Thursday, 26 February 2026

राहुल गांधी को जेल क्यों नहीं भेजते?

*राहुल गांधी देश के लिये ख़तरा हैं तो सरकार जेल क्यों नहंी भेजती?* 
0 इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों को देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
    *-इक़बाल हिन्दुस्तानी*
      कांग्रेस नेता और लीडर आॅफ अपोज़ीशन राहुल गांधी ने पिछले दिनों मोदी सरकार बीजेपी और संघ पर कई गंभीर राजनीतिक आरोप लगाये। संसद में अपनी बात रखते हुए जब उनको आरोपों को साबित करने की चुनौती दी गयी तो उन्होंने प्रमाण प्रस्तुत करने की हामी भरी। लेकिन तभी सदन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भाजपा नेता जगदंबिका पाल ने मौके की नज़ाकत समझते हुए सरकार की और किरकिरी होने से बचाने के लिये राहुल गांधी को निर्देश दिया कि सबूत पेश करने की कोई ज़रूरत नहीं है, राहुल जल्दी से जल्दी अपनी बात खत्म करें। दरअसल राहुल गांधी ने कुछ समय से मोदी सरकार के खिलाफ बहुत कड़ा रूख़ अपना रखा है। उन्होंने संसद में बोलते हुए आरोप लगाया कि पूर्व सेनाध्यक्ष नरवाणे ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि जब चीन हमारे देश में घुसपैठ कर रहा था तो उनको बार बार अनुमति मांगने पर भी चीन को कड़ा मुंहतोड़ सैनिक जवाब देने की तत्काल छूट नहीं दी गयी। जबकि पीएम मोदी बार बार अपनी छाती 56 इंच बताकर देश को झुकने नहीं देने का झूठा दावा करते रहे हैं। राहुल गांधी का यह भी दावा था कि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौता किया है। उसमें देश के हितों से समझौता किया गया है। इस एकतरफा और ट्रंप के दबाव में किये गये एग्रीमेंट से भारत के किसानों की कमर टूट जायेगी। राहुल गांधी का यह भी आरोप रहा है कि चर्चित और विवादित यौन आरोपों से भरी एप्सटीन फाइल में मोदी सहित उनके एक खास केंद्रीय मंत्री और उनके करीबी एक बड़े उद्योगपति का नाम आया है। इसके साथ ही संसद में जब भी मौका मिलता है, राहुल गांधी मोदी सरकार पर चुनाव आयोग के द्वारा वोट चोरी कर चुनाव जीतने का गंभीर आरोप भी बार बार लगाते आ रहे हैं। इन जैसे और भी कई बड़े राजनीतिक आरोप राहुल गांधी मोदी सरकार के साथ ही बीजेपी और आरएसएस पर लगातार लगाते आ रहे हैं। इसमें कोई नई या आश्चर्य की बात भी नहीं है। क्योंकि विपक्षी नेता का यही काम होता है।
        पहले तो जब वे विपक्ष के नेता के पद पर नहीं थे और संघ परिवार ने उनकी छवि ’’पप्पू‘‘ की बना रखी थी, उनकी बात को कोई खास वेट नहीं मिलता था। राहुल गांधी जब जब विदेश जाते हैं, वहां भी वे भारत में मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे संविधान लोकतंत्र और कानून के राज के खिलाफ कामों पर चिंता जताते रहे हैं। इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही अन्य भाजपा नेता और भी गंदी घटिया और निचले स्तर की भाषा का प्रयोग करते हुए राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि अगर वास्तव में राहुल गांधी इतने बड़े ‘‘कुख्यात अपराधी’’हैं तो सरकार उनके खिलाफ संसदीय या कानूनी कार्यवाही कर अब तक उनको जेल क्यों नहीं भेज रही? ऐसा लगता है कि पहली बार किसी विपक्षी नेता ने साहस दिखाते हुए संसद उसके बाहर देश में और मौका