Tuesday, 22 September 2026

2029 से पहले यूनिफार्म सिविल कोड

*यूसीसी से न तो मुसलमानों का प्रत्यक्ष नुकसान होगा न ही बीजेपी का अप्रत्यक्ष सियासी फायदा!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के आम चुनाव से पहले बीजेपी व एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जायेगा। उत्तराखंड और गोवा में यूसीसी पहले से ही लागू है। दूसरी तरफ गुजरात में इसी साल मार्च में असम में मई में और मध्य प्रदेश में जुलाई 2026 में यूनिफार्म सिविल कोड का बिल पास हो चुका है लेकिन अभी राज्यपाल/राष्ट्रपति की मंज़ूरी नहीं मिलने से लागू नहीं हुआ है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी यूसीसी लागू करने के लिए प्रक्रिया चल रही है लेकिन इसके लिए अभी केवल ड्राफ्टिंग कमेटी ही बनी है, जो इसकी रूप रेखा पर विचार कर रही है। 
       जहां तक मुस्लिम समाज पर यूसीसी के असर का सवाल है, बेशक उसको धार्मिक रूप से कड़ा ऐतराज होगा और वह अपने संवैधानिक शरीयत कानून का हक़ छिनने पर आहत भी ज़रूर होगा, लेकिन सीएए के खिलाफ़ किए गए अपने असफल आंदोलन से वह इस बार शायद ही आंदोलन को सड़क पर उतरे। अलबत्ता इस्लामी आलिमों की तरफ से यूसीसी का अभी से विरोध शुरू हो गया है जो आगे बयान मांगपत्र और आस्तीनों पर काले बैज लगाने तक सीमित रह सकता है। *यूसीसी के लागू होने पर मुस्लिम पुरुष एक से अधिक शादी, एकतरफा तलाक़, तलाक़ के बाद भरण पोषण से बचाव, निकाह हलाला, तलाक़ या पति की मौत पर मुस्लिम महिला इद्दत (4 माह 10 दिन ) लड़कियों का बाल विवाह उत्तराधिकार में लड़कों को लड़कियों से संपत्ति में हिस्सा आधा और गोद लेने व लिव इन रिलेशन में रहने की मनाही जारी नहीं रख पाएंगे। उनको शादी का रजिस्ट्रेशन कराना भी कानूनन अनिवार्य होगा।* हालांकि यूसीसी अनुसूचित जनजाति को छोड़कर हिंदू सिख ईसाई बौद्ध जैन सभी धर्मों के मानने वालों पर भी लागू होगा, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे इस्लामी संगठन इसको शरीयत और मुस्लिम समाज की संस्कृति को प्रभावित करने वाला बताकर विरोध करते आ रहे हैं। आगे भी करेंगे लेकिन आम मुस्लिम उनका खुलकर सक्रिय समर्थन शायद ही करे। सेक्युलर दल और उनकी सरकारें इसीलिये मुसलमानों की नाराज़गी से बचने को यूसीसी लागू नहीं करती थीं और उनमें से अधिकांश अब भी जबरन यूसीसी थोपने के खिलाफ़ हैं। एनडीए के जेडीयू और टीडीपी जैसे कुछ घटक भी इसके सपोर्ट में नहीं हैं लेकिन अंत में वे बीजेपी के सामने घुटने टेक देते हैं तो इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना प्रबल है। कांग्रेस जैसे बड़े सेक्युलर दलों का कहना है कि जब तक मुस्लिम समाज के भीतर से ही यूसीसी लागू करने की मांग नहीं आए तब तक किसी भी सरकार को यूसीसी लागू नहीं करना चाहिए। हालांकि बीजेपी का सियासी मकसद मुस्लिम समाज की भलाई से ज्यादा यूसीसी लागू करके अपने हिंदू वोट बैंक को खुश करना है, लेकिन बदले हुए माहौल में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 हटाने की तरह इस कदम से उसको राजनीतिक लाभ मिलना काफी मुश्किल लग रहा है।
                पहले यूसीसी के मुस्लिम समाज पर पड़ने वाले वास्तविक असर पर बात करते हैं। यह ठीक है कि इससे मुसलमान पुरुषों के अधिकार घटेंगे और कानूनी जिम्मेदारी काफ़ी बढ़ जायेगी लेकिन सीएए और वक़्फ़ बोर्ड संशोधन कानून की तरह पूरे समाज का सीधा नुकसान और भेदभाव का सामना उनको नहीं करना होगा। *जहां तक एक से अधिक शादी पर रोक का सवाल है तो एनएफएसएच 5 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान 1.9 प्रतिशत यानी ईसाई समाज के 2.1 प्रतिशत से कम ही बहुविवाह करते हैं। अलबत्ता यह हिंदुओं के 1.3 प्रतिशत से कुछ अधिक है जबकि बहुविवाह में पूरे देश का औसत प्रतिशत 1.4 है। जाहिर है जैसे कानूनन रोक के बावजूद कुछ हिंदू एक से अधिक पत्नी रख रहे हैं वैसे ही यूसीसी के बावजूद कुछ मुस्लिम भी चोरी छिपे ऐसा करेंगे लेकिन खुलेआम मज़हब की आड़ में बहुविवाह को अधिकार समझने वाले मुस्लिम इससे बचेंगे भी। इस मामले में यह याद दिलाना भी उचित होगा कि इस्लाम में बहुविवाह का चलन उस समय शुरू हुआ था जब जंगों में बड़ी संख्या में मर्द मारे जाते थे और औरतें विधवा हो जाती थीं। अब कम से कम भारत में तो ऐसा कुछ नहीं है। दूसरी बात शरीयत में एक से ज्यादा निकाह की छूट इस शर्त पर दी गई है जब कोई मर्द सब पत्नियों के साथ सौ फीसदी समान बर्ताव करे जो कि नामुमकिन होता है।* एकतरफा एक समय में तीन तलाक ए बिद्दत पर पहले ही कानूनन रोक लग चुकी है जो कि इसका दुरुपयोग होने से समय की ज़रूरत भी थी, जबकि यूसीसी से तीन माह में दी जाने वाली तलाक ए एहसन पर भी रोक लगेगी तो पति पत्नी की आपसी सहमति से कोर्ट से तलाक़ लेने का रास्ता भी खुलेगा। तलाकशुदा पत्नी को उसकी दूसरी शादी होने तक भरण पोषण का खर्च देना ज़रूरी होगा, जो न्यायसंगत ही है। चर्चित शाहबानो के केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही फैसला धारा 125 के तहत दिया था जिसको कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार ने संसद में पलट दिया था, लेकिन इससे बीजेपी को अपना हिंदुत्व एजेंडा राम जन्मभूमि आंदोलन तेज़ कर आगे बढ़ाने को उर्वर ज़मीन मिली थी। *निकाह हलाला को लेकर खुद इस्लामी आलिमों में भारी मतभेद हैं। सुन्नी मुफ्तियों का बड़ा हिस्सा इसको ग़ैर शरई बताता है जबकि कुछ मुस्लिम विद्वान इसको मान्यता देते हैं जिससे मुस्लिम समाज में यह कुप्रथा कम ही सही लेकिन मौजूद है, इसका ख़ात्मा होना स्वागत योग्य होगा। जहां तक तलाक़ या पति की मौत पर महिला की इद्दत का मुद्दा है तो यह व्यवस्था इस्लाम में ऐसी महिला की दूसरी शादी होने पर होने वाले बच्चे के वास्तविक पिता को लेकर उठने वाले विवाद से बचने को की गई थी लेकिन अब इसके लिए मेडिकल साइंस में ऐसे आधुनिक गर्भावस्था परीक्षण होने लगे हैं जिसको जानने के लिए 130 दिन वेट करने की कोई जरूरत नहीं है।* बालविवाह अन्य धर्मों की तरह मुस्लिम समाज में भी करने की कुप्रथा रही है जिसको यूसीसी से रोकना नाबालिग बच्चियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बेहतर ही होगा। मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक माता पिता से उत्तराधिकार में मुस्लिम बेटियों को बेटों से आधा हिस्सा मिलता है जबकि यूसीसी लागू होने के बाद यह बराबर देना होगा, संविधान की लैंगिक समानता के हिसाब से यह भी ठीक ही होगा। ऐसे ही निसंतान दंपत्ति का बच्चा गोद लेना और मुस्लिम प्रेमी प्रेमिका का लिव इन रिलेशन में रहना अब आम बात है, इसे यूसीसी मान्यता देगा तो अब तक शरीयत में वर्जित इन बातों से मुस्लिम समाज में सुधार ही होगा।
          अब बात करते हैं यूसीसी के सियासी और संवैधानिक मकसद पर तो बीजेपी के एजेंडे में यूसीसी राम मंदिर और धारा 370 के साथ शुरू से ही रहा है। इनमें से दो लक्ष्य उसने पहले ही पूरे कर लिए हैं लेकिन यूसीसी अभी भी बाक़ी है। पहले पीएम मोदी ने 2023 में यूसीसी की चर्चा जब ज़ोरदार तरीके से शुरू की थी तो लगा था वे केंद्रीय स्तर पर इसके लिए कोई विधेयक लाने जा रहे हैं लेकिन बाद में यह तय हुआ कि यूसीसी पहले बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लाया जाए जिससे इसके प्रभाव और प्रतिक्रिया को आंका जा सके। वैसे भी यह मामला संविधान की समवर्ती सूची में आता है जिससे केंद्र व राज्य दोनों इसको कानून बनाकर लागू कर सकते हैं। संविधान सभा भी इस मुद्दे पर बंटी हुई थी इसीलिए इस मुद्दे को भविष्य में विचार के लिए आने वाली सरकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया था लेकिन संविधान के दिशा निर्देशक सिद्धांत यह ज़रूर कहते हैं कि यूसीसी के लिए नागरिकों के बीच सहमति बनाने का प्रयास जारी रखा जाए। इसी श्रृंखला में 21 वें लॉ कमीशन ने 2018 में अपने परामर्श पत्र में कहा था कि यूसीसी बनाना न तो समय की आवश्यकता है न ही इस दौर में लोगों की इच्छा के अनुसार होगा। आयोग ने देश की विविधता को देखते हुए मौजूदा पर्सनल लॉ में ही सुधार का सुझाव दिया था। इसके विपरीत 22 वें लॉ कमीशन ने 2023 में जनता और धार्मिक संस्थाओं से व्यापक विचार विमर्श के बाद हायर कोर्ट के दिए गए निर्देशों और समय की मांग के अनुरूप यूसीसी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था।
         *पिछले दिनों छात्रों की गूंज अभियान के तहत राहुल गांधी ने विशेष रूप से लड़कियों को संबोधित करते हुए मनुस्मृति को कोट करते हुए लड़कियों को संविधान के अनुसार समान अधिकार देने में धार्मिक मान्यताओं को बाधा बताया था। बाद में उन पर बीजेपी नेताओं ने केवल हिंदू धर्म ग्रंथों को निशाने पर लेने और मनु स्मृति की संदर्भ से हटकर गलत व्याख्या के भी आरोप लगाए। उनको मुस्लिम महिलाओं को भी बराबर अधिकार दिलाने के लिए बोलने की चुनौती मिली। उनके इस बयान के बाद इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में एक लेख लिखकर इंडियन मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और रोशनी जैसी प्रगतिशील व आधुनिक विचारों वाली महिलाओं के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं की महिला पदाधिकारियों ने भी राहुल गांधी से मुस्लिम सहित सभी समाज की महिलाओं के लिए समान अधिकार के लिए आवाज़ उठाने की माँग की थी लेकिन इस पर अभी तक राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई जवाब नहीं आया है।* भविष्य के विवाद और केवल बहुसंख्यकों के धर्म ग्रंथों पर उंगली उठाने को लेकर बीजेपी के सियासी नैरेटिव से कांग्रेस को होने वाले राजनीतिक नुकसान से बचने को राहुल गांधी को सभी वर्गों की महिलाओं को समान अधिकार देने की संवैधानिक मांग पर ही फोकस करना चाहिए।

Friday, 11 September 2026

कोर्ट का जुर्माना


हाईकोर्ट का जुर्माना व फटकार, यूपी के अफ़सरों में होगा सुधार?
                   -इक़बाल हिंदुस्तानी
       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चैधरी पर गलत तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने पर वहां के डीएम और पुलिस अफसरों पर पांच लाख जुर्माना और कड़ी फटकार लगाई है। हालांकि यूपी सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है लेकिन केस के तथ्यों व प्रमाणों से वहां से भी उसको राहत मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं। ऐसे ही देवरिया में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के आरोप में उच्च न्यायालय ने वहां के एसएचओ के वेतन से काटकर 65000 रूपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस के जवाबों से नाराज़ होकर उसको ‘‘झूठों का झुंड’’ तक बता दिया। उधर नोएडा में ही एक छात्र को जंतर मंतर के आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में एक मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए कोर्ट की मानहानि की कार्यवाही की चेतावनी दी है।
        नोएडा के मामले में कोर्ट ने छात्रा आकृति पर एनएसए लगाने को पूरी तरह गलत बताते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत बताया। आपको याद दिला दें कि आकृति दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ ही सोशल एक्टिविस्ट है। आकृति को नोएडा में हुए मज़दूर आंदोलन के आरोप में अप्रैल 26 में गिरफतार कर पांच माह से जेल में रखा गया था। आकृति पर मज़दूर आंदोलन मंे 13 अप्रैल को हुई हिंसा फैलाने का आरोप था जबकि उसको 12 अप्रैल को ही पकड़कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। इससे पहले आकृति ने मज़दूरों के बीच केवल एक बार भाषण दिया था जिसमें उसने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाये रखने की अपील भी की थी। आकृति पर दूसरा आरोप व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें हिंसक विचार फैलाने का था। जांच में पाया गया कि ग्रुप शिक्षा व समाजसेवा के लिये था लेकिन इसमें पहचान छिपाकर नोएडा के दो पुलिसवाले शामिल हो गये थे। हैरत की बात यह रही कि यही पुलिसवाले विवादित पोस्ट डाल रहे थे। ग्रुप में शामिल अमनपसंद और कानून का पालन करने वाले सदस्यों ने इन पोस्ट पर आपत्ति की और इनको तत्काल डिलीट भी कर दिया था। यहां जो मामले दिये गये हैं वे हाल ही के हैं। कोर्ट पहले भी कई बार यूपी सरकार पुलिस और प्रशासन को नियम कानून व संविधान के हिसाब से काम करने को सख्त लहजे में निर्देश दे चुका है। किसी भी आरोपी के घर पर बुल्डोज़र चलाने, एनकाउंटर करने और फर्जी केस बनाकर किसी को भी हिरासत में लेने पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लेकर थर्ड डिग्री देने और एनएसए व यूएपीए जैसे बेहद कड़े कानून का सत्ता के इशारे पर गलत इस्तेमाल करने के कई मामलों में कोर्ट पहले भी शासन प्रशासन और पुलिस को कड़ी चेतावनी दे चुका है। 
             देखने मंे यह आ रहा है कि कुछ अधिकारी संविधान से अधिक अपने आकाओं को खुश करने के लिये कानूनी गैर कानूनी काम करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। उनको वेतन जनता के दिये कर से मिलता है। आज नहीं तो कल सरकार बदल सकती है। उनकी जवाबदेही नियम कानून और उनके किये गये कामों के हिसाब से बाद में भी कभी ना कभी हो ही सकती है। वे भी एक दिन कानून के शिकंजे में फंस सकते हैं। उनका असली काम जनता की रक्षा करना उसकी सेवा करना और जनहित की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना है। लेकिन आज अनेक भ्रष्ट अफसर लालच अच्छी पोस्टिंग रिश्वत की मोटी कमाई और अपनी कानून के खिलाफ पहले की गयीं कारगुजारियां छिपाने के लिये सत्ताधारी दल के लिये उसका राजनीतिक पक्षपातपूर्ण भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक एजेंडा लागू करने का औज़ार बने हुए हैं। अगर कोर्ट उनको ऐसे ही हर गलती हर अन्याय और हर मनमानी पर फटकार लगाकर जुर्माना लगाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बेलगाम नौकरशाही को अपनी वर्दी अपनी नौकरी और जुर्माने से बचाने को मजबूर होकर संविधान के दायरे में ही काम करना होगा। फिर हाशिये पर पड़े अच्छे ईमानदार और योग्य अधिकारियों को अपना काम सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय करने का मौका भी मिलेगा। क़तील शिफाई का एक शेर याद आ रहा है- हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले, क़ीमते देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और तर्कशील समाज अखबार के चीफ एडिटर हैं।

भारत हिंसक देशों में क्यों?

