Friday, 11 September 2026

कोर्ट का जुर्माना


हाईकोर्ट का जुर्माना व फटकार, यूपी के अफ़सरों में होगा सुधार?
                   -इक़बाल हिंदुस्तानी
       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चैधरी पर गलत तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने पर वहां के डीएम और पुलिस अफसरों पर पांच लाख जुर्माना और कड़ी फटकार लगाई है। हालांकि यूपी सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है लेकिन केस के तथ्यों व प्रमाणों से वहां से भी उसको राहत मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं। ऐसे ही देवरिया में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के आरोप में उच्च न्यायालय ने वहां के एसएचओ के वेतन से काटकर 65000 रूपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस के जवाबों से नाराज़ होकर उसको ‘‘झूठों का झुंड’’ तक बता दिया। उधर नोएडा में ही एक छात्र को जंतर मंतर के आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में एक मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए कोर्ट की मानहानि की कार्यवाही की चेतावनी दी है।
        नोएडा के मामले में कोर्ट ने छात्रा आकृति पर एनएसए लगाने को पूरी तरह गलत बताते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत बताया। आपको याद दिला दें कि आकृति दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ ही सोशल एक्टिविस्ट है। आकृति को नोएडा में हुए मज़दूर आंदोलन के आरोप में अप्रैल 26 में गिरफतार कर पांच माह से जेल में रखा गया था। आकृति पर मज़दूर आंदोलन मंे 13 अप्रैल को हुई हिंसा फैलाने का आरोप था जबकि उसको 12 अप्रैल को ही पकड़कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। इससे पहले आकृति ने मज़दूरों के बीच केवल एक बार भाषण दिया था जिसमें उसने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाये रखने की अपील भी की थी। आकृति पर दूसरा आरोप व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें हिंसक विचार फैलाने का था। जांच में पाया गया कि ग्रुप शिक्षा व समाजसेवा के लिये था लेकिन इसमें पहचान छिपाकर नोएडा के दो पुलिसवाले शामिल हो गये थे। हैरत की बात यह रही कि यही पुलिसवाले विवादित पोस्ट डाल रहे थे। ग्रुप में शामिल अमनपसंद और कानून का पालन करने वाले सदस्यों ने इन पोस्ट पर आपत्ति की और इनको तत्काल डिलीट भी कर दिया था। यहां जो मामले दिये गये हैं वे हाल ही के हैं। कोर्ट पहले भी कई बार यूपी सरकार पुलिस और प्रशासन को नियम कानून व संविधान के हिसाब से काम करने को सख्त लहजे में निर्देश दे चुका है। किसी भी आरोपी के घर पर बुल्डोज़र चलाने, एनकाउंटर करने और फर्जी केस बनाकर किसी को भी हिरासत में लेने पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लेकर थर्ड डिग्री देने और एनएसए व यूएपीए जैसे बेहद कड़े कानून का सत्ता के इशारे पर गलत इस्तेमाल करने के कई मामलों में कोर्ट पहले भी शासन प्रशासन और पुलिस को कड़ी चेतावनी दे चुका है। 
             देखने मंे यह आ रहा है कि कुछ अधिकारी संविधान से अधिक अपने आकाओं को खुश करने के लिये कानूनी गैर कानूनी काम करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। उनको वेतन जनता के दिये कर से मिलता है। आज नहीं तो कल सरकार बदल सकती है। उनकी जवाबदेही नियम कानून और उनके किये गये कामों के हिसाब से बाद में भी कभी ना कभी हो ही सकती है। वे भी एक दिन कानून के शिकंजे में फंस सकते हैं। उनका असली काम जनता की रक्षा करना उसकी सेवा करना और जनहित की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना है। लेकिन आज अनेक भ्रष्ट अफसर लालच अच्छी पोस्टिंग रिश्वत की मोटी कमाई और अपनी कानून के खिलाफ पहले की गयीं कारगुजारियां छिपाने के लिये सत्ताधारी दल के लिये उसका राजनीतिक पक्षपातपूर्ण भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक एजेंडा लागू करने का औज़ार बने हुए हैं। अगर कोर्ट उनको ऐसे ही हर गलती हर अन्याय और हर मनमानी पर फटकार लगाकर जुर्माना लगाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बेलगाम नौकरशाही को अपनी वर्दी अपनी नौकरी और जुर्माने से बचाने को मजबूर होकर संविधान के दायरे में ही काम करना होगा। फिर हाशिये पर पड़े अच्छे ईमानदार और योग्य अधिकारियों को अपना काम सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय करने का मौका भी मिलेगा। क़तील शिफाई का एक शेर याद आ रहा है- हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले, क़ीमते देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और तर्कशील समाज अखबार के चीफ एडिटर हैं।

भारत हिंसक देशों में क्यों?

*भारत दुनिया के सबसे अधिक हिंसक देशों की सूची में कैसे पहुंच गया?*
                    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*       

