Thursday, 2 July 2026

कांग्रेस और मुस्लिम

*मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आने लगे क्या दलित पिछड़े भी आयेंगे?*
                 *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        सपा और कांग्रेस में यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर बयानबाजी तेज़ होती जा रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली और क्षेत्रीय दलों के प्रति उदारता न दिखाने पर नाराज़गी जताई है तो उधर कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा से कांग्रेस को बराबर सम्मान और सीट शेयर करने की दो टूक मांग की है। असम में बदरुद्दीन अजमल की ए आई यूडीएफ से लगभग आधा मुस्लिम वोट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ शिफ़्ट होने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ए आई यूडीएफ का 2021 का वोट 10 प्रतिशत से अधिक था जो इस साल घटकर 5.46 प्रतिशत रह गया। उसको कुल दो सीट मिली। कांग्रेस को वहां 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिला और उसने 19 सीट जीतीं जिनमें से 18 विधायक मुस्लिम हैं। दिल्ली में आपका मुस्लिम वोट 10.8 प्रतिशत घटा है और इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ गया है। *सीएसडीएस लोकनीति और मीडिया विश्लेषण से पता लगता है कि कांग्रेस को उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम 80 प्रतिशत तक, दलित 60 प्रतिशत तक आदिवासी 50 प्रतिशत तक और पिछड़े 30 से 40 प्रतिशत तक कुछ प्रदेशों तक सीमित हैं। जबकि उच्च जातियों में केवल उदार एवं सेक्युलर परिवार के गिने चुने लोग ही कांग्रेस को वोट करते हैं। इनका अधिकांश वोट बीजेपी या उसके घटकों को जाता है। कांग्रेस उच्च सम्पन्न और मध्य वर्ग में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। कांग्रेस का असर हिमाचल कर्नाटक तेलंगाना राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ केरला उत्तराखंड पंजाब में मुख्य दल के रूप में मौजूद है। इतिहास गवाह है कुछ राज्यों में कांग्रेस एक बार चुनाव हारी तो फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। मिसाल के तौर पर 1967 में तमिलनाडु 1977 में बंगाल 1989 में यूपी 1990 के दशक में बिहार और गुजरात में 1995 में महाराष्ट्र 2013 में दिल्ली 2016 में असम 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद वह इन राज्यों में आज तक सत्ता से बाहर है।*
            ऐसा नहीं है, मुस्लिम कांग्रेस से बहुत खुश है, बल्कि वह यह समझ गया है कि क्षेत्रीय और खास तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टियां बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती। इस बदलाव की शुरुआत दिल्ली में आप को छोड़कर कांग्रेस की तरफ गए मुस्लिम वोट के बड़े हिस्से से हो चुकी है। चर्चा है जिस तरह से आप के राज्यसभा सदस्य बीजेपी में गए हैं, इससे नाराज़ मुस्लिम वोट आगे चुनाव में आप को और अधिक छोड़कर कांग्रेस के साथ जुड़ेगा। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बंगाल में टीएमसी से छिटक कर जो 60 विधायक और 20 सांसद एनडीए यानी बीजेपी के समर्थन में गये हैं, उससे आगे मुसलमान बंगाल में भी ममता को छोड़कर राहुल की कांग्रेस या कुछ हिस्सा कम्युनिस्टों के साथ जुड़ सकता है। यही वजह है कि यूपी में सपा के सांसदों को तोड़ने की चर्चा फिलहाल ठंडी पड़ गई है। संघ इस राजनीतिक समीकरण को समझकर आशंकित है कि अगर अधिकांश मुस्लिम वोट से जीते सपा एमपी तोड़कर बीजेपी या एनडीए में लाए गए तो मुस्लिम आगे से सपा पर भरोसा न कर बड़ी संख्या में कांग्रेस या आंशिक रूप से आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए जन्मे दलों में दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाने को जा सकते है। बीजेपी के लिए यह समीकरण सबसे घातक माना जाता है। दरअसल मुस्लिम कांग्रेस सपा बसपा या आरजेडी जैसे किसी दल को जिताने के लिए कभी वोट नहीं देता है। वह तो हर उस सेक्युलर पार्टी को वोट देता रहा है जो भी बीजेपी को गारंटी से हरा सकता हो। यही वजह है उसको पार्टी बदलने में तनिक भी दिक्कत नहीं होती। मुस्लिम अब पूरे देश में महसूस कर रहा है कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को नहीं हरा सकते। उल्टा वे बीजेपी के दबाव में काम करते हैं। बीजेपी को बैकडोर से सपोर्ट तक कर देते हैं और सेक्युलर कांग्रेस का विरोध करते हैं। हद तो यह है कि जब लालच और दबाव ब्लैकमेल की सीमा तक पहुंच जाता है तो इन दलों के जनप्रतिनिधि टूट कर उसी बीजेपी में या उसके गठबंधन में चले जाते हैं जिसको हराने को मुस्लिम समाज ने इनको वोट दिया था। मुस्लिम जानते हैं कि अकेले उनके वोट से कांग्रेस वापस सत्ता में नहीं आ सकती, लेकिन वे इसकी पहल यह सोचकर कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल दलित और पिछड़े भी जब बीजेपी से नाराज़ होंगे तो कांग्रेस में आ सकते हैं।
            1989 से पहले का रिकॉर्ड देखें तो कांग्रेस का एक वोट बैंक हुआ करता था। जिनमें ब्राह्मण मुस्लिम और दलित समाज मुख्य रूप से शामिल थे। इस समीकरण के बल पर कांग्रेस ने देश और राज्यों में कई दशक तक एकक्षत्र राज किया। विडंबना यह रही कि फिर भी कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को स्थायी रूप से अपना बनाए रखने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। उल्टा हुआ यह कि सत्ता का अधिकांश लाभ पहले से ही सम्पन्न सक्षम और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा उच्च वर्ग यानी स्वर्ण जातियां विशेष रूप से ब्राह्मण लेते रहे। कांग्रेस ने दलितों मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने के लिए एक नकारात्मक काम किया। उसने संघ को फलने फूलने दिया। बीजेपी को सांप्रदायिकता की राजनीति करने दी। उसके राज में खूब दंगे हुए, हजारों लोग मारे गए, जिनमें मुस्लिम अधिक होते थे। उनके कारोबार तबाह कर दिए गए। घर जलाए गए। महिलाओं से बलात्कार हुए। महीनों कर्फ़्यू लगा रहता था। फिर दिखावे के लिए जांच आयोग बनते थे। उनकी कई साल बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती थी। कांग्रेस जानती थी दंगे होते नहीं, सुनियोजित तरीके से कराए जाते हैं। एक तरह से कांग्रेस आज की टीएमसी की तरह मुसलमानों दलितों को बीजेपी से डराकर वोट लेने की राजनीति कर रही थी। दलितों को वह बीजेपी के सत्ता में आने पर आरक्षण और संविधान खत्म होने का भय दिखाती थी। जब इससे भी काम नहीं चला तो कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को खुश करने के बदले हिंदूवादी लोगों को भी खुश करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना था। इससे सांप्रदायिक जिन्न बोतल से बाहर आ गया और धीरे धीरे कांग्रेस को पूरी तरह खा गया। *जहाँ तक पिछड़ों का सवाल है, उनकी आबादी 1931 की जातीय गणना के अनुसार 54 प्रतिशत मानी जाती है लेकिन कांग्रेस से अधिकांश पिछड़े दूरी बनाए रहे जो विकल्प मिलने पर बीजेपी के पाले में चले गए। इतिहास बताता है नेहरू सरकार ने पिछड़ों के आरक्षण पर 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था। आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सफारिश की लेकिन नेहरू ने जाति के आधार पर रिजर्वेशन नहीं देने की नीति के कारण इस को लागू नहीं किया। इसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग बनाया। इंदिरा सरकार को 1980 में 3743 पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की इस आयोग ने सिफारिश की लेकिन कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दस साल बाद वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार ने इन सिफारिशों को लागू किया।* इससे अधिकांश पिछड़ी जातियां कांग्रेस से विमुख हो गईं। क्षेत्रीय दल भी क्योंकि अलग अलग प्रदेशों में एक दो दबंग पिछड़ी जातियों का नेतृत्व अधिक कर रहे थे, ऐसे में अधिकांश पिछड़े बीजेपी के साथ हिंदुत्व के अभियान में शामिल हो गए। पिछले दिनों राहुल ने रायबरेली में आज़ादी की दलित योद्धा वीरा पासी की विशाल मूर्ति का अनावरण कर दलितों को सांकेतिक सम्मान दिया है। अब राहुल गांधी ने इस भूल को सुधारने के लिए जिस तरह संविधान दलित पिछड़ों के आरक्षण, जातीय जनगणना और संवैधानिक समानता की मांग उठानी शुरू की है, उससे आशा है कि दलित पिछड़े भी बीजेपी से निराश हुए तो कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं।