*भारत दुनिया के सबसे अधिक हिंसक देशों की सूची में कैसे पहुंच गया?*
                    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*       

        हाल ही में ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में भारत में बढ़ती हिंसा और बेकाबू जघन्य अपराधों के उठते ग्राफ के कारण हमारे देश की गिनती दुनिया के सबसे अधिक 50 हिंसक देशों में की गयी है। विश्व शांति सूचकांक के आधार पर जारी की गयी इस रिपोर्ट में कुल 163 देशों को शामिल किया गया है। जिनमें भारत की रैंक 127 वीं है। इस सर्वे के अनुसार भारत पिछले साल के मुकाबले 12 पायदान नीचे खिसक गया है जबकि आइसलैंड जैसे छोटे देश ने शांतिप्रिय देश की अपनी उपलब्धि बरकरार रखी है। भारत की रैंक में गिरावट के खास कारणों में मणिपुर में लगातार जारी जातीय हिंसा तो है ही, इसके साथ ही देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा, दलित आदिवासियों और गरीबों पर भेदभाव के कारण हमले दुस्साहसी व्यक्तिगत हिंसा, महिलाओं तथा बच्चों के साथ यौन हिंसा व साम्प्रदायिक टकराव और पुलिस पर लगने वाले उत्पीड़न अत्यधिक बल प्रयोग और फर्जी एनकाउंटर हाफ एनकाउंटर के बढ़ते आरोप भी शामिल हैं। हालांकि पड़ौसी देशों के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान 152 तो अफगानिस्तान 157 वें स्थान पर हिंसा में हम से काफी आगे नज़र आते हैं। लेकिन दूसरी तरफ नेपाल 111 बंग्लादेश 117 हम से थोड़ा सा बेहतर हैं तो भूटान 16 और श्रीलंका 67 वें स्थान पर भारत ही नहीं पूरे एशिया में बहुत अच्छी हालत में हैं। दरअसल दुनिया के स्तर पर अमनचैन और सुरक्षा से जुड़े इस इंडेक्स को सिडनी स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर इकाॅनोमिक्स एंड पीस द्वारा किया जाता है। दुनिया का थिंक टैंक मानी जाने वाली इस संस्था का कहना है कि विश्व शांति सूचकांक को बनाते समय 22 मुद्दों पर ध्यान दिया जाता है जिनमें विशेष रूप से सरकारों की कार्यशैली, अच्छा कारोबारी माहौल, संसाधनों का समान वितरण, दूसरों के अधिकारों की परवाह, पड़ौसियों से बेहतर सम्बन्ध, सूचनाओं का विश्वसनीय आदान प्रदान एवं मानवीय पूंजी के आदर्श रखरखाव, गरिमा व सम्मान को दृष्टिगत रखा जाता है।
         पीस इंडेक्स के आधार पर भारत की सीमाओं पर तनाव टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नज़र डालें तो साफ नज़र आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना यह है ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साज़िश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है। 
        *मिसाल के तौर पर हाल ही में पकड़ा गया स्वतंत्र भारद्वाज न केवल जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन करने वाले युवाओं के वैचारिक तौर पर पूरी तरह खिलाफ था बल्कि वह अपने आक़ाओं के इशारे पर उन पर जानलेवा हमला कर सोशल मीडिया पर प्रसारित एक पाॅडकास्ट में इसे दुस्साहस और अहंकार के साथ स्वीकार भी कर रहा था। जिस सोशल मीडिया इंफलूएंसर लड़की के पिता पर उसने घातक हमला किया वह दलित थी। दलितों को लेकर पक्षपात अन्याय और दमन हमारे समाज की आज भी एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे ही कुछ संकीर्ण संगठन एक पार्टी और कुछ कट्टरपंथी लोगों ने दिन रात काम करके अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के बारे में आम लोगों की यह झूठी राय बना दी है कि ये लोग ही समाज और देश की अनेक समस्याओं के लिये ज़िम्मेदार हैं। यही वजह है कि पुलिस का रूख़ भी इस वर्ग को लेकर अकसर पूर्वाग्रह का नज़र आता है। पिछले दिनों गुजरात के भावनगर में फैज़ल नाम के एक युवक ने अपने साथ कई साल से रहने वाली हिंदू महिला काजलबेन की हत्या कर दी थी। पुलिस ने फैजल को पकड़कर सार्वजनिक रूप से जमकर पीटा। इसका वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो जनता का एक बड़ा वर्ग पुलिस के पक्ष में खड़ा नज़र आया। जो लोग पुलिस को नहीं कोर्ट को सज़ा देने का कानूनी अधिकार होने की बात कह रहे थे उनको अंधभक्तों ने ट्राॅल करना शुरू कर दिया।* इस घटना से यह भी पता चलता है कि एक वर्ग कानून से इतर हिंसा के पक्ष में पूरी बेशर्मी से खड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में आरोप लगते है कि यूपी सहित कुछ अन्य भाजपा शासित राज्यों की सरकारों में किसी पर गोकशी या हत्या बलात्कार का गंभीर अपराध का आरोप लगता है और पुलिस प्रशासन उसे हथियार बरामद करने या हत्या का सीन रिक्रियेट करने मौक ए वारदात पर देर रात ले जाकर मुठभेड़ में मार देता है। कुछ लोगों के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर भी खूब हो रहे हैं। थाने में हिरासत के दौरन असहनीय यातना और थर्ड डिग्री देने के मामले तो अनगिनत हैं लेकिन पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर जांच करने वाले मजिस्ट्रेट निचली अदालतें और मानव अधिकार आयोग तक शिकायत के बावजूद इसका संज्ञान नहीं लेते हैं।
             जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कई साल पहले रात के अंधेरे में कुछ लोगों ने छात्रावास पर हिंसक हमला किया था। पुलिस वहां तमाशा देखती रही। इसके बाद जब एक पार्टी के छात्र प्रकोष्ठ की कोमल शर्मा पर हमले में शामिल होने का आरोप लगा तो पुलिस जांच के नाम पर उस मामले को ठंडे बस्ते में डालकर आज तक सो रही है। पिछले महीने बंगाल में जादवपुर यूनिवर्सिटी में ठीक ऐसा ही मामला फिर से देखने में आया। पुलिस वहां भी चुपचाप सब कुछ देखती रही लेकिन सरकार ने भी इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की। आरोप है कि कई साल पहले दिल्ली में सीएए के खिलाफ चले शाहीन बाग आंदोलन, महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित सम्मेलन और शम्भू बोर्डर पर चले किसान आंदोलन को रोकने के लिए भी कुछ तत्वों ने हिंसा का सहारा लिया। कुछ साल पहले दिल्ली के गार्गी काॅलेज में चल रहे समारोह में भी कुछ बाहरी तत्वों ने अपनी नापसंद एक प्रोग्राम के बाद जमकर वहां के छात्र छात्राओं से मारपीट की थी लेकिन जांच के नाम पर उस मामले को भी दबा दिया गया था। रोड पर किसी की गाड़ी टकरा जाने पर थोड़ा सा नुकसान होने पर आरोपी को पीट पीटकर मार देने की घटनाएं भी हाल ही में बहुत बढ़ चुकी हैं। मामूली गलती करने पर स्कूलों में बच्चों को पीटने और कॉलेज यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में छात्रों की आपसी हिंसा भी रुकने का नाम नहीं ले रही है।
        *अब नया ट्रेंड देखने में आ रहा है जिन मामलों में सरकार अपने विरोधी अहसमत या आलोचकों को पुलिस या कोर्ट से सबक सिखाने में असमर्थ पाती है उनमें विपक्ष का आरोप है कि नाॅन स्टेट एक्टर हिंसा करने चले आते हैं। अगर ये मौके पर रंगे हाथ या किसी गवाह और सबूत के आधार पर पकड़कर पुलिस को सौंप भी दिये जाते हैं तो भी अव्वल तो स्वतंत्र भारद्वाज के अनुसार इनके आकाओं के इशारे पर इनके खिलाफ मुकदमा ही कायम नहीं हो पाता और अगर कभी कभी कहीं कहीं राजनीतिक नुकसान या कानून व्यवस्था की मजबूरी में केस दर्ज भी किया जाता है तो हल्की यानी ज़मानतीय धाराओं में लिखा जाता है। इसके बाद इनके खिलाफ गंभीरता से निष्पक्ष जांच गवाह और सबूत नहीं जुटाये जाते और कभी कभी जनता की नज़र हटते ही फाइनल रिपोर्ट लगाकर या मुकदमा वापस लेकर केस खत्म कर दिये जाते हैं।* इस तरह से जब लोगों को लगता है कि उनको वर्तमान सरकार पुलिस और उसकी पक्षपात करने वाली जांच एजेंसियों के रहते न्याय नहीं मिलेगा वे कभी कभी खुद कानून हाथ में लेने पर उतर आते हैं जोकि ठीक नहीं माना जा सकता लेकिन यह समाज में हिंसा के दुष्चक्र को और बढ़ावा देता है। हालत इतनी बदतर है कि हिंसा के कई मामले में माॅब लिंचिंग होने पर जिसकी सामूहिक हिंसा में भीड़ ने हत्या की उसी पर चोरी लूट या हमले का झूठा केस दर्ज कर दिया जाता है। हमारा मानना है जब तक सबको न्याय रोज़गार सबको संसाधनों राष्ट्रीय आय व सम्पत्ति में समान अधिकार रोटी कपड़ा मकान शिक्षा चिकित्सा और मान सम्मान मानवीय गरिमा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक हिंसा का दुष्चक्र रोकना कठिन है।

38 साल से नहीं हटा अतिक्रमण

#इस_तरह_के_अतिक्रमण_को_कोई_38_साल_से_नहीं_हटा_रहा...
          नजीबाबाद के कई मोहल्लों में कल किसी काम से पैदल घूमने का मौक़ा मिला। कई सड़कों पर लोगों ने पूरी बेशर्मी और निडरता से अवैध कब्ज़ा कर रखा है। लगभग सभी पालिकाएं शासन के निर्देश पर कभी कभी मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण हटाने का औपचारिक अभियान चलाकर अपने कर्तव्य की अतिश्री कर लेती है।कोई भी स्थानीय निकाय न तो आगे यह देखती है कि नया अतिक्रमण नहीं हो न ही पुराने हटाए गए अतिक्रमण को फिर से होने से रोकने को कोई तंत्र बनाते हैं। यूपी में 1988 से सुपरसीड किए हुए स्थानीय निकायों में चुनाव फिर से होने शुरू हुए थे। आशा थी कि अफसरों के मुकाबले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से जनता को अधिक राहत मिलेगी क्योंकि वे उनके बीच से चुनकर आएंगे तो उनकी बात को बेहतर समझेंगे। कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी लेकिन सभी स्थानीय लोगों को नाराज़ नहीं करने की नीति से यह भी हुआ कि वे सख़्ती से अतिक्रमण नहीं हटा सके। कुछ लोगों ने अपने घर दुकान और ऑफिसों के सामने नाले नाली नहीं बनने दी। अगर पहले से बनी हुई थी तो उनको पाट दिया। इसके पीछे सार्वजनिक सड़क निजी उपयोग के लिए कब्जाने की नीयत थी। दरअसल नाली ही वो सीमा रेखा है जो अतिक्रमण की सबसे पहले पोल खोल देती है। कई सड़कें खुद बता रही हैं कि वे इधर 15 फिट थी तो उधर 10 फिट रह गई , फिर आगे 12 फिट हो गई यानी जिसका जितना मन हुआ उसने उतनी दबा ली। अजीब बात यह है जब पालिका नई सड़क बनाने आई तो उसने जितनी सड़क बची थी उतनी ही बना दी, अतिक्रमण नहीं हटाया। इससे कई जगह पानी की निकासी भी रुक गया। कई मोहल्लों में भारी जलभराव शुरू हो गया जो आज तक जारी है। कई नालों को पाटकर दुकानदारों ने अपने सामने की सड़क की तरफ पानी का रुख कर दिया। पालिका फिर भी नहीं बोली। फिर इनमें से कुछ ने कई पालिका के नाले की कब्ज़ाई जगह कई हज़ार किराए पर दे दी। नगर में कई जगह लोगों की अपनी दुकान की जितनी गहराई है, उससे ज़्यादा उन्होंने सड़क पर स्थायी और फ्लेक्स बोर्ड या दुकान का सामान रखकर अस्थायी अतिक्रमण कर रखा है। एक सड़क तो साफ़ बता रही है कि उसको अवैध कब्ज़ा करके आधा कर दिया गया है...हिंदुस्तानी

दावत है प्यार...

*दावत है प्यार, न तो अधिकार न ही व्यापार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              मध्य प्रदेश के दमोह की एक ख़बर पढ़ी। पहले हंसी आई, फिर हम संजीदा हो गए। एक वकील दोस्त ने दूसरे वकील दोस्त को बर्थ डे पार्टी नहीं देने पर 41,250 ₹ के हर्जाने का नोटिस भेजा है। विशाल सिंह का आरोप है कि उनके मित्र गोविंद तिवारी ने लिखित इकरारनामा करने के बाद भी दावत नहीं दी, जिससे उनको उस दिन खाना होटल में खाना पड़ा, साथ ही तनाव इतना बढ़ गया कि हॉस्पिटल में इलाज कराया गया। तनाव व इलाज का हर्जाना नोटिस देकर दोस्त से मांगा गया है। उधर दोस्त का दावा है कि वे पार्टी दे चुके हैं जिसके बिल भी मौजूद है।
      यह मामला तो जांच के बाद तय होगा, कौन झूठा और कौन सच्चा है। लेकिन क्या आप और हम समाज परिवार और दोस्तों में इस तरह के मामले आएदिन नहीं देखते रहते हैं? दावत पार्टी और नाश्ते तक को लेकर कुछ लोग बड़े क्रेज़ी रहते हैं। कई लोग दावत कर कर के अच्छे दोस्त बन जाते हैं तो कुछ दोस्त दावत नहीं करके दुश्मन बना लेते हैं। दावत कब अदावत बन जाए, पता ही नहीं लगता है। दरअसल दावत को लेकर हम लोगों की सोच अजीब है। दावत दो लोगों दो परिवारों या दो समूहों के बीच प्यार और सम्मान बढ़ाने के लिए होती है। दावत किसी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है जो हर हाल में होनी ही चाहिए नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे, क्रोधित हो जाएंगे और सामने वाले से न सिर्फ़ रिश्ता तोड़ लेंगे बल्कि खुद को अपमानित समझकर उससे दुश्मनी पर उतर आएंगे? 
          कुछ लोग अपनी ससुराल में दावत अपना हक़ समझते हैं। कुछ लोग शादी या जन्म दिन की पार्टी में नहीं बुलाए जाने पर खफा हो जाते हैं। कुछ लोग सपरिवार न बुलाये जाने पर आक्रोश दर्ज कराते हैं। कुछ लोग दावत का मीनू अपने स्तर या पसंद का नहीं होने पर भी बुरा समझते हैं और सामने वाले की औकात बताने लगते हैं। कुछ लोग बारात में नाश्ते को लेकर बड़े परेशान रहते हैं कि कहीं लेट होने पर नाश्ता न निकल जाए। कुछ लोग शादी करने को रिश्ते के लिए जब कहीं जाते हैं तो नाश्ते के आइटम गिनकर और उनकी कीमत आंककर यह तय करते हैं कि सामने वाले की हैसियत कैसी है? कुछ लोग दावत में मीट नहीं परोसने पर सामने वाले को कंजूस घोषित कर देते हैं तो कुछ लोग चिकन, मटन और बड़े जानवर के गोश्त के हिसाब से सामने वाले के स्टेटस को तय करते हैं। कुछ लोग खाने से पहले स्टार्टर बाद में स्वीट साथ में कोल्ड्रिंक और नाश्ते में ड्राई फ्रूट से अपना सम्मान तोलते हैं।
         दावत की चर्चा चल रही है तो एक और बात पर गौर कीजिये। कुछ दोस्त और रिश्तेदार अक्सर दावत करते हैं, कुछ कभी कभी और कुछ कभी नहीं। इसके पीछे उनकी आर्थिक स्थिति उनकी सोच उनकी सीमित या उदार समझ उनका आपसे करीबी या दूर का रिश्ता या उनके दिल में आपके लिए मुहब्बत इज़्ज़त या सबके लिए तंग दिली फराग दिली या मजबूरी न जाने कितनी वजह हो सकती है। दावत व्यापार नहीं है कि आपने की तो सामने वाला भी करेगा, उतनी ही करेगा या वैसी ही करेगा जैसी आपने की है। 
       हमारे शहर में एक मॉर्निंग वॉकर ग्रुप था। दो दर्जन से अधिक लोग थे। रोज़ सुबह साथ घूमने जाते थे। पहले वापसी में चाय पीने लगे। फिर पकौड़ी समोसे नाश्ते में शामिल हुए। फिर दावतों का सिलसिला शुरू हुआ। सबने बारी बारी दावत शुरू की। कुछ लोग पहले दिन से ही दावत खिलाने की हालत में नहीं थे। वे पहली दावत से ही किनारा कर गए। कुछ जाते रहे, खाते रहे, लेकिन जब उनकी बारी आई, तो अचानक गायब हो गए। बदले की दावत मांगने वाले उनको कॉल करने लगे, कभी बात हुई कभी नहीं हुई। फिर कॉल नो रिप्लाई होने लगी। दावत के दीवाने उस दोस्त के घर पहुंच गए। वो मिला तो बहुत ज़लील किया। फिर उसने घर जाने पर दोस्तों से मिलना भी बंद कर दिया। फिर उसको सड़क बाज़ार या शादी में मिलने पर दावत के लिए याद दिलाया गया। दावत न होनी थी न ही हुई। दोस्ती खत्म हो गई। ग्रुप भी बिखर गया। मॉर्निंग वॉक भी उनमें से अब कम लोग ही करते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है दावत प्यार दोस्ती और इज़्ज़त के लिए होती है उसे बदला व्यापार या अधिकार समझने की भूल कभी भी मत कीजिये। दावत को दावत रहने दीजिये अदावत में मत बदलिए प्लीज़।
*बहुत कुछ जान के जाना है तुम को*
*बड़ी मुश्किल से पहचाना है तुम को*
*मुझे जो तुम समझते हो ग़लत है*
*किसी दिन ये भी समझाना है तुम को।*
नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।

हिंदुत्व समर्थक और विरोधी...