        हाल ही में ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती हिंसा और बेकाबू जघन्य अपराधों के उठते ग्राफ के कारण हमारे देश की गिनती दुनिया के सबसे अधिक 50 हिंसक देशों में की गयी है। विश्व शांति सूचकांक के आधार पर जारी की गयी इस रिपोर्ट में कुल 163 देशों को शामिल किया गया है। जिनमें भारत की रैंक 127 वीं है। इस सर्वे के अनुसार भारत पिछले साल के मुकाबले 12 पायदान नीचे खिसक गया है जबकि आइसलैंड जैसे छोटे देश ने शांतिप्रिय देश की अपनी उपलब्धि बरकरार रखी है। भारत की रैंक में गिरावट के खास कारणों में मणिपुर में लगातार जारी जातीय हिंसा तो है ही, इसके साथ ही देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा, दलित आदिवासियों और गरीबों पर भेदभाव के कारण हमले दुस्साहसी व्यक्तिगत हिंसा, महिलाओं तथा बच्चों के साथ यौन हिंसा व साम्प्रदायिक टकराव और पुलिस पर लगने वाले उत्पीड़न अत्यधिक बल प्रयोग और फर्जी एनकाउंटर हाफ एनकाउंटर के बढ़ते आरोप भी शामिल हैं। हालांकि पड़ौसी देशों के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान 152 तो अफगानिस्तान 157 वें स्थान पर हिंसा में हम से काफी आगे नज़र आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नेपाल 111 बंग्लादेश 117 हम से थोड़ा सा बेहतर हैं तो भूटान 16 और श्रीलंका 67 वें स्थान पर भारत ही नहीं पूरे एशिया में बहुत अच्छी हालत में हैं। दरअसल दुनिया के स्तर पर अमनचैन और सुरक्षा से जुड़े इस इंडेक्स को सिडनी स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर इकाॅनोमिक्स एंड पीस द्वारा किया जाता है। दुनिया का थिंक टैंक मानी जाने वाली इस संस्था का कहना है कि विश्व शांति सूचकांक को बनाते समय 22 मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है जिनमें विशेष रूप से सरकारों की कार्यशैली, अच्छा कारोबारी माहौल, संसाधनों का समान वितरण, दूसरों के अधिकारों की परवाह, पड़ौसियों से बेहतर सम्बन्ध, सूचनाओं का विश्वसनीय आदान प्रदान एवं मानवीय पूंजी के आदर्श रखरखाव, गरिमा व सम्मान को दृष्टिगत रखा जाता है।
         पीस इंडेक्स के आधार पर भारत की सीमाओं पर तनाव टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नज़र डालें तो साफ नज़र आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना यह है ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साज़िश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है। 
        *मिसाल के तौर पर हाल ही में पकड़ा गया स्वतंत्र भारद्वाज न केवल जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं के वैचारिक तौर पर पूरी तरह खिलाफ था बल्कि वह अपने आक़ाओं के इशारे पर उन पर जानलेवा हमला कर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक पाॅडकास्ट में इसे दुस्साहस और अहंकार के साथ स्वीकार भी कर रहा था। जिस सोशल मीडिया इंफलूएंसर लड़की के पिता पर उसने घातक हमला किया वह दलित थी। दलितों को लेकर पक्षपात अन्याय और दमन हमारे समाज की आज भी एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे ही कुछ संकीर्ण संगठन एक पार्टी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने दिन रात काम करके अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के बारे में आम लोगों की यह झूठी राय बना दी है कि ये लोग ही समाज और देश की अनेक समस्याओं के लिये ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि पुलिस का रूख़ भी इस वर्ग को लेकर अकसर पूर्वाग्रह का नज़र आता है। पिछले दिनों गुजरात के भावनगर में फैज़ल नाम के एक युवक ने अपने साथ कई साल से रहने वाली हिंदू महिला काजलबेन की हत्या कर दी थी। पुलिस ने फैजल को पकड़कर सार्वजनिक रूप से जमकर पीटा। इसका वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस के पक्ष में खड़ा नज़र आया। जो लोग पुलिस को नहीं कोर्ट को सज़ा देने का कानूनी अधिकार होने की बात कह रहे थे उनको अंधभक्तों ने ट्राॅल करना शुरू कर दिया।* इस घटना से यह भी पता चलता है कि एक वर्ग कानून से इतर हिंसा के पक्ष में पूरी बेशर्मी से खड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में आरोप लगते है कि यूपी सहित कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों की सरकारों में किसी पर गोकशी या हत्या बलात्कार का गंभीर अपराध का आरोप लगता है और पुलिस प्रशासन उसे हथियार बरामद करने या हत्या का सीन रिक्रियेट करने मौक ए वारदात पर देर रात ले जाकर मुठभेड़ में मार देता है। कुछ लोगों के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर भी खूब हो रहे हैं। थाने में हिरासत के दौरन असहनीय यातना और थर्ड डिग्री देने के मामले तो अनगिनत हैं लेकिन पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर जांच करने वाले मजिस्ट्रेट निचली अदालतें और मानव अधिकार आयोग तक शिकायत के बावजूद इसका संज्ञान नहीं लेते हैं।
             जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कई साल पहले रात के अंधेरे में कुछ लोगों ने छात्रावास पर हिंसक हमला किया था। पुलिस वहां तमाशा देखती रही। इसके बाद जब एक पार्टी के छात्र प्रकोष्ठ की कोमल शर्मा पर हमले में शामिल होने का आरोप लगा तो पुलिस जांच के नाम पर उस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर आज तक सो रही है। पिछले महीने बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में ठीक ऐसा ही मामला फिर से देखने में आया। पुलिस वहां भी चुपचाप सब कुछ देखती रही लेकिन सरकार ने भी इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। आरोप है कि कई साल पहले दिल्ली में सीएए के खिलाफ चले शाहीन बाग आंदोलन, महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित सम्मेलन और शम्भू बोर्डर पर चले किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया। कुछ साल पहले दिल्ली के गार्गी काॅलेज में चल रहे समारोह में भी कुछ बाहरी तत्वों ने अपनी नापसंद एक प्रोग्राम के बाद जमकर वहां के छात्र छात्राओं से मारपीट की थी लेकिन जांच के नाम पर उस मामले को भी दबा दिया गया था। रोड पर किसी की गाड़ी टकरा जाने पर थोड़ा सा नुकसान होने पर आरोपी को पीट पीटकर मार देने की घटनाएं भी हाल ही में बहुत बढ़ चुकी हैं। मामूली गलती करने पर स्कूलों में बच्चों को पीटने और कॉलेज यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में छात्रों की आपसी हिंसा भी रुकने का नाम नहीं ले रही है।
        *अब नया ट्रेंड देखने में आ रहा है जिन मामलों में सरकार अपने विरोधी अहसमत या आलोचकों को पुलिस या कोर्ट से सबक सिखाने में असमर्थ पाती है उनमें विपक्ष का आरोप है कि नाॅन स्टेट एक्टर हिंसा करने चले आते हैं। अगर ये मौके पर रंगे हाथ या किसी गवाह और सबूत के आधार पर पकड़कर पुलिस को सौंप भी दिये जाते हैं तो भी अव्वल तो स्वतंत्र भारद्वाज के अनुसार इनके आकाओं के इशारे पर इनके खिलाफ मुकदमा ही कायम नहीं हो पाता और अगर कभी कभी कहीं कहीं राजनीतिक नुकसान या कानून व्यवस्था की मजबूरी में केस दर्ज भी किया जाता है तो हल्की यानी ज़मानतीय धाराओं में लिखा जाता है। इसके बाद इनके खिलाफ गंभीरता से निष्पक्ष जांच गवाह और सबूत नहीं जुटाये जाते और कभी कभी जनता की नज़र हटते ही फाइनल रिपोर्ट लगाकर या मुकदमा वापस लेकर केस खत्म कर दिये जाते हैं।* इस तरह से जब लोगों को लगता है कि उनको वर्तमान सरकार पुलिस और उसकी पक्षपात करने वाली जांच एजेंसियों के रहते न्याय नहीं मिलेगा वे कभी कभी खुद कानून हाथ में लेने पर उतर आते हैं जोकि ठीक नहीं माना जा सकता लेकिन यह समाज में हिंसा के दुष्चक्र को और बढ़ावा देता है। हालत इतनी बदतर है कि हिंसा के कई मामले में माॅब लिंचिंग होने पर जिसकी सामूहिक हिंसा में भीड़ ने हत्या की उसी पर चोरी लूट या हमले का झूठा केस दर्ज कर दिया जाता है। हमारा मानना है जब तक सबको न्याय रोज़गार सबको संसाधनों राष्ट्रीय आय व सम्पत्ति में समान अधिकार रोटी कपड़ा मकान शिक्षा चिकित्सा और मान सम्मान मानवीय गरिमा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक हिंसा का दुष्चक्र रोकना कठिन है।

