Wednesday, 29 April 2026

राकेश अग्रवाल जी

*चंद्रा_कत्था_इंडस्ट्रीज_के_स्वामी_राकेश_अग्रवाल जी_नहीं_रहे*😢
नजीबाबाद जिला बिजनौर यूपी, स्थित चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के एम डी, चंद्रा ग्रुप के मुखिया स्व. श्री सुभाष चंद अग्रवाल के छोटे भाई पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ समाजसेवी स्व. नरेशचंद्र अग्रवाल के भतीजे , रामलीला कमेटी के संरक्षक और वरिष्ठ समाजसेवी व सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री राकेश कुमार अग्रवाल का 23 मार्च की रात दुखद निधन हो गया है। वे आगामी 10जुलाई को पूरे 75 वर्ष के होने वाले थे। उनको मंगलवार सुबह 10 बजे नजीबाबाद उनके स्टेशन रोड स्थित निवास चंद्रा हाउस पर लाया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के नमामि गंगा घाट पर 25 मार्च को 11.30 बजे होगा। #उनकी_शवयात्रा_सुबह_9_30_बजे_उनके_रेलवे_स्टेशन_रोड_स्थित_निवास_चंद्रा_हाउस_से_चलेगी।
     श्री अग्रवाल चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के साथ ही मानसरोवर बॉटलिंग कंपनी, मानसरोवर पेपर मिल, चंद्रा केमिकल, चंद्रा फ्रेगरेंस आर सी ए लीजिंग जैसी चंद्रा ग्रुप की अन्य अनेक कंपनियों के डायरेक्टर रहे और सीकेआई छाप कत्था कच्छ के साथ ही उनकी कंपनी के दिलरुबा पान मसाले ने देश विदेश में अपनी बेहतरीन इमेज बनाई जिससे नजीबाबाद को भी प्रसिद्धि मिली। उनकी थम्सअप फैक्ट्री के प्रोडक्ट भी अपने विशेष स्वाद के लिए पूरे भारत में मशहूर हुए और कई बार विले पार्ले ग्रुप मुंबई से एमबीसीएल को इसके लिए विशेष पुरस्कार मिले। उन्होंने गैर हिंदी भाषी देशों और भारत के राज्यों में हिंदी के लिए विशेष सेवा करने वाले विद्वानों को कई साल तक माता कुसुम कुमारी सम्मान देकर भी नजीबाबाद का नाम रोशन किया जिसकी चर्चा आकाशवाणी और दूरदर्शन से होने से लोग नगर व जनपद को अलग से पहचानने लगे थे। उनके चंद्रा ग्रुप से न केवल कई कंपनी बल्कि बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा हुए जिससे नगर का विकास हुआ।
      राकेश जी कुछ माह से बीमार चल रहे थे। वे दिल्ली के एक बड़े हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनका वहां जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर्स गहन चिकित्सा कक्ष में इलाज कर रहे थे। इससे पहले उनका उपचार कुछ समय तक मुंबई के अस्पताल में भी हुआ था। स्वास्थ्य कुछ बेहतर होने के बाद उनको दिल्ली स्थित उनके राजधानी वाले फ्लैट पर शिफ्ट कर दिया गया था। इस दौरान वे डॉ के परामर्श पर समय समय पर ट्रीटमेंट के लिए चिकित्सालय जाते रहते थे। एक सप्ताह पूर्व उनकी तबियत अधिक खराब हुई तो उनको अस्पताल में एडमिट कर दिया गया था। जहां उनका आईसीयू में रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर इलाज कर रहे थे। भर्ती होने के बाद उनकी तबीयत में विशेष सुधार नहीं हुआ और वे दिन ब दिन कमज़ोर होते गए। बेहतरीन डॉक्टर शानदार सुविधाओं वाले अस्पताल और हर संभव दवा के द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने पर भी उनको बचाया नहीं जा सका और उन्होंने सोमवार की रात 9.10 बजे अंतिम सांस ली। 
उल्लेखनीय है कि राकेश जी का व्यवहार परिवार कंपनी स्टाफ और समाज के सभी वर्गों के साथ बहुत उदार स्नेहशील और सहयोग करने वाला था। उनको सभी वर्गों के लोग पसंद करते थे। वे आर्ट ऑफ लिविंग, रामलीला कमेटी लायंस क्लब माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान सहित अनेक सामाजिक साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। नगर जनपद और देश के कोने कोने से जुड़े उनके मित्रो संबंधियों और सहयोगियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके साथ तीन दशक से अधिक सीकेआई में सर्विस करते हुए उनको हमने एक संरक्षक के रूप में महसूस किया। हमारी ओर से भी उनको विनम्र श्रद्धांजलि। 

Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?

परिसीमन बिल गिरा

*जिस विपक्ष के आप दुश्मन हैं, वह सरकार को सपोर्ट क्यों करेगा?* 
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*        
0 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार का 131 वां संविधान संशोधन विधेयक पहला बिल है। जो केंद्र सरकार के तमाम दांव पेंच विपक्ष को डराने धमकाने और महिला वोटों के लिये ललचाने के बादवजूद तीन चैथाई बहुमत यानी 528 मंे से 352 की जगह 298 मिलने से हासिल कर पाने से औंधे मुंह गिर गया। मोदी सरकार पहले ही जानती थी कि वह सीएए या अन्य धन विधेयक बताकर विवादित बिलों की तरह राज्यसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भी जैसे साम दाम दंड भेद से सामान्य बहुमत का जुगाड़ करके अपने बिल पास कराने में सफल रही है। इस बार ठीक वैसा ही होना मुश्किल नहीं नामुमकिन है। लेकिन उसको इतना भरोसा ज़रूर था कि अगर यह बिल किसी तरह से पास हो गया तो वह महिलाओं को यह कहकर खुश करेगी कि उसने महिलाओं का आरक्षण लागू करने के लिये आवश्यक संसदीय कार्यवाही अंजाम तक पहंुचा दी और अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो वह राजनीतिक लाभ लेने के लिये विपक्ष के खिलाफ विशेष तौर पर बंगाल और तमिलनाडू में यह प्रचार जमकर करेगी कि विपक्ष महिला विरोधी है। लेकिन विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जिस राजनीतिक दूरअंदेशी और सूझबूझ से मोदी सरकार की इस चाल को नाकाम करते हुए महिला आरक्षण का समर्थन और संविधान संशोधन विधेयक गिराकर चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर कराने और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कराने का बीजेपी को एक तरफा लाभ पहंुचाने वाला दांव नाकाम किया उससे अब मोदी सरकार काफी सदमें में नज़र आ रही है। हालांकि यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि मोदी सरकार इन हालात में 2029 के आम चुनाव में वर्तमान 543 संसदीय सीटों पर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू कर पायेगी या नहीं? लेकिन 2023 में 106 वां संविधान संशोधन पास कराने के बाद मोदी सरकार ने जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया था वह 16 अपै्रल की अधिसूचना जारी होने से लागू हो चुका है। इसके साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या 2029 के आम चुनाव से पहले जनगणना और नया परिसीमन पूरा हो पायेगा? क्योंकि अब तक का कानून यह है कि हर नई जनगणना के बाद संसदीय और राज्यों की विधानसभाओं का नया परिसीमन होना चाहिये। विपक्ष यह भी जानता है कि जिस तरह से बीजेपी सरकार के रहते अब तक असम और कश्मीर में नया परिसीमन इस तरह से किया गया है कि इससे बीजेपी को राजनीतिक लाभ और विपक्ष को नुकसान हुआ है।
        विपक्ष को पूरी आशंका है और सही भी है कि ऐसा ही लोकसभा का नया परिसीमन करने के दौरान किया जायेगा। यह नाराज़गी और डर खासतौर पर दक्षिण के राज्यों तमिलनाडू केरल कर्नाटक और आंध्रा में अधिक देखा जा रहा है। लेकिन आंध्रा में चन्दर बाबू नायडू का गठबंधन एनडीए यानी बीजेपी के साथ होने से वहां इस मुद्दे पर सत्ताधारी राजनेताओं में तो अधिक हलचल नहीं है लेकिन जनता में अन्य दक्षिणी राज्यों की तहर ही बेचैनी और सीटें व राज्य का कोटा घटने की आशंका मौजूद है। हो सकता है नायडू को इसका राजनीतिक नुकसान भी पहुंचे। 1951 में तत्कालीन 489 संसदीय सीटों को बढ़ाकर 494 और 1961 के बाद 522 और अंतिम बार 1971 में 543 नई जनगणना और परिसीमन के बाद किया गया था। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दक्षिण के जो राज्य देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कर परिवार नियोजन कर रहे हैं। अगर उत्तर भारत की तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से सीटों का परिसीमन कर उनके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ती है तो इससे एक नया विरोधाभास खड़ा होगा। उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बढ़ता देख तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42 वां संशोधन कर नये परिसीमन को 2001 तक के लिये रोक दिया था। इसका मकसद देश में परिवार नियोजन को बढ़ावा देना था। सन 2000 में 91 वां संविधान संशोधन कर एनडीए की वाजपेयी सरकार ने इस रोक को आगामी 25 साल और बढ़ाकर नये परिसीमन की मयाद 2026 कर दी। नये परिसीमन पर इस 50 साल की रोक का मकसद जनसंख्या का टीएफआर 2.1 यानि जन्म और मृत्यु दर समानता पर लाकर स्थिर करना था। संविधान सभा की सदस्य रेणुका राय का कहना था कि भविष्य में जब सबको समान अवसर मिलेंगे तो योग्य महिलाएं जनरल सीटों पर ही अपनी भागीदारी खुद बढ़ाती जायेंगी। बदकिस्मती से ऐसा व्यवहारिक रूप से कई दशक तक भी हो नहीं सका। जहां तक इंडिया गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों का मोदी सरकार के संविधान संशोधन बिल के विरोध का सवाल है। यह राजनीतिक गुणा भाग से तो स्वाभाविक ही है। मोदी सरकार बनने के बाद से जितना विपक्ष का दानवीकरण किया गया है। इतना देश स्वतंत्र होने के बाद से किसी सरकार ने नहीं किया। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब पीएम मोदी उनकी सरकार में शामिल मंत्री उनके बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें पुलिस प्रशासन अन्य जांच एजंसियां और उनका गोदी मीडिया ईडी सीबीआई इनकम टैक्स जीएसटी विभाग विभिन्न आयोग ट्रिब्यूनल यहां तक कि कुछ कोर्ट तक विपक्ष और उसके नेताओं को निशाने पर नहीं लेते हों। यहां तक कि कांग्रेस और सेकुलर दलों को तो देशद्रोही राष्ट्रविरोधी और विदेशी टूलकिट का एजेंट तक बताया जाता है।
         विपक्षी नेताओं पर पूरे देश में जगह जगह ऐसी बातों बयानों और भाषणों के लिये भी एफआईआर दर्ज करा दी जाती हैं जिनका उनसे कोई मतलब वास्ता भी नहीं होता। उनको सोशल मीडिया पर अकसर ट्राॅल किया जाता है। कुछ अंधभक्त तो उनसे नफरत और विरोध में इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनको और उनके परिवार महिलाओं और मासूम बच्चों तक पर बेशर्मी से कीचड़ उछालते हैं। उनको संसद में बोलने का अवसर नहीं दिया जाता, बोलने के दौरान उनका माइक बंद कर दिया जाता है, उनको जबरन सदन से बाहर निकाल दिया जाता है, उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जाता है, यहां तक कि नेता विपक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता छीनकर उनका घर रातो रात खाली करा लिया जाता है। ऐसा ही कई अन्य विपक्षी नेताओं महुआ मोइत्रा आादि के साथ समय समय पर अन्याय और पक्षपात किया जाता है। इतना ही नहीं विपक्ष की महाराष्ट्र की तरह कई राज्यों में सरकारें गिराकर बीजेपी अपने या एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में जबरन अवैध और असंवैधानिक रूप से सरकार बना लेती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि विपक्ष को सरकार विश्वास में कैसे ले सकती है और 131 वां संविधान संशोधन कैसे पास करा पाती? मोदी सरकार और विपक्ष के बीच न केवल 36 का आंकड़ा है बल्कि भारी अविश्वास और तनाव टकराव हर समय बना रहता है जिसके लिये खुद मोदी सरकार की मनमानी तानाशाह और फासिस्ट तौर तरीकों वाली कार्यशैली उत्तरदायी है। इस लिये नया परिसीमन और संसद की सीटें बढ़ाने वाला बिल बिना विपक्ष के सहयोग के न तो पास होना था और न ही हुआ और भविष्य में इसकी संभावना तब तक नहीं होगी जब तक मोदी सरकार बीजेपी संघ उसके प्रकोष्ठ और उसके वरिष्ठ नेता विपक्ष को टारगेट करना बदनाम करना और पक्षपात पूर्ण एसआईआर के द्वारा चुनाव में लेवल प्लेंयिंग फील्ड खत्म कर वोट चोरी कर चुनाव जीतने का विरोधी दलों का आरोप गलत साबित कर उनसे सौहार्दपूर्ण लोकतांत्रिक समानता और मैत्रीपूर्ण सम्बंध स्थापित कर सही मायने में संवैधानिक परंपराओं निष्पक्षता और सम्मान का परिचय नहीं देती है। एक शेर याद आ रहा है-
 *चाकू की पसलियों से सिफ़ारिश तो देखिये,* 
 *वे चाहते हैं काटने में उनको मदद करे।*

