Wednesday, 15 July 2026

बेकाबू बाइकर्स

*आपकी बाइक है शौक से चलाओ,* 
*दूसरों के लिए आफ़त मत बनाओ*
       *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        आजकल जिस तरह से युवा मोबाइल के दीवाने हैं। उसी तरह से उनका दूसरा प्यार बाइक बन चुकी है। कुछ युवक युवतियां स्कूटर और स्कूटी भी चलाते हैं लेकिन बाइक चलाने वाले उनकी तुलना में कई गुना अधिक हैं। लोवर मीडियम और मीडियम क्लास जहां 75,000 से एक लाख तक की बाइक चलाते हैं, वहीं अपर मीडियम और अपर क्लास बहुत महंगी मॉडर्न और स्पोर्ट बाइक चलाते है। ये अन्य सुविधाओं के साथ ही स्टार्ट होते ही बहुत तेज़ स्पीड पकड़ लेती हैं। असली प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती हैं। फैशन और स्पीड का दीवाना युवा ये आधुनिक बाइक चलाते हुए पूरी सावधानी नहीं बरतता। वह हेलमेट नहीं लगाता, डी एल नहीं बनवाता, दो नहीं तीन नहीं चार चार साथियों को बाइक पर बैठाकर गली मुहल्ले में ही नहीं हाईवे और एक्सप्रेस वे पर भी निकल जाता है। खुद की जान के साथ सड़को पर पैदल या दूसरे हल्के वाहनों से जा रहे लोगों की जान भी खतरे में डालता है। कई बार एक्सीडेंट होते हैं। युवा जान से हाथ धो बैठते हैं। मातापिता लाड प्यार में नाबालिग बच्चों को भी टू व्हीलर की चाबी दे देते हैं जोकि नियम कानून ही नहीं उनकी अपनी सुरक्षा के लिए मुसीबत बन जाती है। बड़े चौराहों और राष्ट्रीय राज मार्गों पर तो कभी कभी पुलिस इन वाहनों की चेकिंग करके चालान काट भी देती है, लेकिन नगरो कस्बों गांवों के गली मोहल्लों में ये बाइक सवार युवा सरपट दौड़ते रहते हैं। इनके प्रेशर हार्न से बच्चे बुजुर्ग और बीमार सो नहीं पाते या सोते सोते चौंक कर बार बार जाग जाते हैं। ये अपनी बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर गैर कानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 
        इन अवैध साइलेंसर से बार बार पटाखा फूटने की दिल हिला देने वाली तेज़ आवाजें गूंजती रहती हैं लेकिन इन बेलगाम और बिगड़े हुए युवाओं की मौज मस्ती पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अव्वल तो गली मोहल्लों में इनको पुलिस पकड़ती ही नहीं है, अगर ये गलती से किसी व्यस्त चौराहे या हाईवे पर पकड़े भी जाते है तो अपने परिवार के रसूख का इस्तेमाल नहीं तो यातायात पुलिस की जेब गर्म और कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर चालान कटवाकर भर देते हैं या कभी कभी मौक़े से दुस्साहस दिखाते हुए भाग भी जाते हैं। कई नगरों में कई सड़कों पर बहुत ऊंचे स्पीड ब्रेकर होने या जाम लगा होने पर ये स्पीड काबू नहीं कर पाने से भयंकर टक्कर भी मार देते हैं और भाग जाते हैं। इन बिगड़े हुए युवाओं की इन लापरवाही मनमानी और खतरनाक बाइक स्टंट से नागरिक बहुत परेशान हैं। वे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों आश्रमों धर्मशालाओं में पूजा नमाज से लेकर अस्पताल में अमन सकून से इलाज तक नहीं करा पाते। स्कूल कॉलेज के बच्चे इनके हॉर्न और मोडिफाइड साइलेंसर के कर्कश असहनीय शोर से पढ़ भी नहीं पाते। 
        ऐसी बाइक पास से गुजरने मात्र से कई मासूम बच्चे महिलाएं और बूढ़े बुजुर्ग तो एक्सीडेंट के खौफ से बुरी तरह काँप जाते हैं या डिसबैलेंस होकर रास्ते में ही गिरकर चोट खा जाते हैं। इन बेकाबू बाइकर्स के डरावने कोलाहल से कभी कभी अवारा बेसहारा जानवर बौखलाकर रोड पर बेतहाशा दौड़ने लगते है जिससे पैदल या वाहन पर चलते दूसरे लोग उनकी ज़द में आकर बुरी तरह घायल या मौत का शिकार हो जाते हैं। कई बाइक और दूसरे वाहनों की प्रदूषण की जांच या तो बरसों तक होती नहीं या फिर वे फील गुड कराकर फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं, जिससे वे जिधर से निकलते हैं, उधर ज़हरीला धुआँ छोड़ते जाते हैं और लोग उनको बददुआ देते रहते हैं। इनकी इन बढ़ती समाज विरोधी शांति विरोधी और नागरिक सुरक्षा की दुश्मन हरकतों का कोई समाधान सरकार प्रशासन और पुलिस के पास अभी तक नहीं है। काश इन नौजवानों और उनके परिवार वालों को सिविक सेंस नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य बोध हो और वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार संवेदनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ा सकें जिससे वे अपनी बाइक को चलती फिरती आफ़त मुसीबत और यमदूत बनने से बच सकें।
*नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है*
(नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं)

अयोध्या चढ़ावा चोरी...