38 साल से नहीं हटा अतिक्रमण

#इस_तरह_के_अतिक्रमण_को_कोई_38_साल_से_नहीं_हटा_रहा...
          नजीबाबाद के कई मोहल्लों में कल किसी काम से पैदल घूमने का मौक़ा मिला। कई सड़कों पर लोगों ने पूरी बेशर्मी और निडरता से अवैध कब्ज़ा कर रखा है। लगभग सभी पालिकाएं शासन के निर्देश पर कभी कभी मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण हटाने का औपचारिक अभियान चलाकर अपने कर्तव्य की अतिश्री कर लेती है।कोई भी स्थानीय निकाय न तो आगे यह देखती है कि नया अतिक्रमण नहीं हो न ही पुराने हटाए गए अतिक्रमण को फिर से होने से रोकने को कोई तंत्र बनाते हैं। यूपी में 1988 से सुपरसीड किए हुए स्थानीय निकायों में चुनाव फिर से होने शुरू हुए थे। आशा थी कि अफसरों के मुकाबले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से जनता को अधिक राहत मिलेगी क्योंकि वे उनके बीच से चुनकर आएंगे तो उनकी बात को बेहतर समझेंगे। कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी लेकिन सभी स्थानीय लोगों को नाराज़ नहीं करने की नीति से यह भी हुआ कि वे सख़्ती से अतिक्रमण नहीं हटा सके। कुछ लोगों ने अपने घर दुकान और ऑफिसों के सामने नाले नाली नहीं बनने दी। अगर पहले से बनी हुई थी तो उनको पाट दिया। इसके पीछे सार्वजनिक सड़क निजी उपयोग के लिए कब्जाने की नीयत थी। दरअसल नाली ही वो सीमा रेखा है जो अतिक्रमण की सबसे पहले पोल खोल देती है। कई सड़कें खुद बता रही हैं कि वे इधर 15 फिट थी तो उधर 10 फिट रह गई , फिर आगे 12 फिट हो गई यानी जिसका जितना मन हुआ उसने उतनी दबा ली। अजीब बात यह है जब पालिका नई सड़क बनाने आई तो उसने जितनी सड़क बची थी उतनी ही बना दी, अतिक्रमण नहीं हटाया। इससे कई जगह पानी की निकासी भी रुक गया। कई मोहल्लों में भारी जलभराव शुरू हो गया जो आज तक जारी है। कई नालों को पाटकर दुकानदारों ने अपने सामने की सड़क की तरफ पानी का रुख कर दिया। पालिका फिर भी नहीं बोली। फिर इनमें से कुछ ने कई पालिका के नाले की कब्ज़ाई जगह कई हज़ार किराए पर दे दी। नगर में कई जगह लोगों की अपनी दुकान की जितनी गहराई है, उससे ज़्यादा उन्होंने सड़क पर स्थायी और फ्लेक्स बोर्ड या दुकान का सामान रखकर अस्थायी अतिक्रमण कर रखा है। एक सड़क तो साफ़ बता रही है कि उसको अवैध कब्ज़ा करके आधा कर दिया गया है...हिंदुस्तानी

दावत है प्यार...

*दावत है प्यार, न तो अधिकार न ही व्यापार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              मध्य प्रदेश के दमोह की एक ख़बर पढ़ी। पहले हंसी आई, फिर हम संजीदा हो गए। एक वकील दोस्त ने दूसरे वकील दोस्त को बर्थ डे पार्टी नहीं देने पर 41,250 ₹ के हर्जाने का नोटिस भेजा है। विशाल सिंह का आरोप है कि उनके मित्र गोविंद तिवारी ने लिखित इकरारनामा करने के बाद भी दावत नहीं दी, जिससे उनको उस दिन खाना होटल में खाना पड़ा, साथ ही तनाव इतना बढ़ गया कि हॉस्पिटल में इलाज कराया गया। तनाव व इलाज का हर्जाना नोटिस देकर दोस्त से मांगा गया है। उधर दोस्त का दावा है कि वे पार्टी दे चुके हैं जिसके बिल भी मौजूद है।
      यह मामला तो जांच के बाद तय होगा, कौन झूठा और कौन सच्चा है। लेकिन क्या आप और हम समाज परिवार और दोस्तों में इस तरह के मामले आएदिन नहीं देखते रहते हैं? दावत पार्टी और नाश्ते तक को लेकर कुछ लोग बड़े क्रेज़ी रहते हैं। कई लोग दावत कर कर के अच्छे दोस्त बन जाते हैं तो कुछ दोस्त दावत नहीं करके दुश्मन बना लेते हैं। दावत कब अदावत बन जाए, पता ही नहीं लगता है। दरअसल दावत को लेकर हम लोगों की सोच अजीब है। दावत दो लोगों दो परिवारों या दो समूहों के बीच प्यार और सम्मान बढ़ाने के लिए होती है। दावत किसी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है जो हर हाल में होनी ही चाहिए नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे, क्रोधित हो जाएंगे और सामने वाले से न सिर्फ़ रिश्ता तोड़ लेंगे बल्कि खुद को अपमानित समझकर उससे दुश्मनी पर उतर आएंगे? 
          कुछ लोग अपनी ससुराल में दावत अपना हक़ समझते हैं। कुछ लोग शादी या जन्म दिन की पार्टी में नहीं बुलाए जाने पर खफा हो जाते हैं। कुछ लोग सपरिवार न बुलाये जाने पर आक्रोश दर्ज कराते हैं। कुछ लोग दावत का मीनू अपने स्तर या पसंद का नहीं होने पर भी बुरा समझते हैं और सामने वाले की औकात बताने लगते हैं। कुछ लोग बारात में नाश्ते को लेकर बड़े परेशान रहते हैं कि कहीं लेट होने पर नाश्ता न निकल जाए। कुछ लोग शादी करने को रिश्ते के लिए जब कहीं जाते हैं तो नाश्ते के आइटम गिनकर और उनकी कीमत आंककर यह तय करते हैं कि सामने वाले की हैसियत कैसी है? कुछ लोग दावत में मीट नहीं परोसने पर सामने वाले को कंजूस घोषित कर देते हैं तो कुछ लोग चिकन, मटन और बड़े जानवर के गोश्त के हिसाब से सामने वाले के स्टेटस को तय करते हैं। कुछ लोग खाने से पहले स्टार्टर बाद में स्वीट साथ में कोल्ड्रिंक और नाश्ते में ड्राई फ्रूट से अपना सम्मान तोलते हैं।
         दावत की चर्चा चल रही है तो एक और बात पर गौर कीजिये। कुछ दोस्त और रिश्तेदार अक्सर दावत करते हैं, कुछ कभी कभी और कुछ कभी नहीं। इसके पीछे उनकी आर्थिक स्थिति उनकी सोच उनकी सीमित या उदार समझ उनका आपसे करीबी या दूर का रिश्ता या उनके दिल में आपके लिए मुहब्बत इज़्ज़त या सबके लिए तंग दिली फराग दिली या मजबूरी न जाने कितनी वजह हो सकती है। दावत व्यापार नहीं है कि आपने की तो सामने वाला भी करेगा, उतनी ही करेगा या वैसी ही करेगा जैसी आपने की है। 
       हमारे शहर में एक मॉर्निंग वॉकर ग्रुप था। दो दर्जन से अधिक लोग थे। रोज़ सुबह साथ घूमने जाते थे। पहले वापसी में चाय पीने लगे। फिर पकौड़ी समोसे नाश्ते में शामिल हुए। फिर दावतों का सिलसिला शुरू हुआ। सबने बारी बारी दावत शुरू की। कुछ लोग पहले दिन से ही दावत खिलाने की हालत में नहीं थे। वे पहली दावत से ही किनारा कर गए। कुछ जाते रहे, खाते रहे, लेकिन जब उनकी बारी आई, तो अचानक गायब हो गए। बदले की दावत मांगने वाले उनको कॉल करने लगे, कभी बात हुई कभी नहीं हुई। फिर कॉल नो रिप्लाई होने लगी। दावत के दीवाने उस दोस्त के घर पहुंच गए। वो मिला तो बहुत ज़लील किया। फिर उसने घर जाने पर दोस्तों से मिलना भी बंद कर दिया। फिर उसको सड़क बाज़ार या शादी में मिलने पर दावत के लिए याद दिलाया गया। दावत न होनी थी न ही हुई। दोस्ती खत्म हो गई। ग्रुप भी बिखर गया। मॉर्निंग वॉक भी उनमें से अब कम लोग ही करते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है दावत प्यार दोस्ती और इज़्ज़त के लिए होती है उसे बदला व्यापार या अधिकार समझने की भूल कभी भी मत कीजिये। दावत को दावत रहने दीजिये अदावत में मत बदलिए प्लीज़।
*बहुत कुछ जान के जाना है तुम को*
*बड़ी मुश्किल से पहचाना है तुम को*
*मुझे जो तुम समझते हो ग़लत है*
*किसी दिन ये भी समझाना है तुम को।*
नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।

