Monday, 9 February 2026

नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

*नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का एक ‘‘दीपक’’* 
0 इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है।
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      उत्तराखंड के कोटद्वार में 70 साल के एक बुजुर्ग वकील अहमद की कपड़े की दुकान का नाम बाबा स्कूल ड्रेस एंड यूनिफाॅर्म है। यह दुकान लगभग चार दशक से इसी नाम पर चल रही है। बताया जाता है कि इसका शाॅप एक्ट इनकम टैक्स और जीएसटी एक्ट आदि कई कानूनों में इसी नाम से बहुत समय पहले से रजिस्ट्रेशन चला आ रहा है। आज तक शासन प्रशासन या पुलिस को इस नाम से दुकान चलाने की कोई शिकायत किसी से नहीं मिली। कोई और आरोप अपराध या कर चोरी का मामला भी इस दुकान स्वामी के नाम पर दर्ज नहीं है। लेकिन कुछ दिन पहले कुछ नफरती चिंटू बाबा शाॅप पर बिना बुलाये मेहमान के तौर पर जा धमके। उन्होंने वरिष्ठ नागरिक वकील अहमद को धमकाया कि अपनी दुकान के नाम से बाबा शब्द हटायंे। वकील अहमद ने वजह पूछी तो दर्जन भर उत्पाती युवक अभद्रता और अपमान पर उतर आये। यह सब होता देख उधर से जा रहे एक ज़िम्मेदार नागरिक आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले और कानून का सम्मान करने वाले जिम संचालक दीपक कश्यप उर्फ मुहम्मद दीपक ने हिम्मत दिखाते हुए मामले में हस्तक्षेप करते हुए बुजुर्ग का बचाव किया।
         दीपक ने यह जानते हुए भी कि जिनसे वह भिड़ने जा रहा है वे कोई साधारण लोग नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के समर्थक शासन प्रशासन व पुलिस की शह पर उत्पात करने वाले लंपट हैं, यह कहते हुए बुजुर्ग का बचाव किया कि यह देश संविधान कानून और आपसी प्यार मुहब्बत से चलता है। दुकान के नाम से बाबा शब्द नहीं हटेगा। न ही दुकान के मालिक को दुकान या घर छोड़कर राज्य व कस्बे से जाने दिया जायेगा। इस पर उत्पाती युवक दीपक से भिड़ गये लेकिन वे उस समय उसका बहुत कुछ नहीं बिगाड़ पाये। बाद में उन उग्र युवकों के खिलाफ मजबूरी में मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के कारण पुलिस को केस दर्ज करना पड़ा, लेकिन साथ साथ मेल मिलाप और भाईचारा बनाये रखने की कोशिश करने वाले दीपक को भी केस में लपेट लिया गया। इसके बाद जब यह घटना चर्चा का विषय बन गयी तो पुलिस प्रशासन ने कोटद्वार में बाहर से बड़ी तादाद में आकर घटना को कवर करने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट यू ट्यूबर्स और बड़े मीडिया हाउसों को प्रवेश से रोक दिया। लकिन तब तक दीपक सोशल मीडिया पर हीरो बन चुका था।
       इस घटना के बाद आज दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है। वह चाहता है कि बढ़ते अपराध महंगाई और बेरोज़गारी जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये। दीपक जैसे लोगों के लिये शायर ने क्या खूब कहा है- *दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग़ कई आंधियों पे भारी है।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 6 February 2026