*अयोध्या चढ़ावा चोरी: वकील अपना काम नहीं करेंगे तो कानून अपना काम कैसे करेगा?*
          _*इक़बाल हिंदुस्तानी*
                    अयोध्या बार एसोसिएशन ने एलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के किसी आरोपी की कोई वकील कानूनी पैरवी नहीं करेगा। अगर एसोसिएशन के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई वकील ऐसा करता है तो उस पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जायेगा। हमारा कहना है कि अपराधी कोई भी हो उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन हर आरोपी अपराधी ही हो यह ज़रूरी नहीं होता। कानून के राज में जब तक कोई आरोपी अपराधी साबित नहीं हो जाता उसको किसी भी प्रकार से किसी भी स्तर पर किसी के भी द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार कितना ही गम्भीर अपराध का आरोपी हो उसको दंड दिए जाने से पहले अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने का कानूनी अधिकार दिया गया है। अयोध्या के अधिवक्ताओं के संगठन ने आरोपियों को कानूनी सहायता नहीं देने का जो फ़ैसला किया है, वह अपने आप में कानून के राज की मूल भावना के खिलाफ़ है। कानून की पढ़ाई, डिग्री और अदालत में प्रैक्टिस के लिए बार कौंसिल में रजिस्ट्रेशन से पहले प्रत्येक अधिवक्ता को शपथ पत्र देना होता है कि वह संविधान के अनुसार कानून का पालन करते हुए अपने पेशे के नियम के मुताबिक किसी जरूरतमंद को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं करेगा। इसके बावजूद कोई एक दो वकील व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि उनकी पूरी यूनियन एक आवाज़ में एक साथ एक प्रस्ताव पास करके अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा और दान चोरी के आरोपियों के केस कानूनी पैरवी के लिये लेने से खुले आम इन्कार कर रही है। 
              यहां यह स्पष्ट कर दें हमारा अभिप्राय इस मामले में यह बिल्कुल नहीं है कि चढ़ावा चोरी के अपराधियों को दंड नहीं मिले। हम चाहते हैं इस केस में जो भी अपराधी साबित हों उनको न केवल सज़ा मिले बल्कि कड़ी और शीघ्र सज़ा दी जाए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की निर्लज्ज और राम भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली घटिया हरकत करने से पहले सौ बार सोचे और चोरी करने से डरे व बचे। अजीब बात यह है कि कानून की पैरवी करने वाले वकील ही धार्मिक भावनाओं को संविधान से ऊपर रखकर आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान करने से मना कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस बारे में साफ़ और सख़्त स्टैंडिंग ऑर्डर हैं कि संविधान और न्यायपालिका के नियम अनुसार कोई वकील किसी आरोपी की पैरवी करने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते कि उसने उससे पहले ही दूसरे पक्ष का केस लड़ने को अनुबंध नहीं कर लिया हो। *2010 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ़ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने किसी भी बार एसोसिएशन के इस तरह के प्रस्ताव को गैर कानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। यह मामला कोयमबटूर के एक वकील और पुलिस वाले के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद अधिवक्ताओं ने पुलिस के मामलों की कानूनी पैरवी करने से मना कर दिया था। मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा वकीलों के इस फैसके को वकालत के प्रोफेशन के खिलाफ़ बताने के बाद बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट अपील में गई थी। *उत्तराखंड में एक वकील की हत्या के मामले में जब वकीलों ने आरोपियों को कानूनी सहायता देने से मना किया तो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रस्ताव गैर कानूनी बताते हुए हत्या आरोपियों की पैरवी करने से रोकने या इस दौरान कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने पर वकीलों को कोर्ट की मानहानि का केस दर्ज कराने की कड़ी चेतावनी दी थी।* 
            *इतना ही नहीं बार कौंसिल ऑफ इंडिया भी इस बारे में स्पष्ट कह चुका है कि कोई भी वकील किसी भी आरोपी को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं कर सकता।* बार कौंसिल का यहां तक कहना है कि वकील फीस भी केस की नेचर गंभीरता और स्तर के हिसाब से ले सकता है, इतनी नहीं मांग सकता जिससे आरोपी अनावश्यक और अव्यवहारिक मानकर भुगतान करने में असमर्थ हो और उसको जानबूझकर कानूनी बचाव से वंचित कर दिया जाए। कौंसिल का कहना था कि अगर एसोसिएशन के फैसले के खिलाफ जाकर कोई वकील किसी आरोपी का कोई केस कोर्ट में लड़ता है तो उस अधिवक्ता पर एसोसिएशन न तो कोई अर्थदंड लगा सकती है और न ही उसकी सदस्यता निरस्त की जा सकती है। 