हिंदुत्व समर्थक और विरोधी...

*हिंदुत्व के समर्थक और विरोधी, हिंसक होने के अधिक आरोप किस पर हैं?*
                           *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण में "दिमागी नक्सल" शब्द पर एक पखवाड़े से अधिक समय से चर्चा चल रही है। पहले संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजूजी ने सफ़ाई दी थी कि इस शब्द का विपक्ष से कोई मतलब नहीं है। लेकिन दिमागी नक्सल पर संघ के मुख्य पत्र ऑर्गनाइजर में छपे विस्तृत लेख, बीजेपी के ट्विटर हैंडल पर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जैसे बुद्धिजीवीयों को "इंटेलेक्चुअल नक्सल" बताने और इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में पूर्व में आरएसएस से जुड़े रहे बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राम माधव के साप्ताहिक स्तम्भ रामराज्य में प्रकाशित विचारों से स्पष्ट हो गया है कि अर्बन नक्सल दिमागी नक्सल के बाद अब इंटेलेक्चुअल नक्सल नाम से इस आरोप में उन सब लोगों को शामिल कर लिया गया है जो बीजेपी संघ के हिंदुत्व मॉडल से सहमत नहीं हैं, तटस्थ हैं या विरोधी हैं। उन्होंने ऐसा कहकर एक तरह से ईराक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के उस बयान को याद दिला दिया है जिसमें उन्होंने दुनिया के देशों को यह कहकर धमकाया था कि अब बीच का कोई रास्ता नहीं है, इस खाड़ी जंग में या तो आप हमारे साथ रहें नहीं तो आपको चुप रहने पर हमारे खिलाफ़ यानी अमेरिका का दुश्मन माना जायेगा। जबकि इतिहास गवाह है भारत ने तो एक दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की गुटबंदी से बचने के लिए ही गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया था जिसमें न्यायप्रिय तटस्थ और निष्पक्ष विश्व के अनेक देश हमारे साथ जुड़े थे और उस दौर में दुनिया दो ध्रुव से तीन बड़े हिस्सों ने नज़र आने लगी थी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी संघ या पीएम मोदी ने हिंदुत्व विरोधियों या निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया हो। संघ परिवार पहले दिन से ही "या तो हमारे साथ नहीं तो हमारा शत्रु" की नीति पर चलता रहा है। यही वजह है कि वे विपक्ष, विरोध करने वाले नागरिक समाज और बीजेपी सरकार के खिलाफ़ जनहित के मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को बीजेपी विरोधी सरकार विरोधी या किसी विशेष सरकारी फैसले का विरोधी नहीं सीधे "राष्ट्र विरोधी देशद्रोही और पाकिस्तानी खालिस्तानी" बताकर उनका मनोबल तोड़ते हैं, उन पर विदेशी साज़िश टूलकिट का आरोप लगाते हैं और साथ ही उनको हिंदू विरोधी घोषित करके समाज में उनकी छवि खलनायक की बनाने का प्रयास करते हैं। 
          अगर थोड़ा पीछे चलें तो हम देखते हैं कि हिंसा का आरोप तो वे नक्सल माओवादी और वामपंथी सोच वालों पर लगाते हैं लेकिन खुद बीजेपी संघ पर दंगों के आरोप लगते रहे हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद तोड़ने के आरोप हैं। उनके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की विवादित यात्रा से देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़काने का आरोप लगा है। खुद मोदी पर गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों का कोच जलने पर पूरे प्रदेश में भड़के दंगे जानबूझकर नहीं रोकने का विपक्ष आरोप लगाता रहा है। बीजेपी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कुछ अन्य पर तो बाकायदा भगवा आतंकवाद का आरोप रहा है जिससे समझौता एक्सप्रेस ट्रेन सहित मक्का मस्जिद में बम विस्फोट से हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जे एन यू, जादवपुर यूनिवर्सिटी व गार्गी कॉलेज सहित कई गैर हिंदुत्व विचारधारा के संस्थानों संगठनों और व्यक्तियों पर हिंसक जानलेवा और सुनियोजित हमले करने के संघ परिवार पर समय समय पर गंभीर आरोप लगे हैं। गौरी लंकेश नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे जैसे पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट की हत्या कराने में दक्षिणपंथी सोच का हाथ होने का आरोप लगा है।
           किसान आंदोलन, सी ए ए के खिलाफ़ शाहीन बाग़ आंदोलन और भीमा कोरे गांव में दलित सम्मेलन में हिंसा के गंभीर आरोप भी संघ परिवार पर लगे हैं लेकिन इसमें सत्ता पक्ष ने उल्टा आरोप लगाने वाले यानी पीड़ित समझे जाने वाले पक्ष को ही यूएपीए जैसे मुकदमों में जेल भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले तेजिंदर सिंह बग्गा को जिस तरह बीजेपी ने पार्टी में लिया और फिर पंजाब की आप सरकार की कानूनी कार्यवाही से केजरीवाल के मानहानि के केस में बचाया, उस तरह के भी यहां छोटे बड़े दर्जनों अनेक मामले इसके अलावा भी गिनवाए जा सकते हैं लेकिन उससे यह साबित नहीं होता कि अकेले बीजेपी और संघ ही ऐसे हिंसा के आरोपों से घिरे हैं, हां ये आरोप अधिक अवश्य हैं।