*हिंदुत्व के समर्थक और विरोधी, हिंसक होने के अधिक आरोप किस पर हैं?*
                           *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण में "दिमागी नक्सल" शब्द पर एक पखवाड़े से अधिक समय से चर्चा चल रही है। पहले संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजूजी ने सफ़ाई दी थी कि इस शब्द का विपक्ष से कोई मतलब नहीं है। लेकिन दिमागी नक्सल पर संघ के मुख्य पत्र ऑर्गनाइजर में छपे विस्तृत लेख, बीजेपी के ट्विटर हैंडल पर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जैसे बुद्धिजीवीयों को "इंटेलेक्चुअल नक्सल" बताने और इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में पूर्व में आरएसएस से जुड़े रहे बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राम माधव के साप्ताहिक स्तम्भ रामराज्य में प्रकाशित विचारों से स्पष्ट हो गया है कि अर्बन नक्सल दिमागी नक्सल के बाद अब इंटेलेक्चुअल नक्सल नाम से इस आरोप में उन सब लोगों को शामिल कर लिया गया है जो बीजेपी संघ के हिंदुत्व मॉडल से सहमत नहीं हैं, तटस्थ हैं या विरोधी हैं। उन्होंने ऐसा कहकर एक तरह से ईराक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के उस बयान को याद दिला दिया है जिसमें उन्होंने दुनिया के देशों को यह कहकर धमकाया था कि अब बीच का कोई रास्ता नहीं है, इस खाड़ी जंग में या तो आप हमारे साथ रहें नहीं तो आपको चुप रहने पर हमारे खिलाफ़ यानी अमेरिका का दुश्मन माना जायेगा। जबकि इतिहास गवाह है भारत ने तो एक दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की गुटबंदी से बचने के लिए ही गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया था जिसमें न्यायप्रिय तटस्थ और निष्पक्ष विश्व के अनेक देश हमारे साथ जुड़े थे और उस दौर में दुनिया दो ध्रुव से तीन बड़े हिस्सों ने नज़र आने लगी थी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी संघ या पीएम मोदी ने हिंदुत्व विरोधियों या निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया हो। संघ परिवार पहले दिन से ही "या तो हमारे साथ नहीं तो हमारा शत्रु" की नीति पर चलता रहा है। यही वजह है कि वे विपक्ष, विरोध करने वाले नागरिक समाज और बीजेपी सरकार के खिलाफ़ जनहित के मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को बीजेपी विरोधी सरकार विरोधी या किसी विशेष सरकारी फैसले का विरोधी नहीं सीधे "राष्ट्र विरोधी देशद्रोही और पाकिस्तानी खालिस्तानी" बताकर उनका मनोबल तोड़ते हैं, उन पर विदेशी साज़िश टूलकिट का आरोप लगाते हैं और साथ ही उनको हिंदू विरोधी घोषित करके समाज में उनकी छवि खलनायक की बनाने का प्रयास करते हैं। 
          अगर थोड़ा पीछे चलें तो हम देखते हैं कि हिंसा का आरोप तो वे नक्सल माओवादी और वामपंथी सोच वालों पर लगाते हैं लेकिन खुद बीजेपी संघ पर दंगों के आरोप लगते रहे हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद तोड़ने के आरोप हैं। उनके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की विवादित यात्रा से देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़काने का आरोप लगा है। खुद मोदी पर गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों का कोच जलने पर पूरे प्रदेश में भड़के दंगे जानबूझकर नहीं रोकने का विपक्ष आरोप लगाता रहा है। बीजेपी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कुछ अन्य पर तो बाकायदा भगवा आतंकवाद का आरोप रहा है जिससे समझौता एक्सप्रेस ट्रेन सहित मक्का मस्जिद में बम विस्फोट से हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जे एन यू, जादवपुर यूनिवर्सिटी व गार्गी कॉलेज सहित कई गैर हिंदुत्व विचारधारा के संस्थानों संगठनों और व्यक्तियों पर हिंसक जानलेवा और सुनियोजित हमले करने के संघ परिवार पर समय समय पर गंभीर आरोप लगे हैं। गौरी लंकेश नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे जैसे पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट की हत्या कराने में दक्षिणपंथी सोच का हाथ होने का आरोप लगा है।
           किसान आंदोलन, सी ए ए के खिलाफ़ शाहीन बाग़ आंदोलन और भीमा कोरे गांव में दलित सम्मेलन में हिंसा के गंभीर आरोप भी संघ परिवार पर लगे हैं लेकिन इसमें सत्ता पक्ष ने उल्टा आरोप लगाने वाले यानी पीड़ित समझे जाने वाले पक्ष को ही यूएपीए जैसे मुकदमों में जेल भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले तेजिंदर सिंह बग्गा को जिस तरह बीजेपी ने पार्टी में लिया और फिर पंजाब की आप सरकार की कानूनी कार्यवाही से केजरीवाल के मानहानि के केस में बचाया, उस तरह के भी यहां छोटे बड़े दर्जनों अनेक मामले इसके अलावा भी गिनवाए जा सकते हैं लेकिन उससे यह साबित नहीं होता कि अकेले बीजेपी और संघ ही ऐसे हिंसा के आरोपों से घिरे हैं, हां ये आरोप अधिक अवश्य हैं।
      *अगर मुख्य विपक्षी दल की बात करें तो कांग्रेस का दामन 1984 की सिख विरोधी हिंसा से दाग़दार है। तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने इस एकतरफा सिख नरसंहार को यह कहकर जस्टिफाई करने की अनैतिक कोशिश भी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती काँपती ही है। ऐसा ही मिलता जुलता बयान गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सीएम मोदी ने देते हुए कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। अगर अन्य विपक्षी दलों का रिकॉर्ड देखें तो उनमें से वामपंथी दलों और टीएमसी पर सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे हैं। यूपी में सपा और बिहार में राजद पर भी कभी कभी माफियाओं की शह पर हिंसा और कुछ बड़े अपराधों के आरोप लगे हैं। ऐसे ही अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों पर छिटपुट हिंसा के आरोप लगते रहे हैं लेकिन इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना का विशेष रूप से उत्तर भारतीयों और दंगों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा का विवादित इतिहास है, जो लंबे समय से बीजेपी के साथ गठबंधन में रही और हिंदूवादी सोच से ही प्रेरित रही है। *आज के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो बीजेपी के विभिन्न प्रकोष्ठ जिनमें बजरंग दल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, हिंदुत्व से असहमत लोगों के साथ हिंसा करने के बहुतायत आरोपों से घिरे हुए हैं। इनमें विशेष रूप से गौ मांस, गो हत्या, लव जेहाद, धर्म परिवर्तन जैसे विभिन्न फर्ज़ी जेहाद, मॉब लिंचिंग कांवड़ खंडित होने पर हिंसा,मस्जिद मदरसों और चर्चों पर झूठी सूचनाओं के आधार पर हमले और हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के झूठे सच्चे आरोप लगाकर हिंसा करने के थोक में आरोप लगते रहे हैं।* इससे एक ट्रेंड पता लगता है कि जो आरोप लगा रहे हैं वे हिंसा के अधिक आरोपी हैं और जो संविधान लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्मनिरपेक्षता समानता मानवता आंदोलन विरोध प्रदर्शन धरना समाजवाद नैतिकता आरक्षण और सबके लिए सस्ती शिक्षा स्वास्थ्य व रोज़गार की मांग करते हैं, लेकिन हिंसा का सहारा नहीं लेते उनको आरोप लगाकर सत्ता के बल पर विलेन बनाया जा रहा है।
            *कोई भी विचारधारा, हिंसा और अपराध के हिसाब से देखें तो सुप्रीम कोर्ट और अनेक उच्च न्यायालयों (विशेष रूप से केरल हाईकोर्ट) ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि केवल किसी विचारधारा (मिसाल के तौर पर माओवाद या नक्सलवाद ) को मानना या उससे हमदर्दी रखना तब तक अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि वह आदमी उस विचार को बाकी नागरिकों पर जबरन थोपने के इरादे से हिंसा नहीं करता या कानून के राज, संविधान और लोकतंत्र को चुनौती नहीं देता।खास तौर से, इस सिद्धांत को मजबूत करने वाले प्रमुख मामले इस प्रकार हैं-1. थवाहा फजल बनाम भारत संघ (2021) - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि "सिर्फ माओवादी साहित्य पास में होना या किसी विशेष विचारधारा के प्रति झुकाव होना गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी किसी आतंकी गतिविधि या हिंसा को अंजाम देने के इरादे से सक्रिय रूप से नहीं जुड़ता, तब तक केवल वैचारिक जुड़ाव के आधार पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। 2. अरूप भूइयां बनाम असम राज्य (2011 और 2023 पुनर्विचार याचिका पर ) इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्यायशास्त्र के 'क्लियर एंड प्रेजेंट डेंजर' (स्पष्ट और वर्तमान खतरा) सिद्धांत का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन की केवल निष्क्रिय सदस्यता तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि वह सदस्य लोगों को हिंसा के लिए नहीं उकसाता या खुद हिंसा में शामिल नहीं होता। हालांकि, 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी पीठ ने सुरक्षा कारणों से 'प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने' को अपराध माना, लेकिन बिना हिंसा या उकसावे के केवल विचारधारा रखने को अभी भी अपराध नहीं माना जाता है। 3. श्याम बालकृष्णन बनाम केरल राज्य (2015) (सुप्रीम कोर्ट द्वारा समर्थित सिद्धांत के आधार पर ) इस विषय पर सबसे स्पष्ट टिप्पणी केरल हाईकोर्ट ने 2015 में की थी, जिसे बाद के कानूनी सिद्धांतों में आधार बनाया गया।अदालत ने कहा था कि "माओवादी होना कोई अपराध नहीं है।"*
               इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के अनुसार कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा: "भले ही माओवादियों की राजनीतिक विचारधारा हमारे संवैधानिक ढांचे से मेल न खाती हो, लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इस विचारधारा को मानने के लिए तब तक गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह देश के संविधान, लोकतंत्र और कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए किसी हिंसक या अवैध गतिविधि में शामिल न हो।" द हिंदू समाचार पत्र के मुताबिक इस फैसले का मुख्य निष्कर्ष यह था कि अदालतों का स्पष्ट मत है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां 'विचारों की स्वतंत्रता' (संविधान के आर्टिकल 19 के तहत ) हर नागरिक को प्राप्त है। कोई भी विचारधारा चाहे वह कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो तब तक कानूनी दायरे में है जब तक वह शांतिपूर्ण है। जैसे ही उसमें हिंसा, हथियारों का इस्तेमाल या देश को तोड़ने की साजिश शामिल होती है, वह कानूनन अपराध बन जाती है। इस हिसाब से भी "दिमागी नक्सल" अपराधी नहीं माने जा सकते जबकि संघ परिवार लगातार ऐसे फैसले ऐसे विवादित बयान और माहौल बनाता रहा है जिससे हिंसा को बढ़ावा देने के उस पर आरोप बढ़ते जा रहे हैं।

आईफोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था

*आई फ़ोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल भी जानलेवा है?*
                 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
             महाराष्ट्र के संभाजी नगर में एक बच्चे ने आई फ़ोन लेने की ज़िद पूरी नहीं होने पर जान दे दी। सतही तौर पर देखें तो बेशक आत्महत्या की वजह आई फोन ही नज़र आती है लेकिन बड़े परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखें तो एक बड़ी वजह हमारा बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था व विकास का उपभोक्तावादी असमान आय वाला असफल पूंजीवादी मॉडल भी है। आई फोन वाली घटना पर बाद में पहले इसी मॉडल पर बात करते हैं। एलपीजी यानि लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल मतलब उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की पूंजीवादी नीतियों ने आज पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हमारा देश भी 1991 से मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता छोड़कर पूरी तरह पूंजीवादी मॉडल को अपना रहा है। दक्षिणपंथी अधिकांश राजनीतिक दल पूरी तरह इस मॉडल के पक्ष में रहे हैं। भारत में भी बीजेपी ने 2014 से चुनाव अपने बल पर जीतने के बाद सांप्रदायिकता और कॉर्पोरेट का एक कॉकटेल बना लिया है। कहा जाता है कि कॉर्पोरेट ने चुनाव से पहले ही मोदी को पीएम मैटीरियल मानकर उनकी जीत के लिये पैसा पानी की तरह बहाया था। मोदी ने सत्ता हासिल करते ही बाक़ी बची हुई समाजवादी नीतियों को भी तिलांजलि देने की नीयत से पूरी तरह क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सबको पता है *पूंजीवाद उपभोक्तावाद को खुलकर बढ़ावा देता है। कॉर्पोरेट विज्ञापनों के ज़रिए बाज़ार में ऐसा माहौल बनाता है जिससे लोग उसके मोहपाश में फंसकर गैर ज़रूरी चीज़ें अधिक खरीदने लगते हैं। पैसा पास नहीं हो तो उधार लेते हैं। बाज़ार लोगों के दिमाग़ को कंट्रोल करने लगता है। कंपनियां अपनी बिक्री और बेतहाशा मुनाफा कमाने के एकसूत्री लक्ष्य को हासिल करने के लिए बाज़ार को उन सामानों से पाट देती हैं जो लोगों की वास्तविक या बुनियादी जरूरतों का नहीं होता। चंद पूंजीपतियों को देश के सब संसाधन कारोबार और मोनोपली वाली उत्पादन की कंपनियां सौंप देने से उनका अर्थव्यवस्था पर एकक्षत्र कंट्रोल हो गया है। आज देश में बाज़ार तय कर रहा है कि लोग क्या खायेंगे क्या पहनेंगे और क्या क्या खरीदेंगे?* 
         इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन लोगों की इतनी आमदनी नहीं है कि वे आई फोन या कोई और महंगा गैजेट खरीद सकें उनको उसके बिना समाज में हीन भावना भी बाज़ार महसूस कराता है। यह समाज में फैशन बन जाता है। ऐसे में लोग ये विलासिता की चीज़ें उधार किश्तों पर खरीद लेते हैं। बाद में जब अचानक नौकरी चली जाती है या कोई और बड़ा खर्च स्वास्थ्य शिक्षा या शादी का आ जाता है तो कर्ज़ की किश्तें रुक जाती हैं। ऐसे में क़र्ज़ देने वाली कंपनी अपने ऑफिस से से ही आपका उधार खरीदा गया मोबाइल अपने सिस्टम से लॉक कर देती है और लाखों का मोबाइल अचानक डब्बा बनकर वेस्ट मैटिरियल बनकर एक कोने में चला जाता है। यह आघात गरीब और मीडियम क्लास लोग क्या किसी भी वर्ग के आदमी को बर्दाश्त नहीं होता। क़र्ज़ पर लिए और भी सामान का किश्तें रुक जाने पर कंपनी के दबंगों द्वारा यही हश्र होता है। उसके बाद इस सदमे में डूबा बच्चा हो बड़ा हो या कोई बुद्धिजीवी अवसाद में चला जाता है। तनाव और दुख में आत्मघाती कदम भी उठा लेता है जिससे वह खुद ही नहीं पूरा परिवार तबाह हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। चलना भी चाहिए। समाज में सम्मान से रहने को कई मामलों में साथ चलना पड़ता भी है लेकिन हम सबका आर्थिक स्तर समझ का स्तर शिक्षा का स्तर और आय इतनी नहीं है कि हम अमीर लोगों या विकसित देशों की बराबरी कर सकें। आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां रोज़गार बढ़ने की बजाए कई क्षेत्रों में तो घट रहे हैं ए आई की वजह से कुछ कंपनियों में नौकरी कम हो रही हैं। ट्रैजिडी यह है कि देश की कुल आय और प्रॉपर्टी का बड़ा हिस्सा चंद पूंजिपतियों की तिजोरी तक सीमित होता जा रहा है। आम आदमी के पास जब पर्याप्त आय नहीं होगी तो रहने को अच्छा घर पौष्टिक खाना स्टैंडर्ड का रहन सहन पहनावा अच्छी शिक्षा और बेहतर चिकित्सा कहां से आयेगी? *यही वह पूंजीवादी असफल ग़ैर समावेशी विकास का जानलेवा मॉडल है जिससे कोई बच्चा पेपर लीक होने से कोई परीक्षा में असफल होने से कोई इंटरव्यू में पक्षपात होने से कोई नौकरी नहीं मिलने से कोई नौकरी छूट जाने से तो कोई इंसान क़र्ज़ अदा नहीं कर पाने से कोई बीमारी का महंगा इलाज नहीं करा पाने से कोई किसान फ़सल उजड़ जाने से कोई पीड़ित थाने में रिपोर्ट नहीं होने से कोई कोर्ट में केस हार जाने से कोई स्कैम में लाखों का फ्रॉड होने से और कोई आई फोन नहीं खरीद पाने से जान देने को मजबूर हो जाता है।*
        अब बात करते हैं उस घटना पर जिसमें महाराष्ट्र के संभाजीनगर का एक बच्चा आई फोन लेने की ज़िद में पास की 300 मीटर ऊंची पहाड़ी पर चढ़ गया। उसको बचाने उसके पिता पहाड़ी पर चढे़ तो वे भी उसके साथ साथ संतुलन खोने से फिसलकर नीचे गिर गये। यह अनर्थ देखकर उस बच्चे की मां ने भी पहाड़ी से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान सदमें में दे दी। कुछ ही पल में देखते ही देखते पूरा परिवार मौत के आगोश में समा गया। दिल्ली में एक वेंडर ने महंगा आई फ़ोन फाइनेंस कराया था। वह जब उसके लोन की किश्तें टाइम पर जमा नहीं कर पाया तो उसने भी जान देने को यमुना में छलांग लगा दी लेकिन पास के लोगों ने उसे बचा लिया। सतही तौर पर देखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि मोबाइल की वजह से तीन जानें चली गयीं। कुछ को लगता है कि आईफोन की वजह से ऐसा हुआ क्योंकि मोबाइल तो आजकल लगभग सभी के पास हैं। इस परिवार के पास भी होगा। अगर नहीं भी होता तो पहले से मांग कर रहे बच्चे को कोई सस्ता सा मोबाइल दिलाना कौन सी बड़ी बात थी? लेकिन आई फोन चूंकि बहुत महंगा होता है इसलिये यह परिवार आईफोन नहीं दिला पाया होगा जिससे पूरा परिवार असमय ही काल के गाल में समा गया?
          बच्चा चला गया उसके मातापिता चले गये यानी पूरा परिवार खत्म हो गया। कभी कभी हम चीज़ों को बहुत सतही तौर पर देखते हैं। उसकी वजह यह है कि हमें केवल जितना बाहर से दिखता है। यानी जितनी जानकारी हमारे सामने आती है। उसी पर चर्चा करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। यह कहना बहुत आसान है कि आज मोबाइल ने बच्चो को बिगाड़ दिया है। उनको ज़िद्दी बना दिया है। कुछ लोग बड़ों के भी मोबाइल के इस्तेमाल के नुकसान गिनाने लगते हैं। कुछ कहते हैं कि जब से मोबाइल आया हर कोई मोबाइल में ही लगा रहता है। वह किताब अखबार और परिवार को समय नहीं देता। वह सामाजिक नहीं रह गया है। वह अनैतिक होता जा रहा है। वह मोबाइल पर पोर्न देखता है। फिल्में देखता है। गाने सुनता है। रील देखता है। अंजान लोगों से चैट करता है। हर समय व्हाट्सएप फेसबुक एक्स थ्रेड यू ट्यूब ईमेल और इंस्टाग्राम पर लगा रहता है। किसी के पास परिवार से बात करने साथ बैठने खाना खाने नाश्ता करने और पिकनिक के लिये भी टाइम नहीं है। यहां तक कि जब लोग किसी ग़म या खुशी के प्रोग्राम में भी जाते हैं वहां भी अपने मोबाइल में ही बिज़ी रहते हैं। लेकिन सच केवल इतना ही नहीं है।
        मोबाइल पूरी दुनिया में आया है। वहां भी ये सभी एप चलते हैं। वहां भी लोग चैट करते हैं। हर देश में मनोरंजन करने वाले लोग हैं। वहां लोगों को ये सब शिकायते मोबाइल से नहीं हैं। उन्होंने अनुशासन अपनाया हुआ है। उनके यहां नैतिकता मौजूद है। उन्होंने एक सिस्टम बनाया हुआ है। यानी उनको मोबाइल से कोई शिकायत नहीं है। वे मोबाइल को इस्तेमाल करते हैं। वे मोबाइल के एडिक्शन के शिकार नहीं हैं। सच यह है कि अगर इंसान परिवार और समाज मोबाइल ही नहीं हर चीज़ का व्यवस्थित सुनियोजित और समय के हिसाब से नपा तुला इस्तेमाल करे तो मोबाइल ही नहीं किसी चीज़ से कोई परेशानी नहीं होगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।
   इसलिये सावधान रहें सजग रहें और अपनी सीमा में रहकर ही खरीदारी करें। अपने बच्चों को शुरू से ही अपनी आय अपनी खरीद क्षमता और अपनी उपभोग सीमा से परिचित करायें, अच्छे बच्चे के संस्कार सिखायें और उनसे समय समय पर अनुशासन व अच्छे नागरिक बनने अच्छा इंसान बनने और माता पिता का कहना मानने के फायदे बतायें। बच्चों से संवाद बनाये रखें। इसके साथ ही हमें ज़रूरत और विलासिता की इच्छा में भी अंतर करना सीखना चाहिए। उपभोक्तावाद बाज़ार के जाल और विज्ञापनों के चंगुल से अपने बच्चों परिवार और खुद को बचाने का प्रयास करें। फिलहाल बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बचने निबटने और नुकसान कम करने का यही तरीका है। वसीम बरेलवी ने शायद ऐसे ही बच्चों के लिए एक शेर कहा है...
*"नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है"*

महंगे इलाज से गरीब बनते लोग...

*जितने लोग हर साल ग़रीबी की रेखा से ऊपर आ रहे हैं, उससे ज़्यादा नीचे क्यों जा रहे हैं ?* 
           *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      नेशनल हेल्थ एकाउंट के अनुसार भारत में हर साल महंगे इलाज के कारण 3 से 6 करोड़ लोग मध्यम वर्ग से गरीबी की रेखा से नीचे या उसके करीब पहुंच जाते हैं। पहले यह आंकड़ा 5.5 से 10 करोड़ तक आंका जाता था लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर होने, उनके जागरूक होने पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ने और सरकार द्वारा चलाई गयी आयुषमान भारत योजना से बड़ी संख्या में लोगों को हाॅस्पिटलाइजे़शन खर्च में कुछ राहत मिली है। नीति आयोग का कहना है कि हर साल 2.5 से लेकर 2.7 करोड़ भारतीयों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला जा रहा है। सरकार का कहना है कि आयुष्मान कार्ड धारकों की संख्या इस समय देश में 45 करोड़ से अधिक हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि 12.69 करोड़ लोग इस योजना के तहत हर साल पांच लाख रूपये तक का अब तक निशुल्क उपचार का लाभ ले चुके हैं। समस्या यह है कि सरकार की यह योजना गरीब वर्ग के लिये होने से मीडियम क्लास के लगभग 40 करोड़ लोगों को इससे कम ही लाभ मिला है। दरअसल बीमारी किसी की आय नहीं देखती अगर किसी को अचानाक गंभीर बीमारी में अस्पताल में भर्ती होकर आईसीयू हार्ट आॅप्रेशन या कैंसर होने पर कीमियोथेरेपी करानी पडे़ तो उस परिवार पर इतना अधिक आर्थिक बोझ आ जाता है कि उसका मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। 
         *जहां विकसित देशों में नागरिक स्वास्थ्य खर्च का मात्र 20 प्रतिशत स्वयं वहन करते हैं वहीं हमारे देश में यह आंकड़ा 45 से 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।* जबकि विकसित देशों में लोगों की आय का स्तर भी हमसे काफी अधिक ही है। गंभीर बीमार होने हार्ट अटैक ब्रेन हेम्रेज लकवा एक्सीडेंट या कोई और ज़रूरी आॅप्रेशन कराने के लिये एक बार निजी अस्पताल में भर्ती होने पर कम से कम 50,000 खर्च आता है। चाइल्ड बर्थ में सीजे़रियन केस होने पर यह खर्च और अधिक हो जाता है। सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत सबको पता ही है वर्ना यहां यह खर्च 6500 तक ही होता है। सरकार जीडीपी का मात्र 1.5 प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च करती है। थ्री स्टार से फाइव स्टार तक अस्पताल में यही खर्च लाखों रूपयों तक पहुंच जाता है। जिसके लिये लोगों को जेवर ज़मीन मकान बेचकर या महाजन से ब्याज पर पैसा उधार लेना होता है। इसके बाद ऐसे परिवार लंबे समय तक कर्ज़ के जाल में उलझकर बच्चो की पढ़ाई मकान का निर्माण और शादी तक को टालने को मजबूर हो जाते हैं।
        *संसद की एक समिति ने पिछले दिनों महंगे इलाज की शिकायतों को बढ़ता देखकर सरकार से सिफारिश की है कि सभी उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्रों के लिये यह ज़रूरी किया जाये कि वे रोगी को भर्ती करते हुए लंबे इलाज का अनुमानित खर्च उसके परिवार को अनिवार्य रूप से स्पश्ट करें। समिति ने उपचार के मानक नियम और तौर तरीकों उपलब्ध सुविधाओं और सभी तरह के खर्च के बारे में भी पारदर्शिता लाने के नियम लागू करने का सुझाव दिया है। उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक मामले में वी द पीपुल संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली जा रही भारी फीस को मजबूरी का फायदा उठाते हुए एक तरह से लूटना बताया। पीठ ने इस मामले में वर्तमान कानून को अपर्याप्त बताते हुए नये कानून की ज़रूरत और ऐसे निजी अस्पतालों को सरकार द्वारा सशर्त दी गयी निशुल्क ज़मीन लेने के बाद भी गरीब लोगों का सस्ता इलाज नहीं करने पर सख्त कानूनी कार्यवाही पर ज़ोर दिया।* सरकार और कोर्ट के रूख से यह पता तो लगता ही है कि महंगा इलाज देश में लोगों के लिये बहुत बड़ी असहनीय समस्या बन चुका है।
       *एनएसएसओ के एक सर्वे के अनुसार देश में 45 साल से अधिक उम्र के अधिकांश लोग नियमित रूप से दवा खाने को विवश हैं। आंकड़ें बताते हैं कि कुल इलाज का 72 प्रतिशत खर्च केवल दवाओं को खरीदने में ही होता है। इससे देश में दवा उद्योग एक बड़ा कारोबार बन गया है। भारत में आज एक लाख करोड़ से अधिक का दवा व्यवसाय चल रहा है। जिसमें सरकारी दवा कंपनियों की हिस्सेदारी मात्र 400 करोड़ की है। सरकार की इस नाम मात्र की भागीदारी से निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों की मोनोपोली स्थापित हो चुकी है। हालांकि सरकार ने जीवन रक्षक दवाओं के मूल्य नियंत्रण के लिये 348 दवाओं के दाम निर्धारित करने का दावा किया है लेकिन इसमें सरकारी अधिकारी और निजी कंपनी के अफसर मिलकर एक खेल यह करते हैं कि उन्होंने किसी भी दवा उत्पाद में एक प्रतिशत से अधिक का हिस्सा रखने वाली ब्रांडेड कंपनियों द्वारा ही निर्धारित किये गये अलग अलग मूल्यों का औसत निकालकर उस दवा का अधिकतक दाम तय कर दिया है। जबकि सबको पता है कि निजी दवा कंपनियां लागत पर 500 से 1000 प्रतिशत तक का मुनाफा वसूल रही हैं।* जिससे गरीब लोगों को ज़रूरी दवायें सस्ते रेट पर प्राइवेट ब्रांडेड कंपनियों से ही उपलब्ध कराने की सरकार की कवायद एक औपचारिकता दिखावा और मृगमरीचिका बन कर रह गयी है। इसके साथ ही दवा नियामक नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग आॅथोरिटी का यह दावा आज भी दावा ही है कि वह दवाओं के दाम निर्धारित सीमित और आम आदमी की पहुंच में रखने के लिये निजी दवा कंपनियों को मुनाफाखोरी से रोकने लिये बाज़ार के हवाले नहीं करेगी बल्कि लागत के हिसाब से दवाओं के रेट तय करने के लिये प्रयासरत है। सरकार दवा बाज़ार का यह सच जानती है कि पंूजीवादी सिस्टम में दवा कंपनियां भी अपना मुनाफा मरीजों की जान की परवाह नहीं करते हुए हर हाल में बढ़ाने की कोशिश में लगी होंगी फिर भी उनको बेकाबू छोड़ दिया गया है। 
          सरकार की यह अनदेखी या अपराधिक लापरवाही की यह हालत तब है जबकि *काॅरपोरेट मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपनी एक स्टडी में यह पाया है कि देश की अधिकांश दवा कंपनियां दवाओं की लागत में 1100 प्रतिशत तक का लाभ जोड़कर दवाओं को बेच रही हैं।* एनएफपीए के तमाम नियामकों नियमों और शर्तों को धता बताते हुए दवा कंपनियां हाईकोर्ट के अनुसार लोगों की मजबूरी का नाजायज लाभ उठाकर उनको एक तरह से लूट रही हैं। साथ ही दवा कंपनियां सरकार के किसी भी नये कानून नियमन और रेग्यूलेटर का भी खुला विरोध करती चली आ रही हैं। यही कारण है कि लोग दवा कंपनियों की मनमानी के खिलाफ कोर्ट जाने लगे हैं। *मानकों से अधिक मूल्य वसूलने के लिये निजी दवा कंपनियों के खिलाफ कोर्ट में 900 से अधिक मामले चल रहे हैं। इनमें से कुछ मुकदमों में अदालत ने इन दवा कंपनियों पर हज़ारों करोड़ का जुर्माना भी लगाया है लेकिन इन ब्रांडेड दवा कंपनियों के दुस्साहस की हालत यह है कि इन्होंने मात्र 250 करोड़ अर्थदंड ही अब तक जमा किया है।* इतना ही नहीं ये कंपनियां नियम कानून का मजाक उड़ाकर भी दवाओं का निर्माण भंडारण और बिक्री कर रही हैं। इसके साथ ही सरकार से नियामक को कंपनियों के हिसाब से चलने का निर्देश देने की मांग भी कर रही हैं। सरकार का रूख़ भी इस मामले में निजी दवा कंपनियों के बेकाबू दवा के दामों को लेकर कोई बहुत आशावादी या सकारात्मक नहीं लगता क्योंकि वह भी पूंजीवादी बाज़ारवादी और मुनाफाखोरी नीति आज के दौर में अपरिहार्य मानकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को महंगे इलाज के लिये इनके ही रहम ओ करम पर छोड़ चुकी है। अब तो शिक्षा व्यवस्था को बदलने को संघर्ष कर रहे युवा वर्ग से ही जनता को कुछ आस जगी है। यह अलग बात है कि युवा वर्ग ही अपनी पढ़ाई नौकरी व पेपर लीक की समस्या के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर भी नज़र डाले तो कुछ सुधार हो सकता है क्योंकि बीमार और बुज़ुर्ग लोग न तो आंदोलन करने की स्थिति में हैं न ही सरकार उनकी बात सुनेगी।

