Thursday, 7 May 2026

टीएमसी की हार

*बंगाल में टीएमसी की हार, ममता खुद भी ज़िम्मेदार?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
   *0 इसमें कोई दो राय नहीं पांच राज्यों में आये चुनाव नतीजे बंगाल से काफी अलग हैं। इसके कारण भी अलग अलग हैं। एसआईआर भी इन पांच राज्यों सहित अब तक देश के कुल 14 राज्यों में हो चुकी है लेकिन जिस तरह से बंगाल में 27 लाख लोगों को चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस कारण के वोट डालने से रोक दिया, उससे यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया कि मतदाता सरकार चुनते हैं बल्कि अब आप कह सकते हैं कि सरकार उन मतदाताओं को चुन रही हैं जो उसको सत्ता में लाने के लिये वोट कर सकते हैं। साथ ही एक पेटर्न आप इन चुनाव नतीजों में और देख सकते हैं कि ममता चाहे अपनी हार का एकमात्र कारण चुनावी धांधली बेईमानी और पक्षपात बतायें लेकिन वह राज्य में बीजेपी को स्पेस देने के साथ कैसे इस हार की खुद भी ज़िम्मेदार हैं, सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस लेख में हम तथ्यों और प्रमाणों के साथ आपको बतायेंगे।*
        राजनीति के जानकार बताते हैं कि जो दल नेता या गठबंधन कभी न कभी बीेजेपी के साथ अपने स्वार्थ में यह जानने के बाद भी जुड़े हैं कि उसका रास्ता गलत है, उनको देर सवेर भाजपा ने खत्म कर अपने अंदर समा लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर टीएमसी पीडीपी बीजू जनता दल जनता दल यू बसपा शिवसेना जननायक जनता पार्टी अकाली दल और अप्रत्यक्ष रूप से के चंद्रशेखर राव जगन मोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल जैसे नामों की एक लंबी सूची बन सकती है जो कभी न कभी बीजेपी से अपने अवसरवादी सिध्दांतहीन और परंपरागत मूल्यों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ में जुड़े और आज बीजेपी उनको निगल गयी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी की हार में केंचुआ का एसआईआर के बहाने वोट चोरी के साथ ही उनकी सरकार के खिलाफ पनप रहा जन असंतोष उनके कैडर का कट मनी वसूलना और उनके खिलाफ 15 साल की एंटी इनकम्बैंसी भी का भी रोल रहा है लेकिन सबसे बड़ी वजह जो लोग भूल चुके हैं। वह यह है कि ममता बनर्जी ने जो बोया आज उनको वह काटना पड़ा है। 29 साल पहले 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस नाम से वरिष्ठ बंगाली नेता मुकुल राय के साथ मिलकर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी परंपरागत विरोधी कांग्रेस और वामपंथी दलों को खत्म करने और अपने मुस्लिम वोट बैंक को डराकर बीजेपी को बंगाल में प्रवेश कराने में हर तरह का सहयोग दिया। बीजेपी जो पहले से ही कम्युनिस्टों और कांग्रस की विरोधी नहीं शत्रु की सीमा पार करके उनका नाम ओ निशान मिटाना चाहती थी, को बिन मांगी मुराद पूरी करने का अवसर मिल गया। मौका मिलते ही बीजेपी ने टीएमसी के संस्थापक सदस्य और ममता के राइट हैंड समझे जाने वाले मुकुल राय पर छापा मारकर उनको बीजेपी में ले लिया।
         इसके बाद ममता खुद 1999 में एनडीए सरकार में शामिल होकर रेल मंत्री बन गयी। जबकि यहीं से उनका राजनीतिक पतन शुरू हो गया। 2001 में रक्षा सौदों में कमीशन खाने का स्टिंग सामने आने पर वह कथित नैतिकता की दुहाई देकर अपना पद त्याग कर एनडीए से अलग हो गयीं। उसके बाद 2001 में ममता ने बीजेपी को अपनी स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में एनडीए में लौटने की संभावना व्यक्त की। 2003 में ममता फिर से एनडीए सरकार में बिना विभाग की मंत्री बन गयीं। इसी साल ममता ने आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के एडिटर तरूण विजय की वामपंथी आतंक पर लिखी गयी किताब के विमोचन समारोह में अपनी हाज़िरी लगाई। संघी अख़बार के संपादक ने उनको बंगाल की दुर्गा बताकर हाथो हाथ राजनीतिक हिसाब बराबर कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ संघी लेखक और राज्यसभा सांसद बलवीर पंुज ने ममता को सदन में ‘‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं’’ कहकर नवाज़ा। इतना ही नहीं बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ हिंसक संघर्ष में टीएमसी और संघ एक ही पेज पर खुलकर आ गये। ममता ने संघ से मेलजोल बढ़ाते हुए आरएसएस के मोहन भागवत मदन दास देवी और शेषाद्रि चारी को सच्चा देशभक्त बताया। 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता की सादगी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में शामिल हैं, जो सियासत का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये नहीं करते हंै। इसके बाद हालांकि ममता ने यह ज़ाहिर किया कि वह बीजेपी संघ और एनडीए से दूरी बना चुकी हैं लेकिन तमाम विरोध असहमति और आपत्ति के बावजूद जब संसद में सीएए के खिलाफ मतदान की बारी आई तो टीएमसी के आठ सांसद गायब हो गये और एनडीए का यह विवादित विधेयक बिना पर्याप्त सांसदों के आराम से पास हो गया।
         ममता ने संविधान विरोधी विधेयक रोकने को न तो पार्टी का कोई व्हिप जारी किया और न ही पार्टी लाइन से हटकर लापता होने वाले आठ सांसदों के खिलाफ कोई अनुशासन की कार्यवाही ही की। 2021 में मुकुल राय बीजेपी से टीएमसी में आ गये और बोले बीजेपी और टीएमसी दोनों एक सी ही पार्टी हैं। ममता उनके इस बयान पर भी चुप रहीं। जुलाई 2022 में वाइस प्रेसिडंेट के इलैक्शन में ममता की पार्टी ने अचानक विपक्ष की साझा उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का विरोध कर अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी की बी टीम होने का एक और प्रमाण दे दिया। सियासत के जानकार यह देखकर हैरत में पड़ गये कि जिन जगदीप धनकड़ ने बंगाल का राज्यपाल रहते ममता सरकार का काम करना दूभर कर दिया था उनको ही जिताने के लिये टीएमसी सदन में उनके खिलाफ वोट न करके अप्रत्यक्ष मदद करने को कैसे तैयार हो गयी? ममता बनर्जी बार बार इंडिया गठबंधन को भी धोखा देती रही हैं। बंगाल में उनकी पार्टी की हार पांच प्रतिशत वोटों से हुयी है लेकिन दोनों अलग अलग लड़कर सात प्रतिशत वोट लेने वाले इंडिया गठबंधन के घटक कांग्रेस और कम्युनिस्टों को उन्होंने बार बार प्रस्ताव देने के बावजूद कभी साथ मिलकर लड़ने की हामी नहीं भरी। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहां ममता की हार के लिये केंचुआ और मोदी सरकार का खुला पक्षपात बे ईमानी और हर र्मार्चे पर उनको घेरना है वहीं ममता का संघ और बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक फासिस्ट और नफरत की सियासत करने वाली पार्टी से कभी खुलकर तो कभी छिपकर अनैतिक सियासत करना आज उनको अन्य बीजेपी सहयोगियों की तरह खा गया है। शायर ने कहा है- तू किसी और से ना हारेगा, तुझको तेरा ग़रूर मारेगा, तुझको दस्तार जिसने बख़्शी है, तेरा सर भी वही उतारेगा।
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से पत्रकारिता शायरी लेखन अख़बार संपादन और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हुए हैं।*

Tuesday, 5 May 2026

मज़दूर असंतोष

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

बंगाल में बीजेपी

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

Wednesday, 29 April 2026

राकेश अग्रवाल जी

*चंद्रा_कत्था_इंडस्ट्रीज_के_स्वामी_राकेश_अग्रवाल जी_नहीं_रहे*😢
नजीबाबाद जिला बिजनौर यूपी, स्थित चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के एम डी, चंद्रा ग्रुप के मुखिया स्व. श्री सुभाष चंद अग्रवाल के छोटे भाई पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ समाजसेवी स्व. नरेशचंद्र अग्रवाल के भतीजे , रामलीला कमेटी के संरक्षक और वरिष्ठ समाजसेवी व सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री राकेश कुमार अग्रवाल का 23 मार्च की रात दुखद निधन हो गया है। वे आगामी 10जुलाई को पूरे 75 वर्ष के होने वाले थे। उनको मंगलवार सुबह 10 बजे नजीबाबाद उनके स्टेशन रोड स्थित निवास चंद्रा हाउस पर लाया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के नमामि गंगा घाट पर 25 मार्च को 11.30 बजे होगा। #उनकी_शवयात्रा_सुबह_9_30_बजे_उनके_रेलवे_स्टेशन_रोड_स्थित_निवास_चंद्रा_हाउस_से_चलेगी।
     श्री अग्रवाल चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के साथ ही मानसरोवर बॉटलिंग कंपनी, मानसरोवर पेपर मिल, चंद्रा केमिकल, चंद्रा फ्रेगरेंस आर सी ए लीजिंग जैसी चंद्रा ग्रुप की अन्य अनेक कंपनियों के डायरेक्टर रहे और सीकेआई छाप कत्था कच्छ के साथ ही उनकी कंपनी के दिलरुबा पान मसाले ने देश विदेश में अपनी बेहतरीन इमेज बनाई जिससे नजीबाबाद को भी प्रसिद्धि मिली। उनकी थम्सअप फैक्ट्री के प्रोडक्ट भी अपने विशेष स्वाद के लिए पूरे भारत में मशहूर हुए और कई बार विले पार्ले ग्रुप मुंबई से एमबीसीएल को इसके लिए विशेष पुरस्कार मिले। उन्होंने गैर हिंदी भाषी देशों और भारत के राज्यों में हिंदी के लिए विशेष सेवा करने वाले विद्वानों को कई साल तक माता कुसुम कुमारी सम्मान देकर भी नजीबाबाद का नाम रोशन किया जिसकी चर्चा आकाशवाणी और दूरदर्शन से होने से लोग नगर व जनपद को अलग से पहचानने लगे थे। उनके चंद्रा ग्रुप से न केवल कई कंपनी बल्कि बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा हुए जिससे नगर का विकास हुआ।
      राकेश जी कुछ माह से बीमार चल रहे थे। वे दिल्ली के एक बड़े हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनका वहां जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर्स गहन चिकित्सा कक्ष में इलाज कर रहे थे। इससे पहले उनका उपचार कुछ समय तक मुंबई के अस्पताल में भी हुआ था। स्वास्थ्य कुछ बेहतर होने के बाद उनको दिल्ली स्थित उनके राजधानी वाले फ्लैट पर शिफ्ट कर दिया गया था। इस दौरान वे डॉ के परामर्श पर समय समय पर ट्रीटमेंट के लिए चिकित्सालय जाते रहते थे। एक सप्ताह पूर्व उनकी तबियत अधिक खराब हुई तो उनको अस्पताल में एडमिट कर दिया गया था। जहां उनका आईसीयू में रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर इलाज कर रहे थे। भर्ती होने के बाद उनकी तबीयत में विशेष सुधार नहीं हुआ और वे दिन ब दिन कमज़ोर होते गए। बेहतरीन डॉक्टर शानदार सुविधाओं वाले अस्पताल और हर संभव दवा के द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने पर भी उनको बचाया नहीं जा सका और उन्होंने सोमवार की रात 9.10 बजे अंतिम सांस ली। 
उल्लेखनीय है कि राकेश जी का व्यवहार परिवार कंपनी स्टाफ और समाज के सभी वर्गों के साथ बहुत उदार स्नेहशील और सहयोग करने वाला था। उनको सभी वर्गों के लोग पसंद करते थे। वे आर्ट ऑफ लिविंग, रामलीला कमेटी लायंस क्लब माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान सहित अनेक सामाजिक साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। नगर जनपद और देश के कोने कोने से जुड़े उनके मित्रो संबंधियों और सहयोगियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके साथ तीन दशक से अधिक सीकेआई में सर्विस करते हुए उनको हमने एक संरक्षक के रूप में महसूस किया। हमारी ओर से भी उनको विनम्र श्रद्धांजलि। 

Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?

परिसीमन बिल गिरा

*जिस विपक्ष के आप दुश्मन हैं, वह सरकार को सपोर्ट क्यों करेगा?* 
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*        
0 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार का 131 वां संविधान संशोधन विधेयक पहला बिल है। जो केंद्र सरकार के तमाम दांव पेंच विपक्ष को डराने धमकाने और महिला वोटों के लिये ललचाने के बादवजूद तीन चैथाई बहुमत यानी 528 मंे से 352 की जगह 298 मिलने से हासिल कर पाने से औंधे मुंह गिर गया। मोदी सरकार पहले ही जानती थी कि वह सीएए या अन्य धन विधेयक बताकर विवादित बिलों की तरह राज्यसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भी जैसे साम दाम दंड भेद से सामान्य बहुमत का जुगाड़ करके अपने बिल पास कराने में सफल रही है। इस बार ठीक वैसा ही होना मुश्किल नहीं नामुमकिन है। लेकिन उसको इतना भरोसा ज़रूर था कि अगर यह बिल किसी तरह से पास हो गया तो वह महिलाओं को यह कहकर खुश करेगी कि उसने महिलाओं का आरक्षण लागू करने के लिये आवश्यक संसदीय कार्यवाही अंजाम तक पहंुचा दी और अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो वह राजनीतिक लाभ लेने के लिये विपक्ष के खिलाफ विशेष तौर पर बंगाल और तमिलनाडू में यह प्रचार जमकर करेगी कि विपक्ष महिला विरोधी है। लेकिन विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जिस राजनीतिक दूरअंदेशी और सूझबूझ से मोदी सरकार की इस चाल को नाकाम करते हुए महिला आरक्षण का समर्थन और संविधान संशोधन विधेयक गिराकर चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर कराने और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कराने का बीजेपी को एक तरफा लाभ पहंुचाने वाला दांव नाकाम किया उससे अब मोदी सरकार काफी सदमें में नज़र आ रही है। हालांकि यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि मोदी सरकार इन हालात में 2029 के आम चुनाव में वर्तमान 543 संसदीय सीटों पर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू कर पायेगी या नहीं? लेकिन 2023 में 106 वां संविधान संशोधन पास कराने के बाद मोदी सरकार ने जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया था वह 16 अपै्रल की अधिसूचना जारी होने से लागू हो चुका है। इसके साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या 2029 के आम चुनाव से पहले जनगणना और नया परिसीमन पूरा हो पायेगा? क्योंकि अब तक का कानून यह है कि हर नई जनगणना के बाद संसदीय और राज्यों की विधानसभाओं का नया परिसीमन होना चाहिये। विपक्ष यह भी जानता है कि जिस तरह से बीजेपी सरकार के रहते अब तक असम और कश्मीर में नया परिसीमन इस तरह से किया गया है कि इससे बीजेपी को राजनीतिक लाभ और विपक्ष को नुकसान हुआ है।
        विपक्ष को पूरी आशंका है और सही भी है कि ऐसा ही लोकसभा का नया परिसीमन करने के दौरान किया जायेगा। यह नाराज़गी और डर खासतौर पर दक्षिण के राज्यों तमिलनाडू केरल कर्नाटक और आंध्रा में अधिक देखा जा रहा है। लेकिन आंध्रा में चन्दर बाबू नायडू का गठबंधन एनडीए यानी बीजेपी के साथ होने से वहां इस मुद्दे पर सत्ताधारी राजनेताओं में तो अधिक हलचल नहीं है लेकिन जनता में अन्य दक्षिणी राज्यों की तहर ही बेचैनी और सीटें व राज्य का कोटा घटने की आशंका मौजूद है। हो सकता है नायडू को इसका राजनीतिक नुकसान भी पहुंचे। 1951 में तत्कालीन 489 संसदीय सीटों को बढ़ाकर 494 और 1961 के बाद 522 और अंतिम बार 1971 में 543 नई जनगणना और परिसीमन के बाद किया गया था। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दक्षिण के जो राज्य देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कर परिवार नियोजन कर रहे हैं। अगर उत्तर भारत की तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से सीटों का परिसीमन कर उनके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ती है तो इससे एक नया विरोधाभास खड़ा होगा। उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बढ़ता देख तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42 वां संशोधन कर नये परिसीमन को 2001 तक के लिये रोक दिया था। इसका मकसद देश में परिवार नियोजन को बढ़ावा देना था। सन 2000 में 91 वां संविधान संशोधन कर एनडीए की वाजपेयी सरकार ने इस रोक को आगामी 25 साल और बढ़ाकर नये परिसीमन की मयाद 2026 कर दी। नये परिसीमन पर इस 50 साल की रोक का मकसद जनसंख्या का टीएफआर 2.1 यानि जन्म और मृत्यु दर समानता पर लाकर स्थिर करना था। संविधान सभा की सदस्य रेणुका राय का कहना था कि भविष्य में जब सबको समान अवसर मिलेंगे तो योग्य महिलाएं जनरल सीटों पर ही अपनी भागीदारी खुद बढ़ाती जायेंगी। बदकिस्मती से ऐसा व्यवहारिक रूप से कई दशक तक भी हो नहीं सका। जहां तक इंडिया गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों का मोदी सरकार के संविधान संशोधन बिल के विरोध का सवाल है। यह राजनीतिक गुणा भाग से तो स्वाभाविक ही है। मोदी सरकार बनने के बाद से जितना विपक्ष का दानवीकरण किया गया है। इतना देश स्वतंत्र होने के बाद से किसी सरकार ने नहीं किया। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब पीएम मोदी उनकी सरकार में शामिल मंत्री उनके बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें पुलिस प्रशासन अन्य जांच एजंसियां और उनका गोदी मीडिया ईडी सीबीआई इनकम टैक्स जीएसटी विभाग विभिन्न आयोग ट्रिब्यूनल यहां तक कि कुछ कोर्ट तक विपक्ष और उसके नेताओं को निशाने पर नहीं लेते हों। यहां तक कि कांग्रेस और सेकुलर दलों को तो देशद्रोही राष्ट्रविरोधी और विदेशी टूलकिट का एजेंट तक बताया जाता है।
         विपक्षी नेताओं पर पूरे देश में जगह जगह ऐसी बातों बयानों और भाषणों के लिये भी एफआईआर दर्ज करा दी जाती हैं जिनका उनसे कोई मतलब वास्ता भी नहीं होता। उनको सोशल मीडिया पर अकसर ट्राॅल किया जाता है। कुछ अंधभक्त तो उनसे नफरत और विरोध में इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनको और उनके परिवार महिलाओं और मासूम बच्चों तक पर बेशर्मी से कीचड़ उछालते हैं। उनको संसद में बोलने का अवसर नहीं दिया जाता, बोलने के दौरान उनका माइक बंद कर दिया जाता है, उनको जबरन सदन से बाहर निकाल दिया जाता है, उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जाता है, यहां तक कि नेता विपक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता छीनकर उनका घर रातो रात खाली करा लिया जाता है। ऐसा ही कई अन्य विपक्षी नेताओं महुआ मोइत्रा आादि के साथ समय समय पर अन्याय और पक्षपात किया जाता है। इतना ही नहीं विपक्ष की महाराष्ट्र की तरह कई राज्यों में सरकारें गिराकर बीजेपी अपने या एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में जबरन अवैध और असंवैधानिक रूप से सरकार बना लेती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि विपक्ष को सरकार विश्वास में कैसे ले सकती है और 131 वां संविधान संशोधन कैसे पास करा पाती? मोदी सरकार और विपक्ष के बीच न केवल 36 का आंकड़ा है बल्कि भारी अविश्वास और तनाव टकराव हर समय बना रहता है जिसके लिये खुद मोदी सरकार की मनमानी तानाशाह और फासिस्ट तौर तरीकों वाली कार्यशैली उत्तरदायी है। इस लिये नया परिसीमन और संसद की सीटें बढ़ाने वाला बिल बिना विपक्ष के सहयोग के न तो पास होना था और न ही हुआ और भविष्य में इसकी संभावना तब तक नहीं होगी जब तक मोदी सरकार बीजेपी संघ उसके प्रकोष्ठ और उसके वरिष्ठ नेता विपक्ष को टारगेट करना बदनाम करना और पक्षपात पूर्ण एसआईआर के द्वारा चुनाव में लेवल प्लेंयिंग फील्ड खत्म कर वोट चोरी कर चुनाव जीतने का विरोधी दलों का आरोप गलत साबित कर उनसे सौहार्दपूर्ण लोकतांत्रिक समानता और मैत्रीपूर्ण सम्बंध स्थापित कर सही मायने में संवैधानिक परंपराओं निष्पक्षता और सम्मान का परिचय नहीं देती है। एक शेर याद आ रहा है-
 *चाकू की पसलियों से सिफ़ारिश तो देखिये,* 
 *वे चाहते हैं काटने में उनको मदद करे।*

हुमायूं कबीर की पोल खुली

*मुसलमानों को नई पार्टी नहीं नई सोच की ज़रूरत है !*
       _इक़बाल हिंदुस्तानी 
0बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का सियासी शिगूफा छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का बीजेपी से करोड़ों रूपये लेकर चुनाव लड़ने का स्टिंग आॅप्रेशन कितना सच है यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस स्टिंग से इस आरोप को बल मिला है कि हुमायूं अपने निजी लाभ के लिये बीजेपी से मिले हुए हैं। ऐसे ही आॅल इंडिया मुस्लिम इत्तेहाद ए मुस्लिमीन के सदर असदउद्दीन ओवैसी पर जानकारों को काफी समय से शक है कि सदर साहब अपने 15000 करोड़ के कारोबार को बिना किसी जांच छापे और दबाव के सुरक्षित चलाने के लिये अपनी पार्टी को बीजेपी के इशारे पर मुसलमानों के वोट बांटने के लिये एक मोहरे के तौर पर सियासत में इस्तेमाल हो रहे हैं। इतना ही नहीं असम में पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद से जुड़े रहे मौलाना बदरूद्दीन अजमल पर भी एआईयूडीएफ बनाकर मुस्लिम वोट को कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी से अलग कर राज्य में बीजेपी की सरकार बार बार बनने का रास्ता साफ करने का आरोप लगता रहा है।     
      हुमायूं कबीर के बारे में यह स्टिंग आॅप्रेशन सामने आया है कि उन्होंने मुसलमानों को बंगाल में टीएमसी से अलग कर बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने के लिये एक हज़ार करोड़ का सौदा किया है। उसके बाद इस स्टिंग के असली नकली होने को लेकर दोनों पक्षों में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। हालांकि इस स्टिंग की निष्पक्ष जांच होने तक दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सच क्या है लेकिन सियासत में कभी कभी केवल आरोपों चर्चाओं और अफवाहों से ही राजनीतिक नफा नुकसान वक्ती तौर पर जो होना है वह तो हो ही जाता है। इस स्टिंग के बाद ममता बनर्जी के इस आरोप को पर लग गये हैं कि हुमायूं बीजेपी का ही आदमी है। इसके बाद ओवैसी ने हुमायूं की जनता उन्नयन पार्टी से अपना गठबंधन तत्काल तोड़ लिया है। इससे जउपा को भी अब पहले की तरह मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात पहले दिन से ही शक के दायरे में थी कि जिस पांच सौ साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को संघ और बीजेपी कई दशक से नेस्तो नाबूद करने पर तुले थे, और आखिरकार 1992 में उसको तोड़ भी दिया गया फिर कोर्ट का आस्था के आधार पर फैसला आया और उस जगह राम मंदिर बनाया गया। ऐसे में हुमायूं के बाबरी के नाम के पर बंगाल में कारसेवा से फिर से एक मस्जिद का बनाना और उस पर संघ परिवार का चुप रहना यहां तक कि कोर्ट का उस पर स्टे न देना समझ से बाहर था। अब यह राज़ काफी हद तक खुल गया है। ऐसे ही जिस तरह की संदिग्ध बांटने वाली और सेकुलर दलों से मुसलमानों को अलग करने वाली घटिया सियासत ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कर रही है। जिसमें वह कई राज्यों में कुछ हद तक सफल भी होती नज़र आ रही है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि ओवैसी मुसलमानों की दुश्मन नंबर वन मानी जाने वाली बीजेपी की जगह सेकुलर दलों का ही विरोध क्यों करते हैं? ओवैसी को गोदी मीडिया में विपक्ष केेेे नेता राहुल गांधी से कई गुना अधिक कवरेज क्यों दी जाती है?
          साथ ही सारे विपक्षी दलों उनके नेताओं यहां तक कि उनको चंदा देने वाले व्यापारी व्यवसायी और काॅरपोरेट तक पर बार बार परेशान करने की नीयत से सीबीआई इडी और इनकम टैक्स सहित तमाम जांच एजंसियों के छापे मारने वाली बीजेपी सरकार ओवैसी पर कभी कोई छापा जांच या मुकदमा दायर क्यों नहीं करती? ऐसे और भी कई गंभीर आरोप और संदेह ओवैसी पर किये जाते रहे हैं जिन पर आज तक वह कोई ठोस सफाई जवाब या वजह नहीं बता सके हैं। जहां तक असम के मौलाना अजमल का सवाल है। उनके ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करते ही मौलाना मदनी की जमीयत ए उलेमा ने कड़ा विरोध जताते हुए उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मौलाना अजमल का भी बहुत बड़ा इत्र का कारोबार है लेकिन इस इत्र से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने की बदबू आती रही है। पिछली बार चुनाव में असम में मौलाना अजमल की सांप्रदायिक पार्टी से कांग्रेस को गठबंधन का भारी सियासी नुकसान हुआ था वर्ना राजनीतिक जानकारों का कहना था कि माहौल ऐसा था कि कांगे्रस पांच साल पहले ही असम में सरकार बना सकती थी। इस बार कांग्रेस के सत्ता में वापसी के अच्छे आसार इस लिये भी माने जा रहे हैंे कि उसने मौलाना की एआईयूडीएफ से खुद को अलग कर लिया है। वैसे तो यह साफ नहीं कि मौलाना का भी अलग पार्टी बनाकर मुसलमानों के वोट बांटने से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाना या अपने अरबों के इत्र कारोबार को आराम से बिना सरकारी दखल के चलाना सोची समझी योजना का हिस्सा है या यह महज़ इल्ज़ाम ही है लेकिन इतना तो साफ है कि मौलाना हों ओवैसी हों या हुमायूं इनके जैसे स्वार्थी संदिग्ध और बीजेपी की बी टीम माने जाने वाले सेकुलर दलों से अलग चलकर मुसलमानों के वोट सेकुलर दलों से काटने को चुनाव लड़ना यह चीख चीख कर बताता है कि कुछ तो पर्दे के पीछे चल ही रहा है। अधिकांश मुसलमान इस तरह की चाल साज़िश और मिलीभगत को समझ रहा है तो चंद कट्टर तंगनज़र और फिर्कापरस्त मुसलमान इनके झांसे में आकर अपना वोट इनको देकर दो चार या पांच दस हज़ार के अंतर से बीजेपी या उसके घटकों को जिताने का औज़ार भी बनने लगा है।
             यह सही है कि हर धर्म जाति या क्षेत्र के लोगों में आपको ओवैसी हुमायूं और मौलाना अजमल जैसे नासमझ नादान या जानबूझकर मीर जाफर बनने वाले चालाक मक्कार और धूर्त नेता भी मिल ही जायेंगे लेकिन आज का सियासी दौर यह कहता है कि मुसलमानों को किसी मुस्लिम नेता या दल के बीजेपी की तरह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता जातिवाद झूठ नफरत और हिंसा की घटिया राजनीति के झांसे में न आकर सेकुलर सर्वहारा और गरीब हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहिये। जिसके लिये उनको नई मुस्लिम पार्टी नये आग उगलने वाले भाषण देने वाले नेता या बिके हुए सेकुलर दल विरोधी संकीर्ण नेता की नहीं बल्कि नई सोच की ज़रूरत है। बाकी उनकी जायज़ शिकायतंे मांगे और अधिकार बीजेपी जैसी पार्टी का अराजक राज का दौर खत्म होने या उसके सत्ता से धीरे धीरे बाहर होने के बाद ही मिल सकता है। एक पत्रकार के तौर पर हमने 40 साल में देखा है कि मुसलमानों का जितना पैसा मस्जिद मदरसा तब्लीगी जमात हज कुरबानी मुशायरा महंगी शादी दहेज़ बाइक मोबाइल कवाब पार्टी कव्वाली उर्स वगैरा में खर्च होता है। उतना स्कूल काॅलेज यूनिवर्सिटी धर्मार्थ अस्पताल धर्मशाला आंखों के आॅपे्रशन का कैम्प खेलकूद सांस्कृतिक प्रोग्राम विकलांगों की मदद विधवा व अनाथ बच्चो की देखभाल गरीब मगर काबिल बच्चो की कोचिंग साम्प्रदायिक एकता व भाईचारे के लिये मिलन प्रोग्राम या चैरिटी के कामों में खर्च नहीं होता। आज वक़्त की मांग है कि मुसलमान डबल सी यानी कैरेक्टर व कंडक्ट मतलब किरदार व अख़लाक़ और डबल ई यानी एजुकेशन व इकाॅनोमी मतलब तालीम व पैसा कमाने पर कट्टरपंथी दकियानूसरी और अंधविश्वासी सोच छोड़कर पूरा ज़ोर दें। उनको तालीम में भी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा पर तवज्जो देनी होगी। उनको परिवार नियोजन भी अपनाना होगा। उनको बैंक और बीमा के क्षेत्र में जो सुविधायें दूसरे समाज के लोग ले रहे हैं। उनका कथित वर्जित सहारा भी कट्टरपंथी लोगों की दकियानूसी बातें अनसुनी करके लेना होगा। आज दरअसल पैसा और शिक्षा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  
*0 लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के संपादक हैं।*