      *अगर मुख्य विपक्षी दल की बात करें तो कांग्रेस का दामन 1984 की सिख विरोधी हिंसा से दाग़दार है। तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने इस एकतरफा सिख नरसंहार को यह कहकर जस्टिफाई करने की अनैतिक कोशिश भी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती काँपती ही है। ऐसा ही मिलता जुलता बयान गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सीएम मोदी ने देते हुए कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। अगर अन्य विपक्षी दलों का रिकॉर्ड देखें तो उनमें से वामपंथी दलों और टीएमसी पर सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे हैं। यूपी में सपा और बिहार में राजद पर भी कभी कभी माफियाओं की शह पर हिंसा और कुछ बड़े अपराधों के आरोप लगे हैं। ऐसे ही अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों पर छिटपुट हिंसा के आरोप लगते रहे हैं लेकिन इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना का विशेष रूप से उत्तर भारतीयों और दंगों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा का विवादित इतिहास है, जो लंबे समय से बीजेपी के साथ गठबंधन में रही और हिंदूवादी सोच से ही प्रेरित रही है। *आज के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो बीजेपी के विभिन्न प्रकोष्ठ जिनमें बजरंग दल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, हिंदुत्व से असहमत लोगों के साथ हिंसा करने के बहुतायत आरोपों से घिरे हुए हैं। इनमें विशेष रूप से गौ मांस, गो हत्या, लव जेहाद, धर्म परिवर्तन जैसे विभिन्न फर्ज़ी जेहाद, मॉब लिंचिंग कांवड़ खंडित होने पर हिंसा,मस्जिद मदरसों और चर्चों पर झूठी सूचनाओं के आधार पर हमले और हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के झूठे सच्चे आरोप लगाकर हिंसा करने के थोक में आरोप लगते रहे हैं।* इससे एक ट्रेंड पता लगता है कि जो आरोप लगा रहे हैं वे हिंसा के अधिक आरोपी हैं और जो संविधान लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्मनिरपेक्षता समानता मानवता आंदोलन विरोध प्रदर्शन धरना समाजवाद नैतिकता आरक्षण और सबके लिए सस्ती शिक्षा स्वास्थ्य व रोज़गार की मांग करते हैं, लेकिन हिंसा का सहारा नहीं लेते उनको आरोप लगाकर सत्ता के बल पर विलेन बनाया जा रहा है।
            *कोई भी विचारधारा, हिंसा और अपराध के हिसाब से देखें तो सुप्रीम कोर्ट और अनेक उच्च न्यायालयों (विशेष रूप से केरल हाईकोर्ट) ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि केवल किसी विचारधारा (मिसाल के तौर पर माओवाद या नक्सलवाद ) को मानना या उससे हमदर्दी रखना तब तक अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि वह आदमी उस विचार को बाकी नागरिकों पर जबरन थोपने के इरादे से हिंसा नहीं करता या कानून के राज, संविधान और लोकतंत्र को चुनौती नहीं देता।खास तौर से, इस सिद्धांत को मजबूत करने वाले प्रमुख मामले इस प्रकार हैं-1. थवाहा फजल बनाम भारत संघ (2021) - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि "सिर्फ माओवादी साहित्य पास में होना या किसी विशेष विचारधारा के प्रति झुकाव होना गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी किसी आतंकी गतिविधि या हिंसा को अंजाम देने के इरादे से सक्रिय रूप से नहीं जुड़ता, तब तक केवल वैचारिक जुड़ाव के आधार पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। 2. अरूप भूइयां बनाम असम राज्य (2011 और 2023 पुनर्विचार याचिका पर ) इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्यायशास्त्र के 'क्लियर एंड प्रेजेंट डेंजर' (स्पष्ट और वर्तमान खतरा) सिद्धांत का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन की केवल निष्क्रिय सदस्यता तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि वह सदस्य लोगों को हिंसा के लिए नहीं उकसाता या खुद हिंसा में शामिल नहीं होता। हालांकि, 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी पीठ ने सुरक्षा कारणों से 'प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने' को अपराध माना, लेकिन बिना हिंसा या उकसावे के केवल विचारधारा रखने को अभी भी अपराध नहीं माना जाता है। 3. श्याम बालकृष्णन बनाम केरल राज्य (2015) (सुप्रीम कोर्ट द्वारा समर्थित सिद्धांत के आधार पर ) इस विषय पर सबसे स्पष्ट टिप्पणी केरल हाईकोर्ट ने 2015 में की थी, जिसे बाद के कानूनी सिद्धांतों में आधार बनाया गया।अदालत ने कहा था कि "माओवादी होना कोई अपराध नहीं है।"*
               इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के अनुसार कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा: "भले ही माओवादियों की राजनीतिक विचारधारा हमारे संवैधानिक ढांचे से मेल न खाती हो, लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इस विचारधारा को मानने के लिए तब तक गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह देश के संविधान, लोकतंत्र और कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए किसी हिंसक या अवैध गतिविधि में शामिल न हो।" द हिंदू समाचार पत्र के मुताबिक इस फैसले का मुख्य निष्कर्ष यह था कि अदालतों का स्पष्ट मत है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां 'विचारों की स्वतंत्रता' (संविधान के आर्टिकल 19 के तहत ) हर नागरिक को प्राप्त है। कोई भी विचारधारा चाहे वह कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो तब तक कानूनी दायरे में है जब तक वह शांतिपूर्ण है। जैसे ही उसमें हिंसा, हथियारों का इस्तेमाल या देश को तोड़ने की साजिश शामिल होती है, वह कानूनन अपराध बन जाती है। इस हिसाब से भी "दिमागी नक्सल" अपराधी नहीं माने जा सकते जबकि संघ परिवार लगातार ऐसे फैसले ऐसे विवादित बयान और माहौल बनाता रहा है जिससे हिंसा को बढ़ावा देने के उस पर आरोप बढ़ते जा रहे हैं।

आईफोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था

*आई फ़ोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल भी जानलेवा है?*
                 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
             महाराष्ट्र के संभाजी नगर में एक बच्चे ने आई फ़ोन लेने की ज़िद पूरी नहीं होने पर जान दे दी। सतही तौर पर देखें तो बेशक आत्महत्या की वजह आई फोन ही नज़र आती है लेकिन बड़े परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखें तो एक बड़ी वजह हमारा बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था व विकास का उपभोक्तावादी असमान आय वाला असफल पूंजीवादी मॉडल भी है। आई फोन वाली घटना पर बाद में पहले इसी मॉडल पर बात करते हैं। एलपीजी यानि लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल मतलब उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की पूंजीवादी नीतियों ने आज पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हमारा देश भी 1991 से मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता छोड़कर पूरी तरह पूंजीवादी मॉडल को अपना रहा है। दक्षिणपंथी अधिकांश राजनीतिक दल पूरी तरह इस मॉडल के पक्ष में रहे हैं। भारत में भी बीजेपी ने 2014 से चुनाव अपने बल पर जीतने के बाद सांप्रदायिकता और कॉर्पोरेट का एक कॉकटेल बना लिया है। कहा जाता है कि कॉर्पोरेट ने चुनाव से पहले ही मोदी को पीएम मैटीरियल मानकर उनकी जीत के लिये पैसा पानी की तरह बहाया था। मोदी ने सत्ता हासिल करते ही बाक़ी बची हुई समाजवादी नीतियों को भी तिलांजलि देने की नीयत से पूरी तरह क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सबको पता है *पूंजीवाद उपभोक्तावाद को खुलकर बढ़ावा देता है। कॉर्पोरेट विज्ञापनों के ज़रिए बाज़ार में ऐसा माहौल बनाता है जिससे लोग उसके मोहपाश में फंसकर गैर ज़रूरी चीज़ें अधिक खरीदने लगते हैं। पैसा पास नहीं हो तो उधार लेते हैं। बाज़ार लोगों के दिमाग़ को कंट्रोल करने लगता है। कंपनियां अपनी बिक्री और बेतहाशा मुनाफा कमाने के एकसूत्री लक्ष्य को हासिल करने के लिए बाज़ार को उन सामानों से पाट देती हैं जो लोगों की वास्तविक या बुनियादी जरूरतों का नहीं होता। चंद पूंजीपतियों को देश के सब संसाधन कारोबार और मोनोपली वाली उत्पादन की कंपनियां सौंप देने से उनका अर्थव्यवस्था पर एकक्षत्र कंट्रोल हो गया है। आज देश में बाज़ार तय कर रहा है कि लोग क्या खायेंगे क्या पहनेंगे और क्या क्या खरीदेंगे?* 
         इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन लोगों की इतनी आमदनी नहीं है कि वे आई फोन या कोई और महंगा गैजेट खरीद सकें उनको उसके बिना समाज में हीन भावना भी बाज़ार महसूस कराता है। यह समाज में फैशन बन जाता है। ऐसे में लोग ये विलासिता की चीज़ें उधार किश्तों पर खरीद लेते हैं। बाद में जब अचानक नौकरी चली जाती है या कोई और बड़ा खर्च स्वास्थ्य शिक्षा या शादी का आ जाता है तो कर्ज़ की किश्तें रुक जाती हैं। ऐसे में क़र्ज़ देने वाली कंपनी अपने ऑफिस से से ही आपका उधार खरीदा गया मोबाइल अपने सिस्टम से लॉक कर देती है और लाखों का मोबाइल अचानक डब्बा बनकर वेस्ट मैटिरियल बनकर एक कोने में चला जाता है। यह आघात गरीब और मीडियम क्लास लोग क्या किसी भी वर्ग के आदमी को बर्दाश्त नहीं होता। क़र्ज़ पर लिए और भी सामान का किश्तें रुक जाने पर कंपनी के दबंगों द्वारा यही हश्र होता है। उसके बाद इस सदमे में डूबा बच्चा हो बड़ा हो या कोई बुद्धिजीवी अवसाद में चला जाता है। तनाव और दुख में आत्मघाती कदम भी उठा लेता है जिससे वह खुद ही नहीं पूरा परिवार तबाह हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। चलना भी चाहिए। समाज में सम्मान से रहने को कई मामलों में साथ चलना पड़ता भी है लेकिन हम सबका आर्थिक स्तर समझ का स्तर शिक्षा का स्तर और आय इतनी नहीं है कि हम अमीर लोगों या विकसित देशों की बराबरी कर सकें। आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां रोज़गार बढ़ने की बजाए कई क्षेत्रों में तो घट रहे हैं ए आई की वजह से कुछ कंपनियों में नौकरी कम हो रही हैं। ट्रैजिडी यह है कि देश की कुल आय और प्रॉपर्टी का बड़ा हिस्सा चंद पूंजिपतियों की तिजोरी तक सीमित होता जा रहा है। आम आदमी के पास जब पर्याप्त आय नहीं होगी तो रहने को अच्छा घर पौष्टिक खाना स्टैंडर्ड का रहन सहन पहनावा अच्छी शिक्षा और बेहतर चिकित्सा कहां से आयेगी? *यही वह पूंजीवादी असफल ग़ैर समावेशी विकास का जानलेवा मॉडल है जिससे कोई बच्चा पेपर लीक होने से कोई परीक्षा में असफल होने से कोई इंटरव्यू में पक्षपात होने से कोई नौकरी नहीं मिलने से कोई नौकरी छूट जाने से तो कोई इंसान क़र्ज़ अदा नहीं कर पाने से कोई बीमारी का महंगा इलाज नहीं करा पाने से कोई किसान फ़सल उजड़ जाने से कोई पीड़ित थाने में रिपोर्ट नहीं होने से कोई कोर्ट में केस हार जाने से कोई स्कैम में लाखों का फ्रॉड होने से और कोई आई फोन नहीं खरीद पाने से जान देने को मजबूर हो जाता है।*
