Saturday, 1 August 2026

ए सी कोच में चोरी

*ए सी कोच में सफ़र करने वाले भी चोरी करते हैं?*
                  *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
               एक अंग्रेज़ी दैनिक की ख़बर के मुताबिक रेलवे के ए सी कोच में सफ़र करने वाले यात्रियों ने पिछले चार साल में 104.51 करोड़ के सामान की चोरी की है। इनमें जनवरी 22 से मई 26 के बीच 1.27 करोड़ बेड रोल, 46.54 लाख फेस टॉवल, 41.13 लाख बेडशीट 12.95 लाख कम्बल व 2.76 लाख तकिए शामिल हैं। हालांकि चोरी की यह रकम रेलवे के अटेंडेंट की सैलरी से हर माह कट जाती है, जिससे रेलवे को कोई नुकसान नहीं हुआ है। हो सकता है इस चोरी में कुछ बाहरी लोग भी शामिल हों लेकिन सवाल यह है कि रेलवे के ए सी कोच में अमीर और मीडियम क्लास लोग ही अधिक यात्रा करते हैं। वे भी चोरी करते हैं?
        आमतौर पर हमारा समाज गरीबों को चोर समझता है। इसकी वजह उनकी आय कम होने से ज़रूरी खर्च पूरे नहीं होना माना जाता है। कुछ लोग उनको नाकारा बताकर भी शॉर्ट कट से पैसा बनाने के आरोप में चोर बता देते हैं। जबकि ग़रीब, अमीर और मीडियम क्लास को पेट भरा होने के बावजूद चोरी करने वाला बताता है। उसका कहना है कि ये वर्ग टैक्स चुराकर ही अमीर बनता है। वे इस वर्ग पर बैंकों का पैसा मारकर दिवालिया बनने से सरकार यानी जनता का धन चुराने का आरोप लगाते हैं। *जबकि सच यह है कि सभी वर्गों में आपको अच्छे बुरे लोग मिल जाएंगे। इसे यह भी कह सकते हैं कि ईमानदार केवल वो है जिसे चोरी का मौक़ा नहीं मिलता है। लेकिन यह भी आधा सच है क्योंकि आपको ऐसे लोग भी सभी क्लास में मिल जायेंगे जो मौक़ा मिलने पर भी कभी चोरी नहीं करते।* 
       इतना ही नहीं आपको कम ही सही आज के कलयुग में भी ऐसे चुनिंदा लोग मिल जाएंगे जिनकी नीयत दूसरे के लाखों करोड़ों रूपये देखकर भी नहीं बिगड़ती। वे किसी का खोया पर्स ज्वैलरी और नोटों का बैग मिलने पर उसे तलाश करके वापस कर देते हैं। जहां तक रेलवे से बिस्तर चादर तकिये और तौलिया चोरी होने का सवाल है, करोड़ो लोग हर साल ए सी ट्रेन में सफ़र करते हैं लेकिन उनमें से 98 से 99% लोग कोई चोरी नहीं करते। लेकिन जो एक दो प्रतिशत चोरी करते हैं, उससे कहा जा सकता है। एक मछली ही तालाब को गंदा करने को काफ़ी है। रेलवे को चाहिए ये सामान देने से पहले लोगों से सिक्योरिटी जमा कराए। लोग खुद सामान वापस देने के लिए उतावले रहा करेंगे। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि हर कोच में कैमरे लगाए जाएं जिससे चोरी करने वालों को न सिर्फ़ पहचाना जा सके बल्कि पकड़ा जा सके और उनसे सामान के साथ भारी जुर्माना और उनको जेल भी भेजा जा सके। 
      *संस्कार ज़मीर और ईमान वाले लोग तो बहुत कम होते हैं जो मौक़ा मिलने पर चोरी धोखा और बे ईमानी नहीं करते वरना पूरी दुनिया में इंसान लगभग एक जैसे ही होते हैं। उनमें लालच झूठ और बे ईमानी मौजूद होती है लेकिन सरकार का सिस्टम मज़बूत हो तो उनको पकड़ लेता है, जिससे वे डरकर अपराध नहीं करते।* मिसाल के तौर पर भारतीय रेलवे में लोग खूब बिना टिकट चलते हैं, लेकिन दिल्ली मेट्रो में चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहां ऐसा करने का सिस्टम ही नहीं है।

जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मनोबल

*सरकार जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ना चाहती है?*
               *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      मौलाना मुहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के कुल 40 में से 38 कमरे बिना नक़्शा पास कराये बनाने के आरोप में रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण के आदेश पर हालांकि कमिश्नर आंजनेय कुमार ने फिलहाल तो स्टे कर दिया है, लेकिन योगी और अन्य बीजेपी सरकारों की अब तक की मुस्लिम विरोधी कार्यशैली देेखते हुए लगता नहीं कि यह स्टे स्थायी आदेश में बदलेगा। हालांकि यह मामला राहत नहीं मिलने पर कोर्ट में भी जायेगा लेकिन बड़ी अदालतों का रूख़ भी आजकल सरकार को नाराज़ नहीं करने का साफ़ देखा जा सकता है। दरअसल यह मामला एक यूनिवर्सिटी या गैर कानूनी निर्माण तोड़ने का नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ने का अधिक लगता है। जिस तरह से देश में अनेक मस्जिद और मदरसे आयेदिन अवैध बताकर तोड़े जा रहे हैं तो ऐसा नहीं है कि केवल यही अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल गैर कानूनी या बिना नक्शा पास कराये बने होंगे। लेकिन निशाना केवल इनको ही मुसलमानों को एक संदेश देने के लिये बनाया जा रहा है। हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभी कहीं कहीं अन्य धर्म वालों के आस्था स्थल और मकान दुकान भी तोड़े जाते हैं लेकिन उनका कारण कुछ और होता है। अयोध्या में राममंदिर के चढ़ावा चोरी और जंतर मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के बैनर तले देश में हुए युवाओं के अभूतपूर्व आंदोलन से जनता का ध्यान हटाने का भी सरकार का एक मकसद हो सकता है। 
           इससे पहले कई साल तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने का सरकार का अभियान भी मुस्लिम समाज को लंबे समय तक भय और तनाव में रखने में सफल रहा था। लेकिन बाद में उस समय के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ की बैंच ने आश्चर्यजनक तरीके से हिम्मत और निष्पक्षता दिखाते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल रखने का एतिहासिक आदेश दिया था। जिस पर मोदी सरकार इस अहम और संवेदनशील मुद्दे पर कोई अग्रिम कानूनी कार्यवाही नहीं करने पर मजबूर हो गयी थी। लेकिन उसकी मुसलमानों को मुख्यधारा से बाहर रखकर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने उनके साथ कदम कदम पर अन्याय और अत्याचार करने की नीति में कोई खास अंतर नहीं आया है। जौहर यूनिवर्सिटी को सपा के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान को सबक सिखाने के लिये भी निशाने पर लिया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सपा में आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच झेल चुके पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव, पूर्व सीएम अखिलेश यादव उनके चाचा और अपने राज में चर्चित और सबसे भ्रष्ट रहे शिवपाल यादव तथा राम गोपाल यादव साथ ही सपा में कई अन्य वरिष्ठ नेता मंत्री और अधिकारी भ्रष्ट नहीं थे जो केवल आज़म खान को ही सौ से अधिक मुकदमे कायम कर लगातार जेल में रखा जा रहा है? 
         विपक्ष का सवाल रहा है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी की तरह अनेक सरकारी और निजी यूनिवर्सिटियों में गैर कानूनी निर्माण और अवैध गतिविधियां नहीं हुयीं होंगी लेकिन केवल इसी को निशाने पर लेने का मकसद साफ मुसलमानों को अनपढ़ जाहिल और बेरोज़गार बनाये रखना नहीं माना जाना चाहिये? हालांकि यह बहुत गंभीर आरोप है लेकिन अगर जम्मू के वैष्णोदेवी मेडिकल काॅलेज में मैरिट के आधार पर 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों के एडमिशन होने पर सरकार उस काॅलेज की मान्यता ही रद्द कर देती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है। हाल ही में जंतर मंतर पर सीजेपी के आंदोलन में यूपी गाज़ियाबाद जिले के मसूरी निवासी जुनैद मालिक आंदोलन करने वाले युवाओं को खाना परोस रहा था। उसको दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया। उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसके राज्य यूपी ले जाया गया। उससे घंटों तक खाने की फंडिंग को लेकर दर्जनों सवाल पूछे गये। उसको रात के अंधेरे में हाईवे पर छोड़ दिया गया। उसके परिवार को भी पुलिस ने थाने बुलाकर डराया धमकाया। ऐसा और बच्चो के साथ भी हुआ है लेकिन इनमें मुस्लिम और दलित अधिक शामिल हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाला उमर खालिद अपने कई साथियों के साथ संविधान तिरंगा झंडा और भारत माता की जय के नारों के बीच कानून का सम्मान करते हुए भाषण देता था लेकिन उनको सरकार ने कई साल से जेल में डाल रखा है और बेल नियम जेल अपवाद बताने वाली कोर्ट उनको जमानत नहीं दे रही है। जबकि यह कानून ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ केवल मुसलमानों को शरणार्थी के तौर पर आने पर भारत की नागरिकता देने से मना करता है। 
           यूपी के गोरखपुर में जब सरकारी मेडिकल काॅलेज में आॅक्सीजन की सप्लाई ठेकेदार ने भुगतान नहीं होने के कारण काट दी तो वहां सेवा दे रहे बच्चो के डाक्टर कफील खान ने अपनी जेब से प्राइवेट आॅक्सीजन सिलेंडर खरीदकर कई बच्चो की जान बचाई थी। इससे वे हीरो बन गये। लेकिन नतीजा क्या हुआ उनको पुरस्कृत करने की बजाये उल्टा मुसलमान होने की वजह से झूठे आरोप लगाकर कई महीनों के लिये जेल में डाल दिया गया। बाद में वे एक भी आरोप साबित नहीं होने पर कोर्ट से बरी किये गये। कश्मीरी लोगों को धारा 370 हटाने के बाद कई माह तक घरों में लाॅकडाउन लगाकर कैद रखा गया और देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य का पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बना दिया गया। सद्दीक कप्पन नाम का एक राष्ट्रीय पत्रकार हाथरस में हुए दलित युवती के बलात्कार की रिपोर्टिंग करने यूपी आने के लिये जैसे ही मथुरा पहंुचा उसको यूपी पुलिस ने 2020 में विदेशी साज़िश का फर्जी आरोप लगाकर हिरासत में लिया और कई माह तक जेल में रखा। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रिहा हो सका था। सरकार सड़क पर दस मिनट की नमाज़ पर रोक लगाती है लेकिन इसी रोड हाईवे एक्सप्रैस वे को एक माह के लिये कांवड़ के लिये बंद कर दिया जाता है। अकेले मेरठ दिल्ली एक्सप्रैस वे पर इस दौरान 700 करोड़ के नुकसान का व्यापारियों का अनुमान है। इस दौरान मांस बेचने पर भी रोक लग जाती है। मुस्लिम दुकानदारों होटलों और ढाबों को भी अपनी पहचान सार्वजनिक करने पर मजबूर किया जाता है। जिससे उनका कांवड़ वाले खरीदारी में बहिष्कार कर सकें। 
            सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को आॅप्रेशन सिंदूर सफलतापूर्वक करने के बादवजूद एक मुस्लिम होने की वजह से बीजेपी के एक मंत्री आतंकियों की बहन बताते है और उनको कोई सज़ा नहीं मिलती। पूरे देश में आयेदिन मुस्लिम नामों वाले शहरों कस्बों गांवों और संस्थानों के नाम बदलकर हिंदू धर्म और संस्कृति के अनुसार रखे जा रहे हैं। सवाल है कि क्या यह देश मुसलमानों का नहीं है? किसी भी मुसलमान पर झूठा आरोप लगने पर भी तत्काल केस दर्ज हो जाता है और उसको जेल भेजने के साथ ही उसके दुकान मकान पर बुल्डोज़र भी चल जाता है। उसको ज़मानत भी अकसर देर से मिलती है। बाद में कोर्ट से वह बेकसूर साबित होने पर बरी हो जाता है तो ध्वस्तीकरण से उसके नुकसान का सरकार मुआवज़ा क्यों नहीं देती? हालांकि बुल्डोज़र अब गैर मुस्लिमों के यहां भी कई मामलों में जाने लगा है लेकिन वह भी गैर कानूनी ही है। बोट से गंगा की सैर कर बिरयानी खाने वाले एक दर्जन से अधिक मुस्लिम युवाओं को चिकन की हड्डी नदी में फेंकने पर महीनों के लिए जेल में रखा गया। बिहार से लेकर यूपी और कई बीजेपी शासित राज्यों तक में चुन चुनकर पहले अनेक मुस्लिम माफियाओं का गैर कानूनी तरीके से फर्जी एनकाउंटर करके एक खास संदेश दिया गया। बाद में यह कवायद सभी वर्गों के लिये आम हो चुकी है। गोमांस का आरोप लगाकर कई मुसलमानों की माॅब लिंचिंग की जा चुकी है। बाद में फोरेंसिक जांच में यह मीट भैंस का पाया जाता है। अंतरधार्मिक विवाह का कानून और संविधान में अधिकार होने के बाद भी लव जेहाद बताकर केवल उन मामलों को रोका और मारा पीटा जाता है जिनमें लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम होता है। 
           कई बीजेपी शासित राज्यों में काॅमन सिविल कोड के नाम पर सबके लिये एकसा कानून लाने का दावा कर आदिवासियों को इससे बाहर रखकर केवल मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है। कश्मीर फाइल, केरल स्टोरी, हिजाब विवाद, हज सब्सिडी, कोरोना जेहाद, लैंड जेहाद, थूक जेहाद, यूपीएससी जेहाद, काॅरपोरेट जेहाद, रामनवमी पर शोभायात्रा के नाम पर मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों के सामने आपत्तिजनक नारेबाज़ी, वक्फ बोर्ड कानून के द्वारा उनकी सम्पत्तियों पर सरकार की बुरी नज़र, फिल्मी सितारे शाहरूख़ आमिर और सलमान को तरह तरह से सताना, यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव द्वारा मुसलमानों को टारगेट करने के बाद भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होना, इसकी कई मिसाले मौजूद हैं। मुस्लिम विरोधी कई कानून बनाने के साथ ही असम और यूपी के सीएम आयेदिन ऐसे बयान देते रहते हैं जिनसे मुसलमानों को अपमानित प्रताड़ित और उनका मनोबल तोड़ा जा सके। इसलिये जौहर यूनिवर्सिटी तो नया बहाना है, इसके तोड़ने के आदेश के ज़रिये मुसलमानों का मनोबल तोड़ना अधिक प्रतीत होता है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा

*कॉकरोच आंदोलन सफल लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक बंद हो जाएगा?*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                 कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खत्म कराने को मजबूरी में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा तो हो गया लेकिन संघ बीजेपी और मोदी की कार्यशैली को जानने वालों को पता है, इससे पेपर लीक होना बंद हो ही जाएं यह ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता युवाओं की मांग पूरी होने से उनको लगा है कि सरकार झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। जहां तक सीजेपी के आंदोलन का सवाल है उसकी तुलना जे पे या अन्ना के आंदोलन से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें संगठन प्रबंधन और सरकार से मांगो पर वार्ता करने के लिए निगोशिएशन करने वाले अलग वरिष्ठ अनुभवी और विशेषज्ञ नागरिक मौजूद थे, जो इस आंदोलन में नज़र नहीं आये। सोनम वांगचुक जब सीजेपी के आंदोलन में शरीक हुए तब यह लग रहा था कि अब वे इसकी कमान सीजेपी के मुखिया अभिजीत दीपके से अधिक बेहतर संभाल सकते थे लेकिन उनको पुलिस ने जबरन उठाकर हॉस्पिटल भेज दिया, जिससे वे मुख्य मंच से बाहर हो गए। सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास के नेतृत्व में जो लोग स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से मिलने गए वे पहले दिन तो निराश होकर लौटे लेकिन दूसरे दिन शिक्षा मंत्री को हटवाने में सफल हो गए।
         दरअसल शिक्षा मंत्री को हटाने से यह व्यापक समस्या हल होने वाली नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक या आंदोलन की बड़ी सफलता तो लोगों को दूर से दिखाई दे रही है, है भी लेकिन ठीक ऐसा ही होगा जैसे किसी अस्पताल का पूरा सिस्टम सुविधाएं मशीनें नियम कानून उपलब्ध सीमित दवायें और इलाज की सीमाएं बदले बिना डॉक्टर बदलकर रोगी के ठीक होने की आशा करना। हालांकि सीजेपी के घोषणा पत्र में न्यायिक स्वतंत्रता, महिला आरक्षण, चुनावी अखंडता, मीडिया की जवाबदेही और कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हैं लेकिन फ़िलहाल उन्होंने शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, नीट परीक्षा बार बार रद्द होने से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने के साथ आंदोलन करने वाले बच्चों के खिलाफ़ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करने की मुख्य मांग ही सरकार से मनवाई हैं । सीजेपी के युवा जोश में हैं। उनको अनुभव अभी नहीं है। वे राजनीति की बारीकियां शासन प्रशासन की चालें भी नहीं समझते। साथ ही इस सरकार की बनावट और काम करने के परंपरा से अलग हटकर तौर तरीके और आंदोलन व विरोध को लेकर उसकी नीति भी शायद नहीं जानते थे। उनको यह भी नहीं पता शिक्षा मंत्री ही नहीं सभी कैबिनेट मंत्री और अन्य मंत्री भी पीएमओ यानी मोदी और संघ के दिशा निर्देश से ही सारे काम, फैसले और बयान जारी करते हैं। 
            यहां तक कि बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी बिना मोदी शाह और संघ की सहमति के कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकते। यही वजह है कि बीजेपी में मंत्री या मुख्यमंत्री बनने के लिए जनाधार योग्यता और अधिक राजनीतिक अनुभव नहीं वफ़ादारी कम योग्यता और लोकप्रियता विहीन होना मैरिट माना जाता है। रिकॉर्ड बताता है कि संघ बीजेपी और मोदी कभी भी लोकतांत्रिक उदार और संविधान के अनुसार चलने वाले नहीं रहे हैं। वे सांप्रदायिक कट्टरवादी और पूंजीवादी सोच के होने की वजह से अधिनायकवादी अहंकारी और एक एजेंडे के हिसाब से ही चलते हैं। यही वजह है कि नैतिकता जनभावनाओं का सम्मान और विपक्ष सिविल सोसायटी या विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद फैसले लेने में उनका तनिक भी विश्वास नहीं रहा है अन्यथा नोट बंदी, देश में लॉक डाउन और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान नहीं हुआ होता। पेट्रोल में बिना समुचित चर्चा तैयारी या वाहनों की बनावट की जांच के सीधे दस से बीस प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से खराब हो रही कारों का यह देश में ऐसा ही चौथा मनमाना थोपा गया एकतरफा फैसला है।
          यही वजह है कि मोदी और अन्य बीजेपी सरकारें भ्रष्टाचार अपराध महंगाई बेरोजगारी और ग़रीबी को कोई बड़ी समस्या ही नहीं मानते। जब प्रॉब्लम ही स्वीकार नहीं करते तो इनके समाधान के लिए भी कुछ ठोस काम नहीं करेंगे। मोदी सरकार अपने 12 साल के कार्यकाल में केवल उन आंदोलनकारी किसानों के सामने झुकी थी जिन्होंने तमाम तिकड़मों रुकावटों और सरकारी दमन के बावजूद दिल्ली बोर्डर पर एक साल से अधिक धरना और 700 से अधिक किसानों की जान का बलिदान दिया था। उसकी वजह भी देश की आबादी में किसानों की बड़ी संख्या और यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव में बीजेपी की हार का खतरा था। मोदी सरकार विपक्ष को संसद या बाहर भी विरोध तक नहीं करने देती, साथ ही विपक्ष के सांसदों को शामिल कर बनी संयुक्त संसदीय समितियों को अधिकांश बिल विवाद के बाद भी विचार को या तो भेजे नहीं जाते और अगर मजबूरी में कभी कभी सदन चलाने को ऐसे विधेयक विचार विमर्श को दिए भी जाते हैं तो उनकी सिफ़ारिश को सरकार स्वीकार ही नहीं करती। युवाओं के वर्तमान आक्रोश नाराज़गी और विरोध का कारण मोदी के हर साल दो करोड़ नए रोज़गार का वादा पूरा नहीं होना भी था। इसके साथ ही मोदी जिन अडानी अंबानी जैसे चंद मित्र पूंजिपतियों के हाथ देश की सारी संपत्ति संसाधन और दौलत लुटाते आ रहे हैं उससे भी युवाओं में गुस्सा है। यह ठीक है कि सरकार के हिंदू मुस्लिम एजेंडे को धता बताकर कॉकरोच आंदोलन ने दो सफलताये शुरू में ही हासिल कर ली थी, जिनमें एक आंदोलन करने पर सरकार की बदले की कार्यवाही का भय ख़त्म होना और दूसरा आंदोलन करने वालों से सरकार का अब तक बात नहीं करने का घमंड तोड़ना शामिल था। यह सरकार बड़े से बड़े फैसले बिना सोचे समझे बिना संसद को विश्वास में लिए और बिना नागरिकों से चर्चा किए लेती रही है। 
           6 जून को जब कॉकरोच आंदोलन शुरू हुआ तो सरकार ने उससे तत्काल बात नहीं की लेकिन जब तनाव टकराव और विवाद 20 जुलाई को संसद चलो के आव्हान से काफी बढ़ गया तो समझौता वार्ता शुरू हुई। इसके कई दिन बाद पीएम मोदी ने पेपर लीक के मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनने का कानून बनाने और उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी को हटाने का आदेश देकर ऐसा संदेश देना चाहा जैसे ये कोई बड़े क्रांतिकारी फ़ैसले हों। इसके साथ ही मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक कानून में दस साल सज़ा और दस करोड़ जुर्माने की भी व्यवस्था कर दी है, लेकिन जैसे जनलोकपाल बना लेकिन करप्शन खत्म नहीं हुआ वैसा ही इस कानून का भी हश्र होगा। अंत में कोई विकल्प न बचने पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लिया गया, इसमें में भी पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी नहीं स्वीकार की गई है। मोदी सरकार की विश्वसनीयता साख और छवि अब ढलान पर है, जिससे उसके वादों दावों और आश्वासनों पर सीजेपी क्या कोई भी विश्वास करने को तैयार नहीं होता है। उसने हर समस्या का समाधान हिंदू मुस्लिम झूठ और नफ़रत को बनाकर गोदी मीडिया से ऐसा नैरेटिव बनाकर चुनावी जीत का मैकेनिज्म विकसित कर लिया है जिससे धर्मेंद्र प्रधान को तो क्या कल मोदी को भी अगर पद से हटा दिया जाए तो भी जो नया प्रधानमंत्री बनेगा वो संघ के उसी एजेंडे पर वैसे ही चलेगा जैसे आज मोदी चल रहे हैं। हम सीजेपी के आंदोलन की सफलता को कम करके नहीं आंकना चाहते लेकिन यह ज़रूर कहेंगे कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक की समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि इसके लिए पूरी सरकार व्यवस्था और काफी सीमा तक हमारा अनैतिक समाज भी उत्तरदायी है।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

कॉकरोच आंदोलन

*क्या कॉकरोच आंदोलन अपना मक़सद हासिल कर सकेगा?*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
            मई माह में कुछ छात्रों और युवाओं ने ऑनलाइन कॉकरोच जनता पार्टी बनाई थी। अभिजीत दीपके के नेतृत्व में बनी इस पार्टी के उसी दिन दो करोड़ फॉलोवर बनने पर लोगों को हैरत हुई थी। इसके मुखिया दीपके जब अमेरिका से 6 जून को भारत लौटे तो युवाओं ने उनको सर आंखों पर लिया। जैसा कि इस पार्टी के नाम से ही लगा कि यह एक सटायर यानी हास्य व्यंग्य के तौर पर मज़ाक में बना हल्का संगठन है। लेकिन जब इसी बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं ने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन का पहला दौर शुरू किया तो लोगों ने इस पार्टी को संजीदगी से लेना शुरू किया। 
                सीजेपी की शुरू में एक ही मांग थी कि बार बार लीक हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर की जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफ़ा दें। जब यह मांग धरने से पूरी नहीं हुई तो सीजेपी ने 20 जून से जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन छेड़ दिया। इस दौरान सोशल एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक सीजेपी के जंतर मंतर पर किए जा रहे आंदोलन में समर्थन देने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने 19 दिन भूख हड़ताल की। उनका वज़न 9 किलो से ज्यादा घट गया। मामला दिल्ली हाईकोर्ट गया। हाईकोर्ट ने सरकार को सोनम की सेहत का ख़्याल रखने को कहा। सरकार ने सोनम को पुलिस से उठवा कर हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। इसके बाद सीजेपी के मुखिया दीपके ने आंदोलन को तेज़ कर दिया। उन्होंने खुद आमरण अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन एक दिन बाद ही उनको कुछ वरिष्ठ नागरिक अनुभवी समाजसेवी और सुलझे हुए राजनेता यह समझाने में सफल हो गए कि धरने अनशन और प्रदर्शन का इस सरकार पर कोई असर नहीं होता। इसके बाद दीपके ने एक दिन में ही अनशन खत्म कर संसद मार्च का ऐलान कर दिया। अब कॉकरोच पार्टी की मांगे बढ़कर शिक्षा मंत्री के रिजाइन के साथ साथ पेपर लीक के सदमे से मरने वाले 21 छात्रों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने तक बढ़ चुकी हैं।
                इस दौरान जब सीजेपी ने जंतर मंतर से संसद की तरफ़ कूच किया तो आश्चर्यजनक ढंग से उनको संख्या चार पांच हज़ार से बढ़कर अचानक एक लाख से भी अधिक हो गई। इस मार्च की अनुमति सरकार से नहीं मिली थी। पुलिस ने संसद से काफी पहले छात्रों के मार्च को रोका। जब वे नहीं रुके तो उन पर लाठी चार्ज किया गया। आरोप है कि पुलिस ने पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक और शॉक बेटन यानी करंट लगाने वाली लाठी का इस्तेमाल भी किया, लेकिन सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया। यह भी चर्चा है कि आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने को पुलिस और अन्य अर्ध सैनिक बलों के साथ सिविल ड्रेस में ऐसे लोग भी लाठी चार्ज कर रहे थे जिनके बारे में यह स्पष्ट नहीं है कि बिना वर्दी बिना बैज और बिना नेम प्लेट के ये प्राइवेट फोर्स किन लोगों की थी। बाद में पुलिस ने इनको अपने ही जवान बताया। कई छात्र छात्राओं ने लाठी चार्ज के दौरान गंभीर चोटें आने जानबूझकर घायल करने और अश्लील हरकतें करने के भी आरोप लगाए हैं। निष्पक्ष जांच के बाद ही पता लगेगा कि प्राइवेट लोग कौन थे और जो आरोप लग रहे हैं उनमें कितना सच है और कितनी अफवाहें हैं।
          समय रहते सरकार ने सीजेपी से बात कर इस आंदोलन को निबटाने की कोशिश नहीं की। जिस दिन संसद मार्च हो रहा था और छात्र छात्राओं पर लाठी चार्ज हुआ उसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने सीजेपी के नेताओं से बात की, लेकिन तत्काल उनकी एक भी मांग नहीं मानी। इससे आंदोलकारी और भड़क गए। बर्बर लाठी चार्ज और युवाओं को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की शिकायतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन कई ग़ैर ज़रूरी और अपेक्षाकृत कम महत्व के मुद्दों पर सु मोटो लेने वाली बड़ी अदालतों ने तत्काल सुनने से इन मामलों को यह कहते हुए मना कर दिया कि कोर्ट को सियासत में मत घसीटिए और इन मामलों में फौरन सुनवाई कोर्ट का कीमती टाइम ख़राब करना माना जाएगा। ऐसे जनहित के मुद्दों पर याचिकाएं सुनते हुए अदालतें काफ़ी समय से इसी तरह का रुखा रुख अपना रही हैं, जिससे सरकार को काफ़ी राहत मिल जाती है।
            कॉकरोच आंदोलन सफल होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मोदी सरकार की अब तक की कार्यशैली देखते हुए यही संकेत मिल रहे हैं कि वह सीजेपी की मांगो को नहीं मानेगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बहुत पहले कह चुके है कि हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते। यह लेख लिखे जाने तक आंदोलन जारी है। घायल छात्र छात्राएं गुस्से में हैं। वे फिर से जंतर मंतर पर जमा हो रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार के इस मिथक को तो तोड़ दिया है कि लोग डर से शासन प्रशासन और पुलिस के खिलाफ़ आंदोलन नहीं करेंगे। इसके साथ ही देर से सही लेकिन सरकार ने सीजेपी नेताओं से बात करके यह भी भ्रम तोड़ दिया कि यह सरकार विरोध करने वालों से बात तक नहीं करती।
          सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस द्वारा कुछ युवाओं को कॉकरोच बताने के जवाब में बनी कॉकरोच जनता पार्टी आज मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है। उसने आंदोलन करके दो मकसद तो शुरू में ही हासिल कर लिए थे। इनमें एक निडर होकर सरकार के खिलाफ़ आंदोलन और दूसरा विरोध करने वालों से कभी भी बात नहीं करने वाली मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा द्वारा सीजेपी नेताओं से समझौता वार्ता करना। अब जबकि विपक्ष भी खुलकर सीजेपी के आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है, सरकार के लिये और मुसीबत बढ़ गई है। सरकार इनकी मांगे मानकर अपनी अब तक किसी आंदोलन के सामने नहीं झुकने की परम्परा नहीं तोड़ना चाहेगी। उसे यह भी डर है कि मंत्री प्रधान का इस्ती़फा लिया तो कल प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा न मांगा जाने लगे। साथ ही ऐसी मांगे बढ़ते जाने और माने जाने से सरकार दब्बू डरपोक और कमज़ोर नज़र आ सकती है। हर विरोध करने वाले को सरकार देशद्रोही खालिस्तानी पाकिस्तानी और विदेशी साज़िश रचने वाला अर्बन नक्सल बताती रही है। मोदी सरकार खुद को सेवक की जगह स्वामी और जनता को आज्ञाकारी सेवक बनाना चाहती है। वह विपक्ष को भी विरोध एक सीमा तक ही करने देती है। केवल एक साल से अधिक आंदोलन करने वाले किसान ही 700 लोगों की बलि देकर मोदी सरकार को पहली बार कृषि कानून वापस लेने को मजबूर कर सके थे। देखना यह है कि सरकार फिर से झुकती है या युवा आंदोलन बिना मकसद हासिल किए कुछ दिन में खत्म हो जाएगा।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

विपक्ष , आधा एनडीए में आधा जेल में?

*2029 के चुनाव तक आधा विपक्ष बीजेपी आधा जेल में होगा?*
       *_इक़बाल हिंदुस्तानी* 
       मानसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार परिसीमन जैसे अहम बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने में जी जान से लगी है। वर्तमान लोकसभा में उसको 362 सांसद चाहिए, आम आदमी पार्टी और टीएमसी के काफी सांसद तोड़कर 332 उसने जुटा लिए हैं। हाल ही में उसने शरद पवार की एनसीपी को एनडीए का समर्थन करने को तैयार कर लिया है। अब उसकी नज़र सपा और द्रमुक पर है, ये दोनों सीधे समर्थन नहीं भी देंगे तो इनको सदन से गायब रहने पर राज़ी किया जा सकता है, जिससे सदन की कुल संख्या कम हो जाएगी और इसके साथ ही टू थर्ड मेजॉरिटी का आंकड़ा भी नीचे आ जाएगा। 
           सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है। यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।
          महाराष्ट्र में शरद पवार आज आत्मघाती फैसला कर रहे हैं, कल ममता बनर्जी ने भी बीजेपी को सपोर्ट करके ऐसी ही गलतफहमी पाली थी। ममता समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। 
         ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। 
         कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् श्री एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। 
         बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। मोदी सरकार विपक्ष को तोड़ने खत्म करने और ईडी सीबीआई इनकम टैक्स के ज़रिए टारगेट करके जिस तरह बीजेपी एनडीए या इंडिया एलाइंस से अलग होकर नया गुट बनाने को ब्लैकमेल करके तानाशाही दिखा रही है, उससे लगता है अगला आम चुनाव आते आते आधे विपक्षी नेता या तो बीजेपी को सपोर्ट करेंगे या फिर जेल में होंगे। 
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*

Wednesday, 15 July 2026

बेकाबू बाइकर्स

*आपकी बाइक है शौक से चलाओ,* 
*दूसरों के लिए आफ़त मत बनाओ*
       *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        आजकल जिस तरह से युवा मोबाइल के दीवाने हैं। उसी तरह से उनका दूसरा प्यार बाइक बन चुकी है। कुछ युवक युवतियां स्कूटर और स्कूटी भी चलाते हैं लेकिन बाइक चलाने वाले उनकी तुलना में कई गुना अधिक हैं। लोवर मीडियम और मीडियम क्लास जहां 75,000 से एक लाख तक की बाइक चलाते हैं, वहीं अपर मीडियम और अपर क्लास बहुत महंगी मॉडर्न और स्पोर्ट बाइक चलाते है। ये अन्य सुविधाओं के साथ ही स्टार्ट होते ही बहुत तेज़ स्पीड पकड़ लेती हैं। असली प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती हैं। फैशन और स्पीड का दीवाना युवा ये आधुनिक बाइक चलाते हुए पूरी सावधानी नहीं बरतता। वह हेलमेट नहीं लगाता, डी एल नहीं बनवाता, दो नहीं तीन नहीं चार चार साथियों को बाइक पर बैठाकर गली मुहल्ले में ही नहीं हाईवे और एक्सप्रेस वे पर भी निकल जाता है। खुद की जान के साथ सड़को पर पैदल या दूसरे हल्के वाहनों से जा रहे लोगों की जान भी खतरे में डालता है। कई बार एक्सीडेंट होते हैं। युवा जान से हाथ धो बैठते हैं। मातापिता लाड प्यार में नाबालिग बच्चों को भी टू व्हीलर की चाबी दे देते हैं जोकि नियम कानून ही नहीं उनकी अपनी सुरक्षा के लिए मुसीबत बन जाती है। बड़े चौराहों और राष्ट्रीय राज मार्गों पर तो कभी कभी पुलिस इन वाहनों की चेकिंग करके चालान काट भी देती है, लेकिन नगरो कस्बों गांवों के गली मोहल्लों में ये बाइक सवार युवा सरपट दौड़ते रहते हैं। इनके प्रेशर हार्न से बच्चे बुजुर्ग और बीमार सो नहीं पाते या सोते सोते चौंक कर बार बार जाग जाते हैं। ये अपनी बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर गैर कानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 
        इन अवैध साइलेंसर से बार बार पटाखा फूटने की दिल हिला देने वाली तेज़ आवाजें गूंजती रहती हैं लेकिन इन बेलगाम और बिगड़े हुए युवाओं की मौज मस्ती पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अव्वल तो गली मोहल्लों में इनको पुलिस पकड़ती ही नहीं है, अगर ये गलती से किसी व्यस्त चौराहे या हाईवे पर पकड़े भी जाते है तो अपने परिवार के रसूख का इस्तेमाल नहीं तो यातायात पुलिस की जेब गर्म और कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर चालान कटवाकर भर देते हैं या कभी कभी मौक़े से दुस्साहस दिखाते हुए भाग भी जाते हैं। कई नगरों में कई सड़कों पर बहुत ऊंचे स्पीड ब्रेकर होने या जाम लगा होने पर ये स्पीड काबू नहीं कर पाने से भयंकर टक्कर भी मार देते हैं और भाग जाते हैं। इन बिगड़े हुए युवाओं की इन लापरवाही मनमानी और खतरनाक बाइक स्टंट से नागरिक बहुत परेशान हैं। वे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों आश्रमों धर्मशालाओं में पूजा नमाज से लेकर अस्पताल में अमन सकून से इलाज तक नहीं करा पाते। स्कूल कॉलेज के बच्चे इनके हॉर्न और मोडिफाइड साइलेंसर के कर्कश असहनीय शोर से पढ़ भी नहीं पाते। 
        ऐसी बाइक पास से गुजरने मात्र से कई मासूम बच्चे महिलाएं और बूढ़े बुजुर्ग तो एक्सीडेंट के खौफ से बुरी तरह काँप जाते हैं या डिसबैलेंस होकर रास्ते में ही गिरकर चोट खा जाते हैं। इन बेकाबू बाइकर्स के डरावने कोलाहल से कभी कभी अवारा बेसहारा जानवर बौखलाकर रोड पर बेतहाशा दौड़ने लगते है जिससे पैदल या वाहन पर चलते दूसरे लोग उनकी ज़द में आकर बुरी तरह घायल या मौत का शिकार हो जाते हैं। कई बाइक और दूसरे वाहनों की प्रदूषण की जांच या तो बरसों तक होती नहीं या फिर वे फील गुड कराकर फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं, जिससे वे जिधर से निकलते हैं, उधर ज़हरीला धुआँ छोड़ते जाते हैं और लोग उनको बददुआ देते रहते हैं। इनकी इन बढ़ती समाज विरोधी शांति विरोधी और नागरिक सुरक्षा की दुश्मन हरकतों का कोई समाधान सरकार प्रशासन और पुलिस के पास अभी तक नहीं है। काश इन नौजवानों और उनके परिवार वालों को सिविक सेंस नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य बोध हो और वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार संवेदनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ा सकें जिससे वे अपनी बाइक को चलती फिरती आफ़त मुसीबत और यमदूत बनने से बच सकें।
*नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है*
(नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं)

अयोध्या चढ़ावा चोरी...

*अयोध्या चढ़ावा चोरी: वकील अपना काम नहीं करेंगे तो कानून अपना काम कैसे करेगा?*
          _*इक़बाल हिंदुस्तानी*
                    अयोध्या बार एसोसिएशन ने एलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के किसी आरोपी की कोई वकील कानूनी पैरवी नहीं करेगा। अगर एसोसिएशन के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई वकील ऐसा करता है तो उस पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जायेगा। हमारा कहना है कि अपराधी कोई भी हो उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन हर आरोपी अपराधी ही हो यह ज़रूरी नहीं होता। कानून के राज में जब तक कोई आरोपी अपराधी साबित नहीं हो जाता उसको किसी भी प्रकार से किसी भी स्तर पर किसी के भी द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार कितना ही गम्भीर अपराध का आरोपी हो उसको दंड दिए जाने से पहले अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने का कानूनी अधिकार दिया गया है। अयोध्या के अधिवक्ताओं के संगठन ने आरोपियों को कानूनी सहायता नहीं देने का जो फ़ैसला किया है, वह अपने आप में कानून के राज की मूल भावना के खिलाफ़ है। कानून की पढ़ाई, डिग्री और अदालत में प्रैक्टिस के लिए बार कौंसिल में रजिस्ट्रेशन से पहले प्रत्येक अधिवक्ता को शपथ पत्र देना होता है कि वह संविधान के अनुसार कानून का पालन करते हुए अपने पेशे के नियम के मुताबिक किसी जरूरतमंद को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं करेगा। इसके बावजूद कोई एक दो वकील व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि उनकी पूरी यूनियन एक आवाज़ में एक साथ एक प्रस्ताव पास करके अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा और दान चोरी के आरोपियों के केस कानूनी पैरवी के लिये लेने से खुले आम इन्कार कर रही है। 
              यहां यह स्पष्ट कर दें हमारा अभिप्राय इस मामले में यह बिल्कुल नहीं है कि चढ़ावा चोरी के अपराधियों को दंड नहीं मिले। हम चाहते हैं इस केस में जो भी अपराधी साबित हों उनको न केवल सज़ा मिले बल्कि कड़ी और शीघ्र सज़ा दी जाए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की निर्लज्ज और राम भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली घटिया हरकत करने से पहले सौ बार सोचे और चोरी करने से डरे व बचे। अजीब बात यह है कि कानून की पैरवी करने वाले वकील ही धार्मिक भावनाओं को संविधान से ऊपर रखकर आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान करने से मना कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस बारे में साफ़ और सख़्त स्टैंडिंग ऑर्डर हैं कि संविधान और न्यायपालिका के नियम अनुसार कोई वकील किसी आरोपी की पैरवी करने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते कि उसने उससे पहले ही दूसरे पक्ष का केस लड़ने को अनुबंध नहीं कर लिया हो। *2010 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ़ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने किसी भी बार एसोसिएशन के इस तरह के प्रस्ताव को गैर कानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। यह मामला कोयमबटूर के एक वकील और पुलिस वाले के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद अधिवक्ताओं ने पुलिस के मामलों की कानूनी पैरवी करने से मना कर दिया था। मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा वकीलों के इस फैसके को वकालत के प्रोफेशन के खिलाफ़ बताने के बाद बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट अपील में गई थी। *उत्तराखंड में एक वकील की हत्या के मामले में जब वकीलों ने आरोपियों को कानूनी सहायता देने से मना किया तो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रस्ताव गैर कानूनी बताते हुए हत्या आरोपियों की पैरवी करने से रोकने या इस दौरान कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने पर वकीलों को कोर्ट की मानहानि का केस दर्ज कराने की कड़ी चेतावनी दी थी।* 
            *इतना ही नहीं बार कौंसिल ऑफ इंडिया भी इस बारे में स्पष्ट कह चुका है कि कोई भी वकील किसी भी आरोपी को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं कर सकता।* बार कौंसिल का यहां तक कहना है कि वकील फीस भी केस की नेचर गंभीरता और स्तर के हिसाब से ले सकता है, इतनी नहीं मांग सकता जिससे आरोपी अनावश्यक और अव्यवहारिक मानकर भुगतान करने में असमर्थ हो और उसको जानबूझकर कानूनी बचाव से वंचित कर दिया जाए। कौंसिल का कहना था कि अगर एसोसिएशन के फैसले के खिलाफ जाकर कोई वकील किसी आरोपी का कोई केस कोर्ट में लड़ता है तो उस अधिवक्ता पर एसोसिएशन न तो कोई अर्थदंड लगा सकती है और न ही उसकी सदस्यता निरस्त की जा सकती है। 
            *संविधान का अनुच्छेद 22 (1) हर किसी को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का वकील अपने कानूनी बचाव में रखना चाहे तो वकील उसको कानूनी सेवाएं देने से इन्कार नहीं कर सकता। सेक्शन 14 हर भारतीय नागरिक को समान कानूनी अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता है तो आर्टिकल 39 ए राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। संविधान यहां तक कहता है कि किसी नागरिक को गरीब कमज़ोर अशिक्षित या विकलांग होने के कारण मुकदमे के दौरान कानूनी बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता और यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह असमर्थ होने पर आरोपी को सरकारी वकील कानूनी बचाव के लिए उपलब्ध कराए।* 
             अगर आज वकीलों के इस अवैध प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो कल डॉक्टर ऐसे आरोपियों के इलाज को यह कहकर मना करने लगेंगे कि आरोपियों ने उनकी धार्मिक भावना या अस्पताल पर हमला करके आहत किया है। दूसरे पेशे वाले भी उनके नक़्शे कदम पर चलकर देश में कानून की बजाए अराजकता की स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस गलत सिलसिले को यहीं रोकना ज़रूरी है। यही वजह है कि 26/11 के मुंबई हमले के पाकिस्तानी आरोपी अजमल कसाब को मौके से रंगे हाथ गोली चलाते हुए निर्दोष लोगों का खून बहाते हुए पकड़े जाने के बावजूद कोर्ट में केस चलाने के दौरान सरकार ने उसके कानूनी बचाव को अपने खर्च पर सरकारी वकील उपलब्ध कराया था। उसको बाद में कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से करते हुए फांसी की सज़ा दी, लेकिन देश विदेश में यह संदेश गया कि उसको वास्तव में अपराधी साबित होने के बाद ही मृत्युदंड दिया गया और सही न्याय हुआ।
              यह भी विडंबना और विरोधाभास ही कहा जाएगा कि अयोध्या के इन वकीलों ने ही दो जुलाई को राम जन्मभूमि थाने में ट्रस्ट से जुड़े कुछ बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज करने को तहरीर दी और आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों की आड़ में कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। वकीलों ने अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन भी किया लेकिन अब तक इनकी दी तहरीर पर कोई एफआईआर होने की अधिकृत सूचना नहीं है। खुद सरकार ने इस मामले में तब एसआईटी बनाई जब यह मामला सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके सार्वजनिक कर दिया। साथ ही कानून को अपना काम करने से रोकने या कुछ छिपाने के आरोप सरकार पर इसलिए भी लगने शुरू हुए क्योंकि उसने तत्काल एफआईआर करने की बजाए पहले एसआईटी बनाई। चर्चा है कि इस दौरान आरोपियों को चोरी का माल ठिकाने लगाने का अवसर मिल गया। अगर कानून को ठीक से काम करने दिया जाता तो पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती, फिर तत्काल आरोपियों को हिरासत में लिया जाता, उनसे सख्ती से पूछताछ होती, उनकी गिरफ्तारी होती, रिमांड पर लिया जाता, उनकी निशानदेही पर चोरी की रकम और दूसरी बेशकीमती सोने चांदी की भेंट की गईं चीज़ें बरामद की जाती, उनके घर दुकान और संपत्ति सील की जाती, उनके बैंक खाते सीज़ किए जाते, उनसे जुड़े लोगों पर नज़र रखी जाती और उनके घरों कार्यालयों व अन्य संबंधित भवनों की निगरानी भी की जाती जिससे वे अब तक चुराया गया चढ़ावा दान और उससे बनाई गई संपत्ति ज़ेवर और बैंक लॉकर से माल ठिकाने नहीं लगा सकें। 
             अंत में यही कहा जा सकता है कि ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी ऐसी पारदर्शी विश्वसनीय और अभेद्य व्यवस्था बनाने की थी जिसमें चोरी हो ही नहीं, लेकिन अगर मानवीय भूल तकनीकी चूक और व्यवहारिक गलती से चोरी का संगीन अपराध हो ही गया था तो ट्रस्ट सरकार पुलिस और वकीलों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे जनता में यह संदेश जाए कि कानून को अपना काम निष्पक्ष स्वतंत्र और संवैधानिक तरीके से नहीं करने दिया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने गंभीर और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करके राम भक्तों और आम आदमी को अच्छा संदेश नहीं दिया है। वहां एक माह से अधिक समय के बाद सुनवाई शुरू होने जा रही है।अभी भी समय है कि जनता का विश्वास कानून के राज में बहाल करने को इस मामले में त्वरित कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही को देश के तटस्थ धार्मिक संतों गणमान्य समाजसेवी और प्रतिष्ठित निष्पक्ष नागरिकों की एक कमेटी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज की अध्यक्षता में बनाकर निश्चित समय में जांच कराई जाए और दोषियों को कड़ा दंड दिया जाए। 
*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़*
*हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा*