Sunday, 5 July 2026

जनविरोधी फ़ैसले कैसे रुकेंगे?

*सरकारों के जनविरोधी फ़ैसले रोकने के सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो चुके हैं?*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी प्रॉपर्टी नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व जजों की सलाहकार कमेटी ही कर सकेगी। ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से यूपी गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी को अपराध की सज़ा मिले इससे कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन सरकार अपने किसी संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत दिए जेल में डाल दे यह कैसे कानून का राज माना जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं जिनमें आरोपी को जेल में रहकर खुद को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी ऐसे ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ प्रिवेंटिव तरीके अपनाए जाते रहे हैं जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों से लगातार आलोचना हुई है। बंगाल सरकार ने स्कूलों में मिड डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवा और शिक्षा में आरक्षण 17 से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईदे कुर्बान पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशु पालकों का भी भारी नुकसान किया था जो साल भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई के लिए करते हैं। टेलीग्राफ जैसे बड़े अखबार के एडिटर रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हुआ, जिससे वह अपनी बेटी की शादी तक में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से असंवैधानिक रोक लगा दी है, क्योंकि अनुमति मांगने पर अनुमति देने की बजाए ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंक विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनते थे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के राज में विपक्ष की सरकारों के जनहित के कानूनों को तो उसके राज्यपाल और यहां तक कि राष्ट्रपति तक सालों तक रोक कर बैठे रहते हैं लेकिन बीजेपी की राज्य सरकारों का कोई भी विवादित कानून वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना के बजाए उसके पक्ष में एक सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है। सबसे दुख और चिंता की बात तो यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और जब तब याची को हाईकोर्ट जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामले अनचाहे ढंग से सुनता भी है तो सालों तक टालता रहता है। उसके बाद बेंच के किसी जज का ट्रांसफर या रिटायरमेंट होने पर नई बेंच बना देता है। फिर लंबे समय तक वह बेंच फिर से पूरा मामला सुनती है। उसके बाद भी अकसर बेंच फैसले को सुरक्षित रख लेती है। इससे कई बार जब फैसला लंबे समय बाद आता भी है तो मूल मुद्दा ही खत्म हो चुका होता है। जैसे कई बार महाराष्ट्र सहित कई राज्य सरकारों सांसदों और विधायकों के चुनाव को लेकर हुआ है। वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और कोर्ट एक ही पेज पर नज़र आते हैं। हमारे चीफ़ जस्टिस कुछ भी दावा करें लेकिन उनके कई फैसले चीख़ चीख़ कर बोल रहे हैं कि वे फैसले जनता के कम सत्ता के पक्ष में अधिक झुके नज़र आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिए। एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं न्यूटल लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई साल से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उनको चार्जशीट दाखिल कर दोषी साबित नहीं किया गया है लेकिन बेल नियम जेल अपवाद कहने वाला कोर्ट उनको फिर भी ज़मानत नहीं देता है। सी ए ए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ उन्होंने शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उस दौरान ही सुनियोजित दंगा हुआ और उनको उनके साथियों सहित दंगे के आरोप में गम्भीर धाराएं लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है। महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवर को मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, नहीं तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू नहीं किए जाएंगे। यूपी में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के स्टैंडिंग ऑर्डर के बावजूद आरोपियों के घर पर तत्काल नियम विरुद्ध बुलडोजर चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियां उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाही करता है। देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मीट के साथ पकड़कर गौमांस बताया जाता है, पीटा जाता है, मॉब लिंच कर दिया जाता है, बाद में मांस की जांच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाऊस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर दुकान और दूसरी प्रॉपर्टी भी ध्वस्त कर दिए जाते हैं। नागरिकता साबित करने को लेकर एसआईआर में जिन प्रमाण पत्रों को मान्यता दी गई थी अब उनको भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट तक को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताकर नागरिकता साबित करने का डाक्यूमेंट होने से मना कर दिया है। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 कागज़ दिखाने के बावजूद भारतीय नागरिक मानने से मना कर दिया, जबकि इन कागज़ात में 1951 की वो एनआरसी भी थी जिसमें उसके दादा दादी का नाम मौजूद है। अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है लेकिन वहां के लिये महंगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात होती नहीं, दूसरे सबसे बड़ी अदालत भी ऐसे मामलों में लोगों को अकसर निराश ही कर रही है, इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है। कभी कभी कुछ हाईकोर्ट अपवाद स्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियां कर देते हैं जिनसे हल्की सी उम्मीद की किरण दिखती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही कई मुकदमे लोगों पर दर्ज हो जाते हैं। यूपी के कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि उस पर सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में 39 मुकदमे अब तक दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता विपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना प्रदर्शन तो दूर किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी हमें मिलने नहीं देती, ऐसा लगता है राज्य में इमरजेंसी लगी है। बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहां की सरकारों ने राज्यों की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट सुनवाई दौरान 27 लाख लोगों को अगली बार वोट दे देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों की मज़ाक भी उड़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो कोर्ट असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने को तैयार नहीं हो और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी नहीं करने दिया जा रहा तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है?

देर ना हो जाए कहीं...

*आज की बात... हिंदुस्तानी*
*इम्तेहान हो या प्लेन व रेल, कैसे बने समय से तालमेल?*
        पिछले दिनों हुई नीट की चर्चित परीक्षा में कुछ बच्चों को समय पर नहीं पहुंचने पर सेंटर में एंट्री नहीं मिली। इससे उनका पेपर छूट गया। उनका एक साल भी खराब हुआ और उनके परिवार का लाखों रुपया भी। इससे कुछ बच्चों ने आहत होकर अपनी जान भी दे दी। लेकिन यह कोई हल नहीं है। कुछ लोग ट्रेन से जाने के लिए भी रेलवे स्टेशन के लिए देर से पहुंचते हैं। ऐसा ही कई लोगों के साथ अपनी तय समय पर टेक ऑफ करने वाली फ्लाइट को लेकर भी होता है। बस छूटने पर तो लोग कुछ देर बाद दूसरी बस से निकल जाते हैं। लेकिन कारपोरेट कॉलेज हॉस्पिटल और कई जगह अब नौकरी करने वालों की हाज़िरी डिजिटल सिस्टम से लगती है। लेट जाने पर उस दिन उनकी छुट्टी लग जाती है या फिर काम पर लेने के बाद भी आधे दिन की सैलरी काट ली जाती है। बोर्ड के एक्जाम में भी देर से जाने वालों को पेपर छूटने पर फेल होने सप्लीमेंट्री आने या फिर से परीक्षा देने का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
      सवाल यह है इतना बड़ा नुकसान टेंशन और कैरियर को ख़तरा होने के बावजूद बच्चे शिक्षक और नौकरी पेशा लोगों के साथ आम आदमी भी बार बार क्यों लेट होते हैं? हम लोग पहले से गैप लेकर घर से क्यों नहीं निकलते, दूसरों का नुकसान देखकर भी सबक नहीं सीखते और खुद का एक बार कैरियर खराब होने पर भी अगली बार बदलाव नहीं करते। क्या हम लोग नहीं जानते कि घर से देर से या बिल्कुल क्लोज़ टाइम पर निकलने से हम अपनी मंज़िलों पर टाइम पर नहीं पहुंच पाएंगे। ट्रेन कैंसिल या लेट भी हो सकती है। क्या नीट जे ई ई और टेट जैसी परीक्षा हमारी वजह से निर्धारित समय से लेट की जा सकती हैं ? क्या ट्रेन और फ्लाइट किसी व्यक्ति विशेष के कारण देर से चलेंगे? क्या ऑफिस का डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम हमारी लेट लतीफी की वजह से हटा दिया जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर हम घर से टाइम पर नहीं निकले तो ग़लती किसकी है? अगर हमें टाइम पर रिक्शा नहीं मिली तो कौन जिम्मेदार है? अगर सड़क पर जाम लगा है तो कोई क्या कर सकता है? गलती चाहे सरकार पुलिस और सिस्टम की हो लेकिन ये ऐसे सवाल हैं जिनका हल खुद हमको ही तलाशना है। हल यह है कि हम समय से सोयें, समय पर उठने को एक नहीं दो दो अलार्म लगाएं, समय कम हो तो नाश्ता खाना और नहाना स्किप कर दें, रिक्शा नहीं मिले तो घर के वाहन से स्टेशन पहुंचे, परीक्षा ट्रेन और फ्लाइट के समय से एक दो घंटे पहले पहुंचने का प्लान बनाएं जिससे कुछ लेट भी हो जाएं तो समय पर एंट्री मिल जाए, अगर एक ही बस ट्रेन या फ्लाइट मंज़िल पर जाती हो तो एक दिन पहले पहुंच जाएं और किसी रिश्तेदार जान पहचान वाले या होटल में कमरा लेकर नाइट स्टे भी कर सकते हैं लेकिन देर से जाने का कोई बहाना नहीं चलेगा।

Thursday, 2 July 2026

कांग्रेस और मुस्लिम

*मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आने लगे क्या दलित पिछड़े भी आयेंगे?*
                 *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        सपा और कांग्रेस में यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर बयानबाजी तेज़ होती जा रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली और क्षेत्रीय दलों के प्रति उदारता न दिखाने पर नाराज़गी जताई है तो उधर कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा से कांग्रेस को बराबर सम्मान और सीट शेयर करने की दो टूक मांग की है। असम में बदरुद्दीन अजमल की ए आई यूडीएफ से लगभग आधा मुस्लिम वोट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ शिफ़्ट होने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ए आई यूडीएफ का 2021 का वोट 10 प्रतिशत से अधिक था जो इस साल घटकर 5.46 प्रतिशत रह गया। उसको कुल दो सीट मिली। कांग्रेस को वहां 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिला और उसने 19 सीट जीतीं जिनमें से 18 विधायक मुस्लिम हैं। दिल्ली में आपका मुस्लिम वोट 10.8 प्रतिशत घटा है और इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ गया है। *सीएसडीएस लोकनीति और मीडिया विश्लेषण से पता लगता है कि कांग्रेस को उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम 80 प्रतिशत तक, दलित 60 प्रतिशत तक आदिवासी 50 प्रतिशत तक और पिछड़े 30 से 40 प्रतिशत तक कुछ प्रदेशों तक सीमित हैं। जबकि उच्च जातियों में केवल उदार एवं सेक्युलर परिवार के गिने चुने लोग ही कांग्रेस को वोट करते हैं। इनका अधिकांश वोट बीजेपी या उसके घटकों को जाता है। कांग्रेस उच्च सम्पन्न और मध्य वर्ग में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। कांग्रेस का असर हिमाचल कर्नाटक तेलंगाना राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ केरला उत्तराखंड पंजाब में मुख्य दल के रूप में मौजूद है। इतिहास गवाह है कुछ राज्यों में कांग्रेस एक बार चुनाव हारी तो फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। मिसाल के तौर पर 1967 में तमिलनाडु 1977 में बंगाल 1989 में यूपी 1990 के दशक में बिहार और गुजरात में 1995 में महाराष्ट्र 2013 में दिल्ली 2016 में असम 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद वह इन राज्यों में आज तक सत्ता से बाहर है।*
            ऐसा नहीं है, मुस्लिम कांग्रेस से बहुत खुश है, बल्कि वह यह समझ गया है कि क्षेत्रीय और खास तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टियां बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती। इस बदलाव की शुरुआत दिल्ली में आप को छोड़कर कांग्रेस की तरफ गए मुस्लिम वोट के बड़े हिस्से से हो चुकी है। चर्चा है जिस तरह से आप के राज्यसभा सदस्य बीजेपी में गए हैं, इससे नाराज़ मुस्लिम वोट आगे चुनाव में आप को और अधिक छोड़कर कांग्रेस के साथ जुड़ेगा। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बंगाल में टीएमसी से छिटक कर जो 60 विधायक और 20 सांसद एनडीए यानी बीजेपी के समर्थन में गये हैं, उससे आगे मुसलमान बंगाल में भी ममता को छोड़कर राहुल की कांग्रेस या कुछ हिस्सा कम्युनिस्टों के साथ जुड़ सकता है। यही वजह है कि यूपी में सपा के सांसदों को तोड़ने की चर्चा फिलहाल ठंडी पड़ गई है। संघ इस राजनीतिक समीकरण को समझकर आशंकित है कि अगर अधिकांश मुस्लिम वोट से जीते सपा एमपी तोड़कर बीजेपी या एनडीए में लाए गए तो मुस्लिम आगे से सपा पर भरोसा न कर बड़ी संख्या में कांग्रेस या आंशिक रूप से आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए जन्मे दलों में दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाने को जा सकते है। बीजेपी के लिए यह समीकरण सबसे घातक माना जाता है। दरअसल मुस्लिम कांग्रेस सपा बसपा या आरजेडी जैसे किसी दल को जिताने के लिए कभी वोट नहीं देता है। वह तो हर उस सेक्युलर पार्टी को वोट देता रहा है जो भी बीजेपी को गारंटी से हरा सकता हो। यही वजह है उसको पार्टी बदलने में तनिक भी दिक्कत नहीं होती। मुस्लिम अब पूरे देश में महसूस कर रहा है कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को नहीं हरा सकते। उल्टा वे बीजेपी के दबाव में काम करते हैं। बीजेपी को बैकडोर से सपोर्ट तक कर देते हैं और सेक्युलर कांग्रेस का विरोध करते हैं। हद तो यह है कि जब लालच और दबाव ब्लैकमेल की सीमा तक पहुंच जाता है तो इन दलों के जनप्रतिनिधि टूट कर उसी बीजेपी में या उसके गठबंधन में चले जाते हैं जिसको हराने को मुस्लिम समाज ने इनको वोट दिया था। मुस्लिम जानते हैं कि अकेले उनके वोट से कांग्रेस वापस सत्ता में नहीं आ सकती, लेकिन वे इसकी पहल यह सोचकर कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल दलित और पिछड़े भी जब बीजेपी से नाराज़ होंगे तो कांग्रेस में आ सकते हैं।
            1989 से पहले का रिकॉर्ड देखें तो कांग्रेस का एक वोट बैंक हुआ करता था। जिनमें ब्राह्मण मुस्लिम और दलित समाज मुख्य रूप से शामिल थे। इस समीकरण के बल पर कांग्रेस ने देश और राज्यों में कई दशक तक एकक्षत्र राज किया। विडंबना यह रही कि फिर भी कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को स्थायी रूप से अपना बनाए रखने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। उल्टा हुआ यह कि सत्ता का अधिकांश लाभ पहले से ही सम्पन्न सक्षम और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा उच्च वर्ग यानी स्वर्ण जातियां विशेष रूप से ब्राह्मण लेते रहे। कांग्रेस ने दलितों मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने के लिए एक नकारात्मक काम किया। उसने संघ को फलने फूलने दिया। बीजेपी को सांप्रदायिकता की राजनीति करने दी। उसके राज में खूब दंगे हुए, हजारों लोग मारे गए, जिनमें मुस्लिम अधिक होते थे। उनके कारोबार तबाह कर दिए गए। घर जलाए गए। महिलाओं से बलात्कार हुए। महीनों कर्फ़्यू लगा रहता था। फिर दिखावे के लिए जांच आयोग बनते थे। उनकी कई साल बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती थी। कांग्रेस जानती थी दंगे होते नहीं, सुनियोजित तरीके से कराए जाते हैं। एक तरह से कांग्रेस आज की टीएमसी की तरह मुसलमानों दलितों को बीजेपी से डराकर वोट लेने की राजनीति कर रही थी। दलितों को वह बीजेपी के सत्ता में आने पर आरक्षण और संविधान खत्म होने का भय दिखाती थी। जब इससे भी काम नहीं चला तो कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को खुश करने के बदले हिंदूवादी लोगों को भी खुश करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना था। इससे सांप्रदायिक जिन्न बोतल से बाहर आ गया और धीरे धीरे कांग्रेस को पूरी तरह खा गया। *जहाँ तक पिछड़ों का सवाल है, उनकी आबादी 1931 की जातीय गणना के अनुसार 54 प्रतिशत मानी जाती है लेकिन कांग्रेस से अधिकांश पिछड़े दूरी बनाए रहे जो विकल्प मिलने पर बीजेपी के पाले में चले गए। इतिहास बताता है नेहरू सरकार ने पिछड़ों के आरक्षण पर 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था। आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सफारिश की लेकिन नेहरू ने जाति के आधार पर रिजर्वेशन नहीं देने की नीति के कारण इस को लागू नहीं किया। इसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग बनाया। इंदिरा सरकार को 1980 में 3743 पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की इस आयोग ने सिफारिश की लेकिन कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दस साल बाद वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार ने इन सिफारिशों को लागू किया।* इससे अधिकांश पिछड़ी जातियां कांग्रेस से विमुख हो गईं। क्षेत्रीय दल भी क्योंकि अलग अलग प्रदेशों में एक दो दबंग पिछड़ी जातियों का नेतृत्व अधिक कर रहे थे, ऐसे में अधिकांश पिछड़े बीजेपी के साथ हिंदुत्व के अभियान में शामिल हो गए। पिछले दिनों राहुल ने रायबरेली में आज़ादी की दलित योद्धा वीरा पासी की विशाल मूर्ति का अनावरण कर दलितों को सांकेतिक सम्मान दिया है। अब राहुल गांधी ने इस भूल को सुधारने के लिए जिस तरह संविधान दलित पिछड़ों के आरक्षण, जातीय जनगणना और संवैधानिक समानता की मांग उठानी शुरू की है, उससे आशा है कि दलित पिछड़े भी बीजेपी से निराश हुए तो कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं।

Sunday, 28 June 2026

घरेलू औरत

*आज की बात...हिंदुस्तानी*
*घरेलू औरत नहीं है बेकार,*
*उसके काम की वैल्यू 30 हज़ार*
          सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दुर्घटना मृत्यु के एक मामले में मुआवजा तय करते हुए घरेलू औरत के काम की कीमत 30,000 रुपए मासिक मानी है। साथ ही कोर्ट ने हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और अगर वो महिला कोई और काम भी करती हो तो उसकी कीमत अलग से जोड़ने को कहा है। 
     कुछ लोग केवल उन महिलाओं के काम की वैल्यू समझते हैं, जो घर से बाहर जाकर बिज़नेस या नौकरी करती हैं। उनका मानना है कि जो कमाकर नहीं लाता वो बेकार है। जबकि आप हिसाब जोड़ें तो महिलाएं घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। घर से बाहर काम करने वाले हर पुरुष के काम के घंटे तय होते हैं, छुट्टी भी मिलती है, वो खुद भी अवकाश लेता है और वह एक्स्ट्रा काम करता है तो उसको डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान भी होता है। जबकि घर की महिला को ऐसा कुछ नहीं मिलता। उसको पर्याप्त आराम भी नहीं मिलता। साथ ही उसकी नींद के घंटे भी कम हो जाते हैं। अगर आप उनके खाना बनाने नाश्ता बनाने बार बार चाय बनाने सफ़ाई कपड़े व बर्तन धोने प्रेस करने बिस्तर बिछाने बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल त्यौहार पर अतिरिक्त तैयारी करने, शादी बर्थडे या बच्चा पैदा होने पर एक्स्ट्रा काम का बोझ झेलने, बच्चों को होम वर्क कराने, उनको स्कूल छोड़ने और लेने जाने, उनकी माता पिता की और अपनी व कभी कभी पति की भी दवाई लाने, लाइन में लगकर सरकारी राशन लाने, पर्दे साफ़ करने, घर के जाले झाड़ने, सोफों के कवर बदलने, बच्चों के खिलौने संभालकर रखने, मेहमानों को अटेंड करने, टंकी में पानी भरने, घर का सामान खरीदने को लिस्ट बनाने, परिवार की तरफ़ से दूसरे रिश्तेदारों के लेनदेन का हिसाब रखने, सबके सोने पर लाइटें बंद करने, घर में पेंट होने पर सामान हटाने फिर सेट करने, बाज़ार से कपड़ों सहित घरेलू इस्तेमाल का सामान खरीदने आदि का बेतहाशा काम वो करती हैं।
       देश की जीडीपी में घरेलू महिलाओं के काम का 17 प्रतिशत योगदान माना जाता है। फिर भी लिंग के आधार पर महिलाओं के घरेलू काम को फ्री समझा जाता है और उनको बेकार। जबकि आर्थिक समानता के हिसाब से देखें तो सबको वेतन नहीं मिलने बावजूद घरेलू महिलाओं का घर के काम में जो योगदान माना गया है, उतना देश के आधे से अधिक पुरुष भी नहीं कमाते। घरेलू महिलाएं एक तरह से राष्ट्र निर्माता हैं। वे देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। ऐसी सभी महिलाओं को हमारा सलाम।

Sunday, 21 June 2026

पानी की वैल्यू समझिए

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*किफायत से खर्च करें पानी,* 
*वरना हो जायेगी परेशानी...*
         एक विद्वान ने कहा है। लोग चीज़ों की वैल्यू मिलने से पहले और उनके खोने के बाद ही समझते हैं। हम लोग जिस पश्चिमी यूपी में रहते हैं। उसको बहुत से वरदान कुदरत ने दिए हैं। उनमें से एक पर्याप्त पानी भी है। यही वजह है इस इलाक़े की खेती अच्छी है। घरों में भी जल निगम नगर निगम और स्थानीय निकाय भरपूर पानी सप्लाई करते हैं। कई शहरों में पानी मामूली टैक्स देकर अनलिमिटेड मिलता है। कुछ लोग इसका इसीलिए दुरूपयोग भी करते हैं। वे पानी भरकर नहीं रखते। टूटी खुली छोड़ देते हैं। पानी बेवजह बहता रहता है। वे पीने के इस पानी से अपने वाहन भी धोते हैं। अपने मकान दुकान के सामने खूब पानी का छिड़काव करते हैं। छतें भी बार बार पानी से धोते हैं। कुछ ने अवैध रूप से पालिका के पानी से व्यवसाय कर पैसा कमाने का रास्ता भी तलाश लिया है। कुछ घर के बाथरूम में घंटों नहाते रहते हैं। कुछ टॉयलेट के फ्लश को शौच के साथ ही पेशाब करने पर भी बार बार चलाते हैं। 
              कुछ शेविंग करते हुए वाश बेसिन का नल लगातार खुला रखते हैं। आर ओ में भी दो तिहाई पानी बर्बाद होता है। कुछ पानी भरने के लिए मोटर चलाकर भूल जाते हैं और घंटों पानी नाली में बहता रहता है। कुछ गमलों में वेस्ट पानी की जगह पेयजल ही डालते हैं। कुछ लोग छतें ठंडी करने को बहुत पानी रात को खुली हवा में सोने के लिये बर्बाद करते हैं। बर्तन धोने के लिए भी कुछ महिलाएं एक बार टूटी खोलकर तब तक बंद नहीं करती जब तक सब बर्तन नहीं धुल जाते। कुछ घर दुकान और सड़क को साफ करने की जगह सैंकड़ो लीटर पानी रोज़ डालते हैं। ऐसे लोगों से पानी वेस्ट न करने को कहो तो वे कहते हैं, हमारा वाटर कनेक्शन है, हम चाहे जितना पानी बहाएं आपको क्या प्रॉब्लम है। उनको कौन बताए ज़मीन के नीचे से आ रहा पानी उनका नहीं सब नागरिकों का है और लगातार वाटर लेवल नीचे जा रहा है। 
     *कम लोगों को पता है कि राजस्थान महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु और दिल्ली के कई इलाकों में ज़मीन के नीचे पानी पूरी तरह खत्म हो चुका है। यहां दो से पांच दिन में सरकारी और प्राइवेट टैंकर से पानी आता है। यहां प्रति व्यक्ति 20 से 40 लीटर पानी खरीदा जाता है। जबकि जरूरत 200 से 500 लीटर की होती है। यह पानी एक, डेढ़ से दो रुपए लीटर तक और कहीं कहीं 30 रु बोतल से 160 रु प्रति जार मिलता है। प्रति परिवार को 1500 से 8000 रु पानी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इसलिए आज और अभी से पानी का दुरुपयोग बंद कर दीजिये।*

Friday, 19 June 2026

योग दिवस

आज का विचार... हिंदुस्तानी 
*योग धार्मिक नहीं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है!*
              21 जून हर वर्ष योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पूजा पाठ नहीं बल्कि हर देश हर जाति और हर धर्म के मानने वालों के लिए वरदान है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में विभिन्न योग नियमित रूप से करने से न केवल शरीर बल्कि आपका मन भी निरोग और समग्र स्वास्थ्य लाभ होते हैं। योग से इंसान के दिल दिमाग़ को ऑक्सीजन की बेहतर सप्लाई होती है। उसके जिस्म के साथ उसके मन की कैफ़ियत भी बदलने लगती है। टेंशन ब्लड प्रेशर और दिल घबराने की शिकायत कम होने लगती है। योगा करने से पॉजिटिव सोच पैदा होती है। काल्पनिक डर सोच से दूर चले जाते हैं। समझ उदार होने लगती है। 
           संवेदनशील और संयमी व्यवहार भी योग से आने लगता है। समस्याओं से लड़ने की क्षमता और समाज के साथ मिलकर चलने की कला भी योग का बाई प्रोडक्ट माना जाता है।यह प्राचीन भारतीय परंपरा आसन, प्राणायाम, ध्यान और नैतिक अनुशासन पर आधारित है, जो शरीर और मन को संतुलित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे Johns Hopkins, Healthline, NCCIH आदि) के अनुसार शारीरिक लाभ में योग आसनों से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ लचीले बनते हैं और गिरने का खतरा कम होता है। पीठ दर्द, गठिया और जोड़ों की समस्या में राहत कई अध्ययनों में योग को पीठ दर्द और गठिया के लक्षणों को कम करने में प्रभावी पाया गया है। यह रक्तचाप कम करता है, सूजन घटाता है और हृदय रोग के जोखिम को कम करता है।श्वसन, ऊर्जा और चयापचय में सुधार के अनुसार बेहतर सांस लेने से ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ती है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। बेहतर मुद्रा, हड्डियों की मजबूती, नींद की गुणवत्ता में सुधार और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होना भी इसके लाभ हैं। तनाव, चिंता और अवसाद में कमी गहरी सांस और ध्यान से कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है, मन शांत रहता है।
       एकाग्रता, जागरूकता और भावनात्मक संतुलन बच्चों से लेकर वयस्कों तक फोकस बढ़ाता है और आत्म जागरूकता विकसित करता है। समग्र कल्याण के हिसाब से देखें तो नींद बेहतर होती है, मूड अच्छा रहता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
           स्वामी विवेकानंद, बी.के.एस. आयंगर, पट्टाभि जोइस जैसे योग गुरुओं ने इसे पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।संयुक्त राष्ट्र की भूमिका देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। इसे 175+ देशों ने समर्थन दिया। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे देशों में भी स्कूल-कॉलेज में योग आ चुका है। नियमित अभ्यास से ही पूर्ण लाभ मिलता है। लेकिन पहले से बीमार दर्द के शिकार और सीनियर सिटीजन को ट्रेनर से जानकारी करके ही योग करना चाहिए।
*ज़ाहिदे तंग नज़र ने मुझे काफिर समझा ।* *और काफिर ये समझते हैं मुसलमान हूँ मैं ।।*

यूसुफ़ पठान का दलबदल

*एक अनैतिक समाज में सिर्फ़ सेलिब्रिटी ही ईमानदार कैसे होगा ?*
             *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                      बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गई। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए?क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था? 
        यहां यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है? यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बे ईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताख पर रख दिया है।
       यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही है और इंसान हिंदू हो या मुसलमान कभी भी बे ईमान हो ही सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये ललचा ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलाट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है। विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद कल मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा। 
            यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है उनको पुलिस ईडी सीबीआई इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो। वह भी इसी देश इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बे ईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है। यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है अब उनका दलबदल भी उसी डर लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों सांसदों को क्या बे ईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है? यह भी हो सकता है वे आज़म ख़ान उमर खालिद नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के मुख्याओं का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो अगर कोई इंसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा। 
*"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"*