        अब बात करते हैं उस घटना पर जिसमें महाराष्ट्र के संभाजीनगर का एक बच्चा आई फोन लेने की ज़िद में पास की 300 मीटर ऊंची पहाड़ी पर चढ़ गया। उसको बचाने उसके पिता पहाड़ी पर चढे़ तो वे भी उसके साथ साथ संतुलन खोने से फिसलकर नीचे गिर गये। यह अनर्थ देखकर उस बच्चे की मां ने भी पहाड़ी से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान सदमें में दे दी। कुछ ही पल में देखते ही देखते पूरा परिवार मौत के आगोश में समा गया। दिल्ली में एक वेंडर ने महंगा आई फ़ोन फाइनेंस कराया था। वह जब उसके लोन की किश्तें टाइम पर जमा नहीं कर पाया तो उसने भी जान देने को यमुना में छलांग लगा दी लेकिन पास के लोगों ने उसे बचा लिया। सतही तौर पर देखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि मोबाइल की वजह से तीन जानें चली गयीं। कुछ को लगता है कि आईफोन की वजह से ऐसा हुआ क्योंकि मोबाइल तो आजकल लगभग सभी के पास हैं। इस परिवार के पास भी होगा। अगर नहीं भी होता तो पहले से मांग कर रहे बच्चे को कोई सस्ता सा मोबाइल दिलाना कौन सी बड़ी बात थी? लेकिन आई फोन चूंकि बहुत महंगा होता है इसलिये यह परिवार आईफोन नहीं दिला पाया होगा जिससे पूरा परिवार असमय ही काल के गाल में समा गया?
          बच्चा चला गया उसके मातापिता चले गये यानी पूरा परिवार खत्म हो गया। कभी कभी हम चीज़ों को बहुत सतही तौर पर देखते हैं। उसकी वजह यह है कि हमें केवल जितना बाहर से दिखता है। यानी जितनी जानकारी हमारे सामने आती है। उसी पर चर्चा करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। यह कहना बहुत आसान है कि आज मोबाइल ने बच्चो को बिगाड़ दिया है। उनको ज़िद्दी बना दिया है। कुछ लोग बड़ों के भी मोबाइल के इस्तेमाल के नुकसान गिनाने लगते हैं। कुछ कहते हैं कि जब से मोबाइल आया हर कोई मोबाइल में ही लगा रहता है। वह किताब अखबार और परिवार को समय नहीं देता। वह सामाजिक नहीं रह गया है। वह अनैतिक होता जा रहा है। वह मोबाइल पर पोर्न देखता है। फिल्में देखता है। गाने सुनता है। रील देखता है। अंजान लोगों से चैट करता है। हर समय व्हाट्सएप फेसबुक एक्स थ्रेड यू ट्यूब ईमेल और इंस्टाग्राम पर लगा रहता है। किसी के पास परिवार से बात करने साथ बैठने खाना खाने नाश्ता करने और पिकनिक के लिये भी टाइम नहीं है। यहां तक कि जब लोग किसी ग़म या खुशी के प्रोग्राम में भी जाते हैं वहां भी अपने मोबाइल में ही बिज़ी रहते हैं। लेकिन सच केवल इतना ही नहीं है।
        मोबाइल पूरी दुनिया में आया है। वहां भी ये सभी एप चलते हैं। वहां भी लोग चैट करते हैं। हर देश में मनोरंजन करने वाले लोग हैं। वहां लोगों को ये सब शिकायते मोबाइल से नहीं हैं। उन्होंने अनुशासन अपनाया हुआ है। उनके यहां नैतिकता मौजूद है। उन्होंने एक सिस्टम बनाया हुआ है। यानी उनको मोबाइल से कोई शिकायत नहीं है। वे मोबाइल को इस्तेमाल करते हैं। वे मोबाइल के एडिक्शन के शिकार नहीं हैं। सच यह है कि अगर इंसान परिवार और समाज मोबाइल ही नहीं हर चीज़ का व्यवस्थित सुनियोजित और समय के हिसाब से नपा तुला इस्तेमाल करे तो मोबाइल ही नहीं किसी चीज़ से कोई परेशानी नहीं होगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।
   इसलिये सावधान रहें सजग रहें और अपनी सीमा में रहकर ही खरीदारी करें। अपने बच्चों को शुरू से ही अपनी आय अपनी खरीद क्षमता और अपनी उपभोग सीमा से परिचित करायें, अच्छे बच्चे के संस्कार सिखायें और उनसे समय समय पर अनुशासन व अच्छे नागरिक बनने अच्छा इंसान बनने और माता पिता का कहना मानने के फायदे बतायें। बच्चों से संवाद बनाये रखें। इसके साथ ही हमें ज़रूरत और विलासिता की इच्छा में भी अंतर करना सीखना चाहिए। उपभोक्तावाद बाज़ार के जाल और विज्ञापनों के चंगुल से अपने बच्चों परिवार और खुद को बचाने का प्रयास करें। फिलहाल बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बचने निबटने और नुकसान कम करने का यही तरीका है। वसीम बरेलवी ने शायद ऐसे ही बच्चों के लिए एक शेर कहा है...
*"नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है"*

महंगे इलाज से गरीब बनते लोग...

*जितने लोग हर साल ग़रीबी की रेखा से ऊपर आ रहे हैं, उससे ज़्यादा नीचे क्यों जा रहे हैं ?* 
           *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      नेशनल हेल्थ एकाउंट के अनुसार भारत में हर साल महंगे इलाज के कारण 3 से 6 करोड़ लोग मध्यम वर्ग से गरीबी की रेखा से नीचे या उसके करीब पहुंच जाते हैं। पहले यह आंकड़ा 5.5 से 10 करोड़ तक आंका जाता था लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर होने, उनके जागरूक होने पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ने और सरकार द्वारा चलाई गयी आयुषमान भारत योजना से बड़ी संख्या में लोगों को हाॅस्पिटलाइजे़शन खर्च में कुछ राहत मिली है। नीति आयोग का कहना है कि हर साल 2.5 से लेकर 2.7 करोड़ भारतीयों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा रहा है। सरकार का कहना है कि आयुष्मान कार्ड धारकों की संख्या इस समय देश में 45 करोड़ से अधिक हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि 12.69 करोड़ लोग इस योजना के तहत हर साल पांच लाख रूपये तक का अब तक निशुल्क उपचार का लाभ ले चुके हैं। समस्या यह है कि सरकार की यह योजना गरीब वर्ग के लिये होने से मीडियम क्लास के लगभग 40 करोड़ लोगों को इससे कम ही लाभ मिला है। दरअसल बीमारी किसी की आय नहीं देखती अगर किसी को अचानाक गंभीर बीमारी में अस्पताल में भर्ती होकर आईसीयू हार्ट आॅप्रेशन या कैंसर होने पर कीमियोथेरेपी करानी पडे़ तो उस परिवार पर इतना अधिक आर्थिक बोझ आ जाता है कि उसका मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। 
         *जहां विकसित देशों में नागरिक स्वास्थ्य खर्च का मात्र 20 प्रतिशत स्वयं वहन करते हैं वहीं हमारे देश में यह आंकड़ा 45 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।* जबकि विकसित देशों में लोगों की आय का स्तर भी हमसे काफी अधिक ही है। गंभीर बीमार होने हार्ट अटैक ब्रेन हेम्रेज लकवा एक्सीडेंट या कोई और ज़रूरी आॅप्रेशन कराने के लिये एक बार निजी अस्पताल में भर्ती होने पर कम से कम 50,000 खर्च आता है। चाइल्ड बर्थ में सीजे़रियन केस होने पर यह खर्च और अधिक हो जाता है। सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत सबको पता ही है वर्ना यहां यह खर्च 6500 तक ही होता है। सरकार जीडीपी का मात्र 1.5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करती है। थ्री स्टार से फाइव स्टार तक अस्पताल में यही खर्च लाखों रूपयों तक पहुंच जाता है। जिसके लिये लोगों को जेवर ज़मीन मकान बेचकर या महाजन से ब्याज पर पैसा उधार लेना होता है। इसके बाद ऐसे परिवार लंबे समय तक कर्ज़ के जाल में उलझकर बच्चो की पढ़ाई मकान का निर्माण और शादी तक को टालने को मजबूर हो जाते हैं।
        *संसद की एक समिति ने पिछले दिनों महंगे इलाज की शिकायतों को बढ़ता देखकर सरकार से सिफारिश की है कि सभी उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों के लिये यह ज़रूरी किया जाये कि वे रोगी को भर्ती करते हुए लंबे इलाज का अनुमानित खर्च उसके परिवार को अनिवार्य रूप से स्पश्ट करें। समिति ने उपचार के मानक नियम और तौर तरीकों उपलब्ध सुविधाओं और सभी तरह के खर्च के बारे में भी पारदर्शिता लाने के नियम लागू करने का सुझाव दिया है। उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले में वी द पीपुल संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली जा रही भारी फीस को मजबूरी का फायदा उठाते हुए एक तरह से लूटना बताया। पीठ ने इस मामले में वर्तमान कानून को अपर्याप्त बताते हुए नये कानून की ज़रूरत और ऐसे निजी अस्पतालों को सरकार द्वारा सशर्त दी गयी निशुल्क ज़मीन लेने के बाद भी गरीब लोगों का सस्ता इलाज नहीं करने पर सख्त कानूनी कार्यवाही पर ज़ोर दिया।* सरकार और कोर्ट के रूख से यह पता तो लगता ही है कि महंगा इलाज देश में लोगों के लिये बहुत बड़ी असहनीय समस्या बन चुका है।
       *एनएसएसओ के एक सर्वे के अनुसार देश में 45 साल से अधिक उम्र के अधिकांश लोग नियमित रूप से दवा खाने को विवश हैं। आंकड़ें बताते हैं कि कुल इलाज का 72 प्रतिशत खर्च केवल दवाओं को खरीदने में ही होता है। इससे देश में दवा उद्योग एक बड़ा कारोबार बन गया है। भारत में आज एक लाख करोड़ से अधिक का दवा व्यवसाय चल रहा है। जिसमें सरकारी दवा कंपनियों की हिस्सेदारी मात्र 400 करोड़ की है। सरकार की इस नाम मात्र की भागीदारी से निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों की मोनोपोली स्थापित हो चुकी है। हालांकि सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिये 348 दवाओं के दाम निर्धारित करने का दावा किया है लेकिन इसमें सरकारी अधिकारी और निजी कंपनी के अफसर मिलकर एक खेल यह करते हैं कि उन्होंने किसी भी दवा उत्पाद में एक प्रतिशत से अधिक का हिस्सा रखने वाली ब्रांडेड कंपनियों द्वारा ही निर्धारित किये गये अलग अलग मूल्यों का औसत निकालकर उस दवा का अधिकतक दाम तय कर दिया है। जबकि सबको पता है कि निजी दवा कंपनियां लागत पर 500 से 1000 प्रतिशत तक का मुनाफा वसूल रही हैं।* जिससे गरीब लोगों को ज़रूरी दवायें सस्ते रेट पर प्राइवेट ब्रांडेड कंपनियों से ही उपलब्ध कराने की सरकार की कवायद एक औपचारिकता दिखावा और मृगमरीचिका बन कर रह गयी है। इसके साथ ही दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग आॅथोरिटी का यह दावा आज भी दावा ही है कि वह दवाओं के दाम निर्धारित सीमित और आम आदमी की पहुंच में रखने के लिये निजी दवा कंपनियों को मुनाफाखोरी से रोकने लिये बाज़ार के हवाले नहीं करेगी बल्कि लागत के हिसाब से दवाओं के रेट तय करने के लिये प्रयासरत है। सरकार दवा बाज़ार का यह सच जानती है कि पंूजीवादी सिस्टम में दवा कंपनियां भी अपना मुनाफा मरीजों की जान की परवाह नहीं करते हुए हर हाल में बढ़ाने की कोशिश में लगी होंगी फिर भी उनको बेकाबू छोड़ दिया गया है। 
          सरकार की यह अनदेखी या अपराधिक लापरवाही की यह हालत तब है जबकि *काॅरपोरेट मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपनी एक स्टडी में यह पाया है कि देश की अधिकांश दवा कंपनियां दवाओं की लागत में 1100 प्रतिशत तक का लाभ जोड़कर दवाओं को बेच रही हैं।* एनएफपीए के तमाम नियामकों नियमों और शर्तों को धता बताते हुए दवा कंपनियां हाईकोर्ट के अनुसार लोगों की मजबूरी का नाजायज लाभ उठाकर उनको एक तरह से लूट रही हैं। साथ ही दवा कंपनियां सरकार के किसी भी नये कानून नियमन और रेग्यूलेटर का भी खुला विरोध करती चली आ रही हैं। यही कारण है कि लोग दवा कंपनियों की मनमानी के खिलाफ कोर्ट जाने लगे हैं। *मानकों से अधिक मूल्य वसूलने के लिये निजी दवा कंपनियों के खिलाफ कोर्ट में 900 से अधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कुछ मुकदमों में अदालत ने इन दवा कंपनियों पर हज़ारों करोड़ का जुर्माना भी लगाया है लेकिन इन ब्रांडेड दवा कंपनियों के दुस्साहस की हालत यह है कि इन्होंने मात्र 250 करोड़ अर्थदंड ही अब तक जमा किया है।* इतना ही नहीं ये कंपनियां नियम कानून का मजाक उड़ाकर भी दवाओं का निर्माण भंडारण और बिक्री कर रही हैं। इसके साथ ही सरकार से नियामक को कंपनियों के हिसाब से चलने का निर्देश देने की मांग भी कर रही हैं। सरकार का रूख़ भी इस मामले में निजी दवा कंपनियों के बेकाबू दवा के दामों को लेकर कोई बहुत आशावादी या सकारात्मक नहीं लगता क्योंकि वह भी पूंजीवादी बाज़ारवादी और मुनाफाखोरी नीति आज के दौर में अपरिहार्य मानकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को महंगे इलाज के लिये इनके ही रहम ओ करम पर छोड़ चुकी है। अब तो शिक्षा व्यवस्था को बदलने को संघर्ष कर रहे युवा वर्ग से ही जनता को कुछ आस जगी है। यह अलग बात है कि युवा वर्ग ही अपनी पढ़ाई नौकरी व पेपर लीक की समस्या के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर भी नज़र डाले तो कुछ सुधार हो सकता है क्योंकि बीमार और बुज़ुर्ग लोग न तो आंदोलन करने की स्थिति में हैं न ही सरकार उनकी बात सुनेगी।