            *संविधान का अनुच्छेद 22 (1) हर किसी को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का वकील अपने कानूनी बचाव में रखना चाहे तो वकील उसको कानूनी सेवाएं देने से इन्कार नहीं कर सकता। सेक्शन 14 हर भारतीय नागरिक को समान कानूनी अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता है तो आर्टिकल 39 ए राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। संविधान यहां तक कहता है कि किसी नागरिक को गरीब कमज़ोर अशिक्षित या विकलांग होने के कारण मुकदमे के दौरान कानूनी बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता और यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह असमर्थ होने पर आरोपी को सरकारी वकील कानूनी बचाव के लिए उपलब्ध कराए।* 
             अगर आज वकीलों के इस अवैध प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो कल डॉक्टर ऐसे आरोपियों के इलाज को यह कहकर मना करने लगेंगे कि आरोपियों ने उनकी धार्मिक भावना या अस्पताल पर हमला करके आहत किया है। दूसरे पेशे वाले भी उनके नक़्शे कदम पर चलकर देश में कानून की बजाए अराजकता की स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस गलत सिलसिले को यहीं रोकना ज़रूरी है। यही वजह है कि 26/11 के मुंबई हमले के पाकिस्तानी आरोपी अजमल कसाब को मौके से रंगे हाथ गोली चलाते हुए निर्दोष लोगों का खून बहाते हुए पकड़े जाने के बावजूद कोर्ट में केस चलाने के दौरान सरकार ने उसके कानूनी बचाव को अपने खर्च पर सरकारी वकील उपलब्ध कराया था। उसको बाद में कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से करते हुए फांसी की सज़ा दी, लेकिन देश विदेश में यह संदेश गया कि उसको वास्तव में अपराधी साबित होने के बाद ही मृत्युदंड दिया गया और सही न्याय हुआ।
              यह भी विडंबना और विरोधाभास ही कहा जाएगा कि अयोध्या के इन वकीलों ने ही दो जुलाई को राम जन्मभूमि थाने में ट्रस्ट से जुड़े कुछ बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज करने को तहरीर दी और आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों की आड़ में कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। वकीलों ने अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन भी किया लेकिन अब तक इनकी दी तहरीर पर कोई एफआईआर होने की अधिकृत सूचना नहीं है। खुद सरकार ने इस मामले में तब एसआईटी बनाई जब यह मामला सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके सार्वजनिक कर दिया। साथ ही कानून को अपना काम करने से रोकने या कुछ छिपाने के आरोप सरकार पर इसलिए भी लगने शुरू हुए क्योंकि उसने तत्काल एफआईआर करने की बजाए पहले एसआईटी बनाई। चर्चा है कि इस दौरान आरोपियों को चोरी का माल ठिकाने लगाने का अवसर मिल गया। अगर कानून को ठीक से काम करने दिया जाता तो पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती, फिर तत्काल आरोपियों को हिरासत में लिया जाता, उनसे सख्ती से पूछताछ होती, उनकी गिरफ्तारी होती, रिमांड पर लिया जाता, उनकी निशानदेही पर चोरी की रकम और दूसरी बेशकीमती सोने चांदी की भेंट की गईं चीज़ें बरामद की जाती, उनके घर दुकान और संपत्ति सील की जाती, उनके बैंक खाते सीज़ किए जाते, उनसे जुड़े लोगों पर नज़र रखी जाती और उनके घरों कार्यालयों व अन्य संबंधित भवनों की निगरानी भी की जाती जिससे वे अब तक चुराया गया चढ़ावा दान और उससे बनाई गई संपत्ति ज़ेवर और बैंक लॉकर से माल ठिकाने नहीं लगा सकें। 
             अंत में यही कहा जा सकता है कि ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी ऐसी पारदर्शी विश्वसनीय और अभेद्य व्यवस्था बनाने की थी जिसमें चोरी हो ही नहीं, लेकिन अगर मानवीय भूल तकनीकी चूक और व्यवहारिक गलती से चोरी का संगीन अपराध हो ही गया था तो ट्रस्ट सरकार पुलिस और वकीलों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे जनता में यह संदेश जाए कि कानून को अपना काम निष्पक्ष स्वतंत्र और संवैधानिक तरीके से नहीं करने दिया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने गंभीर और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करके राम भक्तों और आम आदमी को अच्छा संदेश नहीं दिया है। वहां एक माह से अधिक समय के बाद सुनवाई शुरू होने जा रही है।अभी भी समय है कि जनता का विश्वास कानून के राज में बहाल करने को इस मामले में त्वरित कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही को देश के तटस्थ धार्मिक संतों गणमान्य समाजसेवी और प्रतिष्ठित निष्पक्ष नागरिकों की एक कमेटी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज की अध्यक्षता में बनाकर निश्चित समय में जांच कराई जाए और दोषियों को कड़ा दंड दिया जाए। 
*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़*
*हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा*

