Wednesday, 15 July 2026

बेकाबू बाइकर्स

*आपकी बाइक है शौक से चलाओ,* 
*दूसरों के लिए आफ़त मत बनाओ*
       *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        आजकल जिस तरह से युवा मोबाइल के दीवाने हैं। उसी तरह से उनका दूसरा प्यार बाइक बन चुकी है। कुछ युवक युवतियां स्कूटर और स्कूटी भी चलाते हैं लेकिन बाइक चलाने वाले उनकी तुलना में कई गुना अधिक हैं। लोवर मीडियम और मीडियम क्लास जहां 75,000 से एक लाख तक की बाइक चलाते हैं, वहीं अपर मीडियम और अपर क्लास बहुत महंगी मॉडर्न और स्पोर्ट बाइक चलाते है। ये अन्य सुविधाओं के साथ ही स्टार्ट होते ही बहुत तेज़ स्पीड पकड़ लेती हैं। असली प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती हैं। फैशन और स्पीड का दीवाना युवा ये आधुनिक बाइक चलाते हुए पूरी सावधानी नहीं बरतता। वह हेलमेट नहीं लगाता, डी एल नहीं बनवाता, दो नहीं तीन नहीं चार चार साथियों को बाइक पर बैठाकर गली मुहल्ले में ही नहीं हाईवे और एक्सप्रेस वे पर भी निकल जाता है। खुद की जान के साथ सड़को पर पैदल या दूसरे हल्के वाहनों से जा रहे लोगों की जान भी खतरे में डालता है। कई बार एक्सीडेंट होते हैं। युवा जान से हाथ धो बैठते हैं। मातापिता लाड प्यार में नाबालिग बच्चों को भी टू व्हीलर की चाबी दे देते हैं जोकि नियम कानून ही नहीं उनकी अपनी सुरक्षा के लिए मुसीबत बन जाती है। बड़े चौराहों और राष्ट्रीय राज मार्गों पर तो कभी कभी पुलिस इन वाहनों की चेकिंग करके चालान काट भी देती है, लेकिन नगरो कस्बों गांवों के गली मोहल्लों में ये बाइक सवार युवा सरपट दौड़ते रहते हैं। इनके प्रेशर हार्न से बच्चे बुजुर्ग और बीमार सो नहीं पाते या सोते सोते चौंक कर बार बार जाग जाते हैं। ये अपनी बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर गैर कानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 
        इन अवैध साइलेंसर से बार बार पटाखा फूटने की दिल हिला देने वाली तेज़ आवाजें गूंजती रहती हैं लेकिन इन बेलगाम और बिगड़े हुए युवाओं की मौज मस्ती पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अव्वल तो गली मोहल्लों में इनको पुलिस पकड़ती ही नहीं है, अगर ये गलती से किसी व्यस्त चौराहे या हाईवे पर पकड़े भी जाते है तो अपने परिवार के रसूख का इस्तेमाल नहीं तो यातायात पुलिस की जेब गर्म और कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर चालान कटवाकर भर देते हैं या कभी कभी मौक़े से दुस्साहस दिखाते हुए भाग भी जाते हैं। कई नगरों में कई सड़कों पर बहुत ऊंचे स्पीड ब्रेकर होने या जाम लगा होने पर ये स्पीड काबू नहीं कर पाने से भयंकर टक्कर भी मार देते हैं और भाग जाते हैं। इन बिगड़े हुए युवाओं की इन लापरवाही मनमानी और खतरनाक बाइक स्टंट से नागरिक बहुत परेशान हैं। वे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों आश्रमों धर्मशालाओं में पूजा नमाज से लेकर अस्पताल में अमन सकून से इलाज तक नहीं करा पाते। स्कूल कॉलेज के बच्चे इनके हॉर्न और मोडिफाइड साइलेंसर के कर्कश असहनीय शोर से पढ़ भी नहीं पाते। 
        ऐसी बाइक पास से गुजरने मात्र से कई मासूम बच्चे महिलाएं और बूढ़े बुजुर्ग तो एक्सीडेंट के खौफ से बुरी तरह काँप जाते हैं या डिसबैलेंस होकर रास्ते में ही गिरकर चोट खा जाते हैं। इन बेकाबू बाइकर्स के डरावने कोलाहल से कभी कभी अवारा बेसहारा जानवर बौखलाकर रोड पर बेतहाशा दौड़ने लगते है जिससे पैदल या वाहन पर चलते दूसरे लोग उनकी ज़द में आकर बुरी तरह घायल या मौत का शिकार हो जाते हैं। कई बाइक और दूसरे वाहनों की प्रदूषण की जांच या तो बरसों तक होती नहीं या फिर वे फील गुड कराकर फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं, जिससे वे जिधर से निकलते हैं, उधर ज़हरीला धुआँ छोड़ते जाते हैं और लोग उनको बददुआ देते रहते हैं। इनकी इन बढ़ती समाज विरोधी शांति विरोधी और नागरिक सुरक्षा की दुश्मन हरकतों का कोई समाधान सरकार प्रशासन और पुलिस के पास अभी तक नहीं है। काश इन नौजवानों और उनके परिवार वालों को सिविक सेंस नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य बोध हो और वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार संवेदनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ा सकें जिससे वे अपनी बाइक को चलती फिरती आफ़त मुसीबत और यमदूत बनने से बच सकें।
*नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है*
(नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं)

अयोध्या चढ़ावा चोरी...

*अयोध्या चढ़ावा चोरी: वकील अपना काम नहीं करेंगे तो कानून अपना काम कैसे करेगा?*
          _*इक़बाल हिंदुस्तानी*
                    अयोध्या बार एसोसिएशन ने एलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के किसी आरोपी की कोई वकील कानूनी पैरवी नहीं करेगा। अगर एसोसिएशन के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई वकील ऐसा करता है तो उस पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जायेगा। हमारा कहना है कि अपराधी कोई भी हो उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन हर आरोपी अपराधी ही हो यह ज़रूरी नहीं होता। कानून के राज में जब तक कोई आरोपी अपराधी साबित नहीं हो जाता उसको किसी भी प्रकार से किसी भी स्तर पर किसी के भी द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार कितना ही गम्भीर अपराध का आरोपी हो उसको दंड दिए जाने से पहले अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने का कानूनी अधिकार दिया गया है। अयोध्या के अधिवक्ताओं के संगठन ने आरोपियों को कानूनी सहायता नहीं देने का जो फ़ैसला किया है, वह अपने आप में कानून के राज की मूल भावना के खिलाफ़ है। कानून की पढ़ाई, डिग्री और अदालत में प्रैक्टिस के लिए बार कौंसिल में रजिस्ट्रेशन से पहले प्रत्येक अधिवक्ता को शपथ पत्र देना होता है कि वह संविधान के अनुसार कानून का पालन करते हुए अपने पेशे के नियम के मुताबिक किसी जरूरतमंद को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं करेगा। इसके बावजूद कोई एक दो वकील व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि उनकी पूरी यूनियन एक आवाज़ में एक साथ एक प्रस्ताव पास करके अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा और दान चोरी के आरोपियों के केस कानूनी पैरवी के लिये लेने से खुले आम इन्कार कर रही है। 
              यहां यह स्पष्ट कर दें हमारा अभिप्राय इस मामले में यह बिल्कुल नहीं है कि चढ़ावा चोरी के अपराधियों को दंड नहीं मिले। हम चाहते हैं इस केस में जो भी अपराधी साबित हों उनको न केवल सज़ा मिले बल्कि कड़ी और शीघ्र सज़ा दी जाए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की निर्लज्ज और राम भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली घटिया हरकत करने से पहले सौ बार सोचे और चोरी करने से डरे व बचे। अजीब बात यह है कि कानून की पैरवी करने वाले वकील ही धार्मिक भावनाओं को संविधान से ऊपर रखकर आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान करने से मना कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस बारे में साफ़ और सख़्त स्टैंडिंग ऑर्डर हैं कि संविधान और न्यायपालिका के नियम अनुसार कोई वकील किसी आरोपी की पैरवी करने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते कि उसने उससे पहले ही दूसरे पक्ष का केस लड़ने को अनुबंध नहीं कर लिया हो। *2010 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ़ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने किसी भी बार एसोसिएशन के इस तरह के प्रस्ताव को गैर कानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। यह मामला कोयमबटूर के एक वकील और पुलिस वाले के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद अधिवक्ताओं ने पुलिस के मामलों की कानूनी पैरवी करने से मना कर दिया था। मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा वकीलों के इस फैसके को वकालत के प्रोफेशन के खिलाफ़ बताने के बाद बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट अपील में गई थी। *उत्तराखंड में एक वकील की हत्या के मामले में जब वकीलों ने आरोपियों को कानूनी सहायता देने से मना किया तो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रस्ताव गैर कानूनी बताते हुए हत्या आरोपियों की पैरवी करने से रोकने या इस दौरान कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने पर वकीलों को कोर्ट की मानहानि का केस दर्ज कराने की कड़ी चेतावनी दी थी।* 
            *इतना ही नहीं बार कौंसिल ऑफ इंडिया भी इस बारे में स्पष्ट कह चुका है कि कोई भी वकील किसी भी आरोपी को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं कर सकता।* बार कौंसिल का यहां तक कहना है कि वकील फीस भी केस की नेचर गंभीरता और स्तर के हिसाब से ले सकता है, इतनी नहीं मांग सकता जिससे आरोपी अनावश्यक और अव्यवहारिक मानकर भुगतान करने में असमर्थ हो और उसको जानबूझकर कानूनी बचाव से वंचित कर दिया जाए। कौंसिल का कहना था कि अगर एसोसिएशन के फैसले के खिलाफ जाकर कोई वकील किसी आरोपी का कोई केस कोर्ट में लड़ता है तो उस अधिवक्ता पर एसोसिएशन न तो कोई अर्थदंड लगा सकती है और न ही उसकी सदस्यता निरस्त की जा सकती है। 
            *संविधान का अनुच्छेद 22 (1) हर किसी को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का वकील अपने कानूनी बचाव में रखना चाहे तो वकील उसको कानूनी सेवाएं देने से इन्कार नहीं कर सकता। सेक्शन 14 हर भारतीय नागरिक को समान कानूनी अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता है तो आर्टिकल 39 ए राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। संविधान यहां तक कहता है कि किसी नागरिक को गरीब कमज़ोर अशिक्षित या विकलांग होने के कारण मुकदमे के दौरान कानूनी बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता और यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह असमर्थ होने पर आरोपी को सरकारी वकील कानूनी बचाव के लिए उपलब्ध कराए।* 
             अगर आज वकीलों के इस अवैध प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो कल डॉक्टर ऐसे आरोपियों के इलाज को यह कहकर मना करने लगेंगे कि आरोपियों ने उनकी धार्मिक भावना या अस्पताल पर हमला करके आहत किया है। दूसरे पेशे वाले भी उनके नक़्शे कदम पर चलकर देश में कानून की बजाए अराजकता की स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस गलत सिलसिले को यहीं रोकना ज़रूरी है। यही वजह है कि 26/11 के मुंबई हमले के पाकिस्तानी आरोपी अजमल कसाब को मौके से रंगे हाथ गोली चलाते हुए निर्दोष लोगों का खून बहाते हुए पकड़े जाने के बावजूद कोर्ट में केस चलाने के दौरान सरकार ने उसके कानूनी बचाव को अपने खर्च पर सरकारी वकील उपलब्ध कराया था। उसको बाद में कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से करते हुए फांसी की सज़ा दी, लेकिन देश विदेश में यह संदेश गया कि उसको वास्तव में अपराधी साबित होने के बाद ही मृत्युदंड दिया गया और सही न्याय हुआ।
              यह भी विडंबना और विरोधाभास ही कहा जाएगा कि अयोध्या के इन वकीलों ने ही दो जुलाई को राम जन्मभूमि थाने में ट्रस्ट से जुड़े कुछ बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज करने को तहरीर दी और आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों की आड़ में कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। वकीलों ने अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन भी किया लेकिन अब तक इनकी दी तहरीर पर कोई एफआईआर होने की अधिकृत सूचना नहीं है। खुद सरकार ने इस मामले में तब एसआईटी बनाई जब यह मामला सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके सार्वजनिक कर दिया। साथ ही कानून को अपना काम करने से रोकने या कुछ छिपाने के आरोप सरकार पर इसलिए भी लगने शुरू हुए क्योंकि उसने तत्काल एफआईआर करने की बजाए पहले एसआईटी बनाई। चर्चा है कि इस दौरान आरोपियों को चोरी का माल ठिकाने लगाने का अवसर मिल गया। अगर कानून को ठीक से काम करने दिया जाता तो पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती, फिर तत्काल आरोपियों को हिरासत में लिया जाता, उनसे सख्ती से पूछताछ होती, उनकी गिरफ्तारी होती, रिमांड पर लिया जाता, उनकी निशानदेही पर चोरी की रकम और दूसरी बेशकीमती सोने चांदी की भेंट की गईं चीज़ें बरामद की जाती, उनके घर दुकान और संपत्ति सील की जाती, उनके बैंक खाते सीज़ किए जाते, उनसे जुड़े लोगों पर नज़र रखी जाती और उनके घरों कार्यालयों व अन्य संबंधित भवनों की निगरानी भी की जाती जिससे वे अब तक चुराया गया चढ़ावा दान और उससे बनाई गई संपत्ति ज़ेवर और बैंक लॉकर से माल ठिकाने नहीं लगा सकें। 
             अंत में यही कहा जा सकता है कि ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी ऐसी पारदर्शी विश्वसनीय और अभेद्य व्यवस्था बनाने की थी जिसमें चोरी हो ही नहीं, लेकिन अगर मानवीय भूल तकनीकी चूक और व्यवहारिक गलती से चोरी का संगीन अपराध हो ही गया था तो ट्रस्ट सरकार पुलिस और वकीलों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे जनता में यह संदेश जाए कि कानून को अपना काम निष्पक्ष स्वतंत्र और संवैधानिक तरीके से नहीं करने दिया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने गंभीर और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करके राम भक्तों और आम आदमी को अच्छा संदेश नहीं दिया है। वहां एक माह से अधिक समय के बाद सुनवाई शुरू होने जा रही है।अभी भी समय है कि जनता का विश्वास कानून के राज में बहाल करने को इस मामले में त्वरित कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही को देश के तटस्थ धार्मिक संतों गणमान्य समाजसेवी और प्रतिष्ठित निष्पक्ष नागरिकों की एक कमेटी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज की अध्यक्षता में बनाकर निश्चित समय में जांच कराई जाए और दोषियों को कड़ा दंड दिया जाए। 
*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़*
*हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा*

Tuesday, 7 July 2026

सिया केतन और चेतन

*आज का विचार... इक़बाल हिंदुस्तानी*
*सिया, यह तू ने क्या कर दिया,*
 *ना नहीं की , मर्डर कर दिया?*
        पुणे की सिया पर आरोप है। उसने अपने मंगेतर केतन का अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर मर्डर कर दिया। वह साहस करके इस शादी को ना भी बोल सकती थी, लेकिन उसने दुस्साहस दिखाते हुए अपने होने वाले पति को खाई में धक्का दे दिया। हाल ही में इस तरह की और भी घटनाएं सामने आईं हैं। मेघालय में हनीमून के दौरान राजा रघुवंशी को विवाह के चौदह दिन बाद ही उसकी पत्नी ने मार दिया था। दिलीप यादव की सुपारी हत्या का आरोप है। मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत का ब्ल्यू ड्रम हत्याकांड पहले ही कुख्यात हो चुका है। सब्ज़ी विक्रेता धन्ना लाल सैनी की हत्या भी मीडिया में सुर्खियां बनी थीं। देहरादून का राजेश गुलाटी हत्या केस लोगों के दिमाग़ में अभी तक ताज़ा है।
        *एक सर्वे एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं और लड़कियों द्वारा अपने पतियों या प्रेमियों को खुद मार देने या सुपारी किलर से हत्या कराने के सालभर में 300 केस सामने आते हैं तो पतियों या प्रेमियों द्वारा पत्नियों और प्रेमिकाओं को इसी तरह क़त्ल करने के एक साल में 7000 मुकदमे दर्ज होते हैं। इस जानकारी से यह गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए कि लेडीज़ या प्रेमिकाएं बड़े पैमाने पर इस तरह की हत्याएं कर या करा रही हैं। सच यह है कि पुरुष प्रधान समाज में आज भी इस तरह के अपराध के मामलों में मर्द औरतों से बहुत आगे हैं।*
         हमारा मकसद यहां हत्यारी महिलाओं प्रेमिकाओं और पत्नियों को क्लीन चिट देना नहीं है, लेकिन इन चंद घटनाओं से यह निष्कर्ष निकालना कि अब महिलाएं पुरुषों की तरह क्रूर और ज़ालिम हो चुकी हैं, थोड़ा जल्दबाजी होगी। कुछ मामलों में प्रेमी प्रेमिकाएं जबरन अनचाहा रिश्ता होने से आत्महत्या भी कर लेते हैं। सिया केतन और चेतन का ही केस गौर से गहराई से और आराम से देखें तो पता चलता है कि सिया अपने माता पिता के असहनीय दबाव में इस अनचाही शादी के लिये ना बोलने का साहस नहीं दिखा पाई और उसने अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर केतन को कुछ इस तरह ठिकाने लगाने की साज़िश रची जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। लेकिन हुआ उल्टा। वह अपने अरबपति परिवार को इस शादी के लिए मना करके इसलिए भी नाराज़ नहीं करना चाहती थी क्योंकि वे उसे ऐसा करने पर अपनी संपत्ति घर और परिवार से अलग करने की चेतावनी दे रहे थे। वे परिवार की साख और सम्मान भी खराब होने की दुहाई दे रहे थे। सिया उनका दिल भी नहीं तोड़ना चाहती थी, लेकिन अपने प्रेमी को भी नहीं छोड़ना चाहती थी। वह भारी द्वंद्व और कशमकश में फंसी हुई थी। हमारा कहना है कि परिवार बच्चों को अच्छी समझ शिक्षा और संस्कृति सिखायें जिससे वे शादी के मामलों में उनकी बात मानें लेकिन अगर वे सहमत नहीं हो पाएं तो बेटे बेटियों को जबरदस्ती जान लेने या जान देने को कभी भी मजबूर नहीं करें।

Sunday, 5 July 2026

जनविरोधी फ़ैसले कैसे रुकेंगे?

*सरकारों के जनविरोधी फ़ैसले रोकने के सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो चुके हैं?*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी प्रॉपर्टी नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व जजों की सलाहकार कमेटी ही कर सकेगी। ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से यूपी गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी को अपराध की सज़ा मिले इससे कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन सरकार अपने किसी संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत दिए जेल में डाल दे यह कैसे कानून का राज माना जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं जिनमें आरोपी को जेल में रहकर खुद को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी ऐसे ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ प्रिवेंटिव तरीके अपनाए जाते रहे हैं जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों से लगातार आलोचना हुई है। बंगाल सरकार ने स्कूलों में मिड डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवा और शिक्षा में आरक्षण 17 से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईदे कुर्बान पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशु पालकों का भी भारी नुकसान किया था जो साल भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई के लिए करते हैं। टेलीग्राफ जैसे बड़े अखबार के एडिटर रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हुआ, जिससे वह अपनी बेटी की शादी तक में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से असंवैधानिक रोक लगा दी है, क्योंकि अनुमति मांगने पर अनुमति देने की बजाए ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंक विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनते थे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के राज में विपक्ष की सरकारों के जनहित के कानूनों को तो उसके राज्यपाल और यहां तक कि राष्ट्रपति तक सालों तक रोक कर बैठे रहते हैं लेकिन बीजेपी की राज्य सरकारों का कोई भी विवादित कानून वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना के बजाए उसके पक्ष में एक सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है। सबसे दुख और चिंता की बात तो यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और जब तब याची को हाईकोर्ट जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामले अनचाहे ढंग से सुनता भी है तो सालों तक टालता रहता है। उसके बाद बेंच के किसी जज का ट्रांसफर या रिटायरमेंट होने पर नई बेंच बना देता है। फिर लंबे समय तक वह बेंच फिर से पूरा मामला सुनती है। उसके बाद भी अकसर बेंच फैसले को सुरक्षित रख लेती है। इससे कई बार जब फैसला लंबे समय बाद आता भी है तो मूल मुद्दा ही खत्म हो चुका होता है। जैसे कई बार महाराष्ट्र सहित कई राज्य सरकारों सांसदों और विधायकों के चुनाव को लेकर हुआ है। वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और कोर्ट एक ही पेज पर नज़र आते हैं। हमारे चीफ़ जस्टिस कुछ भी दावा करें लेकिन उनके कई फैसले चीख़ चीख़ कर बोल रहे हैं कि वे फैसले जनता के कम सत्ता के पक्ष में अधिक झुके नज़र आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिए। एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं न्यूटल लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई साल से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उनको चार्जशीट दाखिल कर दोषी साबित नहीं किया गया है लेकिन बेल नियम जेल अपवाद कहने वाला कोर्ट उनको फिर भी ज़मानत नहीं देता है। सी ए ए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ उन्होंने शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उस दौरान ही सुनियोजित दंगा हुआ और उनको उनके साथियों सहित दंगे के आरोप में गम्भीर धाराएं लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है। महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवर को मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, नहीं तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू नहीं किए जाएंगे। यूपी में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के स्टैंडिंग ऑर्डर के बावजूद आरोपियों के घर पर तत्काल नियम विरुद्ध बुलडोजर चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियां उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाही करता है। देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मीट के साथ पकड़कर गौमांस बताया जाता है, पीटा जाता है, मॉब लिंच कर दिया जाता है, बाद में मांस की जांच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाऊस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर दुकान और दूसरी प्रॉपर्टी भी ध्वस्त कर दिए जाते हैं। नागरिकता साबित करने को लेकर एसआईआर में जिन प्रमाण पत्रों को मान्यता दी गई थी अब उनको भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट तक को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताकर नागरिकता साबित करने का डाक्यूमेंट होने से मना कर दिया है। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 कागज़ दिखाने के बावजूद भारतीय नागरिक मानने से मना कर दिया, जबकि इन कागज़ात में 1951 की वो एनआरसी भी थी जिसमें उसके दादा दादी का नाम मौजूद है। अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है लेकिन वहां के लिये महंगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात होती नहीं, दूसरे सबसे बड़ी अदालत भी ऐसे मामलों में लोगों को अकसर निराश ही कर रही है, इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है। कभी कभी कुछ हाईकोर्ट अपवाद स्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियां कर देते हैं जिनसे हल्की सी उम्मीद की किरण दिखती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही कई मुकदमे लोगों पर दर्ज हो जाते हैं। यूपी के कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि उस पर सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में 39 मुकदमे अब तक दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता विपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना प्रदर्शन तो दूर किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी हमें मिलने नहीं देती, ऐसा लगता है राज्य में इमरजेंसी लगी है। बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहां की सरकारों ने राज्यों की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट सुनवाई दौरान 27 लाख लोगों को अगली बार वोट दे देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों की मज़ाक भी उड़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो कोर्ट असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने को तैयार नहीं हो और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी नहीं करने दिया जा रहा तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है?

देर ना हो जाए कहीं...

*आज की बात... हिंदुस्तानी*
*इम्तेहान हो या प्लेन व रेल, कैसे बने समय से तालमेल?*
        पिछले दिनों हुई नीट की चर्चित परीक्षा में कुछ बच्चों को समय पर नहीं पहुंचने पर सेंटर में एंट्री नहीं मिली। इससे उनका पेपर छूट गया। उनका एक साल भी खराब हुआ और उनके परिवार का लाखों रुपया भी। इससे कुछ बच्चों ने आहत होकर अपनी जान भी दे दी। लेकिन यह कोई हल नहीं है। कुछ लोग ट्रेन से जाने के लिए भी रेलवे स्टेशन के लिए देर से पहुंचते हैं। ऐसा ही कई लोगों के साथ अपनी तय समय पर टेक ऑफ करने वाली फ्लाइट को लेकर भी होता है। बस छूटने पर तो लोग कुछ देर बाद दूसरी बस से निकल जाते हैं। लेकिन कारपोरेट कॉलेज हॉस्पिटल और कई जगह अब नौकरी करने वालों की हाज़िरी डिजिटल सिस्टम से लगती है। लेट जाने पर उस दिन उनकी छुट्टी लग जाती है या फिर काम पर लेने के बाद भी आधे दिन की सैलरी काट ली जाती है। बोर्ड के एक्जाम में भी देर से जाने वालों को पेपर छूटने पर फेल होने सप्लीमेंट्री आने या फिर से परीक्षा देने का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
      सवाल यह है इतना बड़ा नुकसान टेंशन और कैरियर को ख़तरा होने के बावजूद बच्चे शिक्षक और नौकरी पेशा लोगों के साथ आम आदमी भी बार बार क्यों लेट होते हैं? हम लोग पहले से गैप लेकर घर से क्यों नहीं निकलते, दूसरों का नुकसान देखकर भी सबक नहीं सीखते और खुद का एक बार कैरियर खराब होने पर भी अगली बार बदलाव नहीं करते। क्या हम लोग नहीं जानते कि घर से देर से या बिल्कुल क्लोज़ टाइम पर निकलने से हम अपनी मंज़िलों पर टाइम पर नहीं पहुंच पाएंगे। ट्रेन कैंसिल या लेट भी हो सकती है। क्या नीट जे ई ई और टेट जैसी परीक्षा हमारी वजह से निर्धारित समय से लेट की जा सकती हैं ? क्या ट्रेन और फ्लाइट किसी व्यक्ति विशेष के कारण देर से चलेंगे? क्या ऑफिस का डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम हमारी लेट लतीफी की वजह से हटा दिया जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर हम घर से टाइम पर नहीं निकले तो ग़लती किसकी है? अगर हमें टाइम पर रिक्शा नहीं मिली तो कौन जिम्मेदार है? अगर सड़क पर जाम लगा है तो कोई क्या कर सकता है? गलती चाहे सरकार पुलिस और सिस्टम की हो लेकिन ये ऐसे सवाल हैं जिनका हल खुद हमको ही तलाशना है। हल यह है कि हम समय से सोयें, समय पर उठने को एक नहीं दो दो अलार्म लगाएं, समय कम हो तो नाश्ता खाना और नहाना स्किप कर दें, रिक्शा नहीं मिले तो घर के वाहन से स्टेशन पहुंचे, परीक्षा ट्रेन और फ्लाइट के समय से एक दो घंटे पहले पहुंचने का प्लान बनाएं जिससे कुछ लेट भी हो जाएं तो समय पर एंट्री मिल जाए, अगर एक ही बस ट्रेन या फ्लाइट मंज़िल पर जाती हो तो एक दिन पहले पहुंच जाएं और किसी रिश्तेदार जान पहचान वाले या होटल में कमरा लेकर नाइट स्टे भी कर सकते हैं लेकिन देर से जाने का कोई बहाना नहीं चलेगा।

