Thursday, 29 October 2026

जावेद अख़्तर की मुस्लिम समाज को चुनौती

*जावेद अख़्तर की समाज सुधार की चुनौती को स्वीकार करेंगे मुस्लिम बुद्धिजीवी?*
                   *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                जाने माने गीतकार लेखक और पूर्व सांसद जावेद अख़्तर ने मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी, उदार और धर्मनिरपेक्ष वर्ग को एक बार फिर अपने समुदाय में सुधार की चुनौती दी है। सवाल यह है कि क्या प्रगतिशील मुस्लिम इस बयान पर पहले की तरह चुप्पी साध जायेंगे या उनको उल्टा काफ़िर, नास्तिक और देहरिया बताकर पलटवार करेंगे? इंडियन एक्सप्रेस हिंदी को पिछले दिनों दिए एक इंटरव्यू में जावेद अख़्तर ने कहा था "मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 में बना, आज़ादी 1947 में मिली। फिर भी समुदाय के भीतर से कोई बड़ा सुधार क्यों नहीं हुआ? इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ पर प्रतिबंध के लिये बीजेपी सरकार का इंतज़ार क्यों करना पड़ा? यह शर्म की बात है। यह किस तरह का सेक्युलरिज्म है?" उनका यह भी कहना था " यह दुखद है मुस्लिम समुदाय में सामाजिक समस्याओं और कमियों का विरोध करने वाला बहुत छोटा वर्ग है। पहले अपना घर सुधारो, फिर दूसरों की आलोचना का अधिकार मिलता है।"
                 जावेद अख़्तर की शिकायत अपनी जगह ठीक हो सकती है लेकिन इस मुद्दे पर विचार करने से पहले हमें मुस्लिम समाज की बनावट उसके अकीदे और जीने के तौर तरीकों को ठीक से समझना होगा। इस्लाम की तुलना हिंदू या अन्य धर्म से नहीं की जा सकती, इसकी वजह यह है कि इस्लाम रिवील्ड मज़हब है जबकि हिंदू धर्म को इवॉल्व माना जाता है। यानी इस्लाम को मानने वाले किसी मुसलमान को जिस तरह से ईमान एक अल्लाह एक रसूल और एक किताब से बांध दिया जाता है, वैसा हिंदू या अन्य धर्मों में नहीं है। इस्लाम की बुनियाद में ही कट्टरता शामिल हो जाती है जब कोई यह ईमान ले आता है कि सिर्फ़ उसका मज़हब ही सच्चा है, ईश्वरीय आदेश पर आधारित है और क्योंकि उसके अवतार ही अंतिम अवतार हैं तो उसमें किसी बदलाव सुधार या कमी की गुंजाइश नहीं रह जाती है। मिसाल के तौर पर इस्लाम के नाम पर मुस्लिम समाज में बहुत कम ही सही लेकिन बहुविवाह बाल विवाह और तीन तलाक़ का चलन आज भी जारी है। कानूनन रोक लग जाने के बाद भी इस्लामी आलिम इस ज़िद पर अड़े हुए हैं कि अगर कोई मुस्लिम अपनी बेटी के बालिग़ होने पर उसकी तत्काल शादी नहीं करता है तो उस लड़की को जितने महीने तक शादी से पहले पीरियड्स होंगे, उतने ही बच्चों के क़त्ल का जिम्मेदार वह परिवार होगा। जबकि कानूनन यह उम्र भारत में 18 साल है। मुसलमानों को यह समझने की ज़रूरत है कि शादी से पहले लड़की का जिस्म ही बच्चे पैदा करने लायक़ नहीं दिमाग़ और बॉडी भी परिपक्व होनी ज़रूरी है, जो पढ़ाई आयु और अनुभव से होती है। ऐसे ही तीन तलाक़ बोलकर वैवाहिक जीवन को तीन सेकंड में ख़त्म करना पत्नी ही नहीं बच्चों पूरे परिवार और समाज के साथ खिलवाड़ है। लेकिन मौलाना इस से टस से मस होने को यह कहकर तैयार नहीं हैं कि जब हमारे मज़हब में अल्लाह ने बताया है तो ठीक ही होगा। 
              इससे भी बुरी बात ऐसी एकतरफा तलाक़ देने के बाद भूल सुधार को किए जाने वाला हलाला नामक ज़ुल्म जहालत और अन्याय है, जो पति की गलती की सज़ा बेक़सूर पत्नी को देता है। हलाला यानि पति की गलती से दिए गए तलाक के बाद वापस फिर से पति के साथ रहने को पहले तलाकशुदा पत्नी किसी और से निकाह करे, उसके साथ सेक्स करे, उसके बाद उसका नया पति उसको तलाक़ दे दे तो वह पहले पति से फिर शादी कर सकती है। क्या पत्नी कोई सामान है, संपत्ति है या गुलाम है जो उसकी कोई ग़लती नहीं उसकी कोई मर्ज़ी नहीं उसकी कोई इज़्ज़त नहीं? चाहे जब छोड़ दो चाहे जिसके साथ निकाह करा दो, जिसके साथ चाहो उसे हमबिस्तर करा दो और फिर तलाक दिलाकर फिर से शादी कर लो? गलती पति की और ज़लील पत्नी को किया जाए, यह कौन सा अमानवीय कानून है? यह कौन सा ईश्वरीय निज़ाम है? यह कैसी शरीयत है? ऐसे ही बहु विवाह का मामला है। एक समय था जब हज़ारों साल पहले जब इस्लाम अरब में आया। वहां जब जंगे होती थीं। बहुत से मर्द मारे जाते थे। उनकी बीवियां विधवा हो जाती थीं। बहुत सी लड़कियां पुरुष कम होने से कुंवारी रह जाती थी। लोग एक से अधिक महिलाओं से अवैध संबंध नहीं बनाएं इसलिए उनको एक से अधिक शादी करने बच्चे पैदा होने पर उनके पालन पोषण की ज़िम्मेदारी पूरी करने को और ऐसी महिलाओं से मन भरने के बाद अचानक उनके हाल पर छोड़ देने से रोकने को बहुविवाह की अनुमति दी गई थी, लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं है तो यह व्यवस्था पुरुषवादी समाज के हिसाब से भी बनी होगी क्योंकि अधिकांश धर्म प्रवर्तक पुरुष रहे हैं। हालांकि आंकड़े बताते हैं, मुस्लिम समाज के साथ ही दूसरे धर्मों के लोग भी अनुमति नहीं होने और अवैध होने के बावजूद एक से अधिक शादी करते हैं, कुछ धर्मों में तो बहुविवाह मुस्लिमों से भी अधिक होता है लेकिन वे इसे खुले आम नहीं करते, मज़हब के नाम पर नहीं करते और अधिकार बताकर नहीं करते। ऐसे ही मुसलमान परिवार नियोजन, ब्याज और बीमे से भी बचते नज़र आते हैं। हालांकि अब शिक्षित और सम्पन्न मुस्लिम भी गैर मुस्लिम लोगों की तरह ही कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। लेकिन इस्लामी आलिम और प्रगतिशील मुस्लिम इस बात को कहने से आज भी बचते हैं। वे आज भी फ़ोटो वीडियो फिल्म म्यूज़िक शराब नाच गाना नाजायज़ बताते हैं। वे दीनी तालीम के मुकाबले दुनियावी वैज्ञानिक आधुनिक और तकनीकी शिक्षा से भी परहेज़ करते हैं, जिससे पूरी दुनिया में पिछड़ रहे हैं, ग़रीब और कमज़ोर बनते रहे हैं और अपमान व नुकसान औरों से अधिक उठा रहे हैं।
              जहां तक वक़्फ़ बोर्ड की सम्पत्तियों को लेकर बने नए वक्फ़ कानून का मामला है, उसमें भी मुसलमानों ने आज तक कोई ऐसा रास्ता तलाश नहीं किया जिससे बोर्ड की सम्पत्तियों पर अवैध रूप से काबिज़ लोगों को हटाकर भविष्य में ट्रस्ट बनाकर सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप से रोका जा सके। अगर किसी मुस्लिम महिला के साथ बलात्कार हो जाए तो उसको खुद को बे गुनाह साबित करने के लिए शरीयत के मुताबिक गवाह चाहिए नहीं तो वह अवैध संबंधों की दोषी मानी जायेगी। किसी भी मुस्लिम महिला की गवाही पुरुष के मुकाबले आधी मानी जाती है जबकि माता पिता की प्रॉपर्टी में भी उसको भाई से आधा हिस्सा मिलता है। क़ुरबानी के जज़्बे से ज़्यादा जानवर की क़ुर्बानी देने पर ही आज भी मुसलमानों का ज़ोर अधिक है। जबकि हज के दौरान हर हाजी दो जानवर ज़िबाह करता है और उनको वहीं ज़मीन में दफ़न करना होता है जिससे करोड़ो रुपया धार्मिक परम्परा के नाम पर बेकार चला जाता है। गरीबों की मदद के लिए निकलने वाली ढाई प्रतिशत ज़कात मौलाना मदरसों में लेकर अनाथ बच्चों से इमदाद में तब्दील कराने लगे हैं। ध्वनि प्रदूषण होने के बावजूद मस्जिदों में अज़ान के लिए लाउड स्पीकर बिना अनुमति या इजाज़त से अधिक डेसिबल पर इस्तेमाल करने की ज़िद भी मुस्लिम छोड़ने को तैयार नहीं हैं। मस्जिद में जुमे या ईदगाह में जगह कम पड़ने पर सड़क पर नमाज़ पढ़ने वाले मुस्लिम यह नहीं जानते कि किसी नापाक या दूसरों को चलने में परेशान करने वाली जगह पर नमाज़ नहीं अदा हो सकती। मुस्लिम औरतों को आज भी सर से पांव तक पर्दे में रखने वाले मुस्लिम यह नहीं बताते कि फिर वे कैसे उच्च शिक्षा हासिल करेंगी और किस तरह दूसरे वर्गों की तरह जीवन के हर क्षेत्र में सेवा कर हिस्सेदारी लेंगी? अंधविश्वास के नाम पर जिन्न जादू और नज़र के फेर में मुस्लिम समाज के गरीब और अशिक्षित वर्ग को ढोंगी बाबा खूब लूट रहे हैं। 
             शाह बानो के मसले में तलाक के बाद उसको उसके पति से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गुज़ारा भत्ता इस्लाम के खिलाफ़ बताकर इन दकियानूसी मौलानाओं ने ही तत्कालीन राजीव सरकार को कानून बनाने को मजबूर किया था, लेकिन आज तक वक़्फ़ बोर्ड ने शायद ही किसी तलाकशुदा मुस्लिम महिला को पति की जगह खुद गुज़ारा भत्ता दिया हो जबकि कानून यही बना था। ऐसा नहीं है कि हिंदू समाज में बालविवाह सती प्रथा या छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ़ कानून बनने या हिंदू कोड बिल का विरोध नहीं हुआ लेकिन समय के साथ बहुसंख्यक समाज ने बदलाव देर सवेर स्वीकार कर लिये। इसके उलट मुस्लिम समाज में जब कोई बुद्धिजीवी बदलाव सुधार या कुप्रथा के खिलाफ़ बोलता है तो मज़हब के ठेकेदार उसके ख़िलाफ़ कुफ़्र का फ़तवा जारी करने की धमकी देते हैं। इतना ही नहीं ऐसे प्रगतिशील आधुनिक और तर्कशील मुस्लिमों का समाज में बहिष्कार और उनके साथ ही उनके परिवार को भी डराने धमकाने और दुश्मनी में हिंसक हमले करने का अभियान शुरू हो जाता है, यही वजह है कि मुसलमानों में बदलाव की रफ़्तार बहुत सुस्त और कट्टरपंथी बहुत हावी हैं। लेकिन यह भी सच है कि इसके बावजूद मुस्लिम समाज में शिक्षा सुधार और बदलाव व्यवहारिक रूप से धीमी गति से आ ज़रूर रहा है।

चंद्रमणि रघुवंशी

*श्री चंद्रमणि रघुवंशी: 50 साल से क़लम और रिक्शा वालों का साथ निभाने वाला एक बेमिसाल पत्रकार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               बिजनौर टाइम्स के संपादक, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, पंजीकृत के संरक्षक और बिजनौर रिक्शा चालक एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री चंद्रमणि रघुवंशी बहुआयामी प्रतिभा के धनी है। यह कला, शक्ति और क्षमता उनको उनके पिता स्व. श्री बाबूसिंह चौहान साहब और माता स्व. विमला देवी से विरासत में भी मिली है। एक तरह से पत्रकारिता समाज हित में लेखन और गरीब व कमज़ोर लोगों के पक्ष में संघर्ष करने की शिक्षा उनको अपने घर से घुट्टी में मिली है। उन्होंने "कोख से कारा तक" जैसी कई कालजयी किताबें भी लिखी हैं। वे बेहतरीन कविताएं भी लिखते रहे हैं। 
        सबसे बड़ी बात वे सिर्फ़ लिखते ही नहीं, बोलते ही नहीं बल्कि अपनी समाजसेवी सोच को जीते भी हैं। वे आधी सदी से समाज के सबसे कमज़ोर ग़रीब और हाशिये पर समझे जाने वाले श्रमिक रिक्शा वालों के लिए उनका नेतृत्व करके संबल बने हुए हैं। उन्होंने अपनी जवानी से लेकर आज लगभग 75 साल की उम्र में भी रिक्शा वालों का साथ नहीं छोड़ा है। वे पिछले दिनों 50 वीं बार रिक्शा चालक एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए हैं। हालांकि पिछले एक दशक से वे गंभीर रूप से बीमार हैं। वे कई रोगों का शिकार हैं। उनको चलने फिरने में भी परेशानी होती है। वे वाकर के सहारे चलते हैं। वे कई बार गंभीर इन्फेक्शन होने पर कई माह दिल्ली के बड़े अस्पतालों में भी भर्ती रहे, लेकिन स्वस्थ होते ही अख़बार और रिक्शा यूनियन को अपनी सेवाएं फिर से देने लगे। वे डॉक्टर्स की सलाह के बावजूद घर में बिस्तर तक सीमित होने को तैयार नहीं हैं । समाज में विभिन्न गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहने की कोशिश करते हैं। उन्होंने आज तक किसी राजनीतिक दल की सदस्या नहीं ली जिससे रिक्शा वालों के लिए यूनियन के बैनर से खुद ही संघर्ष किया, बड़ा आंदोलन किया और बहुत बार रिक्शाओं की हड़ताल कराकर उनकी जायज़ मांगे मानने के लिए पुलिस, प्रशासन और शासन को झुकने के लिए मजबूर किया।
        श्री चंद्रमणि रघुवंशी की रिक्शा यूनियन के लिये उपलब्धियां गिनने बैठें तो लिस्ट बहुत लंबी है लेकिन उनके खास खास काम देखें तो श्री चंद्रमणि उस दौर में रिक्शा वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए जब पैडल रिक्शा चलाने वालों को नीची निगाह से देखा जाता था। आज ई रिक्शा तो कई पढ़े लिखे बेरोजगार युवा और उम्रदराज़ लोग आराम से चला रहे हैं। यह वह ज़माना था जब रिक्शा वाले को कोई भी किसी छोटी सी बात पर दुत्कार देता था, पीट देता था या उसको धमका देता था। श्री चंद्रमणि जो एलएलबी यानी कानून के जानकार भी थे, जब रिक्शा यूनियन से जुड़े तो उन्होंने उनकी गरिमा सम्मान और रोज़ी को कानूनी संरक्षण दिलाने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। रिक्शा चालकों के बुनियादी अधिकार, सम्मानजनक किराया, अफोर्डेबल रोड टैक्स, आसान पंजीकरण और उनके साथ मानवीय व्यवहार के लिए श्री चंद्रमणि ने लंबी लड़ाई लड़ी। कम लोगों को पता होगा पहले  ई रिक्शा का टैक्स 15 साल का 22000 एक साथ जमा करना होता था, जबकि ई रिक्शा की ह्रास के बाद आयु दस साल ही मानी जाती है, जो ग़रीब रिक्शा चालकों के लिए बहुत बड़ा बोझ था। श्री रघुवंशी ने इसके लिए ज़िला स्तर के साथ ही शासन से लंबी लिखा पढ़ी करके इस कर को 1000 रुपये साल करा दिया। इससे आर्थिक रूप से कमज़ोर रिक्शा वालों को बहुत बड़ी राहत मिली। इसके साथ ही ई रिक्शा को मोटर व्हीकल एक्ट से निकालकर म्युनिस्पल एक्ट में लाने की मांग भी उन्होंने समय समय पर की जिससे रिक्शा चालकों का टैक्स कम हो और रजिस्ट्रेशन सरल व सुगम हो सके। 
              एक आंकड़े के अनुसार बिजनौर में 3500 से अधिक रिक्शा हैं, जिन से लगभग 1.75 लाख लोग जुड़े हुए हैं। जाने माने राष्ट्रीय साहित्यकार और इम्फाल यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के प्रमुख रहे डॉ देवराज ने अपनी डायरी/संस्मरण में श्री चंद्रमणि रघुवंशी के ऐसे कई संघर्षों, फोन वार्तालापों और रिक्शा वालों की स्थिति में सुधार लाने के उनके सतत प्रयासों का विस्तार से वर्णन किया है। देश के कई मीडिया संस्थानों अखबारों और चैनलों ने भी समय समय पर समाज के सबसे कमज़ोर दमित और पीड़ित रिक्शा चालकों के लिए उनके किए संघर्ष, नियमित रूप से अधिकारियों से संपर्क और पत्राचार पर कई लेख समाचार और साक्षात्कार प्रकाशित किए हैं। श्री चंद्रमणि रघुवंशी को पत्रकार के रूप में शानदार लिखने के साथ रिक्शा वालों के लिये ठोस भलाई का काम करने पर कई संस्थाएं सम्मानित भी कर चुकी हैं। उनकी प्रेरणा से ही आज रिक्शा यूनियन से कई और पत्रकार जैस सूर्यमणि रघुवंशी अनिल चौधरी, मरगूब रहमानी और पूर्व चेयरमैन शमशाद अंसारी आदि जैसे समाजसेवी भी जुड़ चुके हैं। वास्तव में श्री चंद्रमणि रघुवंशी एक बेहतरीन पत्रकार के साथ ही एक बेमिसाल समाजसेवी, संवेदनशील इंसान और गरीबों के मसीह का फ़र्ज़ भी अदा कर रहे हैं, जो आज के युवाओं के लिये एक प्रेरणा श्रोत और लेखन के साथ व्यवहार में समाजसेवा की एक शानदार मिसाल हैं। पत्रकारिता हो या समाजसेवा एक शायर ने क्या ख़ूब कहा है...
*इतनी आसानी से मिलती नहीं फ़न की दौलत,*
*ढल गई उम्र तो ग़ज़लों पे जवानी आई।*