Tuesday, 7 July 2026

सिया केतन और चेतन

*आज का विचार... इक़बाल हिंदुस्तानी*
*सिया, यह तू ने क्या कर दिया,*
 *ना नहीं की , मर्डर कर दिया?*
        पुणे की सिया पर आरोप है। उसने अपने मंगेतर केतन का अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर मर्डर कर दिया। वह साहस करके इस शादी को ना भी बोल सकती थी, लेकिन उसने दुस्साहस दिखाते हुए अपने होने वाले पति को खाई में धक्का दे दिया। हाल ही में इस तरह की और भी घटनाएं सामने आईं हैं। मेघालय में हनीमून के दौरान राजा रघुवंशी को विवाह के चौदह दिन बाद ही उसकी पत्नी ने मार दिया था। दिलीप यादव की सुपारी हत्या का आरोप है। मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत का ब्ल्यू ड्रम हत्याकांड पहले ही कुख्यात हो चुका है। सब्ज़ी विक्रेता धन्ना लाल सैनी की हत्या भी मीडिया में सुर्खियां बनी थीं। देहरादून का राजेश गुलाटी हत्या केस लोगों के दिमाग़ में अभी तक ताज़ा है।
        *एक सर्वे एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं और लड़कियों द्वारा अपने पतियों या प्रेमियों को खुद मार देने या सुपारी किलर से हत्या कराने के सालभर में 300 केस सामने आते हैं तो पतियों या प्रेमियों द्वारा पत्नियों और प्रेमिकाओं को इसी तरह क़त्ल करने के एक साल में 7000 मुकदमे दर्ज होते हैं। इस जानकारी से यह गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए कि लेडीज़ या प्रेमिकाएं बड़े पैमाने पर इस तरह की हत्याएं कर या करा रही हैं। सच यह है कि पुरुष प्रधान समाज में आज भी इस तरह के अपराध के मामलों में मर्द औरतों से बहुत आगे हैं।*
         हमारा मकसद यहां हत्यारी महिलाओं प्रेमिकाओं और पत्नियों को क्लीन चिट देना नहीं है, लेकिन इन चंद घटनाओं से यह निष्कर्ष निकालना कि अब महिलाएं पुरुषों की तरह क्रूर और ज़ालिम हो चुकी हैं, थोड़ा जल्दबाजी होगी। कुछ मामलों में प्रेमी प्रेमिकाएं जबरन अनचाहा रिश्ता होने से आत्महत्या भी कर लेते हैं। सिया केतन और चेतन का ही केस गौर से गहराई से और आराम से देखें तो पता चलता है कि सिया अपने माता पिता के असहनीय दबाव में इस अनचाही शादी के लिये ना बोलने का साहस नहीं दिखा पाई और उसने अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर केतन को कुछ इस तरह ठिकाने लगाने की साज़िश रची जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। लेकिन हुआ उल्टा। वह अपने अरबपति परिवार को इस शादी के लिए मना करके इसलिए भी नाराज़ नहीं करना चाहती थी क्योंकि वे उसे ऐसा करने पर अपनी संपत्ति घर और परिवार से अलग करने की चेतावनी दे रहे थे। वे परिवार की साख और सम्मान भी खराब होने की दुहाई दे रहे थे। सिया उनका दिल भी नहीं तोड़ना चाहती थी, लेकिन अपने प्रेमी को भी नहीं छोड़ना चाहती थी। वह भारी द्वंद्व और कशमकश में फंसी हुई थी। हमारा कहना है कि परिवार बच्चों को अच्छी समझ शिक्षा और संस्कृति सिखायें जिससे वे शादी के मामलों में उनकी बात मानें लेकिन अगर वे सहमत नहीं हो पाएं तो बेटे बेटियों को जबरदस्ती जान लेने या जान देने को कभी भी मजबूर नहीं करें।

Sunday, 5 July 2026

जनविरोधी फ़ैसले कैसे रुकेंगे?