सत्ता नहीं व्यवस्था बदलो

*1947 के बाद जेन ज़ेड ने ही सत्ता की जगह व्यवस्था बदलने की मांग की है?*
                *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        6 अगस्त को मुंबई में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपना आक्रामक रुख़ छोड़कर जेन ज़ेड और जेन अल्फ़ा को वर्तमान पीढ़ी से ज़्यादा देशभक्त और ईमानदार बताया। ऐसा लगता है संघ ने सीजेपी के आंदोलन के भविष्य के बड़े ख़तरे को ठीक से समझकर अपने सुर बदल लिए हैं लेकिन यह एक दिखावटी बनावटी और सजावटी बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है। सबको पता है संघ दस मुँह से बोलता है। असली सवाल यह है कि क्या संघ का राजनीतिक मुखौटा यानी बीजेपी सीजेपी के दबाव में अपना हिंदूवादी पूंजीवादी और विभाजनकारी एजेंडा बदलने को मजबूर होगी? हमें लगता है नहीं। दरअसल बीजेपी और सीजेपी के एजेंडे में चंद मुद्दों पर थोड़े से मतभेद नहीं बल्कि दोनों के लक्ष्यों में ज़मीन आसमान का फ़र्क है। यह ठीक है कि मोदी सरकार को झुकाने का जो काम पिछले 12 साल में कांग्रेस, विपक्ष या इंडिया गठबंधन नहीं कर पाया वो सीजेपी ने 36 दिन में कर दिखाया। सीजेपी के साथ युवाओं का 26.2 प्रतिशत वोट खड़ा न हो जाए यह डर संघ को है। उसके पास विपक्ष के नेताओं की तरह खोने को भी कुछ नहीं है। युवा होने के कारण वे निडर भी हैं। वे अपना भविष्य चौपट देखकर करो या मरो की लड़ाई लड़ने के लिए सर पर कफ़न बांधकर मैदान में उतरे हैं। वे विरोध करने वालों को गालियां देने पर ईंट का जवाब पत्थर से देकर बीजेपी आईटी सेल और संघ को सकते में डाल देते हैं। वे सोशल मीडिया के संघ परिवार से बड़े खिलाड़ी हैं।
        सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके ने बीजेपी से कहा है कि वे भागवत की बात सुनें क्योंकि वे बीजेपी के मेंटर हैं। लेकिन सब जानते हैं बीजेपी नहीं सुनेगी क्योंकि वह जानती है कि भागवत एक रणनीति के तहत युवाओं को पटाने के लिये केवल लिप सर्विस कर रहे हैं। दीपके ने यह भी कहा है कि हमारी विचारधारा वही होगी जो हमारे संविधान की है। उनका यह भी कहना है वे तमाम दबाव और धमकी के बावजूद न तो बीजेपी में जाएंगे और न ही कोई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे। वे दिल्ली में आप और असम में आसू का हश्र देख चुके हैं। वैसे भी मान लो अगर किसी लालच में दीपके बीजेपी में चले भी जाएं या डरकर अपने घर बैठ जाएं तो भी इस आंदोलन की कमान कोई और संभाल लेगा। गुजरात के पटेल आंदोलन के मुखिया हार्दिक पटेल के बीजेपी में जाने की तरह सीजेपी का आंदोलन इससे खत्म नहीं होगा। दीपके कहते हैं वे राजनीति में इसलिए भी नहीं जाएंगे क्योंकि उससे जनता का भरोसा खत्म हो चुका है। ईडी सीबीआई और चुनाव आयोग से दल तोड़े जा रहे हैं। वे कहते हैं देश को बड़े जन आंदोलन की ज़रूरत है। सीजेपी का दावा है हर वह हर आदमी गुलाम है जो अपने मन की बात नहीं कह सकता।सीजेपी की मुख्य नेता नेहा बोहरा तो यहां तक कहती हैं कि हमने अगर नफ़रत की सियासत की चूलें नहीं हिला दी तो धिक्कार है हमारी छात्र राजनीति पर। इन बयानों से पता लगता है वे अपने मकसद को लेकर स्पष्ट और अडिग हैं।
         पेपर लीक से शुरू हुआ सीजेपी का आंदोलन शिक्षा सुधार से होता हुआ अब व्यवस्था परिवर्तन पर ज़ोर दे रहा है। हालांकि भागवत ने बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की बात भी कही लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए फिर शिक्षा बजट 5 से घटाकर आज मोदी सरकार ने ढाई प्रतिशत क्यों कर दिया? भागवत इस अहम सवाल पर बचकर निकल गए कि छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज और पेलेट गन का इस्तेमाल क्यों हुआ? क्या यह संभव है उनको अपनी ही सरकार के इस फैसले का पता नहीं हो? *सीजेपी ने आंदोलन के दौरान एक नारा दिया था "सरकार बीजेपी की हो कांग्रेस की हो आप की हो या आपके बाप की हो, सबको जवाबदेही करनी होगी" यही वह टकराव का वास्तविक बिंदु है जिस पर सीजेपी बीजेपी को अपना एजेंडा बदलने पर मजबूर करना चाहती है। सीजेपी ने अब इस जवाबदेही में कोर्ट को भी शामिल कर लिया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को जब सुप्रीम कोर्ट ने अंडो के डर से वर्चुअल पेशी की इजाज़त न देते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के सीने पर गोली खाने की दुहाई दी तो दीपके और सौरभ दास ने जज साहब को आड़े हाथ लेते हुए लिखा कि क्या सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि हर कोई गोली खाए? जब सुप्रीम कोर्ट के जज अपोजिशन लीडर्स के खिलाफ़ इस तरह के बयान देते हैं, तो आम आदमी के लिए क्या उम्मीद बचती है? सीजेपी के सह संयोजक सौरभ दास ने तो यहां तक कह दिया कि हमने किस तरह के बड़बोले लोगों को जज बनाया है? हमें ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी तय करने की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की बेरोजगार युवाओं पर अपमानजक टिप्पणी के जवाब में बनी कोकरोच जनता पार्टी अब सरकार के साथ ही कोर्ट जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी खुलकर सवाल उठा रही है। इससे सुप्रीम कोर्ट के रुख़ में भी बदलाव आए या नहीं आए लेकिन जज सफाई देते नज़र आ रहे हैं। दीपके ने अमेरिका में अपनी पढ़ाई के खर्च पर भी तीखा जवाब देते हुए कहा कि वे मेरे पेपर देखने से पहले मोदी की डिग्री और पीएम केयर फंड का हिसाब दें। 
         सीजेपी बीजेपी की असली लड़ाई इसी मुद्दे पर है कि जनता नहीं सरकार सेवक है। इसीलिए उसकी ही जवाबदेही है। सीजेपी 70 साल से अधिक आयु के नेताओं को घर या आश्रम भेजने की भी मांग कर रही है जो संघ तो कभी भी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उनके यहां मरते दम तक प्रमुख बने रहने का नियम है। खुद मोदी 75 साल से अधिक आयु वालों को मार्ग दर्शक मंडल में भेजने का नियम बनाकर उसे अपने लिए लागू करने से मुकर गए। सबको पता है संघ बीजेपी सत्ता का इस्तेमाल अपना हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने के लिए कर रहे हैं। इसके लिए संविधान लोकतंत्र और कानून के राज को भी ताख पर रख दिया गया है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। इतिहास बदला जा रहा है। कोर्स की किताबों में झूठ लिखकर हिन्दू मुस्लिम के बीच नफ़रत की दीवार चौड़ी की जा रही है। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। जिससे शिक्षा न केवल महंगी हो रही है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी नीचे जा रही है। सरकारी संस्थाओं का निजीकरण करके चोर दरवाज़े से आरक्षण खत्म किया जा रहा है। सरकारी यूनिवर्सिटीज में संघी वीसी और कॉलेजों में संघी प्राचार्य भेजे जा रहे हैं। जहां वे तैनात नहीं हो पाए हैं वहां एक संघी बड़े वेतन पर उनका ओएसडी या पीआरओ बनाकर डिक्टेट करने के लिए उनके सर पर रखा गया है। कॉर्पोरेट को चंदा दो धंधा लो नीति के तहत खुलकर लूटने की छूट दे दी गई है। सरकारी ठेकों में कमीशन अब तक का सबसे अधिक वसूला जा रहा है। जिससे आए दिन पुल और एक्सप्रेस वे ध्वस्त हो रहे हैं।बेसहारा जानवर सड़कों पर मौत तो खेतों में किसानों की फसल तबाह कर रहे हैं। प्रशासनिक भ्रष्टाचार पहले से कई गुना इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि वर्तमान सरकार भ्रष्ट अफसरों से मासिक लक्ष्य देकर बेशर्मी से वसूली कर रही है। 
          संघ परिवार वाले अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि विरोध करने वाले बेकसूर होकर भी जेल में सड़ते रहते हैं। काले धन से चुनाव जीते जा रहे हैं। बाद में जरूरत पड़ने पर विपक्षी विधायक सांसद भी ख़रीद लिए जाते हैं। राम नवमी कांवड़ यात्रा और आएदिन धार्मिक शोभायात्रा को इसी तरह के अकूत धन से फंडिंग भी की जा रही है। संघ बीजेपी ने फाइव स्टार ऑफिस बना लिए हैं। जहाजों से सफर कर रहे हैं। बड़े बड़े होटलों में ठहर रहे हैं। वे विरोध बिल्कुल सहन नहीं करते। इससे सत्ता जाने का खतरा है। विपक्ष को लेवल प्लेइंग फील्ड खत्म कर चुनाव जीतने से वंचित कर दिया गया है। कांग्रेस और विपक्ष की सरकारें चाहे कितनी भ्रष्ट और घमंडी रही हों लेकिन बीजेपी की तरह तानाशाह नहीं रहीं, वे जनता से ऊपर नहीं थीं। *यही वजह है कि सीजेपी समझ गई है कि व्यवस्था बदलनी है तो सत्ता को ही बदलना होगा। संघ बीजेपी सांप्रदायिक जातिवादी झूठी नफरती फासिस्ट और असमानता व अमानवीय सोच से चलती हैं जिनको सीजेपी ने ठीक से परखकर आरपार की जंग छेड़ने का मन बना लिया है। उनका नारा भी है। "मोदी जब जब डरता है, हिंदू मुस्लिम करता है।" इसलिये यह साफ़ है कि सीजेपी बीजेपी के जनविरोधी शिक्षा व रोज़गार विरोधी एजेंडे को बदलने के लिए उसके सत्ता से बेदखल होने तक सतत संघर्ष का इरादा कर चुकी है क्योंकि संघ बीजेपी युवाओं को ही नहीं सभी जनता को गुलाम अनुयायी और सेवक बनाना चाहते हैं और इसीलिए सरकार की बजाए उल्टा बार बार नागरिकों के कर्तव्यों का राग अलापता रहते हैं।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*

प्रिशा बेटा ईश्वर से कहना...

*आज की बात... हिंदुस्तानी*
*प्रिशा बेटा ईश्वर से कहना हम सबको कभी माफ़ नहीं करे...?* 
          हल्दौर के पत्रकार भाई संजीव मिश्रा की सात साल की बेटी प्रिशा अब इस दुनिया में नहीं है। उसको बुख़ार था। उल्टी आ रही थीं। इस मौसम में यह आम बात है। संजीव मिश्रा उसको बिजनौर इलाज को लाये थे। शायद सोचा होगा बिजनौर बड़ा शहर है। अच्छा इलाज मिलेगा। लेकिन यहां तो नजीबाबाद रोड के एक अस्पताल में कई घंटे इलाज ही नहीं हुआ। डॉ ने देखा तक नहीं। उसको दूसरे हॉस्पिटल में रेफर भी नहीं किया। यह हॉस्पिटल है या बूचड़खाना? डॉ को लोग भगवान का दर्जा देते हैं क्योंकि वे मरते लोगों को दूसरा जीवन देते हैं। लेकिन यहां तो डॉ "यमराज" बन गए। इतने क्रूर, इतने स्वार्थी और इतने असंवेदनशील? 
       जब हमने रात को यह खबर सुनी, खाना नहीं खाया गया। भूख गायब हो गई। रात भर नींद भी नहीं आई। उस मासूम बच्ची का चेहरा नज़रों में घूमता रहा। आँखों में खुद ही आंसू आते रहे। दिल दुखता रहा। वो नादान बच्ची ज़िन्दा आई थी और एक दिन बाद उसकी डैड बॉडी घर लौटी। उसके और उसके मातापिता के कितने सपने रहे होंगे। वो बड़ी होती। पढ़ती लिखती। कुछ बनती। हो सकता था देश और समाज के लिये कुछ नया करती। अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती। उसकी शादी होती। हंसता खेलता परिवार होता। मातापिता नाना नानी बनते। कितने खुश होते सब। लेकिन एक भूल एक गलती और आपराधिक लापरवाही ने उस घर का गोद लिया एक मात्र चिराग़ भी बुझा दिया। अब संजीव भाई और उनकी पत्नी उनके परिवार के दूसरे लोग किस के सहारे जियेंगे? किसके लिए जिएंगे? ज़िंदगी में एक बड़ा शून्य आ गया। एक खालीपन आ गया। एक बड़ी कमी आ गई। अब उनको दुनिया वैसी नहीं लगेगी जैसी प्रिशा के ज़िंदा रहते लगती थी। सब खोखला बेमतलब और बेकार नज़र आयेगा। 
      प्रिशा बेटा यह उम्र नहीं थी तेरे जाने की, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। प्रिशा बेटा हम सब तेरे गुनहगार है। हमारा पूरा सिस्टम तेरा "हत्यारा" है। आरोप है इसी अस्पताल में ऐसे तीन केस तीन माह में हो चुके हैं। ऐसे और भी जानलेवा अस्पताल होंगे। ऐसे और भी लापरवाह डॉक्टर होंगे। बेशक अच्छे अस्पताल और अच्छे डॉक्टर भी हैं। लेकिन शासन प्रशासन और समाज बुरे लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। हमारा सारा सिस्टम लगभग फेल हो चुका है। ऐसी कोई घटना होती है तो कुछ पल कुछ घंटे और कुछ दिन क्षणिक आवेश में हंगामा मचता है। फिर जांच होती है। फिर कुछ दिन बाद जांच कंप्रोमाइज हो जाती है। जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली जाती है। उस पर ठोस एक्शन नहीं होता। मेडिकल ही नहीं सभी फील्ड में लगभग ऐसा ही है। सब जगह सेटिंग करने वाले बैठे हैं। बस कीमत अलग अलग है। बस उन तक पहुंच होनी चाहिए। इंसान की जान सबसे सस्ती है। हम लोग ज़िंदा लाशें बन चुके हैं। हमारा ज़मीर हमारी आत्मा हमारा ईमान कब के मर चुके है। ऐसा लगता है हम लोग इस धरती पर बोझ हैं। हम में भावनाएं नहीं हैं। प्रिशा हम शर्मिंदा है। प्रिशा बेटा हम सब पापी हैं। प्रिशा बेटा हमें माफ़ मत करना, ईश्वर से कहना हमारे समाज को ऐसी सज़ा दे जिससे हम पैसे की जगह इंसान की जान की कीमत समझें। ईश्वर से शिकायत करना जिससे हम लोग सुधर जाएं। शायद वरिष्ठ पत्रकार भाई सूर्यमणि रघुवंशी और उनके साथी पत्रकार धरना नहीं देते तो डॉ माफ़ी भी नहीं मांगते। भला हो बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह एडवोकेट और किसान यूनियन अराजनीतिक के पदाधिकारियों व अन्य समाजसेवी संस्थाओं का जिन्होंने मानवता दिखाते हुए इस धरने को तत्काल सपोर्ट किया। आजकल हमारे समाज का यह हाल है...
*मौत के डर से नाहक परेशान हैं,* 
*आप ज़िंदा कहां हैं जो मर जाएंगे.*