Wednesday, 21 October 2026

इंसानियत का मज़हब

*इंसान का इंसान से हो भाईचारा,*
*यही मज़हब यही पैग़ाम हमारा !*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              17 अक्टूबर की चिंगारी में जनाब गिज़ाल मेहदी का लेख "हिंदू समाज, मुस्लिम समाज या इंसानी समाज..." आज के दौर का बहुत बड़ा सवाल है। वे इंसानियत की खिदमत का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। उनको बधाई। आज के दौर में ऐसे लेख चिंगारी जैसा निष्पक्ष अख़बार और उसके मानवता प्रेमी संपादक श्री सूर्यमणि रघुवंशी ही छाप सकते हैं। आज जब हर बात हर घटना हर चीज़ को धर्म के चश्मे से देखा जाता है, तमाम देश धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग हो रही हैं, और धर्म के बहाने गैंग बनाकर दंगे और "गैंगवार" सी चल निकली है, ऐसे में इंसानियत की बात करना अपने आप में बहुत बड़े दिल खुली समझ और इंसान की साझा ज़रूरतों पर फ़ोकस करना हिम्मत की बात है। एक समय था जब मज़हब समाज में बुराई को ख़त्म करने और अच्छाई को फैलाने के लिये आए थे। कुछ आज भी यही काम कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं उस जंगल युग में धर्मों ने समाज सुधार चरित्र निर्माण और परस्पर भाईचारे को बढ़ावा दिया लेकिन कालान्तर में धर्मों के नाम पर सांप्रदायिकता कट्टरता और सियासी युद्ध होने लगे, जिससे आंकड़े बताते हैं जितने लोग दुनिया में अब तक हुई देशों के बीच जंगो में नहीं मरे उससे ज्यादा आस्था के नाम पर हुए कत्लेआम में मारे गए। धर्मों में समय के अनुकूल जो सुधार बदलाव और गैर ज़रूरी रस्मों के विलोपन होने चाहिए थे, वे नहीं हुए जिससे टकराव बढ़ता गया और यह आज भी तमाम मुल्कों में दंगों हिंसा और पक्षपात के रूप में जारी है।
           जब कोई भी बच्चा पैदा होता है तो वह इंसान ही होता है। बाद में उसका परिवार उसे अपने धर्म के रंग में ढाल देता है। उसके बड़े होने का वेट भी नहीं किया जाता। उस बच्चे के सामने सभी धर्मों को रखा जाए, बताया जाए और पढ़ाया जाए उसके बाद यह फैसला उस पर छोड़ दिया जाए कि वह किस आस्था को स्वीकार करता है। लेकिन हमारा समाज हमारा परिवार और हमारी दुनिया के अधिकांश देश यह मानकर चलते हैं कि जो धर्म उनका है केवल वही सही है। यही वजह है कोई बच्चा बड़े होकर अगर अपना जन्मजात धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म अपना ले या केवल सभी धर्मों से किनारा कर ले तो उसके पूर्व धर्म के लोग उसके दुश्मन बन जाते हैं। कई देशों और धर्मों में तो धर्म बदलने या आज का मज़हब छोड़कर इंसानियत का मज़हब अपनाने पर हत्या तक कर दी जाती है। कई धर्म वाले ऐसे मानवता प्रेमी का सामाजिक बहिष्कार करने लगते हैं। कई मामलों में अलग अलग धर्म होने पर प्रेमी प्रेमिका को धर्म के ठेकेदार शादी नहीं करने देते। हमारे देश में तो इस तरह के विवाह रोकने को बाकायदा लव जेहाद नाम देकर कानून भी बन गया है। लेकिन इसके अमल में भी धर्म देखकर पक्षपात हो रहा है।
        पीयू रिसर्च 2025 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में कोई भी धर्म नहीं मानने वालों की तादाद 1 अरब 90 करोड़ हो चुकी है, जो हर साल तेज़ी से बढ़ रही है। इन लोगों को मज़हबी लोगों से कोई विरोध नाराज़गी या रंजिश नहीं है। उधर धर्म मानने वालों के साथ दो बड़ी प्रॉब्लम है। इन आस्था वालों को नास्तिकों से बड़ी समस्या है। ये कहते हैं धर्म तो सबको मानना चाहिए। इनका दूसरा दावा होता है कि केवल उनका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इस दावे से धर्मों के अनुयायियों में आपस में ही वर्चस्व की लड़ाई होने लगती है। कई मुल्कों में कई दशकों से हो भी रही है। जिसमें करोड़ो लोग मर चुके हैं ।हमारे देश में भी हिंदू मुस्लिम की बांटो और राज करो की सांप्रदायिक सियासत काफ़ी समय से फल फूल रही है। अजीब बात यह है किसी भी धर्म के मानने वालों के पास ऐसा कोई प्रमाण तथ्य या गवाह नहीं है जिससे वे यह साबित कर पाएं कि केवल वे ही सही हैं लेकिन दावा सब यही करते हैं। इसके साथ ही वे समय के साथ बदलाव को तैयार नहीं होते। आस्था क्योंकि भावनाओं से जुड़ी होती है तो वे तथ्य सत्य और बदलाव को स्वीकार नहीं करते। वे अंधविश्वास दकियानूसी परंपराओं और जादू व जिन्न भूत के भी शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले लोग हैं जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानते हैं। वे सबसे बड़ा धर्म मानवता और नैतिकता को कहते हैं और उस पर अमल भी करते हैं लेकिन वे संस्कृति स्वस्थ परंपरा और अध्यात्म को नहीं नकारते। वे यह दावा भी नहीं करते कि केवल वे ही सही हैं। उनके द्वारा आस्तिकों के साथ नफ़रत भेदभाव या सामूहिक हत्या का भी कोई प्रमाण आंकड़ा या ख़बर नहीं है। बेहतर हो कि सबको धर्म मानने या नहीं मानने और धर्म बदलने की आज़ादी हो जिससे आपसी टकराव नहीं हो और लोग कोई सा भी धर्म मानने के बावजूद पहले खुद को इंसान मानें जिससे विश्व के देशों के बीच और लोगों के बीच अमन चैन भाई चारा व प्रेम भावना बनी रहे। निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है...
*घर से मस्जिदें बहुत दूर हैं चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।*
नोट= लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अखबार के संपादक हैं।

Monday, 19 October 2026

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुसार चले...

*सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ईश्वरीय वाणी नहीं हैं, उनकी भी स्वस्थ आलोचना हो सकती है!*
         *इक़बाल हिंदुस्तानी*
      सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए हाल ही में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा धमका नहीं सकता। बेशक सुप्रीम कोर्ट को इससे बचाने के लिये ही कोर्ट की मानहानि का मुकदमा चलाने का विशेष अधिकर मिला हुआ है। लेकिन उसके फैसलों की स्वस्थ आलोचना करने का अधिकार संविधान ने नागरिकों को दिया है। उधर वरिष्ठ वकील श्री कपिल सिब्बल ने कहा है “मैं बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाकर थक गया हूं। मैं अपनी बात कह रहा हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं है।” इससे पहले एक और सीनियर एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण यह आरोप लगा चुके हैं कि ऐसा लगता है कि सबसे बड़ी अदालत के कई जज सरकार के दबाव में फैसले दे रहे हैं। उनका दावा था कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मोदी सरकार ने अनेक न्यायाधीशों और उनके निकटवर्ती संबंधियों की गोपनीय जांच कराकर उनकी कुछ संवेदनशील जानकारी जुटाकर अपने मन माफिक फैसले लेने का एक अनैतिक मैकेनिज्म विकसित कर लिया है? इन गंभीर आरोपों की न तो आज तक जांच हुई और न ही किसी स्तर पर पुष्टि हुई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय से एक के बाद एक आ रहे कुछ बेंचों और कुछ खास जजो के सरकार समर्थक अधिकांश फैसलों ने सिविल सोसायटी के इस तरह के संदेह को और गहरा ज़रूर कर दिया है। अगर जजों की बात याद करें तो 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने जस्टिस चेलामेश्वर के आवास पर एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। जजों  के आरोपों के अनुसार यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार था कि सिटिंग जजों ने सार्वजनिक रूप से उस समय के मुख्य न्यायाधीश  दीपक मिश्रा के प्रशासनिक कामकाज पर चिंता जताई थी। इन जजों का कहना था “जब तक इस संस्था यानी सर्वोच्च न्यायालय को सुरक्षित नहीं रखा जाता और यह अपना संतुलन बनाए नहीं रखती, देश में लोकतंत्र नहीं बच पाएगा। सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।” चारों जजों ने कहा था कि उन्होंने सीजेआई से मुलाकात कर और पत्र लिखकर भी ये समस्याएँ बताईं, लेकिन उनके प्रयास विफल रहे। इसलिए वे राष्ट्र के सामने यह बात रखने को मजबूर हुए, ताकि भविष्य में कोई यह न कहे कि उन्होंने संस्था की रक्षा नहीं की।
      "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए" मूल रूप से यह कथन लॉर्ड हेवर्ट का है। वे इंग्लैंड के लॉर्ड चीफ जस्टिस थे।भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सिद्धांत को अपनाया है। 7 मई 1997 को सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट मीटिंग में इसी सिद्धांत को न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्स्थापना के रूप में अपनाया गया था। उस समय जस्टिस जे.एस. वर्मा भारत के चीफ जस्टिस थे। इस दस्तावेज के पहले बिंदु में ही यही सिद्धांत शामिल है। कहने का अभिप्राय यह है कि 2014 के बाद से सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश फैसलों को इस कसौटी पर परखा जाए तो वे सरकार की तरफ़ झुके नज़र आते हैं। उन फैसलों में न्याय होता दिखाई नहीं पड़ता। यहां यह स्पष्ट करना भी मुनासिब होगा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में सुप्रीम कोर्ट और उसके माननीय न्यायाधीशों का सम्मान करना और उनके दिए फैसलों से असहमति रखना दोनों अलग अलग बात हैं। पिछले दिनों जब विपक्षी दलों ने अपनी बात रखने को चीफ़ जस्टिस से मिलना चाहा तो निष्पक्षता की दुहाई देते हुए उन्होंने मना कर दिया जबकि वन नेशन वन इलेक्शन के सरकारी मसौदे पर विचार के लिए बने आयोग से इस विवादित मुद्दे पर चर्चा करने को वे सहर्ष तैयार हो गए थे। बाद में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इसे सांवैधानिक रूप से गलत बताया तो वे पीछे हट गए।
        कोर्ट की मानहानि का केस कंटेप्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट 1971 के तहत चलता है जिसमें कोर्ट के आदेशों स्टे या उसको दिए वचन यानी शपथ पत्र का जानबूझकर उल्लंघन, उसकी गरिमा अधिकार या न्याय प्रक्रिया में बाधा डालना, धमकी देना और अपमान करना शामिल है। अपवाद के तौर पर देखा जाए तो न्यायिक फैसलों और प्रशासनिक कार्यों की स्वस्थ यानी सकारात्मक आलोचना, निष्पक्ष विश्लेषण और संविधान समाज व जनहित में सत्य तथ्य और प्रमाणिक आंकड़ों के आधार पर समीक्षा की जा सकती है। *सबसे अधिक आलोचना सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर से जुड़े फ़ैसले को लेकर हो रही है। इस मामले में चुनाव आयोग सरकार के पक्ष में झुका नज़र आता रहा लेकिन कोर्ट ने उसको फ्री हैंड दे दिया। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में जब सरकार ने चीफ़ जस्टिस को बाहर कर एक केबिनेट मिनिस्टर को चयन समिति में शामिल किया तो भी सुप्रीम कोर्ट ने उस पर तत्काल रोक नहीं लगाई और सरकार को मनमानी का मौका मिल गया। चुनाव आयोग ने एसआईआर में अब तक 13 करोड़ असली नक़ली लोगों के नाम विभिन्न कारणों से वोटर लिस्ट से काट दिए हैं, इस दौरान महाराष्ट्र बिहार बंगाल और दिल्ली में चुनाव भी हो गए लेकिन कोर्ट ने कुछ ठोस एक्शन नहीं किया। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर 27 लाख लोग बंगाल में एसआईआर के कारण इस बार वोट नहीं डाल पाए तो क्या हुआ अगली बार डाल देंगे। यह कितनी ग़ैर जिम्मेदार और लापरवाही की बात थी? महाराष्ट्र में शिवसेना के विधायक तोड़कर उद्धव ठाकरे सरकार गिराकर शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनाई गई लेकिन कोर्ट ने ठोस और समय पर सख़्त कार्रवाई नहीं की। नतीजा यह हुआ उस विवादित सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया लेकिन  विधानसभा अध्यक्ष को विधायकों की अयोग्यता तय करने को असीमित समय मिलने से कोर्ट का प्रभावी फैसला नहीं आया। बंगाल में टीएमसी को अवैध तरीके से तोड़ा गया, उसके सांसदों विधायकों पर हमले होते रहे उसके खाते सीज़ किए गए लेकिन कोर्ट ममता बनर्जी को राहत देने के नाम पर चुप्पी साधे रहा। ज़मानत नियम और जेल अपवाद बताने वाले कोर्ट ने पांच साल से उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देकर अपने ही नियम कथन और परंपरा को तोड़ दिया। अदालत ने कश्मीर से धारा 370 हटाने धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाले सी ए ए और प्रस्तावित वक्फ अधिनियम के विवादित प्रावधान पर रोक न लगाकर एक बड़े वर्ग को बुरी तरह निराश किया है। लव जेहाद धर्म परिवर्तन और एंटी रोमियो जैसे विवादित कानूनों को कोर्ट ने बार बार चुनौती देने पर भी स्थायी निषेध आज्ञा जारी नहीं की। कोर्ट ने बहुत ध्वंस होने के बाद किसी भी अपराध के आरोपी के घर दुकान या संस्थान पर अवैध रूप से बीजेपी सरकारों द्वारा चलाए जा रहे बुलडोज़र पर रोक तो लगाई लेकिन इस पर अमल नहीं होने पर कोई कोर्ट कंटेंप्ट की कार्यवाही नहीं की। ऐसे ही फ़र्ज़ी एंकाउंटर हाफ एनकाउंटर और गौ मांस के नाम पर आएदिन हो रहे मॉब लिंचिंग के मामलों पर कोर्ट ने पहले तो कोई सख़्त आदेश जारी नहीं किया और जब ऐसा किया तो उस पर कार्यवाही सुनिश्चित नहीं हो ऐसी कोई पुख़्ता व्यवस्था नहीं की। यहां तक कि यूपी सरकार के बिना कानून ही आंदोलन के दौरान सार्वजिनक संपत्तियों के नुकसान के हर्जाना वसूलने के मामले में भी कोर्ट ने कोई ठोस कार्यवाही नहीं करके केवल ऐसा कानून बनाने की सलाह देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। सबसे चर्चित मामला इलेक्टोरल बॉन्ड का था जिसको सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तो ठहराया लेकिन उसकी सबसे बड़ी लाभार्थी सत्ताधारी बीजेपी होने के बावजूद उन बॉन्ड से वसूल हज़ारो करोड़ की रकम वापस नहीं कराई। पीएम केयर फंड पर भी कोर्ट नरम रुख़ अपनाता नज़र आया। इतना ही नहीं अयोध्या में राम मंदिर बनाने का कोर्ट का फ़ैसला आस्था के आधार पर अधिक माना गया जबकि कोर्ट के ही अनुसार मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाने का कोई प्रमाण नहीं मिला था। अपने ही स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले किसी कार सेवक को कोर्ट ने सज़ा नहीं दी। सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटाकर कट्टरपंथी तत्वों के विरोध के सामने कोर्ट फिर से अपने ही फैसले की समीक्षा को तैयार हो गया। समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद कोर्ट रूढ़िवादी तत्वों के दबाव में उनकी परस्पर शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मान्यता देने को तैयार नहीं हुआ। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कहीं भी उल्लेख नहीं होने के बावजूद कोर्ट ने सरकार द्वारा दिए गए ई डब्ल्यू एस के 10 प्रतिशत रिजर्वेशन को आश्चर्यजनक रूप से क्लीन चिट दे दी। जबकि कई राज्य सरकारों के धर्म के आधार पर दिए गए अल्पसंख्यकों के आरक्षण को वह असंवैधानिक बताकर बार बार निरस्त करता रहा है। ऐसे ही विवादित फैसले में कोर्ट ने बिना कोटा पूरा हुए ही एस सी एस टी के आरक्षण में उप वर्गीकरण की इजाज़त दे दी।* ऐसे फैसलों की सूची काफ़ी लंबी है लेकिन यहां सबका उल्लेख नहीं किया जा सकता। कोर्ट को चाहिए वह इस बात पर भी विचार करे कि वह संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह है, क्या उसके फ़ैसले इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतर रहे हैं?