*सरकारों के जनविरोधी फ़ैसले रोकने के सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो चुके हैं?*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी प्रॉपर्टी नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व जजों की सलाहकार कमेटी ही कर सकेगी। ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से यूपी गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी को अपराध की सज़ा मिले इससे कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन सरकार अपने किसी संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत दिए जेल में डाल दे यह कैसे कानून का राज माना जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं जिनमें आरोपी को जेल में रहकर खुद को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी ऐसे ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ प्रिवेंटिव तरीके अपनाए जाते रहे हैं जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों से लगातार आलोचना हुई है। बंगाल सरकार ने स्कूलों में मिड डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवा और शिक्षा में आरक्षण 17 से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईदे कुर्बान पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशु पालकों का भी भारी नुकसान किया था जो साल भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई के लिए करते हैं। टेलीग्राफ जैसे बड़े अखबार के एडिटर रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हुआ, जिससे वह अपनी बेटी की शादी तक में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से असंवैधानिक रोक लगा दी है, क्योंकि अनुमति मांगने पर अनुमति देने की बजाए ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंक विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनते थे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के राज में विपक्ष की सरकारों के जनहित के कानूनों को तो उसके राज्यपाल और यहां तक कि राष्ट्रपति तक सालों तक रोक कर बैठे रहते हैं लेकिन बीजेपी की राज्य सरकारों का कोई भी विवादित कानून वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना के बजाए उसके पक्ष में एक सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है। सबसे दुख और चिंता की बात तो यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और जब तब याची को हाईकोर्ट जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामले अनचाहे ढंग से सुनता भी है तो सालों तक टालता रहता है। उसके बाद बेंच के किसी जज का ट्रांसफर या रिटायरमेंट होने पर नई बेंच बना देता है। फिर लंबे समय तक वह बेंच फिर से पूरा मामला सुनती है। उसके बाद भी अकसर बेंच फैसले को सुरक्षित रख लेती है। इससे कई बार जब फैसला लंबे समय बाद आता भी है तो मूल मुद्दा ही खत्म हो चुका होता है। जैसे कई बार महाराष्ट्र सहित कई राज्य सरकारों सांसदों और विधायकों के चुनाव को लेकर हुआ है। वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और कोर्ट एक ही पेज पर नज़र आते हैं। हमारे चीफ़ जस्टिस कुछ भी दावा करें लेकिन उनके कई फैसले चीख़ चीख़ कर बोल रहे हैं कि वे फैसले जनता के कम सत्ता के पक्ष में अधिक झुके नज़र आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिए। एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं न्यूटल लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई साल से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उनको चार्जशीट दाखिल कर दोषी साबित नहीं किया गया है लेकिन बेल नियम जेल अपवाद कहने वाला कोर्ट उनको फिर भी ज़मानत नहीं देता है। सी ए ए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ उन्होंने शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उस दौरान ही सुनियोजित दंगा हुआ और उनको उनके साथियों सहित दंगे के आरोप में गम्भीर धाराएं लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है। महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवर को मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, नहीं तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू नहीं किए जाएंगे। यूपी में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के स्टैंडिंग ऑर्डर के बावजूद आरोपियों के घर पर तत्काल नियम विरुद्ध बुलडोजर चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियां उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाही करता है। देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मीट के साथ पकड़कर गौमांस बताया जाता है, पीटा जाता है, मॉब लिंच कर दिया जाता है, बाद में मांस की जांच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाऊस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर दुकान और दूसरी प्रॉपर्टी भी ध्वस्त कर दिए जाते हैं। नागरिकता साबित करने को लेकर एसआईआर में जिन प्रमाण पत्रों को मान्यता दी गई थी अब उनको भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट तक को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताकर नागरिकता साबित करने का डाक्यूमेंट होने से मना कर दिया है। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 कागज़ दिखाने के बावजूद भारतीय नागरिक मानने से मना कर दिया, जबकि इन कागज़ात में 1951 की वो एनआरसी भी थी जिसमें उसके दादा दादी का नाम मौजूद है। अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है लेकिन वहां के लिये महंगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात होती नहीं, दूसरे सबसे बड़ी अदालत भी ऐसे मामलों में लोगों को अकसर निराश ही कर रही है, इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है। कभी कभी कुछ हाईकोर्ट अपवाद स्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियां कर देते हैं जिनसे हल्की सी उम्मीद की किरण दिखती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही कई मुकदमे लोगों पर दर्ज हो जाते हैं। यूपी के कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि उस पर सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में 39 मुकदमे अब तक दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता विपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना प्रदर्शन तो दूर किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी हमें मिलने नहीं देती, ऐसा लगता है राज्य में इमरजेंसी लगी है। बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहां की सरकारों ने राज्यों की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट सुनवाई दौरान 27 लाख लोगों को अगली बार वोट दे देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों की मज़ाक भी उड़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो कोर्ट असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने को तैयार नहीं हो और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी नहीं करने दिया जा रहा तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है?

देर ना हो जाए कहीं...