मिलने पर विदेश में मोदी सरकार की तथ्यों तर्कों और प्रमाणों के साथ कथनी करनी में भारी अंतर की पोल खोलकर उसको आईना दिखा दिया है जिससे सरकार तिलमिला बौखला और डर गयी है लेकिन राहुल गांधी का अब तक तो कुछ बिगाड़ नहीं पाई है। सरकार राहुल को जेल भेजकर उनके हीरो बनने से भी डरती है। लगता है भविष्य में किसी पुराने मामले में राहुल गांधी को सज़ा दिलाकर संसद से निकालकर जल्दी ही सबक सिखाया जा सकता है। मोदी सरकार पर इस मामले में शायर ने क्या खूब कहा है- दूसरों पर जब तब्सिरा किया कीजिये, आईना सामने रख लिया कीजिये।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मधुसूदन आनंद

*मधुसूदन आनंदः जिन्होंने देश में किया नजीबाबाद का नाम बुलंद!* 
      -इक़बाल हिन्दुस्तानी
     नजीबाबाद के मूल निवासी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार मधुसूदन आनंद का बीती 19 फरवरी को निधन हो गया था। वह देश के जानेमाने पत्रकारों में से एक रहे हैं। मधुसूदन आनंद  हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रमुख और सम्मानित व्यक्तित्व थे। उनका जन्म 30 दिसंबर 1952 को बिजनौर जनपद के नजीबाबाद नगर में हुआ था। वे वरिष्ठ लेखक कहानीकार, कवि, निबंधकार, संपादक और पत्रकार थे। उनकी शिक्षा एम.ए. (हिंदी) थी। उनकी प्रमुख रचनाएँ कविता संग्रह पृथ्वी से करें फरमाइश व कहानी संग्रह करौंदे का पेड़, साधारण जीवन, बचपन, थोड़ा सा उजाला निबंध संग्रह जो सामने है। उन्होंने संपादन का काम भी सफलतापूर्वक किया, जिसमें नवभारत टाइम्स के यशस्वी संपादक रहे राजेंद्र माथुर के अग्रलेखों का संचयन भी सम्मिलित है। पत्रकारिता में उनका योगदान याद करें तो मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को गंभीरता, निष्पक्षता, साहित्यिक भाषा शैली की गुणवत्ता और सामाजिक संवेदनशीलता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान के कुछ मुख्य बिंदु इस तरह से गिनाये जा सकते हैं।
      उन्होंने 1974 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में ट्रेनी पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया और नवभारत टाइम्स से सहयोगी संपादक के रूप में लंबे समय तक जुड़े रहे। यह भी बताया जाता है कि उनकी नियुक्ति आरंभ में लेखा विभाग में हुयी थी लेकिन लिखने पढ़ने का बचपन से ही उनको शौक था तो वे कुछ ही समय बाद एकाउंटिंग सैक्शन से संपादकीय विभाग में आ गये। वहां उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा कुछ ही समय में अपने वरिष्ठ साथी पत्रकारों को मनवा दिया। नवभारत टाइम्स में विभिन्न पदों पर काम किया। सब एडिटर, विशेष संवाददाता, सहायक संपादक, संपादकीय पेज प्रभारी, नाइट एडीटर, और अंततः अपनी मेहनत और लगन के बल पर संपादक के पद तक जा पहुंचे पहुंचे। मधुसूदन ने अपनी प्रतिभा व्यवहार कुशलता और योग्यता के बल पर कुछ ही समय में राजधानी दिल्ली के सरकारी क्षेत्र में ऐसी छवि बना ली थी, एक दौर में सत्ता चाहे किसी की भी हो, उनकी पहुंच सीधे पीएमओ तक रहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में कवरेज के लिये साथ जाने वाले चंद गिने चुने संपादकों में उनका नाम सदैव शामिल रहता था। उनकी विशेषता यह थी कि वे न केवल पीएम की विज़िट