Wednesday, 13 May 2026

चिड़िया का बच्चा

*आज का विचार*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*चिड़िया_का_बच्चा_चाइनीज़_मांझा और हमारा परिवार...* 🤔
कुछ दिन पहले हमारे घर में एक पौधे पर एक खूबसूरत चिड़िया ने घोंसला बनाया। उसके बाद उसने अंडे दिए। उसके बाद एक बच्चा पैदा हुआ। चिड़िया उसकी देखभाल कर ही रही थी। हम लोग भी आंधी या बारिश में उस घोंसले पर कपड़े सुखाने का स्टैंड लगाकर उस पर प्लास्टिक की शीट डाल देते थे। चिड़िया उस मासूम बच्चे के लिए अक्सर अपने मुँह में कीड़े लाती थी और अपने बच्चे को खिलाती थी। कभी कभी चिड़िया बहुत देर से आती या पूरी रात नहीं आती तो बच्चे के भूखा होने और लगातार बोलने पर मेरा बेटा या बेगम उसको चावल या दूध खिलाने पिलाने की कोशिश करते थे। एक छोटी कटोरी में पीने को पानी भी रख दिया था। अभी तक सब ठीक चल रहा था। बच्चा धीरे धीरे बड़ा हो रहा था। उसके पर भी निकलने लगे थे। उड़ने की तैयारी कर रहा था। आँखे खोलता था। मां खाना लाती तो फौरन मुंह खोलता था। ऐसा लगता था उसकी आवाज़ से जैसे चिड़िया के देर से आने की मासूम शिकायत कर रहा है ।अचानक एक दिन उसकी चिड़िया मां जब खाने को कुछ लाई। उसके मुंह में उस खाने को डाल दिया। पता लगा आए दिन लोगों की गर्दन और हाथ काटने को बदनाम चायनीज़ मांझा भी उस खाने के साथ उलझा हुआ था। वही हुआ जिसका डर था कि खाना निगलने से पहले ही मांझा चिड़िया के बच्चे के मुंह में फंस गया। मासूम बच्चा दर्द से चिल्लाने लगा। उसके बोलने की आवाज़ में दर्द की असहनीय तकलीफ़ सुनकर ही महसूस हो रही थी। मैं ने जैसे ही वो मांझा बच्चे के मुंह से निकालना चाहा देखा तो उसके मुंह में जीभ के साथ चिपका हुआ था। इसी दौरान उसकी मां चिड़िया ने बच्चे को खतरा देख मेरे सर पर हमला करना चाहा और ज़ोर ज़ोर चीखना शुरू कर दिया। फिर मेरे बेटे ने चिड़िया के वहां से जाने का वेट करने को कहा। चिड़िया कुछ देर बाद उड़ गई। फिर बेटे ने बड़ी फुर्ती से बच्चे के मुंह में फंसा मांझा छोटी कैंची से काटकर निकाल दिया। इसके बाद बच्चा नॉर्मल हो गया। चिड़िया भी वापस घोंसले में आकर उसके साथ सहज होकर बैठ गई। उसके लिए जो खाना लाई वो बच्चा आराम से खा रहा है। दोनों खुश हैं और इधर हमारा पूरा परिवार भी चिड़िया और उसके बच्चे की खुशी से सकून से है। बच्चे के मुंह से मांझा निकालने और बच्चे व चिड़िया के नॉर्मल हो जाने से ऐसा सुख मिला मानो किसी फैमिली मेंबर का ऑपरेशन कामयाब हो गया हो। चिड़िया जब जब घर में आती है, चहचहाती है, उसका बच्चा बोलता है, तो घर में ऐसे रौनक हो जाती है जैसे परिवार का कोई बच्चा जब खिलखिलाता है तो परिवार खुशी से भाव विभोर हो जाता है। परिंदों की भी अपनी दुनिया है लेकिन जब वे कभी कभी कुछ टाइम के लिए हम इंसानों के साथ रहने लगते हैं तो उनके सुख दुख भी हमारे खुशी ग़म हो जाते हैं। यह हमने इससे पहले भी कई बार शिद्दत से महसूस किया है। आपने भी कभी कभी ऐसा ही महसूस किया होगा। अगर हम में इंसानियत मुहब्बत और संवेदनशीलता है तो हम इंसानों का नहीं सभी जीवों का दर्द और खुशी महसूस कर सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जिसमें पूरी कायनात के जीव मिल जुलकर दुख सुख साझा करके और एक दूसरे की मदद कर के आराम से प्यार से सह अस्तित्व के साथ रह सकते हैं। 
मनव्वर राणा का माँ बच्चे पर लिखा एक शेर याद आ रहा है_*खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,*
*बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही।*

वामपन्थ कभी खत्म नहीं होगा...