*आज की बात... हिंदुस्तानी*
*इम्तेहान हो या प्लेन व रेल, कैसे बने समय से तालमेल?*
        पिछले दिनों हुई नीट की चर्चित परीक्षा में कुछ बच्चों को समय पर नहीं पहुंचने पर सेंटर में एंट्री नहीं मिली। इससे उनका पेपर छूट गया। उनका एक साल भी खराब हुआ और उनके परिवार का लाखों रुपया भी। इससे कुछ बच्चों ने आहत होकर अपनी जान भी दे दी। लेकिन यह कोई हल नहीं है। कुछ लोग ट्रेन से जाने के लिए भी रेलवे स्टेशन के लिए देर से पहुंचते हैं। ऐसा ही कई लोगों के साथ अपनी तय समय पर टेक ऑफ करने वाली फ्लाइट को लेकर भी होता है। बस छूटने पर तो लोग कुछ देर बाद दूसरी बस से निकल जाते हैं। लेकिन कारपोरेट कॉलेज हॉस्पिटल और कई जगह अब नौकरी करने वालों की हाज़िरी डिजिटल सिस्टम से लगती है। लेट जाने पर उस दिन उनकी छुट्टी लग जाती है या फिर काम पर लेने के बाद भी आधे दिन की सैलरी काट ली जाती है। बोर्ड के एक्जाम में भी देर से जाने वालों को पेपर छूटने पर फेल होने सप्लीमेंट्री आने या फिर से परीक्षा देने का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
      सवाल यह है इतना बड़ा नुकसान टेंशन और कैरियर को ख़तरा होने के बावजूद बच्चे शिक्षक और नौकरी पेशा लोगों के साथ आम आदमी भी बार बार क्यों लेट होते हैं? हम लोग पहले से गैप लेकर घर से क्यों नहीं निकलते, दूसरों का नुकसान देखकर भी सबक नहीं सीखते और खुद का एक बार कैरियर खराब होने पर भी अगली बार बदलाव नहीं करते। क्या हम लोग नहीं जानते कि घर से देर से या बिल्कुल क्लोज़ टाइम पर निकलने से हम अपनी मंज़िलों पर टाइम पर नहीं पहुंच पाएंगे। ट्रेन कैंसिल या लेट भी हो सकती है। क्या नीट जे ई ई और टेट जैसी परीक्षा हमारी वजह से निर्धारित समय से लेट की जा सकती हैं ? क्या ट्रेन और फ्लाइट किसी व्यक्ति विशेष के कारण देर से चलेंगे? क्या ऑफिस का डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम हमारी लेट लतीफी की वजह से हटा दिया जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर हम घर से टाइम पर नहीं निकले तो ग़लती किसकी है? अगर हमें टाइम पर रिक्शा नहीं मिली तो कौन जिम्मेदार है? अगर सड़क पर जाम लगा है तो कोई क्या कर सकता है? गलती चाहे सरकार पुलिस और सिस्टम की हो लेकिन ये ऐसे सवाल हैं जिनका हल खुद हमको ही तलाशना है। हल यह है कि हम समय से सोयें, समय पर उठने को एक नहीं दो दो अलार्म लगाएं, समय कम हो तो नाश्ता खाना और नहाना स्किप कर दें, रिक्शा नहीं मिले तो घर के वाहन से स्टेशन पहुंचे, परीक्षा ट्रेन और फ्लाइट के समय से एक दो घंटे पहले पहुंचने का प्लान बनाएं जिससे कुछ लेट भी हो जाएं तो समय पर एंट्री मिल जाए, अगर एक ही बस ट्रेन या फ्लाइट मंज़िल पर जाती हो तो एक दिन पहले पहुंच जाएं और किसी रिश्तेदार जान पहचान वाले या होटल में कमरा लेकर नाइट स्टे भी कर सकते हैं लेकिन देर से जाने का कोई बहाना नहीं चलेगा।

Thursday, 2 July 2026

कांग्रेस और मुस्लिम

*मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आने लगे क्या दलित पिछड़े भी आयेंगे?*
                 *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        सपा और कांग्रेस में यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर बयानबाजी तेज़ होती जा रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली और क्षेत्रीय दलों के प्रति उदारता न दिखाने पर नाराज़गी जताई है तो उधर कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा से कांग्रेस को बराबर सम्मान और सीट शेयर करने की दो टूक मांग की है। असम में बदरुद्दीन अजमल की ए आई यूडीएफ से लगभग आधा मुस्लिम वोट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ शिफ़्ट होने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ए आई यूडीएफ का 2021 का वोट 10 प्रतिशत से अधिक था जो इस साल घटकर 5.46 प्रतिशत रह गया। उसको कुल दो सीट मिली। कांग्रेस को वहां 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिला और उसने 19 सीट जीतीं जिनमें से 18 विधायक मुस्लिम हैं। दिल्ली में आपका मुस्लिम वोट 10.8 प्रतिशत घटा है और इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ गया है। *सीएसडीएस लोकनीति और मीडिया विश्लेषण से पता लगता है कि कांग्रेस को उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम 80 प्रतिशत तक, दलित 60 प्रतिशत तक आदिवासी 50 प्रतिशत तक और पिछड़े 30 से 40 प्रतिशत तक कुछ प्रदेशों तक सीमित हैं। जबकि उच्च जातियों में केवल उदार एवं सेक्युलर परिवार के गिने चुने लोग ही कांग्रेस को वोट करते हैं। इनका अधिकांश वोट बीजेपी या उसके घटकों को जाता है। कांग्रेस उच्च सम्पन्न और मध्य वर्ग में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। कांग्रेस का असर हिमाचल कर्नाटक तेलंगाना राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ केरला उत्तराखंड पंजाब में मुख्य दल के रूप में मौजूद है। इतिहास गवाह है कुछ राज्यों में कांग्रेस एक बार चुनाव हारी तो फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। मिसाल के तौर पर 1967 में तमिलनाडु 1977 में बंगाल 1989 में यूपी 1990 के दशक में बिहार और गुजरात में 1995 में महाराष्ट्र 2013 में दिल्ली 2016 में असम 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद वह इन राज्यों में आज तक सत्ता से बाहर है।*
            ऐसा नहीं है, मुस्लिम कांग्रेस से बहुत खुश है, बल्कि वह यह समझ गया है कि क्षेत्रीय और खास तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टियां बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती। इस बदलाव की शुरुआत दिल्ली में आप को छोड़कर कांग्रेस की तरफ गए मुस्लिम वोट के बड़े हिस्से से हो चुकी है। चर्चा है जिस तरह से आप के राज्यसभा सदस्य बीजेपी में गए हैं, इससे नाराज़ मुस्लिम वोट आगे चुनाव में आप को और अधिक छोड़कर कांग्रेस के साथ जुड़ेगा। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बंगाल में टीएमसी से छिटक कर जो 60 विधायक और 20 सांसद एनडीए यानी बीजेपी के समर्थन में गये हैं, उससे आगे मुसलमान बंगाल में भी ममता को छोड़कर राहुल की कांग्रेस या कुछ हिस्सा कम्युनिस्टों के साथ जुड़ सकता है। यही वजह है कि यूपी में सपा के सांसदों को तोड़ने की चर्चा फिलहाल ठंडी पड़ गई है। संघ इस राजनीतिक समीकरण को समझकर आशंकित है कि अगर अधिकांश मुस्लिम वोट से जीते सपा एमपी तोड़कर बीजेपी या एनडीए में लाए गए तो मुस्लिम आगे से सपा पर भरोसा न कर बड़ी संख्या में कांग्रेस या आंशिक रूप से आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए जन्मे दलों में दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाने को जा सकते है। बीजेपी के लिए यह समीकरण सबसे घातक माना जाता है। दरअसल मुस्लिम कांग्रेस सपा बसपा या आरजेडी जैसे किसी दल को जिताने के लिए कभी वोट नहीं देता है। वह तो हर उस सेक्युलर पार्टी को वोट देता रहा है जो भी बीजेपी को गारंटी से हरा सकता हो। यही वजह है उसको पार्टी बदलने में तनिक भी दिक्कत नहीं होती। मुस्लिम अब पूरे देश में महसूस कर रहा है कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को नहीं हरा सकते। उल्टा वे बीजेपी के दबाव में काम करते हैं। बीजेपी को बैकडोर से सपोर्ट तक कर देते हैं और सेक्युलर कांग्रेस का विरोध करते हैं। हद तो यह है कि जब लालच और दबाव ब्लैकमेल की सीमा तक पहुंच जाता है तो इन दलों के जनप्रतिनिधि टूट कर उसी बीजेपी में या उसके गठबंधन में चले जाते हैं जिसको हराने को मुस्लिम समाज ने इनको वोट दिया था। मुस्लिम जानते हैं कि अकेले उनके वोट से कांग्रेस वापस सत्ता में नहीं आ सकती, लेकिन वे इसकी पहल यह सोचकर कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल दलित और पिछड़े भी जब बीजेपी से नाराज़ होंगे तो कांग्रेस में आ सकते हैं।
            1989 से पहले का रिकॉर्ड देखें तो कांग्रेस का एक वोट बैंक हुआ करता था। जिनमें ब्राह्मण मुस्लिम और दलित समाज मुख्य रूप से शामिल थे। इस समीकरण के बल पर कांग्रेस ने देश और राज्यों में कई दशक तक एकक्षत्र राज किया। विडंबना यह रही कि फिर भी कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को स्थायी रूप से अपना बनाए रखने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। उल्टा हुआ यह कि सत्ता का अधिकांश लाभ पहले से ही सम्पन्न सक्षम और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा उच्च वर्ग यानी स्वर्ण जातियां विशेष रूप से ब्राह्मण लेते रहे। कांग्रेस ने दलितों मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने के लिए एक नकारात्मक काम किया। उसने संघ को फलने फूलने दिया। बीजेपी को सांप्रदायिकता की राजनीति करने दी। उसके राज में खूब दंगे हुए, हजारों लोग मारे गए, जिनमें मुस्लिम अधिक होते थे। उनके कारोबार तबाह कर दिए गए। घर जलाए गए। महिलाओं से बलात्कार हुए। महीनों कर्फ़्यू लगा रहता था। फिर दिखावे के लिए जांच आयोग बनते थे। उनकी कई साल बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती थी। कांग्रेस जानती थी दंगे होते नहीं, सुनियोजित तरीके से कराए जाते हैं। एक तरह से कांग्रेस आज की टीएमसी की तरह मुसलमानों दलितों को बीजेपी से डराकर वोट लेने की राजनीति कर रही थी। दलितों को वह बीजेपी के सत्ता में आने पर आरक्षण और संविधान खत्म होने का भय दिखाती थी। जब इससे भी काम नहीं चला तो कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को खुश करने के बदले हिंदूवादी लोगों को भी खुश करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना था। इससे सांप्रदायिक जिन्न बोतल से बाहर आ गया और धीरे धीरे कांग्रेस को पूरी तरह खा गया। *जहाँ तक पिछड़ों का सवाल है, उनकी आबादी 1931 की जातीय गणना के अनुसार 54 प्रतिशत मानी जाती है लेकिन कांग्रेस से अधिकांश पिछड़े दूरी बनाए रहे जो विकल्प मिलने पर बीजेपी के पाले में चले गए। इतिहास बताता है नेहरू सरकार ने पिछड़ों के आरक्षण पर 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था। आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सफारिश की लेकिन नेहरू ने जाति के आधार पर रिजर्वेशन नहीं देने की नीति के कारण इस को लागू नहीं किया। इसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग बनाया। इंदिरा सरकार को 1980 में 3743 पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की इस आयोग ने सिफारिश की लेकिन कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दस साल बाद वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार ने इन सिफारिशों को लागू किया।* इससे अधिकांश पिछड़ी जातियां कांग्रेस से विमुख हो गईं। क्षेत्रीय दल भी क्योंकि अलग अलग प्रदेशों में एक दो दबंग पिछड़ी जातियों का नेतृत्व अधिक कर रहे थे, ऐसे में अधिकांश पिछड़े बीजेपी के साथ हिंदुत्व के अभियान में शामिल हो गए। पिछले दिनों राहुल ने रायबरेली में आज़ादी की दलित योद्धा वीरा पासी की विशाल मूर्ति का अनावरण कर दलितों को सांकेतिक सम्मान दिया है। अब राहुल गांधी ने इस भूल को सुधारने के लिए जिस तरह संविधान दलित पिछड़ों के आरक्षण, जातीय जनगणना और संवैधानिक समानता की मांग उठानी शुरू की है, उससे आशा है कि दलित पिछड़े भी बीजेपी से निराश हुए तो कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं।