Thursday, 2 July 2026

कांग्रेस और मुस्लिम

*मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आने लगे क्या दलित पिछड़े भी आयेंगे?*
                 *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        सपा और कांग्रेस में यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर बयानबाजी तेज़ होती जा रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली और क्षेत्रीय दलों के प्रति उदारता न दिखाने पर नाराज़गी जताई है तो उधर कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा से कांग्रेस को बराबर सम्मान और सीट शेयर करने की दो टूक मांग की है। असम में बदरुद्दीन अजमल की ए आई यूडीएफ से लगभग आधा मुस्लिम वोट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ शिफ़्ट होने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ए आई यूडीएफ का 2021 का वोट 10 प्रतिशत से अधिक था जो इस साल घटकर 5.46 प्रतिशत रह गया। उसको कुल दो सीट मिली। कांग्रेस को वहां 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिला और उसने 19 सीट जीतीं जिनमें से 18 विधायक मुस्लिम हैं। दिल्ली में आपका मुस्लिम वोट 10.8 प्रतिशत घटा है और इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ गया है। *सीएसडीएस लोकनीति और मीडिया विश्लेषण से पता लगता है कि कांग्रेस को उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम 80 प्रतिशत तक, दलित 60 प्रतिशत तक आदिवासी 50 प्रतिशत तक और पिछड़े 30 से 40 प्रतिशत तक कुछ प्रदेशों तक सीमित हैं। जबकि उच्च जातियों में केवल उदार एवं सेक्युलर परिवार के गिने चुने लोग ही कांग्रेस को वोट करते हैं। इनका अधिकांश वोट बीजेपी या उसके घटकों को जाता है। कांग्रेस उच्च सम्पन्न और मध्य वर्ग में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। कांग्रेस का असर हिमाचल कर्नाटक तेलंगाना राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ केरला उत्तराखंड पंजाब में मुख्य दल के रूप में मौजूद है। इतिहास गवाह है कुछ राज्यों में कांग्रेस एक बार चुनाव हारी तो फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। मिसाल के तौर पर 1967 में तमिलनाडु 1977 में बंगाल 1989 में यूपी 1990 के दशक में बिहार और गुजरात में 1995 में महाराष्ट्र 2013 में दिल्ली 2016 में असम 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद वह इन राज्यों में आज तक सत्ता से बाहर है।*
            ऐसा नहीं है, मुस्लिम कांग्रेस से बहुत खुश है, बल्कि वह यह समझ गया है कि क्षेत्रीय और खास तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टियां बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती। इस बदलाव की शुरुआत दिल्ली में आप को छोड़कर कांग्रेस की तरफ गए मुस्लिम वोट के बड़े हिस्से से हो चुकी है। चर्चा है जिस तरह से आप के राज्यसभा सदस्य बीजेपी में गए हैं, इससे नाराज़ मुस्लिम वोट आगे चुनाव में आप को और अधिक छोड़कर कांग्रेस के साथ जुड़ेगा। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बंगाल में टीएमसी से छिटक कर जो 60 विधायक और 20 सांसद एनडीए यानी बीजेपी के समर्थन में गये हैं, उससे आगे मुसलमान बंगाल में भी ममता को छोड़कर राहुल की कांग्रेस या कुछ हिस्सा कम्युनिस्टों के साथ जुड़ सकता है। यही वजह है कि यूपी में सपा के सांसदों को तोड़ने की चर्चा फिलहाल ठंडी पड़ गई है। संघ इस राजनीतिक समीकरण को समझकर आशंकित है कि अगर अधिकांश मुस्लिम वोट से जीते सपा एमपी तोड़कर बीजेपी या एनडीए में लाए गए तो मुस्लिम आगे से सपा पर भरोसा न कर बड़ी संख्या में कांग्रेस या आंशिक रूप से आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए जन्मे दलों में दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाने को जा सकते है। बीजेपी के लिए यह समीकरण सबसे घातक माना जाता है। दरअसल मुस्लिम कांग्रेस सपा बसपा या आरजेडी जैसे किसी दल को जिताने के लिए कभी वोट नहीं देता है। वह तो हर उस सेक्युलर पार्टी को वोट देता रहा है जो भी बीजेपी को गारंटी से हरा सकता हो। यही वजह है उसको पार्टी बदलने में तनिक भी दिक्कत नहीं होती। मुस्लिम अब पूरे देश में महसूस कर रहा है कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को नहीं हरा सकते। उल्टा वे बीजेपी के दबाव में काम करते हैं। बीजेपी को बैकडोर से सपोर्ट तक कर देते हैं और सेक्युलर कांग्रेस का विरोध करते हैं। हद तो यह है कि जब लालच और दबाव ब्लैकमेल की सीमा तक पहुंच जाता है तो इन दलों के जनप्रतिनिधि टूट कर उसी बीजेपी में या उसके गठबंधन में चले जाते हैं जिसको हराने को मुस्लिम समाज ने इनको वोट दिया था। मुस्लिम जानते हैं कि अकेले उनके वोट से कांग्रेस वापस सत्ता में नहीं आ सकती, लेकिन वे इसकी पहल यह सोचकर कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल दलित और पिछड़े भी जब बीजेपी से नाराज़ होंगे तो कांग्रेस में आ सकते हैं।
            1989 से पहले का रिकॉर्ड देखें तो कांग्रेस का एक वोट बैंक हुआ करता था। जिनमें ब्राह्मण मुस्लिम और दलित समाज मुख्य रूप से शामिल थे। इस समीकरण के बल पर कांग्रेस ने देश और राज्यों में कई दशक तक एकक्षत्र राज किया। विडंबना यह रही कि फिर भी कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को स्थायी रूप से अपना बनाए रखने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। उल्टा हुआ यह कि सत्ता का अधिकांश लाभ पहले से ही सम्पन्न सक्षम और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा उच्च वर्ग यानी स्वर्ण जातियां विशेष रूप से ब्राह्मण लेते रहे। कांग्रेस ने दलितों मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने के लिए एक नकारात्मक काम किया। उसने संघ को फलने फूलने दिया। बीजेपी को सांप्रदायिकता की राजनीति करने दी। उसके राज में खूब दंगे हुए, हजारों लोग मारे गए, जिनमें मुस्लिम अधिक होते थे। उनके कारोबार तबाह कर दिए गए। घर जलाए गए। महिलाओं से बलात्कार हुए। महीनों कर्फ़्यू लगा रहता था। फिर दिखावे के लिए जांच आयोग बनते थे। उनकी कई साल बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती थी। कांग्रेस जानती थी दंगे होते नहीं, सुनियोजित तरीके से कराए जाते हैं। एक तरह से कांग्रेस आज की टीएमसी की तरह मुसलमानों दलितों को बीजेपी से डराकर वोट लेने की राजनीति कर रही थी। दलितों को वह बीजेपी के सत्ता में आने पर आरक्षण और संविधान खत्म होने का भय दिखाती थी। जब इससे भी काम नहीं चला तो कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को खुश करने के बदले हिंदूवादी लोगों को भी खुश करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना था। इससे सांप्रदायिक जिन्न बोतल से बाहर आ गया और धीरे धीरे कांग्रेस को पूरी तरह खा गया। *जहाँ तक पिछड़ों का सवाल है, उनकी आबादी 1931 की जातीय गणना के अनुसार 54 प्रतिशत मानी जाती है लेकिन कांग्रेस से अधिकांश पिछड़े दूरी बनाए रहे जो विकल्प मिलने पर बीजेपी के पाले में चले गए। इतिहास बताता है नेहरू सरकार ने पिछड़ों के आरक्षण पर 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था। आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सफारिश की लेकिन नेहरू ने जाति के आधार पर रिजर्वेशन नहीं देने की नीति के कारण इस को लागू नहीं किया। इसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग बनाया। इंदिरा सरकार को 1980 में 3743 पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की इस आयोग ने सिफारिश की लेकिन कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दस साल बाद वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार ने इन सिफारिशों को लागू किया।* इससे अधिकांश पिछड़ी जातियां कांग्रेस से विमुख हो गईं। क्षेत्रीय दल भी क्योंकि अलग अलग प्रदेशों में एक दो दबंग पिछड़ी जातियों का नेतृत्व अधिक कर रहे थे, ऐसे में अधिकांश पिछड़े बीजेपी के साथ हिंदुत्व के अभियान में शामिल हो गए। पिछले दिनों राहुल ने रायबरेली में आज़ादी की दलित योद्धा वीरा पासी की विशाल मूर्ति का अनावरण कर दलितों को सांकेतिक सम्मान दिया है। अब राहुल गांधी ने इस भूल को सुधारने के लिए जिस तरह संविधान दलित पिछड़ों के आरक्षण, जातीय जनगणना और संवैधानिक समानता की मांग उठानी शुरू की है, उससे आशा है कि दलित पिछड़े भी बीजेपी से निराश हुए तो कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं।

Sunday, 28 June 2026

घरेलू औरत

*आज की बात...हिंदुस्तानी*
*घरेलू औरत नहीं है बेकार,*
*उसके काम की वैल्यू 30 हज़ार*
          सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दुर्घटना मृत्यु के एक मामले में मुआवजा तय करते हुए घरेलू औरत के काम की कीमत 30,000 रुपए मासिक मानी है। साथ ही कोर्ट ने हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और अगर वो महिला कोई और काम भी करती हो तो उसकी कीमत अलग से जोड़ने को कहा है। 
     कुछ लोग केवल उन महिलाओं के काम की वैल्यू समझते हैं, जो घर से बाहर जाकर बिज़नेस या नौकरी करती हैं। उनका मानना है कि जो कमाकर नहीं लाता वो बेकार है। जबकि आप हिसाब जोड़ें तो महिलाएं घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। घर से बाहर काम करने वाले हर पुरुष के काम के घंटे तय होते हैं, छुट्टी भी मिलती है, वो खुद भी अवकाश लेता है और वह एक्स्ट्रा काम करता है तो उसको डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान भी होता है। जबकि घर की महिला को ऐसा कुछ नहीं मिलता। उसको पर्याप्त आराम भी नहीं मिलता। साथ ही उसकी नींद के घंटे भी कम हो जाते हैं। अगर आप उनके खाना बनाने नाश्ता बनाने बार बार चाय बनाने सफ़ाई कपड़े व बर्तन धोने प्रेस करने बिस्तर बिछाने बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल त्यौहार पर अतिरिक्त तैयारी करने, शादी बर्थडे या बच्चा पैदा होने पर एक्स्ट्रा काम का बोझ झेलने, बच्चों को होम वर्क कराने, उनको स्कूल छोड़ने और लेने जाने, उनकी माता पिता की और अपनी व कभी कभी पति की भी दवाई लाने, लाइन में लगकर सरकारी राशन लाने, पर्दे साफ़ करने, घर के जाले झाड़ने, सोफों के कवर बदलने, बच्चों के खिलौने संभालकर रखने, मेहमानों को अटेंड करने, टंकी में पानी भरने, घर का सामान खरीदने को लिस्ट बनाने, परिवार की तरफ़ से दूसरे रिश्तेदारों के लेनदेन का हिसाब रखने, सबके सोने पर लाइटें बंद करने, घर में पेंट होने पर सामान हटाने फिर सेट करने, बाज़ार से कपड़ों सहित घरेलू इस्तेमाल का सामान खरीदने आदि का बेतहाशा काम वो करती हैं।
       देश की जीडीपी में घरेलू महिलाओं के काम का 17 प्रतिशत योगदान माना जाता है। फिर भी लिंग के आधार पर महिलाओं के घरेलू काम को फ्री समझा जाता है और उनको बेकार। जबकि आर्थिक समानता के हिसाब से देखें तो सबको वेतन नहीं मिलने बावजूद घरेलू महिलाओं का घर के काम में जो योगदान माना गया है, उतना देश के आधे से अधिक पुरुष भी नहीं कमाते। घरेलू महिलाएं एक तरह से राष्ट्र निर्माता हैं। वे देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। ऐसी सभी महिलाओं को हमारा सलाम।

