*क्या पाकिस्तान अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है?*
पाकिस्तान में हाल ही में मुख्य रूप से लाहौर (पंजाब) में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। ये बदलाव पंजाब सरकार की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के नेतृत्व में विभाजन से पूर्व काल के मूल नामों को बहाल करने के लिए किए गए हैं।
मुख्य बदलाव लाहौर में किए गए हैं। जिनमें इस्लामपुरा को कृष्णा नगर, बबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक, मुस्तफाबाद को धर्मपुरा सुन्नत नगर को संत नगर,रहमान गली को राम गली,हामिद निजामी रोड को टेम्पल स्ट्रीट, निश्तर रोड को ब्रैंड्रेथ रोड , फातिमा जिन्ना रोड को क्वीन्स रोड, अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड किया गया है।
अन्य प्रस्तावित और बदले जाने वाले लक्ष्मी चौक, मोहन लाल बाजार, भगवान पुरा, शांति नगर आदि अभी बाकी हैं लेकिन इन पर भी शासन को प्रशासन की ओर से प्रस्ताव बनाकर भेजे जा चुके हैं। आशा की जाती है ये भी जल्दी ही पुराने सांस्कृतिक नामों से जाने जाएंगे। कुल मिलाकर 9 से ज्यादा जगहों के नाम पहले ही बदले जा चुके हैं, और 15 से अधिक और नामों को बदलने की योजना विचाराधीन है।
सवाल यह है कि पाकिस्तान जैसे कट्टर इसलामिक मुल्क में इन जगहों के नाम क्यों बदले गए? दरअसल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बहाल करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हिंदुस्तान के बंटवारे के समय सबसे अधिक तकलीफ़ देह विभाजन लाहौर जैसे विश्व प्रसिद्ध महानगर का हुआ था। वहाँ विभाजन से पहले मुस्लिम हिंदू जैन और सिखों की मिली जुली संस्कृति विकसित हुई थी लेकिन बंटवारे ने इसको दो टुकड़ों में अलग अलग कर दिलों का भी विभाजन कर दिया। लाहौर विभाजन 1947 से पहले कई धर्मों और ब्रिटिश काल की विविधता वाला शहर था। वहां की सरकार ने इस मिली जुली कल्चर को खत्म करने के लिए कई गैर मुस्लिम नामों को बाद में इस्लामी उर्दू और अरबी नामों से बदल दिया गया था। लेकिन नाम बदलने से पुरानी यादें सभ्यता और परम्पराएं कभी भी कहीं भी खत्म नहीं होती, वे कुछ समय के लिए दब जाती हैं या छिप जाती हैं। बताया जाता है कि पिछले दिनों जो नाम बदले गए हैं वे लाहौर हेरिटेज रिवाइवल प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की यह महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन अपने सीएम और पीएम रहते वे इसको परवान नहीं चढ़ा सके थे। अब यह अहम और ऐतिहासिक काम उनकी बेटी और पंजाब की पहली महिला सीएम मरियम नवाज़ ने किया है। इसका मकसद पर्यटन को बढ़ावा और शहर की पुरानी पहचान को फिर से जीवंत करने का भी बताया जाता है, लेकिन इसके लिए न केवल प्रांतीय सरकार को अपना दिल बड़ा करना पड़ा है बल्कि योजना को लागू करने में वहां के कट्टरपंथी भी आड़े आ रहे थे। इतना ही नहीं कई आतंकी और संकीर्ण सोच के संगठनों तो पंजाब सरकार से फिर से वही मुस्लिम नाम रखने की ज़ोरदार मांग भी की है और उनकी बात नहीं माने जाने पर आंदोलन और हिंसक कार्यवाही धमकी दी है। सरकार का कहना है कि वह कट्टर तत्वों के दबाव में नहीं आयेगी क्योंकि यह सांस्कृतिक संरक्षण है, न कि कोई राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए की गई व्यक्ति विशेष या पार्टी की कार्यवाही।
पाकिस्तान जैसे कट्टर संकीर्ण और हिंसक गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले मुल्क में ये क्रांतिकारी उदार और सेक्युलर बदलाव आजकल दुनियाभर में काफी चर्चा में हैं। कुछ लोग इसे अपनी जड़ों की ओर लौटने वाला बड़ा सकारात्मक कदम यानी इतिहास की बहाली मान रहे हैं, तो कुछ विरोधी इसे कुफ्र भारतीय हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने वाला विवादास्पद काम भी बता रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एशिया में भारत पाकिस्तान या बंगलादेश कोई भी मुल्क हो, इनकी सभ्यता संस्कृति और परंपराएं एक ही रही हैं। यह ठीक है कि लोग समय समय पर धर्म बदलते रहते हैं लेकिन उनके पुरखों पूर्वजों और बुजुर्गों की जीवन जीने की शैली वही रहती है, जो हज़ारों साल पहले थी, इसलिए संस्कृति साहित्य और समाज की समृद्ध यादों को साझा विरासत मानकर अपनाया जाना चाहिए जैसा कि पाकिस्तान ने अपनी छवि कट्टर सोच और गैर मुस्लिम तौर तरीकों के विरोध के बावजूद आज सदबुद्धि आने पर किया है, शायद भारत भी अगर बहुसंख्यक राजनीति के ध्रुवीकरण के दौर से एक दिन निकला तो पाकिस्तान की इस उदार सोच का स्वागत करेगा और अपनी उसी पुरानी उदारता धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता को अक्षुण्ण बनाये रखेगा जो उसने हज़ारों साल से बनाए रखकर दुनिया के सामने बेहतरीन मिसाल पेश की है।शकील जमाली का एक शेर याद आ रहा है_
*पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम,*
*दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं।*