में उनसे लगातार साक्षात्कार करते और उनके प्रोग्राम की विस्तृत ख़बर लिखते थे बल्कि वहां से वापस आने के बाद भी उस विदेश यात्रा पर कई कई विशेष संपादकीय लेख और रिपोर्ताज लिखते थे। जिनका उस समय के उनके चाहने वाले पाठक बड़ी अधीरता से इंतज़ार करते थे। उनके नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ने राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी संतुलित और विश्वसनीय पत्रकारिता की अपनी सराहनीय नीति बनाए और बचाये रखी। वे निडर, निष्पक्ष और साहित्यिक दृष्टि वाले संपादक माने जाते थे। कुछ समय तक उन्होंने विश्व प्रसिध्द ‘डॉयचे वेले’ में भी संपादक के रूप में काम किया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी महान और यादगार पहचान को दर्शाता है।
          वे ’वॉयस ऑफ अमेरिका’ के नई दिल्ली संवाददाता भी रहे। कुछ समय दैनिक जागरण और नई दुनिया जैसे अन्य समाचारपत्रों से भी जुड़े रहे और अपनी लेखनी की अमिट छाप छोड़ी। बाद के वर्षों में ’भारतीय ज्ञानपीठ’ की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ’नया ज्ञानोदय’ के संपादक के पद पर रहे, जहाँ उन्होंने साहित्य और अपनी सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय विचारधारा को अपनी कलम से और मजबूती प्रदान की। वे इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे विद्वानों के अनुवाद किये लेख बड़े रोचक ढंग से विस्तार से प्रकाशित करते थे, जो तत्कालीन पत्रिका की गुणवत्ता को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है। हिंदी पत्रकारिता में उन्हें उनके सहकर्मी संवाददाता और पाठक उनको मृदुभाषी, विनम्र, समर्पित और साहित्य-प्रेमी संपादक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने कई युवा पत्रकारों को इस क्षेत्र में भारी प्रतियोगिता और संघर्ष होने के बाद भी कठिन समय में प्रोत्साहित किया और उनके लिये सम्मान के साथ काम करने का माहौल बनाया।
          कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यिक गहराई और पेशेवर नैतिकता से न केवल समृद्ध किया बल्कि सफलता की उूंचाई तक पहंुचाया। वे एक ऐसे संपादक थे जो खबरों को सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और साहित्यिक मूल्यों के साथ समायोजित कर जनहित में पेश करते थे। उनकी कमी हिंदी मीडिया और साहित्य जगत में लंबे समय तक खलेगी। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ भी अपने समय में चर्चा मेें रहती थीं। हिंदी कथा-साहित्य में संवेदनशीलता, सूक्ष्म निरीक्षण, सामान्य जीवन की गहराई और मानवीय संबंधों की नाजुक परतों को उकेरने के साथ साथ जनवादी सोच के लिए भी जानी जाती हैं। वे प्रेमचंद की सामाजिक सुधारवादी प्रगतिशील परंपरा से जुड़े हुए रहे हैं, लेकिन आधुनिक संवेदना, शहरी-ग्रामीण संक्रमण और व्यक्तिगत अंतद्वंद्व को अधिक सूक्ष्म ढंग से धरातल से उठाकर प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा सरल, ज़मीन से जुड़ी हुयी, आम आदमी के सुखदुख की प्रतिनिधि मृदु और प्रभावशाली है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बिना अतिरंजना के जन भावनाओं को छू लेती है।

