Friday, 19 June 2026

योग दिवस

आज का विचार... हिंदुस्तानी 
*योग धार्मिक नहीं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है!*
              21 जून हर वर्ष योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पूजा पाठ नहीं बल्कि हर देश हर जाति और हर धर्म के मानने वालों के लिए वरदान है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में विभिन्न योग नियमित रूप से करने से न केवल शरीर बल्कि आपका मन भी निरोग और समग्र स्वास्थ्य लाभ होते हैं। योग से इंसान के दिल दिमाग़ को ऑक्सीजन की बेहतर सप्लाई होती है। उसके जिस्म के साथ उसके मन की कैफ़ियत भी बदलने लगती है। टेंशन ब्लड प्रेशर और दिल घबराने की शिकायत कम होने लगती है। योगा करने से पॉजिटिव सोच पैदा होती है। काल्पनिक डर सोच से दूर चले जाते हैं। समझ उदार होने लगती है। 
           संवेदनशील और संयमी व्यवहार भी योग से आने लगता है। समस्याओं से लड़ने की क्षमता और समाज के साथ मिलकर चलने की कला भी योग का बाई प्रोडक्ट माना जाता है।यह प्राचीन भारतीय परंपरा आसन, प्राणायाम, ध्यान और नैतिक अनुशासन पर आधारित है, जो शरीर और मन को संतुलित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे Johns Hopkins, Healthline, NCCIH आदि) के अनुसार शारीरिक लाभ में योग आसनों से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ लचीले बनते हैं और गिरने का खतरा कम होता है। पीठ दर्द, गठिया और जोड़ों की समस्या में राहत कई अध्ययनों में योग को पीठ दर्द और गठिया के लक्षणों को कम करने में प्रभावी पाया गया है। यह रक्तचाप कम करता है, सूजन घटाता है और हृदय रोग के जोखिम को कम करता है।श्वसन, ऊर्जा और चयापचय में सुधार के अनुसार बेहतर सांस लेने से ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ती है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। बेहतर मुद्रा, हड्डियों की मजबूती, नींद की गुणवत्ता में सुधार और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होना भी इसके लाभ हैं। तनाव, चिंता और अवसाद में कमी गहरी सांस और ध्यान से कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है, मन शांत रहता है।
       एकाग्रता, जागरूकता और भावनात्मक संतुलन बच्चों से लेकर वयस्कों तक फोकस बढ़ाता है और आत्म जागरूकता विकसित करता है। समग्र कल्याण के हिसाब से देखें तो नींद बेहतर होती है, मूड अच्छा रहता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
           स्वामी विवेकानंद, बी.के.एस. आयंगर, पट्टाभि जोइस जैसे योग गुरुओं ने इसे पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।संयुक्त राष्ट्र की भूमिका देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। इसे 175+ देशों ने समर्थन दिया। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे देशों में भी स्कूल-कॉलेज में योग आ चुका है। नियमित अभ्यास से ही पूर्ण लाभ मिलता है। लेकिन पहले से बीमार दर्द के शिकार और सीनियर सिटीजन को ट्रेनर से जानकारी करके ही योग करना चाहिए।
*ज़ाहिदे तंग नज़र ने मुझे काफिर समझा ।* *और काफिर ये समझते हैं मुसलमान हूँ मैं ।।*

यूसुफ़ पठान का दलबदल

*एक अनैतिक समाज में सिर्फ़ सेलिब्रिटी ही ईमानदार कैसे होगा ?*
             *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                      बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गई। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए?क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था? 
        यहां यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है? यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बे ईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताख पर रख दिया है।
       यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही है और इंसान हिंदू हो या मुसलमान कभी भी बे ईमान हो ही सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये ललचा ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलाट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है। विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद कल मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा। 
            यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है उनको पुलिस ईडी सीबीआई इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो। वह भी इसी देश इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बे ईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है। यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है अब उनका दलबदल भी उसी डर लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों सांसदों को क्या बे ईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है? यह भी हो सकता है वे आज़म ख़ान उमर खालिद नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के मुख्याओं का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो अगर कोई इंसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा। 
*"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"*

Sunday, 14 June 2026

रक्तदान दिवस

*करनी हैं बातें दो चार... हिंदुस्तानी*
*रक्तदान करने वाले हैं फरिश्ते,*
*जो खून देकर बनाते हैं नए रिश्ते*
       खून का एक रिश्ता पैदाइशी होता है, दूसरा कुछ लोग फ़रिश्ता बनकर ज़रूरत मंद लोगों को खून देकर बनाते हैं। पहला रिश्ता खुद बन जाता है तो दूसरा इंसान अपनी मर्ज़ी से बनाता है। आज के दौर में जब आदमी पैसे प्रॉपर्टी या सेक्स के लिये किसी की जान लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है, ऐसे में कुछ इंसानों का बिना किसी स्वार्थ के रक्तदान करना और किसी अंजान इंसान की जान बचाना फरिश्ते से कुछ कम नहीं है।
      सरकारी ब्लड बैंक की बात करें तो ज़िले में उसकी क्षमता 350 यूनिट है। लेकिन वहां इस समय 119 यूनिट ही खून उपलब्ध है। उनमें भी केवल 79 यूनिट की जांच हुई है जो तत्काल किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है। इसके बदले पैसा नहीं किसी भी ग्रुप का उतने ही यूनिट खून देना होता है। आंकड़े बताते हैं खून की मांग हमेशा उपलब्ध खून से ज़्यादा बनी रहती है। ज़िले में 80 बच्चे थैलीसीमिया रोग के शिकार हैं। जिनको महीने में दो बार अनिवार्य रूप से ब्लड चढ़ाना होता है। इसके बदले वापस खून देने की कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा एक्सीडेंट ऑपरेशन और एनीमिया के मरीजों को भी समय समय पर खून देना होता है। इस ब्लड बैंक में सबसे कम मिलने वाला ए नेगेटिव,ओ नेगेटिव, और एबी नेगेटिव खून सिर्फ एक से तीन यूनिट ही मौजूद है।
      सरकारी स्तर पर जो लोग ब्लड बैंक का प्रबंध करते हैं उनको उसका बाकायदा वेतन मिलता है। सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस बड़ी मानव आवश्यकता सेवा और जनरक्षा को देखते हुए इसमें प्राइवेट संस्थाएं समाजसेवी संगठन और दयालु नागरिक भी सहयोग करने लगे हैं। ज़िले की कई निजी ब्लड बैंक संस्थाओं में नजीबाबाद ब्लॉक की हाजी फहीम अख्तर की टीम भी शामिल है, जो अब तक 2000 यूनिट से ज़्यादा खून डोनेट करा चुकी है। इसमें शैलेंद्र चौधरी जैसे कई अन्य लोगों का भी भारी सपोर्ट है। ज़िले में पचास से अधिक बार खून देने वालों में विकास सेतिया, राहुल राजपूत, नवेद फरीदी शामिल हैं। वहीं नहटोर के महबूब शेख 27 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनको एक बार अपनी बच्ची की जान बचाने को खून की ज़रूरत पेश आई थी, तब से वे अपनी बेटी के जन्मदिन पर हर बार रक्तदान कर रहे हैं।
     रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों (जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) की निरंतर जरूरत के बारे में लोगों को बताना। स्वैच्छिक रक्तदाताओं को सम्मान दिया जाना चाहिए। नियमित दान को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। दुनिया में सुरक्षित रक्त की कमी बनी रहती है, खासकर विकासशील देशों में। इस दिन नए रक्त दाताओं को जोड़ने और मौजूदा दाताओं को नियमित बनाने का प्रयास किया जाता है।14 जून की तारीख को रक्तदान दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिन के अवसर पर चुना गया है। वे ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1901 में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप)। इसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। इन्हें आधुनिक रक्तदान का "पिता" माना जाता है। इतिहास देखें तो 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संगठनों (Red Cross, IFBDO, ISBT) ने इसे शुरू किया। 2005 में WHO की विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे वार्षिक वैश्विक कार्यक्रम बना दिया।
हर साल एक नया थीम चुना जाता है, जैसे "One Drop of Humanity. Give Blood. Save Lives." 2026 के लिए टैग लाइन है।
*ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों, बनों में फिरते हैं मारे मारे,मैं उसका बंदा बनूँगा जिसको, ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा।*

Tuesday, 9 June 2026

कांग्रेस बनाम अवसरवादी क्षेत्रीय दल

*अवसरवादी क्षेत्रीय दल इंडिया गठबंधन की ताकत नहीं कमज़ोरी हैं?*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है, यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।*
        सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और राहुल गांधी सोनिया गांधी ने ठीक ऐसा ही करते हुए अपने विधायकों और सांसदों की बगावत का शिकार लगातार कमज़ोर होती जा टीएमसी को इंडिया गठबंधन की बैठक में पूरे मान सम्मान से शरीक कर लिया। कांग्रेस भूल गई यह वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने कांग्रेस को बंगाल में तोड़कर टीएमसी बनाई थी। इतना ही ममता ने 2016 में कांग्रेस के जीते 44 और लेफ्ट के 32 विधायकों को भी तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया था। इसके बाद कांग्रेस के एकमात्र एमपी अधीर रंजन चौधरी को बहरामपुर से हराने के लिए दीदी गुजरात से क्रिकेटर यूसुफ़ पठान को ले आई और तमाम तिकड़मों से उनको हराकर ही दम लिया। इससे पहले दीदी कांग्रेस को झटका देने के लिए वाजपेयी सरकार में केंद्र में मंत्री बन गयीं थी। इतना ही नहीं दीदी ने 2011 का चुनाव जीतने से पहले बकायदा पत्र लिखकर बीजेपी से लेफ्ट और कांग्रेस को खत्म करने के लिए मदद मांगी। बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह वाजपेयी के निर्देश पर बंगाल गये और टीएमसी बीजेपी की इस बारे में व्यापक योजना बनी। फिर एक सोची समझी रणनीति के तहत दीदी ने एक के बाद कदम उठाते हुए लेफ्ट और कांग्रेस को बंगाल में पूरी तरह हाशिए पर पहुंचा दिया। उनके कार्यालयों पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को सताया गया और बीजेपी की शाह मोदी शैली अपनाते हुए उनको टीएमसी में आने को मजबूर किया गया। कुछ को बात नहीं मानने पर जेल भेजा गया, कुछ का कारोबार तबाह कर दिया गया। दीदी समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। ऐसे लोगों के लिये ही शायर ने कहा है....
*उसके होंठो की तरफ़ न देख वो क्या कहता है,*
*उसके कदमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।*

Monday, 8 June 2026

रियाजउद्दीन गद्दे वाला


*आज के माहौल में रियाजउद्दीन जैसे लोग फ़रिश्तों जैसे ही हैं*
              आज हम देखते हैं अधिकांश लोग इतने आत्ममुग्ध और असंवेदनशील होते जा रहे हैं कि थोड़े से फायदे के लिये किसी की जान ले लेते हैं या ज़रा सा त्याग करना पड़ जाए तो मुंह फेरकर निकल जाते हैं। लेकिन संतोष की बात यह है कि दूसरों के लिये अपना अब कुछ न्योछावर करने वाले रियाजउद्दीन जैसे संत लोग भी इसी दुनिया में मौजूद हैं।
            रियाजुद्दीन मंसूरी मालवीय नगर दिल्ली के हौज रानी इलाके में गद्दे और रजाई की दुकान चलाते हैं। वे पिछले चालीस साल से वहाँ रहते और व्यापार करते हैं। उनके बेटे अरमान भी उनके साथ काम करते हैं। वे सिविल डिफेंस वॉलंटियर भी हैं।
        पिछले दिनों 4 जून को जब इलाके के मशहूर फ्लोरिश स्टे होटल में जब आग लगी तो कुछ लोग जान बचाकर भाग गए, कुछ ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी लेकिन रियाजउद्दीन ने मुसीबत के टाइम भी अपने होश हवास पर काबू रखते हुए वो किया जो वो कर सकते थे।
          मालवीय नगर के हौज रानी में पांच मंजिला होटल में जिस समय भीषण आग लगी। तो लोग जान बचाने के लिए खिड़की से मदद मांग रहे थे। उस समय अफरातफरी का माहौल था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि जब तक फायर ब्रिगेड और सरकारी सहायता नहीं पहुंचे तब तक इतनी बड़ी सीढ़ी कहां से लायें और इन लोगों की जान कैसे बचाएं। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई ,और अनेक जख्मी भी हुए हैं।मरने वालों में कई विदेशी मेहमान भी शामिल थे। होटल के सामने ही रियाजुद्दीन की रज़ाई गद्दों की दुकान है। जब लोग ऊपरी मंजिलों से धुएँ और लपटों से बचने के लिए खिड़कियों से कूदने को मजबूर हुए, तब रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके बेटे अरमान ने तुरंत अपनी दुकान से दो दर्जन से अधिक गद्दे और रजाइयाँ निकालकर सड़क पर बिछा दीं। इससे कूदने वालों को गंभीर चोटों से बचाया गया।
      रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने कम से कम 8 से 10 लोगों की जान बचाई कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस संख्या को 20 तक भी बताया गया है। लेकिन यहां तादाद का सवाल नहीं है बल्कि रियाजउद्दीन की नीयत इरादे और इंसानियत की भावना का है। उन्होंने उन मृतकों को ढकने के लिए चादर भी उपलब्ध कराईं। जिनको तमाम कोशिशों के बावजूद जलने दम घुटने के कारण मरने से बचाया नहीं जा सका।
       मानवता के इस नेक काम में अगर आर्थिक नुकसान की बात करें तो रियाज़उद्दीन के लगभग दो से चार लाख रुपये के गद्दे रजाई का इस्तेमाल हुआ या जल गये, लेकिन उन्होंने इसकी फ़िक्र न करते हुए कहा कि “इंसानियत के लिए आगे आए, कुछ जानें बच पाईं, यही सबसे बड़ी बात है।”
 ख़बर है कि उन्हें सरदार पटेल सेवा दल जैसी संस्थाओं ने सम्मानित किया है और एक लाख रुपये की सहायता राशि दी गई है। समाजसेवी इंसानियत पसंद और आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले लोग उनके लिए सरकार से पर्याप्त मुआवजे की मांग भी कर रहे हैं क्योंकि उनका नेक काम के दौरान व्यापारिक नुकसान हुआ। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनको सम्मानित करने और पुरस्कृत करने का ऐलान भी किया है, लेकिन यह नहीं पता आज की राजनीति के चलते यह काम कब होगा या होगा भी नहीं?
        यह घटना इंसानियत और साहस की मिसाल बन गई है। रियाजुद्दीन जैसे आम नागरिकों ने दिखाया कि संकट के समय कोई भी फरिश्ता बन सकता है।
रियाजउद्दीन ने शायर की इस सोच को ताज़ा कर दिया है...
*ग़मो की आँच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग जो किसी पर भी डालकर देखो, तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो।*

Thursday, 4 June 2026

बेटी की शादी बनाम बेटी की जान

*क्या बेटी की शादी बचाना उसकी जान बचाने से ज़्यादा ज़्ारूरी है?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
          भोपाल की ट्विशा शर्मा की हत्या या आत्महत्या तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि यह मामला न तो पहला है न ही आखि़री। हम इस बात पर भी अधिक ज़ोर नहीं देंगे कि दहेज़ की नाजायज़ मांग और नहीं मिलने पर बहु को सताना असहनीय यातनायें देना और अंत में क्रूरता की सारी सीमायें पार करते हुए उसको मार डालना हमारे समाज में कितना आम हो चुका है। हमारा सवाल यह है कि जब ट्विशा के माता पिता को यह बात साफ साफ पता लग चुकी थी कि उनकी बेटी को ससुराल में तरह तरह से परेशान किया जा रहा है और उसकी जान को ख़तरा है। तब भी वे अपनी बेटी को तलाक दिलाकर घर लाने की बजाये उसके घर आने पर बार बार समझाकर उसके ससुराल मौत के मुंह में क्यों भेज रहे थे? अगर ट्विशा के परिवार वाले कम शिक्षित या बेहद गरीब होते तब भी यह माना जा सकता था कि वे उसकी शादी फिर से करने के लिये इतना धन नहीं जुटा सकते थे। लेकिन ट्विशा का मामला इस कैटेगिरी मंे भी नहीं आता है। उसकी शादी डेटिंग एप के द्वारा समर्थ से दिसंबर 25 में हुयी थी। 12 मई 2026 को छह माह बाद ही ट्विशा ससुराल में फंदे से लटकी मिली। समर्थ एक वकील है जबकि उसकी मां ज़िला जज के पद से रिटायर हुयी थी। आरोप है कि ट्विशा की सास बेटे की पसंद की वजह से अतंर्जातीय विवाह को मजबूर हुयी लेकिन बहु को धार्मिक मंत्र याद नहीं होना और उसको बिना बताये घर से बाहर जाना स्वीकार नहीं था। सवाल यह है कि जो महिला ज़िला जज के पद पर रह चुकी हो और उससे न केवल दूसरे लोगों को न्याय देने की आशा की जाती हो बल्कि उससे अपनी सोच समझ और दृष्टिकोण प्रगातिशील तार्किक और विवेकशील होने की अपेक्षा की जाती हो वह भी इतनी दकियानूसी अंधविश्वासी और अमानवीय कैसे हो सकती है?
       बताया जाता है कि उसकी सास को अपनी बहु का अपनी मां से बहुत बात करना और उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता कोई और होने का भी शक था। ये सब विवाद बहस और आरोप ट्विशा के परिवार को भी पता थे। जिनको लेकर अकसर उसके घर में झगड़ा होता था। लेकिन ट्विशा के घर वाले उसको हर बार यही समझाते थे कि वह संयम से काम लो प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। ट्विशा ने अपने परिवार को यह भी बताया था कि उसका पति न केवल ड्रग लेता है बल्कि गुस्से में इतना बेकाबू हो जाता है कि वह उसके साथ किसी दिन कोई भी बड़ी अनहोनी कर सकता है। लेकिन उसके घर वाले उसको फोन पर मिलने पर और मायके आने पर हर बार यही समझाते रहे कि उसको अपनी ससुराल में ही एडजस्ट करना है। यानी एक तरह से उन्होंने अपनी बेटी की जान की कीमत पर भी उसके लिये घर वापसी के दरवाजे़ पूरी तरह बंद कर दिये। उन्होंने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि एक बार बेटी घर से डोली में जायेगी तो फिर उस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी। इसका मतलब बेटी के साथ उसके ससुराल वाले कुछ भी अनर्थ और अन्याय अत्याचार करें लेकिन बेटी को उसके माता पिता घर वापस लाने की बात सोच भी नहीं सकते। हैरत और दुख की बात यह रही कि बेटी ने बार बार न केवल मौखिक सीधे मिलकर बल्कि व्हाट्सएप चैट में भी ससुराल में अपनी जान को ख़तरा बताया लेकिन ’’कन्यादान’’ करने वाला समाज असंवेदनशील बना रहा। कुछ लोग शादी को सात जन्मांे का संबन्ध बताते हैं। लेकिन वे यह नहीं मानते कि शादी एक जुआ भी है। जिसका होने के बाद ही पता चलता है कि सही हुयी या गलत। अगर हम यह बात स्वीकार कर लें कि हमसे रिश्ता चुनते हुए गल्ती भी हो सकती है तो उसको तलाक दिलाकर खत्म किया जा सकता है। जिस शादी में कुछ महीने बाद ही यह बात पता लग गयी थी कि न केवल पति नशेड़ी और गुस्सैल बल्कि ट्विशा की सास भी बहुत पुराने विचारों दकियानूसी और सख्त मिज़ाज की महिला है, उसमें किसी अनहोनी के होने की प्रतीक्षा करने की क्या ज़रूरत थी?
         हालांकि यह सच है कि लड़की चाहे उच्च शिक्षित हो अमीर हो या फिर बहुत कमाने वाली बड़े पद पर आसीन हो लेकिन अगर एक बार उसका तलाक हो गया तो समाज उसको ‘सेकेंड हैंड’ की संज्ञा देकर उसका पक्ष न जानकर उसकी दूसरी शादी के विकल्प कम कर देता है। साथ ही अगर उसके साथ कोई बच्चा भी मौजूद हो तो उसकी दूसरी शादी और भी कठिन हो जाती है। जबकि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता है। यही हमारे समाज को दोगलापन अन्याय और पक्षपात है। तलाकशुदा और साथ में पहले पति से बच्चे वाली की तो बात ही क्या है अगर किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार हो जाये और उसमें उसकी ज़रा भी गल्ती नहीं हो तब भी समाज उसकी शादी तो दूर उसके साथ ही उसके परिवार का जीना भी हराम कर देता है। ट्विशा के मामले का एक दुखद पहलू यह भी है कि उसके केस से एक बार फिर साबित हुआ कि कानून सबके लिये बराबर नहीं है। पहले तो उसके केस को आत्महत्या बताकर पुलिस ने तीन दिन तक पूर्व जिला जज उसकी सास के दबाव में एफआईआर ही नहीं लिखी। बाद में जब तीन दिन बाद रपट लिखी भी तो पुलिस ने उसके परिवार की तहरीर के बजाये अपने हिसाब से हल्की धाराओं और कमज़ोर आरोपों के साथ खानापूरी की। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सास अपने रसूख के बल पर कुछ ही घंटों मंे ज़मानत हासिल करके आराम से अपने घर चली गयी। इतना ही नहीं पुलिस ने उसके आरोपी पति को फरार होने का पूरा मौका दिया। बाद में ट्विशा के सेना में जनरल भाई ने जब रिटायर सैन्य कर्मियों के संगठन को यह सब बताया तो उन्होंने पुलिस प्रशासन और शासन के खिलाफ मोर्चा खोलकर रिपोर्ट तरमीम कराई, दोबारा ट्विशा की डैडबाॅडी का पोस्टमार्टम हुआ और उसकी सास की ज़मानत खारिज कर केस की जांच सीबीआई को दे दी गयी। इसके साथ ही भागने का कोई रास्ता न बचता देख उसके पति समर्थ ने भी कोर्ट में सरेंडर कर दिया। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने उसको और उसकी मां पूर्व जज को रिमांड पर लेकर उस सख्ती और थर्ड डिग्री से पूछताछ नहीं की जिसके लिये हमारी पुलिस पहचान रखती है। शायर कहता है- तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी, जो शाख़ ए नाजु़क पे आशियाना बनेगा ना पायेदार होगा।
*नोट- लेखाक पत्रकारिता और आकाशवाणी से चार दशक से अधिक समय से जुड़े हुए हैं।*

Thursday, 28 May 2026

मॉडर्न बहु

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*लोगों का काम है कहना,* 
*आपका हक़ है ज़िन्दा रहना*
            अब तक सुना पढ़ा था बच्चे ने फेल होकर प्रेमी प्रेमिका ने प्यार में धोखा खाकर या किसी ने कर्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर ली। लेकिन अपनी पुत्र वधु स्नेहा के मॉडर्न लाइफ़ स्टाइल से आहत होकर सास ससुर ने हरियाणा में अपनी जान दे दी। इसके पीछे की वजह जानकर आपको भी दुख होगा। हैरत भी होगी। हुआ यह कि स्नेहा दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी एक खुले विचारों की लड़की है। स्नेहा की लव मैरिज हरियाणा के पानीपत के गांव नारा निवासी आशीष के साथ परिवार की सहमति से ही हुई थी। आशीष अपने माता पिता राजेश और पत्नी सुमन का इकलौता बेटा है। चूंकि स्नेहा मॉडर्न परिवार से थी और गांव के माहौल में ढलना नहीं चाहती थी। सास-ससुर को उसके छोटे कपड़ों से परेशानी थी। उसके पहनावे और रहन-सहन को लेकर अक्सर घर में टोका-टाकी होती थी। सुमन और राजेश चाहते थे कि बहू सूट और साड़ी पहने, लेकिन स्नेहा को यह रोकटोक मंजूर नहीं थी। 
      जिसकी वजह से परिवार में अक्सर झगड़ा होता रहता था। पिछले दिनों फिर इसी बात को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ, जिसके बाद स्नेहा के सास ससुर राजेश और सुमन ने विषैला सल्फ़ाज़ खा लिया। दोनों को इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। एक ही घर से दो अर्थियां उठने से पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। 
         सुसाइड की खबर मिलते ही मौके पर पहुंची पुलिस ने बहू पर सुसाइड के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। परिजनों ने बताया कि बहू दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी थी और वह शादी के बाद गांव के माहौल में ढलने को किसी कीमत पर भी तैयार नहीं थी। तलाक़ ही एक रास्ता था जिसके लिए पति तैयार नहीं था। 
      उसका पति भी उसको अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने के पक्ष में था। वह दिल्ली का कल्चर छोड़ना नहीं चाहती थी। उसके पहनावे और रील्स बनाने के शौक को लेकर अक्सर सास ससुर और गांव वाले टोका-टाकी करते थे, जो धीरे-धीरे बड़े क्लेश का रूप लेने लगा। सवाल यह है कि आप जिस परिवेश में रहते हैं जिस सोच के हैं और जिस जीवन शैली को पसंद करते हैं उसके जैसी ही बहु लानी चाहिए, लेकिन क्योंकि लड़के ने सोशल मीडिया पर प्रेमिका बनी लड़की से अपनी पसंद से लव मैरिज की थी तो सास ससुर को शादी की सहमति नहीं देनी थी। अगर आपका लड़का नहीं मानता तो आपको उससे संबंध तोड़ लेने थे या सीमित कर लेने थे। अपने लड़के और मॉडर्न बहु को कहीं शहर में रखना था। 
     अगर गांव में रखना मजबूरी थी तो लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह नहीं करनी थी क्योंकि लोगों का काम है कहना, और आपका हक़ है सम्मान के साथ ज़िंदा रहना। गांव हो या शहर हर किसी को अपने हिसाब से शादी करना अपने तरीके से जीना और अपनी पसंद के कपड़े व खाना बुनियादी अधिकार है। इस अलग राय सोच और समझ को लेकर झगड़ा करना गांव वालों के ताने सुन कर अपमानित महसूस करना और यहां तक कि जान दे देना ठीक नहीं माना जा सकता। सास ससुर को हर हाल में ज़िंदा रहने का उसी तरह अधिकार है जैसे बहु को अपने छोटे कपड़ों और खुले विचारों के साथ जीना पसंद रहा है। अंजुम रहबर का एक शेर याद आ रहा है...
*उसकी पसंद और थी मेरी पसंद और,*
*इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा।*