Sunday, 21 June 2026

पानी की वैल्यू समझिए

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*किफायत से खर्च करें पानी,* 
*वरना हो जायेगी परेशानी...*
         एक विद्वान ने कहा है। लोग चीज़ों की वैल्यू मिलने से पहले और उनके खोने के बाद ही समझते हैं। हम लोग जिस पश्चिमी यूपी में रहते हैं। उसको बहुत से वरदान कुदरत ने दिए हैं। उनमें से एक पर्याप्त पानी भी है। यही वजह है इस इलाक़े की खेती अच्छी है। घरों में भी जल निगम नगर निगम और स्थानीय निकाय भरपूर पानी सप्लाई करते हैं। कई शहरों में पानी मामूली टैक्स देकर अनलिमिटेड मिलता है। कुछ लोग इसका इसीलिए दुरूपयोग भी करते हैं। वे पानी भरकर नहीं रखते। टूटी खुली छोड़ देते हैं। पानी बेवजह बहता रहता है। वे पीने के इस पानी से अपने वाहन भी धोते हैं। अपने मकान दुकान के सामने खूब पानी का छिड़काव करते हैं। छतें भी बार बार पानी से धोते हैं। कुछ ने अवैध रूप से पालिका के पानी से व्यवसाय कर पैसा कमाने का रास्ता भी तलाश लिया है। कुछ घर के बाथरूम में घंटों नहाते रहते हैं। कुछ टॉयलेट के फ्लश को शौच के साथ ही पेशाब करने पर भी बार बार चलाते हैं। 
              कुछ शेविंग करते हुए वाश बेसिन का नल लगातार खुला रखते हैं। आर ओ में भी दो तिहाई पानी बर्बाद होता है। कुछ पानी भरने के लिए मोटर चलाकर भूल जाते हैं और घंटों पानी नाली में बहता रहता है। कुछ गमलों में वेस्ट पानी की जगह पेयजल ही डालते हैं। कुछ लोग छतें ठंडी करने को बहुत पानी रात को खुली हवा में सोने के लिये बर्बाद करते हैं। बर्तन धोने के लिए भी कुछ महिलाएं एक बार टूटी खोलकर तब तक बंद नहीं करती जब तक सब बर्तन नहीं धुल जाते। कुछ घर दुकान और सड़क को साफ करने की जगह सैंकड़ो लीटर पानी रोज़ डालते हैं। ऐसे लोगों से पानी वेस्ट न करने को कहो तो वे कहते हैं, हमारा वाटर कनेक्शन है, हम चाहे जितना पानी बहाएं आपको क्या प्रॉब्लम है। उनको कौन बताए ज़मीन के नीचे से आ रहा पानी उनका नहीं सब नागरिकों का है और लगातार वाटर लेवल नीचे जा रहा है। 
     *कम लोगों को पता है कि राजस्थान महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु और दिल्ली के कई इलाकों में ज़मीन के नीचे पानी पूरी तरह खत्म हो चुका है। यहां दो से पांच दिन में सरकारी और प्राइवेट टैंकर से पानी आता है। यहां प्रति व्यक्ति 20 से 40 लीटर पानी खरीदा जाता है। जबकि जरूरत 200 से 500 लीटर की होती है। यह पानी एक, डेढ़ से दो रुपए लीटर तक और कहीं कहीं 30 रु बोतल से 160 रु प्रति जार मिलता है। प्रति परिवार को 1500 से 8000 रु पानी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इसलिए आज और अभी से पानी का दुरुपयोग बंद कर दीजिये।*

Friday, 19 June 2026

योग दिवस

आज का विचार... हिंदुस्तानी 
*योग धार्मिक नहीं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है!*
              21 जून हर वर्ष योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पूजा पाठ नहीं बल्कि हर देश हर जाति और हर धर्म के मानने वालों के लिए वरदान है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में विभिन्न योग नियमित रूप से करने से न केवल शरीर बल्कि आपका मन भी निरोग और समग्र स्वास्थ्य लाभ होते हैं। योग से इंसान के दिल दिमाग़ को ऑक्सीजन की बेहतर सप्लाई होती है। उसके जिस्म के साथ उसके मन की कैफ़ियत भी बदलने लगती है। टेंशन ब्लड प्रेशर और दिल घबराने की शिकायत कम होने लगती है। योगा करने से पॉजिटिव सोच पैदा होती है। काल्पनिक डर सोच से दूर चले जाते हैं। समझ उदार होने लगती है। 
           संवेदनशील और संयमी व्यवहार भी योग से आने लगता है। समस्याओं से लड़ने की क्षमता और समाज के साथ मिलकर चलने की कला भी योग का बाई प्रोडक्ट माना जाता है।यह प्राचीन भारतीय परंपरा आसन, प्राणायाम, ध्यान और नैतिक अनुशासन पर आधारित है, जो शरीर और मन को संतुलित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे Johns Hopkins, Healthline, NCCIH आदि) के अनुसार शारीरिक लाभ में योग आसनों से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ लचीले बनते हैं और गिरने का खतरा कम होता है। पीठ दर्द, गठिया और जोड़ों की समस्या में राहत कई अध्ययनों में योग को पीठ दर्द और गठिया के लक्षणों को कम करने में प्रभावी पाया गया है। यह रक्तचाप कम करता है, सूजन घटाता है और हृदय रोग के जोखिम को कम करता है।श्वसन, ऊर्जा और चयापचय में सुधार के अनुसार बेहतर सांस लेने से ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ती है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। बेहतर मुद्रा, हड्डियों की मजबूती, नींद की गुणवत्ता में सुधार और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होना भी इसके लाभ हैं। तनाव, चिंता और अवसाद में कमी गहरी सांस और ध्यान से कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है, मन शांत रहता है।
       एकाग्रता, जागरूकता और भावनात्मक संतुलन बच्चों से लेकर वयस्कों तक फोकस बढ़ाता है और आत्म जागरूकता विकसित करता है। समग्र कल्याण के हिसाब से देखें तो नींद बेहतर होती है, मूड अच्छा रहता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
           स्वामी विवेकानंद, बी.के.एस. आयंगर, पट्टाभि जोइस जैसे योग गुरुओं ने इसे पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।संयुक्त राष्ट्र की भूमिका देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। इसे 175+ देशों ने समर्थन दिया। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे देशों में भी स्कूल-कॉलेज में योग आ चुका है। नियमित अभ्यास से ही पूर्ण लाभ मिलता है। लेकिन पहले से बीमार दर्द के शिकार और सीनियर सिटीजन को ट्रेनर से जानकारी करके ही योग करना चाहिए।
*ज़ाहिदे तंग नज़र ने मुझे काफिर समझा ।* *और काफिर ये समझते हैं मुसलमान हूँ मैं ।।*

यूसुफ़ पठान का दलबदल

*एक अनैतिक समाज में सिर्फ़ सेलिब्रिटी ही ईमानदार कैसे होगा ?*
             *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                      बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गई। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए?क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था? 
        यहां यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है? यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बे ईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताख पर रख दिया है।
       यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही है और इंसान हिंदू हो या मुसलमान कभी भी बे ईमान हो ही सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये ललचा ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलाट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है। विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद कल मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा। 
            यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है उनको पुलिस ईडी सीबीआई इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो। वह भी इसी देश इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बे ईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है। यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है अब उनका दलबदल भी उसी डर लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों सांसदों को क्या बे ईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है? यह भी हो सकता है वे आज़म ख़ान उमर खालिद नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के मुख्याओं का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो अगर कोई इंसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा। 
*"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"*

Sunday, 14 June 2026

रक्तदान दिवस

*करनी हैं बातें दो चार... हिंदुस्तानी*
*रक्तदान करने वाले हैं फरिश्ते,*
*जो खून देकर बनाते हैं नए रिश्ते*
       खून का एक रिश्ता पैदाइशी होता है, दूसरा कुछ लोग फ़रिश्ता बनकर ज़रूरत मंद लोगों को खून देकर बनाते हैं। पहला रिश्ता खुद बन जाता है तो दूसरा इंसान अपनी मर्ज़ी से बनाता है। आज के दौर में जब आदमी पैसे प्रॉपर्टी या सेक्स के लिये किसी की जान लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है, ऐसे में कुछ इंसानों का बिना किसी स्वार्थ के रक्तदान करना और किसी अंजान इंसान की जान बचाना फरिश्ते से कुछ कम नहीं है।
      सरकारी ब्लड बैंक की बात करें तो ज़िले में उसकी क्षमता 350 यूनिट है। लेकिन वहां इस समय 119 यूनिट ही खून उपलब्ध है। उनमें भी केवल 79 यूनिट की जांच हुई है जो तत्काल किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है। इसके बदले पैसा नहीं किसी भी ग्रुप का उतने ही यूनिट खून देना होता है। आंकड़े बताते हैं खून की मांग हमेशा उपलब्ध खून से ज़्यादा बनी रहती है। ज़िले में 80 बच्चे थैलीसीमिया रोग के शिकार हैं। जिनको महीने में दो बार अनिवार्य रूप से ब्लड चढ़ाना होता है। इसके बदले वापस खून देने की कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा एक्सीडेंट ऑपरेशन और एनीमिया के मरीजों को भी समय समय पर खून देना होता है। इस ब्लड बैंक में सबसे कम मिलने वाला ए नेगेटिव,ओ नेगेटिव, और एबी नेगेटिव खून सिर्फ एक से तीन यूनिट ही मौजूद है।
      सरकारी स्तर पर जो लोग ब्लड बैंक का प्रबंध करते हैं उनको उसका बाकायदा वेतन मिलता है। सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस बड़ी मानव आवश्यकता सेवा और जनरक्षा को देखते हुए इसमें प्राइवेट संस्थाएं समाजसेवी संगठन और दयालु नागरिक भी सहयोग करने लगे हैं। ज़िले की कई निजी ब्लड बैंक संस्थाओं में नजीबाबाद ब्लॉक की हाजी फहीम अख्तर की टीम भी शामिल है, जो अब तक 2000 यूनिट से ज़्यादा खून डोनेट करा चुकी है। इसमें शैलेंद्र चौधरी जैसे कई अन्य लोगों का भी भारी सपोर्ट है। ज़िले में पचास से अधिक बार खून देने वालों में विकास सेतिया, राहुल राजपूत, नवेद फरीदी शामिल हैं। वहीं नहटोर के महबूब शेख 27 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनको एक बार अपनी बच्ची की जान बचाने को खून की ज़रूरत पेश आई थी, तब से वे अपनी बेटी के जन्मदिन पर हर बार रक्तदान कर रहे हैं।
     रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों (जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) की निरंतर जरूरत के बारे में लोगों को बताना। स्वैच्छिक रक्तदाताओं को सम्मान दिया जाना चाहिए। नियमित दान को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। दुनिया में सुरक्षित रक्त की कमी बनी रहती है, खासकर विकासशील देशों में। इस दिन नए रक्त दाताओं को जोड़ने और मौजूदा दाताओं को नियमित बनाने का प्रयास किया जाता है।14 जून की तारीख को रक्तदान दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिन के अवसर पर चुना गया है। वे ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1901 में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप)। इसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। इन्हें आधुनिक रक्तदान का "पिता" माना जाता है। इतिहास देखें तो 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संगठनों (Red Cross, IFBDO, ISBT) ने इसे शुरू किया। 2005 में WHO की विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे वार्षिक वैश्विक कार्यक्रम बना दिया।
हर साल एक नया थीम चुना जाता है, जैसे "One Drop of Humanity. Give Blood. Save Lives." 2026 के लिए टैग लाइन है।
*ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों, बनों में फिरते हैं मारे मारे,मैं उसका बंदा बनूँगा जिसको, ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा।*