Saturday, 17 October 2026

चिंगारी के 40 साल

*चिंगारी: कागज़ के पन्नो से मोबाइल की स्क्रीन तक विचारधारा की एक लड़ाई!*
*0 दुनिया में हमेशा से दो वर्ग रहे हैं। एक आम आदमी एक खास आदमी। चिंगारी की विचारधारा पीड़ित आम आदमी के पक्ष में रही है। यह लड़ाई चिंगारी दैनिक होने के बाद 40 साल से लगातार लड़ता चला आ रहा है। हालांकि उसने गोदी मीडिया के खिलाफ़ यह दुस्साहस करके इस उसूली लड़ाई की भारी कीमत चुकाई है लेकिन अखबार के पन्नो से शुरू करके आज मोबाइल की स्क्रीन तक आते आते भी उसने तकनीक तो बदली लेकिन सच के साथ रहने का मिज़ाज नहीं बदला। आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। अख़बार भी इस अस्तित्व के संघर्ष से बचे हुए नहीं हैं लेकिन यूपी के बिजनौर जैसे छोटे ज़िले से हिंदी अख़बार चिंगारी सांध्य दैनिक ने ऐसे गलाकाट दौर में भी अपनी विश्वसनीयता, सत्यता और जीवटता को बचाए रखा है।*  
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
              चिंगारी सिर्फ़ एक अख़बार का नाम ही नहीं है बल्कि यह एक विचारधारा है, मिशन है और सेवा का अभियान है। यह सबके हित में सोचता है। सबकी बात लिखता है और सबकी ख़बर लेता और देता है। यह धर्म जाति और छोटे बड़े के नाम पर फर्क नहीं करता। यह ज़ालिम और मजलूम की लड़ाई में कमज़ोर का साथ देता है। यह विज्ञापन के लिए खबरों का सौदा नहीं करता। यह उसूलों के लिए कीमत चुकाने को हर समय तैयार रहता है। यह डरता नहीं। यह झुकता नहीं। यह सच कहने से रुकता नहीं। कलम के सिपाही, जनवादी विचारों के धनी और समाजवाद व निष्पक्षता के मसीहा स्व. बाबू सिंह चौहान साहब ने जब चिंगारी का प्रकाशन साप्ताहिक अख़बार के रूप में आज से 76 साल पहले शुरू किया था तो शायद सोचा भी नहीं होगा कि एक ऐसा गोदी मीडिया फेक न्यूज और झूठे सियासी नैरेटिव का पूंजीवादी बेशर्म और अनैतिक दौर भी आएगा जहां सत्य, सिद्धांत और न्यायवादी होना दंड का भागी होना तथा झूठ फरेब और नफ़रत की पत्रकारिता करना सम्मान उन्नति तथा दौलत बरसने का रास्ता बन जायेगा। वैसे तो चिंगारी का प्रकाशन 1950 में ही शुरू हो गया था लेकिन 25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। आज चिंगारी के संपादक प्रखर वक्ता और दक्ष संचालक श्री सूर्यमणि रघुवंशी भी उसी दौरान अपनी पढ़ाई पूरी करके डेस्क पर संपादन का काम संभालना शुरू कर रहे थे। 
       शुरू में बड़े भाई साहब और उस समय बिजनौर टाइम्स के सहयोगी संपादक श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादक की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद मिलनसार इंसान हंसमुख व्यक्तित्व के धनी और ज़मीन से जुड़े श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी। एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अख़बार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अख़बार और चैनल तक इसकी ख़बरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली ख़बरों से अपनी अहम ख़बरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है।
        बिजनौर से निकलकर अब चिंगारी देखते देखते ही उत्तराखंड के साथ ही आसपास के कई सीमावर्ती ज़िलों में भी छाने लगा। कई बार बिजनौर के और कई बार बाहर के बडे़ समाचार पत्र समूहों ने चिंगारी को चुनौती देने के लिये अपना सुबह का अख़बार न चलता देख शाम का अख़बार इस इलाके में प्रकाशित करना चाहा। लेकिन वे नकारात्मक सोच और ईष्या की वजह से कामयाब नहीं हो सके। कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अख़बार लगातार चार दशक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है। चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। आज डिजिटल मीडिया प्रिंट मीडिया के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। हालांकि चिंगारी सहित अनेक अखबारों ने पीडीएफ फॉर्म में अपने डिजिटल वर्जन भी पब्लिश करने शुरू कर दिए हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में चिंगारी न्यूज चैनल वेबसाइट और एप की शक्ल में भी लोगों के लिए सेवाएं धीरे धीरे प्रिंट के साथ साथ उपलब्ध कराने का सफल प्रयास कर रहा है लेकिन यहां उसे एल्गोरिदम और नैरेटिव की लड़ाई में और अधिक संघर्ष करना होगा। आज मीडिया का अधिकांश हिस्सा गोदी मीडिया यानी चाटुकारिता में बदल गया है। रील का ज़माना है, यानी जो ज़्यादा दिखता है वही बिकता है। किसी भी घटना किसी भी समाचार और किसी के भी विचार का केवल कुछ सेकंड या अधिक से अधिक एक दो मिनट का सबसे चर्चित गुस्से वाला गाली वाला सेक्सी वीभत्स रक्तरंजित झूठा आक्रोशित और हिंसक हिस्सा निकालकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है। इससे उसके वीव लाखों करोड़ों में पहुंच जाते हैं। वह लोकप्रिय हो जाता है। कुछ ही पल में सेलिब्रिटी बन जाता है।एकाउंट में कंटेंट का मोटा पेमेंट आ जाता है। यह सब ए आई की मदद से होता है। इसके बाद लोग चाहें या नहीं चाहें यही हिस्सा सबसे ज़्यादा देखा सुना और पढ़ा जाता है। इससे कंटेंट का मूल विचार सिद्धांत और सत्यता कहीं पीछे छूट जाती है। इसके पीछे सत्ता का भी अहम रोल होता है। इसको काउंटर करने के लिए सरकार विरोधी विपक्ष सिविल सोसायटी और बुद्धिजीवी भी ऐसे ही जवाबी ऑडियो वीडियो और टेक्स्ट पर ज़ोर देते हैं। इससे एक बनावटी सियासी और झूठा नैरेटिव लोगों के बीच चल निकलता है जिसका सत्य तथ्य और वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे ही एक दल एक संगठन और कुछ समूहों ने दस लाख से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं जो लगातार इतिहास को तोड़ मरोड़ के अपने एजेंडे के हिसाब से लोगों को परोसते रहते हैं जिससे समाज में फेक न्यूज नफ़रत और बदले की भावना टकराव हिंसा बढ़ रही है। लोग भावुक नादान मासूम भोले और बहुत शरीफ व सीधे हैं तो वे भी ऐसे पोस्ट की क्रॉस चेकिंग नहीं करते जिससे गोदी मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आम आदमी को गुमराह कर रहा है और अपने सियासी एजेंडे चुनावी नैरेटिव तथा घृणा हिंसा व बदले की भावना में उलझा कर जीवन के असली मुद्दों रोटी कपड़ा और मकान आदि से भटका रहा है। ऐसे में चिंगारी जैसे मिशनरी सेक्युलर तथा आम आदमी की आवाज़ उठाने वाले क्षेत्रीय अख़बार की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। चिंगारी की हिम्मत को सलाम और ढेर सारी दुआएं पेश हैं। चिंगारी के नाम एक शेर पेश है...
0 उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।
*नोट लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अखबार के संपादक हैं।*

Sunday, 11 October 2026

300 के लिए 3 खून?

आज का विचार 
*तीन सौ रुपए के लिए तीन खून, समाज में बढ़ रहा कैसा जनून?*
          *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         देहरादून में 300 रुपए दिहाड़ी कम देने पर प्लंबर राजकुमार ने एक परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. रमेश कपूर, पत्नी रजनी कपूर और घरेलू सहायिका शीला को पेचकस से गोदकर मार डाला. आरोपी के मुताबिक, दिहाड़ी 600 रुपए तय हुई थी, लेकिन दंपति सिर्फ 300 रुपए दे रहे थे. इसी पर विवाद आगे बढ़ा था. दूसरी ख़बर बिजनौर ज़िले की है जिसमें मामूली विवाद के बाद तीन लोगों को ट्रेक्टर से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया।
       पूरे देश में रोज़ छोटी छोटी बातों पर ऐसी ही सैंकड़ो हत्याएं हो रही हैं। हालांकि हर जान कीमती है। हर इंसान अपने परिवार के लिए बहुत अहम होता है। हर कोई समाज में अपनी खास भूमिका निभाता है जो कोई दूसरा नहीं निभा सकता। कोई कह सकता है हत्या करना अपराध है और कानून ऐसे लोगों को सज़ा देगा। लेकिन यहां हमारी चिंता दूसरी है। पहले भी मर्डर होते थे लेकिन वे रेयर होते थे। बहुत कम यानी जमीन जायदाद और ज़ेवर के लिए बड़े मामलों या सुपारी लेकर होते थे। समाज क़त्ल को बहुत बुरा समझता था। लोग क़ातिल से नफ़रत करते थे। उससे दूरी बना लेते थे। कई जगह तो हत्यारों का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था। हालांकि अपराध साबित होने पर भी सज़ा देना कोर्ट का काम है लेकिन जघन्य अपराधी के प्रति समाज परिवार और रिश्तेदारों में तिरस्कार नफ़रत और बुरा समझने का भाव उसको उसकी समाज विरोधी हरकत के लिये एहसास कराना होता था। लेकिन अब यह सब रुटीन बात हो गई है।
      हम यह नहीं कह सकते कि हत्या के ऐसे मामलों में कानून अपना काम नहीं करता। बेशक पुलिस वकील और कोर्ट अपना काम आज भी देर सवेर करते ही हैं लेकिन यह भी सच है कि सज़ा मिलने में बहुत लंबा समय लगता है। कई बार जांच ठीक से नहीं होने सबूत मिटाने और गवाहों को डराने धमकाने से आरोप साबित भी नहीं हो पाते। कई बार बड़े और हाईप्रोफाइल मामलों में अभियोज पुलिस और बड़े रसूख वाले लोग हत्या तक के मामलों में पैसे पहुंच और जुगाड़ से जुर्म करके भी बच निकलते हैं जिससे ऐसे ही क्राइम की मंशा रखने वाले निडर होकर हत्या जैसे अपराध बार बार करते हैं।
      समाज में बात बात पर लड़ाई झगड़ा और हमले के जुनून पर भी विचार करना होगा। आख़िर क्या वजह है कि 300 रूपये की दिहाड़ी कम मिलने पर एक प्लंबर तीन लोगों की जान ले लेता है? दरअसल समाज का गरीब अनपढ़ और कमज़ोर तबका बड़े लोगों से पहले ही चिढ़ा रहता है। उसको ईर्ष्या होती है कि इतनी मेहनत करके भी उनके पास ठीक से जीवन गुज़ारने के लायक पैसा नहीं है। दूसरी तरफ़ वह देखता है कुछ लोग खानदानी विरासत नंबर दो की दौलत और बे ईमानी से खूब आमदनी कर रहे हैं। हालांकि सब मामलों में तो ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे केस भी काफ़ी हैं। इसके साथ ही उस मजदूर के दिमाग़ में भरा नफ़रत गुस्सा और बदले की भावना का यह बारूद उस समय चिंगारी से ट्रिगर हो जाता है जब कोई उसे उसकी वाजिब जायज़ और कानूनी मजदूरी तय करके भी पूरी नहीं देता। तब वह आपा खो देता है। उसको यह भी लगता है कि इतने बड़े लोगों की शिकायत पुलिस प्रशासन और शासन भी नहीं सुनेगा। कोर्ट में वह वकील की फीस और लंबा टाइम नहीं लगा पाएगा। समाज भी उसके साथ बड़े वीआईपी आदमी के खिलाफ़ खड़ा नहीं होगा। हत्या और हमलों के मामलों में सबसे बड़ी वजह सामने वाले की तीखी ज़बान भी बनती है, अगर वही बात प्यार और नरमी से कही जाए तो छोटे लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है वे पैसे का नुकसान झेल भी जाते हैं लेकिन अपमान धमकी और बदतमीज़ी से बात और बढ़ जाती है। लेकिन जुर्म तो जुर्म है उसे किसी भी हाल में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क़तील शिफ़ाई का शेर है...
*हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले,*
*कीमतें देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।*

हिंदुत्ववादी राज में हिंदुओं का भला?

*क्या बीजेपी के "हिंदुत्ववादी" राज से हिंदुओं का कुछ वास्तविक भला हुआ है?*
                     *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         क्या अब तक बीजेपी समर्थक रहे हिंदुओं का धीमा ही सही मगर बीजेपी से मोहभंग हो रहा है? क्या हिन्दुत्ववादी राज से उनका कुछ वास्तविक भला नहीं हुआ है जिससे ब्रांड मोदी तेज़ी से अपनी चमक खो रहा है? क्या आरएसएस का हिन्दुओं के लिए लाया गया धार्मिक सांस्कृतिक और मानसिक तुष्टीकरण का अतीतजीवी मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक मॉडल आर्थिक असफलताएं बढ़ते जाने से नाकाम होने लगा है? यही वजह है कि बीजेपी को एसआईआर के बहाने चुनाव आयोग से मिलकर वोट चोरी के विपक्ष के आरोप झेलने पड़ रहे हैं और उसका विरोध बढ़ता ही जा रहा है। बीजेपी के राज में बरसों के संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के विवादित फैसले से राम मंदिर बना लेकिन इसके बाद हुए 2024 के आम चुनाव में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। इतना ही नहीं अयोध्या वाले राज्य यूपी में उसकी संसदीय सीट 62 से घटकर 33 रह गई। इसका मतलब इस काम से हिंदू खुश नहीं हुए? बीजेपी सरकार ने कश्मीर से राज्य को विशेष अधिकार देने वाली धारा 370 हटा दी जबकि पूर्वोत्तर व पर्वतीय कई राज्यों में ऐसी ही धाराएं आज भी लागू हैं, तो इससे हिंदू समाज को क्या मिला? ऐसे ही वह अपने पुराने एजेंडे के तीसरे अहम काम कॉमन सिविल कोड को एक एक कर सभी बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लागू करेगी तो इससे हिंदुओं को क्या लाभ होगा? मोदी सरकार ने सीएए पास कर सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की व्यवस्था कर दी इससे कट्टर हिंदू धार्मिक आधार पर कुछ खुश हो सकते हैं लेकिन ऐसा तो कांवड़ वालों पर फूल बरसाकर, उनकी सरकारी मशीनरी से सेवा कराकर, आएदिन धार्मिक शोभायात्रा निकालकर, उनमें शामिल उद्दंड युवाओं से मुस्लिम बस्ती में उनके घरों मस्जिदों और मदरसों के सामने आपत्तिजनक नारे लगवाकर उनको अपमानित कराकर उनके यहां लगे इस्लामी झंडो को उतारकर भगवा झंडे फहराकर, कोई भी झूठा सच्चा आरोप लगते ही उनके घरों दुकानों और इबादतगाह पर बुलडोज़र चलवाकर, सावन मास में मांस का कारोबार बंद कर, किसी भी मांस को गोमांस बताकर उनको पीटने, मॉब लिंचिंग करने और जेल भेजने या यूपी में पाँव में गोली मारकर हाफ़ एनकाउंटर करने सड़क या सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ पढ़ने से रोकने उनके ख़िलाफ़ संघ और बीजेपी नेताओं के ज़हरीले बयान जारी करने और मुस्लिम हिस्ट्रीशीटर या हत्या बलात्कार के मामले में पीड़ित पक्ष ग़ैर मुस्लिम होने पर उनका फर्ज़ी एनकाउंटर करने, लव जेहाद लैंड जेहाद और थूक जेहाद के नाम पर उनको फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर जेल भेजने फिर उमर खालिद की तरह लंबे समय तक ज़मानत नहीं होने देने, सपा नेता आज़म ख़ान, जौहर यूनिवर्सिटी और गोरखपुर अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों को मरने से बचाने वाले डॉ कफ़ील खान को ही उल्टा जेल भेज देने से हिंदुओं को क्या फायदा हुआ है? क्या यह पर उत्पीड़न सुख का मामला है जिसमें हिंदुओं को केवल मुस्लिम समाज के साथ किए जा रहे पक्षपात से मानसिक खुशी मिल रही है जिसमें हिंदुओं का आर्थिक नुकसान भी हो तो वे झेल रहे हैं? क्या हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के झूठे प्रोपेगैंडा से ऐसा माइंड सेट बना दिया गया है जिससे उसको वही ठीक और अपने लिए बेहतर लगता है जो बीजेपी सरकारें उनके खिलाफ़ भी कर रही हैं?
           एक सर्वे के अनुसार देश में 8 करोड़ से अधिक युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं न ही पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई ट्रेनिंग कर रहे हैं और न ही नौकरी तलाश कर रहे हैं। इन्होंने एक तरह से जॉब मिलने की उम्मीद भी छोड़ दी है। एनएसएसओ 2017-18 के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षित बेरोजगारी बढ़कर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह पिछले 45 साल की सबसे अधिक बेरोजगारी बताई जाती है। हालांकि 2025 में पी एल एफ एस के आंकड़ों के अनुसार इसमें कुछ सुधार देखा गया जिससे यह आंकड़ा घटकर 11 प्रतिशत तक आ गया। लेकिन इस मामले में सिविल सोसायटी निष्पक्ष एजेंसियां और वर्ल्ड रैंकिंग में भारत सरकार के विभिन्न आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठने लगे हैं। इसके साथ ही विभिन्न न्यूटल एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद देश और विभिन्न राज्यों में अपराध महंगाई भुखमरी और भ्रष्टाचार का ग्राफ़ भी तेज़ी से बढ़ा है। जबकि सही रिपोर्ट नहीं होने से कई राज्यों में सच छिपाया भी जाता है।
       2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदुओं की आबादी लगभग 80 प्रतिशत थी। ज़ाहिर बात है अगर बेरोजगारी महंगाई अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो इसका असर बड़ी आबादी पर उसके अनुपात में अधिक ही होगा। देश में सरकारी शिक्षा स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था की हालत भी अच्छी नहीं है जिससे सभी भारतीय परेशान हैं। भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब सत्ताधारी नेताओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कहने पर भी थाने तहसील में बिना रिश्वत के कानूनी काम भी नहीं होते। सरकारी ठेकों में कमीशन पहले से बढ़ते जाने के आरोप ठेकेदार गाहे ब गाहे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सुधार नहीं है। नए बने रोड हाइवे एक्सप्रेस वे और पुल आएदिन गिरते रहते हैं। सड़क दुर्घटनाये बढ़ती जा रही हैं। 80 करोड़ से अधिक भारतीय सरकारी राशन में मिलने वाले फ्री पांच किलो अनाज पर गुज़ारा कर रहे हैं। किसानों की आय नहीं बढ़ने से वे रोज़ आत्महत्या करते हैं। कहने का मतलब यह है जीडीपी के आंकड़े अर्थव्यवस्था का आकार और विश्वगुरु बनने के सरकारी दावों के बावजूद आम भारतीय परेशान है जिसमें हिंदुओं की संख्या ही सबसे अधिक है। इतना ही नहीं दुनिया में प्रतिष्ठित विश्वसनीय और अपनी उच्चतम साख रखने वाली इंटरनेशनल एजेंसियों और देशों के वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स (157/180), ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (130/193), करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (91/180), ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (129/148), एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (176), ग्लोबल पीस इंडेक्स (116/163), डेमोक्रेसी/फ्रीडम इंडिसेज, वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट और रुल ऑफ लॉ इंडेक्स में भारत 2014 के बाद से काफ़ी नीचे जा चुका है। जबकि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, सैन्य क्षमता, और एसडीजी इंडेक्स में हमारे देश ने पहले से कुछ बेहतर रैंक हासिल की है।इसके साथ ही नोटबंदी लॉकडाउन जीएसटी से आर्थिक नुकसान और कोरोना से जो लाखों मौतें हुईं उसका अधिक शिकार कौन हुआ? बिना किसी रिसर्च विचार विमर्श और 2023 से पहले बनी कारों के लिए भी 20 प्रतिशत एथेनॉल पेट्रोल में मिलाने से किस वर्ग का अधिक नुकसान हो रहा है? शेयर मार्केट और डालर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिरने से कौन लोग लाखों करोड़ का घाटा संख्या में अधिक झेल रहे हैं? 
     सवाल यह है कि बीजेपी जिन हिंदुओं की भलाई का दावा हिंदुत्ववादी अपने राज में करती है, उससे आम हिंदू को क्या मिला है? क्या समुदाय के तौर पर हिंदुओं का ग़ैर हिंदुओं के मुकाबले कोई विशेष अतिरिक्त और उल्लेखनीय भला हुआ है? विडंबना तो यह है कि कई क्षेत्रों में आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने के आंकड़े देखे जाएं तो उनमें ग़ैर हिंदू कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं से भी आगे हैं। मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना में मुसलमान लाभार्थी वर्ग के आंकड़े उनकी आबादी से अधिक बताए जाते हैं। यही हाल हर माह मिलने वाले निशुल्क पांच किलो सरकारी अनाज और विधवा व वृद्धा पेंशन का बताया जाता है लेकिन इसका कोई ठोस आंकड़ा सरकार ने दावों के बावजूद हाल फिलहाल उपलब्ध नहीं कराया है लेकिन ज़मीन पर देखें तो इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इन सरकारी सुविधाओं जिनमें हर घर जल , आयुष्मान और पीएम किसान योजना का लाभ कमोबेश सबको मिल ही रहा है। इसके विपरीत अधिक शिक्षा उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में आगे होने से हिंदू समुदाय को अपेक्षित जॉब उपलब्ध नहीं होने से कम मिल रहे हैं जबकि अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिम समाज में दस्तकार मजदूर छोटे बड़े पेशे जैसे राज मिस्त्री पेंटर कारपेंटर नाई हलवाई रिक्शाचालक टैक्सी ड्राइवर मैकेनिक वेल्डर रसोइया हेल्पर चपरासी हॉकर प्लंबर इलेक्ट्रिशियन और सब्ज़ी फल विक्रेता का कोई भी काम नौकरी और कारीगरी करके अपना पेट हिंदुओं के अनुपात में अधिक आसानी से पालते मिल जायेंगे। इससे बीजेपी समर्थक हिंदुओं को निराशा होना स्वाभाविक है। लेकिन सौ टके का सवाल यह है जब तक निष्पक्ष और लेवल प्लेइंग फ़ील्ड पर ईमानदारी से चुनाव नहीं होंगे तब तक बीजेपी एंटी इनकंबेंसी और अपने समर्थक हिंदुओं की नाराज़गी के बाद भी सत्ता से हटेगी कैसे?