      उनके प्रमुख कहानी संग्रह ’करौंदे का पेड़’, ’साधारण जीवन’, ’बचपन’, ’थोड़ा सा उजाला’’ ने भी पाठकों को कायल कर लिया था। इनमें से कुछ चर्चित कहानियों और उनके संग्रहों का संक्षिप्त विश्लेषण निम्न है-’करौंदे का पेड़’’ शीर्षक कहानी और संग्रह है। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कहानी मानी जाती है। ’कथानक’ एक गरीब मध्यमवर्गीय परिवार में करौंदे का पुराना पेड़ भावनात्मक और स्मृति का प्रतीक बन जाता है। समय के साथ पेड़ सूखता है, लेकिन उसकी यादें और उससे जुड़े स्वाद (करौंदे की चटनी आदि) जीवन की कड़वाहट-मीठेपन को दर्शाते हैं। ’विश्लेषण’ नामक कहानी स्मृति, अभाव, परिवारिक बंधन और प्रकृति से मानवीय लगाव पर केंद्रित है। करौंदा कड़वा फल होने के बावजूद जीवन की आवश्यकता का प्रतीक है। जैसे जीवन में कड़वाहट के बिना मीठा नहीं मिलता। आलोचक इसे नारी-संवेदना और ग्रामीण-शहरी स्मृति के संयुक्त मेल के रूप में देखते पहचानते हैं। पहली कहानी संग्रह होने से इसने उन्हें विशिष्ट कथाकार के रूप में स्थापित किया।
          ’साधारण जीवन’ संग्रह और शीर्षक कहानियाँ ’थीम’’ रोजमर्रा का जीवन, छोटी-छोटी खुशियाँ, संघर्ष और उनकी सार्थकता पर आधारित है। प्रमुख विशेषता मधुसूदन आनंद को असाधारण बनाते हैं। उनकी कहानियाँ मध्यमवर्गीय मनोविज्ञान, रिश्तों की सूक्ष्म दरारें और जीवन की सादगी को उजागर करती हैं। कई कहानियाँ आत्मकथात्मक लगती हैं, जहाँ नजीबाबाद (उनका जन्मस्थान) जैसा कस्बा पृष्ठभूमि बनता है। यह संग्रह ’नॉस्टैल्जिया’ और वर्तमान के साथ टकराव को खूबसूरती से दिखाता है। ’थोड़ा सा उजाला’ भी उनकी सबसे प्रमुख कहानियाँँ में शामिल हैं, जो आलोचकों द्वारा श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ’थीम’ आशा की किरण, अंधेरे जीवन में छोटी रोशनी, आधुनिक जीवन की खोखलापन, लेकिन अंत में मानवीयता की जीत का संदेश देती है। जीवन में पूर्ण सुख नहीं, बस थोड़ी-सी उम्मीद काफी है। ये कहानियाँ शहरी अलगाव, उपभोक्तावाद और संबंधों की कमजोरी’’ को छूती हैं, लेकिन निराशावादी नहीं बल्कि संतुलित और आशावादी हैं। यह कहानी आधुनिक कार्य संस्कृति की खोखली चमक पर व्यंग्य भी करती है। ’शैली’ संयमित, बिना चीख-पुकार के भावुकता को प्रस्तुत करती है। संवाद जीवन के करीब, वर्णन चित्रात्मक लेकिन संक्षिप्त है। ’महत्व’ व ’’नई कहानी’’ आंदोलन के बाद की पीढ़ी में साहित्यिक पत्रकारिता के प्रतीक है। जहाँ कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। उनकी कहानियाँ भावुकता और यथार्थ के बीच संतुलन बनाती हैं, जो हिंदी कथा-साहित्य में बड़ा दुर्लभ है। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ पढ़ने से लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता उसके साधारण क्षणों में छिपी है। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे मानवीय संवेदना को कभी पुराना नहीं होने देतीं। मधुसूदन आनंद ने अपनी लेखनी से नजीबाबाद का भी नाम बुलंद किया। हम उनको विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित करते हैं। उनके लिये वसीम बरेलवी का एक शेर याद आ रहा है- जहां भी जायेगा रोशनी लुटायेगा, किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 19 February 2026

हिंदू मुसलमान नहीं...