Tuesday, 9 June 2026

कांग्रेस बनाम अवसरवादी क्षेत्रीय दल

*अवसरवादी क्षेत्रीय दल इंडिया गठबंधन की ताकत नहीं कमज़ोरी हैं?*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है, यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।*
        सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और राहुल गांधी सोनिया गांधी ने ठीक ऐसा ही करते हुए अपने विधायकों और सांसदों की बगावत का शिकार लगातार कमज़ोर होती जा टीएमसी को इंडिया गठबंधन की बैठक में पूरे मान सम्मान से शरीक कर लिया। कांग्रेस भूल गई यह वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने कांग्रेस को बंगाल में तोड़कर टीएमसी बनाई थी। इतना ही ममता ने 2016 में कांग्रेस के जीते 44 और लेफ्ट के 32 विधायकों को भी तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया था। इसके बाद कांग्रेस के एकमात्र एमपी अधीर रंजन चौधरी को बहरामपुर से हराने के लिए दीदी गुजरात से क्रिकेटर यूसुफ़ पठान को ले आई और तमाम तिकड़मों से उनको हराकर ही दम लिया। इससे पहले दीदी कांग्रेस को झटका देने के लिए वाजपेयी सरकार में केंद्र में मंत्री बन गयीं थी। इतना ही नहीं दीदी ने 2011 का चुनाव जीतने से पहले बकायदा पत्र लिखकर बीजेपी से लेफ्ट और कांग्रेस को खत्म करने के लिए मदद मांगी। बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह वाजपेयी के निर्देश पर बंगाल गये और टीएमसी बीजेपी की इस बारे में व्यापक योजना बनी। फिर एक सोची समझी रणनीति के तहत दीदी ने एक के बाद कदम उठाते हुए लेफ्ट और कांग्रेस को बंगाल में पूरी तरह हाशिए पर पहुंचा दिया। उनके कार्यालयों पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को सताया गया और बीजेपी की शाह मोदी शैली अपनाते हुए उनको टीएमसी में आने को मजबूर किया गया। कुछ को बात नहीं मानने पर जेल भेजा गया, कुछ का कारोबार तबाह कर दिया गया। दीदी समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। ऐसे लोगों के लिये ही शायर ने कहा है....
*उसके होंठो की तरफ़ न देख वो क्या कहता है,*
*उसके कदमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।*

Monday, 8 June 2026

रियाजउद्दीन गद्दे वाला


*आज के माहौल में रियाजउद्दीन जैसे लोग फ़रिश्तों जैसे ही हैं*
              आज हम देखते हैं अधिकांश लोग इतने आत्ममुग्ध और असंवेदनशील होते जा रहे हैं कि थोड़े से फायदे के लिये किसी की जान ले लेते हैं या ज़रा सा त्याग करना पड़ जाए तो मुंह फेरकर निकल जाते हैं। लेकिन संतोष की बात यह है कि दूसरों के लिये अपना अब कुछ न्योछावर करने वाले रियाजउद्दीन जैसे संत लोग भी इसी दुनिया में मौजूद हैं।
            रियाजुद्दीन मंसूरी मालवीय नगर दिल्ली के हौज रानी इलाके में गद्दे और रजाई की दुकान चलाते हैं। वे पिछले चालीस साल से वहाँ रहते और व्यापार करते हैं। उनके बेटे अरमान भी उनके साथ काम करते हैं। वे सिविल डिफेंस वॉलंटियर भी हैं।
        पिछले दिनों 4 जून को जब इलाके के मशहूर फ्लोरिश स्टे होटल में जब आग लगी तो कुछ लोग जान बचाकर भाग गए, कुछ ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी लेकिन रियाजउद्दीन ने मुसीबत के टाइम भी अपने होश हवास पर काबू रखते हुए वो किया जो वो कर सकते थे।
          मालवीय नगर के हौज रानी में पांच मंजिला होटल में जिस समय भीषण आग लगी। तो लोग जान बचाने के लिए खिड़की से मदद मांग रहे थे। उस समय अफरातफरी का माहौल था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि जब तक फायर ब्रिगेड और सरकारी सहायता नहीं पहुंचे तब तक इतनी बड़ी सीढ़ी कहां से लायें और इन लोगों की जान कैसे बचाएं। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई ,और अनेक जख्मी भी हुए हैं।मरने वालों में कई विदेशी मेहमान भी शामिल थे। होटल के सामने ही रियाजुद्दीन की रज़ाई गद्दों की दुकान है। जब लोग ऊपरी मंजिलों से धुएँ और लपटों से बचने के लिए खिड़कियों से कूदने को मजबूर हुए, तब रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके बेटे अरमान ने तुरंत अपनी दुकान से दो दर्जन से अधिक गद्दे और रजाइयाँ निकालकर सड़क पर बिछा दीं। इससे कूदने वालों को गंभीर चोटों से बचाया गया।
      रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने कम से कम 8 से 10 लोगों की जान बचाई कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस संख्या को 20 तक भी बताया गया है। लेकिन यहां तादाद का सवाल नहीं है बल्कि रियाजउद्दीन की नीयत इरादे और इंसानियत की भावना का है। उन्होंने उन मृतकों को ढकने के लिए चादर भी उपलब्ध कराईं। जिनको तमाम कोशिशों के बावजूद जलने दम घुटने के कारण मरने से बचाया नहीं जा सका।
       मानवता के इस नेक काम में अगर आर्थिक नुकसान की बात करें तो रियाज़उद्दीन के लगभग दो से चार लाख रुपये के गद्दे रजाई का इस्तेमाल हुआ या जल गये, लेकिन उन्होंने इसकी फ़िक्र न करते हुए कहा कि “इंसानियत के लिए आगे आए, कुछ जानें बच पाईं, यही सबसे बड़ी बात है।”
 ख़बर है कि उन्हें सरदार पटेल सेवा दल जैसी संस्थाओं ने सम्मानित किया है और एक लाख रुपये की सहायता राशि दी गई है। समाजसेवी इंसानियत पसंद और आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले लोग उनके लिए सरकार से पर्याप्त मुआवजे की मांग भी कर रहे हैं क्योंकि उनका नेक काम के दौरान व्यापारिक नुकसान हुआ। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनको सम्मानित करने और पुरस्कृत करने का ऐलान भी किया है, लेकिन यह नहीं पता आज की राजनीति के चलते यह काम कब होगा या होगा भी नहीं?
        यह घटना इंसानियत और साहस की मिसाल बन गई है। रियाजुद्दीन जैसे आम नागरिकों ने दिखाया कि संकट के समय कोई भी फरिश्ता बन सकता है।
रियाजउद्दीन ने शायर की इस सोच को ताज़ा कर दिया है...
*ग़मो की आँच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग जो किसी पर भी डालकर देखो, तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो।*

Thursday, 4 June 2026

बेटी की शादी बनाम बेटी की जान

*क्या बेटी की शादी बचाना उसकी जान बचाने से ज़्यादा ज़्ारूरी है?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
          भोपाल की ट्विशा शर्मा की हत्या या आत्महत्या तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि यह मामला न तो पहला है न ही आखि़री। हम इस बात पर भी अधिक ज़ोर नहीं देंगे कि दहेज़ की नाजायज़ मांग और नहीं मिलने पर बहु को सताना असहनीय यातनायें देना और अंत में क्रूरता की सारी सीमायें पार करते हुए उसको मार डालना हमारे समाज में कितना आम हो चुका है। हमारा सवाल यह है कि जब ट्विशा के माता पिता को यह बात साफ साफ पता लग चुकी थी कि उनकी बेटी को ससुराल में तरह तरह से परेशान किया जा रहा है और उसकी जान को ख़तरा है। तब भी वे अपनी बेटी को तलाक दिलाकर घर लाने की बजाये उसके घर आने पर बार बार समझाकर उसके ससुराल मौत के मुंह में क्यों भेज रहे थे? अगर ट्विशा के परिवार वाले कम शिक्षित या बेहद गरीब होते तब भी यह माना जा सकता था कि वे उसकी शादी फिर से करने के लिये इतना धन नहीं जुटा सकते थे। लेकिन ट्विशा का मामला इस कैटेगिरी मंे भी नहीं आता है। उसकी शादी डेटिंग एप के द्वारा समर्थ से दिसंबर 25 में हुयी थी। 12 मई 2026 को छह माह बाद ही ट्विशा ससुराल में फंदे से लटकी मिली। समर्थ एक वकील है जबकि उसकी मां ज़िला जज के पद से रिटायर हुयी थी। आरोप है कि ट्विशा की सास बेटे की पसंद की वजह से अतंर्जातीय विवाह को मजबूर हुयी लेकिन बहु को धार्मिक मंत्र याद नहीं होना और उसको बिना बताये घर से बाहर जाना स्वीकार नहीं था। सवाल यह है कि जो महिला ज़िला जज के पद पर रह चुकी हो और उससे न केवल दूसरे लोगों को न्याय देने की आशा की जाती हो बल्कि उससे अपनी सोच समझ और दृष्टिकोण प्रगातिशील तार्किक और विवेकशील होने की अपेक्षा की जाती हो वह भी इतनी दकियानूसी अंधविश्वासी और अमानवीय कैसे हो सकती है?
       बताया जाता है कि उसकी सास को अपनी बहु का अपनी मां से बहुत बात करना और उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता कोई और होने का भी शक था। ये सब विवाद बहस और आरोप ट्विशा के परिवार को भी पता थे। जिनको लेकर अकसर उसके घर में झगड़ा होता था। लेकिन ट्विशा के घर वाले उसको हर बार यही समझाते थे कि वह संयम से काम लो प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। ट्विशा ने अपने परिवार को यह भी बताया था कि उसका पति न केवल ड्रग लेता है बल्कि गुस्से में इतना बेकाबू हो जाता है कि वह उसके साथ किसी दिन कोई भी बड़ी अनहोनी कर सकता है। लेकिन उसके घर वाले उसको फोन पर मिलने पर और मायके आने पर हर बार यही समझाते रहे कि उसको अपनी ससुराल में ही एडजस्ट करना है। यानी एक तरह से उन्होंने अपनी बेटी की जान की कीमत पर भी उसके लिये घर वापसी के दरवाजे़ पूरी तरह बंद कर दिये। उन्होंने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि एक बार बेटी घर से डोली में जायेगी तो फिर उस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी। इसका मतलब बेटी के साथ उसके ससुराल वाले कुछ भी अनर्थ और अन्याय अत्याचार करें लेकिन बेटी को उसके माता पिता घर वापस लाने की बात सोच भी नहीं सकते। हैरत और दुख की बात यह रही कि बेटी ने बार बार न केवल मौखिक सीधे मिलकर बल्कि व्हाट्सएप चैट में भी ससुराल में अपनी जान को ख़तरा बताया लेकिन ’’कन्यादान’’ करने वाला समाज असंवेदनशील बना रहा। कुछ लोग शादी को सात जन्मांे का संबन्ध बताते हैं। लेकिन वे यह नहीं मानते कि शादी एक जुआ भी है। जिसका होने के बाद ही पता चलता है कि सही हुयी या गलत। अगर हम यह बात स्वीकार कर लें कि हमसे रिश्ता चुनते हुए गल्ती भी हो सकती है तो उसको तलाक दिलाकर खत्म किया जा सकता है। जिस शादी में कुछ महीने बाद ही यह बात पता लग गयी थी कि न केवल पति नशेड़ी और गुस्सैल बल्कि ट्विशा की सास भी बहुत पुराने विचारों दकियानूसी और सख्त मिज़ाज की महिला है, उसमें किसी अनहोनी के होने की प्रतीक्षा करने की क्या ज़रूरत थी?
         हालांकि यह सच है कि लड़की चाहे उच्च शिक्षित हो अमीर हो या फिर बहुत कमाने वाली बड़े पद पर आसीन हो लेकिन अगर एक बार उसका तलाक हो गया तो समाज उसको ‘सेकेंड हैंड’ की संज्ञा देकर उसका पक्ष न जानकर उसकी दूसरी शादी के विकल्प कम कर देता है। साथ ही अगर उसके साथ कोई बच्चा भी मौजूद हो तो उसकी दूसरी शादी और भी कठिन हो जाती है। जबकि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता है। यही हमारे समाज को दोगलापन अन्याय और पक्षपात है। तलाकशुदा और साथ में पहले पति से बच्चे वाली की तो बात ही क्या है अगर किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार हो जाये और उसमें उसकी ज़रा भी गल्ती नहीं हो तब भी समाज उसकी शादी तो दूर उसके साथ ही उसके परिवार का जीना भी हराम कर देता है। ट्विशा के मामले का एक दुखद पहलू यह भी है कि उसके केस से एक बार फिर साबित हुआ कि कानून सबके लिये बराबर नहीं है। पहले तो उसके केस को आत्महत्या बताकर पुलिस ने तीन दिन तक पूर्व जिला जज उसकी सास के दबाव में एफआईआर ही नहीं लिखी। बाद में जब तीन दिन बाद रपट लिखी भी तो पुलिस ने उसके परिवार की तहरीर के बजाये अपने हिसाब से हल्की धाराओं और कमज़ोर आरोपों के साथ खानापूरी की। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सास अपने रसूख के बल पर कुछ ही घंटों मंे ज़मानत हासिल करके आराम से अपने घर चली गयी। इतना ही नहीं पुलिस ने उसके आरोपी पति को फरार होने का पूरा मौका दिया। बाद में ट्विशा के सेना में जनरल भाई ने जब रिटायर सैन्य कर्मियों के संगठन को यह सब बताया तो उन्होंने पुलिस प्रशासन और शासन के खिलाफ मोर्चा खोलकर रिपोर्ट तरमीम कराई, दोबारा ट्विशा की डैडबाॅडी का पोस्टमार्टम हुआ और उसकी सास की ज़मानत खारिज कर केस की जांच सीबीआई को दे दी गयी। इसके साथ ही भागने का कोई रास्ता न बचता देख उसके पति समर्थ ने भी कोर्ट में सरेंडर कर दिया। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने उसको और उसकी मां पूर्व जज को रिमांड पर लेकर उस सख्ती और थर्ड डिग्री से पूछताछ नहीं की जिसके लिये हमारी पुलिस पहचान रखती है। शायर कहता है- तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी, जो शाख़ ए नाजु़क पे आशियाना बनेगा ना पायेदार होगा।
*नोट- लेखाक पत्रकारिता और आकाशवाणी से चार दशक से अधिक समय से जुड़े हुए हैं।*

