Tuesday, 6 October 2026

चालान नहीं हेलमेट

*अच्छा है हेलमेट बांटो अभियान,* 
*एक्सीडेंट में बचेगी लोगों की जान*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              बिजनौर ज़िले में एसपी श्री विश्नोई के निर्देश पर आजकल अच्छा यातायात सुरक्षा अभियान चल रहा है। पहले नियम के अनुसार बिना हेलमेट टू व्हीलर चलाने वालों का 1000 रुपए का चालान काटा जाता था। अब ऐसे लोगों को मौके पर ही 800 रुपए का हेलमेट खरीदने को प्रेरित कर सेफ रवाना किया जा रहा है। यह मांग बहुत दिन से हम जैसे बहुत से पत्रकार, समाजसेवी और सोशल एक्टिविस्ट पुलिस से करते आ रहे थे कि बिना हेलमेट वालों के चालान काटने की बजाए उनको हेलमेट हाथों हाथ खरीदने को कहा जाए, अब ज़िले में पुलिस ने ऐसा अभियान पांच दिन के लिए चलाकर अब तक लगभग 500 हेलमेट जनपद के विभिन्न नगरों कस्बों और गांवों के आसपास चैकिंग प्वाइंट पर वाहन चालक लोगों को उपलब्ध कराए हैं।
          हालांकि यह काम अगर केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा होता तो और भी अच्छा था। लेकिन शासन केवल चालान की रकम बढ़ाकर हर बार यह मानता है कि इससे लोग अधिक जुर्माना देते हुए डरेंगे और यातायात नियमों का पालन करने लगेंगे। लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्टेशन एंड हाइवे के आंकड़े बताते हैं कि वाहनों के कुल 45000 करोड़ के चालान पेंडिंग पड़े हुए हैं। यह इतना बड़ा आंकड़ा है कि शायद किसी छोटे राज्य का कुल वार्षिक बजट इसके बराबर होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लंबित पड़े चालानों की रकम वसूलने को सरकार से कोई नई रणनीति बनाने को कहा था। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर लोग एक से अधिक चालान होने पर भी बेफिक्र होकर गाड़ी चला रहे हैं और बार बार ट्रैफ़िक रूल तोड़ रहे हैं तो उनके चालान की रकम उनके बिजली के बिल में जोड़कर भेजी जानी चाहिए और अगर वे फिर भी बिल चालान की राशि सहित जमा नहीं करते तो उनकी बिजली काट देनी चाहिए। लेकिन सरकार इस प्रस्ताव पर राज़ी नहीं थी तो उसने भविष्य में ऐसे वाहनों को सीज़ करने का शपथ पत्र कोर्ट में दिया जिनके चालान कटने के बाद लंबे समय से पेंडिंग पड़े हुए हैं।
       हमारे देश समाज और नागरिकों की समझ अजीब है। इनको अपनी जान सुरक्षित रखने के लिए लगाए जाने वाले हेलमेट के लिए भी चालान का डर दिखाना होता है लेकिन बार बार समझाने और चालान कटने के बाद भी अधिकांश लोग हेलमेट लगाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं। कुछ लोग पुलिस चैकिंग को देखकर हैंडिल पर टंगा हेलमेट लगा लेते हैं और आगे बढ़ते ही फिर से उतार देते हैं। कुछ लोग रास्ता बदलकर निकल जाते हैं । कुछ लोग सौ दो सौ और पांच सौ किमी तक का सफ़र बाइक और कार से दिल्ली मुंबई तक बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के पूरा कर लेते हैं और इन बड़े शहरों में एंट्री लेते हुए यह सोचकर हेलमेट और सीट बेल्ट लगाते हैं कि यहां पुलिस चालान करने में सख़्त है। मतलब जान बचाने की परवाह नहीं पुलिस और चालान के डर से ट्रैफ़िक नियम का पालन करते हैं। बिनजौर एसपी के हेलमेट उपलब्ध कराओ सराहनीय अभियान से लोग जितनी बार पकड़े जाएंगे उनके पास उतने ही हेलमेट जमा होते जाएंगे तो वे चालान और फालतू हेलमेट खरीदने से बचने और दुर्घटना होने पर अपनी जान की सलामती के लिए शायद हेलमेट लगाने की आदत डाल लें, वैसे तो टू व्हीलर पर बैठी दूसरी सवारी और बच्चों को भी हर हाल में हेलमेट लगाना ही चाहिए।
*नहीं है वजह ज़रूरी के जब हो,तब मर जाएँ,*
*उदास लोग हैं, मुमकिन है बे सबब मर जाएँ ।*
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अख़बार के संपादक हैं।

बुजुर्ग बेशकीमती इंसान


*बुज़ुर्ग होते हैं बेशकीमती इंसान, इनकी अनदेखी से होगा नुकसान!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
       एक अक्टूबर को हर साल वृद्ध दिवस मनाया जाता है। इस दिन जितनी अच्छी सच्ची और भावुक बातें मंच से वक्ता बोलते हैं, काश वे वास्तविक जीवन में भी साकार होती तो वृद्धों की ज़िन्दगी कितनी आसान, सुखद और सुंदर होती?सीनियर सिटीजन होने से पहले ही हमें एक पत्रकार के तौर पर बुजुर्गों के प्रोग्राम में जाने का कई बार मौका मिला है। वहां हमने कार्यक्रम की कवरेज के साथ ही कई बार मुख्य वक्ता के रूप में वृद्धों और युवाओं की बात भी रखी। कई बार ऐसे आयोजनों का संचालन करने का अवसर भी मिला। जब हमने निज़ामत के दौरान कुछ भावुक शेर पढ़े तो कई बुजुर्गों की आँखें गीली हो गईं। शायद उनको अपनी व्यथा उन पंक्तियों में सुनने को मिली जो वे बहुत दिन से खुद भुगत रहे थे। कई बार हमने युवा पीढ़ी की तरफ से भी उनका पक्ष रखा, उनकी व्यस्तता और मजबूरियां बयान की जिससे दोनों जेनरेशन के बीच संवाद का एक सेतु बन सके। लेकिन सीनियर सिटीजन को यह दुख सताता ही रहा कि उनके बच्चे उनको उस तरह से ट्रीट क्यों नहीं करते जैसा वे चाहते हैं। 
         काशी के एक वृद्धा आश्रम "अपना घर" से पिछले दिनों एक बड़ी दुखद पीड़ादायक और निराश करने वाली ख़बर आई। पता लगा पिछले साल जिन 55 बुजुर्गों ने इस आस में दम तोड़ा कि उनसे मिलने उनके बच्चे एक दिन ज़रूर आयेंगे। उनके परिवार रिश्तेदार और जानकार कोई नहीं आया। इस समाचार का सबसे अधिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला पक्ष यह है कि जो उंगलियों पर गिनने लायक़ चंद बच्चे या परिवार उन बुजुर्गों के आये भी तो वे मरने के बाद भी मातम करने आंसू बहाने या ग़म में नहीं उनकी ज़मीन जायदाद और बीमा लेने को ज़रूरी औपचारिकता पूरी करने, उनका डीएनए सैंपल लेने और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने को मजबूरी में आए थे।
         यह ख़बर पढ़ने के बाद पूरे दिन हमारे दिमाग़ में हलचल चलती रही। रात में भी यह डरावना घिनौना और कड़वा सच बार बार दस्तक देता रहा कि हमारा समाज कितना स्वार्थी लालची और असंवेदनशील हो गया है। कितने क्रूर बेरहम और मतलबी हैं हम लोग जो उन मातापिता को उम्र बढ़ने पर बोझ समझने लगते हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन हमें जन्म देने से लेकर पालने पोसने पढ़ाने लिखाने और शादी से लेकर रोज़गार दिलाने तक में समर्पित कर दिया। बताते हैं जब कोई मां किसी बच्चे को जन्म देती है तो उसको आम इंसान के मुकाबले प्रसव में सात गुना दर्द होता है। कई मां की जान बच्चे पैदा करते हुए चली जाती है। नौ महीने वह खुद से ज़्यादा बच्चे का पेट में ख़्याल रखती है। उसका मन न भी हो तो भी बच्चे की सेहत के लिए खाती है। बच्चे को जन्म देकर कई साल तक ठीक से सो नहीं पाती। खुद गीले में सोती है बच्चे को आराम से सुलाती है। बच्चा जागता है तो वह भी जागती रहती है। जितनी बार रात को बच्चा उठता है रोता है उतनी बार उसको फीड कराती है, साफ़ करती है और दुलारती है। मां की कुर्बानियां अनगिनत है। 
       ऐसे ही बाप का मामला है। कहते हैं बाप जहां जाना भी पसंद नहीं करता, अपने बच्चों के लिए वहां भी हाथ फैला देता है। वह दिन रात काम करता है और अपने बच्चों को बेहतर जीवन स्तर देता है। उनको उच्च शिक्षा दिलाता है। चाहे इसके लिए कर्ज़ लेना पड़े। जो वह खुद नहीं बना अपने बच्चों को बनाना चाहता है। उनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देता है। उनको उस मकाम तक पहुंचा देता है जहां से खुद छोटा नज़र आता है, हारा हुआ लगता है और कमज़ोर लगता है लेकिन फिर भी खुश होता है। इसलिए बच्चों को चाहिए कभी भी मातापिता दादा दादी नाना नानी और किसी भी बुज़ुर्ग को बोझ नहीं समझें, उनको दूध से भाग जाने वाला जानवर नहीं समझें और साथ ही उनको आर्थिक लाभ नहीं देने वाला बुढ़ापे बीमारी और बुरे वक़्त में बेजान सामान नहीं समझें हमेशा भला करने वाला सलाह देने वाला और पूरे परिवार का संरक्षक बेशकीमती इंसान ही समझें।
*मेरी आंखों का तारा ही मुझे आँखें दिखाता है,*
*सिखाया बोलना जिसको वो चुप रहना सिखाता है।*

Sunday, 27 September 2026

ए सी ट्रेन में सभ्यता

*आज का विचार*
*ट्रेन कोच एसी हो या नॉन एसी, डिस्टर्ब न हो किसी की प्राइवेसी*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               ख़बर है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और कर्नाटक संगीत की गायिका शिवश्री स्कन्दप्रसाद एक ट्रेन के ए सी कोच में सफ़र कर रही थी। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, डिब्बे में सवार लगभग 40 यात्री का ग्रुप में लगातार शोर कर रहे थे। उन्होंने टीटी से अपना कोच बदलने की मांग की लेकिन बर्थ उपलब्ध नहीं होने से यह संभव नहीं हो सका। पांच घंटे के सफ़र के दौरान पहले तो उन्होंने उस यात्री समूह की टीटी से शिकायत की जो कार्ड खेल रहे थे और ज़ोर ज़ोर फिल्मी गाने गा रहे थे। टीटी ने एक बार उनको चुप भी कराया मगर कुछ देर बाद वे फिर से वही हरकतें करने लगे। शिवश्री ने अपनी लंबी पोस्ट में ऐसे लोगों से भविष्य में सफ़र के दौरान दूसरों की प्राइवेसी सुविधा और तकलीफ़ न पहुंचाने और सभ्य व्यवहार की अपील की है।
          शिवश्री की इस शिकायत, समस्या और सलाह को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे साथ वाले दूसरे लोगों को लगे हम एक तमीज़ वाले इंसान हैं। इसे आप सिविक सेंस या कॉमन सेंस भी कह सकते हैं। दरअसल हम लोग शोर अनाधिकार चेष्टा और अनचाही चीज़ों के इतने आदी हो गए हैं कि जब कोई इन अवांछनीय और निजता को ठेस पहुंचाने वाली हरकतों पर आपत्ति करता है तो समाज के बड़े वर्ग को वही आदमी ऐसा लगता है जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आया हो। आपने भी ट्रेन बस या सार्वजनिक स्थानों पर अकसर देखा होगा लोग जो मर्ज़ी चाहे मनमानी करते रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि वे जहां हैं वह जगह केवल उनकी निजी नहीं है। अगर आप सार्वजनिक स्थान पर हैं तो आपका फ़र्ज़ है कि आप साथ वाले या पास वाले लोगों को किसी भी तरह से अपनी किसी भी हरकत से परेशान नहीं करें। मिसाल के तौर पर ज़ोर ज़ोर बोलना, हंसना और मोबाइल पर स्पीकर ऑन कर तेज़ आवाज़ में सर्फिंग करना सभ्य सुसंस्कृत और जिम्मेदार नागरिकों को बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। इसके लिए हेड फ़ोन इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही कॉल पर तेज़ आवाज़ में बात करना भी शालीनता नहीं माना जाता। बेहतर है ऐसे में चैट या एसएमएस से जवाब दें।
       इतना ही नहीं कुछ यात्री डिब्बे में अपने बच्चों को खेलने के लिए छोड़ देते हैं जो बाक़ी मुसाफिरों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। कुछ लोग लगातार हंसी मज़ाक और गाली गलौच के साथ घटिया बहस करते हैं। कुछ यात्री अपने पैर सामने वाले की सीट पर रखते हैं और कुछ ढेर सारा सामान बर्थ पर रख देते हैं। कुछ बिना टिकट और बिना रिजर्वेशन के ही दूसरे की सीट/बर्थ हथिया लेते हैं और ख़ाली करने को कहने पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। कुछ कोच के गेट पर खड़े रहकर ट्रेन से उतरने चढ़ने वालों को जगह ही नहीं देते। कुछ फ़र्श पर कपड़ा बिछाकर सो जाते हैं जिससे बर्थ वाले यात्री इधर उधर जाने में दिक्कत महसूस करते हैं। कुछ तेज़ गंध वाला खाना गुटका या शराब पीने लगते हैं। कुछ पान गुटके की पीक और बीड़ी सिगरेट का धुआं छोड़ते रहते हैं। कुछ दूसरों की फ़ोन स्क्रीन को झांकते हैं और ख़ास तौर पर लेडीज़ को नीचे से ऊपर तक बेशर्मी से घूरते रहते हैं या लाइट बंद होने पर छेड़छाड़ भी कर देते हैं। कुछ देर रात तक भी लाइट बंद नहीं करने देते जिससे दूसरे यात्री ठीक से सो नहीं पाते। कुछ बिना परमिशन सामने वाले की बातचीत में शामिल हो जाते हैं जो सलीके के खिलाफ़ माना जाता है। ऐसी और भी अनेक बातें, हरकतें और घटनाएं यहां गिनाईं जा सकती हैं जिससे साथ सफ़र कर रहे दूसरे यात्री असहज हो जाते हैं लेकिन पता नहीं कब कुछ भारतीय दूसरों की प्राइवेसी नागरिक बोध और सभ्यता को समझेंगे। ऐसे लोगों के लिए शायर कहता है...
*सलीक़ा यूं तो आता है बक़द्र ए ज़र्फ़ इन्सां को,* 
*सलीक़ा जिसको कहते हैं बड़ी मुश्किल से आता है।*

Tuesday, 22 September 2026

2029 से पहले यूनिफार्म सिविल कोड

*यूसीसी से न तो मुसलमानों का प्रत्यक्ष नुकसान होगा न ही बीजेपी का अप्रत्यक्ष सियासी फायदा!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के आम चुनाव से पहले बीजेपी व एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जायेगा। उत्तराखंड और गोवा में यूसीसी पहले से ही लागू है। दूसरी तरफ गुजरात में इसी साल मार्च में असम में मई में और मध्य प्रदेश में जुलाई 2026 में यूनिफार्म सिविल कोड का बिल पास हो चुका है लेकिन अभी राज्यपाल/राष्ट्रपति की मंज़ूरी नहीं मिलने से लागू नहीं हुआ है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी लागू करने के लिए प्रक्रिया चल रही है लेकिन इसके लिए अभी केवल ड्राफ्टिंग कमेटी ही बनी है, जो इसकी रूप रेखा पर विचार कर रही है। 
       जहां तक मुस्लिम समाज पर यूसीसी के असर का सवाल है, बेशक उसको धार्मिक रूप से कड़ा ऐतराज होगा और वह अपने संवैधानिक शरीयत कानून का हक़ छिनने पर आहत भी ज़रूर होगा, लेकिन सीएए के खिलाफ़ किए गए अपने असफल आंदोलन से वह इस बार शायद ही आंदोलन को सड़क पर उतरे। अलबत्ता इस्लामी आलिमों की तरफ से यूसीसी का अभी से विरोध शुरू हो गया है जो आगे बयान मांगपत्र और आस्तीनों पर काले बैज लगाने तक सीमित रह सकता है। *यूसीसी के लागू होने पर मुस्लिम पुरुष एक से अधिक शादी, एकतरफा तलाक़, तलाक़ के बाद भरण पोषण से बचाव, निकाह हलाला, तलाक़ या पति की मौत पर मुस्लिम महिला इद्दत (4 माह 10 दिन ) लड़कियों का बाल विवाह उत्तराधिकार में लड़कों को लड़कियों से संपत्ति में हिस्सा आधा और गोद लेने व लिव इन रिलेशन में रहने की मनाही जारी नहीं रख पाएंगे। उनको शादी का रजिस्ट्रेशन कराना भी कानूनन अनिवार्य होगा।* हालांकि यूसीसी अनुसूचित जनजाति को छोड़कर हिंदू सिख ईसाई बौद्ध जैन सभी धर्मों के मानने वालों पर भी लागू होगा, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इस्लामी संगठन इसको शरीयत और मुस्लिम समाज की संस्कृति को प्रभावित करने वाला बताकर विरोध करते आ रहे हैं। आगे भी करेंगे लेकिन आम मुस्लिम उनका खुलकर सक्रिय समर्थन शायद ही करे। सेक्युलर दल और उनकी सरकारें इसीलिये मुसलमानों की नाराज़गी से बचने को यूसीसी लागू नहीं करती थीं और उनमें से अधिकांश अब भी जबरन यूसीसी थोपने के खिलाफ़ हैं। एनडीए के जेडीयू और टीडीपी जैसे कुछ घटक भी इसके सपोर्ट में नहीं हैं लेकिन अंत में वे बीजेपी के सामने घुटने टेक देते हैं तो इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना प्रबल है। कांग्रेस जैसे बड़े सेक्युलर दलों का कहना है कि जब तक मुस्लिम समाज के भीतर से ही यूसीसी लागू करने की मांग नहीं आए तब तक किसी भी सरकार को यूसीसी लागू नहीं करना चाहिए। हालांकि बीजेपी का सियासी मकसद मुस्लिम समाज की भलाई से ज्यादा यूसीसी लागू करके अपने हिंदू वोट बैंक को खुश करना है, लेकिन बदले हुए माहौल में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 हटाने की तरह इस कदम से उसको राजनीतिक लाभ मिलना काफी मुश्किल लग रहा है।
                पहले यूसीसी के मुस्लिम समाज पर पड़ने वाले वास्तविक असर पर बात करते हैं। यह ठीक है कि इससे मुसलमान पुरुषों के अधिकार घटेंगे और कानूनी जिम्मेदारी काफ़ी बढ़ जायेगी लेकिन सीएए और वक़्फ़ बोर्ड संशोधन कानून की तरह पूरे समाज का सीधा नुकसान और भेदभाव का सामना उनको नहीं करना होगा। *जहां तक एक से अधिक शादी पर रोक का सवाल है तो एनएफएसएच 5 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान 1.9 प्रतिशत यानी ईसाई समाज के 2.1 प्रतिशत से कम ही बहुविवाह करते हैं। अलबत्ता यह हिंदुओं के 1.3 प्रतिशत से कुछ अधिक है जबकि बहुविवाह में पूरे देश का औसत प्रतिशत 1.4 है। जाहिर है जैसे कानूनन रोक के बावजूद कुछ हिंदू एक से अधिक पत्नी रख रहे हैं वैसे ही यूसीसी के बावजूद कुछ मुस्लिम भी चोरी छिपे ऐसा करेंगे लेकिन खुलेआम मज़हब की आड़ में बहुविवाह को अधिकार समझने वाले मुस्लिम इससे बचेंगे भी। इस मामले में यह याद दिलाना भी उचित होगा कि इस्लाम में बहुविवाह का चलन उस समय शुरू हुआ था जब जंगों में बड़ी संख्या में मर्द मारे जाते थे और औरतें विधवा हो जाती थीं। अब कम से कम भारत में तो ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी बात शरीयत में एक से ज्यादा निकाह की छूट इस शर्त पर दी गई है जब कोई मर्द सब पत्नियों के साथ सौ फीसदी समान बर्ताव करे जो कि नामुमकिन होता है।* एकतरफा एक समय में तीन तलाक ए बिद्दत पर पहले ही कानूनन रोक लग चुकी है जो कि इसका दुरुपयोग होने से समय की ज़रूरत भी थी, जबकि यूसीसी से तीन माह में दी जाने वाली तलाक ए एहसन पर भी रोक लगेगी तो पति पत्नी की आपसी सहमति से कोर्ट से तलाक़ लेने का रास्ता भी खुलेगा। तलाकशुदा पत्नी को उसकी दूसरी शादी होने तक भरण पोषण का खर्च देना ज़रूरी होगा, जो न्यायसंगत ही है। चर्चित शाहबानो के केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फैसला धारा 125 के तहत दिया था जिसको कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने संसद में पलट दिया था, लेकिन इससे बीजेपी को अपना हिंदुत्व एजेंडा राम जन्मभूमि आंदोलन तेज़ कर आगे बढ़ाने को उर्वर ज़मीन मिली थी। *निकाह हलाला को लेकर खुद इस्लामी आलिमों में भारी मतभेद हैं। सुन्नी मुफ्तियों का बड़ा हिस्सा इसको ग़ैर शरई बताता है जबकि कुछ मुस्लिम विद्वान इसको मान्यता देते हैं जिससे मुस्लिम समाज में यह कुप्रथा कम ही सही लेकिन मौजूद है, इसका ख़ात्मा होना स्वागत योग्य होगा। जहां तक तलाक़ या पति की मौत पर महिला की इद्दत का मुद्दा है तो यह व्यवस्था इस्लाम में ऐसी महिला की दूसरी शादी होने पर होने वाले बच्चे के वास्तविक पिता को लेकर उठने वाले विवाद से बचने को की गई थी लेकिन अब इसके लिए मेडिकल साइंस में ऐसे आधुनिक गर्भावस्था परीक्षण होने लगे हैं जिसको जानने के लिए 130 दिन वेट करने की कोई जरूरत नहीं है।* बालविवाह अन्य धर्मों की तरह मुस्लिम समाज में भी करने की कुप्रथा रही है जिसको यूसीसी से रोकना नाबालिग बच्चियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहतर ही होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक माता पिता से उत्तराधिकार में मुस्लिम बेटियों को बेटों से आधा हिस्सा मिलता है जबकि यूसीसी लागू होने के बाद यह बराबर देना होगा, संविधान की लैंगिक समानता के हिसाब से यह भी ठीक ही होगा। ऐसे ही निसंतान दंपत्ति का बच्चा गोद लेना और मुस्लिम प्रेमी प्रेमिका का लिव इन रिलेशन में रहना अब आम बात है, इसे यूसीसी मान्यता देगा तो अब तक शरीयत में वर्जित इन बातों से मुस्लिम समाज में सुधार ही होगा।
          अब बात करते हैं यूसीसी के सियासी और संवैधानिक मकसद पर तो बीजेपी के एजेंडे में यूसीसी राम मंदिर और धारा 370 के साथ शुरू से ही रहा है। इनमें से दो लक्ष्य उसने पहले ही पूरे कर लिए हैं लेकिन यूसीसी अभी भी बाक़ी है। पहले पीएम मोदी ने 2023 में यूसीसी की चर्चा जब ज़ोरदार तरीके से शुरू की थी तो लगा था वे केंद्रीय स्तर पर इसके लिए कोई विधेयक लाने जा रहे हैं लेकिन बाद में यह तय हुआ कि यूसीसी पहले बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लाया जाए जिससे इसके प्रभाव और प्रतिक्रिया को आंका जा सके। वैसे भी यह मामला संविधान की समवर्ती सूची में आता है जिससे केंद्र व राज्य दोनों इसको कानून बनाकर लागू कर सकते हैं। संविधान सभा भी इस मुद्दे पर बंटी हुई थी इसीलिए इस मुद्दे को भविष्य में विचार के लिए आने वाली सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया था लेकिन संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांत यह ज़रूर कहते हैं कि यूसीसी के लिए नागरिकों के बीच सहमति बनाने का प्रयास जारी रखा जाए। इसी श्रृंखला में 21 वें लॉ कमीशन ने 2018 में अपने परामर्श पत्र में कहा था कि यूसीसी बनाना न तो समय की आवश्यकता है न ही इस दौर में लोगों की इच्छा के अनुसार होगा। आयोग ने देश की विविधता को देखते हुए मौजूदा पर्सनल लॉ में ही सुधार का सुझाव दिया था। इसके विपरीत 22 वें लॉ कमीशन ने 2023 में जनता और धार्मिक संस्थाओं से व्यापक विचार विमर्श के बाद हायर कोर्ट के दिए गए निर्देशों और समय की मांग के अनुरूप यूसीसी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।
         *पिछले दिनों छात्रों की गूंज अभियान के तहत राहुल गांधी ने विशेष रूप से लड़कियों को संबोधित करते हुए मनुस्मृति को कोट करते हुए लड़कियों को संविधान के अनुसार समान अधिकार देने में धार्मिक मान्यताओं को बाधा बताया था। बाद में उन पर बीजेपी नेताओं ने केवल हिंदू धर्म ग्रंथों को निशाने पर लेने और मनु स्मृति की संदर्भ से हटकर गलत व्याख्या के भी आरोप लगाए। उनको मुस्लिम महिलाओं को भी बराबर अधिकार दिलाने के लिए बोलने की चुनौती मिली। उनके इस बयान के बाद इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में एक लेख लिखकर इंडियन मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और रोशनी जैसी प्रगतिशील व आधुनिक विचारों वाली महिलाओं के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं की महिला पदाधिकारियों ने भी राहुल गांधी से मुस्लिम सहित सभी समाज की महिलाओं के लिए समान अधिकार के लिए आवाज़ उठाने की माँग की थी लेकिन इस पर अभी तक राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई जवाब नहीं आया है।* भविष्य के विवाद और केवल बहुसंख्यकों के धर्म ग्रंथों पर उंगली उठाने को लेकर बीजेपी के सियासी नैरेटिव से कांग्रेस को होने वाले राजनीतिक नुकसान से बचने को राहुल गांधी को सभी वर्गों की महिलाओं को समान अधिकार देने की संवैधानिक मांग पर ही फोकस करना चाहिए।

Friday, 11 September 2026

कोर्ट का जुर्माना


हाईकोर्ट का जुर्माना व फटकार, यूपी के अफ़सरों में होगा सुधार?
                   -इक़बाल हिंदुस्तानी
       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चैधरी पर गलत तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने पर वहां के डीएम और पुलिस अफसरों पर पांच लाख जुर्माना और कड़ी फटकार लगाई है। हालांकि यूपी सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है लेकिन केस के तथ्यों व प्रमाणों से वहां से भी उसको राहत मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं। ऐसे ही देवरिया में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के आरोप में उच्च न्यायालय ने वहां के एसएचओ के वेतन से काटकर 65000 रूपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस के जवाबों से नाराज़ होकर उसको ‘‘झूठों का झुंड’’ तक बता दिया। उधर नोएडा में ही एक छात्र को जंतर मंतर के आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में एक मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए कोर्ट की मानहानि की कार्यवाही की चेतावनी दी है।
        नोएडा के मामले में कोर्ट ने छात्रा आकृति पर एनएसए लगाने को पूरी तरह गलत बताते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत बताया। आपको याद दिला दें कि आकृति दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ ही सोशल एक्टिविस्ट है। आकृति को नोएडा में हुए मज़दूर आंदोलन के आरोप में अप्रैल 26 में गिरफतार कर पांच माह से जेल में रखा गया था। आकृति पर मज़दूर आंदोलन मंे 13 अप्रैल को हुई हिंसा फैलाने का आरोप था जबकि उसको 12 अप्रैल को ही पकड़कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। इससे पहले आकृति ने मज़दूरों के बीच केवल एक बार भाषण दिया था जिसमें उसने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाये रखने की अपील भी की थी। आकृति पर दूसरा आरोप व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें हिंसक विचार फैलाने का था। जांच में पाया गया कि ग्रुप शिक्षा व समाजसेवा के लिये था लेकिन इसमें पहचान छिपाकर नोएडा के दो पुलिसवाले शामिल हो गये थे। हैरत की बात यह रही कि यही पुलिसवाले विवादित पोस्ट डाल रहे थे। ग्रुप में शामिल अमनपसंद और कानून का पालन करने वाले सदस्यों ने इन पोस्ट पर आपत्ति की और इनको तत्काल डिलीट भी कर दिया था। यहां जो मामले दिये गये हैं वे हाल ही के हैं। कोर्ट पहले भी कई बार यूपी सरकार पुलिस और प्रशासन को नियम कानून व संविधान के हिसाब से काम करने को सख्त लहजे में निर्देश दे चुका है। किसी भी आरोपी के घर पर बुल्डोज़र चलाने, एनकाउंटर करने और फर्जी केस बनाकर किसी को भी हिरासत में लेने पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लेकर थर्ड डिग्री देने और एनएसए व यूएपीए जैसे बेहद कड़े कानून का सत्ता के इशारे पर गलत इस्तेमाल करने के कई मामलों में कोर्ट पहले भी शासन प्रशासन और पुलिस को कड़ी चेतावनी दे चुका है। 
             देखने मंे यह आ रहा है कि कुछ अधिकारी संविधान से अधिक अपने आकाओं को खुश करने के लिये कानूनी गैर कानूनी काम करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। उनको वेतन जनता के दिये कर से मिलता है। आज नहीं तो कल सरकार बदल सकती है। उनकी जवाबदेही नियम कानून और उनके किये गये कामों के हिसाब से बाद में भी कभी ना कभी हो ही सकती है। वे भी एक दिन कानून के शिकंजे में फंस सकते हैं। उनका असली काम जनता की रक्षा करना उसकी सेवा करना और जनहित की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना है। लेकिन आज अनेक भ्रष्ट अफसर लालच अच्छी पोस्टिंग रिश्वत की मोटी कमाई और अपनी कानून के खिलाफ पहले की गयीं कारगुजारियां छिपाने के लिये सत्ताधारी दल के लिये उसका राजनीतिक पक्षपातपूर्ण भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक एजेंडा लागू करने का औज़ार बने हुए हैं। अगर कोर्ट उनको ऐसे ही हर गलती हर अन्याय और हर मनमानी पर फटकार लगाकर जुर्माना लगाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बेलगाम नौकरशाही को अपनी वर्दी अपनी नौकरी और जुर्माने से बचाने को मजबूर होकर संविधान के दायरे में ही काम करना होगा। फिर हाशिये पर पड़े अच्छे ईमानदार और योग्य अधिकारियों को अपना काम सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय करने का मौका भी मिलेगा। क़तील शिफाई का एक शेर याद आ रहा है- हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले, क़ीमते देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और तर्कशील समाज अखबार के चीफ एडिटर हैं।

भारत हिंसक देशों में क्यों?

*भारत दुनिया के सबसे अधिक हिंसक देशों की सूची में कैसे पहुंच गया?*
                    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*       

        हाल ही में ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती हिंसा और बेकाबू जघन्य अपराधों के उठते ग्राफ के कारण हमारे देश की गिनती दुनिया के सबसे अधिक 50 हिंसक देशों में की गयी है। विश्व शांति सूचकांक के आधार पर जारी की गयी इस रिपोर्ट में कुल 163 देशों को शामिल किया गया है। जिनमें भारत की रैंक 127 वीं है। इस सर्वे के अनुसार भारत पिछले साल के मुकाबले 12 पायदान नीचे खिसक गया है जबकि आइसलैंड जैसे छोटे देश ने शांतिप्रिय देश की अपनी उपलब्धि बरकरार रखी है। भारत की रैंक में गिरावट के खास कारणों में मणिपुर में लगातार जारी जातीय हिंसा तो है ही, इसके साथ ही देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा, दलित आदिवासियों और गरीबों पर भेदभाव के कारण हमले दुस्साहसी व्यक्तिगत हिंसा, महिलाओं तथा बच्चों के साथ यौन हिंसा व साम्प्रदायिक टकराव और पुलिस पर लगने वाले उत्पीड़न अत्यधिक बल प्रयोग और फर्जी एनकाउंटर हाफ एनकाउंटर के बढ़ते आरोप भी शामिल हैं। हालांकि पड़ौसी देशों के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान 152 तो अफगानिस्तान 157 वें स्थान पर हिंसा में हम से काफी आगे नज़र आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नेपाल 111 बंग्लादेश 117 हम से थोड़ा सा बेहतर हैं तो भूटान 16 और श्रीलंका 67 वें स्थान पर भारत ही नहीं पूरे एशिया में बहुत अच्छी हालत में हैं। दरअसल दुनिया के स्तर पर अमनचैन और सुरक्षा से जुड़े इस इंडेक्स को सिडनी स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर इकाॅनोमिक्स एंड पीस द्वारा किया जाता है। दुनिया का थिंक टैंक मानी जाने वाली इस संस्था का कहना है कि विश्व शांति सूचकांक को बनाते समय 22 मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है जिनमें विशेष रूप से सरकारों की कार्यशैली, अच्छा कारोबारी माहौल, संसाधनों का समान वितरण, दूसरों के अधिकारों की परवाह, पड़ौसियों से बेहतर सम्बन्ध, सूचनाओं का विश्वसनीय आदान प्रदान एवं मानवीय पूंजी के आदर्श रखरखाव, गरिमा व सम्मान को दृष्टिगत रखा जाता है।
         पीस इंडेक्स के आधार पर भारत की सीमाओं पर तनाव टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नज़र डालें तो साफ नज़र आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना यह है ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साज़िश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है। 
        *मिसाल के तौर पर हाल ही में पकड़ा गया स्वतंत्र भारद्वाज न केवल जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं के वैचारिक तौर पर पूरी तरह खिलाफ था बल्कि वह अपने आक़ाओं के इशारे पर उन पर जानलेवा हमला कर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक पाॅडकास्ट में इसे दुस्साहस और अहंकार के साथ स्वीकार भी कर रहा था। जिस सोशल मीडिया इंफलूएंसर लड़की के पिता पर उसने घातक हमला किया वह दलित थी। दलितों को लेकर पक्षपात अन्याय और दमन हमारे समाज की आज भी एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे ही कुछ संकीर्ण संगठन एक पार्टी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने दिन रात काम करके अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के बारे में आम लोगों की यह झूठी राय बना दी है कि ये लोग ही समाज और देश की अनेक समस्याओं के लिये ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि पुलिस का रूख़ भी इस वर्ग को लेकर अकसर पूर्वाग्रह का नज़र आता है। पिछले दिनों गुजरात के भावनगर में फैज़ल नाम के एक युवक ने अपने साथ कई साल से रहने वाली हिंदू महिला काजलबेन की हत्या कर दी थी। पुलिस ने फैजल को पकड़कर सार्वजनिक रूप से जमकर पीटा। इसका वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस के पक्ष में खड़ा नज़र आया। जो लोग पुलिस को नहीं कोर्ट को सज़ा देने का कानूनी अधिकार होने की बात कह रहे थे उनको अंधभक्तों ने ट्राॅल करना शुरू कर दिया।* इस घटना से यह भी पता चलता है कि एक वर्ग कानून से इतर हिंसा के पक्ष में पूरी बेशर्मी से खड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में आरोप लगते है कि यूपी सहित कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों की सरकारों में किसी पर गोकशी या हत्या बलात्कार का गंभीर अपराध का आरोप लगता है और पुलिस प्रशासन उसे हथियार बरामद करने या हत्या का सीन रिक्रियेट करने मौक ए वारदात पर देर रात ले जाकर मुठभेड़ में मार देता है। कुछ लोगों के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर भी खूब हो रहे हैं। थाने में हिरासत के दौरन असहनीय यातना और थर्ड डिग्री देने के मामले तो अनगिनत हैं लेकिन पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर जांच करने वाले मजिस्ट्रेट निचली अदालतें और मानव अधिकार आयोग तक शिकायत के बावजूद इसका संज्ञान नहीं लेते हैं।
             जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कई साल पहले रात के अंधेरे में कुछ लोगों ने छात्रावास पर हिंसक हमला किया था। पुलिस वहां तमाशा देखती रही। इसके बाद जब एक पार्टी के छात्र प्रकोष्ठ की कोमल शर्मा पर हमले में शामिल होने का आरोप लगा तो पुलिस जांच के नाम पर उस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर आज तक सो रही है। पिछले महीने बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में ठीक ऐसा ही मामला फिर से देखने में आया। पुलिस वहां भी चुपचाप सब कुछ देखती रही लेकिन सरकार ने भी इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। आरोप है कि कई साल पहले दिल्ली में सीएए के खिलाफ चले शाहीन बाग आंदोलन, महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित सम्मेलन और शम्भू बोर्डर पर चले किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया। कुछ साल पहले दिल्ली के गार्गी काॅलेज में चल रहे समारोह में भी कुछ बाहरी तत्वों ने अपनी नापसंद एक प्रोग्राम के बाद जमकर वहां के छात्र छात्राओं से मारपीट की थी लेकिन जांच के नाम पर उस मामले को भी दबा दिया गया था। रोड पर किसी की गाड़ी टकरा जाने पर थोड़ा सा नुकसान होने पर आरोपी को पीट पीटकर मार देने की घटनाएं भी हाल ही में बहुत बढ़ चुकी हैं। मामूली गलती करने पर स्कूलों में बच्चों को पीटने और कॉलेज यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में छात्रों की आपसी हिंसा भी रुकने का नाम नहीं ले रही है।
        *अब नया ट्रेंड देखने में आ रहा है जिन मामलों में सरकार अपने विरोधी अहसमत या आलोचकों को पुलिस या कोर्ट से सबक सिखाने में असमर्थ पाती है उनमें विपक्ष का आरोप है कि नाॅन स्टेट एक्टर हिंसा करने चले आते हैं। अगर ये मौके पर रंगे हाथ या किसी गवाह और सबूत के आधार पर पकड़कर पुलिस को सौंप भी दिये जाते हैं तो भी अव्वल तो स्वतंत्र भारद्वाज के अनुसार इनके आकाओं के इशारे पर इनके खिलाफ मुकदमा ही कायम नहीं हो पाता और अगर कभी कभी कहीं कहीं राजनीतिक नुकसान या कानून व्यवस्था की मजबूरी में केस दर्ज भी किया जाता है तो हल्की यानी ज़मानतीय धाराओं में लिखा जाता है। इसके बाद इनके खिलाफ गंभीरता से निष्पक्ष जांच गवाह और सबूत नहीं जुटाये जाते और कभी कभी जनता की नज़र हटते ही फाइनल रिपोर्ट लगाकर या मुकदमा वापस लेकर केस खत्म कर दिये जाते हैं।* इस तरह से जब लोगों को लगता है कि उनको वर्तमान सरकार पुलिस और उसकी पक्षपात करने वाली जांच एजेंसियों के रहते न्याय नहीं मिलेगा वे कभी कभी खुद कानून हाथ में लेने पर उतर आते हैं जोकि ठीक नहीं माना जा सकता लेकिन यह समाज में हिंसा के दुष्चक्र को और बढ़ावा देता है। हालत इतनी बदतर है कि हिंसा के कई मामले में माॅब लिंचिंग होने पर जिसकी सामूहिक हिंसा में भीड़ ने हत्या की उसी पर चोरी लूट या हमले का झूठा केस दर्ज कर दिया जाता है। हमारा मानना है जब तक सबको न्याय रोज़गार सबको संसाधनों राष्ट्रीय आय व सम्पत्ति में समान अधिकार रोटी कपड़ा मकान शिक्षा चिकित्सा और मान सम्मान मानवीय गरिमा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक हिंसा का दुष्चक्र रोकना कठिन है।

38 साल से नहीं हटा अतिक्रमण

#इस_तरह_के_अतिक्रमण_को_कोई_38_साल_से_नहीं_हटा_रहा...
          नजीबाबाद के कई मोहल्लों में कल किसी काम से पैदल घूमने का मौक़ा मिला। कई सड़कों पर लोगों ने पूरी बेशर्मी और निडरता से अवैध कब्ज़ा कर रखा है। लगभग सभी पालिकाएं शासन के निर्देश पर कभी कभी मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण हटाने का औपचारिक अभियान चलाकर अपने कर्तव्य की अतिश्री कर लेती है।कोई भी स्थानीय निकाय न तो आगे यह देखती है कि नया अतिक्रमण नहीं हो न ही पुराने हटाए गए अतिक्रमण को फिर से होने से रोकने को कोई तंत्र बनाते हैं। यूपी में 1988 से सुपरसीड किए हुए स्थानीय निकायों में चुनाव फिर से होने शुरू हुए थे। आशा थी कि अफसरों के मुकाबले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से जनता को अधिक राहत मिलेगी क्योंकि वे उनके बीच से चुनकर आएंगे तो उनकी बात को बेहतर समझेंगे। कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी लेकिन सभी स्थानीय लोगों को नाराज़ नहीं करने की नीति से यह भी हुआ कि वे सख़्ती से अतिक्रमण नहीं हटा सके। कुछ लोगों ने अपने घर दुकान और ऑफिसों के सामने नाले नाली नहीं बनने दी। अगर पहले से बनी हुई थी तो उनको पाट दिया। इसके पीछे सार्वजनिक सड़क निजी उपयोग के लिए कब्जाने की नीयत थी। दरअसल नाली ही वो सीमा रेखा है जो अतिक्रमण की सबसे पहले पोल खोल देती है। कई सड़कें खुद बता रही हैं कि वे इधर 15 फिट थी तो उधर 10 फिट रह गई , फिर आगे 12 फिट हो गई यानी जिसका जितना मन हुआ उसने उतनी दबा ली। अजीब बात यह है जब पालिका नई सड़क बनाने आई तो उसने जितनी सड़क बची थी उतनी ही बना दी, अतिक्रमण नहीं हटाया। इससे कई जगह पानी की निकासी भी रुक गया। कई मोहल्लों में भारी जलभराव शुरू हो गया जो आज तक जारी है। कई नालों को पाटकर दुकानदारों ने अपने सामने की सड़क की तरफ पानी का रुख कर दिया। पालिका फिर भी नहीं बोली। फिर इनमें से कुछ ने कई पालिका के नाले की कब्ज़ाई जगह कई हज़ार किराए पर दे दी। नगर में कई जगह लोगों की अपनी दुकान की जितनी गहराई है, उससे ज़्यादा उन्होंने सड़क पर स्थायी और फ्लेक्स बोर्ड या दुकान का सामान रखकर अस्थायी अतिक्रमण कर रखा है। एक सड़क तो साफ़ बता रही है कि उसको अवैध कब्ज़ा करके आधा कर दिया गया है...हिंदुस्तानी