*जब तक शोषण अन्याय रहेगा, तब तक वामपंथ भी रहेगा!* 
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
            देश में पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी थी। संयोग की बात है कि पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के चुनाव में देश के एकमात्र राज्य केरल में बची वामपंथी सरकार भी हार गयी। इसी के साथ ही वामपंथ के चिरपरिचित विरोधी साम्प्रदायिक और पूंजीवादियों ने झूठा राग अलापना शुरू कर दिया कि अब भारत से कम्युनिस्ट विचारधारा हमेशा के लिये खत्म हो गयी। यह उनका बचकाना नादान और मूर्खतापूर्ण दावा है कि भारत ही नहीं दुनिया से कभी कम्युनिस्ट विचारधारा खत्म हो सकती है। उनको पता होना चाहिये कि वामपंथी सोच का अस्तित्व और जन्म मज़दूर किसान गरीब कमजोर दलित और अल्पसंख्यकों के शोषण अत्याचार अन्याय के खिलाफ हुआ है। ज़ाहिर बात है कि जब तक दुनिया और हमारे देश में भी ये सब असमानतायें कमियां और बुराइयां मौजूद हैं तब तक उनके खिलाफ लड़ने की इंसान की इच्छा शक्ति लक्ष्य और सपना भी जीवित रहेगा। इसलिये वामपंथ का कभी अंत नहीं होगा। जब दशकों तक जनसंघ और बीजेपी सत्ता में नहीं आई तो क्या संघ की विचारधारा देश से खत्म हो गयी थी? नहीं क्योंकि विचारधारा का सत्ता से सीधा सरोकार नहीं होता है। अंग्रेजी में एक शब्द विलफुल थिंकिंग है। यह उन दावों के लिये इस्तेमाल होता है। जिनमें आदमी उस तरह की सोच का शिकार होता है जैसा वह देखना चाहता है। सामने सच और हकीकत कुछ और होते हुए भी वह उसको झुठलाता है। मिसाल के तौर पर हिंदुओं का एक वर्ग खुद को सर्वश्रेष्ठ और विश्वगुरू मानता है तो वह वास्तविकता इससे विपरीत होने पर भी इस कल्पना में ही जीता रहता है कि वह जो मानता है वही हो रहा है और वही होगा। ऐसे ही मुसलमानों का कट्टरपंथी तबका अपने इस्लाम को दुनिया का सबसे बेहतरीन मज़हब बताता है और यह भी दावा करता है कि दुनिया में एक दिन सब लोग मुसलमान होंगे और इस्लाम का राज होगा जबकि हकीकत से यह दावा बिल्कुल उल्टा है। ऐसा होने के दूर दूर तक आसार भी नहीं हैं। लेकिन वह हर घटना हर जंग और हर बात को इसी से जोड़कर खुशफहमी में जीता है। जब सोवियत संघ का पराभव हुआ उस समय भी नवउदारवादियों ने दुनिया से वामपंथ की अंतिम विदाई का समूह गान किया था, लेकिन रूस तो फिर से खड़ा हो गया। साथ ही वह दुनिया की पांच वीटो पाॅवर वाले परमाणु शक्ति वाले देशों के क्लब में भी बना हुआ है।
          इतना ही नहीं आज वामपंथी चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को अमेरिका से होड़ कर रहा है। वह तकनीक हथियार और नये नये क्षेत्रों में दुनिया की महाशक्तियों को चुनौती दे रहा है। अपने देश में निर्मित सस्ते माल से चीन ने दुनिया के तमाम देशों को पाट दिया है। दुनिया के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें चल रही हैं। यह ठीक है कि भारत में पश्चिमी बंगाल के बाद त्रिपुरा और अब केरल से कम्युनिस्ट सरकार की विदाई हो गयी है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि बंगाल में सबसे अधिक लंबे समय तक सरकार चलाने का रिकाॅर्ड भी कम्युनिस्टों के नाम 34 साल का है। केरल में बारी बारी से कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन वामपंथी सरकार को रिप्लेस करता रहा है। लेकिन आप तीनों राज्यों में देखें तो भूमि सुधार सार्वजनिक शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था विकेंद्रीयकरण साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिये सामाजिक चेतना सहित मज़दूरों को न्यूनतम सम्मानजनक वेतन गरीबों को जीवन यापन के लिये भूमि बेरोज़गारों को रोज़गार मिलने तक गुजारा भत्ता आदि जनहित की अनेक योजनायें वामपंथियों की देन रही है। केरल में एलडीएफ की सरकार की हार के बाद यह पहला मौका है कि वामराज के एक दौर पर फिलहाल विराम लगा है। लेकिन यह समझना भूल होगा कि अब कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं होगी। यह सच है कि 1977 के बाद देश में पहली बार किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है। यह याद रखना चाहिये कि 1957 में जब केरल में पहली बार नंबूदरीपाद के वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे तब वह भारत के ही किसी राज्य नहीं दुनिया में पहली चुनी हुयी कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया बने थे। नंबूदरीपाद देश के पहले गैर कांग्रेसी सीएम भी थे। उनकी सरकार को तत्कालीन केंद्रीय कांग्रेसी नेहरू सरकार ने बिना किसी ठोस कारण के दो साल बाद ही बर्खास्त कर दिया था। लेकिन उन्होंने बार बार चुनाव जीतकर केरल को सबसे अधिक साक्षर और मानव मूल्य विकास में अग्रणी बना दिया था। बंगाल में वामपंथी मुख्यमंत्री ज्योति बसु भूमि सुधार पंचायती राज और राजनैतिक स्थिरता के साथ सबसे लंबे समय 23 साल तक राज करते रहे। उनको 1996 में देश में संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिल रहा था लेकिन कम्युनिस्टों की अपने बहुमत से ही पीएम बनने की ज़िद ने भारतीय राजनीति को नई दिशा देने का स्वर्णिम अवसर खो दिया जिसको बाद में वामपंथी इतिहास की हिमालय जैसी भूल माना गया। वर्ना आज देश की राजनीति का रूप रंग कुछ और ही होता।
         यह भी एक सच है कि बदलते हालात के हिसाब से कम्युनिस्ट नहीं बदले और भारत की जाति व्यवस्था को स्वीकार करने की बजाये वर्ग संघर्ष को ही प्राथमिकता देकर पंूजीवाद का लगातार विरोध करते रहे जिससे वामपंथी राज्यों में पूंजी निवेश घटता गया और रोज़गार घटने से प्रति व्यक्ति आय का मुकाबला अन्य राज्यों से करने में समस्या आने लगी। संसद में भी एक दौर था जब कम्युनिस्ट सांसदों की संख्या 60 से अधिक थी लेकिन अमेरिका से परमाणु संधि पर विवाद के बाद कम्युनिस्टों ने यूपीए की मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके साथ ही यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कभी मुख्य विपक्ष बनकर रहने वाले कम्युनिस्ट जाति और धर्म की राजनीति का वर्चस्व बढ़ने पर धीरे धीरे किनारे होते गये। भारत के लोगों में कम्युनिस्टों को लेकर उनके नास्तिक होने का भी सियासी नुकसान हुआ क्योेंकि भारतीय मूल रूप से धार्मिक और अंधविश्वासी होते हैं जबकि वामपंथी धर्म को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में लाने के खिलाफ रहे हैं। साथ ही यह भी रिकाॅर्ड है कि कम्युनिस्टों के राज में एक भी मंदिर मस्जिद नहीं तोड़ी गयी ना ही किसी धर्म के मानने वालों को उनके पूजा या नमाज़ जैसी किसी गतिविधि से रोका गया लेकिन चुनावी राजनीति महंगी और जाति व धर्म आधारित होते जाने से भी वामपंथी खुद को हाशिये पर जाता देखते रहे। सबसे बड़ी कमी उनकी यह रही कि उन्होंने समय रहते लोगों को प्रगतिशील विवेकशील तर्कशील और वैज्ञानिक सोच का नागरिक बनाने को कोई विशेष सांस्कृतिक सामाजिक और चेतना व जागरूकता का सघन अभियान नहीं चलाया जिससे संघ व बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता में आने और लोगों के दिमाग पर मीडिया के ज़रिये कब्ज़ा करने का मौका मिल गया। लेकिन यह भरोसा रखना चाहिये कि जब तक समाज में असमानता पक्षपात और अन्याय है तब तक वामपंथी सोच को दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती, भारत भी इसका अपवाद नहीं है। शायर ने कहा है- *मेरे बच्चे तुम्हारे लफ्ज़ को रोटी समझते हैं, ज़रा तक़रीर कर दीजिये कि इनका पेट भर जाये।* 
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से हिंदी पत्रकारिता और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हैं।*

Thursday, 7 May 2026

टीएमसी की हार

*बंगाल में टीएमसी की हार, ममता खुद भी ज़िम्मेदार?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
   *0 इसमें कोई दो राय नहीं पांच राज्यों में आये चुनाव नतीजे बंगाल से काफी अलग हैं। इसके कारण भी अलग अलग हैं। एसआईआर भी इन पांच राज्यों सहित अब तक देश के कुल 14 राज्यों में हो चुकी है लेकिन जिस तरह से बंगाल में 27 लाख लोगों को चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस कारण के वोट डालने से रोक दिया, उससे यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया कि मतदाता सरकार चुनते हैं बल्कि अब आप कह सकते हैं कि सरकार उन मतदाताओं को चुन रही हैं जो उसको सत्ता में लाने के लिये वोट कर सकते हैं। साथ ही एक पेटर्न आप इन चुनाव नतीजों में और देख सकते हैं कि ममता चाहे अपनी हार का एकमात्र कारण चुनावी धांधली बेईमानी और पक्षपात बतायें लेकिन वह राज्य में बीजेपी को स्पेस देने के साथ कैसे इस हार की खुद भी ज़िम्मेदार हैं, सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस लेख में हम तथ्यों और प्रमाणों के साथ आपको बतायेंगे।*
        राजनीति के जानकार बताते हैं कि जो दल नेता या गठबंधन कभी न कभी बीेजेपी के साथ अपने स्वार्थ में यह जानने के बाद भी जुड़े हैं कि उसका रास्ता गलत है, उनको देर सवेर भाजपा ने खत्म कर अपने अंदर समा लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर टीएमसी पीडीपी बीजू जनता दल जनता दल यू बसपा शिवसेना जननायक जनता पार्टी अकाली दल और अप्रत्यक्ष रूप से के चंद्रशेखर राव जगन मोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल जैसे नामों की एक लंबी सूची बन सकती है जो कभी न कभी बीजेपी से अपने अवसरवादी सिध्दांतहीन और परंपरागत मूल्यों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ में जुड़े और आज बीजेपी उनको निगल गयी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी की हार में केंचुआ का एसआईआर के बहाने वोट चोरी के साथ ही उनकी सरकार के खिलाफ पनप रहा जन असंतोष उनके कैडर का कट मनी वसूलना और उनके खिलाफ 15 साल की एंटी इनकम्बैंसी भी का भी रोल रहा है लेकिन सबसे बड़ी वजह जो लोग भूल चुके हैं। वह यह है कि ममता बनर्जी ने जो बोया आज उनको वह काटना पड़ा है। 29 साल पहले 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस नाम से वरिष्ठ बंगाली नेता मुकुल राय के साथ मिलकर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी परंपरागत विरोधी कांग्रेस और वामपंथी दलों को खत्म करने और अपने मुस्लिम वोट बैंक को डराकर बीजेपी को बंगाल में प्रवेश कराने में हर तरह का सहयोग दिया। बीजेपी जो पहले से ही कम्युनिस्टों और कांग्रस की विरोधी नहीं शत्रु की सीमा पार करके उनका नाम ओ निशान मिटाना चाहती थी, को बिन मांगी मुराद पूरी करने का अवसर मिल गया। मौका मिलते ही बीजेपी ने टीएमसी के संस्थापक सदस्य और ममता के राइट हैंड समझे जाने वाले मुकुल राय पर छापा मारकर उनको बीजेपी में ले लिया।
         इसके बाद ममता खुद 1999 में एनडीए सरकार में शामिल होकर रेल मंत्री बन गयी। जबकि यहीं से उनका राजनीतिक पतन शुरू हो गया। 2001 में रक्षा सौदों में कमीशन खाने का स्टिंग सामने आने पर वह कथित नैतिकता की दुहाई देकर अपना पद त्याग कर एनडीए से अलग हो गयीं। उसके बाद 2001 में ममता ने बीजेपी को अपनी स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में एनडीए में लौटने की संभावना व्यक्त की। 2003 में ममता फिर से एनडीए सरकार में बिना विभाग की मंत्री बन गयीं। इसी साल ममता ने आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के एडिटर तरूण विजय की वामपंथी आतंक पर लिखी गयी किताब के विमोचन समारोह में अपनी हाज़िरी लगाई। संघी अख़बार के संपादक ने उनको बंगाल की दुर्गा बताकर हाथो हाथ राजनीतिक हिसाब बराबर कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ संघी लेखक और राज्यसभा सांसद बलवीर पंुज ने ममता को सदन में ‘‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं’’ कहकर नवाज़ा। इतना ही नहीं बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ हिंसक संघर्ष में टीएमसी और संघ एक ही पेज पर खुलकर आ गये। ममता ने संघ से मेलजोल बढ़ाते हुए आरएसएस के मोहन भागवत मदन दास देवी और शेषाद्रि चारी को सच्चा देशभक्त बताया। 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता की सादगी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में शामिल हैं, जो सियासत का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये नहीं करते हंै। इसके बाद हालांकि ममता ने यह ज़ाहिर किया कि वह बीजेपी संघ और एनडीए से दूरी बना चुकी हैं लेकिन तमाम विरोध असहमति और आपत्ति के बावजूद जब संसद में सीएए के खिलाफ मतदान की बारी आई तो टीएमसी के आठ सांसद गायब हो गये और एनडीए का यह विवादित विधेयक बिना पर्याप्त सांसदों के आराम से पास हो गया।
         ममता ने संविधान विरोधी विधेयक रोकने को न तो पार्टी का कोई व्हिप जारी किया और न ही पार्टी लाइन से हटकर लापता होने वाले आठ सांसदों के खिलाफ कोई अनुशासन की कार्यवाही ही की। 2021 में मुकुल राय बीजेपी से टीएमसी में आ गये और बोले बीजेपी और टीएमसी दोनों एक सी ही पार्टी हैं। ममता उनके इस बयान पर भी चुप रहीं। जुलाई 2022 में वाइस प्रेसिडंेट के इलैक्शन में ममता की पार्टी ने अचानक विपक्ष की साझा उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का विरोध कर अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी की बी टीम होने का एक और प्रमाण दे दिया। सियासत के जानकार यह देखकर हैरत में पड़ गये कि जिन जगदीप धनकड़ ने बंगाल का राज्यपाल रहते ममता सरकार का काम करना दूभर कर दिया था उनको ही जिताने के लिये टीएमसी सदन में उनके खिलाफ वोट न करके अप्रत्यक्ष मदद करने को कैसे तैयार हो गयी? ममता बनर्जी बार बार इंडिया गठबंधन को भी धोखा देती रही हैं। बंगाल में उनकी पार्टी की हार पांच प्रतिशत वोटों से हुयी है लेकिन दोनों अलग अलग लड़कर सात प्रतिशत वोट लेने वाले इंडिया गठबंधन के घटक कांग्रेस और कम्युनिस्टों को उन्होंने बार बार प्रस्ताव देने के बावजूद कभी साथ मिलकर लड़ने की हामी नहीं भरी। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहां ममता की हार के लिये केंचुआ और मोदी सरकार का खुला पक्षपात बे ईमानी और हर र्मार्चे पर उनको घेरना है वहीं ममता का संघ और बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक फासिस्ट और नफरत की सियासत करने वाली पार्टी से कभी खुलकर तो कभी छिपकर अनैतिक सियासत करना आज उनको अन्य बीजेपी सहयोगियों की तरह खा गया है। शायर ने कहा है- तू किसी और से ना हारेगा, तुझको तेरा ग़रूर मारेगा, तुझको दस्तार जिसने बख़्शी है, तेरा सर भी वही उतारेगा।
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से पत्रकारिता शायरी लेखन अख़बार संपादन और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हुए हैं।*

Tuesday, 5 May 2026

मज़दूर असंतोष

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

बंगाल में बीजेपी

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

Wednesday, 29 April 2026

राकेश अग्रवाल जी

*चंद्रा_कत्था_इंडस्ट्रीज_के_स्वामी_राकेश_अग्रवाल जी_नहीं_रहे*😢
नजीबाबाद जिला बिजनौर यूपी, स्थित चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के एम डी, चंद्रा ग्रुप के मुखिया स्व. श्री सुभाष चंद अग्रवाल के छोटे भाई पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ समाजसेवी स्व. नरेशचंद्र अग्रवाल के भतीजे , रामलीला कमेटी के संरक्षक और वरिष्ठ समाजसेवी व सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री राकेश कुमार अग्रवाल का 23 मार्च की रात दुखद निधन हो गया है। वे आगामी 10जुलाई को पूरे 75 वर्ष के होने वाले थे। उनको मंगलवार सुबह 10 बजे नजीबाबाद उनके स्टेशन रोड स्थित निवास चंद्रा हाउस पर लाया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के नमामि गंगा घाट पर 25 मार्च को 11.30 बजे होगा। #उनकी_शवयात्रा_सुबह_9_30_बजे_उनके_रेलवे_स्टेशन_रोड_स्थित_निवास_चंद्रा_हाउस_से_चलेगी।
     श्री अग्रवाल चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के साथ ही मानसरोवर बॉटलिंग कंपनी, मानसरोवर पेपर मिल, चंद्रा केमिकल, चंद्रा फ्रेगरेंस आर सी ए लीजिंग जैसी चंद्रा ग्रुप की अन्य अनेक कंपनियों के डायरेक्टर रहे और सीकेआई छाप कत्था कच्छ के साथ ही उनकी कंपनी के दिलरुबा पान मसाले ने देश विदेश में अपनी बेहतरीन इमेज बनाई जिससे नजीबाबाद को भी प्रसिद्धि मिली। उनकी थम्सअप फैक्ट्री के प्रोडक्ट भी अपने विशेष स्वाद के लिए पूरे भारत में मशहूर हुए और कई बार विले पार्ले ग्रुप मुंबई से एमबीसीएल को इसके लिए विशेष पुरस्कार मिले। उन्होंने गैर हिंदी भाषी देशों और भारत के राज्यों में हिंदी के लिए विशेष सेवा करने वाले विद्वानों को कई साल तक माता कुसुम कुमारी सम्मान देकर भी नजीबाबाद का नाम रोशन किया जिसकी चर्चा आकाशवाणी और दूरदर्शन से होने से लोग नगर व जनपद को अलग से पहचानने लगे थे। उनके चंद्रा ग्रुप से न केवल कई कंपनी बल्कि बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा हुए जिससे नगर का विकास हुआ।
      राकेश जी कुछ माह से बीमार चल रहे थे। वे दिल्ली के एक बड़े हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनका वहां जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर्स गहन चिकित्सा कक्ष में इलाज कर रहे थे। इससे पहले उनका उपचार कुछ समय तक मुंबई के अस्पताल में भी हुआ था। स्वास्थ्य कुछ बेहतर होने के बाद उनको दिल्ली स्थित उनके राजधानी वाले फ्लैट पर शिफ्ट कर दिया गया था। इस दौरान वे डॉ के परामर्श पर समय समय पर ट्रीटमेंट के लिए चिकित्सालय जाते रहते थे। एक सप्ताह पूर्व उनकी तबियत अधिक खराब हुई तो उनको अस्पताल में एडमिट कर दिया गया था। जहां उनका आईसीयू में रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर इलाज कर रहे थे। भर्ती होने के बाद उनकी तबीयत में विशेष सुधार नहीं हुआ और वे दिन ब दिन कमज़ोर होते गए। बेहतरीन डॉक्टर शानदार सुविधाओं वाले अस्पताल और हर संभव दवा के द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने पर भी उनको बचाया नहीं जा सका और उन्होंने सोमवार की रात 9.10 बजे अंतिम सांस ली। 
उल्लेखनीय है कि राकेश जी का व्यवहार परिवार कंपनी स्टाफ और समाज के सभी वर्गों के साथ बहुत उदार स्नेहशील और सहयोग करने वाला था। उनको सभी वर्गों के लोग पसंद करते थे। वे आर्ट ऑफ लिविंग, रामलीला कमेटी लायंस क्लब माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान सहित अनेक सामाजिक साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। नगर जनपद और देश के कोने कोने से जुड़े उनके मित्रो संबंधियों और सहयोगियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके साथ तीन दशक से अधिक सीकेआई में सर्विस करते हुए उनको हमने एक संरक्षक के रूप में महसूस किया। हमारी ओर से भी उनको विनम्र श्रद्धांजलि। 

Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?