Thursday, 28 May 2026

मॉडर्न बहु

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*लोगों का काम है कहना,* 
*आपका हक़ है ज़िन्दा रहना*
            अब तक सुना पढ़ा था बच्चे ने फेल होकर प्रेमी प्रेमिका ने प्यार में धोखा खाकर या किसी ने कर्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर ली। लेकिन अपनी पुत्र वधु स्नेहा के मॉडर्न लाइफ़ स्टाइल से आहत होकर सास ससुर ने हरियाणा में अपनी जान दे दी। इसके पीछे की वजह जानकर आपको भी दुख होगा। हैरत भी होगी। हुआ यह कि स्नेहा दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी एक खुले विचारों की लड़की है। स्नेहा की लव मैरिज हरियाणा के पानीपत के गांव नारा निवासी आशीष के साथ परिवार की सहमति से ही हुई थी। आशीष अपने माता पिता राजेश और पत्नी सुमन का इकलौता बेटा है। चूंकि स्नेहा मॉडर्न परिवार से थी और गांव के माहौल में ढलना नहीं चाहती थी। सास-ससुर को उसके छोटे कपड़ों से परेशानी थी। उसके पहनावे और रहन-सहन को लेकर अक्सर घर में टोका-टाकी होती थी। सुमन और राजेश चाहते थे कि बहू सूट और साड़ी पहने, लेकिन स्नेहा को यह रोकटोक मंजूर नहीं थी। 
      जिसकी वजह से परिवार में अक्सर झगड़ा होता रहता था। पिछले दिनों फिर इसी बात को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ, जिसके बाद स्नेहा के सास ससुर राजेश और सुमन ने विषैला सल्फ़ाज़ खा लिया। दोनों को इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। एक ही घर से दो अर्थियां उठने से पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। 
         सुसाइड की खबर मिलते ही मौके पर पहुंची पुलिस ने बहू पर सुसाइड के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। परिजनों ने बताया कि बहू दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी थी और वह शादी के बाद गांव के माहौल में ढलने को किसी कीमत पर भी तैयार नहीं थी। तलाक़ ही एक रास्ता था जिसके लिए पति तैयार नहीं था। 
      उसका पति भी उसको अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने के पक्ष में था। वह दिल्ली का कल्चर छोड़ना नहीं चाहती थी। उसके पहनावे और रील्स बनाने के शौक को लेकर अक्सर सास ससुर और गांव वाले टोका-टाकी करते थे, जो धीरे-धीरे बड़े क्लेश का रूप लेने लगा। सवाल यह है कि आप जिस परिवेश में रहते हैं जिस सोच के हैं और जिस जीवन शैली को पसंद करते हैं उसके जैसी ही बहु लानी चाहिए, लेकिन क्योंकि लड़के ने सोशल मीडिया पर प्रेमिका बनी लड़की से अपनी पसंद से लव मैरिज की थी तो सास ससुर को शादी की सहमति नहीं देनी थी। अगर आपका लड़का नहीं मानता तो आपको उससे संबंध तोड़ लेने थे या सीमित कर लेने थे। अपने लड़के और मॉडर्न बहु को कहीं शहर में रखना था। 
     अगर गांव में रखना मजबूरी थी तो लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह नहीं करनी थी क्योंकि लोगों का काम है कहना, और आपका हक़ है सम्मान के साथ ज़िंदा रहना। गांव हो या शहर हर किसी को अपने हिसाब से शादी करना अपने तरीके से जीना और अपनी पसंद के कपड़े व खाना बुनियादी अधिकार है। इस अलग राय सोच और समझ को लेकर झगड़ा करना गांव वालों के ताने सुन कर अपमानित महसूस करना और यहां तक कि जान दे देना ठीक नहीं माना जा सकता। सास ससुर को हर हाल में ज़िंदा रहने का उसी तरह अधिकार है जैसे बहु को अपने छोटे कपड़ों और खुले विचारों के साथ जीना पसंद रहा है। अंजुम रहबर का एक शेर याद आ रहा है...
*उसकी पसंद और थी मेरी पसंद और,*
*इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा।*

कुरबानी का जज़्बा

*आज का विचार*
    _इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सिर्फ़ जानवर ज़िबाह मत कीजिये, क़ुर्बानी का जज़्बा भी पहचानिये..*
     मुसलमान साल में दो त्यौहार खासतौर पर मनाते हैं। एक ईद उल फ़ित्र और दूसरा ईद उज्जुहा। इस ईद को ईद ए क़ुर्बान या बकराईद भी कहा जाता है। इस ईद पर साहिब ए हैसियत मुसलमान जानवर की कुर्बानी देते हैं। जानवर के मीट के तीन हिस्से बनाए जाते हैं। एक खुद रखते हैं दूसरा अपने परिचितों को देते हैं और तीसरा ग़रीब और ज़रूरतमंदों को भेजा जाता है। जिस तरह हज के लिये जायज़ कमाई ज़रूरी है, वैसे ही क़ुरबानी के लिए हलाल पैसा खर्च करना शर्त है। इसके साथ ही आप पर किसी का कर्ज़ नहीं होना चाहिए। जो असली बात लोग भूल जाते हैं वो यह है कि जानवर की क़ुरबानी देने के साथ आपके दिल में अल्लाह की राह में इंसानियत मुल्क और आपसी रिश्तों को बचाने के लिए भी क़ुर्बानी का जज़्बा होना चाहिए। यह नहीं हो सकता आप हज़रत इब्राहीम की रस्म पूरी करने के लिए अल्लाह की राह में जानवर तो क़ुर्बान करें लेकिन अगर अपने सगे भाई पड़ौसी या हमवतन के लिए अपने पैसे जायदाद या किसी भी तरह के हित की थोड़ी से कुर्बानी देने की ज़रूरत आए तो पीछे हट जाएं। कुरबानी का मकसद अपनी हसद लालच हिंसा टकराव गुस्सा झूठ जुर्म और नफ़रत जैसी तमाम बुराइयों को भी कुरबान करना होता है। अगर सरकार कह रही है सड़क पर नमाज़ मत पढ़ो तो यह जानते हुए भी कि दूसरे धर्म के लोगों को ऐसा नहीं कह रही है, हम इसलिए रोड पर इबादत नहीं करेंगे क्योंकि इससे राहगीरों को आने जाने में तकलीफ़ होती है और अपने किसी भी मज़हबी काम से किसी को तकलीफ़ देना इस्लाम ने मना किया है। बाक़ी लोग क्या करते हैं और सरकार उनको क्यों करने देती है यह मुसलमानों का मामला नहीं है। मुसलमानों को अच्छी बातें सीखनी हैं उनपर अमल करना है और दूसरे लोगों से बेहतर मिसाल पेश करनी है। ऐसे लोगों के लिए ही शायर ने कहा है_
*मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,*
*उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक़ याद किया।*

Tuesday, 26 May 2026

पाक में हिंदू नाम बहाल


*क्या पाकिस्तान अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है?*
        पाकिस्तान में हाल ही में  मुख्य रूप से लाहौर (पंजाब) में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। ये बदलाव पंजाब सरकार की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के नेतृत्व में विभाजन से पूर्व काल के मूल नामों को बहाल करने के लिए किए गए हैं।
     मुख्य बदलाव लाहौर में किए गए हैं। जिनमें इस्लामपुरा को कृष्णा नगर, बबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक, मुस्तफाबाद को धर्मपुरा सुन्नत नगर को संत नगर,रहमान गली को राम गली,हामिद निजामी रोड को टेम्पल स्ट्रीट, निश्तर रोड को ब्रैंड्रेथ रोड , फातिमा जिन्ना रोड को क्वीन्स रोड, अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड किया गया है।
      अन्य प्रस्तावित और बदले जाने वाले लक्ष्मी चौक, मोहन लाल बाजार, भगवान पुरा, शांति नगर आदि अभी बाकी हैं लेकिन इन पर भी शासन को प्रशासन की ओर से प्रस्ताव बनाकर भेजे जा चुके हैं। आशा की जाती है ये भी जल्दी ही पुराने सांस्कृतिक नामों से जाने जाएंगे। कुल मिलाकर 9 से ज्यादा जगहों के नाम पहले ही बदले जा चुके हैं, और 15 से अधिक और नामों को बदलने की योजना विचाराधीन है।
       सवाल यह है कि पाकिस्तान जैसे कट्टर इसलामिक मुल्क में इन जगहों के नाम क्यों बदले गए? दरअसल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बहाल करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हिंदुस्तान के बंटवारे के समय सबसे अधिक तकलीफ़ देह विभाजन लाहौर जैसे विश्व प्रसिद्ध महानगर का हुआ था। वहाँ विभाजन से पहले मुस्लिम हिंदू जैन और सिखों की मिली जुली संस्कृति विकसित हुई थी लेकिन बंटवारे ने इसको दो टुकड़ों में अलग अलग कर दिलों का भी विभाजन कर दिया। लाहौर विभाजन 1947 से पहले कई धर्मों और ब्रिटिश काल की विविधता वाला शहर था। वहां की सरकार ने इस मिली जुली कल्चर को खत्म करने के लिए कई गैर मुस्लिम नामों को बाद में इस्लामी उर्दू और अरबी नामों से बदल दिया गया था। लेकिन नाम बदलने से पुरानी यादें सभ्यता और परम्पराएं कभी भी कहीं भी खत्म नहीं होती, वे कुछ समय के लिए दब जाती हैं या छिप जाती हैं। बताया जाता है कि पिछले दिनों जो नाम बदले गए हैं वे लाहौर हेरिटेज रिवाइवल प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की यह महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन अपने सीएम और पीएम रहते वे इसको परवान नहीं चढ़ा सके थे। अब यह अहम और ऐतिहासिक काम उनकी बेटी और पंजाब की पहली महिला सीएम मरियम नवाज़ ने किया है।  इसका मकसद पर्यटन को बढ़ावा और शहर की पुरानी पहचान को फिर से जीवंत करने का भी बताया जाता है, लेकिन इसके लिए न केवल प्रांतीय सरकार को अपना दिल बड़ा करना पड़ा है बल्कि योजना को लागू करने में वहां के कट्टरपंथी भी आड़े आ रहे थे। इतना ही नहीं कई आतंकी और संकीर्ण सोच के संगठनों तो पंजाब सरकार से फिर से वही मुस्लिम नाम रखने की ज़ोरदार मांग भी की है और उनकी बात नहीं माने जाने पर आंदोलन और हिंसक कार्यवाही धमकी दी है। सरकार का कहना है कि वह कट्टर तत्वों के दबाव में नहीं आयेगी क्योंकि यह सांस्कृतिक संरक्षण है, न कि कोई राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए की गई व्यक्ति विशेष या पार्टी की कार्यवाही।
       पाकिस्तान जैसे कट्टर संकीर्ण और हिंसक गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले मुल्क में ये क्रांतिकारी उदार और सेक्युलर बदलाव आजकल दुनियाभर में काफी चर्चा में हैं। कुछ लोग इसे अपनी जड़ों की ओर लौटने वाला बड़ा सकारात्मक कदम यानी इतिहास की बहाली मान रहे हैं, तो कुछ विरोधी इसे कुफ्र भारतीय हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने वाला विवादास्पद काम भी बता रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एशिया में भारत पाकिस्तान या बंगलादेश कोई भी मुल्क हो, इनकी सभ्यता संस्कृति और परंपराएं एक ही रही हैं। यह ठीक है कि लोग समय समय पर धर्म बदलते रहते हैं लेकिन उनके पुरखों पूर्वजों और बुजुर्गों की जीवन जीने की शैली वही रहती है, जो हज़ारों साल पहले थी, इसलिए संस्कृति साहित्य और समाज की समृद्ध यादों को साझा विरासत मानकर अपनाया जाना चाहिए जैसा कि पाकिस्तान ने अपनी छवि कट्टर सोच और गैर मुस्लिम तौर तरीकों के विरोध के बावजूद आज सदबुद्धि आने पर किया है, शायद भारत भी अगर बहुसंख्यक राजनीति के ध्रुवीकरण के दौर से एक दिन निकला तो पाकिस्तान की इस उदार सोच का स्वागत करेगा और अपनी उसी पुरानी उदारता धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता को अक्षुण्ण बनाये रखेगा जो उसने हज़ारों साल से बनाए रखकर दुनिया के सामने बेहतरीन मिसाल पेश की है।शकील जमाली का एक शेर याद आ रहा है_
 *पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम,*
*दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं।*

Wednesday, 13 May 2026

चिड़िया का बच्चा

*आज का विचार*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*चिड़िया_का_बच्चा_चाइनीज़_मांझा और हमारा परिवार...* 🤔
कुछ दिन पहले हमारे घर में एक पौधे पर एक खूबसूरत चिड़िया ने घोंसला बनाया। उसके बाद उसने अंडे दिए। उसके बाद एक बच्चा पैदा हुआ। चिड़िया उसकी देखभाल कर ही रही थी। हम लोग भी आंधी या बारिश में उस घोंसले पर कपड़े सुखाने का स्टैंड लगाकर उस पर प्लास्टिक की शीट डाल देते थे। चिड़िया उस मासूम बच्चे के लिए अक्सर अपने मुँह में कीड़े लाती थी और अपने बच्चे को खिलाती थी। कभी कभी चिड़िया बहुत देर से आती या पूरी रात नहीं आती तो बच्चे के भूखा होने और लगातार बोलने पर मेरा बेटा या बेगम उसको चावल या दूध खिलाने पिलाने की कोशिश करते थे। एक छोटी कटोरी में पीने को पानी भी रख दिया था। अभी तक सब ठीक चल रहा था। बच्चा धीरे धीरे बड़ा हो रहा था। उसके पर भी निकलने लगे थे। उड़ने की तैयारी कर रहा था। आँखे खोलता था। मां खाना लाती तो फौरन मुंह खोलता था। ऐसा लगता था उसकी आवाज़ से जैसे चिड़िया के देर से आने की मासूम शिकायत कर रहा है ।अचानक एक दिन उसकी चिड़िया मां जब खाने को कुछ लाई। उसके मुंह में उस खाने को डाल दिया। पता लगा आए दिन लोगों की गर्दन और हाथ काटने को बदनाम चायनीज़ मांझा भी उस खाने के साथ उलझा हुआ था। वही हुआ जिसका डर था कि खाना निगलने से पहले ही मांझा चिड़िया के बच्चे के मुंह में फंस गया। मासूम बच्चा दर्द से चिल्लाने लगा। उसके बोलने की आवाज़ में दर्द की असहनीय तकलीफ़ सुनकर ही महसूस हो रही थी। मैं ने जैसे ही वो मांझा बच्चे के मुंह से निकालना चाहा देखा तो उसके मुंह में जीभ के साथ चिपका हुआ था। इसी दौरान उसकी मां चिड़िया ने बच्चे को खतरा देख मेरे सर पर हमला करना चाहा और ज़ोर ज़ोर चीखना शुरू कर दिया। फिर मेरे बेटे ने चिड़िया के वहां से जाने का वेट करने को कहा। चिड़िया कुछ देर बाद उड़ गई। फिर बेटे ने बड़ी फुर्ती से बच्चे के मुंह में फंसा मांझा छोटी कैंची से काटकर निकाल दिया। इसके बाद बच्चा नॉर्मल हो गया। चिड़िया भी वापस घोंसले में आकर उसके साथ सहज होकर बैठ गई। उसके लिए जो खाना लाई वो बच्चा आराम से खा रहा है। दोनों खुश हैं और इधर हमारा पूरा परिवार भी चिड़िया और उसके बच्चे की खुशी से सकून से है। बच्चे के मुंह से मांझा निकालने और बच्चे व चिड़िया के नॉर्मल हो जाने से ऐसा सुख मिला मानो किसी फैमिली मेंबर का ऑपरेशन कामयाब हो गया हो। चिड़िया जब जब घर में आती है, चहचहाती है, उसका बच्चा बोलता है, तो घर में ऐसे रौनक हो जाती है जैसे परिवार का कोई बच्चा जब खिलखिलाता है तो परिवार खुशी से भाव विभोर हो जाता है। परिंदों की भी अपनी दुनिया है लेकिन जब वे कभी कभी कुछ टाइम के लिए हम इंसानों के साथ रहने लगते हैं तो उनके सुख दुख भी हमारे खुशी ग़म हो जाते हैं। यह हमने इससे पहले भी कई बार शिद्दत से महसूस किया है। आपने भी कभी कभी ऐसा ही महसूस किया होगा। अगर हम में इंसानियत मुहब्बत और संवेदनशीलता है तो हम इंसानों का नहीं सभी जीवों का दर्द और खुशी महसूस कर सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जिसमें पूरी कायनात के जीव मिल जुलकर दुख सुख साझा करके और एक दूसरे की मदद कर के आराम से प्यार से सह अस्तित्व के साथ रह सकते हैं। 
मनव्वर राणा का माँ बच्चे पर लिखा एक शेर याद आ रहा है_*खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,*
*बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही।*

वामपन्थ कभी खत्म नहीं होगा...

*जब तक शोषण अन्याय रहेगा, तब तक वामपंथ भी रहेगा!* 
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
            देश में पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी थी। संयोग की बात है कि पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के चुनाव में देश के एकमात्र राज्य केरल में बची वामपंथी सरकार भी हार गयी। इसी के साथ ही वामपंथ के चिरपरिचित विरोधी साम्प्रदायिक और पूंजीवादियों ने झूठा राग अलापना शुरू कर दिया कि अब भारत से कम्युनिस्ट विचारधारा हमेशा के लिये खत्म हो गयी। यह उनका बचकाना नादान और मूर्खतापूर्ण दावा है कि भारत ही नहीं दुनिया से कभी कम्युनिस्ट विचारधारा खत्म हो सकती है। उनको पता होना चाहिये कि वामपंथी सोच का अस्तित्व और जन्म मज़दूर किसान गरीब कमजोर दलित और अल्पसंख्यकों के शोषण अत्याचार अन्याय के खिलाफ हुआ है। ज़ाहिर बात है कि जब तक दुनिया और हमारे देश में भी ये सब असमानतायें कमियां और बुराइयां मौजूद हैं तब तक उनके खिलाफ लड़ने की इंसान की इच्छा शक्ति लक्ष्य और सपना भी जीवित रहेगा। इसलिये वामपंथ का कभी अंत नहीं होगा। जब दशकों तक जनसंघ और बीजेपी सत्ता में नहीं आई तो क्या संघ की विचारधारा देश से खत्म हो गयी थी? नहीं क्योंकि विचारधारा का सत्ता से सीधा सरोकार नहीं होता है। अंग्रेजी में एक शब्द विलफुल थिंकिंग है। यह उन दावों के लिये इस्तेमाल होता है। जिनमें आदमी उस तरह की सोच का शिकार होता है जैसा वह देखना चाहता है। सामने सच और हकीकत कुछ और होते हुए भी वह उसको झुठलाता है। मिसाल के तौर पर हिंदुओं का एक वर्ग खुद को सर्वश्रेष्ठ और विश्वगुरू मानता है तो वह वास्तविकता इससे विपरीत होने पर भी इस कल्पना में ही जीता रहता है कि वह जो मानता है वही हो रहा है और वही होगा। ऐसे ही मुसलमानों का कट्टरपंथी तबका अपने इस्लाम को दुनिया का सबसे बेहतरीन मज़हब बताता है और यह भी दावा करता है कि दुनिया में एक दिन सब लोग मुसलमान होंगे और इस्लाम का राज होगा जबकि हकीकत से यह दावा बिल्कुल उल्टा है। ऐसा होने के दूर दूर तक आसार भी नहीं हैं। लेकिन वह हर घटना हर जंग और हर बात को इसी से जोड़कर खुशफहमी में जीता है। जब सोवियत संघ का पराभव हुआ उस समय भी नवउदारवादियों ने दुनिया से वामपंथ की अंतिम विदाई का समूह गान किया था, लेकिन रूस तो फिर से खड़ा हो गया। साथ ही वह दुनिया की पांच वीटो पाॅवर वाले परमाणु शक्ति वाले देशों के क्लब में भी बना हुआ है।
          इतना ही नहीं आज वामपंथी चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को अमेरिका से होड़ कर रहा है। वह तकनीक हथियार और नये नये क्षेत्रों में दुनिया की महाशक्तियों को चुनौती दे रहा है। अपने देश में निर्मित सस्ते माल से चीन ने दुनिया के तमाम देशों को पाट दिया है। दुनिया के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें चल रही हैं। यह ठीक है कि भारत में पश्चिमी बंगाल के बाद त्रिपुरा और अब केरल से कम्युनिस्ट सरकार की विदाई हो गयी है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि बंगाल में सबसे अधिक लंबे समय तक सरकार चलाने का रिकाॅर्ड भी कम्युनिस्टों के नाम 34 साल का है। केरल में बारी बारी से कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन वामपंथी सरकार को रिप्लेस करता रहा है। लेकिन आप तीनों राज्यों में देखें तो भूमि सुधार सार्वजनिक शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था विकेंद्रीयकरण साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिये सामाजिक चेतना सहित मज़दूरों को न्यूनतम सम्मानजनक वेतन गरीबों को जीवन यापन के लिये भूमि बेरोज़गारों को रोज़गार मिलने तक गुजारा भत्ता आदि जनहित की अनेक योजनायें वामपंथियों की देन रही है। केरल में एलडीएफ की सरकार की हार के बाद यह पहला मौका है कि वामराज के एक दौर पर फिलहाल विराम लगा है। लेकिन यह समझना भूल होगा कि अब कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं होगी। यह सच है कि 1977 के बाद देश में पहली बार किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है। यह याद रखना चाहिये कि 1957 में जब केरल में पहली बार नंबूदरीपाद के वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे तब वह भारत के ही किसी राज्य नहीं दुनिया में पहली चुनी हुयी कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया बने थे। नंबूदरीपाद देश के पहले गैर कांग्रेसी सीएम भी थे। उनकी सरकार को तत्कालीन केंद्रीय कांग्रेसी नेहरू सरकार ने बिना किसी ठोस कारण के दो साल बाद ही बर्खास्त कर दिया था। लेकिन उन्होंने बार बार चुनाव जीतकर केरल को सबसे अधिक साक्षर और मानव मूल्य विकास में अग्रणी बना दिया था। बंगाल में वामपंथी मुख्यमंत्री ज्योति बसु भूमि सुधार पंचायती राज और राजनैतिक स्थिरता के साथ सबसे लंबे समय 23 साल तक राज करते रहे। उनको 1996 में देश में संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिल रहा था लेकिन कम्युनिस्टों की अपने बहुमत से ही पीएम बनने की ज़िद ने भारतीय राजनीति को नई दिशा देने का स्वर्णिम अवसर खो दिया जिसको बाद में वामपंथी इतिहास की हिमालय जैसी भूल माना गया। वर्ना आज देश की राजनीति का रूप रंग कुछ और ही होता।
         यह भी एक सच है कि बदलते हालात के हिसाब से कम्युनिस्ट नहीं बदले और भारत की जाति व्यवस्था को स्वीकार करने की बजाये वर्ग संघर्ष को ही प्राथमिकता देकर पंूजीवाद का लगातार विरोध करते रहे जिससे वामपंथी राज्यों में पूंजी निवेश घटता गया और रोज़गार घटने से प्रति व्यक्ति आय का मुकाबला अन्य राज्यों से करने में समस्या आने लगी। संसद में भी एक दौर था जब कम्युनिस्ट सांसदों की संख्या 60 से अधिक थी लेकिन अमेरिका से परमाणु संधि पर विवाद के बाद कम्युनिस्टों ने यूपीए की मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके साथ ही यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कभी मुख्य विपक्ष बनकर रहने वाले कम्युनिस्ट जाति और धर्म की राजनीति का वर्चस्व बढ़ने पर धीरे धीरे किनारे होते गये। भारत के लोगों में कम्युनिस्टों को लेकर उनके नास्तिक होने का भी सियासी नुकसान हुआ क्योेंकि भारतीय मूल रूप से धार्मिक और अंधविश्वासी होते हैं जबकि वामपंथी धर्म को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में लाने के खिलाफ रहे हैं। साथ ही यह भी रिकाॅर्ड है कि कम्युनिस्टों के राज में एक भी मंदिर मस्जिद नहीं तोड़ी गयी ना ही किसी धर्म के मानने वालों को उनके पूजा या नमाज़ जैसी किसी गतिविधि से रोका गया लेकिन चुनावी राजनीति महंगी और जाति व धर्म आधारित होते जाने से भी वामपंथी खुद को हाशिये पर जाता देखते रहे। सबसे बड़ी कमी उनकी यह रही कि उन्होंने समय रहते लोगों को प्रगतिशील विवेकशील तर्कशील और वैज्ञानिक सोच का नागरिक बनाने को कोई विशेष सांस्कृतिक सामाजिक और चेतना व जागरूकता का सघन अभियान नहीं चलाया जिससे संघ व बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता में आने और लोगों के दिमाग पर मीडिया के ज़रिये कब्ज़ा करने का मौका मिल गया। लेकिन यह भरोसा रखना चाहिये कि जब तक समाज में असमानता पक्षपात और अन्याय है तब तक वामपंथी सोच को दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती, भारत भी इसका अपवाद नहीं है। शायर ने कहा है- *मेरे बच्चे तुम्हारे लफ्ज़ को रोटी समझते हैं, ज़रा तक़रीर कर दीजिये कि इनका पेट भर जाये।* 
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से हिंदी पत्रकारिता और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हैं।*