रिश्तों में धोखा

*रिश्तों में धोखा बदला और ब्लैकमेल का क्या काम है?*
               *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         इलाहाबाद हाईकोर्ट के साथ ही सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि कुछ लोग एक दूसरे से प्यार करते हैं, सेक्स करते हैं और फिर जब किसी बात पर रिश्ते खराब हो जाते हैं तो रेप का केस दर्ज कराकर अपने प्रेमी को जेल भेजने के लिए अदालत में चले आते हैं। कोर्ट ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि सब मुकदमों में ऐसा नहीं होता लेकिन दहेज़ एक्ट की तरह शादी से पीछे हटने पर अकसर ऐसे फ़र्ज़ी मामले सामने आ रहे हैं।
         वास्तव में यह एक नया ट्रेंड है। लड़के लड़की आपस में प्यार करते हैं। साथ घूमते फिरते हैं। खाते पीते हैं। कुछ लिव इन रिलेशन में भी रहने लगते हैं। इस दौरान नज़दीकी और खुलापन बढ़ने पर वे शादी से पहले ही जिस्मानी रिश्ते भी बना लेते हैं। आम तौर पर प्रेमी प्रेमिका से ऐसा करने से पहले शादी का वायदा करता है लेकिन एक दूसरे से मन भर जाने और किसी बात पर मतभेद हो जाने पर दूरियां बढ़ने लगती हैं। इसके बाद कुछ मामलों में लड़की लड़के को ब्लैक मेल भी करती है। कुछ लड़के भी लड़की को बदनाम करने का डर दिखाकर उसको धोखा देते हैं। अगर वह शिकायत करने की बात कहती है तो लड़का उसको बदनाम करने की धमकी देता है। कुछ प्रेमिकाएं गिफ्ट पैसा और दूसरी मांग करती रहती हैं। कुछ के बीच सब कुछ ठीक चलता रहता है लेकिन जब लड़की अचानक प्रेग्नेंट हो जाती है तब विवाद शुरू होता है। लड़का एबॉर्शन पर ज़ोर देता है। जबकि लड़की शादी की ज़िद पकड़ लेती है। कुछ केस ऐसे भी होते हैं जिनमें लड़का पहले से ही शादी कर चुका होता है और पोल खुल जाने के डर से लड़की से दूरी बनाने लगता है। ऐसे में लड़की ठगा सा महसूस करती है। लेकिन वह जानती है उसके सच बताने पर उसका परिवार समाज और कोर्ट उसको ही ग़लत बताएंगे। जबकि पुरुष प्रधान समाज में लड़के की बराबर ग़लती होने पर भी लड़के को इतना बुरा नहीं समझा जाता है। ऐसे केस होने के बाद भी उसकी शादी आराम से हो जाती है। उधर धोखे की शिकार लड़की की न केवल शादी होनी मुश्किल हो जाती है, उसकी दूसरी बहन का रिश्ता भी कठिन हो जाता है। कई बार लगा हुआ रिश्ता भी टूट जाता है। पूरे परिवार को बदनामी और शर्मिंदगी का सामना करना होता है।
        ऐसे मामलों में एक और प्रॉब्लम आती है। कोर्ट में जब केस जाता है लड़की अपने आरोपों को साबित नहीं कर पाती। इसकी वजह यह होती है कि न तो वे किसी रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के बाद रिश्ता बनाते हैं न ही उनके अंतरंग रिश्ते का कोई गवाह होता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि प्यार इश्क और डेटिंग ये सब बातें छिपकर ही की जाती हैं। हालांकि कुछ राज्य सरकारों ने अपने एजेंडे के तहत विपरीत जाति व धर्म के जोड़ों को ऐसा करने से रोकने को लिव इन रिलेशन के लिए रजिस्ट्रेशन ज़रूरी किया है, लेकिन ये लोग समाज और सरकार की नज़र से बचने को रजिस्ट्रेशन कराते ही नहीं हैं। कोर्ट की यह चिंता वाजिब है कि आप अपनी मर्ज़ी से साथ रहते हैं प्यार करते हैं और शारीरिक संबंध भी बनाते हैं लेकिन विवाद होने पर बलात्कार का आरोप लगाकर ब्लैकमेल करते हैं। सवाल यह है कि आपकी गलती नादानी और बचकानेपन की मूर्खता में अदालत अपना बेशकीमती टाइम ख़राब क्यों करे? 
*मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा, उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक़ याद किया।*
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।

Saturday, 1 August 2026

ए सी कोच में चोरी

*ए सी कोच में सफ़र करने वाले भी चोरी करते हैं?*
                  *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
               एक अंग्रेज़ी दैनिक की ख़बर के मुताबिक रेलवे के ए सी कोच में सफ़र करने वाले यात्रियों ने पिछले चार साल में 104.51 करोड़ के सामान की चोरी की है। इनमें जनवरी 22 से मई 26 के बीच 1.27 करोड़ बेड रोल, 46.54 लाख फेस टॉवल, 41.13 लाख बेडशीट 12.95 लाख कम्बल व 2.76 लाख तकिए शामिल हैं। हालांकि चोरी की यह रकम रेलवे के अटेंडेंट की सैलरी से हर माह कट जाती है, जिससे रेलवे को कोई नुकसान नहीं हुआ है। हो सकता है इस चोरी में कुछ बाहरी लोग भी शामिल हों लेकिन सवाल यह है कि रेलवे के ए सी कोच में अमीर और मीडियम क्लास लोग ही अधिक यात्रा करते हैं। वे भी चोरी करते हैं?
        आमतौर पर हमारा समाज गरीबों को चोर समझता है। इसकी वजह उनकी आय कम होने से ज़रूरी खर्च पूरे नहीं होना माना जाता है। कुछ लोग उनको नाकारा बताकर भी शॉर्ट कट से पैसा बनाने के आरोप में चोर बता देते हैं। जबकि ग़रीब, अमीर और मीडियम क्लास को पेट भरा होने के बावजूद चोरी करने वाला बताता है। उसका कहना है कि ये वर्ग टैक्स चुराकर ही अमीर बनता है। वे इस वर्ग पर बैंकों का पैसा मारकर दिवालिया बनने से सरकार यानी जनता का धन चुराने का आरोप लगाते हैं। *जबकि सच यह है कि सभी वर्गों में आपको अच्छे बुरे लोग मिल जाएंगे। इसे यह भी कह सकते हैं कि ईमानदार केवल वो है जिसे चोरी का मौक़ा नहीं मिलता है। लेकिन यह भी आधा सच है क्योंकि आपको ऐसे लोग भी सभी क्लास में मिल जायेंगे जो मौक़ा मिलने पर भी कभी चोरी नहीं करते।* 
       इतना ही नहीं आपको कम ही सही आज के कलयुग में भी ऐसे चुनिंदा लोग मिल जाएंगे जिनकी नीयत दूसरे के लाखों करोड़ों रूपये देखकर भी नहीं बिगड़ती। वे किसी का खोया पर्स ज्वैलरी और नोटों का बैग मिलने पर उसे तलाश करके वापस कर देते हैं। जहां तक रेलवे से बिस्तर चादर तकिये और तौलिया चोरी होने का सवाल है, करोड़ो लोग हर साल ए सी ट्रेन में सफ़र करते हैं लेकिन उनमें से 98 से 99% लोग कोई चोरी नहीं करते। लेकिन जो एक दो प्रतिशत चोरी करते हैं, उससे कहा जा सकता है। एक मछली ही तालाब को गंदा करने को काफ़ी है। रेलवे को चाहिए ये सामान देने से पहले लोगों से सिक्योरिटी जमा कराए। लोग खुद सामान वापस देने के लिए उतावले रहा करेंगे। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि हर कोच में कैमरे लगाए जाएं जिससे चोरी करने वालों को न सिर्फ़ पहचाना जा सके बल्कि पकड़ा जा सके और उनसे सामान के साथ भारी जुर्माना और उनको जेल भी भेजा जा सके। 
      *संस्कार ज़मीर और ईमान वाले लोग तो बहुत कम होते हैं जो मौक़ा मिलने पर चोरी धोखा और बे ईमानी नहीं करते वरना पूरी दुनिया में इंसान लगभग एक जैसे ही होते हैं। उनमें लालच झूठ और बे ईमानी मौजूद होती है लेकिन सरकार का सिस्टम मज़बूत हो तो उनको पकड़ लेता है, जिससे वे डरकर अपराध नहीं करते।* मिसाल के तौर पर भारतीय रेलवे में लोग खूब बिना टिकट चलते हैं, लेकिन दिल्ली मेट्रो में चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहां ऐसा करने का सिस्टम ही नहीं है।

जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मनोबल

*सरकार जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ना चाहती है?*
               *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      मौलाना मुहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के कुल 40 में से 38 कमरे बिना नक़्शा पास कराये बनाने के आरोप में रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण के आदेश पर हालांकि कमिश्नर आंजनेय कुमार ने फिलहाल तो स्टे कर दिया है, लेकिन योगी और अन्य बीजेपी सरकारों की अब तक की मुस्लिम विरोधी कार्यशैली देेखते हुए लगता नहीं कि यह स्टे स्थायी आदेश में बदलेगा। हालांकि यह मामला राहत नहीं मिलने पर कोर्ट में भी जायेगा लेकिन बड़ी अदालतों का रूख़ भी आजकल सरकार को नाराज़ नहीं करने का साफ़ देखा जा सकता है। दरअसल यह मामला एक यूनिवर्सिटी या गैर कानूनी निर्माण तोड़ने का नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ने का अधिक लगता है। जिस तरह से देश में अनेक मस्जिद और मदरसे आयेदिन अवैध बताकर तोड़े जा रहे हैं तो ऐसा नहीं है कि केवल यही अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल गैर कानूनी या बिना नक्शा पास कराये बने होंगे। लेकिन निशाना केवल इनको ही मुसलमानों को एक संदेश देने के लिये बनाया जा रहा है। हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभी कहीं कहीं अन्य धर्म वालों के आस्था स्थल और मकान दुकान भी तोड़े जाते हैं लेकिन उनका कारण कुछ और होता है। अयोध्या में राममंदिर के चढ़ावा चोरी और जंतर मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के बैनर तले देश में हुए युवाओं के अभूतपूर्व आंदोलन से जनता का ध्यान हटाने का भी सरकार का एक मकसद हो सकता है। 
           इससे पहले कई साल तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने का सरकार का अभियान भी मुस्लिम समाज को लंबे समय तक भय और तनाव में रखने में सफल रहा था। लेकिन बाद में उस समय के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ की बैंच ने आश्चर्यजनक तरीके से हिम्मत और निष्पक्षता दिखाते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल रखने का एतिहासिक आदेश दिया था। जिस पर मोदी सरकार इस अहम और संवेदनशील मुद्दे पर कोई अग्रिम कानूनी कार्यवाही नहीं करने पर मजबूर हो गयी थी। लेकिन उसकी मुसलमानों को मुख्यधारा से बाहर रखकर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने उनके साथ कदम कदम पर अन्याय और अत्याचार करने की नीति में कोई खास अंतर नहीं आया है। जौहर यूनिवर्सिटी को सपा के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान को सबक सिखाने के लिये भी निशाने पर लिया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सपा में आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच झेल चुके पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव, पूर्व सीएम अखिलेश यादव उनके चाचा और अपने राज में चर्चित और सबसे भ्रष्ट रहे शिवपाल यादव तथा राम गोपाल यादव साथ ही सपा में कई अन्य वरिष्ठ नेता मंत्री और अधिकारी भ्रष्ट नहीं थे जो केवल आज़म खान को ही सौ से अधिक मुकदमे कायम कर लगातार जेल में रखा जा रहा है? 
         विपक्ष का सवाल रहा है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी की तरह अनेक सरकारी और निजी यूनिवर्सिटियों में गैर कानूनी निर्माण और अवैध गतिविधियां नहीं हुयीं होंगी लेकिन केवल इसी को निशाने पर लेने का मकसद साफ मुसलमानों को अनपढ़ जाहिल और बेरोज़गार बनाये रखना नहीं माना जाना चाहिये? हालांकि यह बहुत गंभीर आरोप है लेकिन अगर जम्मू के वैष्णोदेवी मेडिकल काॅलेज में मैरिट के आधार पर 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों के एडमिशन होने पर सरकार उस काॅलेज की मान्यता ही रद्द कर देती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है। हाल ही में जंतर मंतर पर सीजेपी के आंदोलन में यूपी गाज़ियाबाद जिले के मसूरी निवासी जुनैद मालिक आंदोलन करने वाले युवाओं को खाना परोस रहा था। उसको दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया। उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसके राज्य यूपी ले जाया गया। उससे घंटों तक खाने की फंडिंग को लेकर दर्जनों सवाल पूछे गये। उसको रात के अंधेरे में हाईवे पर छोड़ दिया गया। उसके परिवार को भी पुलिस ने थाने बुलाकर डराया धमकाया। ऐसा और बच्चो के साथ भी हुआ है लेकिन इनमें मुस्लिम और दलित अधिक शामिल हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाला उमर खालिद अपने कई साथियों के साथ संविधान तिरंगा झंडा और भारत माता की जय के नारों के बीच कानून का सम्मान करते हुए भाषण देता था लेकिन उनको सरकार ने कई साल से जेल में डाल रखा है और बेल नियम जेल अपवाद बताने वाली कोर्ट उनको जमानत नहीं दे रही है। जबकि यह कानून ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ केवल मुसलमानों को शरणार्थी के तौर पर आने पर भारत की नागरिकता देने से मना करता है। 
           यूपी के गोरखपुर में जब सरकारी मेडिकल काॅलेज में आॅक्सीजन की सप्लाई ठेकेदार ने भुगतान नहीं होने के कारण काट दी तो वहां सेवा दे रहे बच्चो के डाक्टर कफील खान ने अपनी जेब से प्राइवेट आॅक्सीजन सिलेंडर खरीदकर कई बच्चो की जान बचाई थी। इससे वे हीरो बन गये। लेकिन नतीजा क्या हुआ उनको पुरस्कृत करने की बजाये उल्टा मुसलमान होने की वजह से झूठे आरोप लगाकर कई महीनों के लिये जेल में डाल दिया गया। बाद में वे एक भी आरोप साबित नहीं होने पर कोर्ट से बरी किये गये। कश्मीरी लोगों को धारा 370 हटाने के बाद कई माह तक घरों में लाॅकडाउन लगाकर कैद रखा गया और देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य का पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बना दिया गया। सद्दीक कप्पन नाम का एक राष्ट्रीय पत्रकार हाथरस में हुए दलित युवती के बलात्कार की रिपोर्टिंग करने यूपी आने के लिये जैसे ही मथुरा पहंुचा उसको यूपी पुलिस ने 2020 में विदेशी साज़िश का फर्जी आरोप लगाकर हिरासत में लिया और कई माह तक जेल में रखा। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रिहा हो सका था। सरकार सड़क पर दस मिनट की नमाज़ पर रोक लगाती है लेकिन इसी रोड हाईवे एक्सप्रैस वे को एक माह के लिये कांवड़ के लिये बंद कर दिया जाता है। अकेले मेरठ दिल्ली एक्सप्रैस वे पर इस दौरान 700 करोड़ के नुकसान का व्यापारियों का अनुमान है। इस दौरान मांस बेचने पर भी रोक लग जाती है। मुस्लिम दुकानदारों होटलों और ढाबों को भी अपनी पहचान सार्वजनिक करने पर मजबूर किया जाता है। जिससे उनका कांवड़ वाले खरीदारी में बहिष्कार कर सकें। 
            सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को आॅप्रेशन सिंदूर सफलतापूर्वक करने के बादवजूद एक मुस्लिम होने की वजह से बीजेपी के एक मंत्री आतंकियों की बहन बताते है और उनको कोई सज़ा नहीं मिलती। पूरे देश में आयेदिन मुस्लिम नामों वाले शहरों कस्बों गांवों और संस्थानों के नाम बदलकर हिंदू धर्म और संस्कृति के अनुसार रखे जा रहे हैं। सवाल है कि क्या यह देश मुसलमानों का नहीं है? किसी भी मुसलमान पर झूठा आरोप लगने पर भी तत्काल केस दर्ज हो जाता है और उसको जेल भेजने के साथ ही उसके दुकान मकान पर बुल्डोज़र भी चल जाता है। उसको ज़मानत भी अकसर देर से मिलती है। बाद में कोर्ट से वह बेकसूर साबित होने पर बरी हो जाता है तो ध्वस्तीकरण से उसके नुकसान का सरकार मुआवज़ा क्यों नहीं देती? हालांकि बुल्डोज़र अब गैर मुस्लिमों के यहां भी कई मामलों में जाने लगा है लेकिन वह भी गैर कानूनी ही है। बोट से गंगा की सैर कर बिरयानी खाने वाले एक दर्जन से अधिक मुस्लिम युवाओं को चिकन की हड्डी नदी में फेंकने पर महीनों के लिए जेल में रखा गया। बिहार से लेकर यूपी और कई बीजेपी शासित राज्यों तक में चुन चुनकर पहले अनेक मुस्लिम माफियाओं का गैर कानूनी तरीके से फर्जी एनकाउंटर करके एक खास संदेश दिया गया। बाद में यह कवायद सभी वर्गों के लिये आम हो चुकी है। गोमांस का आरोप लगाकर कई मुसलमानों की माॅब लिंचिंग की जा चुकी है। बाद में फोरेंसिक जांच में यह मीट भैंस का पाया जाता है। अंतरधार्मिक विवाह का कानून और संविधान में अधिकार होने के बाद भी लव जेहाद बताकर केवल उन मामलों को रोका और मारा पीटा जाता है जिनमें लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम होता है। 
           कई बीजेपी शासित राज्यों में काॅमन सिविल कोड के नाम पर सबके लिये एकसा कानून लाने का दावा कर आदिवासियों को इससे बाहर रखकर केवल मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है। कश्मीर फाइल, केरल स्टोरी, हिजाब विवाद, हज सब्सिडी, कोरोना जेहाद, लैंड जेहाद, थूक जेहाद, यूपीएससी जेहाद, काॅरपोरेट जेहाद, रामनवमी पर शोभायात्रा के नाम पर मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों के सामने आपत्तिजनक नारेबाज़ी, वक्फ बोर्ड कानून के द्वारा उनकी सम्पत्तियों पर सरकार की बुरी नज़र, फिल्मी सितारे शाहरूख़ आमिर और सलमान को तरह तरह से सताना, यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव द्वारा मुसलमानों को टारगेट करने के बाद भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होना, इसकी कई मिसाले मौजूद हैं। मुस्लिम विरोधी कई कानून बनाने के साथ ही असम और यूपी के सीएम आयेदिन ऐसे बयान देते रहते हैं जिनसे मुसलमानों को अपमानित प्रताड़ित और उनका मनोबल तोड़ा जा सके। इसलिये जौहर यूनिवर्सिटी तो नया बहाना है, इसके तोड़ने के आदेश के ज़रिये मुसलमानों का मनोबल तोड़ना अधिक प्रतीत होता है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा

*कॉकरोच आंदोलन सफल लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक बंद हो जाएगा?*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                 कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खत्म कराने को मजबूरी में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा तो हो गया लेकिन संघ बीजेपी और मोदी की कार्यशैली को जानने वालों को पता है, इससे पेपर लीक होना बंद हो ही जाएं यह ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता युवाओं की मांग पूरी होने से उनको लगा है कि सरकार झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। जहां तक सीजेपी के आंदोलन का सवाल है उसकी तुलना जे पे या अन्ना के आंदोलन से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें संगठन प्रबंधन और सरकार से मांगो पर वार्ता करने के लिए निगोशिएशन करने वाले अलग वरिष्ठ अनुभवी और विशेषज्ञ नागरिक मौजूद थे, जो इस आंदोलन में नज़र नहीं आये। सोनम वांगचुक जब सीजेपी के आंदोलन में शरीक हुए तब यह लग रहा था कि अब वे इसकी कमान सीजेपी के मुखिया अभिजीत दीपके से अधिक बेहतर संभाल सकते थे लेकिन उनको पुलिस ने जबरन उठाकर हॉस्पिटल भेज दिया, जिससे वे मुख्य मंच से बाहर हो गए। सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास के नेतृत्व में जो लोग स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से मिलने गए वे पहले दिन तो निराश होकर लौटे लेकिन दूसरे दिन शिक्षा मंत्री को हटवाने में सफल हो गए।
         दरअसल शिक्षा मंत्री को हटाने से यह व्यापक समस्या हल होने वाली नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक या आंदोलन की बड़ी सफलता तो लोगों को दूर से दिखाई दे रही है, है भी लेकिन ठीक ऐसा ही होगा जैसे किसी अस्पताल का पूरा सिस्टम सुविधाएं मशीनें नियम कानून उपलब्ध सीमित दवायें और इलाज की सीमाएं बदले बिना डॉक्टर बदलकर रोगी के ठीक होने की आशा करना। हालांकि सीजेपी के घोषणा पत्र में न्यायिक स्वतंत्रता, महिला आरक्षण, चुनावी अखंडता, मीडिया की जवाबदेही और कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हैं लेकिन फ़िलहाल उन्होंने शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, नीट परीक्षा बार बार रद्द होने से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने के साथ आंदोलन करने वाले बच्चों के खिलाफ़ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करने की मुख्य मांग ही सरकार से मनवाई हैं । सीजेपी के युवा जोश में हैं। उनको अनुभव अभी नहीं है। वे राजनीति की बारीकियां शासन प्रशासन की चालें भी नहीं समझते। साथ ही इस सरकार की बनावट और काम करने के परंपरा से अलग हटकर तौर तरीके और आंदोलन व विरोध को लेकर उसकी नीति भी शायद नहीं जानते थे। उनको यह भी नहीं पता शिक्षा मंत्री ही नहीं सभी कैबिनेट मंत्री और अन्य मंत्री भी पीएमओ यानी मोदी और संघ के दिशा निर्देश से ही सारे काम, फैसले और बयान जारी करते हैं। 
            यहां तक कि बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी बिना मोदी शाह और संघ की सहमति के कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकते। यही वजह है कि बीजेपी में मंत्री या मुख्यमंत्री बनने के लिए जनाधार योग्यता और अधिक राजनीतिक अनुभव नहीं वफ़ादारी कम योग्यता और लोकप्रियता विहीन होना मैरिट माना जाता है। रिकॉर्ड बताता है कि संघ बीजेपी और मोदी कभी भी लोकतांत्रिक उदार और संविधान के अनुसार चलने वाले नहीं रहे हैं। वे सांप्रदायिक कट्टरवादी और पूंजीवादी सोच के होने की वजह से अधिनायकवादी अहंकारी और एक एजेंडे के हिसाब से ही चलते हैं। यही वजह है कि नैतिकता जनभावनाओं का सम्मान और विपक्ष सिविल सोसायटी या विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद फैसले लेने में उनका तनिक भी विश्वास नहीं रहा है अन्यथा नोट बंदी, देश में लॉक डाउन और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान नहीं हुआ होता। पेट्रोल में बिना समुचित चर्चा तैयारी या वाहनों की बनावट की जांच के सीधे दस से बीस प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से खराब हो रही कारों का यह देश में ऐसा ही चौथा मनमाना थोपा गया एकतरफा फैसला है।
          यही वजह है कि मोदी और अन्य बीजेपी सरकारें भ्रष्टाचार अपराध महंगाई बेरोजगारी और ग़रीबी को कोई बड़ी समस्या ही नहीं मानते। जब प्रॉब्लम ही स्वीकार नहीं करते तो इनके समाधान के लिए भी कुछ ठोस काम नहीं करेंगे। मोदी सरकार अपने 12 साल के कार्यकाल में केवल उन आंदोलनकारी किसानों के सामने झुकी थी जिन्होंने तमाम तिकड़मों रुकावटों और सरकारी दमन के बावजूद दिल्ली बोर्डर पर एक साल से अधिक धरना और 700 से अधिक किसानों की जान का बलिदान दिया था। उसकी वजह भी देश की आबादी में किसानों की बड़ी संख्या और यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव में बीजेपी की हार का खतरा था। मोदी सरकार विपक्ष को संसद या बाहर भी विरोध तक नहीं करने देती, साथ ही विपक्ष के सांसदों को शामिल कर बनी संयुक्त संसदीय समितियों को अधिकांश बिल विवाद के बाद भी विचार को या तो भेजे नहीं जाते और अगर मजबूरी में कभी कभी सदन चलाने को ऐसे विधेयक विचार विमर्श को दिए भी जाते हैं तो उनकी सिफ़ारिश को सरकार स्वीकार ही नहीं करती। युवाओं के वर्तमान आक्रोश नाराज़गी और विरोध का कारण मोदी के हर साल दो करोड़ नए रोज़गार का वादा पूरा नहीं होना भी था। इसके साथ ही मोदी जिन अडानी अंबानी जैसे चंद मित्र पूंजिपतियों के हाथ देश की सारी संपत्ति संसाधन और दौलत लुटाते आ रहे हैं उससे भी युवाओं में गुस्सा है। यह ठीक है कि सरकार के हिंदू मुस्लिम एजेंडे को धता बताकर कॉकरोच आंदोलन ने दो सफलताये शुरू में ही हासिल कर ली थी, जिनमें एक आंदोलन करने पर सरकार की बदले की कार्यवाही का भय ख़त्म होना और दूसरा आंदोलन करने वालों से सरकार का अब तक बात नहीं करने का घमंड तोड़ना शामिल था। यह सरकार बड़े से बड़े फैसले बिना सोचे समझे बिना संसद को विश्वास में लिए और बिना नागरिकों से चर्चा किए लेती रही है। 
           6 जून को जब कॉकरोच आंदोलन शुरू हुआ तो सरकार ने उससे तत्काल बात नहीं की लेकिन जब तनाव टकराव और विवाद 20 जुलाई को संसद चलो के आव्हान से काफी बढ़ गया तो समझौता वार्ता शुरू हुई। इसके कई दिन बाद पीएम मोदी ने पेपर लीक के मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनने का कानून बनाने और उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी को हटाने का आदेश देकर ऐसा संदेश देना चाहा जैसे ये कोई बड़े क्रांतिकारी फ़ैसले हों। इसके साथ ही मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक कानून में दस साल सज़ा और दस करोड़ जुर्माने की भी व्यवस्था कर दी है, लेकिन जैसे जनलोकपाल बना लेकिन करप्शन खत्म नहीं हुआ वैसा ही इस कानून का भी हश्र होगा। अंत में कोई विकल्प न बचने पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लिया गया, इसमें में भी पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी नहीं स्वीकार की गई है। मोदी सरकार की विश्वसनीयता साख और छवि अब ढलान पर है, जिससे उसके वादों दावों और आश्वासनों पर सीजेपी क्या कोई भी विश्वास करने को तैयार नहीं होता है। उसने हर समस्या का समाधान हिंदू मुस्लिम झूठ और नफ़रत को बनाकर गोदी मीडिया से ऐसा नैरेटिव बनाकर चुनावी जीत का मैकेनिज्म विकसित कर लिया है जिससे धर्मेंद्र प्रधान को तो क्या कल मोदी को भी अगर पद से हटा दिया जाए तो भी जो नया प्रधानमंत्री बनेगा वो संघ के उसी एजेंडे पर वैसे ही चलेगा जैसे आज मोदी चल रहे हैं। हम सीजेपी के आंदोलन की सफलता को कम करके नहीं आंकना चाहते लेकिन यह ज़रूर कहेंगे कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक की समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि इसके लिए पूरी सरकार व्यवस्था और काफी सीमा तक हमारा अनैतिक समाज भी उत्तरदायी है।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

कॉकरोच आंदोलन

*क्या कॉकरोच आंदोलन अपना मक़सद हासिल कर सकेगा?*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
            मई माह में कुछ छात्रों और युवाओं ने ऑनलाइन कॉकरोच जनता पार्टी बनाई थी। अभिजीत दीपके के नेतृत्व में बनी इस पार्टी के उसी दिन दो करोड़ फॉलोवर बनने पर लोगों को हैरत हुई थी। इसके मुखिया दीपके जब अमेरिका से 6 जून को भारत लौटे तो युवाओं ने उनको सर आंखों पर लिया। जैसा कि इस पार्टी के नाम से ही लगा कि यह एक सटायर यानी हास्य व्यंग्य के तौर पर मज़ाक में बना हल्का संगठन है। लेकिन जब इसी बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं ने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन का पहला दौर शुरू किया तो लोगों ने इस पार्टी को संजीदगी से लेना शुरू किया। 
                सीजेपी की शुरू में एक ही मांग थी कि बार बार लीक हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर की जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफ़ा दें। जब यह मांग धरने से पूरी नहीं हुई तो सीजेपी ने 20 जून से जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन छेड़ दिया। इस दौरान सोशल एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक सीजेपी के जंतर मंतर पर किए जा रहे आंदोलन में समर्थन देने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने 19 दिन भूख हड़ताल की। उनका वज़न 9 किलो से ज्यादा घट गया। मामला दिल्ली हाईकोर्ट गया। हाईकोर्ट ने सरकार को सोनम की सेहत का ख़्याल रखने को कहा। सरकार ने सोनम को पुलिस से उठवा कर हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। इसके बाद सीजेपी के मुखिया दीपके ने आंदोलन को तेज़ कर दिया। उन्होंने खुद आमरण अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन एक दिन बाद ही उनको कुछ वरिष्ठ नागरिक अनुभवी समाजसेवी और सुलझे हुए राजनेता यह समझाने में सफल हो गए कि धरने अनशन और प्रदर्शन का इस सरकार पर कोई असर नहीं होता। इसके बाद दीपके ने एक दिन में ही अनशन खत्म कर संसद मार्च का ऐलान कर दिया। अब कॉकरोच पार्टी की मांगे बढ़कर शिक्षा मंत्री के रिजाइन के साथ साथ पेपर लीक के सदमे से मरने वाले 21 छात्रों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने तक बढ़ चुकी हैं।
                इस दौरान जब सीजेपी ने जंतर मंतर से संसद की तरफ़ कूच किया तो आश्चर्यजनक ढंग से उनको संख्या चार पांच हज़ार से बढ़कर अचानक एक लाख से भी अधिक हो गई। इस मार्च की अनुमति सरकार से नहीं मिली थी। पुलिस ने संसद से काफी पहले छात्रों के मार्च को रोका। जब वे नहीं रुके तो उन पर लाठी चार्ज किया गया। आरोप है कि पुलिस ने पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक और शॉक बेटन यानी करंट लगाने वाली लाठी का इस्तेमाल भी किया, लेकिन सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया। यह भी चर्चा है कि आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने को पुलिस और अन्य अर्ध सैनिक बलों के साथ सिविल ड्रेस में ऐसे लोग भी लाठी चार्ज कर रहे थे जिनके बारे में यह स्पष्ट नहीं है कि बिना वर्दी बिना बैज और बिना नेम प्लेट के ये प्राइवेट फोर्स किन लोगों की थी। बाद में पुलिस ने इनको अपने ही जवान बताया। कई छात्र छात्राओं ने लाठी चार्ज के दौरान गंभीर चोटें आने जानबूझकर घायल करने और अश्लील हरकतें करने के भी आरोप लगाए हैं। निष्पक्ष जांच के बाद ही पता लगेगा कि प्राइवेट लोग कौन थे और जो आरोप लग रहे हैं उनमें कितना सच है और कितनी अफवाहें हैं।
          समय रहते सरकार ने सीजेपी से बात कर इस आंदोलन को निबटाने की कोशिश नहीं की। जिस दिन संसद मार्च हो रहा था और छात्र छात्राओं पर लाठी चार्ज हुआ उसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने सीजेपी के नेताओं से बात की, लेकिन तत्काल उनकी एक भी मांग नहीं मानी। इससे आंदोलकारी और भड़क गए। बर्बर लाठी चार्ज और युवाओं को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की शिकायतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन कई ग़ैर ज़रूरी और अपेक्षाकृत कम महत्व के मुद्दों पर सु मोटो लेने वाली बड़ी अदालतों ने तत्काल सुनने से इन मामलों को यह कहते हुए मना कर दिया कि कोर्ट को सियासत में मत घसीटिए और इन मामलों में फौरन सुनवाई कोर्ट का कीमती टाइम ख़राब करना माना जाएगा। ऐसे जनहित के मुद्दों पर याचिकाएं सुनते हुए अदालतें काफ़ी समय से इसी तरह का रुखा रुख अपना रही हैं, जिससे सरकार को काफ़ी राहत मिल जाती है।
            कॉकरोच आंदोलन सफल होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मोदी सरकार की अब तक की कार्यशैली देखते हुए यही संकेत मिल रहे हैं कि वह सीजेपी की मांगो को नहीं मानेगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बहुत पहले कह चुके है कि हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते। यह लेख लिखे जाने तक आंदोलन जारी है। घायल छात्र छात्राएं गुस्से में हैं। वे फिर से जंतर मंतर पर जमा हो रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार के इस मिथक को तो तोड़ दिया है कि लोग डर से शासन प्रशासन और पुलिस के खिलाफ़ आंदोलन नहीं करेंगे। इसके साथ ही देर से सही लेकिन सरकार ने सीजेपी नेताओं से बात करके यह भी भ्रम तोड़ दिया कि यह सरकार विरोध करने वालों से बात तक नहीं करती।
          सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस द्वारा कुछ युवाओं को कॉकरोच बताने के जवाब में बनी कॉकरोच जनता पार्टी आज मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है। उसने आंदोलन करके दो मकसद तो शुरू में ही हासिल कर लिए थे। इनमें एक निडर होकर सरकार के खिलाफ़ आंदोलन और दूसरा विरोध करने वालों से कभी भी बात नहीं करने वाली मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा द्वारा सीजेपी नेताओं से समझौता वार्ता करना। अब जबकि विपक्ष भी खुलकर सीजेपी के आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है, सरकार के लिये और मुसीबत बढ़ गई है। सरकार इनकी मांगे मानकर अपनी अब तक किसी आंदोलन के सामने नहीं झुकने की परम्परा नहीं तोड़ना चाहेगी। उसे यह भी डर है कि मंत्री प्रधान का इस्ती़फा लिया तो कल प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा न मांगा जाने लगे। साथ ही ऐसी मांगे बढ़ते जाने और माने जाने से सरकार दब्बू डरपोक और कमज़ोर नज़र आ सकती है। हर विरोध करने वाले को सरकार देशद्रोही खालिस्तानी पाकिस्तानी और विदेशी साज़िश रचने वाला अर्बन नक्सल बताती रही है। मोदी सरकार खुद को सेवक की जगह स्वामी और जनता को आज्ञाकारी सेवक बनाना चाहती है। वह विपक्ष को भी विरोध एक सीमा तक ही करने देती है। केवल एक साल से अधिक आंदोलन करने वाले किसान ही 700 लोगों की बलि देकर मोदी सरकार को पहली बार कृषि कानून वापस लेने को मजबूर कर सके थे। देखना यह है कि सरकार फिर से झुकती है या युवा आंदोलन बिना मकसद हासिल किए कुछ दिन में खत्म हो जाएगा।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

विपक्ष , आधा एनडीए में आधा जेल में?