हुमायूं कबीर की पोल खुली

*मुसलमानों को नई पार्टी नहीं नई सोच की ज़रूरत है !*
       _इक़बाल हिंदुस्तानी 
0बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का सियासी शिगूफा छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का बीजेपी से करोड़ों रूपये लेकर चुनाव लड़ने का स्टिंग आॅप्रेशन कितना सच है यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस स्टिंग से इस आरोप को बल मिला है कि हुमायूं अपने निजी लाभ के लिये बीजेपी से मिले हुए हैं। ऐसे ही आॅल इंडिया मुस्लिम इत्तेहाद ए मुस्लिमीन के सदर असदउद्दीन ओवैसी पर जानकारों को काफी समय से शक है कि सदर साहब अपने 15000 करोड़ के कारोबार को बिना किसी जांच छापे और दबाव के सुरक्षित चलाने के लिये अपनी पार्टी को बीजेपी के इशारे पर मुसलमानों के वोट बांटने के लिये एक मोहरे के तौर पर सियासत में इस्तेमाल हो रहे हैं। इतना ही नहीं असम में पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद से जुड़े रहे मौलाना बदरूद्दीन अजमल पर भी एआईयूडीएफ बनाकर मुस्लिम वोट को कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी से अलग कर राज्य में बीजेपी की सरकार बार बार बनने का रास्ता साफ करने का आरोप लगता रहा है।     
      हुमायूं कबीर के बारे में यह स्टिंग आॅप्रेशन सामने आया है कि उन्होंने मुसलमानों को बंगाल में टीएमसी से अलग कर बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने के लिये एक हज़ार करोड़ का सौदा किया है। उसके बाद इस स्टिंग के असली नकली होने को लेकर दोनों पक्षों में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। हालांकि इस स्टिंग की निष्पक्ष जांच होने तक दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सच क्या है लेकिन सियासत में कभी कभी केवल आरोपों चर्चाओं और अफवाहों से ही राजनीतिक नफा नुकसान वक्ती तौर पर जो होना है वह तो हो ही जाता है। इस स्टिंग के बाद ममता बनर्जी के इस आरोप को पर लग गये हैं कि हुमायूं बीजेपी का ही आदमी है। इसके बाद ओवैसी ने हुमायूं की जनता उन्नयन पार्टी से अपना गठबंधन तत्काल तोड़ लिया है। इससे जउपा को भी अब पहले की तरह मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात पहले दिन से ही शक के दायरे में थी कि जिस पांच सौ साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को संघ और बीजेपी कई दशक से नेस्तो नाबूद करने पर तुले थे, और आखिरकार 1992 में उसको तोड़ भी दिया गया फिर कोर्ट का आस्था के आधार पर फैसला आया और उस जगह राम मंदिर बनाया गया। ऐसे में हुमायूं के बाबरी के नाम के पर बंगाल में कारसेवा से फिर से एक मस्जिद का बनाना और उस पर संघ परिवार का चुप रहना यहां तक कि कोर्ट का उस पर स्टे न देना समझ से बाहर था। अब यह राज़ काफी हद तक खुल गया है। ऐसे ही जिस तरह की संदिग्ध बांटने वाली और सेकुलर दलों से मुसलमानों को अलग करने वाली घटिया सियासत ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कर रही है। जिसमें वह कई राज्यों में कुछ हद तक सफल भी होती नज़र आ रही है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि ओवैसी मुसलमानों की दुश्मन नंबर वन मानी जाने वाली बीजेपी की जगह सेकुलर दलों का ही विरोध क्यों करते हैं? ओवैसी को गोदी मीडिया में विपक्ष केेेे नेता राहुल गांधी से कई गुना अधिक कवरेज क्यों दी जाती है?
          साथ ही सारे विपक्षी दलों उनके नेताओं यहां तक कि उनको चंदा देने वाले व्यापारी व्यवसायी और काॅरपोरेट तक पर बार बार परेशान करने की नीयत से सीबीआई इडी और इनकम टैक्स सहित तमाम जांच एजंसियों के छापे मारने वाली बीजेपी सरकार ओवैसी पर कभी कोई छापा जांच या मुकदमा दायर क्यों नहीं करती? ऐसे और भी कई गंभीर आरोप और संदेह ओवैसी पर किये जाते रहे हैं जिन पर आज तक वह कोई ठोस सफाई जवाब या वजह नहीं बता सके हैं। जहां तक असम के मौलाना अजमल का सवाल है। उनके ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करते ही मौलाना मदनी की जमीयत ए उलेमा ने कड़ा विरोध जताते हुए उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मौलाना अजमल का भी बहुत बड़ा इत्र का कारोबार है लेकिन इस इत्र से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने की बदबू आती रही है। पिछली बार चुनाव में असम में मौलाना अजमल की सांप्रदायिक पार्टी से कांग्रेस को गठबंधन का भारी सियासी नुकसान हुआ था वर्ना राजनीतिक जानकारों का कहना था कि माहौल ऐसा था कि कांगे्रस पांच साल पहले ही असम में सरकार बना सकती थी। इस बार कांग्रेस के सत्ता में वापसी के अच्छे आसार इस लिये भी माने जा रहे हैंे कि उसने मौलाना की एआईयूडीएफ से खुद को अलग कर लिया है। वैसे तो यह साफ नहीं कि मौलाना का भी अलग पार्टी बनाकर मुसलमानों के वोट बांटने से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाना या अपने अरबों के इत्र कारोबार को आराम से बिना सरकारी दखल के चलाना सोची समझी योजना का हिस्सा है या यह महज़ इल्ज़ाम ही है लेकिन इतना तो साफ है कि मौलाना हों ओवैसी हों या हुमायूं इनके जैसे स्वार्थी संदिग्ध और बीजेपी की बी टीम माने जाने वाले सेकुलर दलों से अलग चलकर मुसलमानों के वोट सेकुलर दलों से काटने को चुनाव लड़ना यह चीख चीख कर बताता है कि कुछ तो पर्दे के पीछे चल ही रहा है। अधिकांश मुसलमान इस तरह की चाल साज़िश और मिलीभगत को समझ रहा है तो चंद कट्टर तंगनज़र और फिर्कापरस्त मुसलमान इनके झांसे में आकर अपना वोट इनको देकर दो चार या पांच दस हज़ार के अंतर से बीजेपी या उसके घटकों को जिताने का औज़ार भी बनने लगा है।
             यह सही है कि हर धर्म जाति या क्षेत्र के लोगों में आपको ओवैसी हुमायूं और मौलाना अजमल जैसे नासमझ नादान या जानबूझकर मीर जाफर बनने वाले चालाक मक्कार और धूर्त नेता भी मिल ही जायेंगे लेकिन आज का सियासी दौर यह कहता है कि मुसलमानों को किसी मुस्लिम नेता या दल के बीजेपी की तरह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता जातिवाद झूठ नफरत और हिंसा की घटिया राजनीति के झांसे में न आकर सेकुलर सर्वहारा और गरीब हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहिये। जिसके लिये उनको नई मुस्लिम पार्टी नये आग उगलने वाले भाषण देने वाले नेता या बिके हुए सेकुलर दल विरोधी संकीर्ण नेता की नहीं बल्कि नई सोच की ज़रूरत है। बाकी उनकी जायज़ शिकायतंे मांगे और अधिकार बीजेपी जैसी पार्टी का अराजक राज का दौर खत्म होने या उसके सत्ता से धीरे धीरे बाहर होने के बाद ही मिल सकता है। एक पत्रकार के तौर पर हमने 40 साल में देखा है कि मुसलमानों का जितना पैसा मस्जिद मदरसा तब्लीगी जमात हज कुरबानी मुशायरा महंगी शादी दहेज़ बाइक मोबाइल कवाब पार्टी कव्वाली उर्स वगैरा में खर्च होता है। उतना स्कूल काॅलेज यूनिवर्सिटी धर्मार्थ अस्पताल धर्मशाला आंखों के आॅपे्रशन का कैम्प खेलकूद सांस्कृतिक प्रोग्राम विकलांगों की मदद विधवा व अनाथ बच्चो की देखभाल गरीब मगर काबिल बच्चो की कोचिंग साम्प्रदायिक एकता व भाईचारे के लिये मिलन प्रोग्राम या चैरिटी के कामों में खर्च नहीं होता। आज वक़्त की मांग है कि मुसलमान डबल सी यानी कैरेक्टर व कंडक्ट मतलब किरदार व अख़लाक़ और डबल ई यानी एजुकेशन व इकाॅनोमी मतलब तालीम व पैसा कमाने पर कट्टरपंथी दकियानूसरी और अंधविश्वासी सोच छोड़कर पूरा ज़ोर दें। उनको तालीम में भी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा पर तवज्जो देनी होगी। उनको परिवार नियोजन भी अपनाना होगा। उनको बैंक और बीमा के क्षेत्र में जो सुविधायें दूसरे समाज के लोग ले रहे हैं। उनका कथित वर्जित सहारा भी कट्टरपंथी लोगों की दकियानूसी बातें अनसुनी करके लेना होगा। आज दरअसल पैसा और शिक्षा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  
*0 लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के संपादक हैं।*

ईरान ने अमेरिका का घमंड तोड़ा

*ईरान ने अमेरिका के सुपरपाॅवर होने का भरम तोड़ दिया है!*
0 ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं।
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*    
          दो चार दिन में खत्म होने का दावा कर अमेरिका इज़राइल द्वारा शुरू किया गया ईरान युध्द एक महीने से अधिक होने के बावजूद चल रहा है। ऐसा लगता है कि ईरान ने आखिरी सैनिक और आखिरी गोली खत्म होने तक सीज़फायर नहीं करने का दुस्साहसी फैसला कर रखा है। यानी हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेेंगे वाली कहावत लागू हो रही है। ट्रंप एक तो पहले ही स्थिर दिमाग वाले इंसान नहीं हैं। दूसरे उनमें घमंड और बड़बोलापन भरा हुआ है जिसकी वजह से वे ईरान पर हमला करके फंस चुके हैं। अब उनको समझ नहीं आ रहा है कि जंग बीच मेें रोककर भागे तो दुनिया में अमेरिका की नाक कट जायेगी। अगर वे जंग जारी रखते हैं तो भी उनको जल्दी ही जीत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है। ऐेसे में वे कभी यह झूठा दावा करते हैं कि उनका ईरान पर हमले का मकसद पूरा हो गया है। जिसमें वे कहते हैं कि ईरान का परमाणु प्रोग्राम मिसाइल भंडार और सैनिक क्षमता सब कुछ पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। लेकिन जब ईरान लगातार इजराइल और खाड़ी के देशों में अमेरिकी बेस पर और तेज़ हमले करता है तो उनके दावों की पोल खुल जाती है। इसके बाद ट्रंप बौखलाकर नया झूठ बोलते हैं कि ईरान से सीज़फायर पर बात चल रही है। लेकिन ईरान बिना देर किये किसी भी तरह की समझौता वार्ता का खंडन कर देता है। इसके बाद ट्रंप एक बार फिर बयान जारी करते हैं कि हमारी ईरान से मित्र देशों के ज़रिये गोपनीय समझौता वार्ता जारी है। तब ईरान ऐसी बातचीत शुरू करने के लिये कुछ नामुमकिन शर्ते रख देता है। जिनमें जंग में हुआ नुकसान अमेरिका से दिलाने ईरान को भविष्य में किसी तरह का हमला नहीं करने की गारंटी देने और परमाणु प्रोग्राम जारी रखने की आज़ादी देने सहित उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग शामिल होती है। इसके साथ ही वह होरमुज़ जलडमरू मध्य पर लगातार अपना कब्जा जारी रख वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से टोल वसूली कर अपना पिछले कई दशक हुआ नुकसान पूरा करने की छूट चाहता है।
       ज़ाहिर बात है कि अमेरिका इन मांगों को पूरा नहीं करेगा। लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है कि ईरान इस समय चित भी मेरी पट भी मेरी वाला अमेरिका का ही खेल खेल रहा है और जिस अमेरिका का यह मनमानी का रिकाॅर्ड रहा है वह सांप छछूंदर की हालत में फंस चुका है। अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ नो किंग के बैनर तले 80 लाख लोग सड़क पर उतर आये हैं। इससे ट्रंप को आने वाले मिड टर्म चुनाव में हारने का डर भी सता रहा है। उधर नाटो अमेरिका का साथ नहीं दे रहा है। इसके साथ ही ईरान के हमलों से बचाने में नाकाम होने पर खाड़ी देश अमेरिका से बुरी तरह नाराज़ हो गये हैं। इसके साथ ही पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा होने और दाम बढ़ते जाने से अमेरिका के मित्र देशों का दबाव भी ट्रंप पर हर हाल में जल्दी से जल्दी जंग रोकने का बढ़ता जा रहा है। जहां तक ईरान के एटमी प्रोग्राम को खत्म करने का ट्रंप के दावे का सवाल है। ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं। इसके साथ ही ईरान ने मिसाइल मेट्रो यानी आॅटोमैटिक रेल सिस्टम पहाड़ के अंदर बना रखा है। यह सिस्टम असैंबली हाॅल गोला बारूद डिपो और पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित कम से कम दस निकास रास्तों को जोड़ती है।
         इस सिस्टम से ईरान लाॅंचर रेल पर पहले निकास द्वार की तरफ आता है, फिर सतह से उूपर जाता है। मिसाइल दागता है। इसके फौरन बार वापस अंडर ग्राउंड हो जाता है। इसके साथ एंट्री गेट को बख्तरबंद एयरलाॅक से सील कर दिया जाता है। यदि प्रवेश द्वार किसी हमले में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तो उनको अंदर से हाईपाॅवर वाले कंक्रीट से तत्काल मरम्मत कर सील कर दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया दुश्मन के जवाबी हमले में लगने वाले समय से आधे से भी कम में पूरी हो जाती है। यही वजह है कि अमेरिका इज़राइल हमवाई हमलों से केवल उन गिने चुने राॅकेट लांचरों को नष्ट कर पाये हैं जो ज़मीन की सतह पर मौजूद थे।यह भी बताया जाता है कि तकनीक के मामले में चीन रूस और उत्तरी कोरिया ईरान की भरपूर सहायता कर रहे हैं। जिससे वह दुश्मन के ठिकानों को खोजने निशाना लगाने और उसके आईरन डोम जैसे एंटी सैप्टर को चकमा देने में काफी सीमा तक सफल हो रहा है। ट्रंप ईरान की इस रण्नीति से बौखलाकर कभी उसको परमाणु हमले की धमकी देते हैं तो कभी उसके सबसे बड़े एनर्जी सेंटर खार्ग पर हमला कर कब्जा़ करने की बात करते हैं। ट्रंप अपनी सेना ईरान भेजने का इरादा भी जताते हैं लेकिन वियतनाम ईराक और अफगानिस्तान की कई दशक की नाकामी उनके कदम रोक देती है। कहने का मतलब यह है कि ट्रंप चारों तरफ से फंस चुके हैं। उनके अरबों मिलियन डाॅलर के खर्च पर ईरान कुछ हज़ार की हल्की मिसाइल और ड्रोन हमले करके उनको खूब चिढ़ा रहा है। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि अगर कोई देश कोई संगठन या कोई आदमी अपने सर पर कफन बांधकर अपने से कई गुना ताक़तवर से हिम्मत और बेहतर रण्नीति के साथ हारने और नुकसान उठाने का जोखिम उठाकर भिड़ जाये तो उसकी सर्वशक्तिमान या अजेय होने की पोल ऐसे ही खुल जाती है जैसे आज अमेरिका और इजराइल की खुल रही है। ईरान जंग जब भी खत्म होगी दुनिया पहले से काफी बदल जायेगी। शायर ने कहा है- मुश्किल कोई आन पड़े तो घबराने से क्या होगा, जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा।
 *नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Tuesday, 17 March 2026