भारत अमेरिका ट्रेड डील

*अमेरिका भारत ट्रेड डील से किसको क्या फ़ायदा?*
0 ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे।
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      यह खुशी की बात है कि अमेरिका भारत के बीच लंबे समय से पेंडिंग व्यापार समझौता हो गया है। यह भी सही है कि इससे भारत के निर्यातकों को लाभ होगा। यह भी माना जा सकता है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश से हमारे रिश्ते अब बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह सौ टके का है कि यह ट्रेड डील किन शर्तों पर हुयी है? हालांकि हमारी सरकार ने न तो पहले यह साफ किया और न ही अब तक विस्तार से यह बताया कि इस व्यापार समझौते की शर्तें क्या हैं? खुद अमेरिकी राष्ट्रपति टंªप ने ही आधी रात को इस डील की जानकारी सार्वजनिक की थी और दावा किया था कि डील के तहत अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगायेगा जो कि पहले 25 प्रतिशत था और रूस से तेल खरीदते रहने पर यह 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। 
          जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे। अपने स्वदेशी कृषि उत्पादों को पहले की तरह भारत अधिक टैरिफ लगाकर प्रतियोगिता से सुरक्षा प्रदान नहीं कर पायेगा। साथ ही ट्रंप यह भी दावा करते हैं कि भारत ने उनको आश्वासन दिया है कि वह रूस से सस्ता तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिका व वेनेजुएला से मार्केट रेट पर क्रूड आॅयल खरीदेगा। यह बात इसलिये भी सच लगती है कि अमेरिका ने जो 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भारत पर रूस से तेल खरीदने पर लगाया था वह अब हटा लिया गया है। 
       अमेरिका इस डील के बारे में रोज़ सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर रहा है, प्रैस वार्ता कर रहाी है और इस डील को अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश में सरकार ने अव्वल तो इस बारे में अमेरिका के ऐलान के साथ साथ उसी रात कुछ बताने की ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन जब विपक्ष और डील के भारतीय जानकारों ने इस डील को किसान विरोधी और भारत के नागरिकों के हितों के खिलाफ होने के दावा किया तो गोदी मीडिया के चैनलों पर सूत्रों के हवाले से इसे बहुत अच्छी डील हवा में बताया जाना लगा। बाद में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने डील की बिना डिटेल शर्तों और प्रमाण के यह दावा ठोक दिया कि इस डील में सब कुछ अच्छा है लेकिन समय बतायेगा कि यह डील कितनी किसके पक्ष में एकतरफा और साथ ही अपमानजनक तरीके से अंजाम तक पहंुची है।
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मोदी सरकार सही है

नया यूजीसी अधिनियम मोदी सरकार का सराहनीय क़दम!

        -इक़बाल हिंदुस्तानी

0 कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है।

      यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने नये अधिनियम में दलित आदिवासी महिलाओं के साथ ही पिछड़े वर्ग के साथ आयेदिन होने वाले पक्षपात और भेदभाव को परिभाषित कर अन्याय से संरक्षण प्रदान किया है। इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति धर्म लिंग जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जायेगा। प्रत्येक संस्थान में एक इक्वल आॅपोर्चिनिटी सेंटर बनाया जायेगा। जो भेदभाव की शिकायतों को सुनेगा और प्रभावित लोगों की सहायता करेगा। एक शिकायत निवारण तंत्र बनाया गया है जो 24 घंटे सातों दिन काम करेगा और हेल्पलाइन व आॅनलाइन पोर्टल पर आने वाली शिकायतों का समय सीमा के अंतर्गत अनिवार्य कार्यवाही कर समाधान करेगा। अगर इन नियमों का कोई संस्थान समय पर सही से पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करते हुए उसका अनुदान रोकने के साथ ही उसकी मान्यता भी समाप्त की जा सकती है। हर हायर एजुकेशन सेंटर में एक समता समिति बनेगी जिसमें एससी एसटी ओबीसी महिलाओं और दिव्यांगों को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। जिन वर्गों के साथ पक्षपात भेदभाव और अन्याय रोका जाना है, उसके लिये शिक्षकों के आचरण की एक आचारण संहिता बनाई जायेगी। साथ ही प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाया जायेगा जिससे आयेदिन वंचित वर्गों के साथ होने वाले पक्षपात और अन्याय को रोकने की पुख्ता व्यवस्था को सुनिश्चित किया जायेगा।

      कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है। हमारा समाज और सरकारी सिस्टम ऐसा है कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल होता आ रहा है। मिसाल के तौर पर भीड़ हिंसा हमारे देश में आम हो गयी है। अकसर बेकसूर लोेगों की माॅब लिंचिंग हो जाती है। किसी को भी अंजान इलाके में डायन गोहत्यारा और बच्चा चोर बताकर पीट पीट कर मार दिया जाता है। लेकिन ऐसे मामले में या तो अकसर रिपोर्ट दर्ज नहीं होती, होती हैं तो हल्की धाराओं में होती हैं या फिर उल्टा मरने वाले के खिलाफ ही फर्जी आरोपों में रपट लिख दी जाती है। जो लोग इस अधिनियम के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं उनको यह भी समझना चाहिये कि अगर वे पक्षपात, उत्पीड़न और अन्याय नहीं करते या आरक्षित वर्ग के हिस्से पर काबिज़ नहीं हैं तो डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरी कड़वी सच्चाई यह है कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है। जिन वर्गों को यूजीसी के नये अधिनियम का लाभ मिलेगा वह सत्ताधारी भाजपा का नया वोटबैंक है। उसकी संख्या आबादी में 85 प्रतिशत से अधिक है तो सरकार उनके मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत सवर्णों की जायज बात भी क्यों सुनेगी? एक शायर ने कहा है-

इस दौर के फरियादी जाएं तो कहां जायें,

सरकार भी तुम्हारी है दरबार भी तुम्हारा है।

हादसा या हत्या?

इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हादसा नहीं ‘अपराधिक हत्या’?
             -इक़बाल हिंदुस्तानी
       अगर हमारा शासन प्रशासन पुलिस और कई अन्य आपात सेवा एजंसियां मिलकर एक नौजवान इंजीनियर को अचानक हादसा होने पर पानी में डूबने से नहीं बचा सकती तो हमारे विश्वगुरू होने और दुनिया की तीसरी चैथी अर्थव्यवस्था होने का क्या मतलब रह जाता है? कुछ दिन पहले ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में 27 साल के इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मौत कई सवाल खड़े करती है। दरअसल युवराज की कार गहरे कोहरे में अचानक भटककर सड़क किनारे निर्माणाधीन एक मकान में खोदे गये बेसमेंट के एक गड्ढे में समा गयी। जिस जगह यह हादसा हुआ वहां एक तीखा मोड़ था। जिससे युवराज घने कोहरे की वजह से उसे देखकर कार मोड़ नहीं पाया। यह हमारे नये बसे नगरों में सड़कों के बुरे डिज़ाइन और मकान दुकान पास हुए नक्शे के हिसाब से न बनाकर गैर कानूनी व नियम तोड़कर बनाये जाने वाले आयेदिन के रिश्वत से होने वाले गलत कामों का भी अंजाम कहा जा सकता है। युवराज ने पानी के गहरे गड्ढे में गिरने के बाद भी अपनी जान बचाने को हिम्मत नहीं हारी और अपना मोबाइल निकाल कर अपने परिवार को सूचना दी। जिस पर उसके पिता ने नोएडा के सरकारी अमले को तत्काल खबर दी। हैरत और दुख की बात यह रही कि पुलिस फायर ब्रिगेड और स्टेट डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स मौके परा समय पर पहुंच गयी लेकिन 90 मिनट तक पानी में जान बचाने को हाथ पांव मार रहे युवराज को बचाने में सब नाकाम रहे। हालांकि बाद में नेशनल डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स के जवान भी घटना स्थल पर पहुंचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि युवराज समय पर सहायता न मिलने से अपनी जान गंवा चुका था। यह ठीक है कि ऐसी मौतें हमारे देश में होना आम बात है। इस मौत पर कोई हंगामा नहीं मचा क्योंकि यह किसी धर्म या जाति की नाक का सवाल नहीं था। यह भी गारंटी नहीं कि ऐसे हादसे आगे नहीं होंगे। सही मायने में देखा जाये तो युवराज की मौत हमारे नाकाम नाकारा और करप्ट सिस्टम की मौत का ऐलान है। हमारी जनता सरकार चुनने या बदलने के दौरान शायद ही ऐसी मौतों से प्रभावित होकर वोट देती हो। कहने को हम 2030 में विश्व की तीसरी बड़ी इकाॅनोमी बनने का दावा करते हैं, लेकिन अगर हम अपने एक युवा इंजीनियर को पानी के एक गड्ढे में गिरने पर उसकी घंटों मौत और ज़िंदगी से लड़ने पर जान नहीं बचा सकते और हमारा सरकारी अमला खड़ा खड़ा तमाशा देखता रहता है तो विश्वगुरू बनने का दावा करना क्या मज़ाक नहीं है? हमारे देश में हर साल साढ़े 9 लाख लोग हादसों में मरते हैं। यह दुनिया के देशों में हादसों में मरने वाले लोगों का दूसरे नंबर का आंकड़ा है। ऐसा नहीं है कि दूसरे देशों में लोग हादसों का शिकार नहीं होते लेकिन हमारे देश में जितनी बड़ी संख्या और जिस प्रशासनिक लापरवाही सरकारी नाकामी और अधिकारियों की रिश्वतखोरी व असंवेदनशीलता व जवाबदेही न होने से लोग बेमौत और असमय मर रहे हैं, वह चिंता और लज्जा की बात है।

बड़ी आबादी का सच

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी अभिषाप या उपहार?

           -इक़बाल हिंदुस्तानी

     भारत इस समय विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बना हुआ है। हिंदूवादी नेता आयेदिन जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग करते रहते हैं। विहिप के पूर्व मुखिया प्रवीण तोगड़िया ने हाल ही में यह मांग दोहराई है। दरअसल उनको इस तरह की मांग से अल्पसंख्यक मुसलमानों को टारगेट कर अपना हिंदू वोट बैंक मज़बूत बनाने का राजनीतिक मकसद पूरा करना अधिक होता है। उनको यह पता नहीं है कि जब चीन दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था तो उसने एक बच्चे का कानून बनाया था। इसके बाद जब इस नीति से चीन को नुकसान हुआ तो उसने 2016 में यह कानून खत्म कर दिया। फिर चीन ने तीन साल तक के बच्चो के पालने के लिये सालाना 42000 सरकारी मदद देनी शुरू की। कई राज्यों ने वहां दूसरा व तीसरा बच्चा पैदा होने पर एकमुश्त बड़ी रकम देनी शुरू की। यहां तक कि बच्चो की पढ़ाई और परवरिश पर खर्च में बड़ी आयकर छूट भी दी। लेकिन आबादी एक बार घटने लगी तो फिर किसी भी तरह बढ़ी नहीं। अब सारे उपाय नाकाम होने पर चीन ने गर्भनिरोधक पर भारी कर लगाया है जिससे लोग अधिक बच्चे पैदा करें लेकिन जनता का कहना है कि बच्चो को पालना गर्भनिरोधक पर अधिक टैक्स देने से महंगा है। भारत में टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 यानी आबादी स्थिर रहने पर आ गयी है। अगर यह इससे भी कम हुयी तो हमारी हालत भी चीन जैसी हो जायेगी।

बंगाल में घुसपैठ?