Tuesday, 6 October 2026

चालान नहीं हेलमेट

*अच्छा है हेलमेट बांटो अभियान,* 
*एक्सीडेंट में बचेगी लोगों की जान*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              बिजनौर ज़िले में एसपी श्री विश्नोई के निर्देश पर आजकल अच्छा यातायात सुरक्षा अभियान चल रहा है। पहले नियम के अनुसार बिना हेलमेट टू व्हीलर चलाने वालों का 1000 रुपए का चालान काटा जाता था। अब ऐसे लोगों को मौके पर ही 800 रुपए का हेलमेट खरीदने को प्रेरित कर सेफ रवाना किया जा रहा है। यह मांग बहुत दिन से हम जैसे बहुत से पत्रकार, समाजसेवी और सोशल एक्टिविस्ट पुलिस से करते आ रहे थे कि बिना हेलमेट वालों के चालान काटने की बजाए उनको हेलमेट हाथों हाथ खरीदने को कहा जाए, अब ज़िले में पुलिस ने ऐसा अभियान पांच दिन के लिए चलाकर अब तक लगभग 500 हेलमेट जनपद के विभिन्न नगरों कस्बों और गांवों के आसपास चैकिंग प्वाइंट पर वाहन चालक लोगों को उपलब्ध कराए हैं।
          हालांकि यह काम अगर केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा होता तो और भी अच्छा था। लेकिन शासन केवल चालान की रकम बढ़ाकर हर बार यह मानता है कि इससे लोग अधिक जुर्माना देते हुए डरेंगे और यातायात नियमों का पालन करने लगेंगे। लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्टेशन एंड हाइवे के आंकड़े बताते हैं कि वाहनों के कुल 45000 करोड़ के चालान पेंडिंग पड़े हुए हैं। यह इतना बड़ा आंकड़ा है कि शायद किसी छोटे राज्य का कुल वार्षिक बजट इसके बराबर होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लंबित पड़े चालानों की रकम वसूलने को सरकार से कोई नई रणनीति बनाने को कहा था। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर लोग एक से अधिक चालान होने पर भी बेफिक्र होकर गाड़ी चला रहे हैं और बार बार ट्रैफ़िक रूल तोड़ रहे हैं तो उनके चालान की रकम उनके बिजली के बिल में जोड़कर भेजी जानी चाहिए और अगर वे फिर भी बिल चालान की राशि सहित जमा नहीं करते तो उनकी बिजली काट देनी चाहिए। लेकिन सरकार इस प्रस्ताव पर राज़ी नहीं थी तो उसने भविष्य में ऐसे वाहनों को सीज़ करने का शपथ पत्र कोर्ट में दिया जिनके चालान कटने के बाद लंबे समय से पेंडिंग पड़े हुए हैं।
       हमारे देश समाज और नागरिकों की समझ अजीब है। इनको अपनी जान सुरक्षित रखने के लिए लगाए जाने वाले हेलमेट के लिए भी चालान का डर दिखाना होता है लेकिन बार बार समझाने और चालान कटने के बाद भी अधिकांश लोग हेलमेट लगाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं। कुछ लोग पुलिस चैकिंग को देखकर हैंडिल पर टंगा हेलमेट लगा लेते हैं और आगे बढ़ते ही फिर से उतार देते हैं। कुछ लोग रास्ता बदलकर निकल जाते हैं । कुछ लोग सौ दो सौ और पांच सौ किमी तक का सफ़र बाइक और कार से दिल्ली मुंबई तक बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के पूरा कर लेते हैं और इन बड़े शहरों में एंट्री लेते हुए यह सोचकर हेलमेट और सीट बेल्ट लगाते हैं कि यहां पुलिस चालान करने में सख़्त है। मतलब जान बचाने की परवाह नहीं पुलिस और चालान के डर से ट्रैफ़िक नियम का पालन करते हैं। बिनजौर एसपी के हेलमेट उपलब्ध कराओ सराहनीय अभियान से लोग जितनी बार पकड़े जाएंगे उनके पास उतने ही हेलमेट जमा होते जाएंगे तो वे चालान और फालतू हेलमेट खरीदने से बचने और दुर्घटना होने पर अपनी जान की सलामती के लिए शायद हेलमेट लगाने की आदत डाल लें, वैसे तो टू व्हीलर पर बैठी दूसरी सवारी और बच्चों को भी हर हाल में हेलमेट लगाना ही चाहिए।
*नहीं है वजह ज़रूरी के जब हो,तब मर जाएँ,*
*उदास लोग हैं, मुमकिन है बे सबब मर जाएँ ।*
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अख़बार के संपादक हैं।

बुजुर्ग बेशकीमती इंसान


*बुज़ुर्ग होते हैं बेशकीमती इंसान, इनकी अनदेखी से होगा नुकसान!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
       एक अक्टूबर को हर साल वृद्ध दिवस मनाया जाता है। इस दिन जितनी अच्छी सच्ची और भावुक बातें मंच से वक्ता बोलते हैं, काश वे वास्तविक जीवन में भी साकार होती तो वृद्धों की ज़िन्दगी कितनी आसान, सुखद और सुंदर होती?सीनियर सिटीजन होने से पहले ही हमें एक पत्रकार के तौर पर बुजुर्गों के प्रोग्राम में जाने का कई बार मौका मिला है। वहां हमने कार्यक्रम की कवरेज के साथ ही कई बार मुख्य वक्ता के रूप में वृद्धों और युवाओं की बात भी रखी। कई बार ऐसे आयोजनों का संचालन करने का अवसर भी मिला। जब हमने निज़ामत के दौरान कुछ भावुक शेर पढ़े तो कई बुजुर्गों की आँखें गीली हो गईं। शायद उनको अपनी व्यथा उन पंक्तियों में सुनने को मिली जो वे बहुत दिन से खुद भुगत रहे थे। कई बार हमने युवा पीढ़ी की तरफ से भी उनका पक्ष रखा, उनकी व्यस्तता और मजबूरियां बयान की जिससे दोनों जेनरेशन के बीच संवाद का एक सेतु बन सके। लेकिन सीनियर सिटीजन को यह दुख सताता ही रहा कि उनके बच्चे उनको उस तरह से ट्रीट क्यों नहीं करते जैसा वे चाहते हैं। 
         काशी के एक वृद्धा आश्रम "अपना घर" से पिछले दिनों एक बड़ी दुखद पीड़ादायक और निराश करने वाली ख़बर आई। पता लगा पिछले साल जिन 55 बुजुर्गों ने इस आस में दम तोड़ा कि उनसे मिलने उनके बच्चे एक दिन ज़रूर आयेंगे। उनके परिवार रिश्तेदार और जानकार कोई नहीं आया। इस समाचार का सबसे अधिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला पक्ष यह है कि जो उंगलियों पर गिनने लायक़ चंद बच्चे या परिवार उन बुजुर्गों के आये भी तो वे मरने के बाद भी मातम करने आंसू बहाने या ग़म में नहीं उनकी ज़मीन जायदाद और बीमा लेने को ज़रूरी औपचारिकता पूरी करने, उनका डीएनए सैंपल लेने और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने को मजबूरी में आए थे।
         यह ख़बर पढ़ने के बाद पूरे दिन हमारे दिमाग़ में हलचल चलती रही। रात में भी यह डरावना घिनौना और कड़वा सच बार बार दस्तक देता रहा कि हमारा समाज कितना स्वार्थी लालची और असंवेदनशील हो गया है। कितने क्रूर बेरहम और मतलबी हैं हम लोग जो उन मातापिता को उम्र बढ़ने पर बोझ समझने लगते हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन हमें जन्म देने से लेकर पालने पोसने पढ़ाने लिखाने और शादी से लेकर रोज़गार दिलाने तक में समर्पित कर दिया। बताते हैं जब कोई मां किसी बच्चे को जन्म देती है तो उसको आम इंसान के मुकाबले प्रसव में सात गुना दर्द होता है। कई मां की जान बच्चे पैदा करते हुए चली जाती है। नौ महीने वह खुद से ज़्यादा बच्चे का पेट में ख़्याल रखती है। उसका मन न भी हो तो भी बच्चे की सेहत के लिए खाती है। बच्चे को जन्म देकर कई साल तक ठीक से सो नहीं पाती। खुद गीले में सोती है बच्चे को आराम से सुलाती है। बच्चा जागता है तो वह भी जागती रहती है। जितनी बार रात को बच्चा उठता है रोता है उतनी बार उसको फीड कराती है, साफ़ करती है और दुलारती है। मां की कुर्बानियां अनगिनत है। 
       ऐसे ही बाप का मामला है। कहते हैं बाप जहां जाना भी पसंद नहीं करता, अपने बच्चों के लिए वहां भी हाथ फैला देता है। वह दिन रात काम करता है और अपने बच्चों को बेहतर जीवन स्तर देता है। उनको उच्च शिक्षा दिलाता है। चाहे इसके लिए कर्ज़ लेना पड़े। जो वह खुद नहीं बना अपने बच्चों को बनाना चाहता है। उनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देता है। उनको उस मकाम तक पहुंचा देता है जहां से खुद छोटा नज़र आता है, हारा हुआ लगता है और कमज़ोर लगता है लेकिन फिर भी खुश होता है। इसलिए बच्चों को चाहिए कभी भी मातापिता दादा दादी नाना नानी और किसी भी बुज़ुर्ग को बोझ नहीं समझें, उनको दूध से भाग जाने वाला जानवर नहीं समझें और साथ ही उनको आर्थिक लाभ नहीं देने वाला बुढ़ापे बीमारी और बुरे वक़्त में बेजान सामान नहीं समझें हमेशा भला करने वाला सलाह देने वाला और पूरे परिवार का संरक्षक बेशकीमती इंसान ही समझें।
*मेरी आंखों का तारा ही मुझे आँखें दिखाता है,*
*सिखाया बोलना जिसको वो चुप रहना सिखाता है।*

Sunday, 27 September 2026

ए सी ट्रेन में सभ्यता

*आज का विचार*
*ट्रेन कोच एसी हो या नॉन एसी, डिस्टर्ब न हो किसी की प्राइवेसी*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               ख़बर है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और कर्नाटक संगीत की गायिका शिवश्री स्कन्दप्रसाद एक ट्रेन के ए सी कोच में सफ़र कर रही थी। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, डिब्बे में सवार लगभग 40 यात्री का ग्रुप में लगातार शोर कर रहे थे। उन्होंने टीटी से अपना कोच बदलने की मांग की लेकिन बर्थ उपलब्ध नहीं होने से यह संभव नहीं हो सका। पांच घंटे के सफ़र के दौरान पहले तो उन्होंने उस यात्री समूह की टीटी से शिकायत की जो कार्ड खेल रहे थे और ज़ोर ज़ोर फिल्मी गाने गा रहे थे। टीटी ने एक बार उनको चुप भी कराया मगर कुछ देर बाद वे फिर से वही हरकतें करने लगे। शिवश्री ने अपनी लंबी पोस्ट में ऐसे लोगों से भविष्य में सफ़र के दौरान दूसरों की प्राइवेसी सुविधा और तकलीफ़ न पहुंचाने और सभ्य व्यवहार की अपील की है।
          शिवश्री की इस शिकायत, समस्या और सलाह को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे साथ वाले दूसरे लोगों को लगे हम एक तमीज़ वाले इंसान हैं। इसे आप सिविक सेंस या कॉमन सेंस भी कह सकते हैं। दरअसल हम लोग शोर अनाधिकार चेष्टा और अनचाही चीज़ों के इतने आदी हो गए हैं कि जब कोई इन अवांछनीय और निजता को ठेस पहुंचाने वाली हरकतों पर आपत्ति करता है तो समाज के बड़े वर्ग को वही आदमी ऐसा लगता है जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आया हो। आपने भी ट्रेन बस या सार्वजनिक स्थानों पर अकसर देखा होगा लोग जो मर्ज़ी चाहे मनमानी करते रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि वे जहां हैं वह जगह केवल उनकी निजी नहीं है। अगर आप सार्वजनिक स्थान पर हैं तो आपका फ़र्ज़ है कि आप साथ वाले या पास वाले लोगों को किसी भी तरह से अपनी किसी भी हरकत से परेशान नहीं करें। मिसाल के तौर पर ज़ोर ज़ोर बोलना, हंसना और मोबाइल पर स्पीकर ऑन कर तेज़ आवाज़ में सर्फिंग करना सभ्य सुसंस्कृत और जिम्मेदार नागरिकों को बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। इसके लिए हेड फ़ोन इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही कॉल पर तेज़ आवाज़ में बात करना भी शालीनता नहीं माना जाता। बेहतर है ऐसे में चैट या एसएमएस से जवाब दें।
       इतना ही नहीं कुछ यात्री डिब्बे में अपने बच्चों को खेलने के लिए छोड़ देते हैं जो बाक़ी मुसाफिरों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। कुछ लोग लगातार हंसी मज़ाक और गाली गलौच के साथ घटिया बहस करते हैं। कुछ यात्री अपने पैर सामने वाले की सीट पर रखते हैं और कुछ ढेर सारा सामान बर्थ पर रख देते हैं। कुछ बिना टिकट और बिना रिजर्वेशन के ही दूसरे की सीट/बर्थ हथिया लेते हैं और ख़ाली करने को कहने पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। कुछ कोच के गेट पर खड़े रहकर ट्रेन से उतरने चढ़ने वालों को जगह ही नहीं देते। कुछ फ़र्श पर कपड़ा बिछाकर सो जाते हैं जिससे बर्थ वाले यात्री इधर उधर जाने में दिक्कत महसूस करते हैं। कुछ तेज़ गंध वाला खाना गुटका या शराब पीने लगते हैं। कुछ पान गुटके की पीक और बीड़ी सिगरेट का धुआं छोड़ते रहते हैं। कुछ दूसरों की फ़ोन स्क्रीन को झांकते हैं और ख़ास तौर पर लेडीज़ को नीचे से ऊपर तक बेशर्मी से घूरते रहते हैं या लाइट बंद होने पर छेड़छाड़ भी कर देते हैं। कुछ देर रात तक भी लाइट बंद नहीं करने देते जिससे दूसरे यात्री ठीक से सो नहीं पाते। कुछ बिना परमिशन सामने वाले की बातचीत में शामिल हो जाते हैं जो सलीके के खिलाफ़ माना जाता है। ऐसी और भी अनेक बातें, हरकतें और घटनाएं यहां गिनाईं जा सकती हैं जिससे साथ सफ़र कर रहे दूसरे यात्री असहज हो जाते हैं लेकिन पता नहीं कब कुछ भारतीय दूसरों की प्राइवेसी नागरिक बोध और सभ्यता को समझेंगे। ऐसे लोगों के लिए शायर कहता है...
*सलीक़ा यूं तो आता है बक़द्र ए ज़र्फ़ इन्सां को,* 
*सलीक़ा जिसको कहते हैं बड़ी मुश्किल से आता है।*