Sunday, 28 June 2026

घरेलू औरत

*आज की बात...हिंदुस्तानी*
*घरेलू औरत नहीं है बेकार,*
*उसके काम की वैल्यू 30 हज़ार*
          सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दुर्घटना मृत्यु के एक मामले में मुआवजा तय करते हुए घरेलू औरत के काम की कीमत 30,000 रुपए मासिक मानी है। साथ ही कोर्ट ने हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और अगर वो महिला कोई और काम भी करती हो तो उसकी कीमत अलग से जोड़ने को कहा है। 
     कुछ लोग केवल उन महिलाओं के काम की वैल्यू समझते हैं, जो घर से बाहर जाकर बिज़नेस या नौकरी करती हैं। उनका मानना है कि जो कमाकर नहीं लाता वो बेकार है। जबकि आप हिसाब जोड़ें तो महिलाएं घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। घर से बाहर काम करने वाले हर पुरुष के काम के घंटे तय होते हैं, छुट्टी भी मिलती है, वो खुद भी अवकाश लेता है और वह एक्स्ट्रा काम करता है तो उसको डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान भी होता है। जबकि घर की महिला को ऐसा कुछ नहीं मिलता। उसको पर्याप्त आराम भी नहीं मिलता। साथ ही उसकी नींद के घंटे भी कम हो जाते हैं। अगर आप उनके खाना बनाने नाश्ता बनाने बार बार चाय बनाने सफ़ाई कपड़े व बर्तन धोने प्रेस करने बिस्तर बिछाने बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल त्यौहार पर अतिरिक्त तैयारी करने, शादी बर्थडे या बच्चा पैदा होने पर एक्स्ट्रा काम का बोझ झेलने, बच्चों को होम वर्क कराने, उनको स्कूल छोड़ने और लेने जाने, उनकी माता पिता की और अपनी व कभी कभी पति की भी दवाई लाने, लाइन में लगकर सरकारी राशन लाने, पर्दे साफ़ करने, घर के जाले झाड़ने, सोफों के कवर बदलने, बच्चों के खिलौने संभालकर रखने, मेहमानों को अटेंड करने, टंकी में पानी भरने, घर का सामान खरीदने को लिस्ट बनाने, परिवार की तरफ़ से दूसरे रिश्तेदारों के लेनदेन का हिसाब रखने, सबके सोने पर लाइटें बंद करने, घर में पेंट होने पर सामान हटाने फिर सेट करने, बाज़ार से कपड़ों सहित घरेलू इस्तेमाल का सामान खरीदने आदि का बेतहाशा काम वो करती हैं।
       देश की जीडीपी में घरेलू महिलाओं के काम का 17 प्रतिशत योगदान माना जाता है। फिर भी लिंग के आधार पर महिलाओं के घरेलू काम को फ्री समझा जाता है और उनको बेकार। जबकि आर्थिक समानता के हिसाब से देखें तो सबको वेतन नहीं मिलने बावजूद घरेलू महिलाओं का घर के काम में जो योगदान माना गया है, उतना देश के आधे से अधिक पुरुष भी नहीं कमाते। घरेलू महिलाएं एक तरह से राष्ट्र निर्माता हैं। वे देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। ऐसी सभी महिलाओं को हमारा सलाम।