*हिंदू मुसलमान नहीं भारतीयों की विविधता देखो!* 
O दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं।    
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम की मध्यप्रदेश यूनिट के सचिव तौक़ीर निज़ामी ने मुसलमानों के बारे में एक विवादित बयान दिया है। उनका दावा है कि सियासी मुसलमान तीन तरह का माना जाता है। उनका कहना है कि कांग्रेस में जूता चाटने यानी गुलामी करने वाला, भाजपा में जूते खाने वाला और एमआईएम में जूते मारने वाला मुसलमान मिलेगा। हालांकि बयान का विरोध बढ़ने पर निज़ामी ने सफ़ाई दी कि उनका मक़सद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि मुसलमानों को राजनीतिक गुलामी से बाहर निकालना था। इससे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत कह चुके हैं कि हिंदू चार तरह के होते हैं। पहला- जो कहते हैं गर्व से कहो हम हिंदू हैं। दूसरेेे कहते हैं गर्व की क्या बात है? तीसरे कहते हैं धीरे बोलो हिंदू हैं। चैथे वे जो भूल गये वो हिंदू हैं। दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं। वास्तविकता यह है कि जिस बीजेपी को संघ नियंत्रित करता है। उसको अपने आज के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक जीवन में भी केवल 37 प्रतिशत वोट ही मिलते हैं। यानी 63 प्रतिशत लोग उनको पसंद ही नहीं करते। साथ ही यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन 37 प्रतिशत में भी केवल 5 से 10 प्रतिशत हिंदू ऐसे होंगे जिनकी सोच संघ के मुस्लिम विरोध पूर्वाग्रह और घृणा से मिलती होगी।
        अन्यथा इनमें से भी बड़ी संख्या उन हिंदुओं की है जो कांग्रेस या अन्य सेकुलर दलों के विकल्प के तौर पर भाजपा को वोट देते हैं और बीजेपी की साम्प्रदायिक व नफरती नीतियों को किसी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी के साथ दस प्रतिशत का एक नया वर्ग लाभार्थी का भी जुड़ा है जिसको अपनी सुविधाओं योजनाओं और भले से मतलब है। अधिकांश सवर्ण जातियां अपने सामाजिक वर्चस्व आर्थिक लाभ और राजनीतिक श्रेष्ठता बनाये रखने के लिये बीजेपी के साथ हैं उनका धर्म साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध से कोई खास लेना देना नहीं है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है उनमें भी अधिकांश सेकुलर दलों के साथ रहे हैं और आज भी हैं। इनका पूरा भरोसा आज भी संविधान में है। उनका मानना है कि हिंदू मुसलमान मिलकर ही देश का भला कर सकते हैं। बेशक मुसलमानों में भी हिंदुओं की तरह एक छोटा वर्ग साम्प्रदायिक सोच का है जो अधिकांश उच्च जातियों का है। इनमें से ही अधिकांश अब बीजेपी की बी टीम एमआईएम के साथ जुड़ते जा रहे हैं। लेकिन इनको यह पता नहीं है ये जितने औवेसी के साथ जुड़ते जायेंगे उतने ही सेकुलर हिंदू सेकुलर दलों को छोड़कर बीजेपी के साथ जुड़ते जायेंगे। मुसलमानों का एक तीसरा नादान नासमझ जाहिल या कम पढ़ा लिखा गरीब कमज़ोर पिछड़ी सोच का और मासूम तबका भी है जो फिरकापरस्त तंगनज़र और कट्टरतावादी सोच से ग्रस्त होकर चालाक मक्कार और शातिर अलगाववादी सोच के मुस्लिम नेताओं के झांसे में आकर बहक जाता है और उनको वोट व सपोर्ट देकर अपना ही नुकसान करता है। हमारा तो मानना है कि हिंदू हो या मुसलमान आज नहीं तो कल यह बात समझेगा और एक साथ एक मंच पर आयेगा और ऐसे नेताओं पार्टियों या संगठनों को सपोर्ट करेगा जो उसको धर्म के आधार पर नहीं भारतीय के आधार पर एक नागरिक के आधार पर और एक इंसान के तौर पर देखेंगे मानेंगे और उसकी भलाई के लिये सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के आधार पर बिना किसी पक्षपात भेदभाव और धर्म जाति के अंतर को देखे सबके कल्याण का काम करेंगे। शायर कहता है- रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर एवं पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 16 February 2026

ए आई का डर

*ए आई यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस से क्यों डरी आई टी कंपनियां ?* 
0 यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं।          