Tuesday, 22 September 2026

2029 से पहले यूनिफार्म सिविल कोड

*यूसीसी से न तो मुसलमानों का प्रत्यक्ष नुकसान होगा न ही बीजेपी का अप्रत्यक्ष सियासी फायदा!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के आम चुनाव से पहले बीजेपी व एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जायेगा। उत्तराखंड और गोवा में यूसीसी पहले से ही लागू है। दूसरी तरफ गुजरात में इसी साल मार्च में असम में मई में और मध्य प्रदेश में जुलाई 2026 में यूनिफार्म सिविल कोड का बिल पास हो चुका है लेकिन अभी राज्यपाल/राष्ट्रपति की मंज़ूरी नहीं मिलने से लागू नहीं हुआ है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी लागू करने के लिए प्रक्रिया चल रही है लेकिन इसके लिए अभी केवल ड्राफ्टिंग कमेटी ही बनी है, जो इसकी रूप रेखा पर विचार कर रही है। 
       जहां तक मुस्लिम समाज पर यूसीसी के असर का सवाल है, बेशक उसको धार्मिक रूप से कड़ा ऐतराज होगा और वह अपने संवैधानिक शरीयत कानून का हक़ छिनने पर आहत भी ज़रूर होगा, लेकिन सीएए के खिलाफ़ किए गए अपने असफल आंदोलन से वह इस बार शायद ही आंदोलन को सड़क पर उतरे। अलबत्ता इस्लामी आलिमों की तरफ से यूसीसी का अभी से विरोध शुरू हो गया है जो आगे बयान मांगपत्र और आस्तीनों पर काले बैज लगाने तक सीमित रह सकता है। *यूसीसी के लागू होने पर मुस्लिम पुरुष एक से अधिक शादी, एकतरफा तलाक़, तलाक़ के बाद भरण पोषण से बचाव, निकाह हलाला, तलाक़ या पति की मौत पर मुस्लिम महिला इद्दत (4 माह 10 दिन ) लड़कियों का बाल विवाह उत्तराधिकार में लड़कों को लड़कियों से संपत्ति में हिस्सा आधा और गोद लेने व लिव इन रिलेशन में रहने की मनाही जारी नहीं रख पाएंगे। उनको शादी का रजिस्ट्रेशन कराना भी कानूनन अनिवार्य होगा।* हालांकि यूसीसी अनुसूचित जनजाति को छोड़कर हिंदू सिख ईसाई बौद्ध जैन सभी धर्मों के मानने वालों पर भी लागू होगा, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इस्लामी संगठन इसको शरीयत और मुस्लिम समाज की संस्कृति को प्रभावित करने वाला बताकर विरोध करते आ रहे हैं। आगे भी करेंगे लेकिन आम मुस्लिम उनका खुलकर सक्रिय समर्थन शायद ही करे। सेक्युलर दल और उनकी सरकारें इसीलिये मुसलमानों की नाराज़गी से बचने को यूसीसी लागू नहीं करती थीं और उनमें से अधिकांश अब भी जबरन यूसीसी थोपने के खिलाफ़ हैं। एनडीए के जेडीयू और टीडीपी जैसे कुछ घटक भी इसके सपोर्ट में नहीं हैं लेकिन अंत में वे बीजेपी के सामने घुटने टेक देते हैं तो इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना प्रबल है। कांग्रेस जैसे बड़े सेक्युलर दलों का कहना है कि जब तक मुस्लिम समाज के भीतर से ही यूसीसी लागू करने की मांग नहीं आए तब तक किसी भी सरकार को यूसीसी लागू नहीं करना चाहिए। हालांकि बीजेपी का सियासी मकसद मुस्लिम समाज की भलाई से ज्यादा यूसीसी लागू करके अपने हिंदू वोट बैंक को खुश करना है, लेकिन बदले हुए माहौल में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 हटाने की तरह इस कदम से उसको राजनीतिक लाभ मिलना काफी मुश्किल लग रहा है।
                पहले यूसीसी के मुस्लिम समाज पर पड़ने वाले वास्तविक असर पर बात करते हैं। यह ठीक है कि इससे मुसलमान पुरुषों के अधिकार घटेंगे और कानूनी जिम्मेदारी काफ़ी बढ़ जायेगी लेकिन सीएए और वक़्फ़ बोर्ड संशोधन कानून की तरह पूरे समाज का सीधा नुकसान और भेदभाव का सामना उनको नहीं करना होगा। *जहां तक एक से अधिक शादी पर रोक का सवाल है तो एनएफएसएच 5 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान 1.9 प्रतिशत यानी ईसाई समाज के 2.1 प्रतिशत से कम ही बहुविवाह करते हैं। अलबत्ता यह हिंदुओं के 1.3 प्रतिशत से कुछ अधिक है जबकि बहुविवाह में पूरे देश का औसत प्रतिशत 1.4 है। जाहिर है जैसे कानूनन रोक के बावजूद कुछ हिंदू एक से अधिक पत्नी रख रहे हैं वैसे ही यूसीसी के बावजूद कुछ मुस्लिम भी चोरी छिपे ऐसा करेंगे लेकिन खुलेआम मज़हब की आड़ में बहुविवाह को अधिकार समझने वाले मुस्लिम इससे बचेंगे भी। इस मामले में यह याद दिलाना भी उचित होगा कि इस्लाम में बहुविवाह का चलन उस समय शुरू हुआ था जब जंगों में बड़ी संख्या में मर्द मारे जाते थे और औरतें विधवा हो जाती थीं। अब कम से कम भारत में तो ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी बात शरीयत में एक से ज्यादा निकाह की छूट इस शर्त पर दी गई है जब कोई मर्द सब पत्नियों के साथ सौ फीसदी समान बर्ताव करे जो कि नामुमकिन होता है।* एकतरफा एक समय में तीन तलाक ए बिद्दत पर पहले ही कानूनन रोक लग चुकी है जो कि इसका दुरुपयोग होने से समय की ज़रूरत भी थी, जबकि यूसीसी से तीन माह में दी जाने वाली तलाक ए एहसन पर भी रोक लगेगी तो पति पत्नी की आपसी सहमति से कोर्ट से तलाक़ लेने का रास्ता भी खुलेगा। तलाकशुदा पत्नी को उसकी दूसरी शादी होने तक भरण पोषण का खर्च देना ज़रूरी होगा, जो न्यायसंगत ही है। चर्चित शाहबानो के केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फैसला धारा 125 के तहत दिया था जिसको कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने संसद में पलट दिया था, लेकिन इससे बीजेपी को अपना हिंदुत्व एजेंडा राम जन्मभूमि आंदोलन तेज़ कर आगे बढ़ाने को उर्वर ज़मीन मिली थी। *निकाह हलाला को लेकर खुद इस्लामी आलिमों में भारी मतभेद हैं। सुन्नी मुफ्तियों का बड़ा हिस्सा इसको ग़ैर शरई बताता है जबकि कुछ मुस्लिम विद्वान इसको मान्यता देते हैं जिससे मुस्लिम समाज में यह कुप्रथा कम ही सही लेकिन मौजूद है, इसका ख़ात्मा होना स्वागत योग्य होगा। जहां तक तलाक़ या पति की मौत पर महिला की इद्दत का मुद्दा है तो यह व्यवस्था इस्लाम में ऐसी महिला की दूसरी शादी होने पर होने वाले बच्चे के वास्तविक पिता को लेकर उठने वाले विवाद से बचने को की गई थी लेकिन अब इसके लिए मेडिकल साइंस में ऐसे आधुनिक गर्भावस्था परीक्षण होने लगे हैं जिसको जानने के लिए 130 दिन वेट करने की कोई जरूरत नहीं है।* बालविवाह अन्य धर्मों की तरह मुस्लिम समाज में भी करने की कुप्रथा रही है जिसको यूसीसी से रोकना नाबालिग बच्चियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहतर ही होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक माता पिता से उत्तराधिकार में मुस्लिम बेटियों को बेटों से आधा हिस्सा मिलता है जबकि यूसीसी लागू होने के बाद यह बराबर देना होगा, संविधान की लैंगिक समानता के हिसाब से यह भी ठीक ही होगा। ऐसे ही निसंतान दंपत्ति का बच्चा गोद लेना और मुस्लिम प्रेमी प्रेमिका का लिव इन रिलेशन में रहना अब आम बात है, इसे यूसीसी मान्यता देगा तो अब तक शरीयत में वर्जित इन बातों से मुस्लिम समाज में सुधार ही होगा।
          अब बात करते हैं यूसीसी के सियासी और संवैधानिक मकसद पर तो बीजेपी के एजेंडे में यूसीसी राम मंदिर और धारा 370 के साथ शुरू से ही रहा है। इनमें से दो लक्ष्य उसने पहले ही पूरे कर लिए हैं लेकिन यूसीसी अभी भी बाक़ी है। पहले पीएम मोदी ने 2023 में यूसीसी की चर्चा जब ज़ोरदार तरीके से शुरू की थी तो लगा था वे केंद्रीय स्तर पर इसके लिए कोई विधेयक लाने जा रहे हैं लेकिन बाद में यह तय हुआ कि यूसीसी पहले बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लाया जाए जिससे इसके प्रभाव और प्रतिक्रिया को आंका जा सके। वैसे भी यह मामला संविधान की समवर्ती सूची में आता है जिससे केंद्र व राज्य दोनों इसको कानून बनाकर लागू कर सकते हैं। संविधान सभा भी इस मुद्दे पर बंटी हुई थी इसीलिए इस मुद्दे को भविष्य में विचार के लिए आने वाली सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया था लेकिन संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांत यह ज़रूर कहते हैं कि यूसीसी के लिए नागरिकों के बीच सहमति बनाने का प्रयास जारी रखा जाए। इसी श्रृंखला में 21 वें लॉ कमीशन ने 2018 में अपने परामर्श पत्र में कहा था कि यूसीसी बनाना न तो समय की आवश्यकता है न ही इस दौर में लोगों की इच्छा के अनुसार होगा। आयोग ने देश की विविधता को देखते हुए मौजूदा पर्सनल लॉ में ही सुधार का सुझाव दिया था। इसके विपरीत 22 वें लॉ कमीशन ने 2023 में जनता और धार्मिक संस्थाओं से व्यापक विचार विमर्श के बाद हायर कोर्ट के दिए गए निर्देशों और समय की मांग के अनुरूप यूसीसी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।
         *पिछले दिनों छात्रों की गूंज अभियान के तहत राहुल गांधी ने विशेष रूप से लड़कियों को संबोधित करते हुए मनुस्मृति को कोट करते हुए लड़कियों को संविधान के अनुसार समान अधिकार देने में धार्मिक मान्यताओं को बाधा बताया था। बाद में उन पर बीजेपी नेताओं ने केवल हिंदू धर्म ग्रंथों को निशाने पर लेने और मनु स्मृति की संदर्भ से हटकर गलत व्याख्या के भी आरोप लगाए। उनको मुस्लिम महिलाओं को भी बराबर अधिकार दिलाने के लिए बोलने की चुनौती मिली। उनके इस बयान के बाद इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में एक लेख लिखकर इंडियन मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और रोशनी जैसी प्रगतिशील व आधुनिक विचारों वाली महिलाओं के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं की महिला पदाधिकारियों ने भी राहुल गांधी से मुस्लिम सहित सभी समाज की महिलाओं के लिए समान अधिकार के लिए आवाज़ उठाने की माँग की थी लेकिन इस पर अभी तक राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई जवाब नहीं आया है।* भविष्य के विवाद और केवल बहुसंख्यकों के धर्म ग्रंथों पर उंगली उठाने को लेकर बीजेपी के सियासी नैरेटिव से कांग्रेस को होने वाले राजनीतिक नुकसान से बचने को राहुल गांधी को सभी वर्गों की महिलाओं को समान अधिकार देने की संवैधानिक मांग पर ही फोकस करना चाहिए।

Friday, 11 September 2026

कोर्ट का जुर्माना


हाईकोर्ट का जुर्माना व फटकार, यूपी के अफ़सरों में होगा सुधार?
                   -इक़बाल हिंदुस्तानी
       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चैधरी पर गलत तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने पर वहां के डीएम और पुलिस अफसरों पर पांच लाख जुर्माना और कड़ी फटकार लगाई है। हालांकि यूपी सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है लेकिन केस के तथ्यों व प्रमाणों से वहां से भी उसको राहत मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं। ऐसे ही देवरिया में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के आरोप में उच्च न्यायालय ने वहां के एसएचओ के वेतन से काटकर 65000 रूपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस के जवाबों से नाराज़ होकर उसको ‘‘झूठों का झुंड’’ तक बता दिया। उधर नोएडा में ही एक छात्र को जंतर मंतर के आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में एक मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए कोर्ट की मानहानि की कार्यवाही की चेतावनी दी है।
        नोएडा के मामले में कोर्ट ने छात्रा आकृति पर एनएसए लगाने को पूरी तरह गलत बताते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत बताया। आपको याद दिला दें कि आकृति दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ ही सोशल एक्टिविस्ट है। आकृति को नोएडा में हुए मज़दूर आंदोलन के आरोप में अप्रैल 26 में गिरफतार कर पांच माह से जेल में रखा गया था। आकृति पर मज़दूर आंदोलन मंे 13 अप्रैल को हुई हिंसा फैलाने का आरोप था जबकि उसको 12 अप्रैल को ही पकड़कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। इससे पहले आकृति ने मज़दूरों के बीच केवल एक बार भाषण दिया था जिसमें उसने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाये रखने की अपील भी की थी। आकृति पर दूसरा आरोप व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें हिंसक विचार फैलाने का था। जांच में पाया गया कि ग्रुप शिक्षा व समाजसेवा के लिये था लेकिन इसमें पहचान छिपाकर नोएडा के दो पुलिसवाले शामिल हो गये थे। हैरत की बात यह रही कि यही पुलिसवाले विवादित पोस्ट डाल रहे थे। ग्रुप में शामिल अमनपसंद और कानून का पालन करने वाले सदस्यों ने इन पोस्ट पर आपत्ति की और इनको तत्काल डिलीट भी कर दिया था। यहां जो मामले दिये गये हैं वे हाल ही के हैं। कोर्ट पहले भी कई बार यूपी सरकार पुलिस और प्रशासन को नियम कानून व संविधान के हिसाब से काम करने को सख्त लहजे में निर्देश दे चुका है। किसी भी आरोपी के घर पर बुल्डोज़र चलाने, एनकाउंटर करने और फर्जी केस बनाकर किसी को भी हिरासत में लेने पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लेकर थर्ड डिग्री देने और एनएसए व यूएपीए जैसे बेहद कड़े कानून का सत्ता के इशारे पर गलत इस्तेमाल करने के कई मामलों में कोर्ट पहले भी शासन प्रशासन और पुलिस को कड़ी चेतावनी दे चुका है। 
             देखने मंे यह आ रहा है कि कुछ अधिकारी संविधान से अधिक अपने आकाओं को खुश करने के लिये कानूनी गैर कानूनी काम करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। उनको वेतन जनता के दिये कर से मिलता है। आज नहीं तो कल सरकार बदल सकती है। उनकी जवाबदेही नियम कानून और उनके किये गये कामों के हिसाब से बाद में भी कभी ना कभी हो ही सकती है। वे भी एक दिन कानून के शिकंजे में फंस सकते हैं। उनका असली काम जनता की रक्षा करना उसकी सेवा करना और जनहित की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना है। लेकिन आज अनेक भ्रष्ट अफसर लालच अच्छी पोस्टिंग रिश्वत की मोटी कमाई और अपनी कानून के खिलाफ पहले की गयीं कारगुजारियां छिपाने के लिये सत्ताधारी दल के लिये उसका राजनीतिक पक्षपातपूर्ण भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक एजेंडा लागू करने का औज़ार बने हुए हैं। अगर कोर्ट उनको ऐसे ही हर गलती हर अन्याय और हर मनमानी पर फटकार लगाकर जुर्माना लगाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बेलगाम नौकरशाही को अपनी वर्दी अपनी नौकरी और जुर्माने से बचाने को मजबूर होकर संविधान के दायरे में ही काम करना होगा। फिर हाशिये पर पड़े अच्छे ईमानदार और योग्य अधिकारियों को अपना काम सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय करने का मौका भी मिलेगा। क़तील शिफाई का एक शेर याद आ रहा है- हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले, क़ीमते देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और तर्कशील समाज अखबार के चीफ एडिटर हैं।

भारत हिंसक देशों में क्यों?

*भारत दुनिया के सबसे अधिक हिंसक देशों की सूची में कैसे पहुंच गया?*
                    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*       

        हाल ही में ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती हिंसा और बेकाबू जघन्य अपराधों के उठते ग्राफ के कारण हमारे देश की गिनती दुनिया के सबसे अधिक 50 हिंसक देशों में की गयी है। विश्व शांति सूचकांक के आधार पर जारी की गयी इस रिपोर्ट में कुल 163 देशों को शामिल किया गया है। जिनमें भारत की रैंक 127 वीं है। इस सर्वे के अनुसार भारत पिछले साल के मुकाबले 12 पायदान नीचे खिसक गया है जबकि आइसलैंड जैसे छोटे देश ने शांतिप्रिय देश की अपनी उपलब्धि बरकरार रखी है। भारत की रैंक में गिरावट के खास कारणों में मणिपुर में लगातार जारी जातीय हिंसा तो है ही, इसके साथ ही देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा, दलित आदिवासियों और गरीबों पर भेदभाव के कारण हमले दुस्साहसी व्यक्तिगत हिंसा, महिलाओं तथा बच्चों के साथ यौन हिंसा व साम्प्रदायिक टकराव और पुलिस पर लगने वाले उत्पीड़न अत्यधिक बल प्रयोग और फर्जी एनकाउंटर हाफ एनकाउंटर के बढ़ते आरोप भी शामिल हैं। हालांकि पड़ौसी देशों के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान 152 तो अफगानिस्तान 157 वें स्थान पर हिंसा में हम से काफी आगे नज़र आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नेपाल 111 बंग्लादेश 117 हम से थोड़ा सा बेहतर हैं तो भूटान 16 और श्रीलंका 67 वें स्थान पर भारत ही नहीं पूरे एशिया में बहुत अच्छी हालत में हैं। दरअसल दुनिया के स्तर पर अमनचैन और सुरक्षा से जुड़े इस इंडेक्स को सिडनी स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर इकाॅनोमिक्स एंड पीस द्वारा किया जाता है। दुनिया का थिंक टैंक मानी जाने वाली इस संस्था का कहना है कि विश्व शांति सूचकांक को बनाते समय 22 मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है जिनमें विशेष रूप से सरकारों की कार्यशैली, अच्छा कारोबारी माहौल, संसाधनों का समान वितरण, दूसरों के अधिकारों की परवाह, पड़ौसियों से बेहतर सम्बन्ध, सूचनाओं का विश्वसनीय आदान प्रदान एवं मानवीय पूंजी के आदर्श रखरखाव, गरिमा व सम्मान को दृष्टिगत रखा जाता है।
         पीस इंडेक्स के आधार पर भारत की सीमाओं पर तनाव टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नज़र डालें तो साफ नज़र आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना यह है ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साज़िश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है। 
        *मिसाल के तौर पर हाल ही में पकड़ा गया स्वतंत्र भारद्वाज न केवल जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं के वैचारिक तौर पर पूरी तरह खिलाफ था बल्कि वह अपने आक़ाओं के इशारे पर उन पर जानलेवा हमला कर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक पाॅडकास्ट में इसे दुस्साहस और अहंकार के साथ स्वीकार भी कर रहा था। जिस सोशल मीडिया इंफलूएंसर लड़की के पिता पर उसने घातक हमला किया वह दलित थी। दलितों को लेकर पक्षपात अन्याय और दमन हमारे समाज की आज भी एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे ही कुछ संकीर्ण संगठन एक पार्टी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने दिन रात काम करके अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के बारे में आम लोगों की यह झूठी राय बना दी है कि ये लोग ही समाज और देश की अनेक समस्याओं के लिये ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि पुलिस का रूख़ भी इस वर्ग को लेकर अकसर पूर्वाग्रह का नज़र आता है। पिछले दिनों गुजरात के भावनगर में फैज़ल नाम के एक युवक ने अपने साथ कई साल से रहने वाली हिंदू महिला काजलबेन की हत्या कर दी थी। पुलिस ने फैजल को पकड़कर सार्वजनिक रूप से जमकर पीटा। इसका वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस के पक्ष में खड़ा नज़र आया। जो लोग पुलिस को नहीं कोर्ट को सज़ा देने का कानूनी अधिकार होने की बात कह रहे थे उनको अंधभक्तों ने ट्राॅल करना शुरू कर दिया।* इस घटना से यह भी पता चलता है कि एक वर्ग कानून से इतर हिंसा के पक्ष में पूरी बेशर्मी से खड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में आरोप लगते है कि यूपी सहित कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों की सरकारों में किसी पर गोकशी या हत्या बलात्कार का गंभीर अपराध का आरोप लगता है और पुलिस प्रशासन उसे हथियार बरामद करने या हत्या का सीन रिक्रियेट करने मौक ए वारदात पर देर रात ले जाकर मुठभेड़ में मार देता है। कुछ लोगों के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर भी खूब हो रहे हैं। थाने में हिरासत के दौरन असहनीय यातना और थर्ड डिग्री देने के मामले तो अनगिनत हैं लेकिन पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर जांच करने वाले मजिस्ट्रेट निचली अदालतें और मानव अधिकार आयोग तक शिकायत के बावजूद इसका संज्ञान नहीं लेते हैं।
             जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कई साल पहले रात के अंधेरे में कुछ लोगों ने छात्रावास पर हिंसक हमला किया था। पुलिस वहां तमाशा देखती रही। इसके बाद जब एक पार्टी के छात्र प्रकोष्ठ की कोमल शर्मा पर हमले में शामिल होने का आरोप लगा तो पुलिस जांच के नाम पर उस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर आज तक सो रही है। पिछले महीने बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में ठीक ऐसा ही मामला फिर से देखने में आया। पुलिस वहां भी चुपचाप सब कुछ देखती रही लेकिन सरकार ने भी इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। आरोप है कि कई साल पहले दिल्ली में सीएए के खिलाफ चले शाहीन बाग आंदोलन, महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित सम्मेलन और शम्भू बोर्डर पर चले किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया। कुछ साल पहले दिल्ली के गार्गी काॅलेज में चल रहे समारोह में भी कुछ बाहरी तत्वों ने अपनी नापसंद एक प्रोग्राम के बाद जमकर वहां के छात्र छात्राओं से मारपीट की थी लेकिन जांच के नाम पर उस मामले को भी दबा दिया गया था। रोड पर किसी की गाड़ी टकरा जाने पर थोड़ा सा नुकसान होने पर आरोपी को पीट पीटकर मार देने की घटनाएं भी हाल ही में बहुत बढ़ चुकी हैं। मामूली गलती करने पर स्कूलों में बच्चों को पीटने और कॉलेज यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में छात्रों की आपसी हिंसा भी रुकने का नाम नहीं ले रही है।
        *अब नया ट्रेंड देखने में आ रहा है जिन मामलों में सरकार अपने विरोधी अहसमत या आलोचकों को पुलिस या कोर्ट से सबक सिखाने में असमर्थ पाती है उनमें विपक्ष का आरोप है कि नाॅन स्टेट एक्टर हिंसा करने चले आते हैं। अगर ये मौके पर रंगे हाथ या किसी गवाह और सबूत के आधार पर पकड़कर पुलिस को सौंप भी दिये जाते हैं तो भी अव्वल तो स्वतंत्र भारद्वाज के अनुसार इनके आकाओं के इशारे पर इनके खिलाफ मुकदमा ही कायम नहीं हो पाता और अगर कभी कभी कहीं कहीं राजनीतिक नुकसान या कानून व्यवस्था की मजबूरी में केस दर्ज भी किया जाता है तो हल्की यानी ज़मानतीय धाराओं में लिखा जाता है। इसके बाद इनके खिलाफ गंभीरता से निष्पक्ष जांच गवाह और सबूत नहीं जुटाये जाते और कभी कभी जनता की नज़र हटते ही फाइनल रिपोर्ट लगाकर या मुकदमा वापस लेकर केस खत्म कर दिये जाते हैं।* इस तरह से जब लोगों को लगता है कि उनको वर्तमान सरकार पुलिस और उसकी पक्षपात करने वाली जांच एजेंसियों के रहते न्याय नहीं मिलेगा वे कभी कभी खुद कानून हाथ में लेने पर उतर आते हैं जोकि ठीक नहीं माना जा सकता लेकिन यह समाज में हिंसा के दुष्चक्र को और बढ़ावा देता है। हालत इतनी बदतर है कि हिंसा के कई मामले में माॅब लिंचिंग होने पर जिसकी सामूहिक हिंसा में भीड़ ने हत्या की उसी पर चोरी लूट या हमले का झूठा केस दर्ज कर दिया जाता है। हमारा मानना है जब तक सबको न्याय रोज़गार सबको संसाधनों राष्ट्रीय आय व सम्पत्ति में समान अधिकार रोटी कपड़ा मकान शिक्षा चिकित्सा और मान सम्मान मानवीय गरिमा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक हिंसा का दुष्चक्र रोकना कठिन है।

38 साल से नहीं हटा अतिक्रमण

#इस_तरह_के_अतिक्रमण_को_कोई_38_साल_से_नहीं_हटा_रहा...
          नजीबाबाद के कई मोहल्लों में कल किसी काम से पैदल घूमने का मौक़ा मिला। कई सड़कों पर लोगों ने पूरी बेशर्मी और निडरता से अवैध कब्ज़ा कर रखा है। लगभग सभी पालिकाएं शासन के निर्देश पर कभी कभी मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण हटाने का औपचारिक अभियान चलाकर अपने कर्तव्य की अतिश्री कर लेती है।कोई भी स्थानीय निकाय न तो आगे यह देखती है कि नया अतिक्रमण नहीं हो न ही पुराने हटाए गए अतिक्रमण को फिर से होने से रोकने को कोई तंत्र बनाते हैं। यूपी में 1988 से सुपरसीड किए हुए स्थानीय निकायों में चुनाव फिर से होने शुरू हुए थे। आशा थी कि अफसरों के मुकाबले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से जनता को अधिक राहत मिलेगी क्योंकि वे उनके बीच से चुनकर आएंगे तो उनकी बात को बेहतर समझेंगे। कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी लेकिन सभी स्थानीय लोगों को नाराज़ नहीं करने की नीति से यह भी हुआ कि वे सख़्ती से अतिक्रमण नहीं हटा सके। कुछ लोगों ने अपने घर दुकान और ऑफिसों के सामने नाले नाली नहीं बनने दी। अगर पहले से बनी हुई थी तो उनको पाट दिया। इसके पीछे सार्वजनिक सड़क निजी उपयोग के लिए कब्जाने की नीयत थी। दरअसल नाली ही वो सीमा रेखा है जो अतिक्रमण की सबसे पहले पोल खोल देती है। कई सड़कें खुद बता रही हैं कि वे इधर 15 फिट थी तो उधर 10 फिट रह गई , फिर आगे 12 फिट हो गई यानी जिसका जितना मन हुआ उसने उतनी दबा ली। अजीब बात यह है जब पालिका नई सड़क बनाने आई तो उसने जितनी सड़क बची थी उतनी ही बना दी, अतिक्रमण नहीं हटाया। इससे कई जगह पानी की निकासी भी रुक गया। कई मोहल्लों में भारी जलभराव शुरू हो गया जो आज तक जारी है। कई नालों को पाटकर दुकानदारों ने अपने सामने की सड़क की तरफ पानी का रुख कर दिया। पालिका फिर भी नहीं बोली। फिर इनमें से कुछ ने कई पालिका के नाले की कब्ज़ाई जगह कई हज़ार किराए पर दे दी। नगर में कई जगह लोगों की अपनी दुकान की जितनी गहराई है, उससे ज़्यादा उन्होंने सड़क पर स्थायी और फ्लेक्स बोर्ड या दुकान का सामान रखकर अस्थायी अतिक्रमण कर रखा है। एक सड़क तो साफ़ बता रही है कि उसको अवैध कब्ज़ा करके आधा कर दिया गया है...हिंदुस्तानी

दावत है प्यार...

*दावत है प्यार, न तो अधिकार न ही व्यापार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              मध्य प्रदेश के दमोह की एक ख़बर पढ़ी। पहले हंसी आई, फिर हम संजीदा हो गए। एक वकील दोस्त ने दूसरे वकील दोस्त को बर्थ डे पार्टी नहीं देने पर 41,250 ₹ के हर्जाने का नोटिस भेजा है। विशाल सिंह का आरोप है कि उनके मित्र गोविंद तिवारी ने लिखित इकरारनामा करने के बाद भी दावत नहीं दी, जिससे उनको उस दिन खाना होटल में खाना पड़ा, साथ ही तनाव इतना बढ़ गया कि हॉस्पिटल में इलाज कराया गया। तनाव व इलाज का हर्जाना नोटिस देकर दोस्त से मांगा गया है। उधर दोस्त का दावा है कि वे पार्टी दे चुके हैं जिसके बिल भी मौजूद है।
      यह मामला तो जांच के बाद तय होगा, कौन झूठा और कौन सच्चा है। लेकिन क्या आप और हम समाज परिवार और दोस्तों में इस तरह के मामले आएदिन नहीं देखते रहते हैं? दावत पार्टी और नाश्ते तक को लेकर कुछ लोग बड़े क्रेज़ी रहते हैं। कई लोग दावत कर कर के अच्छे दोस्त बन जाते हैं तो कुछ दोस्त दावत नहीं करके दुश्मन बना लेते हैं। दावत कब अदावत बन जाए, पता ही नहीं लगता है। दरअसल दावत को लेकर हम लोगों की सोच अजीब है। दावत दो लोगों दो परिवारों या दो समूहों के बीच प्यार और सम्मान बढ़ाने के लिए होती है। दावत किसी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है जो हर हाल में होनी ही चाहिए नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे, क्रोधित हो जाएंगे और सामने वाले से न सिर्फ़ रिश्ता तोड़ लेंगे बल्कि खुद को अपमानित समझकर उससे दुश्मनी पर उतर आएंगे? 
          कुछ लोग अपनी ससुराल में दावत अपना हक़ समझते हैं। कुछ लोग शादी या जन्म दिन की पार्टी में नहीं बुलाए जाने पर खफा हो जाते हैं। कुछ लोग सपरिवार न बुलाये जाने पर आक्रोश दर्ज कराते हैं। कुछ लोग दावत का मीनू अपने स्तर या पसंद का नहीं होने पर भी बुरा समझते हैं और सामने वाले की औकात बताने लगते हैं। कुछ लोग बारात में नाश्ते को लेकर बड़े परेशान रहते हैं कि कहीं लेट होने पर नाश्ता न निकल जाए। कुछ लोग शादी करने को रिश्ते के लिए जब कहीं जाते हैं तो नाश्ते के आइटम गिनकर और उनकी कीमत आंककर यह तय करते हैं कि सामने वाले की हैसियत कैसी है? कुछ लोग दावत में मीट नहीं परोसने पर सामने वाले को कंजूस घोषित कर देते हैं तो कुछ लोग चिकन, मटन और बड़े जानवर के गोश्त के हिसाब से सामने वाले के स्टेटस को तय करते हैं। कुछ लोग खाने से पहले स्टार्टर बाद में स्वीट साथ में कोल्ड्रिंक और नाश्ते में ड्राई फ्रूट से अपना सम्मान तोलते हैं।
         दावत की चर्चा चल रही है तो एक और बात पर गौर कीजिये। कुछ दोस्त और रिश्तेदार अक्सर दावत करते हैं, कुछ कभी कभी और कुछ कभी नहीं। इसके पीछे उनकी आर्थिक स्थिति उनकी सोच उनकी सीमित या उदार समझ उनका आपसे करीबी या दूर का रिश्ता या उनके दिल में आपके लिए मुहब्बत इज़्ज़त या सबके लिए तंग दिली फराग दिली या मजबूरी न जाने कितनी वजह हो सकती है। दावत व्यापार नहीं है कि आपने की तो सामने वाला भी करेगा, उतनी ही करेगा या वैसी ही करेगा जैसी आपने की है। 
       हमारे शहर में एक मॉर्निंग वॉकर ग्रुप था। दो दर्जन से अधिक लोग थे। रोज़ सुबह साथ घूमने जाते थे। पहले वापसी में चाय पीने लगे। फिर पकौड़ी समोसे नाश्ते में शामिल हुए। फिर दावतों का सिलसिला शुरू हुआ। सबने बारी बारी दावत शुरू की। कुछ लोग पहले दिन से ही दावत खिलाने की हालत में नहीं थे। वे पहली दावत से ही किनारा कर गए। कुछ जाते रहे, खाते रहे, लेकिन जब उनकी बारी आई, तो अचानक गायब हो गए। बदले की दावत मांगने वाले उनको कॉल करने लगे, कभी बात हुई कभी नहीं हुई। फिर कॉल नो रिप्लाई होने लगी। दावत के दीवाने उस दोस्त के घर पहुंच गए। वो मिला तो बहुत ज़लील किया। फिर उसने घर जाने पर दोस्तों से मिलना भी बंद कर दिया। फिर उसको सड़क बाज़ार या शादी में मिलने पर दावत के लिए याद दिलाया गया। दावत न होनी थी न ही हुई। दोस्ती खत्म हो गई। ग्रुप भी बिखर गया। मॉर्निंग वॉक भी उनमें से अब कम लोग ही करते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है दावत प्यार दोस्ती और इज़्ज़त के लिए होती है उसे बदला व्यापार या अधिकार समझने की भूल कभी भी मत कीजिये। दावत को दावत रहने दीजिये अदावत में मत बदलिए प्लीज़।
*बहुत कुछ जान के जाना है तुम को*
*बड़ी मुश्किल से पहचाना है तुम को*
*मुझे जो तुम समझते हो ग़लत है*
*किसी दिन ये भी समझाना है तुम को।*
नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।

हिंदुत्व समर्थक और विरोधी...

*हिंदुत्व के समर्थक और विरोधी, हिंसक होने के अधिक आरोप किस पर हैं?*
                           *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण में "दिमागी नक्सल" शब्द पर एक पखवाड़े से अधिक समय से चर्चा चल रही है। पहले संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजूजी ने सफ़ाई दी थी कि इस शब्द का विपक्ष से कोई मतलब नहीं है। लेकिन दिमागी नक्सल पर संघ के मुख्य पत्र ऑर्गनाइजर में छपे विस्तृत लेख, बीजेपी के ट्विटर हैंडल पर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जैसे बुद्धिजीवीयों को "इंटेलेक्चुअल नक्सल" बताने और इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में पूर्व में आरएसएस से जुड़े रहे बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राम माधव के साप्ताहिक स्तम्भ रामराज्य में प्रकाशित विचारों से स्पष्ट हो गया है कि अर्बन नक्सल दिमागी नक्सल के बाद अब इंटेलेक्चुअल नक्सल नाम से इस आरोप में उन सब लोगों को शामिल कर लिया गया है जो बीजेपी संघ के हिंदुत्व मॉडल से सहमत नहीं हैं, तटस्थ हैं या विरोधी हैं। उन्होंने ऐसा कहकर एक तरह से ईराक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के उस बयान को याद दिला दिया है जिसमें उन्होंने दुनिया के देशों को यह कहकर धमकाया था कि अब बीच का कोई रास्ता नहीं है, इस खाड़ी जंग में या तो आप हमारे साथ रहें नहीं तो आपको चुप रहने पर हमारे खिलाफ़ यानी अमेरिका का दुश्मन माना जायेगा। जबकि इतिहास गवाह है भारत ने तो एक दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की गुटबंदी से बचने के लिए ही गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया था जिसमें न्यायप्रिय तटस्थ और निष्पक्ष विश्व के अनेक देश हमारे साथ जुड़े थे और उस दौर में दुनिया दो ध्रुव से तीन बड़े हिस्सों ने नज़र आने लगी थी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी संघ या पीएम मोदी ने हिंदुत्व विरोधियों या निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया हो। संघ परिवार पहले दिन से ही "या तो हमारे साथ नहीं तो हमारा शत्रु" की नीति पर चलता रहा है। यही वजह है कि वे विपक्ष, विरोध करने वाले नागरिक समाज और बीजेपी सरकार के खिलाफ़ जनहित के मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को बीजेपी विरोधी सरकार विरोधी या किसी विशेष सरकारी फैसले का विरोधी नहीं सीधे "राष्ट्र विरोधी देशद्रोही और पाकिस्तानी खालिस्तानी" बताकर उनका मनोबल तोड़ते हैं, उन पर विदेशी साज़िश टूलकिट का आरोप लगाते हैं और साथ ही उनको हिंदू विरोधी घोषित करके समाज में उनकी छवि खलनायक की बनाने का प्रयास करते हैं। 
          अगर थोड़ा पीछे चलें तो हम देखते हैं कि हिंसा का आरोप तो वे नक्सल माओवादी और वामपंथी सोच वालों पर लगाते हैं लेकिन खुद बीजेपी संघ पर दंगों के आरोप लगते रहे हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद तोड़ने के आरोप हैं। उनके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की विवादित यात्रा से देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़काने का आरोप लगा है। खुद मोदी पर गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों का कोच जलने पर पूरे प्रदेश में भड़के दंगे जानबूझकर नहीं रोकने का विपक्ष आरोप लगाता रहा है। बीजेपी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कुछ अन्य पर तो बाकायदा भगवा आतंकवाद का आरोप रहा है जिससे समझौता एक्सप्रेस ट्रेन सहित मक्का मस्जिद में बम विस्फोट से हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जे एन यू, जादवपुर यूनिवर्सिटी व गार्गी कॉलेज सहित कई गैर हिंदुत्व विचारधारा के संस्थानों संगठनों और व्यक्तियों पर हिंसक जानलेवा और सुनियोजित हमले करने के संघ परिवार पर समय समय पर गंभीर आरोप लगे हैं। गौरी लंकेश नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे जैसे पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट की हत्या कराने में दक्षिणपंथी सोच का हाथ होने का आरोप लगा है।
           किसान आंदोलन, सी ए ए के खिलाफ़ शाहीन बाग़ आंदोलन और भीमा कोरे गांव में दलित सम्मेलन में हिंसा के गंभीर आरोप भी संघ परिवार पर लगे हैं लेकिन इसमें सत्ता पक्ष ने उल्टा आरोप लगाने वाले यानी पीड़ित समझे जाने वाले पक्ष को ही यूएपीए जैसे मुकदमों में जेल भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले तेजिंदर सिंह बग्गा को जिस तरह बीजेपी ने पार्टी में लिया और फिर पंजाब की आप सरकार की कानूनी कार्यवाही से केजरीवाल के मानहानि के केस में बचाया, उस तरह के भी यहां छोटे बड़े दर्जनों अनेक मामले इसके अलावा भी गिनवाए जा सकते हैं लेकिन उससे यह साबित नहीं होता कि अकेले बीजेपी और संघ ही ऐसे हिंसा के आरोपों से घिरे हैं, हां ये आरोप अधिक अवश्य हैं।
      *अगर मुख्य विपक्षी दल की बात करें तो कांग्रेस का दामन 1984 की सिख विरोधी हिंसा से दाग़दार है। तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने इस एकतरफा सिख नरसंहार को यह कहकर जस्टिफाई करने की अनैतिक कोशिश भी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती काँपती ही है। ऐसा ही मिलता जुलता बयान गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सीएम मोदी ने देते हुए कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। अगर अन्य विपक्षी दलों का रिकॉर्ड देखें तो उनमें से वामपंथी दलों और टीएमसी पर सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे हैं। यूपी में सपा और बिहार में राजद पर भी कभी कभी माफियाओं की शह पर हिंसा और कुछ बड़े अपराधों के आरोप लगे हैं। ऐसे ही अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों पर छिटपुट हिंसा के आरोप लगते रहे हैं लेकिन इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना का विशेष रूप से उत्तर भारतीयों और दंगों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा का विवादित इतिहास है, जो लंबे समय से बीजेपी के साथ गठबंधन में रही और हिंदूवादी सोच से ही प्रेरित रही है। *आज के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो बीजेपी के विभिन्न प्रकोष्ठ जिनमें बजरंग दल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, हिंदुत्व से असहमत लोगों के साथ हिंसा करने के बहुतायत आरोपों से घिरे हुए हैं। इनमें विशेष रूप से गौ मांस, गो हत्या, लव जेहाद, धर्म परिवर्तन जैसे विभिन्न फर्ज़ी जेहाद, मॉब लिंचिंग कांवड़ खंडित होने पर हिंसा,मस्जिद मदरसों और चर्चों पर झूठी सूचनाओं के आधार पर हमले और हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के झूठे सच्चे आरोप लगाकर हिंसा करने के थोक में आरोप लगते रहे हैं।* इससे एक ट्रेंड पता लगता है कि जो आरोप लगा रहे हैं वे हिंसा के अधिक आरोपी हैं और जो संविधान लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्मनिरपेक्षता समानता मानवता आंदोलन विरोध प्रदर्शन धरना समाजवाद नैतिकता आरक्षण और सबके लिए सस्ती शिक्षा स्वास्थ्य व रोज़गार की मांग करते हैं, लेकिन हिंसा का सहारा नहीं लेते उनको आरोप लगाकर सत्ता के बल पर विलेन बनाया जा रहा है।
            *कोई भी विचारधारा, हिंसा और अपराध के हिसाब से देखें तो सुप्रीम कोर्ट और अनेक उच्च न्यायालयों (विशेष रूप से केरल हाईकोर्ट) ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि केवल किसी विचारधारा (मिसाल के तौर पर माओवाद या नक्सलवाद ) को मानना या उससे हमदर्दी रखना तब तक अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि वह आदमी उस विचार को बाकी नागरिकों पर जबरन थोपने के इरादे से हिंसा नहीं करता या कानून के राज, संविधान और लोकतंत्र को चुनौती नहीं देता।खास तौर से, इस सिद्धांत को मजबूत करने वाले प्रमुख मामले इस प्रकार हैं-1. थवाहा फजल बनाम भारत संघ (2021) - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि "सिर्फ माओवादी साहित्य पास में होना या किसी विशेष विचारधारा के प्रति झुकाव होना गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी किसी आतंकी गतिविधि या हिंसा को अंजाम देने के इरादे से सक्रिय रूप से नहीं जुड़ता, तब तक केवल वैचारिक जुड़ाव के आधार पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। 2. अरूप भूइयां बनाम असम राज्य (2011 और 2023 पुनर्विचार याचिका पर ) इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्यायशास्त्र के 'क्लियर एंड प्रेजेंट डेंजर' (स्पष्ट और वर्तमान खतरा) सिद्धांत का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन की केवल निष्क्रिय सदस्यता तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि वह सदस्य लोगों को हिंसा के लिए नहीं उकसाता या खुद हिंसा में शामिल नहीं होता। हालांकि, 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी पीठ ने सुरक्षा कारणों से 'प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने' को अपराध माना, लेकिन बिना हिंसा या उकसावे के केवल विचारधारा रखने को अभी भी अपराध नहीं माना जाता है। 3. श्याम बालकृष्णन बनाम केरल राज्य (2015) (सुप्रीम कोर्ट द्वारा समर्थित सिद्धांत के आधार पर ) इस विषय पर सबसे स्पष्ट टिप्पणी केरल हाईकोर्ट ने 2015 में की थी, जिसे बाद के कानूनी सिद्धांतों में आधार बनाया गया।अदालत ने कहा था कि "माओवादी होना कोई अपराध नहीं है।"*
               इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के अनुसार कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा: "भले ही माओवादियों की राजनीतिक विचारधारा हमारे संवैधानिक ढांचे से मेल न खाती हो, लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इस विचारधारा को मानने के लिए तब तक गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह देश के संविधान, लोकतंत्र और कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए किसी हिंसक या अवैध गतिविधि में शामिल न हो।" द हिंदू समाचार पत्र के मुताबिक इस फैसले का मुख्य निष्कर्ष यह था कि अदालतों का स्पष्ट मत है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां 'विचारों की स्वतंत्रता' (संविधान के आर्टिकल 19 के तहत ) हर नागरिक को प्राप्त है। कोई भी विचारधारा चाहे वह कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो तब तक कानूनी दायरे में है जब तक वह शांतिपूर्ण है। जैसे ही उसमें हिंसा, हथियारों का इस्तेमाल या देश को तोड़ने की साजिश शामिल होती है, वह कानूनन अपराध बन जाती है। इस हिसाब से भी "दिमागी नक्सल" अपराधी नहीं माने जा सकते जबकि संघ परिवार लगातार ऐसे फैसले ऐसे विवादित बयान और माहौल बनाता रहा है जिससे हिंसा को बढ़ावा देने के उस पर आरोप बढ़ते जा रहे हैं।

आईफोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था

*आई फ़ोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल भी जानलेवा है?*
                 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
             महाराष्ट्र के संभाजी नगर में एक बच्चे ने आई फ़ोन लेने की ज़िद पूरी नहीं होने पर जान दे दी। सतही तौर पर देखें तो बेशक आत्महत्या की वजह आई फोन ही नज़र आती है लेकिन बड़े परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखें तो एक बड़ी वजह हमारा बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था व विकास का उपभोक्तावादी असमान आय वाला असफल पूंजीवादी मॉडल भी है। आई फोन वाली घटना पर बाद में पहले इसी मॉडल पर बात करते हैं। एलपीजी यानि लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल मतलब उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की पूंजीवादी नीतियों ने आज पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हमारा देश भी 1991 से मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता छोड़कर पूरी तरह पूंजीवादी मॉडल को अपना रहा है। दक्षिणपंथी अधिकांश राजनीतिक दल पूरी तरह इस मॉडल के पक्ष में रहे हैं। भारत में भी बीजेपी ने 2014 से चुनाव अपने बल पर जीतने के बाद सांप्रदायिकता और कॉर्पोरेट का एक कॉकटेल बना लिया है। कहा जाता है कि कॉर्पोरेट ने चुनाव से पहले ही मोदी को पीएम मैटीरियल मानकर उनकी जीत के लिये पैसा पानी की तरह बहाया था। मोदी ने सत्ता हासिल करते ही बाक़ी बची हुई समाजवादी नीतियों को भी तिलांजलि देने की नीयत से पूरी तरह क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सबको पता है *पूंजीवाद उपभोक्तावाद को खुलकर बढ़ावा देता है। कॉर्पोरेट विज्ञापनों के ज़रिए बाज़ार में ऐसा माहौल बनाता है जिससे लोग उसके मोहपाश में फंसकर गैर ज़रूरी चीज़ें अधिक खरीदने लगते हैं। पैसा पास नहीं हो तो उधार लेते हैं। बाज़ार लोगों के दिमाग़ को कंट्रोल करने लगता है। कंपनियां अपनी बिक्री और बेतहाशा मुनाफा कमाने के एकसूत्री लक्ष्य को हासिल करने के लिए बाज़ार को उन सामानों से पाट देती हैं जो लोगों की वास्तविक या बुनियादी जरूरतों का नहीं होता। चंद पूंजीपतियों को देश के सब संसाधन कारोबार और मोनोपली वाली उत्पादन की कंपनियां सौंप देने से उनका अर्थव्यवस्था पर एकक्षत्र कंट्रोल हो गया है। आज देश में बाज़ार तय कर रहा है कि लोग क्या खायेंगे क्या पहनेंगे और क्या क्या खरीदेंगे?* 
         इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन लोगों की इतनी आमदनी नहीं है कि वे आई फोन या कोई और महंगा गैजेट खरीद सकें उनको उसके बिना समाज में हीन भावना भी बाज़ार महसूस कराता है। यह समाज में फैशन बन जाता है। ऐसे में लोग ये विलासिता की चीज़ें उधार किश्तों पर खरीद लेते हैं। बाद में जब अचानक नौकरी चली जाती है या कोई और बड़ा खर्च स्वास्थ्य शिक्षा या शादी का आ जाता है तो कर्ज़ की किश्तें रुक जाती हैं। ऐसे में क़र्ज़ देने वाली कंपनी अपने ऑफिस से से ही आपका उधार खरीदा गया मोबाइल अपने सिस्टम से लॉक कर देती है और लाखों का मोबाइल अचानक डब्बा बनकर वेस्ट मैटिरियल बनकर एक कोने में चला जाता है। यह आघात गरीब और मीडियम क्लास लोग क्या किसी भी वर्ग के आदमी को बर्दाश्त नहीं होता। क़र्ज़ पर लिए और भी सामान का किश्तें रुक जाने पर कंपनी के दबंगों द्वारा यही हश्र होता है। उसके बाद इस सदमे में डूबा बच्चा हो बड़ा हो या कोई बुद्धिजीवी अवसाद में चला जाता है। तनाव और दुख में आत्मघाती कदम भी उठा लेता है जिससे वह खुद ही नहीं पूरा परिवार तबाह हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। चलना भी चाहिए। समाज में सम्मान से रहने को कई मामलों में साथ चलना पड़ता भी है लेकिन हम सबका आर्थिक स्तर समझ का स्तर शिक्षा का स्तर और आय इतनी नहीं है कि हम अमीर लोगों या विकसित देशों की बराबरी कर सकें। आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां रोज़गार बढ़ने की बजाए कई क्षेत्रों में तो घट रहे हैं ए आई की वजह से कुछ कंपनियों में नौकरी कम हो रही हैं। ट्रैजिडी यह है कि देश की कुल आय और प्रॉपर्टी का बड़ा हिस्सा चंद पूंजिपतियों की तिजोरी तक सीमित होता जा रहा है। आम आदमी के पास जब पर्याप्त आय नहीं होगी तो रहने को अच्छा घर पौष्टिक खाना स्टैंडर्ड का रहन सहन पहनावा अच्छी शिक्षा और बेहतर चिकित्सा कहां से आयेगी? *यही वह पूंजीवादी असफल ग़ैर समावेशी विकास का जानलेवा मॉडल है जिससे कोई बच्चा पेपर लीक होने से कोई परीक्षा में असफल होने से कोई इंटरव्यू में पक्षपात होने से कोई नौकरी नहीं मिलने से कोई नौकरी छूट जाने से तो कोई इंसान क़र्ज़ अदा नहीं कर पाने से कोई बीमारी का महंगा इलाज नहीं करा पाने से कोई किसान फ़सल उजड़ जाने से कोई पीड़ित थाने में रिपोर्ट नहीं होने से कोई कोर्ट में केस हार जाने से कोई स्कैम में लाखों का फ्रॉड होने से और कोई आई फोन नहीं खरीद पाने से जान देने को मजबूर हो जाता है।*
        अब बात करते हैं उस घटना पर जिसमें महाराष्ट्र के संभाजीनगर का एक बच्चा आई फोन लेने की ज़िद में पास की 300 मीटर ऊंची पहाड़ी पर चढ़ गया। उसको बचाने उसके पिता पहाड़ी पर चढे़ तो वे भी उसके साथ साथ संतुलन खोने से फिसलकर नीचे गिर गये। यह अनर्थ देखकर उस बच्चे की मां ने भी पहाड़ी से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान सदमें में दे दी। कुछ ही पल में देखते ही देखते पूरा परिवार मौत के आगोश में समा गया। दिल्ली में एक वेंडर ने महंगा आई फ़ोन फाइनेंस कराया था। वह जब उसके लोन की किश्तें टाइम पर जमा नहीं कर पाया तो उसने भी जान देने को यमुना में छलांग लगा दी लेकिन पास के लोगों ने उसे बचा लिया। सतही तौर पर देखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि मोबाइल की वजह से तीन जानें चली गयीं। कुछ को लगता है कि आईफोन की वजह से ऐसा हुआ क्योंकि मोबाइल तो आजकल लगभग सभी के पास हैं। इस परिवार के पास भी होगा। अगर नहीं भी होता तो पहले से मांग कर रहे बच्चे को कोई सस्ता सा मोबाइल दिलाना कौन सी बड़ी बात थी? लेकिन आई फोन चूंकि बहुत महंगा होता है इसलिये यह परिवार आईफोन नहीं दिला पाया होगा जिससे पूरा परिवार असमय ही काल के गाल में समा गया?
          बच्चा चला गया उसके मातापिता चले गये यानी पूरा परिवार खत्म हो गया। कभी कभी हम चीज़ों को बहुत सतही तौर पर देखते हैं। उसकी वजह यह है कि हमें केवल जितना बाहर से दिखता है। यानी जितनी जानकारी हमारे सामने आती है। उसी पर चर्चा करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। यह कहना बहुत आसान है कि आज मोबाइल ने बच्चो को बिगाड़ दिया है। उनको ज़िद्दी बना दिया है। कुछ लोग बड़ों के भी मोबाइल के इस्तेमाल के नुकसान गिनाने लगते हैं। कुछ कहते हैं कि जब से मोबाइल आया हर कोई मोबाइल में ही लगा रहता है। वह किताब अखबार और परिवार को समय नहीं देता। वह सामाजिक नहीं रह गया है। वह अनैतिक होता जा रहा है। वह मोबाइल पर पोर्न देखता है। फिल्में देखता है। गाने सुनता है। रील देखता है। अंजान लोगों से चैट करता है। हर समय व्हाट्सएप फेसबुक एक्स थ्रेड यू ट्यूब ईमेल और इंस्टाग्राम पर लगा रहता है। किसी के पास परिवार से बात करने साथ बैठने खाना खाने नाश्ता करने और पिकनिक के लिये भी टाइम नहीं है। यहां तक कि जब लोग किसी ग़म या खुशी के प्रोग्राम में भी जाते हैं वहां भी अपने मोबाइल में ही बिज़ी रहते हैं। लेकिन सच केवल इतना ही नहीं है।
        मोबाइल पूरी दुनिया में आया है। वहां भी ये सभी एप चलते हैं। वहां भी लोग चैट करते हैं। हर देश में मनोरंजन करने वाले लोग हैं। वहां लोगों को ये सब शिकायते मोबाइल से नहीं हैं। उन्होंने अनुशासन अपनाया हुआ है। उनके यहां नैतिकता मौजूद है। उन्होंने एक सिस्टम बनाया हुआ है। यानी उनको मोबाइल से कोई शिकायत नहीं है। वे मोबाइल को इस्तेमाल करते हैं। वे मोबाइल के एडिक्शन के शिकार नहीं हैं। सच यह है कि अगर इंसान परिवार और समाज मोबाइल ही नहीं हर चीज़ का व्यवस्थित सुनियोजित और समय के हिसाब से नपा तुला इस्तेमाल करे तो मोबाइल ही नहीं किसी चीज़ से कोई परेशानी नहीं होगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।
   इसलिये सावधान रहें सजग रहें और अपनी सीमा में रहकर ही खरीदारी करें। अपने बच्चों को शुरू से ही अपनी आय अपनी खरीद क्षमता और अपनी उपभोग सीमा से परिचित करायें, अच्छे बच्चे के संस्कार सिखायें और उनसे समय समय पर अनुशासन व अच्छे नागरिक बनने अच्छा इंसान बनने और माता पिता का कहना मानने के फायदे बतायें। बच्चों से संवाद बनाये रखें। इसके साथ ही हमें ज़रूरत और विलासिता की इच्छा में भी अंतर करना सीखना चाहिए। उपभोक्तावाद बाज़ार के जाल और विज्ञापनों के चंगुल से अपने बच्चों परिवार और खुद को बचाने का प्रयास करें। फिलहाल बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बचने निबटने और नुकसान कम करने का यही तरीका है। वसीम बरेलवी ने शायद ऐसे ही बच्चों के लिए एक शेर कहा है...
*"नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है"*

महंगे इलाज से गरीब बनते लोग...

*जितने लोग हर साल ग़रीबी की रेखा से ऊपर आ रहे हैं, उससे ज़्यादा नीचे क्यों जा रहे हैं ?* 
           *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      नेशनल हेल्थ एकाउंट के अनुसार भारत में हर साल महंगे इलाज के कारण 3 से 6 करोड़ लोग मध्यम वर्ग से गरीबी की रेखा से नीचे या उसके करीब पहुंच जाते हैं। पहले यह आंकड़ा 5.5 से 10 करोड़ तक आंका जाता था लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर होने, उनके जागरूक होने पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ने और सरकार द्वारा चलाई गयी आयुषमान भारत योजना से बड़ी संख्या में लोगों को हाॅस्पिटलाइजे़शन खर्च में कुछ राहत मिली है। नीति आयोग का कहना है कि हर साल 2.5 से लेकर 2.7 करोड़ भारतीयों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा रहा है। सरकार का कहना है कि आयुष्मान कार्ड धारकों की संख्या इस समय देश में 45 करोड़ से अधिक हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि 12.69 करोड़ लोग इस योजना के तहत हर साल पांच लाख रूपये तक का अब तक निशुल्क उपचार का लाभ ले चुके हैं। समस्या यह है कि सरकार की यह योजना गरीब वर्ग के लिये होने से मीडियम क्लास के लगभग 40 करोड़ लोगों को इससे कम ही लाभ मिला है। दरअसल बीमारी किसी की आय नहीं देखती अगर किसी को अचानाक गंभीर बीमारी में अस्पताल में भर्ती होकर आईसीयू हार्ट आॅप्रेशन या कैंसर होने पर कीमियोथेरेपी करानी पडे़ तो उस परिवार पर इतना अधिक आर्थिक बोझ आ जाता है कि उसका मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। 
         *जहां विकसित देशों में नागरिक स्वास्थ्य खर्च का मात्र 20 प्रतिशत स्वयं वहन करते हैं वहीं हमारे देश में यह आंकड़ा 45 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।* जबकि विकसित देशों में लोगों की आय का स्तर भी हमसे काफी अधिक ही है। गंभीर बीमार होने हार्ट अटैक ब्रेन हेम्रेज लकवा एक्सीडेंट या कोई और ज़रूरी आॅप्रेशन कराने के लिये एक बार निजी अस्पताल में भर्ती होने पर कम से कम 50,000 खर्च आता है। चाइल्ड बर्थ में सीजे़रियन केस होने पर यह खर्च और अधिक हो जाता है। सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत सबको पता ही है वर्ना यहां यह खर्च 6500 तक ही होता है। सरकार जीडीपी का मात्र 1.5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करती है। थ्री स्टार से फाइव स्टार तक अस्पताल में यही खर्च लाखों रूपयों तक पहुंच जाता है। जिसके लिये लोगों को जेवर ज़मीन मकान बेचकर या महाजन से ब्याज पर पैसा उधार लेना होता है। इसके बाद ऐसे परिवार लंबे समय तक कर्ज़ के जाल में उलझकर बच्चो की पढ़ाई मकान का निर्माण और शादी तक को टालने को मजबूर हो जाते हैं।
        *संसद की एक समिति ने पिछले दिनों महंगे इलाज की शिकायतों को बढ़ता देखकर सरकार से सिफारिश की है कि सभी उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों के लिये यह ज़रूरी किया जाये कि वे रोगी को भर्ती करते हुए लंबे इलाज का अनुमानित खर्च उसके परिवार को अनिवार्य रूप से स्पश्ट करें। समिति ने उपचार के मानक नियम और तौर तरीकों उपलब्ध सुविधाओं और सभी तरह के खर्च के बारे में भी पारदर्शिता लाने के नियम लागू करने का सुझाव दिया है। उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले में वी द पीपुल संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली जा रही भारी फीस को मजबूरी का फायदा उठाते हुए एक तरह से लूटना बताया। पीठ ने इस मामले में वर्तमान कानून को अपर्याप्त बताते हुए नये कानून की ज़रूरत और ऐसे निजी अस्पतालों को सरकार द्वारा सशर्त दी गयी निशुल्क ज़मीन लेने के बाद भी गरीब लोगों का सस्ता इलाज नहीं करने पर सख्त कानूनी कार्यवाही पर ज़ोर दिया।* सरकार और कोर्ट के रूख से यह पता तो लगता ही है कि महंगा इलाज देश में लोगों के लिये बहुत बड़ी असहनीय समस्या बन चुका है।
       *एनएसएसओ के एक सर्वे के अनुसार देश में 45 साल से अधिक उम्र के अधिकांश लोग नियमित रूप से दवा खाने को विवश हैं। आंकड़ें बताते हैं कि कुल इलाज का 72 प्रतिशत खर्च केवल दवाओं को खरीदने में ही होता है। इससे देश में दवा उद्योग एक बड़ा कारोबार बन गया है। भारत में आज एक लाख करोड़ से अधिक का दवा व्यवसाय चल रहा है। जिसमें सरकारी दवा कंपनियों की हिस्सेदारी मात्र 400 करोड़ की है। सरकार की इस नाम मात्र की भागीदारी से निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों की मोनोपोली स्थापित हो चुकी है। हालांकि सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिये 348 दवाओं के दाम निर्धारित करने का दावा किया है लेकिन इसमें सरकारी अधिकारी और निजी कंपनी के अफसर मिलकर एक खेल यह करते हैं कि उन्होंने किसी भी दवा उत्पाद में एक प्रतिशत से अधिक का हिस्सा रखने वाली ब्रांडेड कंपनियों द्वारा ही निर्धारित किये गये अलग अलग मूल्यों का औसत निकालकर उस दवा का अधिकतक दाम तय कर दिया है। जबकि सबको पता है कि निजी दवा कंपनियां लागत पर 500 से 1000 प्रतिशत तक का मुनाफा वसूल रही हैं।* जिससे गरीब लोगों को ज़रूरी दवायें सस्ते रेट पर प्राइवेट ब्रांडेड कंपनियों से ही उपलब्ध कराने की सरकार की कवायद एक औपचारिकता दिखावा और मृगमरीचिका बन कर रह गयी है। इसके साथ ही दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग आॅथोरिटी का यह दावा आज भी दावा ही है कि वह दवाओं के दाम निर्धारित सीमित और आम आदमी की पहुंच में रखने के लिये निजी दवा कंपनियों को मुनाफाखोरी से रोकने लिये बाज़ार के हवाले नहीं करेगी बल्कि लागत के हिसाब से दवाओं के रेट तय करने के लिये प्रयासरत है। सरकार दवा बाज़ार का यह सच जानती है कि पंूजीवादी सिस्टम में दवा कंपनियां भी अपना मुनाफा मरीजों की जान की परवाह नहीं करते हुए हर हाल में बढ़ाने की कोशिश में लगी होंगी फिर भी उनको बेकाबू छोड़ दिया गया है। 
          सरकार की यह अनदेखी या अपराधिक लापरवाही की यह हालत तब है जबकि *काॅरपोरेट मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपनी एक स्टडी में यह पाया है कि देश की अधिकांश दवा कंपनियां दवाओं की लागत में 1100 प्रतिशत तक का लाभ जोड़कर दवाओं को बेच रही हैं।* एनएफपीए के तमाम नियामकों नियमों और शर्तों को धता बताते हुए दवा कंपनियां हाईकोर्ट के अनुसार लोगों की मजबूरी का नाजायज लाभ उठाकर उनको एक तरह से लूट रही हैं। साथ ही दवा कंपनियां सरकार के किसी भी नये कानून नियमन और रेग्यूलेटर का भी खुला विरोध करती चली आ रही हैं। यही कारण है कि लोग दवा कंपनियों की मनमानी के खिलाफ कोर्ट जाने लगे हैं। *मानकों से अधिक मूल्य वसूलने के लिये निजी दवा कंपनियों के खिलाफ कोर्ट में 900 से अधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कुछ मुकदमों में अदालत ने इन दवा कंपनियों पर हज़ारों करोड़ का जुर्माना भी लगाया है लेकिन इन ब्रांडेड दवा कंपनियों के दुस्साहस की हालत यह है कि इन्होंने मात्र 250 करोड़ अर्थदंड ही अब तक जमा किया है।* इतना ही नहीं ये कंपनियां नियम कानून का मजाक उड़ाकर भी दवाओं का निर्माण भंडारण और बिक्री कर रही हैं। इसके साथ ही सरकार से नियामक को कंपनियों के हिसाब से चलने का निर्देश देने की मांग भी कर रही हैं। सरकार का रूख़ भी इस मामले में निजी दवा कंपनियों के बेकाबू दवा के दामों को लेकर कोई बहुत आशावादी या सकारात्मक नहीं लगता क्योंकि वह भी पूंजीवादी बाज़ारवादी और मुनाफाखोरी नीति आज के दौर में अपरिहार्य मानकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को महंगे इलाज के लिये इनके ही रहम ओ करम पर छोड़ चुकी है। अब तो शिक्षा व्यवस्था को बदलने को संघर्ष कर रहे युवा वर्ग से ही जनता को कुछ आस जगी है। यह अलग बात है कि युवा वर्ग ही अपनी पढ़ाई नौकरी व पेपर लीक की समस्या के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर भी नज़र डाले तो कुछ सुधार हो सकता है क्योंकि बीमार और बुज़ुर्ग लोग न तो आंदोलन करने की स्थिति में हैं न ही सरकार उनकी बात सुनेगी।

सत्ता नहीं व्यवस्था बदलो

*1947 के बाद जेन ज़ेड ने ही सत्ता की जगह व्यवस्था बदलने की मांग की है?*
                *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        6 अगस्त को मुंबई में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपना आक्रामक रुख़ छोड़कर जेन ज़ेड और जेन अल्फ़ा को वर्तमान पीढ़ी से ज़्यादा देशभक्त और ईमानदार बताया। ऐसा लगता है संघ ने सीजेपी के आंदोलन के भविष्य के बड़े ख़तरे को ठीक से समझकर अपने सुर बदल लिए हैं लेकिन यह एक दिखावटी बनावटी और सजावटी बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है। सबको पता है संघ दस मुँह से बोलता है। असली सवाल यह है कि क्या संघ का राजनीतिक मुखौटा यानी बीजेपी सीजेपी के दबाव में अपना हिंदूवादी पूंजीवादी और विभाजनकारी एजेंडा बदलने को मजबूर होगी? हमें लगता है नहीं। दरअसल बीजेपी और सीजेपी के एजेंडे में चंद मुद्दों पर थोड़े से मतभेद नहीं बल्कि दोनों के लक्ष्यों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है। यह ठीक है कि मोदी सरकार को झुकाने का जो काम पिछले 12 साल में कांग्रेस, विपक्ष या इंडिया गठबंधन नहीं कर पाया वो सीजेपी ने 36 दिन में कर दिखाया। सीजेपी के साथ युवाओं का 26.2 प्रतिशत वोट खड़ा न हो जाए यह डर संघ को है। उसके पास विपक्ष के नेताओं की तरह खोने को भी कुछ नहीं है। युवा होने के कारण वे निडर भी हैं। वे अपना भविष्य चौपट देखकर करो या मरो की लड़ाई लड़ने के लिए सर पर कफ़न बांधकर मैदान में उतरे हैं। वे विरोध करने वालों को गालियां देने पर ईंट का जवाब पत्थर से देकर बीजेपी आईटी सेल और संघ को सकते में डाल देते हैं। वे सोशल मीडिया के संघ परिवार से बड़े खिलाड़ी हैं।
        सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने बीजेपी से कहा है कि वे भागवत की बात सुनें क्योंकि वे बीजेपी के मेंटर हैं। लेकिन सब जानते हैं बीजेपी नहीं सुनेगी क्योंकि वह जानती है कि भागवत एक रणनीति के तहत युवाओं को पटाने के लिये केवल लिप सर्विस कर रहे हैं। दीपके ने यह भी कहा है कि हमारी विचारधारा वही होगी जो हमारे संविधान की है। उनका यह भी कहना है वे तमाम दबाव और धमकी के बावजूद न तो बीजेपी में जाएंगे और न ही कोई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे। वे दिल्ली में आप और असम में आसू का हश्र देख चुके हैं। वैसे भी मान लो अगर किसी लालच में दीपके बीजेपी में चले भी जाएं या डरकर अपने घर बैठ जाएं तो भी इस आंदोलन की कमान कोई और संभाल लेगा। गुजरात के पटेल आंदोलन के मुखिया हार्दिक पटेल के बीजेपी में जाने की तरह सीजेपी का आंदोलन इससे खत्म नहीं होगा। दीपके कहते हैं वे राजनीति में इसलिए भी नहीं जाएंगे क्योंकि उससे जनता का भरोसा खत्म हो चुका है। ईडी सीबीआई और चुनाव आयोग से दल तोड़े जा रहे हैं। वे कहते हैं देश को बड़े जन आंदोलन की ज़रूरत है। सीजेपी का दावा है हर वह हर आदमी गुलाम है जो अपने मन की बात नहीं कह सकता।सीजेपी की मुख्य नेता नेहा बोहरा तो यहां तक कहती हैं कि हमने अगर नफ़रत की सियासत की चूलें नहीं हिला दी तो धिक्कार है हमारी छात्र राजनीति पर। इन बयानों से पता लगता है वे अपने मकसद को लेकर स्पष्ट और अडिग हैं।
         पेपर लीक से शुरू हुआ सीजेपी का आंदोलन शिक्षा सुधार से होता हुआ अब व्यवस्था परिवर्तन पर ज़ोर दे रहा है। हालांकि भागवत ने बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की बात भी कही लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए फिर शिक्षा बजट 5 से घटाकर आज मोदी सरकार ने ढाई प्रतिशत क्यों कर दिया? भागवत इस अहम सवाल पर बचकर निकल गए कि छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज और पेलेट गन का इस्तेमाल क्यों हुआ? क्या यह संभव है उनको अपनी ही सरकार के इस फैसले का पता नहीं हो? *सीजेपी ने आंदोलन के दौरान एक नारा दिया था "सरकार बीजेपी की हो कांग्रेस की हो आप की हो या आपके बाप की हो, सबको जवाबदेही करनी होगी" यही वह टकराव का वास्तविक बिंदु है जिस पर सीजेपी बीजेपी को अपना एजेंडा बदलने पर मजबूर करना चाहती है। सीजेपी ने अब इस जवाबदेही में कोर्ट को भी शामिल कर लिया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को जब सुप्रीम कोर्ट ने अंडो के डर से वर्चुअल पेशी की इजाज़त न देते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के सीने पर गोली खाने की दुहाई दी तो दीपके और सौरभ दास ने जज साहब को आड़े हाथ लेते हुए लिखा कि क्या सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि हर कोई गोली खाए? जब सुप्रीम कोर्ट के जज अपोजिशन लीडर्स के खिलाफ़ इस तरह के बयान देते हैं, तो आम आदमी के लिए क्या उम्मीद बचती है? सीजेपी के सह संयोजक सौरभ दास ने तो यहां तक कह दिया कि हमने किस तरह के बड़बोले लोगों को जज बनाया है? हमें ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी तय करने की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की बेरोजगार युवाओं पर अपमानजक टिप्पणी के जवाब में बनी कोकरोच जनता पार्टी अब सरकार के साथ ही कोर्ट जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी खुलकर सवाल उठा रही है। इससे सुप्रीम कोर्ट के रुख़ में भी बदलाव आए या नहीं आए लेकिन जज सफाई देते नज़र आ रहे हैं। दीपके ने अमेरिका में अपनी पढ़ाई के खर्च पर भी तीखा जवाब देते हुए कहा कि वे मेरे पेपर देखने से पहले मोदी की डिग्री और पीएम केयर फंड का हिसाब दें। 
         सीजेपी बीजेपी की असली लड़ाई इसी मुद्दे पर है कि जनता नहीं सरकार सेवक है। इसीलिए उसकी ही जवाबदेही है। सीजेपी 70 साल से अधिक आयु के नेताओं को घर या आश्रम भेजने की भी मांग कर रही है जो संघ तो कभी भी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उनके यहां मरते दम तक प्रमुख बने रहने का नियम है। खुद मोदी 75 साल से अधिक आयु वालों को मार्ग दर्शक मंडल में भेजने का नियम बनाकर उसे अपने लिए लागू करने से मुकर गए। सबको पता है संघ बीजेपी सत्ता का इस्तेमाल अपना हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने के लिए कर रहे हैं। इसके लिए संविधान लोकतंत्र और कानून के राज को भी ताख पर रख दिया गया है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। इतिहास बदला जा रहा है। कोर्स की किताबों में झूठ लिखकर हिन्दू मुस्लिम के बीच नफ़रत की दीवार चौड़ी की जा रही है। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। जिससे शिक्षा न केवल महंगी हो रही है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी नीचे जा रही है। सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके चोर दरवाज़े से आरक्षण खत्म किया जा रहा है। सरकारी यूनिवर्सिटीज में संघी वीसी और कॉलेजों में संघी प्राचार्य भेजे जा रहे हैं। जहां वे तैनात नहीं हो पाए हैं वहां एक संघी बड़े वेतन पर उनका ओएसडी या पीआरओ बनाकर डिक्टेट करने के लिए उनके सर पर रखा गया है। कॉर्पोरेट को चंदा दो धंधा लो नीति के तहत खुलकर लूटने की छूट दे दी गई है। सरकारी ठेकों में कमीशन अब तक का सबसे अधिक वसूला जा रहा है। जिससे आए दिन पुल और एक्सप्रेस वे ध्वस्त हो रहे हैं।बेसहारा जानवर सड़कों पर मौत तो खेतों में किसानों की फसल तबाह कर रहे हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार पहले से कई गुना इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि वर्तमान सरकार भ्रष्ट अफसरों से मासिक लक्ष्य देकर बेशर्मी से वसूली कर रही है। 
          संघ परिवार वाले अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि विरोध करने वाले बेकसूर होकर भी जेल में सड़ते रहते हैं। काले धन से चुनाव जीते जा रहे हैं। बाद में जरूरत पड़ने पर विपक्षी विधायक सांसद भी ख़रीद लिए जाते हैं। राम नवमी कांवड़ यात्रा और आएदिन धार्मिक शोभायात्रा को इसी तरह के अकूत धन से फंडिंग भी की जा रही है। संघ बीजेपी ने फाइव स्टार ऑफिस बना लिए हैं। जहाजों से सफर कर रहे हैं। बड़े बड़े होटलों में ठहर रहे हैं। वे विरोध बिल्कुल सहन नहीं करते। इससे सत्ता जाने का खतरा है। विपक्ष को लेवल प्लेइंग फील्ड खत्म कर चुनाव जीतने से वंचित कर दिया गया है। कांग्रेस और विपक्ष की सरकारें चाहे कितनी भ्रष्ट और घमंडी रही हों लेकिन बीजेपी की तरह तानाशाह नहीं रहीं, वे जनता से ऊपर नहीं थीं। *यही वजह है कि सीजेपी समझ गई है कि व्यवस्था बदलनी है तो सत्ता को ही बदलना होगा। संघ बीजेपी सांप्रदायिक जातिवादी झूठी नफरती फासिस्ट और असमानता व अमानवीय सोच से चलती हैं जिनको सीजेपी ने ठीक से परखकर आरपार की जंग छेड़ने का मन बना लिया है। उनका नारा भी है। "मोदी जब जब डरता है, हिंदू मुस्लिम करता है।" इसलिये यह साफ़ है कि सीजेपी बीजेपी के जनविरोधी शिक्षा व रोज़गार विरोधी एजेंडे को बदलने के लिए उसके सत्ता से बेदखल होने तक सतत संघर्ष का इरादा कर चुकी है क्योंकि संघ बीजेपी युवाओं को ही नहीं सभी जनता को गुलाम अनुयायी और सेवक बनाना चाहते हैं और इसीलिए सरकार की बजाए उल्टा बार बार नागरिकों के कर्तव्यों का राग अलापता रहते हैं।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*