Monday, 19 October 2026

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुसार चले...

*सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ईश्वरीय वाणी नहीं हैं, उनकी भी स्वस्थ आलोचना हो सकती है!*
         *इक़बाल हिंदुस्तानी*
      सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए हाल ही में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा धमका नहीं सकता। बेशक सुप्रीम कोर्ट को इससे बचाने के लिये ही कोर्ट की मानहानि का मुकदमा चलाने का विशेष अधिकर मिला हुआ है। लेकिन उसके फैसलों की स्वस्थ आलोचना करने का अधिकार संविधान ने नागरिकों को दिया है। उधर वरिष्ठ वकील श्री कपिल सिब्बल ने कहा है “मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाकर थक गया हूं। मैं अपनी बात कह रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं है।” इससे पहले एक और सीनियर एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण यह आरोप लगा चुके हैं कि ऐसा लगता है कि सबसे बड़ी अदालत के कई जज सरकार के दबाव में फैसले दे रहे हैं। उनका दावा था कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मोदी सरकार ने अनेक न्यायाधीशों और उनके निकटवर्ती संबंधियों की गोपनीय जांच कराकर उनकी कुछ संवेदनशील जानकारी जुटाकर अपने मन माफिक फैसले लेने का एक अनैतिक मैकेनिज्म विकसित कर लिया है? इन गंभीर आरोपों की न तो आज तक जांच हुई और न ही किसी स्तर पर पुष्टि हुई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय से एक के बाद एक आ रहे कुछ बेंचों और कुछ खास जजो के सरकार समर्थक अधिकांश फैसलों ने सिविल सोसायटी के इस तरह के संदेह को और गहरा ज़रूर कर दिया है। अगर जजों की बात याद करें तो 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने जस्टिस चेलामेश्वर के आवास पर एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। जजों  के आरोपों के अनुसार यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार था कि सिटिंग जजों ने सार्वजनिक रूप से उस समय के मुख्य न्यायाधीश  दीपक मिश्रा के प्रशासनिक कामकाज पर चिंता जताई थी। इन जजों का कहना था “जब तक इस संस्था यानी सर्वोच्च न्यायालय को सुरक्षित नहीं रखा जाता और यह अपना संतुलन बनाए नहीं रखती, देश में लोकतंत्र नहीं बच पाएगा। सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।” चारों जजों ने कहा था कि उन्होंने सीजेआई से मुलाकात कर और पत्र लिखकर भी ये समस्याएँ बताईं, लेकिन उनके प्रयास विफल रहे। इसलिए वे राष्ट्र के सामने यह बात रखने को मजबूर हुए, ताकि भविष्य में कोई यह न कहे कि उन्होंने संस्था की रक्षा नहीं की।
      "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए" मूल रूप से यह कथन लॉर्ड हेवर्ट का है। वे इंग्लैंड के लॉर्ड चीफ जस्टिस थे।भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सिद्धांत को अपनाया है। 7 मई 1997 को सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट मीटिंग में इसी सिद्धांत को न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्स्थापना के रूप में अपनाया गया था। उस समय जस्टिस जे.एस. वर्मा भारत के चीफ जस्टिस थे। इस दस्तावेज के पहले बिंदु में ही यही सिद्धांत शामिल है। कहने का अभिप्राय यह है कि 2014 के बाद से सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश फैसलों को इस कसौटी पर परखा जाए तो वे सरकार की तरफ़ झुके नज़र आते हैं। उन फैसलों में न्याय होता दिखाई नहीं पड़ता। यहां यह स्पष्ट करना भी मुनासिब होगा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में सुप्रीम कोर्ट और उसके माननीय न्यायाधीशों का सम्मान करना और उनके दिए फैसलों से असहमति रखना दोनों अलग अलग बात हैं। पिछले दिनों जब विपक्षी दलों ने अपनी बात रखने को चीफ़ जस्टिस से मिलना चाहा तो निष्पक्षता की दुहाई देते हुए उन्होंने मना कर दिया जबकि वन नेशन वन इलेक्शन के सरकारी मसौदे पर विचार के लिए बने आयोग से इस विवादित मुद्दे पर चर्चा करने को वे सहर्ष तैयार हो गए थे। बाद में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसे सांवैधानिक रूप से गलत बताया तो वे पीछे हट गए।
        कोर्ट की मानहानि का केस कंटेप्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट 1971 के तहत चलता है जिसमें कोर्ट के आदेशों स्टे या उसको दिए वचन यानी शपथ पत्र का जानबूझकर उल्लंघन, उसकी गरिमा अधिकार या न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना, धमकी देना और अपमान करना शामिल है। अपवाद के तौर पर देखा जाए तो न्यायिक फैसलों और प्रशासनिक कार्यों की स्वस्थ यानी सकारात्मक आलोचना, निष्पक्ष विश्लेषण और संविधान समाज व जनहित में सत्य तथ्य और प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर समीक्षा की जा सकती है। *सबसे अधिक आलोचना सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर से जुड़े फ़ैसले को लेकर हो रही है। इस मामले में चुनाव आयोग सरकार के पक्ष में झुका नज़र आता रहा लेकिन कोर्ट ने उसको फ्री हैंड दे दिया। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में जब सरकार ने चीफ़ जस्टिस को बाहर कर एक केबिनेट मिनिस्टर को चयन समिति में शामिल किया तो भी सुप्रीम कोर्ट ने उस पर तत्काल रोक नहीं लगाई और सरकार को मनमानी का मौका मिल गया। चुनाव आयोग ने एसआईआर में अब तक 13 करोड़ असली नक़ली लोगों के नाम विभिन्न कारणों से वोटर लिस्ट से काट दिए हैं, इस दौरान महाराष्ट्र बिहार बंगाल और दिल्ली में चुनाव भी हो गए लेकिन कोर्ट ने कुछ ठोस एक्शन नहीं किया। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर 27 लाख लोग बंगाल में एसआईआर के कारण इस बार वोट नहीं डाल पाए तो क्या हुआ अगली बार डाल देंगे। यह कितनी ग़ैर जिम्मेदार और लापरवाही की बात थी? महाराष्ट्र में शिवसेना के विधायक तोड़कर उद्धव ठाकरे सरकार गिराकर शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनाई गई लेकिन कोर्ट ने ठोस और समय पर सख़्त कार्रवाई नहीं की। नतीजा यह हुआ उस विवादित सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया लेकिन  विधानसभा अध्यक्ष को विधायकों की अयोग्यता तय करने को असीमित समय मिलने से कोर्ट का प्रभावी फैसला नहीं आया। बंगाल में टीएमसी को अवैध तरीके से तोड़ा गया, उसके सांसदों विधायकों पर हमले होते रहे उसके खाते सीज़ किए गए लेकिन कोर्ट ममता बनर्जी को राहत देने के नाम पर चुप्पी साधे रहा। ज़मानत नियम और जेल अपवाद बताने वाले कोर्ट ने पांच साल से उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देकर अपने ही नियम कथन और परंपरा को तोड़ दिया। अदालत ने कश्मीर से धारा 370 हटाने धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाले सी ए ए और प्रस्तावित वक्फ अधिनियम के विवादित प्रावधान पर रोक न लगाकर एक बड़े वर्ग को बुरी तरह निराश किया है। लव जेहाद धर्म परिवर्तन और एंटी रोमियो जैसे विवादित कानूनों को कोर्ट ने बार बार चुनौती देने पर भी स्थायी निषेध आज्ञा जारी नहीं की। कोर्ट ने बहुत ध्वंस होने के बाद किसी भी अपराध के आरोपी के घर दुकान या संस्थान पर अवैध रूप से बीजेपी सरकारों द्वारा चलाए जा रहे बुलडोज़र पर रोक तो लगाई लेकिन इस पर अमल नहीं होने पर कोई कोर्ट कंटेंप्ट की कार्यवाही नहीं की। ऐसे ही फ़र्ज़ी एंकाउंटर हाफ एनकाउंटर और गौ मांस के नाम पर आएदिन हो रहे मॉब लिंचिंग के मामलों पर कोर्ट ने पहले तो कोई सख़्त आदेश जारी नहीं किया और जब ऐसा किया तो उस पर कार्यवाही सुनिश्चित नहीं हो ऐसी कोई पुख़्ता व्यवस्था नहीं की। यहां तक कि यूपी सरकार के बिना कानून ही आंदोलन के दौरान सार्वजिनक संपत्तियों के नुकसान के हर्जाना वसूलने के मामले में भी कोर्ट ने कोई ठोस कार्यवाही नहीं करके केवल ऐसा कानून बनाने की सलाह देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। सबसे चर्चित मामला इलेक्टोरल बॉन्ड का था जिसको सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तो ठहराया लेकिन उसकी सबसे बड़ी लाभार्थी सत्ताधारी बीजेपी होने के बावजूद उन बॉन्ड से वसूल हज़ारो करोड़ की रकम वापस नहीं कराई। पीएम केयर फंड पर भी कोर्ट नरम रुख़ अपनाता नज़र आया। इतना ही नहीं अयोध्या में राम मंदिर बनाने का कोर्ट का फ़ैसला आस्था के आधार पर अधिक माना गया जबकि कोर्ट के ही अनुसार मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाने का कोई प्रमाण नहीं मिला था। अपने ही स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले किसी कार सेवक को कोर्ट ने सज़ा नहीं दी। सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटाकर कट्टरपंथी तत्वों के विरोध के सामने कोर्ट फिर से अपने ही फैसले की समीक्षा को तैयार हो गया। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद कोर्ट रूढ़िवादी तत्वों के दबाव में उनकी परस्पर शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने को तैयार नहीं हुआ। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कहीं भी उल्लेख नहीं होने के बावजूद कोर्ट ने सरकार द्वारा दिए गए ई डब्ल्यू एस के 10 प्रतिशत रिजर्वेशन को आश्चर्यजनक रूप से क्लीन चिट दे दी। जबकि कई राज्य सरकारों के धर्म के आधार पर दिए गए अल्पसंख्यकों के आरक्षण को वह असंवैधानिक बताकर बार बार निरस्त करता रहा है। ऐसे ही विवादित फैसले में कोर्ट ने बिना कोटा पूरा हुए ही एस सी एस टी के आरक्षण में उप वर्गीकरण की इजाज़त दे दी।* ऐसे फैसलों की सूची काफ़ी लंबी है लेकिन यहां सबका उल्लेख नहीं किया जा सकता। कोर्ट को चाहिए वह इस बात पर भी विचार करे कि वह संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह है, क्या उसके फ़ैसले इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतर रहे हैं?

Saturday, 17 October 2026

चिंगारी के 40 साल

*चिंगारी: कागज़ के पन्नो से मोबाइल की स्क्रीन तक विचारधारा की एक लड़ाई!*
*0 दुनिया में हमेशा से दो वर्ग रहे हैं। एक आम आदमी एक खास आदमी। चिंगारी की विचारधारा पीड़ित आम आदमी के पक्ष में रही है। यह लड़ाई चिंगारी दैनिक होने के बाद 40 साल से लगातार लड़ता चला आ रहा है। हालांकि उसने गोदी मीडिया के खिलाफ़ यह दुस्साहस करके इस उसूली लड़ाई की भारी कीमत चुकाई है लेकिन अखबार के पन्नो से शुरू करके आज मोबाइल की स्क्रीन तक आते आते भी उसने तकनीक तो बदली लेकिन सच के साथ रहने का मिज़ाज नहीं बदला। आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। अख़बार भी इस अस्तित्व के संघर्ष से बचे हुए नहीं हैं लेकिन यूपी के बिजनौर जैसे छोटे ज़िले से हिंदी अख़बार चिंगारी सांध्य दैनिक ने ऐसे गलाकाट दौर में भी अपनी विश्वसनीयता, सत्यता और जीवटता को बचाए रखा है।*  
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
              चिंगारी सिर्फ़ एक अख़बार का नाम ही नहीं है बल्कि यह एक विचारधारा है, मिशन है और सेवा का अभियान है। यह सबके हित में सोचता है। सबकी बात लिखता है और सबकी ख़बर लेता और देता है। यह धर्म जाति और छोटे बड़े के नाम पर फर्क नहीं करता। यह ज़ालिम और मजलूम की लड़ाई में कमज़ोर का साथ देता है। यह विज्ञापन के लिए खबरों का सौदा नहीं करता। यह उसूलों के लिए कीमत चुकाने को हर समय तैयार रहता है। यह डरता नहीं। यह झुकता नहीं। यह सच कहने से रुकता नहीं। कलम के सिपाही, जनवादी विचारों के धनी और समाजवाद व निष्पक्षता के मसीहा स्व. बाबू सिंह चौहान साहब ने जब चिंगारी का प्रकाशन साप्ताहिक अख़बार के रूप में आज से 76 साल पहले शुरू किया था तो शायद सोचा भी नहीं होगा कि एक ऐसा गोदी मीडिया फेक न्यूज और झूठे सियासी नैरेटिव का पूंजीवादी बेशर्म और अनैतिक दौर भी आएगा जहां सत्य, सिद्धांत और न्यायवादी होना दंड का भागी होना तथा झूठ फरेब और नफ़रत की पत्रकारिता करना सम्मान उन्नति तथा दौलत बरसने का रास्ता बन जायेगा। वैसे तो चिंगारी का प्रकाशन 1950 में ही शुरू हो गया था लेकिन 25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। आज चिंगारी के संपादक प्रखर वक्ता और दक्ष संचालक श्री सूर्यमणि रघुवंशी भी उसी दौरान अपनी पढ़ाई पूरी करके डेस्क पर संपादन का काम संभालना शुरू कर रहे थे। 
       शुरू में बड़े भाई साहब और उस समय बिजनौर टाइम्स के सहयोगी संपादक श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादक की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद मिलनसार इंसान हंसमुख व्यक्तित्व के धनी और ज़मीन से जुड़े श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी। एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अख़बार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अख़बार और चैनल तक इसकी ख़बरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली ख़बरों से अपनी अहम ख़बरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है।
        बिजनौर से निकलकर अब चिंगारी देखते देखते ही उत्तराखंड के साथ ही आसपास के कई सीमावर्ती ज़िलों में भी छाने लगा। कई बार बिजनौर के और कई बार बाहर के बडे़ समाचार पत्र समूहों ने चिंगारी को चुनौती देने के लिये अपना सुबह का अख़बार न चलता देख शाम का अख़बार इस इलाके में प्रकाशित करना चाहा। लेकिन वे नकारात्मक सोच और ईष्या की वजह से कामयाब नहीं हो सके। कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अख़बार लगातार चार दशक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है। चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। आज डिजिटल मीडिया प्रिंट मीडिया के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। हालांकि चिंगारी सहित अनेक अखबारों ने पीडीएफ फॉर्म में अपने डिजिटल वर्जन भी पब्लिश करने शुरू कर दिए हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में चिंगारी न्यूज चैनल वेबसाइट और एप की शक्ल में भी लोगों के लिए सेवाएं धीरे धीरे प्रिंट के साथ साथ उपलब्ध कराने का सफल प्रयास कर रहा है लेकिन यहां उसे एल्गोरिदम और नैरेटिव की लड़ाई में और अधिक संघर्ष करना होगा। आज मीडिया का अधिकांश हिस्सा गोदी मीडिया यानी चाटुकारिता में बदल गया है। रील का ज़माना है, यानी जो ज़्यादा दिखता है वही बिकता है। किसी भी घटना किसी भी समाचार और किसी के भी विचार का केवल कुछ सेकंड या अधिक से अधिक एक दो मिनट का सबसे चर्चित गुस्से वाला गाली वाला सेक्सी वीभत्स रक्तरंजित झूठा आक्रोशित और हिंसक हिस्सा निकालकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है। इससे उसके वीव लाखों करोड़ों में पहुंच जाते हैं। वह लोकप्रिय हो जाता है। कुछ ही पल में सेलिब्रिटी बन जाता है।एकाउंट में कंटेंट का मोटा पेमेंट आ जाता है। यह सब ए आई की मदद से होता है। इसके बाद लोग चाहें या नहीं चाहें यही हिस्सा सबसे ज़्यादा देखा सुना और पढ़ा जाता है। इससे कंटेंट का मूल विचार सिद्धांत और सत्यता कहीं पीछे छूट जाती है। इसके पीछे सत्ता का भी अहम रोल होता है। इसको काउंटर करने के लिए सरकार विरोधी विपक्ष सिविल सोसायटी और बुद्धिजीवी भी ऐसे ही जवाबी ऑडियो वीडियो और टेक्स्ट पर ज़ोर देते हैं। इससे एक बनावटी सियासी और झूठा नैरेटिव लोगों के बीच चल निकलता है जिसका सत्य तथ्य और वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे ही एक दल एक संगठन और कुछ समूहों ने दस लाख से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं जो लगातार इतिहास को तोड़ मरोड़ के अपने एजेंडे के हिसाब से लोगों को परोसते रहते हैं जिससे समाज में फेक न्यूज नफ़रत और बदले की भावना टकराव हिंसा बढ़ रही है। लोग भावुक नादान मासूम भोले और बहुत शरीफ व सीधे हैं तो वे भी ऐसे पोस्ट की क्रॉस चेकिंग नहीं करते जिससे गोदी मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आम आदमी को गुमराह कर रहा है और अपने सियासी एजेंडे चुनावी नैरेटिव तथा घृणा हिंसा व बदले की भावना में उलझा कर जीवन के असली मुद्दों रोटी कपड़ा और मकान आदि से भटका रहा है। ऐसे में चिंगारी जैसे मिशनरी सेक्युलर तथा आम आदमी की आवाज़ उठाने वाले क्षेत्रीय अख़बार की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। चिंगारी की हिम्मत को सलाम और ढेर सारी दुआएं पेश हैं। चिंगारी के नाम एक शेर पेश है...
0 उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।
*नोट लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अखबार के संपादक हैं।*

Sunday, 11 October 2026

300 के लिए 3 खून?

आज का विचार 
*तीन सौ रुपए के लिए तीन खून, समाज में बढ़ रहा कैसा जनून?*
          *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         देहरादून में 300 रुपए दिहाड़ी कम देने पर प्लंबर राजकुमार ने एक परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. रमेश कपूर, पत्नी रजनी कपूर और घरेलू सहायिका शीला को पेचकस से गोदकर मार डाला. आरोपी के मुताबिक, दिहाड़ी 600 रुपए तय हुई थी, लेकिन दंपति सिर्फ 300 रुपए दे रहे थे. इसी पर विवाद आगे बढ़ा था. दूसरी ख़बर बिजनौर ज़िले की है जिसमें मामूली विवाद के बाद तीन लोगों को ट्रेक्टर से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया।
       पूरे देश में रोज़ छोटी छोटी बातों पर ऐसी ही सैंकड़ो हत्याएं हो रही हैं। हालांकि हर जान कीमती है। हर इंसान अपने परिवार के लिए बहुत अहम होता है। हर कोई समाज में अपनी खास भूमिका निभाता है जो कोई दूसरा नहीं निभा सकता। कोई कह सकता है हत्या करना अपराध है और कानून ऐसे लोगों को सज़ा देगा। लेकिन यहां हमारी चिंता दूसरी है। पहले भी मर्डर होते थे लेकिन वे रेयर होते थे। बहुत कम यानी जमीन जायदाद और ज़ेवर के लिए बड़े मामलों या सुपारी लेकर होते थे। समाज क़त्ल को बहुत बुरा समझता था। लोग क़ातिल से नफ़रत करते थे। उससे दूरी बना लेते थे। कई जगह तो हत्यारों का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था। हालांकि अपराध साबित होने पर भी सज़ा देना कोर्ट का काम है लेकिन जघन्य अपराधी के प्रति समाज परिवार और रिश्तेदारों में तिरस्कार नफ़रत और बुरा समझने का भाव उसको उसकी समाज विरोधी हरकत के लिये एहसास कराना होता था। लेकिन अब यह सब रुटीन बात हो गई है।
      हम यह नहीं कह सकते कि हत्या के ऐसे मामलों में कानून अपना काम नहीं करता। बेशक पुलिस वकील और कोर्ट अपना काम आज भी देर सवेर करते ही हैं लेकिन यह भी सच है कि सज़ा मिलने में बहुत लंबा समय लगता है। कई बार जांच ठीक से नहीं होने सबूत मिटाने और गवाहों को डराने धमकाने से आरोप साबित भी नहीं हो पाते। कई बार बड़े और हाईप्रोफाइल मामलों में अभियोज पुलिस और बड़े रसूख वाले लोग हत्या तक के मामलों में पैसे पहुंच और जुगाड़ से जुर्म करके भी बच निकलते हैं जिससे ऐसे ही क्राइम की मंशा रखने वाले निडर होकर हत्या जैसे अपराध बार बार करते हैं।
      समाज में बात बात पर लड़ाई झगड़ा और हमले के जुनून पर भी विचार करना होगा। आख़िर क्या वजह है कि 300 रूपये की दिहाड़ी कम मिलने पर एक प्लंबर तीन लोगों की जान ले लेता है? दरअसल समाज का गरीब अनपढ़ और कमज़ोर तबका बड़े लोगों से पहले ही चिढ़ा रहता है। उसको ईर्ष्या होती है कि इतनी मेहनत करके भी उनके पास ठीक से जीवन गुज़ारने के लायक पैसा नहीं है। दूसरी तरफ़ वह देखता है कुछ लोग खानदानी विरासत नंबर दो की दौलत और बे ईमानी से खूब आमदनी कर रहे हैं। हालांकि सब मामलों में तो ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे केस भी काफ़ी हैं। इसके साथ ही उस मजदूर के दिमाग़ में भरा नफ़रत गुस्सा और बदले की भावना का यह बारूद उस समय चिंगारी से ट्रिगर हो जाता है जब कोई उसे उसकी वाजिब जायज़ और कानूनी मजदूरी तय करके भी पूरी नहीं देता। तब वह आपा खो देता है। उसको यह भी लगता है कि इतने बड़े लोगों की शिकायत पुलिस प्रशासन और शासन भी नहीं सुनेगा। कोर्ट में वह वकील की फीस और लंबा टाइम नहीं लगा पाएगा। समाज भी उसके साथ बड़े वीआईपी आदमी के खिलाफ़ खड़ा नहीं होगा। हत्या और हमलों के मामलों में सबसे बड़ी वजह सामने वाले की तीखी ज़बान भी बनती है, अगर वही बात प्यार और नरमी से कही जाए तो छोटे लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है वे पैसे का नुकसान झेल भी जाते हैं लेकिन अपमान धमकी और बदतमीज़ी से बात और बढ़ जाती है। लेकिन जुर्म तो जुर्म है उसे किसी भी हाल में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क़तील शिफ़ाई का शेर है...
*हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले,*
*कीमतें देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।*

हिंदुत्ववादी राज में हिंदुओं का भला?

*क्या बीजेपी के "हिंदुत्ववादी" राज से हिंदुओं का कुछ वास्तविक भला हुआ है?*
                     *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         क्या अब तक बीजेपी समर्थक रहे हिंदुओं का धीमा ही सही मगर बीजेपी से मोहभंग हो रहा है? क्या हिन्दुत्ववादी राज से उनका कुछ वास्तविक भला नहीं हुआ है जिससे ब्रांड मोदी तेज़ी से अपनी चमक खो रहा है? क्या आरएसएस का हिन्दुओं के लिए लाया गया धार्मिक सांस्कृतिक और मानसिक तुष्टीकरण का अतीतजीवी मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक मॉडल आर्थिक असफलताएं बढ़ते जाने से नाकाम होने लगा है? यही वजह है कि बीजेपी को एसआईआर के बहाने चुनाव आयोग से मिलकर वोट चोरी के विपक्ष के आरोप झेलने पड़ रहे हैं और उसका विरोध बढ़ता ही जा रहा है। बीजेपी के राज में बरसों के संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के विवादित फैसले से राम मंदिर बना लेकिन इसके बाद हुए 2024 के आम चुनाव में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। इतना ही नहीं अयोध्या वाले राज्य यूपी में उसकी संसदीय सीट 62 से घटकर 33 रह गई। इसका मतलब इस काम से हिंदू खुश नहीं हुए? बीजेपी सरकार ने कश्मीर से राज्य को विशेष अधिकार देने वाली धारा 370 हटा दी जबकि पूर्वोत्तर व पर्वतीय कई राज्यों में ऐसी ही धाराएं आज भी लागू हैं, तो इससे हिंदू समाज को क्या मिला? ऐसे ही वह अपने पुराने एजेंडे के तीसरे अहम काम कॉमन सिविल कोड को एक एक कर सभी बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लागू करेगी तो इससे हिंदुओं को क्या लाभ होगा? मोदी सरकार ने सीएए पास कर सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की व्यवस्था कर दी इससे कट्टर हिंदू धार्मिक आधार पर कुछ खुश हो सकते हैं लेकिन ऐसा तो कांवड़ वालों पर फूल बरसाकर, उनकी सरकारी मशीनरी से सेवा कराकर, आएदिन धार्मिक शोभायात्रा निकालकर, उनमें शामिल उद्दंड युवाओं से मुस्लिम बस्ती में उनके घरों मस्जिदों और मदरसों के सामने आपत्तिजनक नारे लगवाकर उनको अपमानित कराकर उनके यहां लगे इस्लामी झंडो को उतारकर भगवा झंडे फहराकर, कोई भी झूठा सच्चा आरोप लगते ही उनके घरों दुकानों और इबादतगाह पर बुलडोज़र चलवाकर, सावन मास में मांस का कारोबार बंद कर, किसी भी मांस को गोमांस बताकर उनको पीटने, मॉब लिंचिंग करने और जेल भेजने या यूपी में पाँव में गोली मारकर हाफ़ एनकाउंटर करने सड़क या सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ पढ़ने से रोकने उनके ख़िलाफ़ संघ और बीजेपी नेताओं के ज़हरीले बयान जारी करने और मुस्लिम हिस्ट्रीशीटर या हत्या बलात्कार के मामले में पीड़ित पक्ष ग़ैर मुस्लिम होने पर उनका फर्ज़ी एनकाउंटर करने, लव जेहाद लैंड जेहाद और थूक जेहाद के नाम पर उनको फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर जेल भेजने फिर उमर खालिद की तरह लंबे समय तक ज़मानत नहीं होने देने, सपा नेता आज़म ख़ान, जौहर यूनिवर्सिटी और गोरखपुर अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों को मरने से बचाने वाले डॉ कफ़ील खान को ही उल्टा जेल भेज देने से हिंदुओं को क्या फायदा हुआ है? क्या यह पर उत्पीड़न सुख का मामला है जिसमें हिंदुओं को केवल मुस्लिम समाज के साथ किए जा रहे पक्षपात से मानसिक खुशी मिल रही है जिसमें हिंदुओं का आर्थिक नुकसान भी हो तो वे झेल रहे हैं? क्या हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के झूठे प्रोपेगैंडा से ऐसा माइंड सेट बना दिया गया है जिससे उसको वही ठीक और अपने लिए बेहतर लगता है जो बीजेपी सरकारें उनके खिलाफ़ भी कर रही हैं?
           एक सर्वे के अनुसार देश में 8 करोड़ से अधिक युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं न ही पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई ट्रेनिंग कर रहे हैं और न ही नौकरी तलाश कर रहे हैं। इन्होंने एक तरह से जॉब मिलने की उम्मीद भी छोड़ दी है। एनएसएसओ 2017-18 के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षित बेरोजगारी बढ़कर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह पिछले 45 साल की सबसे अधिक बेरोजगारी बताई जाती है। हालांकि 2025 में पी एल एफ एस के आंकड़ों के अनुसार इसमें कुछ सुधार देखा गया जिससे यह आंकड़ा घटकर 11 प्रतिशत तक आ गया। लेकिन इस मामले में सिविल सोसायटी निष्पक्ष एजेंसियां और वर्ल्ड रैंकिंग में भारत सरकार के विभिन्न आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठने लगे हैं। इसके साथ ही विभिन्न न्यूटल एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद देश और विभिन्न राज्यों में अपराध महंगाई भुखमरी और भ्रष्टाचार का ग्राफ़ भी तेज़ी से बढ़ा है। जबकि सही रिपोर्ट नहीं होने से कई राज्यों में सच छिपाया भी जाता है।
       2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदुओं की आबादी लगभग 80 प्रतिशत थी। ज़ाहिर बात है अगर बेरोजगारी महंगाई अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो इसका असर बड़ी आबादी पर उसके अनुपात में अधिक ही होगा। देश में सरकारी शिक्षा स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था की हालत भी अच्छी नहीं है जिससे सभी भारतीय परेशान हैं। भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब सत्ताधारी नेताओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कहने पर भी थाने तहसील में बिना रिश्वत के कानूनी काम भी नहीं होते। सरकारी ठेकों में कमीशन पहले से बढ़ते जाने के आरोप ठेकेदार गाहे ब गाहे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सुधार नहीं है। नए बने रोड हाइवे एक्सप्रेस वे और पुल आएदिन गिरते रहते हैं। सड़क दुर्घटनाये बढ़ती जा रही हैं। 80 करोड़ से अधिक भारतीय सरकारी राशन में मिलने वाले फ्री पांच किलो अनाज पर गुज़ारा कर रहे हैं। किसानों की आय नहीं बढ़ने से वे रोज़ आत्महत्या करते हैं। कहने का मतलब यह है जीडीपी के आंकड़े अर्थव्यवस्था का आकार और विश्वगुरु बनने के सरकारी दावों के बावजूद आम भारतीय परेशान है जिसमें हिंदुओं की संख्या ही सबसे अधिक है। इतना ही नहीं दुनिया में प्रतिष्ठित विश्वसनीय और अपनी उच्चतम साख रखने वाली इंटरनेशनल एजेंसियों और देशों के वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स (157/180), ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (130/193), करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (91/180), ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (129/148), एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (176), ग्लोबल पीस इंडेक्स (116/163), डेमोक्रेसी/फ्रीडम इंडिसेज, वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट और रुल ऑफ लॉ इंडेक्स में भारत 2014 के बाद से काफ़ी नीचे जा चुका है। जबकि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, सैन्य क्षमता, और एसडीजी इंडेक्स में हमारे देश ने पहले से कुछ बेहतर रैंक हासिल की है।इसके साथ ही नोटबंदी लॉकडाउन जीएसटी से आर्थिक नुकसान और कोरोना से जो लाखों मौतें हुईं उसका अधिक शिकार कौन हुआ? बिना किसी रिसर्च विचार विमर्श और 2023 से पहले बनी कारों के लिए भी 20 प्रतिशत एथेनॉल पेट्रोल में मिलाने से किस वर्ग का अधिक नुकसान हो रहा है? शेयर मार्केट और डालर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिरने से कौन लोग लाखों करोड़ का घाटा संख्या में अधिक झेल रहे हैं? 
     सवाल यह है कि बीजेपी जिन हिंदुओं की भलाई का दावा हिंदुत्ववादी अपने राज में करती है, उससे आम हिंदू को क्या मिला है? क्या समुदाय के तौर पर हिंदुओं का ग़ैर हिंदुओं के मुकाबले कोई विशेष अतिरिक्त और उल्लेखनीय भला हुआ है? विडंबना तो यह है कि कई क्षेत्रों में आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने के आंकड़े देखे जाएं तो उनमें ग़ैर हिंदू कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं से भी आगे हैं। मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना में मुसलमान लाभार्थी वर्ग के आंकड़े उनकी आबादी से अधिक बताए जाते हैं। यही हाल हर माह मिलने वाले निशुल्क पांच किलो सरकारी अनाज और विधवा व वृद्धा पेंशन का बताया जाता है लेकिन इसका कोई ठोस आंकड़ा सरकार ने दावों के बावजूद हाल फिलहाल उपलब्ध नहीं कराया है लेकिन ज़मीन पर देखें तो इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इन सरकारी सुविधाओं जिनमें हर घर जल , आयुष्मान और पीएम किसान योजना का लाभ कमोबेश सबको मिल ही रहा है। इसके विपरीत अधिक शिक्षा उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में आगे होने से हिंदू समुदाय को अपेक्षित जॉब उपलब्ध नहीं होने से कम मिल रहे हैं जबकि अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिम समाज में दस्तकार मजदूर छोटे बड़े पेशे जैसे राज मिस्त्री पेंटर कारपेंटर नाई हलवाई रिक्शाचालक टैक्सी ड्राइवर मैकेनिक वेल्डर रसोइया हेल्पर चपरासी हॉकर प्लंबर इलेक्ट्रिशियन और सब्ज़ी फल विक्रेता का कोई भी काम नौकरी और कारीगरी करके अपना पेट हिंदुओं के अनुपात में अधिक आसानी से पालते मिल जायेंगे। इससे बीजेपी समर्थक हिंदुओं को निराशा होना स्वाभाविक है। लेकिन सौ टके का सवाल यह है जब तक निष्पक्ष और लेवल प्लेइंग फ़ील्ड पर ईमानदारी से चुनाव नहीं होंगे तब तक बीजेपी एंटी इनकंबेंसी और अपने समर्थक हिंदुओं की नाराज़गी के बाद भी सत्ता से हटेगी कैसे?

Tuesday, 6 October 2026

चालान नहीं हेलमेट

*अच्छा है हेलमेट बांटो अभियान,* 
*एक्सीडेंट में बचेगी लोगों की जान*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              बिजनौर ज़िले में एसपी श्री विश्नोई के निर्देश पर आजकल अच्छा यातायात सुरक्षा अभियान चल रहा है। पहले नियम के अनुसार बिना हेलमेट टू व्हीलर चलाने वालों का 1000 रुपए का चालान काटा जाता था। अब ऐसे लोगों को मौके पर ही 800 रुपए का हेलमेट खरीदने को प्रेरित कर सेफ रवाना किया जा रहा है। यह मांग बहुत दिन से हम जैसे बहुत से पत्रकार, समाजसेवी और सोशल एक्टिविस्ट पुलिस से करते आ रहे थे कि बिना हेलमेट वालों के चालान काटने की बजाए उनको हेलमेट हाथों हाथ खरीदने को कहा जाए, अब ज़िले में पुलिस ने ऐसा अभियान पांच दिन के लिए चलाकर अब तक लगभग 500 हेलमेट जनपद के विभिन्न नगरों कस्बों और गांवों के आसपास चैकिंग प्वाइंट पर वाहन चालक लोगों को उपलब्ध कराए हैं।
          हालांकि यह काम अगर केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा होता तो और भी अच्छा था। लेकिन शासन केवल चालान की रकम बढ़ाकर हर बार यह मानता है कि इससे लोग अधिक जुर्माना देते हुए डरेंगे और यातायात नियमों का पालन करने लगेंगे। लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्टेशन एंड हाइवे के आंकड़े बताते हैं कि वाहनों के कुल 45000 करोड़ के चालान पेंडिंग पड़े हुए हैं। यह इतना बड़ा आंकड़ा है कि शायद किसी छोटे राज्य का कुल वार्षिक बजट इसके बराबर होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लंबित पड़े चालानों की रकम वसूलने को सरकार से कोई नई रणनीति बनाने को कहा था। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर लोग एक से अधिक चालान होने पर भी बेफिक्र होकर गाड़ी चला रहे हैं और बार बार ट्रैफ़िक रूल तोड़ रहे हैं तो उनके चालान की रकम उनके बिजली के बिल में जोड़कर भेजी जानी चाहिए और अगर वे फिर भी बिल चालान की राशि सहित जमा नहीं करते तो उनकी बिजली काट देनी चाहिए। लेकिन सरकार इस प्रस्ताव पर राज़ी नहीं थी तो उसने भविष्य में ऐसे वाहनों को सीज़ करने का शपथ पत्र कोर्ट में दिया जिनके चालान कटने के बाद लंबे समय से पेंडिंग पड़े हुए हैं।
       हमारे देश समाज और नागरिकों की समझ अजीब है। इनको अपनी जान सुरक्षित रखने के लिए लगाए जाने वाले हेलमेट के लिए भी चालान का डर दिखाना होता है लेकिन बार बार समझाने और चालान कटने के बाद भी अधिकांश लोग हेलमेट लगाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं। कुछ लोग पुलिस चैकिंग को देखकर हैंडिल पर टंगा हेलमेट लगा लेते हैं और आगे बढ़ते ही फिर से उतार देते हैं। कुछ लोग रास्ता बदलकर निकल जाते हैं । कुछ लोग सौ दो सौ और पांच सौ किमी तक का सफ़र बाइक और कार से दिल्ली मुंबई तक बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के पूरा कर लेते हैं और इन बड़े शहरों में एंट्री लेते हुए यह सोचकर हेलमेट और सीट बेल्ट लगाते हैं कि यहां पुलिस चालान करने में सख़्त है। मतलब जान बचाने की परवाह नहीं पुलिस और चालान के डर से ट्रैफ़िक नियम का पालन करते हैं। बिनजौर एसपी के हेलमेट उपलब्ध कराओ सराहनीय अभियान से लोग जितनी बार पकड़े जाएंगे उनके पास उतने ही हेलमेट जमा होते जाएंगे तो वे चालान और फालतू हेलमेट खरीदने से बचने और दुर्घटना होने पर अपनी जान की सलामती के लिए शायद हेलमेट लगाने की आदत डाल लें, वैसे तो टू व्हीलर पर बैठी दूसरी सवारी और बच्चों को भी हर हाल में हेलमेट लगाना ही चाहिए।
*नहीं है वजह ज़रूरी के जब हो,तब मर जाएँ,*
*उदास लोग हैं, मुमकिन है बे सबब मर जाएँ ।*
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अख़बार के संपादक हैं।

बुजुर्ग बेशकीमती इंसान


*बुज़ुर्ग होते हैं बेशकीमती इंसान, इनकी अनदेखी से होगा नुकसान!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
       एक अक्टूबर को हर साल वृद्ध दिवस मनाया जाता है। इस दिन जितनी अच्छी सच्ची और भावुक बातें मंच से वक्ता बोलते हैं, काश वे वास्तविक जीवन में भी साकार होती तो वृद्धों की ज़िन्दगी कितनी आसान, सुखद और सुंदर होती?सीनियर सिटीजन होने से पहले ही हमें एक पत्रकार के तौर पर बुजुर्गों के प्रोग्राम में जाने का कई बार मौका मिला है। वहां हमने कार्यक्रम की कवरेज के साथ ही कई बार मुख्य वक्ता के रूप में वृद्धों और युवाओं की बात भी रखी। कई बार ऐसे आयोजनों का संचालन करने का अवसर भी मिला। जब हमने निज़ामत के दौरान कुछ भावुक शेर पढ़े तो कई बुजुर्गों की आँखें गीली हो गईं। शायद उनको अपनी व्यथा उन पंक्तियों में सुनने को मिली जो वे बहुत दिन से खुद भुगत रहे थे। कई बार हमने युवा पीढ़ी की तरफ से भी उनका पक्ष रखा, उनकी व्यस्तता और मजबूरियां बयान की जिससे दोनों जेनरेशन के बीच संवाद का एक सेतु बन सके। लेकिन सीनियर सिटीजन को यह दुख सताता ही रहा कि उनके बच्चे उनको उस तरह से ट्रीट क्यों नहीं करते जैसा वे चाहते हैं। 
         काशी के एक वृद्धा आश्रम "अपना घर" से पिछले दिनों एक बड़ी दुखद पीड़ादायक और निराश करने वाली ख़बर आई। पता लगा पिछले साल जिन 55 बुजुर्गों ने इस आस में दम तोड़ा कि उनसे मिलने उनके बच्चे एक दिन ज़रूर आयेंगे। उनके परिवार रिश्तेदार और जानकार कोई नहीं आया। इस समाचार का सबसे अधिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला पक्ष यह है कि जो उंगलियों पर गिनने लायक़ चंद बच्चे या परिवार उन बुजुर्गों के आये भी तो वे मरने के बाद भी मातम करने आंसू बहाने या ग़म में नहीं उनकी ज़मीन जायदाद और बीमा लेने को ज़रूरी औपचारिकता पूरी करने, उनका डीएनए सैंपल लेने और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने को मजबूरी में आए थे।
         यह ख़बर पढ़ने के बाद पूरे दिन हमारे दिमाग़ में हलचल चलती रही। रात में भी यह डरावना घिनौना और कड़वा सच बार बार दस्तक देता रहा कि हमारा समाज कितना स्वार्थी लालची और असंवेदनशील हो गया है। कितने क्रूर बेरहम और मतलबी हैं हम लोग जो उन मातापिता को उम्र बढ़ने पर बोझ समझने लगते हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन हमें जन्म देने से लेकर पालने पोसने पढ़ाने लिखाने और शादी से लेकर रोज़गार दिलाने तक में समर्पित कर दिया। बताते हैं जब कोई मां किसी बच्चे को जन्म देती है तो उसको आम इंसान के मुकाबले प्रसव में सात गुना दर्द होता है। कई मां की जान बच्चे पैदा करते हुए चली जाती है। नौ महीने वह खुद से ज़्यादा बच्चे का पेट में ख़्याल रखती है। उसका मन न भी हो तो भी बच्चे की सेहत के लिए खाती है। बच्चे को जन्म देकर कई साल तक ठीक से सो नहीं पाती। खुद गीले में सोती है बच्चे को आराम से सुलाती है। बच्चा जागता है तो वह भी जागती रहती है। जितनी बार रात को बच्चा उठता है रोता है उतनी बार उसको फीड कराती है, साफ़ करती है और दुलारती है। मां की कुर्बानियां अनगिनत है। 
       ऐसे ही बाप का मामला है। कहते हैं बाप जहां जाना भी पसंद नहीं करता, अपने बच्चों के लिए वहां भी हाथ फैला देता है। वह दिन रात काम करता है और अपने बच्चों को बेहतर जीवन स्तर देता है। उनको उच्च शिक्षा दिलाता है। चाहे इसके लिए कर्ज़ लेना पड़े। जो वह खुद नहीं बना अपने बच्चों को बनाना चाहता है। उनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देता है। उनको उस मकाम तक पहुंचा देता है जहां से खुद छोटा नज़र आता है, हारा हुआ लगता है और कमज़ोर लगता है लेकिन फिर भी खुश होता है। इसलिए बच्चों को चाहिए कभी भी मातापिता दादा दादी नाना नानी और किसी भी बुज़ुर्ग को बोझ नहीं समझें, उनको दूध से भाग जाने वाला जानवर नहीं समझें और साथ ही उनको आर्थिक लाभ नहीं देने वाला बुढ़ापे बीमारी और बुरे वक़्त में बेजान सामान नहीं समझें हमेशा भला करने वाला सलाह देने वाला और पूरे परिवार का संरक्षक बेशकीमती इंसान ही समझें।
*मेरी आंखों का तारा ही मुझे आँखें दिखाता है,*
*सिखाया बोलना जिसको वो चुप रहना सिखाता है।*

Sunday, 27 September 2026

ए सी ट्रेन में सभ्यता

*आज का विचार*
*ट्रेन कोच एसी हो या नॉन एसी, डिस्टर्ब न हो किसी की प्राइवेसी*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               ख़बर है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और कर्नाटक संगीत की गायिका शिवश्री स्कन्दप्रसाद एक ट्रेन के ए सी कोच में सफ़र कर रही थी। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, डिब्बे में सवार लगभग 40 यात्री का ग्रुप में लगातार शोर कर रहे थे। उन्होंने टीटी से अपना कोच बदलने की मांग की लेकिन बर्थ उपलब्ध नहीं होने से यह संभव नहीं हो सका। पांच घंटे के सफ़र के दौरान पहले तो उन्होंने उस यात्री समूह की टीटी से शिकायत की जो कार्ड खेल रहे थे और ज़ोर ज़ोर फिल्मी गाने गा रहे थे। टीटी ने एक बार उनको चुप भी कराया मगर कुछ देर बाद वे फिर से वही हरकतें करने लगे। शिवश्री ने अपनी लंबी पोस्ट में ऐसे लोगों से भविष्य में सफ़र के दौरान दूसरों की प्राइवेसी सुविधा और तकलीफ़ न पहुंचाने और सभ्य व्यवहार की अपील की है।
          शिवश्री की इस शिकायत, समस्या और सलाह को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे साथ वाले दूसरे लोगों को लगे हम एक तमीज़ वाले इंसान हैं। इसे आप सिविक सेंस या कॉमन सेंस भी कह सकते हैं। दरअसल हम लोग शोर अनाधिकार चेष्टा और अनचाही चीज़ों के इतने आदी हो गए हैं कि जब कोई इन अवांछनीय और निजता को ठेस पहुंचाने वाली हरकतों पर आपत्ति करता है तो समाज के बड़े वर्ग को वही आदमी ऐसा लगता है जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आया हो। आपने भी ट्रेन बस या सार्वजनिक स्थानों पर अकसर देखा होगा लोग जो मर्ज़ी चाहे मनमानी करते रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि वे जहां हैं वह जगह केवल उनकी निजी नहीं है। अगर आप सार्वजनिक स्थान पर हैं तो आपका फ़र्ज़ है कि आप साथ वाले या पास वाले लोगों को किसी भी तरह से अपनी किसी भी हरकत से परेशान नहीं करें। मिसाल के तौर पर ज़ोर ज़ोर बोलना, हंसना और मोबाइल पर स्पीकर ऑन कर तेज़ आवाज़ में सर्फिंग करना सभ्य सुसंस्कृत और जिम्मेदार नागरिकों को बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। इसके लिए हेड फ़ोन इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही कॉल पर तेज़ आवाज़ में बात करना भी शालीनता नहीं माना जाता। बेहतर है ऐसे में चैट या एसएमएस से जवाब दें।
       इतना ही नहीं कुछ यात्री डिब्बे में अपने बच्चों को खेलने के लिए छोड़ देते हैं जो बाक़ी मुसाफिरों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। कुछ लोग लगातार हंसी मज़ाक और गाली गलौच के साथ घटिया बहस करते हैं। कुछ यात्री अपने पैर सामने वाले की सीट पर रखते हैं और कुछ ढेर सारा सामान बर्थ पर रख देते हैं। कुछ बिना टिकट और बिना रिजर्वेशन के ही दूसरे की सीट/बर्थ हथिया लेते हैं और ख़ाली करने को कहने पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। कुछ कोच के गेट पर खड़े रहकर ट्रेन से उतरने चढ़ने वालों को जगह ही नहीं देते। कुछ फ़र्श पर कपड़ा बिछाकर सो जाते हैं जिससे बर्थ वाले यात्री इधर उधर जाने में दिक्कत महसूस करते हैं। कुछ तेज़ गंध वाला खाना गुटका या शराब पीने लगते हैं। कुछ पान गुटके की पीक और बीड़ी सिगरेट का धुआं छोड़ते रहते हैं। कुछ दूसरों की फ़ोन स्क्रीन को झांकते हैं और ख़ास तौर पर लेडीज़ को नीचे से ऊपर तक बेशर्मी से घूरते रहते हैं या लाइट बंद होने पर छेड़छाड़ भी कर देते हैं। कुछ देर रात तक भी लाइट बंद नहीं करने देते जिससे दूसरे यात्री ठीक से सो नहीं पाते। कुछ बिना परमिशन सामने वाले की बातचीत में शामिल हो जाते हैं जो सलीके के खिलाफ़ माना जाता है। ऐसी और भी अनेक बातें, हरकतें और घटनाएं यहां गिनाईं जा सकती हैं जिससे साथ सफ़र कर रहे दूसरे यात्री असहज हो जाते हैं लेकिन पता नहीं कब कुछ भारतीय दूसरों की प्राइवेसी नागरिक बोध और सभ्यता को समझेंगे। ऐसे लोगों के लिए शायर कहता है...
*सलीक़ा यूं तो आता है बक़द्र ए ज़र्फ़ इन्सां को,* 
*सलीक़ा जिसको कहते हैं बड़ी मुश्किल से आता है।*