     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      एक कंपनी के टैक्निकल मैनेजर की उसके एक जानकार से हुयी बातचीत आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यह बातचीत नये कोडिंग वाले ए आई और एसएएस माॅडल के नाकाम होने को लेकर भारतीय आई टी कंपनियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे ख़तरे को लेकर चर्चा का विषय बनी हुयी है। मैनेजर का कहना है कि हमारे देश का आई टी सैक्टर पिछले कई दशक से जिस एसएएएस माॅडल पर काम कर रहा था वह अब बेकार होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि ए आई का नया परिष्कृत रूप अब तरह तरह के कुछ प्रश्नों का उत्तर देने वाला मात्र चैटबाॅट नहीं रह गया है बल्कि वह विशेषज्ञ मानव की तरह ए आई कामगार बन चुका है। मिसाल के तौर पर मैनेजर अपनी अन्य हल्की और आम बातों के साथ जो सबसे गंभीर और आई टी उद्योग की सबसे बड़ी ख़तरे की घंटी की आहट सुनकर बता रहा है वह यह है कि अब ए आई कानूनी मसौदा बहीखाता प्रूफ रीडिंग इंट्रो हैडिंग काॅलम चैकिंग टैस्टिंग और कोडिंग तक का काम मिनटों नहीं सेकंडों में करके दे रहा है। वह किसी भी विषय पर लेख निबंध और रिपोर्ताज तक पलक झपकते ही उपलब्ध करा रहा है। यही वजह है कि इस कंपनी के मैनेजर ने पिछले दिनों 30 साल से काम कर रहे एक अधेड़ वरिष्ठ तकनीकी प्रोग्रामर अधिकारी को इसलिये हटा दिया क्योंकि जो काम वह एक सप्ताह में करता था उसी काम को प्रबंधक ने इंग्लिश में डायरेक्शन देकर ए आई से दस मिनट में उससे भी बेहतर क्वालिटी में करा लिया। मैनेजर का कहना था कि मानव कर्मचारी के साथ बैठक चर्चा अपडेट और दिशा निर्देश देने और फिर उसको क्राॅस चैक करने में समय और पैसा दोनों ही अधिक लगता है।
       वायरल चैट में इस मैनेजर ने सबसे डरावनी बात जो कही वह यह थी कि अगर उनका इतना पुराना अनुभवी और एक्सपर्ट आई टी कर्मचारी अब कंपनी के लिये निशुल्क भी सेवायें देता तो कंपनी स्वीकार नहीं करती क्यांेकि वह जितना समय इस काम में लगायेगा दूसरी उनकी प्रतियोगी कंपनियां ए आई से सेकंडों में काम लेकर उनकी कंपनी को मार्केट में पीछे छोड़ देंगी। यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। इस गिरावट के दौर के आगे भी चलने का खतरा आई टी सैक्टर पर मंडरा रहा है। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं। हालांकि जब शुरू शुरू में कंप्यूटर आये थे तब भी नौकरियों को लेकर ऐसा ही खतरा माना जा रहा था लेकिन कुछ जाॅब कंप्यूटर से घटे तो नये जाॅब भी भारी संख्या में पैदा हुए लेकिन ए आई को लेकर कुछ अधिक ही पैनिक है। शायर ने कहा है- *यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता, मुझे गिरा के तुम संभल सको तो चलो।।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 13 February 2026

अधिक बच्चे

*अधिक बच्चो की सलाह देने वाले वे कौन हैं?* 
0 जबकि सच यह है कि न तो एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है और न ही बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज के वास्तविक मुद्दों की चिंता है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं।        
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम के होते हुए मुसलमानों को दुश्मनों की ज़रूरत नहीं है। उसको वैसे ही बीजेपी की बी टीम नहीं कहा जाता है। बल्कि उसकी सियासत उसकी हरकतें और उसके नेताओं के विवादित बयान खुद यह दिखाते हैं कि उनको मुसलमानों की सियासत तो करनी है लेकिन उनके हितों की कोई चिंता नहीं है। हाल ही में एमआईएम के यूपी के अध्यक्ष शौकत अली ने मुरादाबाद में एक जनसभा में कहा कि मुसलमानों को हम दो हमारे दो दर्जन पर अमल करते हुए तेज़ी से जनसंख्या बढ़ानी चाहिये। उनका यह भी दावा कि उनके 8 और उनके बड़े भाई के 16 बच्चे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम आबादी बढ़ने से मुस्लिम समाज और देश मज़बूत होगा। उनका मानना है कि मुसलमानों की आबादी कम होने की वजह से ही मदरसों को आतंक का अड्डा उनकी लिंचिंग दाढ़ी नोचा जाना लड़कियों के नकाब खींचा जाना और किसी भी मांस को गौमांस बताकर उनको आज सताया जा रहा है। इससे पहले आरएसएस के मुखिया भागवत सहित कई हिंदू नेता साक्षी महाराज नवनीत राणा हिमंत विस्व सरमा भी हिंदुओं से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं। वे यहां तक कहते हैं कि अगर हिंदुओं ने अभी भी परिवार नियोजन जारी रखा तो वे जल्दी ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।
     उनका कहना है कि हिंदू समुदाय की घटती जन्मदर से जनसांखिकीय असंतुलन सांस्कृतिक पहचान और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। उनका यह भी दावा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर बढ़ती घुसपैठ और धर्म परिवर्तन से पहले ही हिंदू समाज के लिये चिंता बढ़ गयी है। सच तो यह है कि बच्चे कितने पैदा करने हैं यह परिवारों का निजी मामला है। लेकिन वे यही सवाल मोदी सरकार से नहीं पूछते। दरअसल उनकी असली चिंता हिंदू वोट बैंक की राजनीति है। ऐसे ही एमआईएम नेता सहित कई सिरफिरे मुस्लिम कट्टरपंथी नेताओं की चिंता भी मुस्लिम वोटबैंक को लेकर ही अधिक है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। जबकि सच यह है कि न तो बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज की चिंता है और न ही एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है।
       इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं। नेशनल फेमिली हैल्थ सर्वे-5 के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की जनसंख्या दर तेजी से गिरकर रिप्लेसमेंट रेट यानी 2.1 से भी नीचे आ चुकी है। 2020-25 का यह सर्वे यह भी बताता है कि हिंदुओं की टीएफआर 1.94 तो मुसलमानों की 2.14 रह गयी है। पहले इसमें बहुत अधिक अंतर था लेकिन अब इस दर में सबसे अधिक गिरावट मुसलमानों की आबादी में ही देखी जा रही है। हालांकि हिंदुओं की तुलना में यह अभी भी मामूली सी अधिक है। सर्वे में यह बात भी साफ हो चुकी है कि जनसंख्या बढ़ने का रिश्ता धर्म से नहीं बल्कि सम्पन्नता और शिक्षा से है। जो लोग संगठन व पार्टी मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार और उनको तरह से तरह से अनपढ़ व गरीब बनाये रखने में लगे रहते हैं उनको इस मुद्दे पर चिंता जताने का नैतिक अधिकार नहीं है। ऐसे लोगों के लिये शायर कहता है- सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप, आपका मैयार देखा कितने मैयारी हैं आप।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 9 February 2026

नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

*नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का एक ‘‘दीपक’’* 
0 इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है।
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      उत्तराखंड के कोटद्वार में 70 साल के एक बुजुर्ग वकील अहमद की कपड़े की दुकान का नाम बाबा स्कूल ड्रेस एंड यूनिफाॅर्म है। यह दुकान लगभग चार दशक से इसी नाम पर चल रही है। बताया जाता है कि इसका शाॅप एक्ट इनकम टैक्स और जीएसटी एक्ट आदि कई कानूनों में इसी नाम से बहुत समय पहले से रजिस्ट्रेशन चला आ रहा है। आज तक शासन प्रशासन या पुलिस को इस नाम से दुकान चलाने की कोई शिकायत किसी से नहीं मिली। कोई और आरोप अपराध या कर चोरी का मामला भी इस दुकान स्वामी के नाम पर दर्ज नहीं है। लेकिन कुछ दिन पहले कुछ नफरती चिंटू बाबा शाॅप पर बिना बुलाये मेहमान के तौर पर जा धमके। उन्होंने वरिष्ठ नागरिक वकील अहमद को धमकाया कि अपनी दुकान के नाम से बाबा शब्द हटायंे। वकील अहमद ने वजह पूछी तो दर्जन भर उत्पाती युवक अभद्रता और अपमान पर उतर आये। यह सब होता देख उधर से जा रहे एक ज़िम्मेदार नागरिक आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले और कानून का सम्मान करने वाले जिम संचालक दीपक कश्यप उर्फ मुहम्मद दीपक ने हिम्मत दिखाते हुए मामले में हस्तक्षेप करते हुए बुजुर्ग का बचाव किया।
         दीपक ने यह जानते हुए भी कि जिनसे वह भिड़ने जा रहा है वे कोई साधारण लोग नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के समर्थक शासन प्रशासन व पुलिस की शह पर उत्पात करने वाले लंपट हैं, यह कहते हुए बुजुर्ग का बचाव किया कि यह देश संविधान कानून और आपसी प्यार मुहब्बत से चलता है। दुकान के नाम से बाबा शब्द नहीं हटेगा। न ही दुकान के मालिक को दुकान या घर छोड़कर राज्य व कस्बे से जाने दिया जायेगा। इस पर उत्पाती युवक दीपक से भिड़ गये लेकिन वे उस समय उसका बहुत कुछ नहीं बिगाड़ पाये। बाद में उन उग्र युवकों के खिलाफ मजबूरी में मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के कारण पुलिस को केस दर्ज करना पड़ा, लेकिन साथ साथ मेल मिलाप और भाईचारा बनाये रखने की कोशिश करने वाले दीपक को भी केस में लपेट लिया गया। इसके बाद जब यह घटना चर्चा का विषय बन गयी तो पुलिस प्रशासन ने कोटद्वार में बाहर से बड़ी तादाद में आकर घटना को कवर करने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट यू ट्यूबर्स और बड़े मीडिया हाउसों को प्रवेश से रोक दिया। लकिन तब तक दीपक सोशल मीडिया पर हीरो बन चुका था।
       इस घटना के बाद आज दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है। वह चाहता है कि बढ़ते अपराध महंगाई और बेरोज़गारी जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये। दीपक जैसे लोगों के लिये शायर ने क्या खूब कहा है- *दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग़ कई आंधियों पे भारी है।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 6 February 2026

भारत अमेरिका ट्रेड डील

*अमेरिका भारत ट्रेड डील से किसको क्या फ़ायदा?*
0 ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे।
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      यह खुशी की बात है कि अमेरिका भारत के बीच लंबे समय से पेंडिंग व्यापार समझौता हो गया है। यह भी सही है कि इससे भारत के निर्यातकों को लाभ होगा। यह भी माना जा सकता है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश से हमारे रिश्ते अब बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह सौ टके का है कि यह ट्रेड डील किन शर्तों पर हुयी है? हालांकि हमारी सरकार ने न तो पहले यह साफ किया और न ही अब तक विस्तार से यह बताया कि इस व्यापार समझौते की शर्तें क्या हैं? खुद अमेरिकी राष्ट्रपति टंªप ने ही आधी रात को इस डील की जानकारी सार्वजनिक की थी और दावा किया था कि डील के तहत अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगायेगा जो कि पहले 25 प्रतिशत था और रूस से तेल खरीदते रहने पर यह 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। 
          जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे। अपने स्वदेशी कृषि उत्पादों को पहले की तरह भारत अधिक टैरिफ लगाकर प्रतियोगिता से सुरक्षा प्रदान नहीं कर पायेगा। साथ ही ट्रंप यह भी दावा करते हैं कि भारत ने उनको आश्वासन दिया है कि वह रूस से सस्ता तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिका व वेनेजुएला से मार्केट रेट पर क्रूड आॅयल खरीदेगा। यह बात इसलिये भी सच लगती है कि अमेरिका ने जो 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भारत पर रूस से तेल खरीदने पर लगाया था वह अब हटा लिया गया है। 
       अमेरिका इस डील के बारे में रोज़ सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर रहा है, प्रैस वार्ता कर रहाी है और इस डील को अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश में सरकार ने अव्वल तो इस बारे में अमेरिका के ऐलान के साथ साथ उसी रात कुछ बताने की ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन जब विपक्ष और डील के भारतीय जानकारों ने इस डील को किसान विरोधी और भारत के नागरिकों के हितों के खिलाफ होने के दावा किया तो गोदी मीडिया के चैनलों पर सूत्रों के हवाले से इसे बहुत अच्छी डील हवा में बताया जाना लगा। बाद में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने डील की बिना डिटेल शर्तों और प्रमाण के यह दावा ठोक दिया कि इस डील में सब कुछ अच्छा है लेकिन समय बतायेगा कि यह डील कितनी किसके पक्ष में एकतरफा और साथ ही अपमानजनक तरीके से अंजाम तक पहंुची है।
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*