लालच बुरी बला


*अधिक फायदे के लालच में फंसे तो पछताना पड़ेगा....*
कम पढ़े लिखे गरीब और सीधे सादे लोगों को कुछ महीने साल और अवधि के बाद कोई न कोई कंपनी फर्म और व्यक्ति धोखा देकर ठग लेता है, लेकिन इस लूट का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाता है। एक बार मशहूर ठग नटवर लाल से एक पत्रकार ने सवाल किया कि आप लोगों को बार बार कैसे ठगने में कामयाब हो जाते हैं तो नटवर का जवाब था कि हम नहीं ठगते इंसान का लालच उसको नुकसान उठाने को मजबूर करता है। नटवर का दावा था दुनिया में जब तक लालच है, उसका ठगी का धंधा पुलिस नहीं कोई भी नहीं रोक सकता। पिछले दिनों नजीबाबाद में हर्षवाड़ा बाईपास पर स्थित कंपनी ड्रीम सन शाइन डिजिटल लोगों का करोड़ों रुपया ठगकर फ़रार हो चुकी है। यह न तो पहली बार हुआ और न आखिरी बार। इससे पहले अमरीन एप्लाइंसेज़ नाम की कंपनी भी ऐसे ही लोगों को ठग कर भाग चुकी है। इसकी वजह यह है कि गरीब अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग या कुछ उच्च शिक्षित भी जागरूकता के अभाव में लालच के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। उनका दिमाग़ यह काम नहीं करता कि दुनिया में ऐसा कौन सा बिज़नेस हो सकता है जिसमें घाटा न होने की गारंटी हो? साथ ही हर महीने 5 से 10% प्रॉफिट कैसे और कहां से मिल सकता है? ड्रीम डिजिटल ने भी लोगों को एक ही रात में लखपति बनने का सपना दिखाया करोड़ों का चूना लगाया और रातों रात फरार हो गई। हमने जब इस बारे में तफसील से जानकारी की तो पता लगा पहले यह कंपनी ढाई प्रतिशत ब्याज मासिक दे रही थी, फिर पांच फ़ीसदी किया और अब रमज़ान की बरकत बताकर नौ परसेंट रिटर्न कर दिया था। कुछ लोगों को मोटा कमीशन देकर लोगों को इनके जाल में फंसाने को लगा रखा था। अनेक लोगों ने जो प्रॉफिट इस कंपनी से कमाया था, वो भी और अधिक फ़ायदा कमाने को इसी में रि इनवेस्ट करते गए। कुछ ने अपनी ज़मीन ज़ेवर और बैंक से एक प्रतिशत मासिक ब्याज पर क़र्ज़ लेकर भी बड़ी रकम लगा रखी थी। कंपनी का दावा था कि उनका मुंबई में मिनरल वाटर का बड़ा कारोबार है, जिसमें रॉ मैटीरियल यानि पानी की कोई कीमत नहीं अदा करनी होती, बस उसको पैक करके मार्केट में बेचने से मुनाफा 25/50 परसेंट तक है। जिसमें से वो खर्च निकालकर 5 से 10 प्रतिशत अपने निवेशकों को दे रही है, जबकि यह कोरा झूठ था। इस लेखक ने पता किया कंपनी का मुंबई नहीं देश में कहीं भी कोई भी कारोबार नहीं था, जो पता दिया था वो भी फर्जी था। जो नम्बर दिए थे वो कभी बोलते ही नहीं थे। साथ ही कंपनी का आरबीआई में कोई रजिस्ट्रेशन नहीं था। जानकारी करने पर इस लेखक ने अपने कई मित्रों और रिश्तेदारों को इस कंपनी से दूर रहने की सलाह दी थी, जिससे उनका भारी नुकसान बच गया और वे इस लेखक को आज शुक्रिया बोल रहे हैं। भविष्य में भी हमारा सभी को मशवरा है ऐसे लालच धोखे और फर्जी कंपनी के जाल में फंसकर निवेश नहीं करें नहीं तो जीवन भर पछताना पड़ेगा। यह भी याद रखें एक बार आपको आर्थिक झटका लगा तो फिर संभलना मुश्किल हो जाता है। 
*नोट_लेखक वरिष्ठ पत्रकार लेखक और ब्लॉगर हैं।*

Wednesday, 11 March 2026

ईरान पर हमला

*बेशक अंत में हार ही जायेगा ईरान, 
लेकिन जंग से होगा सबका नुकसान!* 
      *-इक़बाल हिन्दुस्तानी* 
0 ट्रंप जंग चालू होते ही यह भी कह रहे थे कि ईरान के 85 प्रतिशत हथियार खत्म किये जा चुके हैं। अगर यह बात सही होती तो जंग दो चार दिन में खत्म हो जाती लेकिन ईरान जितनी बहादुरी सुनियोजित और रण्नीतिक तौर पर दस दिन बाद भी पूरी ताकत हिम्मत और आश्चर्यजनक तरीके से लड़कर इतना नुकसान उठाने के बाद भी अमेरिका इस्राइल और पड़ौसी अरब देशों को नुकसान पहुंचा रहा है। उससे ऐसा लगता है कि वह इस जंग को जितना हो सके उतना लंबा खींचने और पूरी दुनिया को अमेरिकी ज़िद गल्ती और दुस्साहस के नुकसान का अहसास कराने का मन बना चुका है। ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद कर दुनिया में तेल आने के 20 से 25 प्रतिशत रास्ते को पहले ही बंद कर दिया है।
        अमेरिका ने इस्राइल के दबाव में ईरान पर जंग थोपकर अपना मनमाना तानाशाह और साम्राज्यवादी अभियान आगे बढ़ाया है। उसके पास इस जंग को शुरू करने के कोई वाजिब कारण नहीं है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने देश के सुपर पाॅवर होने के कारण इस जंग को ईरान ही नहीं अप्रत्यक्ष रूप से पूरी दुनिया पर जबरन थोप दिया है। ट्रंप ने पहले दावा किया कि यह जंग दो चार दिन में जीत लेंगे। लेकिन जब ईरान ने अपने टाॅप मज़हबी सुप्रीमो आयतुल्लाह खामेनई के साथ ही कई बड़े नेता मंत्री और सैनिक कमांडर पहले ही हमले में खोने के बावजूद अमेरिका इस्राइल के हमलों का ज़बरदस्त जवाब देना शुरू किया तो ट्रंप ने ईरानी जनता को भड़काकर सड़क पर आने और अपनी सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिये उकसाया। मगर ईरानी लाखों की तादाद में रोड पर तो आये मगर अपनी सरकार और अपने सुप्रीम इस्लामी लीडर खामेनई के पक्ष में उनके लिये शोक मनाने उनको श्रध्दांजलि देने और उनके साथ अपनी एकता ज़ाहिर करने को आये। इसके बाद ट्रंप ने ईराक सीरिया और ईरान के सीमावर्ती कुर्दों को उकसाया कि सब मिलकर बगावत कर दें तो उनको लड़ने के लिये हथियार धन और इस समय अलग देश मिल सकता है। लेकिन ईराक जंग के समय अमेरिका से धोखा खाये कुर्दों ने बाकायदा पत्र लिखकर इस आत्मघाती और धूर्त प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बाद ट्रंप ने ईरान के आसपास के अरब मुल्कों को यह कहकर जंग में कूदने के लिये तैयार करना चाहा कि ईरान ने उन पर हमला करके खुद अपनी कब्र खोद ली है। लेकिन एक तरफ ईरान ने यह साफ कर दिया कि उसकी इन पड़ौसी अरब मुल्कों से कोई सीधी दुश्मनी नहीं है। वह तो बस उन अमेरिकी सैनिक अड्डों को निशाना बना रहा है।
        जिस अमेरिका ने उस पर बिना वजह जंग लाद दी है। इसके साथ ही ईरान ने पड़ौसी खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैनिक अड्डों पर हमले के दौरान उन मुल्कों उनकी जनता और बुनियादी ढांचों को अनजाने में पहुंचे नुकसान पर अफसोस जताकर आगे से ऐसे हमले करने के दौरान ज़रूरी एहतियात बरतने और भविष्य में उनको निशाना बनाने से बचने का बयान देकर ट्रंप का यह खेल भी खराब कर दिया। इसके साथ ही ट्रंप ने बार बार दावा किया कि जंग का मकसद ईरान में सरकार बदलना है। लेकिन वहां न तो सरकार बदली है और न ही निकट भविष्य में बदलने के आसार नज़र आ रहे हैं। ट्रंप का यह भी कहना था कि ईरान अपना नया धार्मिक सर्वोच्च नेता उनकी सहमति से चुने लेकिन ईरान ने मरहूम खामेनई के बेटे मुजतब खामेनई को उनकी जगह खुद चुनकर ट्रंप के इस दावे की भी हवा निकाल दी। ट्रंप का यह भी कहना था कि वह ईरान के परमाणु केंद्रों को हमेशा के लिये नष्ट कर देंगे लेकिन अभी तक वे ऐसा भी नहीं कर पाये हैं। ट्रंप का यह भी सपना है कि ईरान की बेलेस्टिक मिसाइल ड्रोन और दूसरे घातक हथियारों को जंग शुरू होने के पहले सप्ताह मंें खत्म करके उसकी सैनिक कमर तोड़ दी जाये। लेकिन अब तक ऐसा भी कुछ नहीं हुआ। ट्रंप जंग चालू होते ही यह भी कह रहे थे कि ईरान के 85 प्रतिशत हथियार खत्म किये जा चुके हैं। अगर यह बात सही होती तो जंग दो चार दिन में खत्म हो जाती लेकिन ईरान जितनी बहादुरी सुनियोजित और रण्नीतिक तौर पर दस दिन बाद भी पूरी ताकत हिम्मत और आश्चर्यजनक तरीके से लड़कर इतना नुकसान उठाने के बाद भी अमेरिका इस्राइल और पड़ौसी अरब देशों को नुकसान पहुंचा रहा है। उससे ऐसा लगता है कि वह इस जंग को जितना हो सके उतना लंबा खींचने और पूरी दुनिया को अमेरिकी ज़िद गल्ती और दुस्साहस के नुकसान का अहसास कराने का मन बना चुका है। ईरान ने होरमुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद कर दुनिया में तेल आने के 20 से 25 प्रतिशत रास्ते को पहले ही बंद कर दिया है। दूसरी तरफ तेल रिफाइनरीज़ पर हो रहे हमलों से कच्चे तेल के दाम 70 डाॅलर प्रति बैरल से बढ़कर 110 डालर तक पहंुच चुके हैं। क्रूड आॅयल के रेट जंग चलती रही तो जल्दी ही 150 डाॅलर तक पहंुच जाने के आसार बनते जा रहे हैं।
          इससे पूरी दुनिया में न केवल तेल और गैस की कमी होने का खतरा मंडरा रहा है बल्कि आवागमन और यातायात व माल ढुलाई का खर्च बढ़ने से सभी वस्तुओं के दाम बढ़ने से समस्त विश्व में महंगाई का खतरा भी बढ़ गया है। बताते हैं कि ईरान जो मिसाइल और ड्रोन हमले के लिये प्रयोग कर रहा है उनको रोकने के लिये इस्राइल का आयरन डोम आयरन मोम बन गया है और अमेरिका का अधिकतर एंटी मिसाइल सिस्टम पड़ौसी अरब मुल्कों में ईरान ने तबाह कर दिया है जो बचा है उसका खर्च अरबों डाॅलर होने की वजह से अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उधर अमेरिका को अपनी ज़मीन और बड़ी रकम अपनी रक्षा के लिये देने वाले अरब मुल्क ट्रंप से बेहद नाराज़ नज़र आ रहे हैं क्योंकि वह केवल इस्राइल की रक्षा के चक्कर में अरब मुल्कों को उनके हाल पर छोड़कर छिपकर तमाशा देख रहा है। ऐसा लगता है कि ईरान बेशक अमेरिका से यह जंग एक दिन हार जायेगा लेकिन वह तब तक अमेरिका इस्राइल पड़ौसी अरब मुल्कों और पूरी दुनिया के अमेरिकी समर्थकों के साथ न्यूटल देशों को भी जाने अनजाने सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर काफी भारी नुकसान पहुंचाकर ही हथियार डालेगा। लेकिन वियतनाम और अफगानिस्तान में हमला करके मुंह की खाने वाला अमेरिका इस बेशर्मी नाकामी और जगहंसाई से कोई सबक सीखेगा यह कोई दावे से नहीं कह सकता। अलबत्ता ईरान के सुप्रीम मज़हबी लीडर मरहूम अयातुल्लाह खामेनई की कई बातों से असहमत होते हुए भी हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि खामेनई ने ट्रंप के सामने ना झुककर इस्राईल से ब्लैकमेल ना होकर बुज़दिल की तरह बंकर में ना छिपकर मौत सामने देखकर भी निडरता से शहीद होकर अमेरिका इस्राईल और ट्रंप को पूरी दुनिया में बदनाम नाकाम और ज़लील कर खुद को इतिहास में अमर कर लिया है। खामेनई के लिये शायर ने कहा है- मैं यह नहीं कहता कि मेरा सर ना मिलेगा, लेकिन मेरी आंखों में तुझे डर ना मिलेगा।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 26 February 2026

राहुल गांधी को जेल क्यों नहीं भेजते?

*राहुल गांधी देश के लिये ख़तरा हैं तो सरकार जेल क्यों नहंी भेजती?* 
0 इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों को देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
    *-इक़बाल हिन्दुस्तानी*
      कांग्रेस नेता और लीडर आॅफ अपोज़ीशन राहुल गांधी ने पिछले दिनों मोदी सरकार बीजेपी और संघ पर कई गंभीर राजनीतिक आरोप लगाये। संसद में अपनी बात रखते हुए जब उनको आरोपों को साबित करने की चुनौती दी गयी तो उन्होंने प्रमाण प्रस्तुत करने की हामी भरी। लेकिन तभी सदन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भाजपा नेता जगदंबिका पाल ने मौके की नज़ाकत समझते हुए सरकार की और किरकिरी होने से बचाने के लिये राहुल गांधी को निर्देश दिया कि सबूत पेश करने की कोई ज़रूरत नहीं है, राहुल जल्दी से जल्दी अपनी बात खत्म करें। दरअसल राहुल गांधी ने कुछ समय से मोदी सरकार के खिलाफ बहुत कड़ा रूख़ अपना रखा है। उन्होंने संसद में बोलते हुए आरोप लगाया कि पूर्व सेनाध्यक्ष नरवाणे ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि जब चीन हमारे देश में घुसपैठ कर रहा था तो उनको बार बार अनुमति मांगने पर भी चीन को कड़ा मुंहतोड़ सैनिक जवाब देने की तत्काल छूट नहीं दी गयी। जबकि पीएम मोदी बार बार अपनी छाती 56 इंच बताकर देश को झुकने नहीं देने का झूठा दावा करते रहे हैं। राहुल गांधी का यह भी दावा था कि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौता किया है। उसमें देश के हितों से समझौता किया गया है। इस एकतरफा और ट्रंप के दबाव में किये गये एग्रीमेंट से भारत के किसानों की कमर टूट जायेगी। राहुल गांधी का यह भी आरोप रहा है कि चर्चित और विवादित यौन आरोपों से भरी एप्सटीन फाइल में मोदी सहित उनके एक खास केंद्रीय मंत्री और उनके करीबी एक बड़े उद्योगपति का नाम आया है। इसके साथ ही संसद में जब भी मौका मिलता है, राहुल गांधी मोदी सरकार पर चुनाव आयोग के द्वारा वोट चोरी कर चुनाव जीतने का गंभीर आरोप भी बार बार लगाते आ रहे हैं। इन जैसे और भी कई बड़े राजनीतिक आरोप राहुल गांधी मोदी सरकार के साथ ही बीजेपी और आरएसएस पर लगातार लगाते आ रहे हैं। इसमें कोई नई या आश्चर्य की बात भी नहीं है। क्योंकि विपक्षी नेता का यही काम होता है।
        पहले तो जब वे विपक्ष के नेता के पद पर नहीं थे और संघ परिवार ने उनकी छवि ’’पप्पू‘‘ की बना रखी थी, उनकी बात को कोई खास वेट नहीं मिलता था। राहुल गांधी जब जब विदेश जाते हैं, वहां भी वे भारत में मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे संविधान लोकतंत्र और कानून के राज के खिलाफ कामों पर चिंता जताते रहे हैं। इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही अन्य भाजपा नेता और भी गंदी घटिया और निचले स्तर की भाषा का प्रयोग करते हुए राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि अगर वास्तव में राहुल गांधी इतने बड़े ‘‘कुख्यात अपराधी’’हैं तो सरकार उनके खिलाफ संसदीय या कानूनी कार्यवाही कर अब तक उनको जेल क्यों नहीं भेज रही? ऐसा लगता है कि पहली बार किसी विपक्षी नेता ने साहस दिखाते हुए संसद उसके बाहर देश में और मौका मिलने पर विदेश में मोदी सरकार की तथ्यों तर्कों और प्रमाणों के साथ कथनी करनी में भारी अंतर की पोल खोलकर उसको आईना दिखा दिया है जिससे सरकार तिलमिला बौखला और डर गयी है लेकिन राहुल गांधी का अब तक तो कुछ बिगाड़ नहीं पाई है। सरकार राहुल को जेल भेजकर उनके हीरो बनने से भी डरती है। लगता है भविष्य में किसी पुराने मामले में राहुल गांधी को सज़ा दिलाकर संसद से निकालकर जल्दी ही सबक सिखाया जा सकता है। मोदी सरकार पर इस मामले में शायर ने क्या खूब कहा है- दूसरों पर जब तब्सिरा किया कीजिये, आईना सामने रख लिया कीजिये।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मधुसूदन आनंद