*2029 के चुनाव तक आधा विपक्ष बीजेपी आधा जेल में होगा?*
       *_इक़बाल हिंदुस्तानी* 
       मानसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार परिसीमन जैसे अहम बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने में जी जान से लगी है। वर्तमान लोकसभा में उसको 362 सांसद चाहिए, आम आदमी पार्टी और टीएमसी के काफी सांसद तोड़कर 332 उसने जुटा लिए हैं। हाल ही में उसने शरद पवार की एनसीपी को एनडीए का समर्थन करने को तैयार कर लिया है। अब उसकी नज़र सपा और द्रमुक पर है, ये दोनों सीधे समर्थन नहीं भी देंगे तो इनको सदन से गायब रहने पर राज़ी किया जा सकता है, जिससे सदन की कुल संख्या कम हो जाएगी और इसके साथ ही टू थर्ड मेजॉरिटी का आंकड़ा भी नीचे आ जाएगा। 
           सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है। यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।
          महाराष्ट्र में शरद पवार आज आत्मघाती फैसला कर रहे हैं, कल ममता बनर्जी ने भी बीजेपी को सपोर्ट करके ऐसी ही गलतफहमी पाली थी। ममता समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। 
         ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। 
         कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् श्री एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। 
         बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। मोदी सरकार विपक्ष को तोड़ने खत्म करने और ईडी सीबीआई इनकम टैक्स के ज़रिए टारगेट करके जिस तरह बीजेपी एनडीए या इंडिया एलाइंस से अलग होकर नया गुट बनाने को ब्लैकमेल करके तानाशाही दिखा रही है, उससे लगता है अगला आम चुनाव आते आते आधे विपक्षी नेता या तो बीजेपी को सपोर्ट करेंगे या फिर जेल में होंगे। 
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*

Wednesday, 15 July 2026

बेकाबू बाइकर्स

*आपकी बाइक है शौक से चलाओ,* 
*दूसरों के लिए आफ़त मत बनाओ*
       *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        आजकल जिस तरह से युवा मोबाइल के दीवाने हैं। उसी तरह से उनका दूसरा प्यार बाइक बन चुकी है। कुछ युवक युवतियां स्कूटर और स्कूटी भी चलाते हैं लेकिन बाइक चलाने वाले उनकी तुलना में कई गुना अधिक हैं। लोवर मीडियम और मीडियम क्लास जहां 75,000 से एक लाख तक की बाइक चलाते हैं, वहीं अपर मीडियम और अपर क्लास बहुत महंगी मॉडर्न और स्पोर्ट बाइक चलाते है। ये अन्य सुविधाओं के साथ ही स्टार्ट होते ही बहुत तेज़ स्पीड पकड़ लेती हैं। असली प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती हैं। फैशन और स्पीड का दीवाना युवा ये आधुनिक बाइक चलाते हुए पूरी सावधानी नहीं बरतता। वह हेलमेट नहीं लगाता, डी एल नहीं बनवाता, दो नहीं तीन नहीं चार चार साथियों को बाइक पर बैठाकर गली मुहल्ले में ही नहीं हाईवे और एक्सप्रेस वे पर भी निकल जाता है। खुद की जान के साथ सड़को पर पैदल या दूसरे हल्के वाहनों से जा रहे लोगों की जान भी खतरे में डालता है। कई बार एक्सीडेंट होते हैं। युवा जान से हाथ धो बैठते हैं। मातापिता लाड प्यार में नाबालिग बच्चों को भी टू व्हीलर की चाबी दे देते हैं जोकि नियम कानून ही नहीं उनकी अपनी सुरक्षा के लिए मुसीबत बन जाती है। बड़े चौराहों और राष्ट्रीय राज मार्गों पर तो कभी कभी पुलिस इन वाहनों की चेकिंग करके चालान काट भी देती है, लेकिन नगरो कस्बों गांवों के गली मोहल्लों में ये बाइक सवार युवा सरपट दौड़ते रहते हैं। इनके प्रेशर हार्न से बच्चे बुजुर्ग और बीमार सो नहीं पाते या सोते सोते चौंक कर बार बार जाग जाते हैं। ये अपनी बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर गैर कानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 
        इन अवैध साइलेंसर से बार बार पटाखा फूटने की दिल हिला देने वाली तेज़ आवाजें गूंजती रहती हैं लेकिन इन बेलगाम और बिगड़े हुए युवाओं की मौज मस्ती पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अव्वल तो गली मोहल्लों में इनको पुलिस पकड़ती ही नहीं है, अगर ये गलती से किसी व्यस्त चौराहे या हाईवे पर पकड़े भी जाते है तो अपने परिवार के रसूख का इस्तेमाल नहीं तो यातायात पुलिस की जेब गर्म और कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर चालान कटवाकर भर देते हैं या कभी कभी मौक़े से दुस्साहस दिखाते हुए भाग भी जाते हैं। कई नगरों में कई सड़कों पर बहुत ऊंचे स्पीड ब्रेकर होने या जाम लगा होने पर ये स्पीड काबू नहीं कर पाने से भयंकर टक्कर भी मार देते हैं और भाग जाते हैं। इन बिगड़े हुए युवाओं की इन लापरवाही मनमानी और खतरनाक बाइक स्टंट से नागरिक बहुत परेशान हैं। वे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों आश्रमों धर्मशालाओं में पूजा नमाज से लेकर अस्पताल में अमन सकून से इलाज तक नहीं करा पाते। स्कूल कॉलेज के बच्चे इनके हॉर्न और मोडिफाइड साइलेंसर के कर्कश असहनीय शोर से पढ़ भी नहीं पाते। 
        ऐसी बाइक पास से गुजरने मात्र से कई मासूम बच्चे महिलाएं और बूढ़े बुजुर्ग तो एक्सीडेंट के खौफ से बुरी तरह काँप जाते हैं या डिसबैलेंस होकर रास्ते में ही गिरकर चोट खा जाते हैं। इन बेकाबू बाइकर्स के डरावने कोलाहल से कभी कभी अवारा बेसहारा जानवर बौखलाकर रोड पर बेतहाशा दौड़ने लगते है जिससे पैदल या वाहन पर चलते दूसरे लोग उनकी ज़द में आकर बुरी तरह घायल या मौत का शिकार हो जाते हैं। कई बाइक और दूसरे वाहनों की प्रदूषण की जांच या तो बरसों तक होती नहीं या फिर वे फील गुड कराकर फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं, जिससे वे जिधर से निकलते हैं, उधर ज़हरीला धुआँ छोड़ते जाते हैं और लोग उनको बददुआ देते रहते हैं। इनकी इन बढ़ती समाज विरोधी शांति विरोधी और नागरिक सुरक्षा की दुश्मन हरकतों का कोई समाधान सरकार प्रशासन और पुलिस के पास अभी तक नहीं है। काश इन नौजवानों और उनके परिवार वालों को सिविक सेंस नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य बोध हो और वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार संवेदनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ा सकें जिससे वे अपनी बाइक को चलती फिरती आफ़त मुसीबत और यमदूत बनने से बच सकें।
*नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है*
(नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं)

अयोध्या चढ़ावा चोरी...

*अयोध्या चढ़ावा चोरी: वकील अपना काम नहीं करेंगे तो कानून अपना काम कैसे करेगा?*
          _*इक़बाल हिंदुस्तानी*
                    अयोध्या बार एसोसिएशन ने एलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के किसी आरोपी की कोई वकील कानूनी पैरवी नहीं करेगा। अगर एसोसिएशन के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई वकील ऐसा करता है तो उस पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जायेगा। हमारा कहना है कि अपराधी कोई भी हो उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन हर आरोपी अपराधी ही हो यह ज़रूरी नहीं होता। कानून के राज में जब तक कोई आरोपी अपराधी साबित नहीं हो जाता उसको किसी भी प्रकार से किसी भी स्तर पर किसी के भी द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार कितना ही गम्भीर अपराध का आरोपी हो उसको दंड दिए जाने से पहले अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने का कानूनी अधिकार दिया गया है। अयोध्या के अधिवक्ताओं के संगठन ने आरोपियों को कानूनी सहायता नहीं देने का जो फ़ैसला किया है, वह अपने आप में कानून के राज की मूल भावना के खिलाफ़ है। कानून की पढ़ाई, डिग्री और अदालत में प्रैक्टिस के लिए बार कौंसिल में रजिस्ट्रेशन से पहले प्रत्येक अधिवक्ता को शपथ पत्र देना होता है कि वह संविधान के अनुसार कानून का पालन करते हुए अपने पेशे के नियम के मुताबिक किसी जरूरतमंद को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं करेगा। इसके बावजूद कोई एक दो वकील व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि उनकी पूरी यूनियन एक आवाज़ में एक साथ एक प्रस्ताव पास करके अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा और दान चोरी के आरोपियों के केस कानूनी पैरवी के लिये लेने से खुले आम इन्कार कर रही है। 
              यहां यह स्पष्ट कर दें हमारा अभिप्राय इस मामले में यह बिल्कुल नहीं है कि चढ़ावा चोरी के अपराधियों को दंड नहीं मिले। हम चाहते हैं इस केस में जो भी अपराधी साबित हों उनको न केवल सज़ा मिले बल्कि कड़ी और शीघ्र सज़ा दी जाए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की निर्लज्ज और राम भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली घटिया हरकत करने से पहले सौ बार सोचे और चोरी करने से डरे व बचे। अजीब बात यह है कि कानून की पैरवी करने वाले वकील ही धार्मिक भावनाओं को संविधान से ऊपर रखकर आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान करने से मना कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस बारे में साफ़ और सख़्त स्टैंडिंग ऑर्डर हैं कि संविधान और न्यायपालिका के नियम अनुसार कोई वकील किसी आरोपी की पैरवी करने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते कि उसने उससे पहले ही दूसरे पक्ष का केस लड़ने को अनुबंध नहीं कर लिया हो। *2010 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ़ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने किसी भी बार एसोसिएशन के इस तरह के प्रस्ताव को गैर कानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। यह मामला कोयमबटूर के एक वकील और पुलिस वाले के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद अधिवक्ताओं ने पुलिस के मामलों की कानूनी पैरवी करने से मना कर दिया था। मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा वकीलों के इस फैसके को वकालत के प्रोफेशन के खिलाफ़ बताने के बाद बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट अपील में गई थी। *उत्तराखंड में एक वकील की हत्या के मामले में जब वकीलों ने आरोपियों को कानूनी सहायता देने से मना किया तो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रस्ताव गैर कानूनी बताते हुए हत्या आरोपियों की पैरवी करने से रोकने या इस दौरान कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने पर वकीलों को कोर्ट की मानहानि का केस दर्ज कराने की कड़ी चेतावनी दी थी।* 
            *इतना ही नहीं बार कौंसिल ऑफ इंडिया भी इस बारे में स्पष्ट कह चुका है कि कोई भी वकील किसी भी आरोपी को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं कर सकता।* बार कौंसिल का यहां तक कहना है कि वकील फीस भी केस की नेचर गंभीरता और स्तर के हिसाब से ले सकता है, इतनी नहीं मांग सकता जिससे आरोपी अनावश्यक और अव्यवहारिक मानकर भुगतान करने में असमर्थ हो और उसको जानबूझकर कानूनी बचाव से वंचित कर दिया जाए। कौंसिल का कहना था कि अगर एसोसिएशन के फैसले के खिलाफ जाकर कोई वकील किसी आरोपी का कोई केस कोर्ट में लड़ता है तो उस अधिवक्ता पर एसोसिएशन न तो कोई अर्थदंड लगा सकती है और न ही उसकी सदस्यता निरस्त की जा सकती है। 
            *संविधान का अनुच्छेद 22 (1) हर किसी को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का वकील अपने कानूनी बचाव में रखना चाहे तो वकील उसको कानूनी सेवाएं देने से इन्कार नहीं कर सकता। सेक्शन 14 हर भारतीय नागरिक को समान कानूनी अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता है तो आर्टिकल 39 ए राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। संविधान यहां तक कहता है कि किसी नागरिक को गरीब कमज़ोर अशिक्षित या विकलांग होने के कारण मुकदमे के दौरान कानूनी बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता और यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह असमर्थ होने पर आरोपी को सरकारी वकील कानूनी बचाव के लिए उपलब्ध कराए।* 
             अगर आज वकीलों के इस अवैध प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो कल डॉक्टर ऐसे आरोपियों के इलाज को यह कहकर मना करने लगेंगे कि आरोपियों ने उनकी धार्मिक भावना या अस्पताल पर हमला करके आहत किया है। दूसरे पेशे वाले भी उनके नक़्शे कदम पर चलकर देश में कानून की बजाए अराजकता की स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस गलत सिलसिले को यहीं रोकना ज़रूरी है। यही वजह है कि 26/11 के मुंबई हमले के पाकिस्तानी आरोपी अजमल कसाब को मौके से रंगे हाथ गोली चलाते हुए निर्दोष लोगों का खून बहाते हुए पकड़े जाने के बावजूद कोर्ट में केस चलाने के दौरान सरकार ने उसके कानूनी बचाव को अपने खर्च पर सरकारी वकील उपलब्ध कराया था। उसको बाद में कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से करते हुए फांसी की सज़ा दी, लेकिन देश विदेश में यह संदेश गया कि उसको वास्तव में अपराधी साबित होने के बाद ही मृत्युदंड दिया गया और सही न्याय हुआ।
              यह भी विडंबना और विरोधाभास ही कहा जाएगा कि अयोध्या के इन वकीलों ने ही दो जुलाई को राम जन्मभूमि थाने में ट्रस्ट से जुड़े कुछ बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज करने को तहरीर दी और आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों की आड़ में कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। वकीलों ने अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन भी किया लेकिन अब तक इनकी दी तहरीर पर कोई एफआईआर होने की अधिकृत सूचना नहीं है। खुद सरकार ने इस मामले में तब एसआईटी बनाई जब यह मामला सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके सार्वजनिक कर दिया। साथ ही कानून को अपना काम करने से रोकने या कुछ छिपाने के आरोप सरकार पर इसलिए भी लगने शुरू हुए क्योंकि उसने तत्काल एफआईआर करने की बजाए पहले एसआईटी बनाई। चर्चा है कि इस दौरान आरोपियों को चोरी का माल ठिकाने लगाने का अवसर मिल गया। अगर कानून को ठीक से काम करने दिया जाता तो पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती, फिर तत्काल आरोपियों को हिरासत में लिया जाता, उनसे सख्ती से पूछताछ होती, उनकी गिरफ्तारी होती, रिमांड पर लिया जाता, उनकी निशानदेही पर चोरी की रकम और दूसरी बेशकीमती सोने चांदी की भेंट की गईं चीज़ें बरामद की जाती, उनके घर दुकान और संपत्ति सील की जाती, उनके बैंक खाते सीज़ किए जाते, उनसे जुड़े लोगों पर नज़र रखी जाती और उनके घरों कार्यालयों व अन्य संबंधित भवनों की निगरानी भी की जाती जिससे वे अब तक चुराया गया चढ़ावा दान और उससे बनाई गई संपत्ति ज़ेवर और बैंक लॉकर से माल ठिकाने नहीं लगा सकें। 
             अंत में यही कहा जा सकता है कि ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी ऐसी पारदर्शी विश्वसनीय और अभेद्य व्यवस्था बनाने की थी जिसमें चोरी हो ही नहीं, लेकिन अगर मानवीय भूल तकनीकी चूक और व्यवहारिक गलती से चोरी का संगीन अपराध हो ही गया था तो ट्रस्ट सरकार पुलिस और वकीलों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे जनता में यह संदेश जाए कि कानून को अपना काम निष्पक्ष स्वतंत्र और संवैधानिक तरीके से नहीं करने दिया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने गंभीर और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करके राम भक्तों और आम आदमी को अच्छा संदेश नहीं दिया है। वहां एक माह से अधिक समय के बाद सुनवाई शुरू होने जा रही है।अभी भी समय है कि जनता का विश्वास कानून के राज में बहाल करने को इस मामले में त्वरित कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही को देश के तटस्थ धार्मिक संतों गणमान्य समाजसेवी और प्रतिष्ठित निष्पक्ष नागरिकों की एक कमेटी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज की अध्यक्षता में बनाकर निश्चित समय में जांच कराई जाए और दोषियों को कड़ा दंड दिया जाए। 
*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़*
*हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा*