*सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ईश्वरीय वाणी नहीं हैं, उनकी भी स्वस्थ आलोचना हो सकती है!*
*इक़बाल हिंदुस्तानी*
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए हाल ही में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा धमका नहीं सकता। बेशक सुप्रीम कोर्ट को इससे बचाने के लिये ही कोर्ट की मानहानि का मुकदमा चलाने का विशेष अधिकर मिला हुआ है। लेकिन उसके फैसलों की स्वस्थ आलोचना करने का अधिकार संविधान ने नागरिकों को दिया है। उधर वरिष्ठ वकील श्री कपिल सिब्बल ने कहा है “मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाकर थक गया हूं। मैं अपनी बात कह रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं है।” इससे पहले एक और सीनियर एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण यह आरोप लगा चुके हैं कि ऐसा लगता है कि सबसे बड़ी अदालत के कई जज सरकार के दबाव में फैसले दे रहे हैं। उनका दावा था कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मोदी सरकार ने अनेक न्यायाधीशों और उनके निकटवर्ती संबंधियों की गोपनीय जांच कराकर उनकी कुछ संवेदनशील जानकारी जुटाकर अपने मन माफिक फैसले लेने का एक अनैतिक मैकेनिज्म विकसित कर लिया है? इन गंभीर आरोपों की न तो आज तक जांच हुई और न ही किसी स्तर पर पुष्टि हुई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय से एक के बाद एक आ रहे कुछ बेंचों और कुछ खास जजो के सरकार समर्थक अधिकांश फैसलों ने सिविल सोसायटी के इस तरह के संदेह को और गहरा ज़रूर कर दिया है। अगर जजों की बात याद करें तो 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने जस्टिस चेलामेश्वर के आवास पर एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। जजों के आरोपों के अनुसार यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार था कि सिटिंग जजों ने सार्वजनिक रूप से उस समय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के प्रशासनिक कामकाज पर चिंता जताई थी। इन जजों का कहना था “जब तक इस संस्था यानी सर्वोच्च न्यायालय को सुरक्षित नहीं रखा जाता और यह अपना संतुलन बनाए नहीं रखती, देश में लोकतंत्र नहीं बच पाएगा। सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।” चारों जजों ने कहा था कि उन्होंने सीजेआई से मुलाकात कर और पत्र लिखकर भी ये समस्याएँ बताईं, लेकिन उनके प्रयास विफल रहे। इसलिए वे राष्ट्र के सामने यह बात रखने को मजबूर हुए, ताकि भविष्य में कोई यह न कहे कि उन्होंने संस्था की रक्षा नहीं की।
"न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए" मूल रूप से यह कथन लॉर्ड हेवर्ट का है। वे इंग्लैंड के लॉर्ड चीफ जस्टिस थे।भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सिद्धांत को अपनाया है। 7 मई 1997 को सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट मीटिंग में इसी सिद्धांत को न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्स्थापना के रूप में अपनाया गया था। उस समय जस्टिस जे.एस. वर्मा भारत के चीफ जस्टिस थे। इस दस्तावेज के पहले बिंदु में ही यही सिद्धांत शामिल है। कहने का अभिप्राय यह है कि 2014 के बाद से सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश फैसलों को इस कसौटी पर परखा जाए तो वे सरकार की तरफ़ झुके नज़र आते हैं। उन फैसलों में न्याय होता दिखाई नहीं पड़ता। यहां यह स्पष्ट करना भी मुनासिब होगा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में सुप्रीम कोर्ट और उसके माननीय न्यायाधीशों का सम्मान करना और उनके दिए फैसलों से असहमति रखना दोनों अलग अलग बात हैं। पिछले दिनों जब विपक्षी दलों ने अपनी बात रखने को चीफ़ जस्टिस से मिलना चाहा तो निष्पक्षता की दुहाई देते हुए उन्होंने मना कर दिया जबकि वन नेशन वन इलेक्शन के सरकारी मसौदे पर विचार के लिए बने आयोग से इस विवादित मुद्दे पर चर्चा करने को वे सहर्ष तैयार हो गए थे। बाद में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसे सांवैधानिक रूप से गलत बताया तो वे पीछे हट गए।
कोर्ट की मानहानि का केस कंटेप्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट 1971 के तहत चलता है जिसमें कोर्ट के आदेशों स्टे या उसको दिए वचन यानी शपथ पत्र का जानबूझकर उल्लंघन, उसकी गरिमा अधिकार या न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना, धमकी देना और अपमान करना शामिल है। अपवाद के तौर पर देखा जाए तो न्यायिक फैसलों और प्रशासनिक कार्यों की स्वस्थ यानी सकारात्मक आलोचना, निष्पक्ष विश्लेषण और संविधान समाज व जनहित में सत्य तथ्य और प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर समीक्षा की जा सकती है। *सबसे अधिक आलोचना सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर से जुड़े फ़ैसले को लेकर हो रही है। इस मामले में चुनाव आयोग सरकार के पक्ष में झुका नज़र आता रहा लेकिन कोर्ट ने उसको फ्री हैंड दे दिया। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में जब सरकार ने चीफ़ जस्टिस को बाहर कर एक केबिनेट मिनिस्टर को चयन समिति में शामिल किया तो भी सुप्रीम कोर्ट ने उस पर तत्काल रोक नहीं लगाई और सरकार को मनमानी का मौका मिल गया। चुनाव आयोग ने एसआईआर में अब तक 13 करोड़ असली नक़ली लोगों के नाम विभिन्न कारणों से वोटर लिस्ट से काट दिए हैं, इस दौरान महाराष्ट्र बिहार बंगाल और दिल्ली में चुनाव भी हो गए लेकिन कोर्ट ने कुछ ठोस एक्शन नहीं किया। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर 27 लाख लोग बंगाल में एसआईआर के कारण इस बार वोट नहीं डाल पाए तो क्या हुआ अगली बार डाल देंगे। यह कितनी ग़ैर जिम्मेदार और लापरवाही की बात थी? महाराष्ट्र में शिवसेना के विधायक तोड़कर उद्धव ठाकरे सरकार गिराकर शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनाई गई लेकिन कोर्ट ने ठोस और समय पर सख़्त कार्रवाई नहीं की। नतीजा यह हुआ उस विवादित सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया लेकिन विधानसभा अध्यक्ष को विधायकों की अयोग्यता तय करने को असीमित समय मिलने से कोर्ट का प्रभावी फैसला नहीं आया। बंगाल में टीएमसी को अवैध तरीके से तोड़ा गया, उसके सांसदों विधायकों पर हमले होते रहे उसके खाते सीज़ किए गए लेकिन कोर्ट ममता बनर्जी को राहत देने के नाम पर चुप्पी साधे रहा। ज़मानत नियम और जेल अपवाद बताने वाले कोर्ट ने पांच साल से उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देकर अपने ही नियम कथन और परंपरा को तोड़ दिया। अदालत ने कश्मीर से धारा 370 हटाने धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाले सी ए ए और प्रस्तावित वक्फ अधिनियम के विवादित प्रावधान पर रोक न लगाकर एक बड़े वर्ग को बुरी तरह निराश किया है। लव जेहाद धर्म परिवर्तन और एंटी रोमियो जैसे विवादित कानूनों को कोर्ट ने बार बार चुनौती देने पर भी स्थायी निषेध आज्ञा जारी नहीं की। कोर्ट ने बहुत ध्वंस होने के बाद किसी भी अपराध के आरोपी के घर दुकान या संस्थान पर अवैध रूप से बीजेपी सरकारों द्वारा चलाए जा रहे बुलडोज़र पर रोक तो लगाई लेकिन इस पर अमल नहीं होने पर कोई कोर्ट कंटेंप्ट की कार्यवाही नहीं की। ऐसे ही फ़र्ज़ी एंकाउंटर हाफ एनकाउंटर और गौ मांस के नाम पर आएदिन हो रहे मॉब लिंचिंग के मामलों पर कोर्ट ने पहले तो कोई सख़्त आदेश जारी नहीं किया और जब ऐसा किया तो उस पर कार्यवाही सुनिश्चित नहीं हो ऐसी कोई पुख़्ता व्यवस्था नहीं की। यहां तक कि यूपी सरकार के बिना कानून ही आंदोलन के दौरान सार्वजिनक संपत्तियों के नुकसान के हर्जाना वसूलने के मामले में भी कोर्ट ने कोई ठोस कार्यवाही नहीं करके केवल ऐसा कानून बनाने की सलाह देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। सबसे चर्चित मामला इलेक्टोरल बॉन्ड का था जिसको सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तो ठहराया लेकिन उसकी सबसे बड़ी लाभार्थी सत्ताधारी बीजेपी होने के बावजूद उन बॉन्ड से वसूल हज़ारो करोड़ की रकम वापस नहीं कराई। पीएम केयर फंड पर भी कोर्ट नरम रुख़ अपनाता नज़र आया। इतना ही नहीं अयोध्या में राम मंदिर बनाने का कोर्ट का फ़ैसला आस्था के आधार पर अधिक माना गया जबकि कोर्ट के ही अनुसार मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाने का कोई प्रमाण नहीं मिला था। अपने ही स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले किसी कार सेवक को कोर्ट ने सज़ा नहीं दी। सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटाकर कट्टरपंथी तत्वों के विरोध के सामने कोर्ट फिर से अपने ही फैसले की समीक्षा को तैयार हो गया। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद कोर्ट रूढ़िवादी तत्वों के दबाव में उनकी परस्पर शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने को तैयार नहीं हुआ। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कहीं भी उल्लेख नहीं होने के बावजूद कोर्ट ने सरकार द्वारा दिए गए ई डब्ल्यू एस के 10 प्रतिशत रिजर्वेशन को आश्चर्यजनक रूप से क्लीन चिट दे दी। जबकि कई राज्य सरकारों के धर्म के आधार पर दिए गए अल्पसंख्यकों के आरक्षण को वह असंवैधानिक बताकर बार बार निरस्त करता रहा है। ऐसे ही विवादित फैसले में कोर्ट ने बिना कोटा पूरा हुए ही एस सी एस टी के आरक्षण में उप वर्गीकरण की इजाज़त दे दी।* ऐसे फैसलों की सूची काफ़ी लंबी है लेकिन यहां सबका उल्लेख नहीं किया जा सकता। कोर्ट को चाहिए वह इस बात पर भी विचार करे कि वह संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह है, क्या उसके फ़ैसले इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतर रहे हैं?