पाकिस्तानः
पिद्दी न पिद्दी का शोरवा...-इक़बाल हिंदुस्तानी
एक कहावत है कि जब गीदड़ की मौत आती है तो
वह शहर की तरफ भागता है, इसमें
यह और जोड़ा जा सकता है कि जब पाकिस्तान की तबाही आती है तो वह अमेरिका जैसी
महाशक्ति को आंखे दिखाता है। पाकिस्तान के सेनाप्रमुख जनरल परवेज़ कयानी ने जब यह
चेतावनी दी थी कि अमेरिका हमें ईराक या अफगानिस्तान न समझे क्योंकि हमारे पास
परमाणु बम है, तब
कुछ लोगों को यह लगा होगा कि शायद वाक़ई अमेरिका को एक बार फिर सोचना चाहिये कहीं
ऐसा न हो कि अमेरिका के अधिक दबाव बनाने से पाक बौखलाकर कोई अतिवादी क़दम उठा बैठे
लकिन अब पता चला है कि अमेरिका तो अमेरिका है खुद भारत के जंग के अलावा कोई रास्ता
न बचने जैसे कड़े बयानों से 26/11 के मुंबई हमलों के बाद कैसे पाकिस्तान की सिट्टी
पिट्टी गुम हो गयी थी। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालीज़ा राइस ने अपनी किताब ‘नो हाई ऑनर्स’ में इसकी विस्तार से चर्चा की है।
अमेरिका की भी अजब कहानी है जब तक भारत
कश्मीर और पूरे देश में पाकिस्तान
प्रायोजित आतंकवाद का दंश अकेले झेलता रहा तब तक उसको आतंकवाद के वैश्विक ख़तरे का
अहसास नहीं हुआ लेकिन जब वलर््ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला हुआ तो उसको पूरी
दुनिया ख़तरे मंे नज़र आने लगी। उसने दो टूक एलान कर दिया कि जो इस मामले में उसका
साथ नहीं देगा वह आतंकवाद के पक्ष में माना जायेगा। हमले के एक माह बाद ही अमेरिका
ने अक्तूबर 2001 में अलकायदा को इसका ज़िम्मेदार ठहराकर अफगानिस्तान पर धावा बोल
दिया।
अरबो डालर, लाखों
नागरिकों और हज़ारों सैनिकों की जान जाने के बाद अमेरिका को पता चला कि
समस्या की जड़ तो पाकिस्तान में है। पहले तो उसने
दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी माने जाने वाले ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान
के एबटाबाद में न केवल खोज निकाला बल्कि बिना पाक सरकार की मदद और जानकारी के मौत
के घाट भी उतार दिया। अब उसने पाक सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह नाटक न
करके आतंकवाद के पूरी तरह सफाये के लिये बिना शर्त कार्यवाही में अमेरिका का साथ
दे नहीं तो बर्बादी और दुश्मनी को झेलने को तैयार हो जाये।
दरअसल सारा विवाद उस हक़्कानी ग्रुप पर
कार्यवाही करने का है जिसको पाकिस्तान की सेना अपनी बहुत बड़ी पूंजी मानकर चल रही
है। उधर अमेरिका ने तय कर लिया है कि हक़्कानी आतंकवादी समूह को ठिकाने हर हाल में
लगाना है। 2014 तक अमेरिका को नाटो के साथ ही अफगानिस्तान से विदा होना है लिहाज़ा
वह उससे पहले ही आतंकवाद के सारे बीज वहां से चुनचुन कर ख़त्म करना चाहता है लेकिन
पाकिस्तान और कट्टरपंथी वहां इसके बाद दूसरा ही खेल खेलने की तैयारी किये बैठे
हैं। इसी मुद्दे को लेकर पाक अमेरिकी सम्बंध लगातार बिगड़ रहे हैं।
एक तरफ अमेरिका पाक के न चाहते हुए भी उसपर
आतंवाद के पूरी तरह सफाये के लिये अपना साथ हर स्तर पर देने का भारी दबाव बना रहा
है तो दूसरी तरफ वह अपने बल पर ही उत्तरी वज़ीरिस्तान में हक़्कानी समूह से जबरदस्त
टकराव के लिये तैयारी कर रहा है। अमेरिका को यह विश्वास हो चुका है कि उसकी सारी
कवायद तब तक बेकार है जब तक कि वह हक़्क़ानी समूह का सफाया कर उससे काबुल के
अमेरिकी दूतावास पर हमले का हिसाब बराबर नहीं कर लेता।
पाकिस्तान सरकार का हक़्कानी पर धावा न
बोलने का एक कारण यह तो है ही कि वह उसे बाद में अफगानिस्तान में अपने लिये
इस्तेमाल करना चाहता है लेकिन साथ ही यह भी एक बड़ी वजह है कि उसे लग रहा है कि
हक़्कानी समूह से वह पार नहीं पा सकेगा और तालिबान की तरह उसकी दुश्मनी अमेरिका के
जाने के बाद उसे और भी भारी पड़ सकती है। पाक सेना को याद है कि पहले वह वजीरिस्तान
में तालिबान के हाथों शिकस्त खा चुकी है। उधर अमेरिका को अहसास हो चुका है कि
हक्कानी समूह पाक की ही एक छद्म फौज है।
सच तो यह है कि अमेरिका और पाक के सम्बंध
सीआईए के एजेंट रेमंड डेविस की पाक में गिरफ़्तारी के बाद से ख़राब होने शुरू हो
गये थे। ओबामा डेविस को काफी लंबी जद्दो जहद के बाद ही आज़ाद करा पाये थे जिससे
अमेरिका को लगा कि वह पाक को विश्वसनीय नहीं मान सकता। इसके बाद अमेरिका ने जब
ओसामा को एबटाबाद में बिना पाक सरकार को बताये घुसकर मारा तो न केवल पाकिस्तान
पूरी दुनिया मंे शर्मिंदा हुआ बल्कि यह बात भी खुल गयी कि अब अमेरिका उसको विश्वास
के लायक नहीं मानता।
खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली कहावत
चरितार्थ करते हुए पाक फौज बार बार अमेरिका को गीदड़ भभकी देकर यह दिखाने का दंभी
और दिखावटी प्रयास कर रही है कि हम किसी से कम नहीं। यही वजह है कि रेमंड डेविस के
मामले में ही नहीं वह पहले 9/11 के बाद अलकायदा पर हमले को लेकर भी ऐसे ही तेवर
अमेरिका को दिखा चुका है लेकिन जैसे ही तत्कालीन प्रेसिडेंट जार्ज बुश के इशारे पर
रिचर्ड आर्मिटेज ने उसको सबक़ सिखाने की चेतावनी दी थी तो वह इसके लिये सारी शर्तें
मानने को तैयार हो गया था।
पाकिस्तान भूल रहा है कि उसने दशकों पुराने
तालिबानी सम्बंध भुलाने मंे कुछ ही मिनट का समय लगाया था और अफगानिस्तान में न
चाहते हुए भी अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को मजबूरी में तैयार हो गया
था, यह
अलग बात है कि बाद में उसने बीच बीच में ओसामा को बचाने से लेकर अमेरिका के साथ
विश्वासघात करने के अपने दोगले कारनामे जारी रखे लेकिन अमेरिका सब कुछ जानकर भी
खामोश इसलिये रहा कि उसके पास उस समय कोई विकल्प नहीं था लेकिन अब ऐसा नहीं है।
इस मामले में पाकिस्तान जानता है कि भारत और
अमेरिका में ज़मीन आसमान का अंतर है। अगर वह अफगानिस्तान में अमेरिका के सैनिकों पर
परमाणु हमला करने का दुस्साहस भूल से भी कर बैठा तो उसको ओबामा पूरी तरह तबाह और
बर्बाद करके कहीं का नहीं छोड़ेंगे। पाक जानता है कि भारत से भी वह आमने सामने की
जंग में कभी नहीं जीत पायेगा जिससे वह आतंकी निशाना छिप छिप कर साधता रहता है
लेकिन अमेरिका के साथ वह ऐसा भी नहीं कर सकता क्योंकि अमेरिका के पास पाक पर हमला
करने के बाद खोने के लिये कुछ भी नहीं है।
बराक हुसैन ओबामा को बार बार यह अहसास हो रहा
है कि अगर पाकिस्तान ईमानदारी से आतंक से लड़ने में अरबों डॉलर की मदद के बाद भी
उसका साथ देने को तैयार नहीं है तो उसे सबक सिखाने के अलावा चारा भी क्या है?
0 बरस
बरस के चुकाना है उसे अश्को से,
कभी
ज़मीन से बादल ने जो उधारी की।
अजब
नहीं कि उसे आईना न पहचाने,
इसी
तरह जो अंधेरों से उसने यारी की।।
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