*ब्ंागाल में घुसपैठ रोकने को सुरक्षा ग्रिड बनायेगी केंद्र सरकार...* 

       गृहमंत्री अमित शाह ने आरोप लगाय है कि अपना वोटबैंक बढ़ाने के लिये पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी बंग्लादेश से घुसपैठ करने वालों को बढ़ावा दे रही हैं। उनका यह भी कहना है कि केंद्र सरकार ऐसा किसी कीमत पर नहीं होने देगी। शाह का दावा है कि घुसपैठ की समस्या को जड़ से खत्म करने को उनकी सरकार सुरक्षा ग्रिड बनायेगी। सवाल यह है कि राजनीतिक लाभ के लिये अगर राजनेता एक दूसरे पर इतने गंभीर आरोप लगा सकते हैं तो फिर घुसपैठ की समस्या का वास्तविक समाधान कैसे और कौर करेगा? सबको पता है कि सीमा सुरक्षा का काम सीमा सुरक्षा बल करता है। इस बल की कमान केंद्र सरकार के हाथ में है। क्या यह संभव है कि किसी राज्य की सरकार केंद्र सरकार से छिपाकर अपने राज्य में राजनीतिक लाभ के लिये अवैध लोगों की घुसपैठ कराये और केंद्र सरकार को भनक तक ना लगे। या केंद्र सरकार को इस बात का पता भी हो जैसा कि अमित शाह दावा कर रहे हैं फिर भी वे राज्य सरकार के सामने घुटने टेक दें? दूसरा सवाल यह है कि अगर केंद्र सरकार को पता है कि बंगाल में घुसपैठ हो रही है तो उन्होंने अपने जांच कराकर कितने बंग्लादेशियों को उनके देश वापस भेजा? उनको ऐसा करने से कौन रोक रहा है? जो सुरक्षा ग्रिड शाह अब बनाने की बात कह रहे हैं उस ग्रिड हो अब तक क्यों नहींे बनाया गया? सीमा पर घुसपैठ रोकने की ज़िम्मेदारी आखिर केंद्र सरकार की है तो उनको किससे अनुमति लेनी है? कहीं ऐसा तो नहीं जिस राज्य में भी चुनाव आता है वहां भाजपा मोदी सरकार केंचुआ के साथ मिलकर एक योजना के तहत पहले घुसपैठ का आरोप लगाती हैै और फिर विपक्ष के समर्थक माने जाने वाले वोटों में से एक हिस्से को इस बहाने बड़ी तादाद में काटकर चुनाव जीत लेती है। उसके बाद घुसपैठ के सारे आरोप सारे दावे और सारे वादे भुलाकर अगल राज्य के चुनाव में लग जाते हैं। बिहार में भी यह प्रयोग सफल रहा है। एक शायर ने कहा है-
0 लोगों के सर ऐब को मढ़ना सीख गये,
हम भी बेबात झगड़ना सीख गये।
उड़ना कब सीखेंगे चिड़िया के बच्चे,
सांप के बच्चे पेड़ पर चढ़ना सीख गये।।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।

प्रेम विवाह के खिलाफ सरकार?

*लव मैरिज रोकने के लिये विवाह पंजीकरण कठिन...* 

      यूपी सहित कई राज्यों में धार्मिक रीति रिवाज से शादी होने के बाद सरकारी कार्यों के विवाह का पंजीकरण काफी समय पहले अनिवार्य किया जा चुका है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन अब यूपी सरकार ने चुपचाप मैरिज एक्ट के तहत होने वाले रजिस्ट्रेशन के नियम बदल दिये हैं। इसमें यह ज़रूरी कर दिया गया है कि जो भी जोड़ा अपनी शादी का सरकारी पंजीकरण करायेगा वह अपने परिवार के सदस्यों को गवाह के तौर पर अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रार के सामने पेश करेगा। वैसे तो अधिकांश मामलों में परिवार के लोग गवाही दे ही देते हैं। लेकिन जिन मामलों में युवक युवती ने प्रेम विवाह किया होता है। उनमें उनके परिवार के लोग कई बार जाति या धर्म अलग अलग होने की वजह से विरोध करते हैं। ऐसे में जब कोई अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करेगा तो वे उसका पंजीकरण कराने में साथ कैसे दे सकते हैं? सवाल यह है कि जब संविधान बालिग लड़के लड़की को अपनी पंसद की शादी करने की इजाज़त देता है तो सरकार कैसे संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन कर ऐसे नियम या कानून बना सकती है जिससे युवा पीढ़ी अपने परिवार के नहीं चाहने पर अपनी पसंद के लड़के लड़की से विवाह ही नहीं कर सके। यही शाॅर्ट कट सरकारें धर्म परिवर्तन के मामलों में भी अपना रही हैं। ऐसा लगता है कि सरकारें अपना राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर भी नियम कानून बनाने पर तुली हैं।