Thursday, 7 May 2026

टीएमसी की हार

*बंगाल में टीएमसी की हार, ममता खुद भी ज़िम्मेदार?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
   *0 इसमें कोई दो राय नहीं पांच राज्यों में आये चुनाव नतीजे बंगाल से काफी अलग हैं। इसके कारण भी अलग अलग हैं। एसआईआर भी इन पांच राज्यों सहित अब तक देश के कुल 14 राज्यों में हो चुकी है लेकिन जिस तरह से बंगाल में 27 लाख लोगों को चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस कारण के वोट डालने से रोक दिया, उससे यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया कि मतदाता सरकार चुनते हैं बल्कि अब आप कह सकते हैं कि सरकार उन मतदाताओं को चुन रही हैं जो उसको सत्ता में लाने के लिये वोट कर सकते हैं। साथ ही एक पेटर्न आप इन चुनाव नतीजों में और देख सकते हैं कि ममता चाहे अपनी हार का एकमात्र कारण चुनावी धांधली बेईमानी और पक्षपात बतायें लेकिन वह राज्य में बीजेपी को स्पेस देने के साथ कैसे इस हार की खुद भी ज़िम्मेदार हैं, सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस लेख में हम तथ्यों और प्रमाणों के साथ आपको बतायेंगे।*
        राजनीति के जानकार बताते हैं कि जो दल नेता या गठबंधन कभी न कभी बीेजेपी के साथ अपने स्वार्थ में यह जानने के बाद भी जुड़े हैं कि उसका रास्ता गलत है, उनको देर सवेर भाजपा ने खत्म कर अपने अंदर समा लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर टीएमसी पीडीपी बीजू जनता दल जनता दल यू बसपा शिवसेना जननायक जनता पार्टी अकाली दल और अप्रत्यक्ष रूप से के चंद्रशेखर राव जगन मोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल जैसे नामों की एक लंबी सूची बन सकती है जो कभी न कभी बीजेपी से अपने अवसरवादी सिध्दांतहीन और परंपरागत मूल्यों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ में जुड़े और आज बीजेपी उनको निगल गयी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी की हार में केंचुआ का एसआईआर के बहाने वोट चोरी के साथ ही उनकी सरकार के खिलाफ पनप रहा जन असंतोष उनके कैडर का कट मनी वसूलना और उनके खिलाफ 15 साल की एंटी इनकम्बैंसी भी का भी रोल रहा है लेकिन सबसे बड़ी वजह जो लोग भूल चुके हैं। वह यह है कि ममता बनर्जी ने जो बोया आज उनको वह काटना पड़ा है। 29 साल पहले 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस नाम से वरिष्ठ बंगाली नेता मुकुल राय के साथ मिलकर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी परंपरागत विरोधी कांग्रेस और वामपंथी दलों को खत्म करने और अपने मुस्लिम वोट बैंक को डराकर बीजेपी को बंगाल में प्रवेश कराने में हर तरह का सहयोग दिया। बीजेपी जो पहले से ही कम्युनिस्टों और कांग्रस की विरोधी नहीं शत्रु की सीमा पार करके उनका नाम ओ निशान मिटाना चाहती थी, को बिन मांगी मुराद पूरी करने का अवसर मिल गया। मौका मिलते ही बीजेपी ने टीएमसी के संस्थापक सदस्य और ममता के राइट हैंड समझे जाने वाले मुकुल राय पर छापा मारकर उनको बीजेपी में ले लिया।
         इसके बाद ममता खुद 1999 में एनडीए सरकार में शामिल होकर रेल मंत्री बन गयी। जबकि यहीं से उनका राजनीतिक पतन शुरू हो गया। 2001 में रक्षा सौदों में कमीशन खाने का स्टिंग सामने आने पर वह कथित नैतिकता की दुहाई देकर अपना पद त्याग कर एनडीए से अलग हो गयीं। उसके बाद 2001 में ममता ने बीजेपी को अपनी स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में एनडीए में लौटने की संभावना व्यक्त की। 2003 में ममता फिर से एनडीए सरकार में बिना विभाग की मंत्री बन गयीं। इसी साल ममता ने आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के एडिटर तरूण विजय की वामपंथी आतंक पर लिखी गयी किताब के विमोचन समारोह में अपनी हाज़िरी लगाई। संघी अख़बार के संपादक ने उनको बंगाल की दुर्गा बताकर हाथो हाथ राजनीतिक हिसाब बराबर कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ संघी लेखक और राज्यसभा सांसद बलवीर पंुज ने ममता को सदन में ‘‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं’’ कहकर नवाज़ा। इतना ही नहीं बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ हिंसक संघर्ष में टीएमसी और संघ एक ही पेज पर खुलकर आ गये। ममता ने संघ से मेलजोल बढ़ाते हुए आरएसएस के मोहन भागवत मदन दास देवी और शेषाद्रि चारी को सच्चा देशभक्त बताया। 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता की सादगी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में शामिल हैं, जो सियासत का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये नहीं करते हंै। इसके बाद हालांकि ममता ने यह ज़ाहिर किया कि वह बीजेपी संघ और एनडीए से दूरी बना चुकी हैं लेकिन तमाम विरोध असहमति और आपत्ति के बावजूद जब संसद में सीएए के खिलाफ मतदान की बारी आई तो टीएमसी के आठ सांसद गायब हो गये और एनडीए का यह विवादित विधेयक बिना पर्याप्त सांसदों के आराम से पास हो गया।
         ममता ने संविधान विरोधी विधेयक रोकने को न तो पार्टी का कोई व्हिप जारी किया और न ही पार्टी लाइन से हटकर लापता होने वाले आठ सांसदों के खिलाफ कोई अनुशासन की कार्यवाही ही की। 2021 में मुकुल राय बीजेपी से टीएमसी में आ गये और बोले बीजेपी और टीएमसी दोनों एक सी ही पार्टी हैं। ममता उनके इस बयान पर भी चुप रहीं। जुलाई 2022 में वाइस प्रेसिडंेट के इलैक्शन में ममता की पार्टी ने अचानक विपक्ष की साझा उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का विरोध कर अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी की बी टीम होने का एक और प्रमाण दे दिया। सियासत के जानकार यह देखकर हैरत में पड़ गये कि जिन जगदीप धनकड़ ने बंगाल का राज्यपाल रहते ममता सरकार का काम करना दूभर कर दिया था उनको ही जिताने के लिये टीएमसी सदन में उनके खिलाफ वोट न करके अप्रत्यक्ष मदद करने को कैसे तैयार हो गयी? ममता बनर्जी बार बार इंडिया गठबंधन को भी धोखा देती रही हैं। बंगाल में उनकी पार्टी की हार पांच प्रतिशत वोटों से हुयी है लेकिन दोनों अलग अलग लड़कर सात प्रतिशत वोट लेने वाले इंडिया गठबंधन के घटक कांग्रेस और कम्युनिस्टों को उन्होंने बार बार प्रस्ताव देने के बावजूद कभी साथ मिलकर लड़ने की हामी नहीं भरी। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहां ममता की हार के लिये केंचुआ और मोदी सरकार का खुला पक्षपात बे ईमानी और हर र्मार्चे पर उनको घेरना है वहीं ममता का संघ और बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक फासिस्ट और नफरत की सियासत करने वाली पार्टी से कभी खुलकर तो कभी छिपकर अनैतिक सियासत करना आज उनको अन्य बीजेपी सहयोगियों की तरह खा गया है। शायर ने कहा है- तू किसी और से ना हारेगा, तुझको तेरा ग़रूर मारेगा, तुझको दस्तार जिसने बख़्शी है, तेरा सर भी वही उतारेगा।
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से पत्रकारिता शायरी लेखन अख़बार संपादन और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हुए हैं।*

Tuesday, 5 May 2026

मज़दूर असंतोष

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

बंगाल में बीजेपी

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

Wednesday, 29 April 2026

राकेश अग्रवाल जी

*चंद्रा_कत्था_इंडस्ट्रीज_के_स्वामी_राकेश_अग्रवाल जी_नहीं_रहे*😢
नजीबाबाद जिला बिजनौर यूपी, स्थित चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के एम डी, चंद्रा ग्रुप के मुखिया स्व. श्री सुभाष चंद अग्रवाल के छोटे भाई पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ समाजसेवी स्व. नरेशचंद्र अग्रवाल के भतीजे , रामलीला कमेटी के संरक्षक और वरिष्ठ समाजसेवी व सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री राकेश कुमार अग्रवाल का 23 मार्च की रात दुखद निधन हो गया है। वे आगामी 10जुलाई को पूरे 75 वर्ष के होने वाले थे। उनको मंगलवार सुबह 10 बजे नजीबाबाद उनके स्टेशन रोड स्थित निवास चंद्रा हाउस पर लाया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के नमामि गंगा घाट पर 25 मार्च को 11.30 बजे होगा। #उनकी_शवयात्रा_सुबह_9_30_बजे_उनके_रेलवे_स्टेशन_रोड_स्थित_निवास_चंद्रा_हाउस_से_चलेगी।
     श्री अग्रवाल चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के साथ ही मानसरोवर बॉटलिंग कंपनी, मानसरोवर पेपर मिल, चंद्रा केमिकल, चंद्रा फ्रेगरेंस आर सी ए लीजिंग जैसी चंद्रा ग्रुप की अन्य अनेक कंपनियों के डायरेक्टर रहे और सीकेआई छाप कत्था कच्छ के साथ ही उनकी कंपनी के दिलरुबा पान मसाले ने देश विदेश में अपनी बेहतरीन इमेज बनाई जिससे नजीबाबाद को भी प्रसिद्धि मिली। उनकी थम्सअप फैक्ट्री के प्रोडक्ट भी अपने विशेष स्वाद के लिए पूरे भारत में मशहूर हुए और कई बार विले पार्ले ग्रुप मुंबई से एमबीसीएल को इसके लिए विशेष पुरस्कार मिले। उन्होंने गैर हिंदी भाषी देशों और भारत के राज्यों में हिंदी के लिए विशेष सेवा करने वाले विद्वानों को कई साल तक माता कुसुम कुमारी सम्मान देकर भी नजीबाबाद का नाम रोशन किया जिसकी चर्चा आकाशवाणी और दूरदर्शन से होने से लोग नगर व जनपद को अलग से पहचानने लगे थे। उनके चंद्रा ग्रुप से न केवल कई कंपनी बल्कि बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा हुए जिससे नगर का विकास हुआ।
      राकेश जी कुछ माह से बीमार चल रहे थे। वे दिल्ली के एक बड़े हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनका वहां जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर्स गहन चिकित्सा कक्ष में इलाज कर रहे थे। इससे पहले उनका उपचार कुछ समय तक मुंबई के अस्पताल में भी हुआ था। स्वास्थ्य कुछ बेहतर होने के बाद उनको दिल्ली स्थित उनके राजधानी वाले फ्लैट पर शिफ्ट कर दिया गया था। इस दौरान वे डॉ के परामर्श पर समय समय पर ट्रीटमेंट के लिए चिकित्सालय जाते रहते थे। एक सप्ताह पूर्व उनकी तबियत अधिक खराब हुई तो उनको अस्पताल में एडमिट कर दिया गया था। जहां उनका आईसीयू में रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर इलाज कर रहे थे। भर्ती होने के बाद उनकी तबीयत में विशेष सुधार नहीं हुआ और वे दिन ब दिन कमज़ोर होते गए। बेहतरीन डॉक्टर शानदार सुविधाओं वाले अस्पताल और हर संभव दवा के द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने पर भी उनको बचाया नहीं जा सका और उन्होंने सोमवार की रात 9.10 बजे अंतिम सांस ली। 
उल्लेखनीय है कि राकेश जी का व्यवहार परिवार कंपनी स्टाफ और समाज के सभी वर्गों के साथ बहुत उदार स्नेहशील और सहयोग करने वाला था। उनको सभी वर्गों के लोग पसंद करते थे। वे आर्ट ऑफ लिविंग, रामलीला कमेटी लायंस क्लब माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान सहित अनेक सामाजिक साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। नगर जनपद और देश के कोने कोने से जुड़े उनके मित्रो संबंधियों और सहयोगियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके साथ तीन दशक से अधिक सीकेआई में सर्विस करते हुए उनको हमने एक संरक्षक के रूप में महसूस किया। हमारी ओर से भी उनको विनम्र श्रद्धांजलि। 

Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?