*मधुसूदन आनंदः जिन्होंने देश में किया नजीबाबाद का नाम बुलंद!* 
      -इक़बाल हिन्दुस्तानी
     नजीबाबाद के मूल निवासी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार मधुसूदन आनंद का बीती 19 फरवरी को निधन हो गया था। वह देश के जानेमाने पत्रकारों में से एक रहे हैं। मधुसूदन आनंद  हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रमुख और सम्मानित व्यक्तित्व थे। उनका जन्म 30 दिसंबर 1952 को बिजनौर जनपद के नजीबाबाद नगर में हुआ था। वे वरिष्ठ लेखक कहानीकार, कवि, निबंधकार, संपादक और पत्रकार थे। उनकी शिक्षा एम.ए. (हिंदी) थी। उनकी प्रमुख रचनाएँ कविता संग्रह पृथ्वी से करें फरमाइश व कहानी संग्रह करौंदे का पेड़, साधारण जीवन, बचपन, थोड़ा सा उजाला निबंध संग्रह जो सामने है। उन्होंने संपादन का काम भी सफलतापूर्वक किया, जिसमें नवभारत टाइम्स के यशस्वी संपादक रहे राजेंद्र माथुर के अग्रलेखों का संचयन भी सम्मिलित है। पत्रकारिता में उनका योगदान याद करें तो मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को गंभीरता, निष्पक्षता, साहित्यिक भाषा शैली की गुणवत्ता और सामाजिक संवेदनशीलता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान के कुछ मुख्य बिंदु इस तरह से गिनाये जा सकते हैं।
      उन्होंने 1974 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में ट्रेनी पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया और नवभारत टाइम्स से सहयोगी संपादक के रूप में लंबे समय तक जुड़े रहे। यह भी बताया जाता है कि उनकी नियुक्ति आरंभ में लेखा विभाग में हुयी थी लेकिन लिखने पढ़ने का बचपन से ही उनको शौक था तो वे कुछ ही समय बाद एकाउंटिंग सैक्शन से संपादकीय विभाग में आ गये। वहां उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा कुछ ही समय में अपने वरिष्ठ साथी पत्रकारों को मनवा दिया। नवभारत टाइम्स में विभिन्न पदों पर काम किया। सब एडिटर, विशेष संवाददाता, सहायक संपादक, संपादकीय पेज प्रभारी, नाइट एडीटर, और अंततः अपनी मेहनत और लगन के बल पर संपादक के पद तक जा पहुंचे पहुंचे। मधुसूदन ने अपनी प्रतिभा व्यवहार कुशलता और योग्यता के बल पर कुछ ही समय में राजधानी दिल्ली के सरकारी क्षेत्र में ऐसी छवि बना ली थी, एक दौर में सत्ता चाहे किसी की भी हो, उनकी पहुंच सीधे पीएमओ तक रहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में कवरेज के लिये साथ जाने वाले चंद गिने चुने संपादकों में उनका नाम सदैव शामिल रहता था। उनकी विशेषता यह थी कि वे न केवल पीएम की विज़िट में उनसे लगातार साक्षात्कार करते और उनके प्रोग्राम की विस्तृत ख़बर लिखते थे बल्कि वहां से वापस आने के बाद भी उस विदेश यात्रा पर कई कई विशेष संपादकीय लेख और रिपोर्ताज लिखते थे। जिनका उस समय के उनके चाहने वाले पाठक बड़ी अधीरता से इंतज़ार करते थे। उनके नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ने राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी संतुलित और विश्वसनीय पत्रकारिता की अपनी सराहनीय नीति बनाए और बचाये रखी। वे निडर, निष्पक्ष और साहित्यिक दृष्टि वाले संपादक माने जाते थे। कुछ समय तक उन्होंने विश्व प्रसिध्द ‘डॉयचे वेले’ में भी संपादक के रूप में काम किया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी महान और यादगार पहचान को दर्शाता है।
          वे ’वॉयस ऑफ अमेरिका’ के नई दिल्ली संवाददाता भी रहे। कुछ समय दैनिक जागरण और नई दुनिया जैसे अन्य समाचारपत्रों से भी जुड़े रहे और अपनी लेखनी की अमिट छाप छोड़ी। बाद के वर्षों में ’भारतीय ज्ञानपीठ’ की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ’नया ज्ञानोदय’ के संपादक के पद पर रहे, जहाँ उन्होंने साहित्य और अपनी सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय विचारधारा को अपनी कलम से और मजबूती प्रदान की। वे इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे विद्वानों के अनुवाद किये लेख बड़े रोचक ढंग से विस्तार से प्रकाशित करते थे, जो तत्कालीन पत्रिका की गुणवत्ता को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है। हिंदी पत्रकारिता में उन्हें उनके सहकर्मी संवाददाता और पाठक उनको मृदुभाषी, विनम्र, समर्पित और साहित्य-प्रेमी संपादक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने कई युवा पत्रकारों को इस क्षेत्र में भारी प्रतियोगिता और संघर्ष होने के बाद भी कठिन समय में प्रोत्साहित किया और उनके लिये सम्मान के साथ काम करने का माहौल बनाया।
          कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यिक गहराई और पेशेवर नैतिकता से न केवल समृद्ध किया बल्कि सफलता की उूंचाई तक पहंुचाया। वे एक ऐसे संपादक थे जो खबरों को सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और साहित्यिक मूल्यों के साथ समायोजित कर जनहित में पेश करते थे। उनकी कमी हिंदी मीडिया और साहित्य जगत में लंबे समय तक खलेगी। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ भी अपने समय में चर्चा मेें रहती थीं। हिंदी कथा-साहित्य में संवेदनशीलता, सूक्ष्म निरीक्षण, सामान्य जीवन की गहराई और मानवीय संबंधों की नाजुक परतों को उकेरने के साथ साथ जनवादी सोच के लिए भी जानी जाती हैं। वे प्रेमचंद की सामाजिक सुधारवादी प्रगतिशील परंपरा से जुड़े हुए रहे हैं, लेकिन आधुनिक संवेदना, शहरी-ग्रामीण संक्रमण और व्यक्तिगत अंतद्वंद्व को अधिक सूक्ष्म ढंग से धरातल से उठाकर प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा सरल, ज़मीन से जुड़ी हुयी, आम आदमी के सुखदुख की प्रतिनिधि मृदु और प्रभावशाली है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बिना अतिरंजना के जन भावनाओं को छू लेती है।

      उनके प्रमुख कहानी संग्रह ’करौंदे का पेड़’, ’साधारण जीवन’, ’बचपन’, ’थोड़ा सा उजाला’’ ने भी पाठकों को कायल कर लिया था। इनमें से कुछ चर्चित कहानियों और उनके संग्रहों का संक्षिप्त विश्लेषण निम्न है-’करौंदे का पेड़’’ शीर्षक कहानी और संग्रह है। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कहानी मानी जाती है। ’कथानक’ एक गरीब मध्यमवर्गीय परिवार में करौंदे का पुराना पेड़ भावनात्मक और स्मृति का प्रतीक बन जाता है। समय के साथ पेड़ सूखता है, लेकिन उसकी यादें और उससे जुड़े स्वाद (करौंदे की चटनी आदि) जीवन की कड़वाहट-मीठेपन को दर्शाते हैं। ’विश्लेषण’ नामक कहानी स्मृति, अभाव, परिवारिक बंधन और प्रकृति से मानवीय लगाव पर केंद्रित है। करौंदा कड़वा फल होने के बावजूद जीवन की आवश्यकता का प्रतीक है। जैसे जीवन में कड़वाहट के बिना मीठा नहीं मिलता। आलोचक इसे नारी-संवेदना और ग्रामीण-शहरी स्मृति के संयुक्त मेल के रूप में देखते पहचानते हैं। पहली कहानी संग्रह होने से इसने उन्हें विशिष्ट कथाकार के रूप में स्थापित किया।
          ’साधारण जीवन’ संग्रह और शीर्षक कहानियाँ ’थीम’’ रोजमर्रा का जीवन, छोटी-छोटी खुशियाँ, संघर्ष और उनकी सार्थकता पर आधारित है। प्रमुख विशेषता मधुसूदन आनंद को असाधारण बनाते हैं। उनकी कहानियाँ मध्यमवर्गीय मनोविज्ञान, रिश्तों की सूक्ष्म दरारें और जीवन की सादगी को उजागर करती हैं। कई कहानियाँ आत्मकथात्मक लगती हैं, जहाँ नजीबाबाद (उनका जन्मस्थान) जैसा कस्बा पृष्ठभूमि बनता है। यह संग्रह ’नॉस्टैल्जिया’ और वर्तमान के साथ टकराव को खूबसूरती से दिखाता है। ’थोड़ा सा उजाला’ भी उनकी सबसे प्रमुख कहानियाँँ में शामिल हैं, जो आलोचकों द्वारा श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ’थीम’ आशा की किरण, अंधेरे जीवन में छोटी रोशनी, आधुनिक जीवन की खोखलापन, लेकिन अंत में मानवीयता की जीत का संदेश देती है। जीवन में पूर्ण सुख नहीं, बस थोड़ी-सी उम्मीद काफी है। ये कहानियाँ शहरी अलगाव, उपभोक्तावाद और संबंधों की कमजोरी’’ को छूती हैं, लेकिन निराशावादी नहीं बल्कि संतुलित और आशावादी हैं। यह कहानी आधुनिक कार्य संस्कृति की खोखली चमक पर व्यंग्य भी करती है। ’शैली’ संयमित, बिना चीख-पुकार के भावुकता को प्रस्तुत करती है। संवाद जीवन के करीब, वर्णन चित्रात्मक लेकिन संक्षिप्त है। ’महत्व’ व ’’नई कहानी’’ आंदोलन के बाद की पीढ़ी में साहित्यिक पत्रकारिता के प्रतीक है। जहाँ कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। उनकी कहानियाँ भावुकता और यथार्थ के बीच संतुलन बनाती हैं, जो हिंदी कथा-साहित्य में बड़ा दुर्लभ है। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ पढ़ने से लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता उसके साधारण क्षणों में छिपी है। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे मानवीय संवेदना को कभी पुराना नहीं होने देतीं। मधुसूदन आनंद ने अपनी लेखनी से नजीबाबाद का भी नाम बुलंद किया। हम उनको विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित करते हैं। उनके लिये वसीम बरेलवी का एक शेर याद आ रहा है- जहां भी जायेगा रोशनी लुटायेगा, किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 19 February 2026

हिंदू मुसलमान नहीं...

*हिंदू मुसलमान नहीं भारतीयों की विविधता देखो!* 
O दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं।    
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम की मध्यप्रदेश यूनिट के सचिव तौक़ीर निज़ामी ने मुसलमानों के बारे में एक विवादित बयान दिया है। उनका दावा है कि सियासी मुसलमान तीन तरह का माना जाता है। उनका कहना है कि कांग्रेस में जूता चाटने यानी गुलामी करने वाला, भाजपा में जूते खाने वाला और एमआईएम में जूते मारने वाला मुसलमान मिलेगा। हालांकि बयान का विरोध बढ़ने पर निज़ामी ने सफ़ाई दी कि उनका मक़सद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि मुसलमानों को राजनीतिक गुलामी से बाहर निकालना था। इससे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत कह चुके हैं कि हिंदू चार तरह के होते हैं। पहला- जो कहते हैं गर्व से कहो हम हिंदू हैं। दूसरेेे कहते हैं गर्व की क्या बात है? तीसरे कहते हैं धीरे बोलो हिंदू हैं। चैथे वे जो भूल गये वो हिंदू हैं। दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं। वास्तविकता यह है कि जिस बीजेपी को संघ नियंत्रित करता है। उसको अपने आज के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक जीवन में भी केवल 37 प्रतिशत वोट ही मिलते हैं। यानी 63 प्रतिशत लोग उनको पसंद ही नहीं करते। साथ ही यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन 37 प्रतिशत में भी केवल 5 से 10 प्रतिशत हिंदू ऐसे होंगे जिनकी सोच संघ के मुस्लिम विरोध पूर्वाग्रह और घृणा से मिलती होगी।
        अन्यथा इनमें से भी बड़ी संख्या उन हिंदुओं की है जो कांग्रेस या अन्य सेकुलर दलों के विकल्प के तौर पर भाजपा को वोट देते हैं और बीजेपी की साम्प्रदायिक व नफरती नीतियों को किसी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी के साथ दस प्रतिशत का एक नया वर्ग लाभार्थी का भी जुड़ा है जिसको अपनी सुविधाओं योजनाओं और भले से मतलब है। अधिकांश सवर्ण जातियां अपने सामाजिक वर्चस्व आर्थिक लाभ और राजनीतिक श्रेष्ठता बनाये रखने के लिये बीजेपी के साथ हैं उनका धर्म साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध से कोई खास लेना देना नहीं है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है उनमें भी अधिकांश सेकुलर दलों के साथ रहे हैं और आज भी हैं। इनका पूरा भरोसा आज भी संविधान में है। उनका मानना है कि हिंदू मुसलमान मिलकर ही देश का भला कर सकते हैं। बेशक मुसलमानों में भी हिंदुओं की तरह एक छोटा वर्ग साम्प्रदायिक सोच का है जो अधिकांश उच्च जातियों का है। इनमें से ही अधिकांश अब बीजेपी की बी टीम एमआईएम के साथ जुड़ते जा रहे हैं। लेकिन इनको यह पता नहीं है ये जितने औवेसी के साथ जुड़ते जायेंगे उतने ही सेकुलर हिंदू सेकुलर दलों को छोड़कर बीजेपी के साथ जुड़ते जायेंगे। मुसलमानों का एक तीसरा नादान नासमझ जाहिल या कम पढ़ा लिखा गरीब कमज़ोर पिछड़ी सोच का और मासूम तबका भी है जो फिरकापरस्त तंगनज़र और कट्टरतावादी सोच से ग्रस्त होकर चालाक मक्कार और शातिर अलगाववादी सोच के मुस्लिम नेताओं के झांसे में आकर बहक जाता है और उनको वोट व सपोर्ट देकर अपना ही नुकसान करता है। हमारा तो मानना है कि हिंदू हो या मुसलमान आज नहीं तो कल यह बात समझेगा और एक साथ एक मंच पर आयेगा और ऐसे नेताओं पार्टियों या संगठनों को सपोर्ट करेगा जो उसको धर्म के आधार पर नहीं भारतीय के आधार पर एक नागरिक के आधार पर और एक इंसान के तौर पर देखेंगे मानेंगे और उसकी भलाई के लिये सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के आधार पर बिना किसी पक्षपात भेदभाव और धर्म जाति के अंतर को देखे सबके कल्याण का काम करेंगे। शायर कहता है- रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर एवं पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 16 February 2026

ए आई का डर

*ए आई यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस से क्यों डरी आई टी कंपनियां ?* 
0 यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं।          
     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      एक कंपनी के टैक्निकल मैनेजर की उसके एक जानकार से हुयी बातचीत आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यह बातचीत नये कोडिंग वाले ए आई और एसएएस माॅडल के नाकाम होने को लेकर भारतीय आई टी कंपनियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे ख़तरे को लेकर चर्चा का विषय बनी हुयी है। मैनेजर का कहना है कि हमारे देश का आई टी सैक्टर पिछले कई दशक से जिस एसएएएस माॅडल पर काम कर रहा था वह अब बेकार होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि ए आई का नया परिष्कृत रूप अब तरह तरह के कुछ प्रश्नों का उत्तर देने वाला मात्र चैटबाॅट नहीं रह गया है बल्कि वह विशेषज्ञ मानव की तरह ए आई कामगार बन चुका है। मिसाल के तौर पर मैनेजर अपनी अन्य हल्की और आम बातों के साथ जो सबसे गंभीर और आई टी उद्योग की सबसे बड़ी ख़तरे की घंटी की आहट सुनकर बता रहा है वह यह है कि अब ए आई कानूनी मसौदा बहीखाता प्रूफ रीडिंग इंट्रो हैडिंग काॅलम चैकिंग टैस्टिंग और कोडिंग तक का काम मिनटों नहीं सेकंडों में करके दे रहा है। वह किसी भी विषय पर लेख निबंध और रिपोर्ताज तक पलक झपकते ही उपलब्ध करा रहा है। यही वजह है कि इस कंपनी के मैनेजर ने पिछले दिनों 30 साल से काम कर रहे एक अधेड़ वरिष्ठ तकनीकी प्रोग्रामर अधिकारी को इसलिये हटा दिया क्योंकि जो काम वह एक सप्ताह में करता था उसी काम को प्रबंधक ने इंग्लिश में डायरेक्शन देकर ए आई से दस मिनट में उससे भी बेहतर क्वालिटी में करा लिया। मैनेजर का कहना था कि मानव कर्मचारी के साथ बैठक चर्चा अपडेट और दिशा निर्देश देने और फिर उसको क्राॅस चैक करने में समय और पैसा दोनों ही अधिक लगता है।
       वायरल चैट में इस मैनेजर ने सबसे डरावनी बात जो कही वह यह थी कि अगर उनका इतना पुराना अनुभवी और एक्सपर्ट आई टी कर्मचारी अब कंपनी के लिये निशुल्क भी सेवायें देता तो कंपनी स्वीकार नहीं करती क्यांेकि वह जितना समय इस काम में लगायेगा दूसरी उनकी प्रतियोगी कंपनियां ए आई से सेकंडों में काम लेकर उनकी कंपनी को मार्केट में पीछे छोड़ देंगी। यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। इस गिरावट के दौर के आगे भी चलने का खतरा आई टी सैक्टर पर मंडरा रहा है। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं। हालांकि जब शुरू शुरू में कंप्यूटर आये थे तब भी नौकरियों को लेकर ऐसा ही खतरा माना जा रहा था लेकिन कुछ जाॅब कंप्यूटर से घटे तो नये जाॅब भी भारी संख्या में पैदा हुए लेकिन ए आई को लेकर कुछ अधिक ही पैनिक है। शायर ने कहा है- *यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता, मुझे गिरा के तुम संभल सको तो चलो।।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 13 February 2026

अधिक बच्चे

*अधिक बच्चो की सलाह देने वाले वे कौन हैं?* 
0 जबकि सच यह है कि न तो एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है और न ही बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज के वास्तविक मुद्दों की चिंता है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं।        
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम के होते हुए मुसलमानों को दुश्मनों की ज़रूरत नहीं है। उसको वैसे ही बीजेपी की बी टीम नहीं कहा जाता है। बल्कि उसकी सियासत उसकी हरकतें और उसके नेताओं के विवादित बयान खुद यह दिखाते हैं कि उनको मुसलमानों की सियासत तो करनी है लेकिन उनके हितों की कोई चिंता नहीं है। हाल ही में एमआईएम के यूपी के अध्यक्ष शौकत अली ने मुरादाबाद में एक जनसभा में कहा कि मुसलमानों को हम दो हमारे दो दर्जन पर अमल करते हुए तेज़ी से जनसंख्या बढ़ानी चाहिये। उनका यह भी दावा कि उनके 8 और उनके बड़े भाई के 16 बच्चे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम आबादी बढ़ने से मुस्लिम समाज और देश मज़बूत होगा। उनका मानना है कि मुसलमानों की आबादी कम होने की वजह से ही मदरसों को आतंक का अड्डा उनकी लिंचिंग दाढ़ी नोचा जाना लड़कियों के नकाब खींचा जाना और किसी भी मांस को गौमांस बताकर उनको आज सताया जा रहा है। इससे पहले आरएसएस के मुखिया भागवत सहित कई हिंदू नेता साक्षी महाराज नवनीत राणा हिमंत विस्व सरमा भी हिंदुओं से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं। वे यहां तक कहते हैं कि अगर हिंदुओं ने अभी भी परिवार नियोजन जारी रखा तो वे जल्दी ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।
     उनका कहना है कि हिंदू समुदाय की घटती जन्मदर से जनसांखिकीय असंतुलन सांस्कृतिक पहचान और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। उनका यह भी दावा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर बढ़ती घुसपैठ और धर्म परिवर्तन से पहले ही हिंदू समाज के लिये चिंता बढ़ गयी है। सच तो यह है कि बच्चे कितने पैदा करने हैं यह परिवारों का निजी मामला है। लेकिन वे यही सवाल मोदी सरकार से नहीं पूछते। दरअसल उनकी असली चिंता हिंदू वोट बैंक की राजनीति है। ऐसे ही एमआईएम नेता सहित कई सिरफिरे मुस्लिम कट्टरपंथी नेताओं की चिंता भी मुस्लिम वोटबैंक को लेकर ही अधिक है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। जबकि सच यह है कि न तो बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज की चिंता है और न ही एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है।
       इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं। नेशनल फेमिली हैल्थ सर्वे-5 के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की जनसंख्या दर तेजी से गिरकर रिप्लेसमेंट रेट यानी 2.1 से भी नीचे आ चुकी है। 2020-25 का यह सर्वे यह भी बताता है कि हिंदुओं की टीएफआर 1.94 तो मुसलमानों की 2.14 रह गयी है। पहले इसमें बहुत अधिक अंतर था लेकिन अब इस दर में सबसे अधिक गिरावट मुसलमानों की आबादी में ही देखी जा रही है। हालांकि हिंदुओं की तुलना में यह अभी भी मामूली सी अधिक है। सर्वे में यह बात भी साफ हो चुकी है कि जनसंख्या बढ़ने का रिश्ता धर्म से नहीं बल्कि सम्पन्नता और शिक्षा से है। जो लोग संगठन व पार्टी मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार और उनको तरह से तरह से अनपढ़ व गरीब बनाये रखने में लगे रहते हैं उनको इस मुद्दे पर चिंता जताने का नैतिक अधिकार नहीं है। ऐसे लोगों के लिये शायर कहता है- सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप, आपका मैयार देखा कितने मैयारी हैं आप।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 9 February 2026

नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

*नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का एक ‘‘दीपक’’* 
0 इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है।
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      उत्तराखंड के कोटद्वार में 70 साल के एक बुजुर्ग वकील अहमद की कपड़े की दुकान का नाम बाबा स्कूल ड्रेस एंड यूनिफाॅर्म है। यह दुकान लगभग चार दशक से इसी नाम पर चल रही है। बताया जाता है कि इसका शाॅप एक्ट इनकम टैक्स और जीएसटी एक्ट आदि कई कानूनों में इसी नाम से बहुत समय पहले से रजिस्ट्रेशन चला आ रहा है। आज तक शासन प्रशासन या पुलिस को इस नाम से दुकान चलाने की कोई शिकायत किसी से नहीं मिली। कोई और आरोप अपराध या कर चोरी का मामला भी इस दुकान स्वामी के नाम पर दर्ज नहीं है। लेकिन कुछ दिन पहले कुछ नफरती चिंटू बाबा शाॅप पर बिना बुलाये मेहमान के तौर पर जा धमके। उन्होंने वरिष्ठ नागरिक वकील अहमद को धमकाया कि अपनी दुकान के नाम से बाबा शब्द हटायंे। वकील अहमद ने वजह पूछी तो दर्जन भर उत्पाती युवक अभद्रता और अपमान पर उतर आये। यह सब होता देख उधर से जा रहे एक ज़िम्मेदार नागरिक आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले और कानून का सम्मान करने वाले जिम संचालक दीपक कश्यप उर्फ मुहम्मद दीपक ने हिम्मत दिखाते हुए मामले में हस्तक्षेप करते हुए बुजुर्ग का बचाव किया।
         दीपक ने यह जानते हुए भी कि जिनसे वह भिड़ने जा रहा है वे कोई साधारण लोग नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के समर्थक शासन प्रशासन व पुलिस की शह पर उत्पात करने वाले लंपट हैं, यह कहते हुए बुजुर्ग का बचाव किया कि यह देश संविधान कानून और आपसी प्यार मुहब्बत से चलता है। दुकान के नाम से बाबा शब्द नहीं हटेगा। न ही दुकान के मालिक को दुकान या घर छोड़कर राज्य व कस्बे से जाने दिया जायेगा। इस पर उत्पाती युवक दीपक से भिड़ गये लेकिन वे उस समय उसका बहुत कुछ नहीं बिगाड़ पाये। बाद में उन उग्र युवकों के खिलाफ मजबूरी में मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के कारण पुलिस को केस दर्ज करना पड़ा, लेकिन साथ साथ मेल मिलाप और भाईचारा बनाये रखने की कोशिश करने वाले दीपक को भी केस में लपेट लिया गया। इसके बाद जब यह घटना चर्चा का विषय बन गयी तो पुलिस प्रशासन ने कोटद्वार में बाहर से बड़ी तादाद में आकर घटना को कवर करने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट यू ट्यूबर्स और बड़े मीडिया हाउसों को प्रवेश से रोक दिया। लकिन तब तक दीपक सोशल मीडिया पर हीरो बन चुका था।
       इस घटना के बाद आज दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है। वह चाहता है कि बढ़ते अपराध महंगाई और बेरोज़गारी जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये। दीपक जैसे लोगों के लिये शायर ने क्या खूब कहा है- *दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग़ कई आंधियों पे भारी है।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 6 February 2026

भारत अमेरिका ट्रेड डील

*अमेरिका भारत ट्रेड डील से किसको क्या फ़ायदा?*
0 ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे।
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      यह खुशी की बात है कि अमेरिका भारत के बीच लंबे समय से पेंडिंग व्यापार समझौता हो गया है। यह भी सही है कि इससे भारत के निर्यातकों को लाभ होगा। यह भी माना जा सकता है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश से हमारे रिश्ते अब बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह सौ टके का है कि यह ट्रेड डील किन शर्तों पर हुयी है? हालांकि हमारी सरकार ने न तो पहले यह साफ किया और न ही अब तक विस्तार से यह बताया कि इस व्यापार समझौते की शर्तें क्या हैं? खुद अमेरिकी राष्ट्रपति टंªप ने ही आधी रात को इस डील की जानकारी सार्वजनिक की थी और दावा किया था कि डील के तहत अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगायेगा जो कि पहले 25 प्रतिशत था और रूस से तेल खरीदते रहने पर यह 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। 
          जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे। अपने स्वदेशी कृषि उत्पादों को पहले की तरह भारत अधिक टैरिफ लगाकर प्रतियोगिता से सुरक्षा प्रदान नहीं कर पायेगा। साथ ही ट्रंप यह भी दावा करते हैं कि भारत ने उनको आश्वासन दिया है कि वह रूस से सस्ता तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिका व वेनेजुएला से मार्केट रेट पर क्रूड आॅयल खरीदेगा। यह बात इसलिये भी सच लगती है कि अमेरिका ने जो 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भारत पर रूस से तेल खरीदने पर लगाया था वह अब हटा लिया गया है। 
       अमेरिका इस डील के बारे में रोज़ सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर रहा है, प्रैस वार्ता कर रहाी है और इस डील को अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश में सरकार ने अव्वल तो इस बारे में अमेरिका के ऐलान के साथ साथ उसी रात कुछ बताने की ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन जब विपक्ष और डील के भारतीय जानकारों ने इस डील को किसान विरोधी और भारत के नागरिकों के हितों के खिलाफ होने के दावा किया तो गोदी मीडिया के चैनलों पर सूत्रों के हवाले से इसे बहुत अच्छी डील हवा में बताया जाना लगा। बाद में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने डील की बिना डिटेल शर्तों और प्रमाण के यह दावा ठोक दिया कि इस डील में सब कुछ अच्छा है लेकिन समय बतायेगा कि यह डील कितनी किसके पक्ष में एकतरफा और साथ ही अपमानजनक तरीके से अंजाम तक पहंुची है।
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मोदी सरकार सही है

नया यूजीसी अधिनियम मोदी सरकार का सराहनीय क़दम!

        -इक़बाल हिंदुस्तानी

0 कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है।

      यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने नये अधिनियम में दलित आदिवासी महिलाओं के साथ ही पिछड़े वर्ग के साथ आयेदिन होने वाले पक्षपात और भेदभाव को परिभाषित कर अन्याय से संरक्षण प्रदान किया है। इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति धर्म लिंग जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जायेगा। प्रत्येक संस्थान में एक इक्वल आॅपोर्चिनिटी सेंटर बनाया जायेगा। जो भेदभाव की शिकायतों को सुनेगा और प्रभावित लोगों की सहायता करेगा। एक शिकायत निवारण तंत्र बनाया गया है जो 24 घंटे सातों दिन काम करेगा और हेल्पलाइन व आॅनलाइन पोर्टल पर आने वाली शिकायतों का समय सीमा के अंतर्गत अनिवार्य कार्यवाही कर समाधान करेगा। अगर इन नियमों का कोई संस्थान समय पर सही से पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करते हुए उसका अनुदान रोकने के साथ ही उसकी मान्यता भी समाप्त की जा सकती है। हर हायर एजुकेशन सेंटर में एक समता समिति बनेगी जिसमें एससी एसटी ओबीसी महिलाओं और दिव्यांगों को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। जिन वर्गों के साथ पक्षपात भेदभाव और अन्याय रोका जाना है, उसके लिये शिक्षकों के आचरण की एक आचारण संहिता बनाई जायेगी। साथ ही प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाया जायेगा जिससे आयेदिन वंचित वर्गों के साथ होने वाले पक्षपात और अन्याय को रोकने की पुख्ता व्यवस्था को सुनिश्चित किया जायेगा।

      कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है। हमारा समाज और सरकारी सिस्टम ऐसा है कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल होता आ रहा है। मिसाल के तौर पर भीड़ हिंसा हमारे देश में आम हो गयी है। अकसर बेकसूर लोेगों की माॅब लिंचिंग हो जाती है। किसी को भी अंजान इलाके में डायन गोहत्यारा और बच्चा चोर बताकर पीट पीट कर मार दिया जाता है। लेकिन ऐसे मामले में या तो अकसर रिपोर्ट दर्ज नहीं होती, होती हैं तो हल्की धाराओं में होती हैं या फिर उल्टा मरने वाले के खिलाफ ही फर्जी आरोपों में रपट लिख दी जाती है। जो लोग इस अधिनियम के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं उनको यह भी समझना चाहिये कि अगर वे पक्षपात, उत्पीड़न और अन्याय नहीं करते या आरक्षित वर्ग के हिस्से पर काबिज़ नहीं हैं तो डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरी कड़वी सच्चाई यह है कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है। जिन वर्गों को यूजीसी के नये अधिनियम का लाभ मिलेगा वह सत्ताधारी भाजपा का नया वोटबैंक है। उसकी संख्या आबादी में 85 प्रतिशत से अधिक है तो सरकार उनके मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत सवर्णों की जायज बात भी क्यों सुनेगी? एक शायर ने कहा है-

इस दौर के फरियादी जाएं तो कहां जायें,

सरकार भी तुम्हारी है दरबार भी तुम्हारा है।

हादसा या हत्या?

इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हादसा नहीं ‘अपराधिक हत्या’?
             -इक़बाल हिंदुस्तानी
       अगर हमारा शासन प्रशासन पुलिस और कई अन्य आपात सेवा एजंसियां मिलकर एक नौजवान इंजीनियर को अचानक हादसा होने पर पानी में डूबने से नहीं बचा सकती तो हमारे विश्वगुरू होने और दुनिया की तीसरी चैथी अर्थव्यवस्था होने का क्या मतलब रह जाता है? कुछ दिन पहले ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में 27 साल के इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मौत कई सवाल खड़े करती है। दरअसल युवराज की कार गहरे कोहरे में अचानक भटककर सड़क किनारे निर्माणाधीन एक मकान में खोदे गये बेसमेंट के एक गड्ढे में समा गयी। जिस जगह यह हादसा हुआ वहां एक तीखा मोड़ था। जिससे युवराज घने कोहरे की वजह से उसे देखकर कार मोड़ नहीं पाया। यह हमारे नये बसे नगरों में सड़कों के बुरे डिज़ाइन और मकान दुकान पास हुए नक्शे के हिसाब से न बनाकर गैर कानूनी व नियम तोड़कर बनाये जाने वाले आयेदिन के रिश्वत से होने वाले गलत कामों का भी अंजाम कहा जा सकता है। युवराज ने पानी के गहरे गड्ढे में गिरने के बाद भी अपनी जान बचाने को हिम्मत नहीं हारी और अपना मोबाइल निकाल कर अपने परिवार को सूचना दी। जिस पर उसके पिता ने नोएडा के सरकारी अमले को तत्काल खबर दी। हैरत और दुख की बात यह रही कि पुलिस फायर ब्रिगेड और स्टेट डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स मौके परा समय पर पहुंच गयी लेकिन 90 मिनट तक पानी में जान बचाने को हाथ पांव मार रहे युवराज को बचाने में सब नाकाम रहे। हालांकि बाद में नेशनल डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स के जवान भी घटना स्थल पर पहुंचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि युवराज समय पर सहायता न मिलने से अपनी जान गंवा चुका था। यह ठीक है कि ऐसी मौतें हमारे देश में होना आम बात है। इस मौत पर कोई हंगामा नहीं मचा क्योंकि यह किसी धर्म या जाति की नाक का सवाल नहीं था। यह भी गारंटी नहीं कि ऐसे हादसे आगे नहीं होंगे। सही मायने में देखा जाये तो युवराज की मौत हमारे नाकाम नाकारा और करप्ट सिस्टम की मौत का ऐलान है। हमारी जनता सरकार चुनने या बदलने के दौरान शायद ही ऐसी मौतों से प्रभावित होकर वोट देती हो। कहने को हम 2030 में विश्व की तीसरी बड़ी इकाॅनोमी बनने का दावा करते हैं, लेकिन अगर हम अपने एक युवा इंजीनियर को पानी के एक गड्ढे में गिरने पर उसकी घंटों मौत और ज़िंदगी से लड़ने पर जान नहीं बचा सकते और हमारा सरकारी अमला खड़ा खड़ा तमाशा देखता रहता है तो विश्वगुरू बनने का दावा करना क्या मज़ाक नहीं है? हमारे देश में हर साल साढ़े 9 लाख लोग हादसों में मरते हैं। यह दुनिया के देशों में हादसों में मरने वाले लोगों का दूसरे नंबर का आंकड़ा है। ऐसा नहीं है कि दूसरे देशों में लोग हादसों का शिकार नहीं होते लेकिन हमारे देश में जितनी बड़ी संख्या और जिस प्रशासनिक लापरवाही सरकारी नाकामी और अधिकारियों की रिश्वतखोरी व असंवेदनशीलता व जवाबदेही न होने से लोग बेमौत और असमय मर रहे हैं, वह चिंता और लज्जा की बात है।

बड़ी आबादी का सच

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी अभिषाप या उपहार?

           -इक़बाल हिंदुस्तानी

     भारत इस समय विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बना हुआ है। हिंदूवादी नेता आयेदिन जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग करते रहते हैं। विहिप के पूर्व मुखिया प्रवीण तोगड़िया ने हाल ही में यह मांग दोहराई है। दरअसल उनको इस तरह की मांग से अल्पसंख्यक मुसलमानों को टारगेट कर अपना हिंदू वोट बैंक मज़बूत बनाने का राजनीतिक मकसद पूरा करना अधिक होता है। उनको यह पता नहीं है कि जब चीन दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था तो उसने एक बच्चे का कानून बनाया था। इसके बाद जब इस नीति से चीन को नुकसान हुआ तो उसने 2016 में यह कानून खत्म कर दिया। फिर चीन ने तीन साल तक के बच्चो के पालने के लिये सालाना 42000 सरकारी मदद देनी शुरू की। कई राज्यों ने वहां दूसरा व तीसरा बच्चा पैदा होने पर एकमुश्त बड़ी रकम देनी शुरू की। यहां तक कि बच्चो की पढ़ाई और परवरिश पर खर्च में बड़ी आयकर छूट भी दी। लेकिन आबादी एक बार घटने लगी तो फिर किसी भी तरह बढ़ी नहीं। अब सारे उपाय नाकाम होने पर चीन ने गर्भनिरोधक पर भारी कर लगाया है जिससे लोग अधिक बच्चे पैदा करें लेकिन जनता का कहना है कि बच्चो को पालना गर्भनिरोधक पर अधिक टैक्स देने से महंगा है। भारत में टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 यानी आबादी स्थिर रहने पर आ गयी है। अगर यह इससे भी कम हुयी तो हमारी हालत भी चीन जैसी हो जायेगी।

बंगाल में घुसपैठ?

*ब्ंागाल में घुसपैठ रोकने को सुरक्षा ग्रिड बनायेगी केंद्र सरकार...* 

       गृहमंत्री अमित शाह ने आरोप लगाय है कि अपना वोटबैंक बढ़ाने के लिये पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी बंग्लादेश से घुसपैठ करने वालों को बढ़ावा दे रही हैं। उनका यह भी कहना है कि केंद्र सरकार ऐसा किसी कीमत पर नहीं होने देगी। शाह का दावा है कि घुसपैठ की समस्या को जड़ से खत्म करने को उनकी सरकार सुरक्षा ग्रिड बनायेगी। सवाल यह है कि राजनीतिक लाभ के लिये अगर राजनेता एक दूसरे पर इतने गंभीर आरोप लगा सकते हैं तो फिर घुसपैठ की समस्या का वास्तविक समाधान कैसे और कौर करेगा? सबको पता है कि सीमा सुरक्षा का काम सीमा सुरक्षा बल करता है। इस बल की कमान केंद्र सरकार के हाथ में है। क्या यह संभव है कि किसी राज्य की सरकार केंद्र सरकार से छिपाकर अपने राज्य में राजनीतिक लाभ के लिये अवैध लोगों की घुसपैठ कराये और केंद्र सरकार को भनक तक ना लगे। या केंद्र सरकार को इस बात का पता भी हो जैसा कि अमित शाह दावा कर रहे हैं फिर भी वे राज्य सरकार के सामने घुटने टेक दें? दूसरा सवाल यह है कि अगर केंद्र सरकार को पता है कि बंगाल में घुसपैठ हो रही है तो उन्होंने अपने जांच कराकर कितने बंग्लादेशियों को उनके देश वापस भेजा? उनको ऐसा करने से कौन रोक रहा है? जो सुरक्षा ग्रिड शाह अब बनाने की बात कह रहे हैं उस ग्रिड हो अब तक क्यों नहींे बनाया गया? सीमा पर घुसपैठ रोकने की ज़िम्मेदारी आखिर केंद्र सरकार की है तो उनको किससे अनुमति लेनी है? कहीं ऐसा तो नहीं जिस राज्य में भी चुनाव आता है वहां भाजपा मोदी सरकार केंचुआ के साथ मिलकर एक योजना के तहत पहले घुसपैठ का आरोप लगाती हैै और फिर विपक्ष के समर्थक माने जाने वाले वोटों में से एक हिस्से को इस बहाने बड़ी तादाद में काटकर चुनाव जीत लेती है। उसके बाद घुसपैठ के सारे आरोप सारे दावे और सारे वादे भुलाकर अगल राज्य के चुनाव में लग जाते हैं। बिहार में भी यह प्रयोग सफल रहा है। एक शायर ने कहा है-
0 लोगों के सर ऐब को मढ़ना सीख गये,
हम भी बेबात झगड़ना सीख गये।
उड़ना कब सीखेंगे चिड़िया के बच्चे,
सांप के बच्चे पेड़ पर चढ़ना सीख गये।।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।

प्रेम विवाह के खिलाफ सरकार?

*लव मैरिज रोकने के लिये विवाह पंजीकरण कठिन...* 

      यूपी सहित कई राज्यों में धार्मिक रीति रिवाज से शादी होने के बाद सरकारी कार्यों के विवाह का पंजीकरण काफी समय पहले अनिवार्य किया जा चुका है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन अब यूपी सरकार ने चुपचाप मैरिज एक्ट के तहत होने वाले रजिस्ट्रेशन के नियम बदल दिये हैं। इसमें यह ज़रूरी कर दिया गया है कि जो भी जोड़ा अपनी शादी का सरकारी पंजीकरण करायेगा वह अपने परिवार के सदस्यों को गवाह के तौर पर अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रार के सामने पेश करेगा। वैसे तो अधिकांश मामलों में परिवार के लोग गवाही दे ही देते हैं। लेकिन जिन मामलों में युवक युवती ने प्रेम विवाह किया होता है। उनमें उनके परिवार के लोग कई बार जाति या धर्म अलग अलग होने की वजह से विरोध करते हैं। ऐसे में जब कोई अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करेगा तो वे उसका पंजीकरण कराने में साथ कैसे दे सकते हैं? सवाल यह है कि जब संविधान बालिग लड़के लड़की को अपनी पंसद की शादी करने की इजाज़त देता है तो सरकार कैसे संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन कर ऐसे नियम या कानून बना सकती है जिससे युवा पीढ़ी अपने परिवार के नहीं चाहने पर अपनी पसंद के लड़के लड़की से विवाह ही नहीं कर सके। यही शाॅर्ट कट सरकारें धर्म परिवर्तन के मामलों में भी अपना रही हैं। ऐसा लगता है कि सरकारें अपना राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर भी नियम कानून बनाने पर तुली हैं।

संविधान के अनुसार कानून

*उत्तराखंड सरकार संविधान की भावना के अनुकूल बिल लाये...* 

       उत्तराखंड सरकार कथित लैंड जेहाद के खिलाफ एक बिल लाने जा रही है। आज तक लवजेहाद की भी परिभाषा तय नहीं हुयी लेकिन अब एक वर्ग विशेष को टारगेट करने के लिये तथाकथित लैंड जेहाद के बहाने एक नया कानून बनाने के लिये उत्तराखंड सरकार विचार कर रही है। पर्वतीय राज्य की सरकार से पूछा जाना चाहिये कि क्या अल्पसंख्यक इस देश के के नागरिक नहीं हैं? उनको भी दूसरे धर्मों के लोगों की तरह देश के किसी भी राज्य में ज़मीन खरीदने बसने और कारोबार करने का संविधान ने समान अधिकार नहीं दिया है? अगर कोई अल्पसंख्यक उत्तराखंड में भूमि खरीदता है तो यह लैंड जेहाद कैसे हो गया? दरअसल हिंदू वोट बैंक की राजनीति करते करते अधिकांश भाजपा सरकारों ने झूठ नफरत और भय फैलाने की राजनीति का सहारा लेकर कई बार कई राज्यों की सत्ता में कब्ज़ा जमाया है। इन सरकारों ने मीडिया के ज़रिये एक झूठा नेरेटिव पेश कर बात बात पर लवजेहाद थूकजेहाद और लैंडजेहाद का आरोप लगाकर बहुसंख्यकों में मन में अल्पसंख्कों के लिये एक सोची समझी योजना के तहत डर और घृणा पैदा कर सत्ता हासिल करने का बहाना तलाश लिया है। जबकि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

धर्म बड़ा या संविधान

*धर्म नहीं हमारा संविधान ही सब से उूपर है!* 

                 -इक़बाल हिंदुस्तानी

      लल्लन टाॅप टीवी चैनल पर पिछले दिनों डज़ गाॅड एक्ज़िस्ट डिबेट का आयोजन किया गया था। इस बहस में मशहूर फिल्म डाॅयलाग राइटर और शायर जावेद अख़्तर और मुफती शमाइल ने हिस्सा लिया था। यह प्रोग्राम चर्चित हो गया। इसको लाखों लोगों ने देखा सुना। लेकिन बिना किसी जज के यह दावा किया गया कि इस बहस में मुफती शमाइल जीत गये। इसकी वजह शायद भारत में अधिकांश लोगों का आस्तिक होना रहा। बाद में पूरी दुनिया में अपनी लोकप्रियता अचानक बढ़ जाने से मुफती साहब ने एक विवादित बयान दिया कि भारत के मुसलमानों ने शरीयत पर संविधान को तरजीह देकर गलती की है। उनका कहना था कि अगर संविधान और शरीयत में से किसी एक को चुनना हो तो हम शरीयत को चुनेंगे। मुफती साहब भूल गये कि अगर यही बात हिंदू धर्म को मानने वाले कहें तो देश हिंदू राष्ट्र बनने में देर नहीं लगेगी। ऐसे ही जिस देश में जिस मज़हब के मानने वालों की संख्या अधिक होगी वहां उस देश के बहुसंख्यकों का राज हो जायेगा। जबकि लोकतंत्र में बहुमत का शासन होता है। जिसमें सभी धर्म जाति और सोच के लोग शामिल होते हैं। कुछ लोगों का दावा है कि धर्म और संविधान का कोई टकराव ही नहीं तो यह सवाल कहां से आ गया कि दोनों में से एक को चुनो। उनको पता होना चाहिये कि संविधान सेकुलर है। उसके रहते ही सबको अपने अपने मज़हब पर चलने की आज़ादी मिली हुयी है। अगर कोई धर्म को सर्वोपरि मानेगा तो उन मुद्दों पर टकराव होगा जिन पर धर्म और संविधान अलग अलग रास्ता दिखाते हैं। साथ ही धर्मों का आपस में भी झगड़ा बढ़ जायेगा जो पहले ही राजनेता गैंगवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

वामपंथी रास्ते पर कांग्रेस

वामपंथियों की जगह कांग्रेस लेगी अब...

       2025 में आरएसएस के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के भी 100 साल पूरे हो गये। लेकिन जिस तरह से संघ ने अपनी स्थापना का शतक पूरा होने पर थोड़ा सा जश्न मनाया, वामपंथियों ने इस तरह के भी किसी समारोह की औपचारिकता नहीं की। हालांकि दोनों के वर्तमान हालात में ज़मीन आसमान का अंतर है। एक ओर संघ और जिसके राजनीतिक घटक जनसंघ को कभी राजनीति में अछूत माना जाता था। वह आज केंद्र सहित अनेक राज्यों में सत्ता में है। एक तरह से संघ का स्वर्णिम काल चल रहा है। दूसरी तरफ एक समय 2004 में जिस कम्युनिस्ट पार्टी के संसद में 65 सांसद हुआ करते थे और बंगाल केरल व त्रिपुरा में अपनी सरकार हुआ करती थी। आज उन वामपंथियों के मात्र 9 सांसद हैं। अब किसी भी राज्य में उनकी अपनी सरकार नहीं है। यहां तक कि यूपी बिहार सहित कई राज्यों में उनके कई एमपी और दर्जनों विधायक भी नहीं बचे हैं। अगर कहीं किसी सेकुलर गठबंधन के साथ जुड़कर उनके चंद एमएलए चुने भी गये हंै तो उनको उंगलियों पर गिना जा सकता है। इसकी वजह यह है कि हमारे भारतीय समाज में जिस तरह से धर्म और जाति के आधार पर पंूजीवादी शक्तियों ने अपनी सियासी चालें चलीं और चुनाव लड़ना जीतना और सत्ता में आकर काॅरपोरेट के पक्ष में काम कर उनसे मोटा चंदा लेकर फिर से बार बार चुनाव जीतना बेहद महंगा कर दिया उससे वामपंथी सत्ता से दूर होते चले गये। लेकिन संतोष की बात यह है कि जहां भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी मज़बूत हुयी और लगातार तीन बार से चुनाव जीतकर सत्ता में बनी हुयी है। वहां कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की तरह वामपंथी रास्ता पकड़ लिया है। यह तय है कि आज नहीं तो कल लोग जब भी सत्ता बदलने का मन बनायेंगे वे भाजपा को त्यागकर कांग्रेस के पास ही जायेंगे। यही वजह है कि मोदी बीजेपी और संघ का सारा डर सारा विरोध और दिन रात नेहरू पर आरोप कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने को उन राज्यों में भी लगाये जाते हैं जहां कांग्रेस का नाम ओ निशान भी नहीं बचा है। आज भी अखिल भारतीय स्तर पर विचारधारा वाली कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसका संगठन समर्थन और थोड़ा बहुत प्रभाव भारत के हर हिस्से में है। एक शायर ने कहा है-

0 ये लोग औरों के दुख जीने निकल आये हैं सड़कों पर,

  अगर सिर्फ अपना ही ग़म होता तो यूं धरने नहीं देते।।

नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।

दिग्विजय भी थरूर बनेंगे?

दिग्विजय सिंह भी शशि थरूर के रास्ते पर...

      ऐसा लगता है कि कांग्रेसी अधिक दिन तक सत्ता से बाहर नहीं रह सकते। पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने पीएम मोदी की शान में कसीदे पढ़े। इससे पहले यही घटिया काम गुलाम नबी आज़ाद करके अपनी अलग पार्टी बना चुके थे। अब लगभग उसी भाषा शैली और अंदाज़ में एमपी के पूर्व सीएम और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मोदी बीजेपी और आरएसएस की भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि 70 सालों के एकक्षत्र राज में इन जैसे कुछ कांग्रेसियों ने इतना माल नंबर दो से कमाया है कि उसको बचाने के लिये संघ का थोड़ा सा दबाव पड़ते ही ये लोग दंडवत हो जाते हैं। यही वजह है कि कमलनाथ हों या दिग्विजय सिंह राहुल गांधी इनसे बहुत खफा रहते हैं लेकिन सोनिया गांधी के दरबारी होने की वजह से ये कांग्रेस में बने हुए हैं। जबकि सच यह है कि इनकी वजह से कांग्रेस को कोई राजनीतिक लाभ तो दूर उल्टा नुकसान ही हो रहा है। राजस्थान में वहां के पूर्व कांग्रेसी सीएम अशोक गहलौत ने युवा कांग्रेसी नेता सचिन पायलट को सीएम बनने का मौका न देकर चुनाव में गुटबंदी के चलते कांग्रेस को सत्ता से बाहर कराकर ही दम लिया। यही हाल एमपी में कमलनाथ ने युवा कांग्रसी नेता ज्योतिराज्य सिंधिया को सत्ता में भागीदारी न देकर कांग्रेस की कब्र खोदकर बीजेपी को सत्ता थाली में रखकर परोस कर किया।

बांग्लादेश में हिंदू उत्पीड़न

बंग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू उत्पीड़न सहन नहीं होगा...

       पड़ौसी देश बंग्लादेश में जब से चुनावों का ऐलान हुआ है। वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। वहां हालात तेज़ी से खराब हो रहे हैं। वहां दक्षिणपंथी राजनतिक शक्तियां लगातार शक्तिशाली होती जा रही हैं। पूर्व पीएम शेख़ हसीना जब से सत्ता छोड़कर शरण लेने भारत आई हैं। उनकी पार्टी उनके नेताओं और बंग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान से जुड़े हर मामले में वहां की कार्यवाहक सरकार दुश्मनों की तरह पेश आ रही है। उन्होंने हसीना की पार्टी पर चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी है। यानी उनको पता है कि अगर रोक नहीं लगाई तो हसीना की पार्टी फिर बहुमत ला सकती है। साथ ही अल्पसंख्यक हिंदू विरोधी भावनायें भड़काकर बहुसंख्यकवाद की घटिया सियासत भी वहां परवान चढ़ाने की कोशिश जारी है। लेकिन वहां के कार्यवाहक सरकारी मुखिया मुहम्मद यूनुस को यह नहीं भूलना चाहिये कि कोई भी देश अपने अल्पसंख्यक नागरिकों को सताकर न तो प्रगति कर सकता है और न ही देश में स्थायी शांति स्थापित कर सकता है। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

एसआईआर : यूपी में 2.89 करोड़ वोट कटेंगे...

एसआईआर: यूपी में 2 करोड़ 89 लाख वोट कटने का मतलब?

                 -इक़बाल हिंदुस्तानी

      बिहार के बाद देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव आयोग का एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है। संयोग और आश्चर्य की बात यह है कि जिस बंगाल में एसआईआर को लेकर सबसे अधिक घमासान मचा था। वहां मात्र 58 लाख वोटर के नाम लिस्ट से काटे गये हैं। इनमें भी बंग्लादेशी घुसपैठियों की गिनती इस लायक नहीं है कि केंचुआ उनकी संख्या को सार्वजनिक करे। जबकि राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी का दावा है कि इनमें से 32 लाख वो मतदाता हैं जिनके नाम 2025 की लिस्ट में थे लेकिन 2002 की सूची में नहीं होने से ये अपने प्रपत्र जमा नहीं कर सके हैं। यह राज्य की सीएम ममता बनर्जी का ही रौद्र रूप था जिससे चुनाव आयोग अपने आका के इशारे के बाद भी बिहार जैसा सियासी खेल वहां नहीं कर सका है। अब चुनाव आयोग के अनमेप्ड वोटर कहे जाने वाले ये लोग बड़ी संख्या में अपने दस्तावेज़ लेकर फिर से चुनाव आयोग के दर पर दस्तक देने पहंुच रहे हैं। उधर देश की सियासत को सबसे अधिक बनाने बिगाड़ने वाले बीजेपी शासित यूपी में 2 करोड़ 89 लाख वोटर के नाम कटने से राजनीतिक क्षेत्रों में भूचाल सा आ गया है। जानकारों का कहना है कि यह सब केंद्र और राज्य के शासकों में चल रही गुटबंदी का परिणाम है। इस बहाने यूपी के अगले चुनाव में सीएम योगी को सत्ता से बाहर करने की रण्नीति पर चर्चा चल रही है। विपक्ष नेता अखिलेश यादव ने यह कहकर आग में घी डालने का काम किया है कि हमने अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कड़ी निगरानी में बीजेपी को खासतौर पर पिछड़े दलितों और अल्पसंख्यकों के वोट काटने की साज़िश को रोका है।

राइट टू डिस्कनेक्ट

*राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक क्या है, इसकी ज़रूरत क्यों व किसको है?* 
0 पिछले दिनों लोकसभा में एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पेश किया था। हालांकि यह प्राइवेट बिल था जिसको पास नहीं होना था और न ही यह पास हुआ लेकिन इस बिल को पेश कर सुले ने पूरे देश का ध्यान इस ओर आकृष्ट ज़रूर कर दिया कि क्या ऐसा एक कानून होना चाहिये जिससे कार्यालायों या वर्क फ्राॅम होम करने वाले लोगों से ड्यूटी खत्म होने के बाद उनके आॅफिस उनके आॅफिसर यहां तक कि उनके बाॅस भी उनसे कनेक्ट नहीं हो सकें। यानी सेवा के घंटो के बाद किसी नागरिक का डिस्कनेक्ट होना उसका बुनियादी अधिकार है। इंसान कोई मशीन नहीं है कि आप उसको 24 घंटे और सप्ताह के सातों दिन कंपनी के काम मंे व्यस्त रखें। वास्तव में ऐसे कानून की ज़रूरत तो है।    
     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
       फ्रांस की एक बड़ी अदालत ने पिछले दिनों एक फैसला दिया जिसमें सरकार को यह निर्देश दिया गया कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को इस बात के लिये नौकरी से निकाला नहीं जाना चाहिये कि अपनी ड्यूटी खत्म होने के बाद उसने कंपनी के किसी अधिकारी या मालिक की काॅल अटंेड नहीं की। कोर्ट का साफ कहना था कि राइट टू डिस्कनेक्ट एक्ट के तहत आॅफिस से जाने के बाद किसी वर्कर का आॅफिस संबंधी काम से जुड़ा फोन काॅल उठाना या ना उठाना उसका निजी मामला है। यह काम या कंपनी के प्रति लापरवाही या कमी नहीं मानी जा सकती। वहां 2017 मंे ही राइट टू डिस्कनेक्ट कानून लागू हो चुका है। ऐसे ही 1914 में अमेरिका में वहां के जाने माने काॅरपोरेटर और फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड ने सबसे पहला काम अपनी कंपनी के मज़दूरों के काम के घंटे नौ से घटाकर आठ और वेतन 2.34 डाॅलर से सीधे दोगुना यानी 5 डाॅलर कर दिया था। उन्होंने असेंबली लाइन तकनीक का उपयोग करके आॅटोमोबाइल के प्रोडक्शन में क्रांति ला दी थी।
        उनके इस कदम से कारें आम लोगों के लिये काफी सस्ती हो गयी थीं। इससे श्रमिकों को स्थिरता उच्च मनोबल और आर्थिक समृध्दि मिली जिससे वे अपनी ही कंपनी में बनी कार खरीदने की हैसियत में आ गये। फोर्ड के इस कदम को फोर्डिज़्म कहा गया और इससे अमेरिकी मीडियम क्लास के विकास में भी सहायता मिली। फोर्ड ने इसे लाभ का मालिक और कर्मचारियों के बीच वाजिब वितरण बताया था जिससे उच्च वेतन और सस्ती चीजों का उत्पादन बढ़ा। अब हम मूल विषय पर आते हैं। हालांकि राइट टू डिस्कनेक्ट का अभियान जर्मनी फ्रांस सहित यूरूप के कई देशों सहित विश्व स्तर पर 2017-18 में अपने चरम पर था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सांसद और वरिष्ठ पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले ने दरअसल मूल राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पहली बार 2018 में ही लोकसभा में पेश किया था। लेकिन उस समय पर इस पर कोई खास चर्चा नहीं हुयी। इस बार फिर से सुले ने यह प्राइवेट मेंबर बिल-2025 संसद में पेश किया है। हालांकि सबको पता है कि सुले का यह बिल केवल चर्चा के लिये है। बिना सरकार की तरफ से पेश किये इसका पास होना असंभव है। लेकिन अच्छी बात यह है कि देश में इस बिल के मूल विचार को लेकर चर्चा चल निकली है। इसका प्रभाव यहां तक है कि केरल सरकार ने अपने स्तर पर एक ऐसा ही बिल लाने का निर्णय लिया है। इस तरह के कानून की आवश्यकता इसलिये भी महसूस की जा रही है कि आज के दौर में वर्कर्स के घर आने के बाद काॅल और ईमेल का जो सिलसिला शुरू होता है वह सेकंड शिफ्ट कहलाने लगा है। स्टेनफोड रिसर्च बताती है कि काॅरपोरेट सप्ताह में कर्मचारियों से 72 घंटे काम लेना चाहता है। जबकि आदर्श काम के घंटे 50 से 55 ही माने जाते हैं। पूंजीवाद की सोच के उद्योगपतियों को फोर्ड की यह खोज समझने की ज़रूरत है कि वर्कर जितना कम टाइम काम करेगा उसको अधिकतम आराम मिलेगा और ऐसा करने से एक तो काम के दौरान दुर्घटना होने की आशंका कम होती जायेगी दूसरी बात उसके काम की गुणवत्ता लगातार बेहतर होती जायेगी।
          जब वर्कर्स की नींद पूरी नहीं होगी उनके काम करने का उत्साह गुणवत्ता और लगन कम ही होती रहेगी। इसलिये यह मांग तेज़ होती जा रही है कि एक तो काम से घर लौटने के बाद या वर्क फ्राम होम करने वाले कर्मचारियों को काॅल या ईमेल नहीं किया जाना चाहिये और अगर ऐसा मना करने के बावजूद भी होता है कि वर्कर्स को राइट टू डिस्कनेक्ट के तहत यह अधिकार होगा कि वह अपना फोन स्विच आॅफ कर ले या ऐसा एप लगाकर सेटिंग बदल दे कि ऐसी अवांछित काॅल टैक्स्ट और मेल आॅटो मोड में खुद ही डिलीट होती रहे। ब्लैक बेरी मोबाइल में यह आॅपशन इन बिल्ट आने लगा है जिससे सर्विस आॅवर के बाद कर्मचारी को कंपनी आॅफिस से आने वाले ईमेल स्वतः ही रूक जाते हैं। यह भी माना जाता है कि अगर ऐसा कोई कानून बन भी जाता है तो कंपनी अनेक तरीकों से वर्कर्स पर दबाव बनाकर उससे एग्रीमेंट कर सकती है कि उसको काम के बाद घर जाने पर भी काॅल और मैसेज से कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन अगर कंपनी ने उसके ना चाहते हुए उसको राइट टू डिस्कनेक्ट कानून के तहत घर पर काॅन्टैक्ट करना जारी रखा तो बड़ी संख्या में मामले कोर्ट में जायेंगे। पंूजीवादी व्यवस्था में कंपनी एक और तरीके से अपने कर्मचारी को परेशान कर सकती हैं कि अगर उनको कर्मचारी का घर जाने के बाद कंपनी की काॅल और संदेश का जवाब नहीं देना बुरा लगता है तो वह या तो उसको अधिक समय पर आॅफिस रोकर बिना ओवर टाइम दिये काम लेंगी या फिर उसको किसी और बहाने से बाहर का रास्ता दिखा देंगी जिसके लिये कोई भी कर्मचारी तैयार नहीं होता। कहने का मतलब यह है कि राइट टू डिस्कनेक्ट कानून बन भी जाये तो वर्तमान व्यवस्था में लागू करना भी काफी कठिन काम होगा लेकिन इस स्तर पर भी यह विचार ग़जब का है। कानून बन जाये तो उसको लागू करने के तौर तरीके भी अमल में देर सवेर आने ही लगेंगे। एक शायर ने कहा है-
 *0 मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,* 
 *उसको छुट्टी ना मिली जिसने सबक याद किया।।* 
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर हैं।

काज़ी इसफरुल हक़ जकी

*क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की: सूद को छोड़ा,ग़रीबों को बैंकिंग से जोड़ा!*
0 जिस तरह से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने वाले सर सÕयद अहमद खां ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि मुसलमानों को विकास से जोड़ना है तो उनको हायर एजुकेशन में आगे लाना होगा। उसी तरह से यहां 1971 में मुस्लिम फंड कायम करने वाले जलालाबाद निवासी क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की ने आधी सदी पहले यह जान लिया था कि अगर गरीब लोगों को कर्ज़ के चक्रवृध््िद ब्याज और उनके मकान दुकान को नीलाम होने से बचाना है तो उनको मामूली खर्च पर लोन देना होगा, साथ ही कट्टरपंथी कुछ भी आरोप लगाते रहें लेकिन जो लोग सूद के डर से अपना पैसा बैंकों में जमा करने को तैयार नहीं हैं उनको बिना ब्याज छोटी छोटी बचत जमा करके हिंदू मुस्लिम समाजसेवा के काम में लगाना है।    
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      1940 में नजीबाबाद के पास स्थित कस्बा जलालाबाद में पैदा हुए क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की का 26 नवंबर को इंतकाल हो गया था। 55 साल पहले उनके बड़े भाई शहर क़ाज़ी इज़हारूल हक़ के पास 70 के दशक में जमीयत उलेमा हिंद से जुड़े कुछ लोग आये। उन्होंने उनसे नजीबाबाद में भी एक ऐसा बैंकिंग सिस्टम चालू करने की बात कही जैसा देवबंद में बिना सूद के एक इदारा पहले से ही चल रहा था। दरअसल बिना सूद का बैंक रामपुर के पास एक कस्बे में चलने की जानकारी उस टाइम के जाने माने उलेमा और दारूल उलूम देवबंद के संचालक मौलाना असद मदनी को 1960 के आसपास मिली थी। वहां मदनी साहब किसी इजलास में शरीक होने के लिये गये थे। जब उनको उस इलाके के बंजारा जाति के मुसलमानों ने पहली बार इस तरह के फंड के बारे में बताया जिसमें अमीर लोग अपना फालतू पैसा बिना किसी सूद की नीयत के फंड में जमा करते हैं और ज़रूरतमंद गरीब लोगों को सोना चांदी के जे़वर ग्रवीं रखकर उस पैसे से छोटे छोटे कर्ज दिये जाते हैं तो उनको यह आइडिया इस्लामी हिसाब से होने वाली बैंकिंग के लिहाज़ से मुनासिब लगा। मदनी साहब ने बाद में इस तरह के फंड को देवबंद में कुछ लोगों को खोलने के लिये पे्ररित किया। यह फंड वहां खुला लेकिन मदनी साहब उनके इदारे दारूल उलूम और जीमयत उलेमा हिंद का इससे कोई सरोकार नहीं रखा गया। बाद में जमीयत के ही कुछ लोग जब नजीबाबाद में ऐसा नो प्रोफिट नो लाॅस वाला बिना सूद का इदारा खोलने के लिये शहर क़ाज़ी इज़हारूल हक़ के पास गये तो उन्होंने यह काम अपने छोटे भाई क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की को सौंप दिया।
       क़ाज़ी जी ने इस फंड के सिस्टम को समझने के लिये देवबंद जाकर वहां ऐसा ही इदारा चलाने वाले हसीब साहब से पूरी जानकारी हासिल की। बाद में उन्होंने नजीबाबाद वापस आकर शहर के ज़िम्मदार हैसियतदार और सम्पन्न लोगों की मुस्लिम फंड के नाम से एक रजिस्र्ड कमैटी बनाई। जिसमें पत्रकार असद खां हाजी तस्लीम आढ़ती डाॅ जब्बार साहब और हाजी मुमताज़ चूड़ीवाले जैसे अनेक जानी माने लोग शामिल थे। फंड का पहला आॅफिस मुगलूशाह में हाफ़िज़ नूर मुल्तानी की दुकान में खोला गया। कुछ ही महीने बाद इस दफतर को रम्पुरा में यासीन डायमंड वालों के घर लाया गया। यहां लगभग 6 साल चलने के बाद वर्तमान हेड आॅफिस में यह फंड शिफ्ट हुआ। शुरू में इसमें जेवर रखकर जो कर्ज दिया जाता था उसके लिये काॅस्ट आॅफ लोन फाॅर्म बेचा जाता था। जिसकी दस बीस पचास और सौ रूपये कीमत होती थी। लेकिन बाद में यह सिस्टम बंद कर कर्ज पर मासिक रूप से कुछ मामूली फीस तय कर दी गयी। लेकिन इसको भी चक्रवृध््िद ब्याज से दूर रखा गया। इसके बाद स्टाफ की सेलरी स्टेशनरी घर और दुकान से जमा रकम की वसूली के लिये दिये जाने वाले कमीशन के बढ़ते हुए खर्च निकालने के लिये फंड में जमा एक्सट्रा पैसा बैंक में एफडी किया जाने लगा। इससे जो भारी कमाई शुरू हुयी उससे एक के बाद एक दिल्ली मुंबई सूरत वगैरा में फंड ने कार्यालय के लिये अपनी खुद की ज़मीन और उस पर निर्माण शुरू करा दिया। आज फंड में 700 से अधिक लोग काम करते हैं। जो भी सोना चांदी रखकर लोगों ने कर्ज लिया था। उसको वापस न लेने के बाद भी उसमें से एक ग्राम भी आज तक बेचा नहीं गया है।
       इस दौरान सरकार और आरबीआई के बदलते नियमों के तहत फंड का काम सीमित कर अल नजीब मिल्ली म्युचुअल बेनिफिट्स निधि लिमिटेड खोली गयी है। जिसमें जमाकर्ताओं को कंपनी को होने वाले प्रोफिट में हिस्सेदारी दी जाती है। इससे से क़ाज़ी जी पर लगातार लगने वाले सूदी कारोबार के आरोप पर भी कुछ हद तक लगाम तो लगी है लेकिन आज भी मुस्लिम फंड का वजूद कायम होने और पहले के कारोबार से जुटाये गये ब्याज के पैसे से ही सारा सिस्टम चलने से कुछ कट्टरपंथी आलिम इस तरह के कारोबार को हराम करार देते हैं। हालांकि क़ाज़ी जी ने इस विशाल आय से आगोश चैरिटेबिल हाॅस्पिटल नजीबाबाद आईटीआई लाइबे्ररी आंखों के आॅप्रशन के सालाना निशुल्क कैंप लखनऊ की समाजसेवी संस्था कल्याण करोति के सहयोग से विकलांग लोगों को बड़े पैमाने पर उपकरण हर साल गरीब लोगों को कंबल और लिहाफ़ भूकंप पीड़ितों की मदद बाढ़पीड़ितों की सहायता कोरोना लाॅकडाउन में घरेलू सामान की किट रोज़ा अफ़तार होली मिलन प्रोग्राम और कांवड़ती सेवा शिविर जैसे समाजसेवा और हिंदू मुस्लिम एकता के अनेक प्रोग्राम कराते रहे लेकिन जो कट्टरपंथी उनको सूद का हराम कारोबार करने वाला बताते थे वे होली और कांवड़ पर लगने वाले मुस्लिम फंड के सेवा शिविर की आलोचना ही करते रहे। क़ाज़ी जी सिटी प्रैस क्लब सहित कई समाजसेवी अदबी और कल्चरल व शैक्षिक संस्थाओं के संरक्षक और सदर व मैनेजर जैसे अहम पदों पर भी रहे और बराबर अपनी काबिलियत समय और पैसे से मदद करते रहे। हालांकि अब मुस्लिम फंड और अल नजीब संस्था उनके परिवार के लोग चला रहे हैं जिसके प्रबंधन व संचालन में पारदर्शिता और निष्पक्षता की उनके विरोधी लगातार मांग करते रहे हैं लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद संस्था के आर्थिक हालात अब अच्छे नहीं माने जाते हैं। बहरहाल क़ाज़ी जी ने जो कुरबानी दी कट्टरपंथी वर्ग के ताने सुने और समाजसेवा की उसकी दूसरी मिसाल बड़ी मुश्किल से ही देखने को मिलती है। एक शायर ने कहा है-
0 शोहरत मिली तो नींद भी अपनी नहीं रही,
गुमनाम जिं़दगी थी तो कितना सकून था।।
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर हैं।*

नजीबाबाद का होली मिलन_जेपी गुप्ता

सोशल मीडिया से......... हिंदुस्तानी 
*नजीबाबाद में होली मिलन ईद मिलन नरेश चंद जी का सराहनीय कदम था...* जे पी गुप्ता, पूर्व उपजिलाधिकारी 
जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
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       जीवन जब राष्ट्रीयता से ओतप्रोत होती है तब वह धर्म जाति संप्रदाय इन बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ जाती है. ऐसे ही एक शख्स की याद आज ताज़ा हो गई जिसका नाम है इक़बाल हिंदुस्तानी और ठिकाना है नजीबाबाद उत्तरप्रदेश. इस शख्स का वास्तविक नाम इक़बाल अहमद शेख था पर हिंदुस्तान की आत्मा को अपनी आत्मा में बसाकर वह व्यक्ति इक़बाल हिंदुस्तानी हो गया और यही नाम सभी रेकार्ड में दर्ज करा लिया.मुझे याद है कि नजीबाबाद की खूबसूरत धरती पर होली व ईद की मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द को ध्यान में रखते हुए एक बहुत ही खूबसूरत परंपरा स्व. श्री नरेश अग्रवाल जी द्वारा शुरू कि गई थी जो लगातार वहां पर निभाई जा रही थी. जिसमें होली के त्योहार पर होली मिलन का कार्यक्रम मुस्लिम समाज द्वारा और ईद की त्यौहार पर ईद मिलन कार्यक्रम हिंदू समाज द्वारा आयोजित किया जाता था. संजोग बस मुझे भी प्रशासक के रूप में वहां कार्य करने का अवसर मिला. हिंदू लोगों द्वारा ईद मिलन का सुंदर कार्यक्रम आयोजित किया जाता था और होली के अवसर पर होली मिलन कार्यक्रम मुस्लिम लोगों द्वारा. अपने कार्यकाल की दौरान ईद मिलन कार्यक्रम का सुन्दर आयोजन में मुख्य अतिथि की रूप में शिरकत करने का मौका मिला और उसके बाद होली मिलन कार्यक्रम जिसमें मुशायरा का कार्यक्रम होता था.होली मिलन कार्यक्रम की रूपरेखा देखकर मैंने कहा कि इसमें केवल मुशायरा ना होकर होली के गीत आदि भी शामिल किए जाने चाहिए तो आयोजन में शामिल कुछ लोगों द्वारा कहा गया की मुशायरा के साथ संगीत का कार्यक्रम करने से मुस्लिम समाज नाराज हो सकता है क्योकि मुआहरा मे अदब का एक अलग स्थान है.. मैंने देखा कि कुछ आयोजक तो इतना डर गए की कार्यक्रम की शुरुवात में वो मंच पर आने से कतराते रहे. ऐसे में इकबाल हिंदुस्तानी की हिम्मत देखने के काबिल थी. उन्होंने कहा कि मैं एसडीएम साहब के इस प्रस्ताव से बिल्कुल सहमत हूं और इसके लिए उन्होंने बहुत खूबसूरत प्लान किया.होली मिलन में कार्यक्रम का आगाज मुशायरे से किया गया और बीच-बीच में इस बात का अनाउंस करते रहे कि होली मिलन में खुद प्रशाशक साहेब होली गीत प्रस्तुत करेंगे तथा सनव्वर अली खान साहब संगीत पर प्रशासक साहेब कि लिखी गजल पेश करेंगे. धीरे-धीरे लोगों के अंदर उत्साह इस कदर बढ़ता गया कि उन्होंने आगे मुशायरा सुनने से पहले होली गीत सुनने की मांग कर दी और वह कार्यक्रम इतना जबरदस्त सफल हुआ जिसमें हिंदू मुस्लिम सभी लोग मिलकर खूब झूमे और नाचे. यहाँ तक कि मंच पर नोटों की बौछार भी कर दी. श्री नरेश अग्रवाल जी के उसे रोपे गए पौधे को सदा के लिए हरा भरा रखने के उद्देश्य से मैंने यह भी प्रस्ताव रखा था कि उक्त कार्यक्रम आगे नगर पालिका परिषद द्वारा कराया जा सकता है ताकि कार्यक्रम कभी वंद ना हो. आज जब पता चला कि अब होली मिलन का वो कार्यक्रम बंद हो चूका है तो पुरानी याद याद ताजा हो गई.
 सांप्रदायिक सौहार्द पर आधारित उस कार्यक्रम को क्यों बंद किया गया यह तो पता नहीं लेकिन मुझे लगता है कि वर्तमान कमिश्नर आदरणीय श्री aanjaney कुमार सिंह जी से अगर लोग मुलाकात करें और उसके इतिहास से अवगत कराएं तो शायद फिर एक बार होली मिलन और ईद मिलन का कार्यक्रम गुलजार हो सकता है.
 वर्ष 2011-2012 में होली मिलन कार्यक्रम की निजामत करते हुए मेरे मित्र इकबाल हिंदुस्तानी जी चित्र में देखे जा सकते हैं।
*नजीबाबाद में उपजिलाधिकारी रहे और कवि श्री जे पी गुप्ता की फेसबुक वॉल से*