Sunday, 28 June 2026

घरेलू औरत

*आज की बात...हिंदुस्तानी*
*घरेलू औरत नहीं है बेकार,*
*उसके काम की वैल्यू 30 हज़ार*
          सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दुर्घटना मृत्यु के एक मामले में मुआवजा तय करते हुए घरेलू औरत के काम की कीमत 30,000 रुपए मासिक मानी है। साथ ही कोर्ट ने हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और अगर वो महिला कोई और काम भी करती हो तो उसकी कीमत अलग से जोड़ने को कहा है। 
     कुछ लोग केवल उन महिलाओं के काम की वैल्यू समझते हैं, जो घर से बाहर जाकर बिज़नेस या नौकरी करती हैं। उनका मानना है कि जो कमाकर नहीं लाता वो बेकार है। जबकि आप हिसाब जोड़ें तो महिलाएं घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। घर से बाहर काम करने वाले हर पुरुष के काम के घंटे तय होते हैं, छुट्टी भी मिलती है, वो खुद भी अवकाश लेता है और वह एक्स्ट्रा काम करता है तो उसको डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान भी होता है। जबकि घर की महिला को ऐसा कुछ नहीं मिलता। उसको पर्याप्त आराम भी नहीं मिलता। साथ ही उसकी नींद के घंटे भी कम हो जाते हैं। अगर आप उनके खाना बनाने नाश्ता बनाने बार बार चाय बनाने सफ़ाई कपड़े व बर्तन धोने प्रेस करने बिस्तर बिछाने बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल त्यौहार पर अतिरिक्त तैयारी करने, शादी बर्थडे या बच्चा पैदा होने पर एक्स्ट्रा काम का बोझ झेलने, बच्चों को होम वर्क कराने, उनको स्कूल छोड़ने और लेने जाने, उनकी माता पिता की और अपनी व कभी कभी पति की भी दवाई लाने, लाइन में लगकर सरकारी राशन लाने, पर्दे साफ़ करने, घर के जाले झाड़ने, सोफों के कवर बदलने, बच्चों के खिलौने संभालकर रखने, मेहमानों को अटेंड करने, टंकी में पानी भरने, घर का सामान खरीदने को लिस्ट बनाने, परिवार की तरफ़ से दूसरे रिश्तेदारों के लेनदेन का हिसाब रखने, सबके सोने पर लाइटें बंद करने, घर में पेंट होने पर सामान हटाने फिर सेट करने, बाज़ार से कपड़ों सहित घरेलू इस्तेमाल का सामान खरीदने आदि का बेतहाशा काम वो करती हैं।
       देश की जीडीपी में घरेलू महिलाओं के काम का 17 प्रतिशत योगदान माना जाता है। फिर भी लिंग के आधार पर महिलाओं के घरेलू काम को फ्री समझा जाता है और उनको बेकार। जबकि आर्थिक समानता के हिसाब से देखें तो सबको वेतन नहीं मिलने बावजूद घरेलू महिलाओं का घर के काम में जो योगदान माना गया है, उतना देश के आधे से अधिक पुरुष भी नहीं कमाते। घरेलू महिलाएं एक तरह से राष्ट्र निर्माता हैं। वे देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। ऐसी सभी महिलाओं को हमारा सलाम।

Sunday, 21 June 2026

पानी की वैल्यू समझिए

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*किफायत से खर्च करें पानी,* 
*वरना हो जायेगी परेशानी...*
         एक विद्वान ने कहा है। लोग चीज़ों की वैल्यू मिलने से पहले और उनके खोने के बाद ही समझते हैं। हम लोग जिस पश्चिमी यूपी में रहते हैं। उसको बहुत से वरदान कुदरत ने दिए हैं। उनमें से एक पर्याप्त पानी भी है। यही वजह है इस इलाक़े की खेती अच्छी है। घरों में भी जल निगम नगर निगम और स्थानीय निकाय भरपूर पानी सप्लाई करते हैं। कई शहरों में पानी मामूली टैक्स देकर अनलिमिटेड मिलता है। कुछ लोग इसका इसीलिए दुरूपयोग भी करते हैं। वे पानी भरकर नहीं रखते। टूटी खुली छोड़ देते हैं। पानी बेवजह बहता रहता है। वे पीने के इस पानी से अपने वाहन भी धोते हैं। अपने मकान दुकान के सामने खूब पानी का छिड़काव करते हैं। छतें भी बार बार पानी से धोते हैं। कुछ ने अवैध रूप से पालिका के पानी से व्यवसाय कर पैसा कमाने का रास्ता भी तलाश लिया है। कुछ घर के बाथरूम में घंटों नहाते रहते हैं। कुछ टॉयलेट के फ्लश को शौच के साथ ही पेशाब करने पर भी बार बार चलाते हैं। 
              कुछ शेविंग करते हुए वाश बेसिन का नल लगातार खुला रखते हैं। आर ओ में भी दो तिहाई पानी बर्बाद होता है। कुछ पानी भरने के लिए मोटर चलाकर भूल जाते हैं और घंटों पानी नाली में बहता रहता है। कुछ गमलों में वेस्ट पानी की जगह पेयजल ही डालते हैं। कुछ लोग छतें ठंडी करने को बहुत पानी रात को खुली हवा में सोने के लिये बर्बाद करते हैं। बर्तन धोने के लिए भी कुछ महिलाएं एक बार टूटी खोलकर तब तक बंद नहीं करती जब तक सब बर्तन नहीं धुल जाते। कुछ घर दुकान और सड़क को साफ करने की जगह सैंकड़ो लीटर पानी रोज़ डालते हैं। ऐसे लोगों से पानी वेस्ट न करने को कहो तो वे कहते हैं, हमारा वाटर कनेक्शन है, हम चाहे जितना पानी बहाएं आपको क्या प्रॉब्लम है। उनको कौन बताए ज़मीन के नीचे से आ रहा पानी उनका नहीं सब नागरिकों का है और लगातार वाटर लेवल नीचे जा रहा है। 
     *कम लोगों को पता है कि राजस्थान महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु और दिल्ली के कई इलाकों में ज़मीन के नीचे पानी पूरी तरह खत्म हो चुका है। यहां दो से पांच दिन में सरकारी और प्राइवेट टैंकर से पानी आता है। यहां प्रति व्यक्ति 20 से 40 लीटर पानी खरीदा जाता है। जबकि जरूरत 200 से 500 लीटर की होती है। यह पानी एक, डेढ़ से दो रुपए लीटर तक और कहीं कहीं 30 रु बोतल से 160 रु प्रति जार मिलता है। प्रति परिवार को 1500 से 8000 रु पानी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इसलिए आज और अभी से पानी का दुरुपयोग बंद कर दीजिये।*

Friday, 19 June 2026

योग दिवस

आज का विचार... हिंदुस्तानी 
*योग धार्मिक नहीं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है!*
              21 जून हर वर्ष योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पूजा पाठ नहीं बल्कि हर देश हर जाति और हर धर्म के मानने वालों के लिए वरदान है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में विभिन्न योग नियमित रूप से करने से न केवल शरीर बल्कि आपका मन भी निरोग और समग्र स्वास्थ्य लाभ होते हैं। योग से इंसान के दिल दिमाग़ को ऑक्सीजन की बेहतर सप्लाई होती है। उसके जिस्म के साथ उसके मन की कैफ़ियत भी बदलने लगती है। टेंशन ब्लड प्रेशर और दिल घबराने की शिकायत कम होने लगती है। योगा करने से पॉजिटिव सोच पैदा होती है। काल्पनिक डर सोच से दूर चले जाते हैं। समझ उदार होने लगती है। 
           संवेदनशील और संयमी व्यवहार भी योग से आने लगता है। समस्याओं से लड़ने की क्षमता और समाज के साथ मिलकर चलने की कला भी योग का बाई प्रोडक्ट माना जाता है।यह प्राचीन भारतीय परंपरा आसन, प्राणायाम, ध्यान और नैतिक अनुशासन पर आधारित है, जो शरीर और मन को संतुलित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे Johns Hopkins, Healthline, NCCIH आदि) के अनुसार शारीरिक लाभ में योग आसनों से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ लचीले बनते हैं और गिरने का खतरा कम होता है। पीठ दर्द, गठिया और जोड़ों की समस्या में राहत कई अध्ययनों में योग को पीठ दर्द और गठिया के लक्षणों को कम करने में प्रभावी पाया गया है। यह रक्तचाप कम करता है, सूजन घटाता है और हृदय रोग के जोखिम को कम करता है।श्वसन, ऊर्जा और चयापचय में सुधार के अनुसार बेहतर सांस लेने से ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ती है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। बेहतर मुद्रा, हड्डियों की मजबूती, नींद की गुणवत्ता में सुधार और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होना भी इसके लाभ हैं। तनाव, चिंता और अवसाद में कमी गहरी सांस और ध्यान से कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है, मन शांत रहता है।
       एकाग्रता, जागरूकता और भावनात्मक संतुलन बच्चों से लेकर वयस्कों तक फोकस बढ़ाता है और आत्म जागरूकता विकसित करता है। समग्र कल्याण के हिसाब से देखें तो नींद बेहतर होती है, मूड अच्छा रहता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
           स्वामी विवेकानंद, बी.के.एस. आयंगर, पट्टाभि जोइस जैसे योग गुरुओं ने इसे पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।संयुक्त राष्ट्र की भूमिका देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। इसे 175+ देशों ने समर्थन दिया। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे देशों में भी स्कूल-कॉलेज में योग आ चुका है। नियमित अभ्यास से ही पूर्ण लाभ मिलता है। लेकिन पहले से बीमार दर्द के शिकार और सीनियर सिटीजन को ट्रेनर से जानकारी करके ही योग करना चाहिए।
*ज़ाहिदे तंग नज़र ने मुझे काफिर समझा ।* *और काफिर ये समझते हैं मुसलमान हूँ मैं ।।*

यूसुफ़ पठान का दलबदल

*एक अनैतिक समाज में सिर्फ़ सेलिब्रिटी ही ईमानदार कैसे होगा ?*
             *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                      बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गई। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए?क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था? 
        यहां यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है? यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बे ईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताख पर रख दिया है।
       यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही है और इंसान हिंदू हो या मुसलमान कभी भी बे ईमान हो ही सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये ललचा ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलाट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है। विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद कल मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा। 
            यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है उनको पुलिस ईडी सीबीआई इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो। वह भी इसी देश इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बे ईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है। यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है अब उनका दलबदल भी उसी डर लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों सांसदों को क्या बे ईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है? यह भी हो सकता है वे आज़म ख़ान उमर खालिद नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के मुख्याओं का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो अगर कोई इंसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा। 
*"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"*

Sunday, 14 June 2026

रक्तदान दिवस

*करनी हैं बातें दो चार... हिंदुस्तानी*
*रक्तदान करने वाले हैं फरिश्ते,*
*जो खून देकर बनाते हैं नए रिश्ते*
       खून का एक रिश्ता पैदाइशी होता है, दूसरा कुछ लोग फ़रिश्ता बनकर ज़रूरत मंद लोगों को खून देकर बनाते हैं। पहला रिश्ता खुद बन जाता है तो दूसरा इंसान अपनी मर्ज़ी से बनाता है। आज के दौर में जब आदमी पैसे प्रॉपर्टी या सेक्स के लिये किसी की जान लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है, ऐसे में कुछ इंसानों का बिना किसी स्वार्थ के रक्तदान करना और किसी अंजान इंसान की जान बचाना फरिश्ते से कुछ कम नहीं है।
      सरकारी ब्लड बैंक की बात करें तो ज़िले में उसकी क्षमता 350 यूनिट है। लेकिन वहां इस समय 119 यूनिट ही खून उपलब्ध है। उनमें भी केवल 79 यूनिट की जांच हुई है जो तत्काल किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है। इसके बदले पैसा नहीं किसी भी ग्रुप का उतने ही यूनिट खून देना होता है। आंकड़े बताते हैं खून की मांग हमेशा उपलब्ध खून से ज़्यादा बनी रहती है। ज़िले में 80 बच्चे थैलीसीमिया रोग के शिकार हैं। जिनको महीने में दो बार अनिवार्य रूप से ब्लड चढ़ाना होता है। इसके बदले वापस खून देने की कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा एक्सीडेंट ऑपरेशन और एनीमिया के मरीजों को भी समय समय पर खून देना होता है। इस ब्लड बैंक में सबसे कम मिलने वाला ए नेगेटिव,ओ नेगेटिव, और एबी नेगेटिव खून सिर्फ एक से तीन यूनिट ही मौजूद है।
      सरकारी स्तर पर जो लोग ब्लड बैंक का प्रबंध करते हैं उनको उसका बाकायदा वेतन मिलता है। सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस बड़ी मानव आवश्यकता सेवा और जनरक्षा को देखते हुए इसमें प्राइवेट संस्थाएं समाजसेवी संगठन और दयालु नागरिक भी सहयोग करने लगे हैं। ज़िले की कई निजी ब्लड बैंक संस्थाओं में नजीबाबाद ब्लॉक की हाजी फहीम अख्तर की टीम भी शामिल है, जो अब तक 2000 यूनिट से ज़्यादा खून डोनेट करा चुकी है। इसमें शैलेंद्र चौधरी जैसे कई अन्य लोगों का भी भारी सपोर्ट है। ज़िले में पचास से अधिक बार खून देने वालों में विकास सेतिया, राहुल राजपूत, नवेद फरीदी शामिल हैं। वहीं नहटोर के महबूब शेख 27 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनको एक बार अपनी बच्ची की जान बचाने को खून की ज़रूरत पेश आई थी, तब से वे अपनी बेटी के जन्मदिन पर हर बार रक्तदान कर रहे हैं।
     रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों (जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) की निरंतर जरूरत के बारे में लोगों को बताना। स्वैच्छिक रक्तदाताओं को सम्मान दिया जाना चाहिए। नियमित दान को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। दुनिया में सुरक्षित रक्त की कमी बनी रहती है, खासकर विकासशील देशों में। इस दिन नए रक्त दाताओं को जोड़ने और मौजूदा दाताओं को नियमित बनाने का प्रयास किया जाता है।14 जून की तारीख को रक्तदान दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिन के अवसर पर चुना गया है। वे ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1901 में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप)। इसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। इन्हें आधुनिक रक्तदान का "पिता" माना जाता है। इतिहास देखें तो 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संगठनों (Red Cross, IFBDO, ISBT) ने इसे शुरू किया। 2005 में WHO की विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे वार्षिक वैश्विक कार्यक्रम बना दिया।
हर साल एक नया थीम चुना जाता है, जैसे "One Drop of Humanity. Give Blood. Save Lives." 2026 के लिए टैग लाइन है।
*ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों, बनों में फिरते हैं मारे मारे,मैं उसका बंदा बनूँगा जिसको, ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा।*

Tuesday, 9 June 2026

कांग्रेस बनाम अवसरवादी क्षेत्रीय दल

*अवसरवादी क्षेत्रीय दल इंडिया गठबंधन की ताकत नहीं कमज़ोरी हैं?*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है, यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।*
        सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और राहुल गांधी सोनिया गांधी ने ठीक ऐसा ही करते हुए अपने विधायकों और सांसदों की बगावत का शिकार लगातार कमज़ोर होती जा टीएमसी को इंडिया गठबंधन की बैठक में पूरे मान सम्मान से शरीक कर लिया। कांग्रेस भूल गई यह वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने कांग्रेस को बंगाल में तोड़कर टीएमसी बनाई थी। इतना ही ममता ने 2016 में कांग्रेस के जीते 44 और लेफ्ट के 32 विधायकों को भी तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया था। इसके बाद कांग्रेस के एकमात्र एमपी अधीर रंजन चौधरी को बहरामपुर से हराने के लिए दीदी गुजरात से क्रिकेटर यूसुफ़ पठान को ले आई और तमाम तिकड़मों से उनको हराकर ही दम लिया। इससे पहले दीदी कांग्रेस को झटका देने के लिए वाजपेयी सरकार में केंद्र में मंत्री बन गयीं थी। इतना ही नहीं दीदी ने 2011 का चुनाव जीतने से पहले बकायदा पत्र लिखकर बीजेपी से लेफ्ट और कांग्रेस को खत्म करने के लिए मदद मांगी। बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह वाजपेयी के निर्देश पर बंगाल गये और टीएमसी बीजेपी की इस बारे में व्यापक योजना बनी। फिर एक सोची समझी रणनीति के तहत दीदी ने एक के बाद कदम उठाते हुए लेफ्ट और कांग्रेस को बंगाल में पूरी तरह हाशिए पर पहुंचा दिया। उनके कार्यालयों पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को सताया गया और बीजेपी की शाह मोदी शैली अपनाते हुए उनको टीएमसी में आने को मजबूर किया गया। कुछ को बात नहीं मानने पर जेल भेजा गया, कुछ का कारोबार तबाह कर दिया गया। दीदी समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। ऐसे लोगों के लिये ही शायर ने कहा है....
*उसके होंठो की तरफ़ न देख वो क्या कहता है,*
*उसके कदमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।*

Monday, 8 June 2026

रियाजउद्दीन गद्दे वाला


*आज के माहौल में रियाजउद्दीन जैसे लोग फ़रिश्तों जैसे ही हैं*
              आज हम देखते हैं अधिकांश लोग इतने आत्ममुग्ध और असंवेदनशील होते जा रहे हैं कि थोड़े से फायदे के लिये किसी की जान ले लेते हैं या ज़रा सा त्याग करना पड़ जाए तो मुंह फेरकर निकल जाते हैं। लेकिन संतोष की बात यह है कि दूसरों के लिये अपना अब कुछ न्योछावर करने वाले रियाजउद्दीन जैसे संत लोग भी इसी दुनिया में मौजूद हैं।
            रियाजुद्दीन मंसूरी मालवीय नगर दिल्ली के हौज रानी इलाके में गद्दे और रजाई की दुकान चलाते हैं। वे पिछले चालीस साल से वहाँ रहते और व्यापार करते हैं। उनके बेटे अरमान भी उनके साथ काम करते हैं। वे सिविल डिफेंस वॉलंटियर भी हैं।
        पिछले दिनों 4 जून को जब इलाके के मशहूर फ्लोरिश स्टे होटल में जब आग लगी तो कुछ लोग जान बचाकर भाग गए, कुछ ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी लेकिन रियाजउद्दीन ने मुसीबत के टाइम भी अपने होश हवास पर काबू रखते हुए वो किया जो वो कर सकते थे।
          मालवीय नगर के हौज रानी में पांच मंजिला होटल में जिस समय भीषण आग लगी। तो लोग जान बचाने के लिए खिड़की से मदद मांग रहे थे। उस समय अफरातफरी का माहौल था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि जब तक फायर ब्रिगेड और सरकारी सहायता नहीं पहुंचे तब तक इतनी बड़ी सीढ़ी कहां से लायें और इन लोगों की जान कैसे बचाएं। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई ,और अनेक जख्मी भी हुए हैं।मरने वालों में कई विदेशी मेहमान भी शामिल थे। होटल के सामने ही रियाजुद्दीन की रज़ाई गद्दों की दुकान है। जब लोग ऊपरी मंजिलों से धुएँ और लपटों से बचने के लिए खिड़कियों से कूदने को मजबूर हुए, तब रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके बेटे अरमान ने तुरंत अपनी दुकान से दो दर्जन से अधिक गद्दे और रजाइयाँ निकालकर सड़क पर बिछा दीं। इससे कूदने वालों को गंभीर चोटों से बचाया गया।
      रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने कम से कम 8 से 10 लोगों की जान बचाई कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस संख्या को 20 तक भी बताया गया है। लेकिन यहां तादाद का सवाल नहीं है बल्कि रियाजउद्दीन की नीयत इरादे और इंसानियत की भावना का है। उन्होंने उन मृतकों को ढकने के लिए चादर भी उपलब्ध कराईं। जिनको तमाम कोशिशों के बावजूद जलने दम घुटने के कारण मरने से बचाया नहीं जा सका।
       मानवता के इस नेक काम में अगर आर्थिक नुकसान की बात करें तो रियाज़उद्दीन के लगभग दो से चार लाख रुपये के गद्दे रजाई का इस्तेमाल हुआ या जल गये, लेकिन उन्होंने इसकी फ़िक्र न करते हुए कहा कि “इंसानियत के लिए आगे आए, कुछ जानें बच पाईं, यही सबसे बड़ी बात है।”
 ख़बर है कि उन्हें सरदार पटेल सेवा दल जैसी संस्थाओं ने सम्मानित किया है और एक लाख रुपये की सहायता राशि दी गई है। समाजसेवी इंसानियत पसंद और आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले लोग उनके लिए सरकार से पर्याप्त मुआवजे की मांग भी कर रहे हैं क्योंकि उनका नेक काम के दौरान व्यापारिक नुकसान हुआ। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनको सम्मानित करने और पुरस्कृत करने का ऐलान भी किया है, लेकिन यह नहीं पता आज की राजनीति के चलते यह काम कब होगा या होगा भी नहीं?
        यह घटना इंसानियत और साहस की मिसाल बन गई है। रियाजुद्दीन जैसे आम नागरिकों ने दिखाया कि संकट के समय कोई भी फरिश्ता बन सकता है।
रियाजउद्दीन ने शायर की इस सोच को ताज़ा कर दिया है...
*ग़मो की आँच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग जो किसी पर भी डालकर देखो, तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो।*

Thursday, 4 June 2026

बेटी की शादी बनाम बेटी की जान

*क्या बेटी की शादी बचाना उसकी जान बचाने से ज़्यादा ज़्ारूरी है?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
          भोपाल की ट्विशा शर्मा की हत्या या आत्महत्या तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि यह मामला न तो पहला है न ही आखि़री। हम इस बात पर भी अधिक ज़ोर नहीं देंगे कि दहेज़ की नाजायज़ मांग और नहीं मिलने पर बहु को सताना असहनीय यातनायें देना और अंत में क्रूरता की सारी सीमायें पार करते हुए उसको मार डालना हमारे समाज में कितना आम हो चुका है। हमारा सवाल यह है कि जब ट्विशा के माता पिता को यह बात साफ साफ पता लग चुकी थी कि उनकी बेटी को ससुराल में तरह तरह से परेशान किया जा रहा है और उसकी जान को ख़तरा है। तब भी वे अपनी बेटी को तलाक दिलाकर घर लाने की बजाये उसके घर आने पर बार बार समझाकर उसके ससुराल मौत के मुंह में क्यों भेज रहे थे? अगर ट्विशा के परिवार वाले कम शिक्षित या बेहद गरीब होते तब भी यह माना जा सकता था कि वे उसकी शादी फिर से करने के लिये इतना धन नहीं जुटा सकते थे। लेकिन ट्विशा का मामला इस कैटेगिरी मंे भी नहीं आता है। उसकी शादी डेटिंग एप के द्वारा समर्थ से दिसंबर 25 में हुयी थी। 12 मई 2026 को छह माह बाद ही ट्विशा ससुराल में फंदे से लटकी मिली। समर्थ एक वकील है जबकि उसकी मां ज़िला जज के पद से रिटायर हुयी थी। आरोप है कि ट्विशा की सास बेटे की पसंद की वजह से अतंर्जातीय विवाह को मजबूर हुयी लेकिन बहु को धार्मिक मंत्र याद नहीं होना और उसको बिना बताये घर से बाहर जाना स्वीकार नहीं था। सवाल यह है कि जो महिला ज़िला जज के पद पर रह चुकी हो और उससे न केवल दूसरे लोगों को न्याय देने की आशा की जाती हो बल्कि उससे अपनी सोच समझ और दृष्टिकोण प्रगातिशील तार्किक और विवेकशील होने की अपेक्षा की जाती हो वह भी इतनी दकियानूसी अंधविश्वासी और अमानवीय कैसे हो सकती है?
       बताया जाता है कि उसकी सास को अपनी बहु का अपनी मां से बहुत बात करना और उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता कोई और होने का भी शक था। ये सब विवाद बहस और आरोप ट्विशा के परिवार को भी पता थे। जिनको लेकर अकसर उसके घर में झगड़ा होता था। लेकिन ट्विशा के घर वाले उसको हर बार यही समझाते थे कि वह संयम से काम लो प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। ट्विशा ने अपने परिवार को यह भी बताया था कि उसका पति न केवल ड्रग लेता है बल्कि गुस्से में इतना बेकाबू हो जाता है कि वह उसके साथ किसी दिन कोई भी बड़ी अनहोनी कर सकता है। लेकिन उसके घर वाले उसको फोन पर मिलने पर और मायके आने पर हर बार यही समझाते रहे कि उसको अपनी ससुराल में ही एडजस्ट करना है। यानी एक तरह से उन्होंने अपनी बेटी की जान की कीमत पर भी उसके लिये घर वापसी के दरवाजे़ पूरी तरह बंद कर दिये। उन्होंने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि एक बार बेटी घर से डोली में जायेगी तो फिर उस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी। इसका मतलब बेटी के साथ उसके ससुराल वाले कुछ भी अनर्थ और अन्याय अत्याचार करें लेकिन बेटी को उसके माता पिता घर वापस लाने की बात सोच भी नहीं सकते। हैरत और दुख की बात यह रही कि बेटी ने बार बार न केवल मौखिक सीधे मिलकर बल्कि व्हाट्सएप चैट में भी ससुराल में अपनी जान को ख़तरा बताया लेकिन ’’कन्यादान’’ करने वाला समाज असंवेदनशील बना रहा। कुछ लोग शादी को सात जन्मांे का संबन्ध बताते हैं। लेकिन वे यह नहीं मानते कि शादी एक जुआ भी है। जिसका होने के बाद ही पता चलता है कि सही हुयी या गलत। अगर हम यह बात स्वीकार कर लें कि हमसे रिश्ता चुनते हुए गल्ती भी हो सकती है तो उसको तलाक दिलाकर खत्म किया जा सकता है। जिस शादी में कुछ महीने बाद ही यह बात पता लग गयी थी कि न केवल पति नशेड़ी और गुस्सैल बल्कि ट्विशा की सास भी बहुत पुराने विचारों दकियानूसी और सख्त मिज़ाज की महिला है, उसमें किसी अनहोनी के होने की प्रतीक्षा करने की क्या ज़रूरत थी?
         हालांकि यह सच है कि लड़की चाहे उच्च शिक्षित हो अमीर हो या फिर बहुत कमाने वाली बड़े पद पर आसीन हो लेकिन अगर एक बार उसका तलाक हो गया तो समाज उसको ‘सेकेंड हैंड’ की संज्ञा देकर उसका पक्ष न जानकर उसकी दूसरी शादी के विकल्प कम कर देता है। साथ ही अगर उसके साथ कोई बच्चा भी मौजूद हो तो उसकी दूसरी शादी और भी कठिन हो जाती है। जबकि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता है। यही हमारे समाज को दोगलापन अन्याय और पक्षपात है। तलाकशुदा और साथ में पहले पति से बच्चे वाली की तो बात ही क्या है अगर किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार हो जाये और उसमें उसकी ज़रा भी गल्ती नहीं हो तब भी समाज उसकी शादी तो दूर उसके साथ ही उसके परिवार का जीना भी हराम कर देता है। ट्विशा के मामले का एक दुखद पहलू यह भी है कि उसके केस से एक बार फिर साबित हुआ कि कानून सबके लिये बराबर नहीं है। पहले तो उसके केस को आत्महत्या बताकर पुलिस ने तीन दिन तक पूर्व जिला जज उसकी सास के दबाव में एफआईआर ही नहीं लिखी। बाद में जब तीन दिन बाद रपट लिखी भी तो पुलिस ने उसके परिवार की तहरीर के बजाये अपने हिसाब से हल्की धाराओं और कमज़ोर आरोपों के साथ खानापूरी की। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सास अपने रसूख के बल पर कुछ ही घंटों मंे ज़मानत हासिल करके आराम से अपने घर चली गयी। इतना ही नहीं पुलिस ने उसके आरोपी पति को फरार होने का पूरा मौका दिया। बाद में ट्विशा के सेना में जनरल भाई ने जब रिटायर सैन्य कर्मियों के संगठन को यह सब बताया तो उन्होंने पुलिस प्रशासन और शासन के खिलाफ मोर्चा खोलकर रिपोर्ट तरमीम कराई, दोबारा ट्विशा की डैडबाॅडी का पोस्टमार्टम हुआ और उसकी सास की ज़मानत खारिज कर केस की जांच सीबीआई को दे दी गयी। इसके साथ ही भागने का कोई रास्ता न बचता देख उसके पति समर्थ ने भी कोर्ट में सरेंडर कर दिया। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने उसको और उसकी मां पूर्व जज को रिमांड पर लेकर उस सख्ती और थर्ड डिग्री से पूछताछ नहीं की जिसके लिये हमारी पुलिस पहचान रखती है। शायर कहता है- तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी, जो शाख़ ए नाजु़क पे आशियाना बनेगा ना पायेदार होगा।
*नोट- लेखाक पत्रकारिता और आकाशवाणी से चार दशक से अधिक समय से जुड़े हुए हैं।*

Thursday, 28 May 2026

मॉडर्न बहु

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*लोगों का काम है कहना,* 
*आपका हक़ है ज़िन्दा रहना*
            अब तक सुना पढ़ा था बच्चे ने फेल होकर प्रेमी प्रेमिका ने प्यार में धोखा खाकर या किसी ने कर्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर ली। लेकिन अपनी पुत्र वधु स्नेहा के मॉडर्न लाइफ़ स्टाइल से आहत होकर सास ससुर ने हरियाणा में अपनी जान दे दी। इसके पीछे की वजह जानकर आपको भी दुख होगा। हैरत भी होगी। हुआ यह कि स्नेहा दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी एक खुले विचारों की लड़की है। स्नेहा की लव मैरिज हरियाणा के पानीपत के गांव नारा निवासी आशीष के साथ परिवार की सहमति से ही हुई थी। आशीष अपने माता पिता राजेश और पत्नी सुमन का इकलौता बेटा है। चूंकि स्नेहा मॉडर्न परिवार से थी और गांव के माहौल में ढलना नहीं चाहती थी। सास-ससुर को उसके छोटे कपड़ों से परेशानी थी। उसके पहनावे और रहन-सहन को लेकर अक्सर घर में टोका-टाकी होती थी। सुमन और राजेश चाहते थे कि बहू सूट और साड़ी पहने, लेकिन स्नेहा को यह रोकटोक मंजूर नहीं थी। 
      जिसकी वजह से परिवार में अक्सर झगड़ा होता रहता था। पिछले दिनों फिर इसी बात को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ, जिसके बाद स्नेहा के सास ससुर राजेश और सुमन ने विषैला सल्फ़ाज़ खा लिया। दोनों को इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। एक ही घर से दो अर्थियां उठने से पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। 
         सुसाइड की खबर मिलते ही मौके पर पहुंची पुलिस ने बहू पर सुसाइड के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। परिजनों ने बताया कि बहू दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी थी और वह शादी के बाद गांव के माहौल में ढलने को किसी कीमत पर भी तैयार नहीं थी। तलाक़ ही एक रास्ता था जिसके लिए पति तैयार नहीं था। 
      उसका पति भी उसको अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने के पक्ष में था। वह दिल्ली का कल्चर छोड़ना नहीं चाहती थी। उसके पहनावे और रील्स बनाने के शौक को लेकर अक्सर सास ससुर और गांव वाले टोका-टाकी करते थे, जो धीरे-धीरे बड़े क्लेश का रूप लेने लगा। सवाल यह है कि आप जिस परिवेश में रहते हैं जिस सोच के हैं और जिस जीवन शैली को पसंद करते हैं उसके जैसी ही बहु लानी चाहिए, लेकिन क्योंकि लड़के ने सोशल मीडिया पर प्रेमिका बनी लड़की से अपनी पसंद से लव मैरिज की थी तो सास ससुर को शादी की सहमति नहीं देनी थी। अगर आपका लड़का नहीं मानता तो आपको उससे संबंध तोड़ लेने थे या सीमित कर लेने थे। अपने लड़के और मॉडर्न बहु को कहीं शहर में रखना था। 
     अगर गांव में रखना मजबूरी थी तो लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह नहीं करनी थी क्योंकि लोगों का काम है कहना, और आपका हक़ है सम्मान के साथ ज़िंदा रहना। गांव हो या शहर हर किसी को अपने हिसाब से शादी करना अपने तरीके से जीना और अपनी पसंद के कपड़े व खाना बुनियादी अधिकार है। इस अलग राय सोच और समझ को लेकर झगड़ा करना गांव वालों के ताने सुन कर अपमानित महसूस करना और यहां तक कि जान दे देना ठीक नहीं माना जा सकता। सास ससुर को हर हाल में ज़िंदा रहने का उसी तरह अधिकार है जैसे बहु को अपने छोटे कपड़ों और खुले विचारों के साथ जीना पसंद रहा है। अंजुम रहबर का एक शेर याद आ रहा है...
*उसकी पसंद और थी मेरी पसंद और,*
*इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा।*

कुरबानी का जज़्बा

*आज का विचार*
    _इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सिर्फ़ जानवर ज़िबाह मत कीजिये, क़ुर्बानी का जज़्बा भी पहचानिये..*
     मुसलमान साल में दो त्यौहार खासतौर पर मनाते हैं। एक ईद उल फ़ित्र और दूसरा ईद उज्जुहा। इस ईद को ईद ए क़ुर्बान या बकराईद भी कहा जाता है। इस ईद पर साहिब ए हैसियत मुसलमान जानवर की कुर्बानी देते हैं। जानवर के मीट के तीन हिस्से बनाए जाते हैं। एक खुद रखते हैं दूसरा अपने परिचितों को देते हैं और तीसरा ग़रीब और ज़रूरतमंदों को भेजा जाता है। जिस तरह हज के लिये जायज़ कमाई ज़रूरी है, वैसे ही क़ुरबानी के लिए हलाल पैसा खर्च करना शर्त है। इसके साथ ही आप पर किसी का कर्ज़ नहीं होना चाहिए। जो असली बात लोग भूल जाते हैं वो यह है कि जानवर की क़ुरबानी देने के साथ आपके दिल में अल्लाह की राह में इंसानियत मुल्क और आपसी रिश्तों को बचाने के लिए भी क़ुर्बानी का जज़्बा होना चाहिए। यह नहीं हो सकता आप हज़रत इब्राहीम की रस्म पूरी करने के लिए अल्लाह की राह में जानवर तो क़ुर्बान करें लेकिन अगर अपने सगे भाई पड़ौसी या हमवतन के लिए अपने पैसे जायदाद या किसी भी तरह के हित की थोड़ी से कुर्बानी देने की ज़रूरत आए तो पीछे हट जाएं। कुरबानी का मकसद अपनी हसद लालच हिंसा टकराव गुस्सा झूठ जुर्म और नफ़रत जैसी तमाम बुराइयों को भी कुरबान करना होता है। अगर सरकार कह रही है सड़क पर नमाज़ मत पढ़ो तो यह जानते हुए भी कि दूसरे धर्म के लोगों को ऐसा नहीं कह रही है, हम इसलिए रोड पर इबादत नहीं करेंगे क्योंकि इससे राहगीरों को आने जाने में तकलीफ़ होती है और अपने किसी भी मज़हबी काम से किसी को तकलीफ़ देना इस्लाम ने मना किया है। बाक़ी लोग क्या करते हैं और सरकार उनको क्यों करने देती है यह मुसलमानों का मामला नहीं है। मुसलमानों को अच्छी बातें सीखनी हैं उनपर अमल करना है और दूसरे लोगों से बेहतर मिसाल पेश करनी है। ऐसे लोगों के लिए ही शायर ने कहा है_
*मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,*
*उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक़ याद किया।*

Tuesday, 26 May 2026

पाक में हिंदू नाम बहाल


*क्या पाकिस्तान अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है?*
        पाकिस्तान में हाल ही में  मुख्य रूप से लाहौर (पंजाब) में कई जगहों के नाम बदले गए हैं। ये बदलाव पंजाब सरकार की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के नेतृत्व में विभाजन से पूर्व काल के मूल नामों को बहाल करने के लिए किए गए हैं।
     मुख्य बदलाव लाहौर में किए गए हैं। जिनमें इस्लामपुरा को कृष्णा नगर, बबरी मस्जिद चौक को जैन मंदिर चौक, मुस्तफाबाद को धर्मपुरा सुन्नत नगर को संत नगर,रहमान गली को राम गली,हामिद निजामी रोड को टेम्पल स्ट्रीट, निश्तर रोड को ब्रैंड्रेथ रोड , फातिमा जिन्ना रोड को क्वीन्स रोड, अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड किया गया है।
      अन्य प्रस्तावित और बदले जाने वाले लक्ष्मी चौक, मोहन लाल बाजार, भगवान पुरा, शांति नगर आदि अभी बाकी हैं लेकिन इन पर भी शासन को प्रशासन की ओर से प्रस्ताव बनाकर भेजे जा चुके हैं। आशा की जाती है ये भी जल्दी ही पुराने सांस्कृतिक नामों से जाने जाएंगे। कुल मिलाकर 9 से ज्यादा जगहों के नाम पहले ही बदले जा चुके हैं, और 15 से अधिक और नामों को बदलने की योजना विचाराधीन है।
       सवाल यह है कि पाकिस्तान जैसे कट्टर इसलामिक मुल्क में इन जगहों के नाम क्यों बदले गए? दरअसल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बहाल करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। हिंदुस्तान के बंटवारे के समय सबसे अधिक तकलीफ़ देह विभाजन लाहौर जैसे विश्व प्रसिद्ध महानगर का हुआ था। वहाँ विभाजन से पहले मुस्लिम हिंदू जैन और सिखों की मिली जुली संस्कृति विकसित हुई थी लेकिन बंटवारे ने इसको दो टुकड़ों में अलग अलग कर दिलों का भी विभाजन कर दिया। लाहौर विभाजन 1947 से पहले कई धर्मों और ब्रिटिश काल की विविधता वाला शहर था। वहां की सरकार ने इस मिली जुली कल्चर को खत्म करने के लिए कई गैर मुस्लिम नामों को बाद में इस्लामी उर्दू और अरबी नामों से बदल दिया गया था। लेकिन नाम बदलने से पुरानी यादें सभ्यता और परम्पराएं कभी भी कहीं भी खत्म नहीं होती, वे कुछ समय के लिए दब जाती हैं या छिप जाती हैं। बताया जाता है कि पिछले दिनों जो नाम बदले गए हैं वे लाहौर हेरिटेज रिवाइवल प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की यह महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन अपने सीएम और पीएम रहते वे इसको परवान नहीं चढ़ा सके थे। अब यह अहम और ऐतिहासिक काम उनकी बेटी और पंजाब की पहली महिला सीएम मरियम नवाज़ ने किया है।  इसका मकसद पर्यटन को बढ़ावा और शहर की पुरानी पहचान को फिर से जीवंत करने का भी बताया जाता है, लेकिन इसके लिए न केवल प्रांतीय सरकार को अपना दिल बड़ा करना पड़ा है बल्कि योजना को लागू करने में वहां के कट्टरपंथी भी आड़े आ रहे थे। इतना ही नहीं कई आतंकी और संकीर्ण सोच के संगठनों तो पंजाब सरकार से फिर से वही मुस्लिम नाम रखने की ज़ोरदार मांग भी की है और उनकी बात नहीं माने जाने पर आंदोलन और हिंसक कार्यवाही धमकी दी है। सरकार का कहना है कि वह कट्टर तत्वों के दबाव में नहीं आयेगी क्योंकि यह सांस्कृतिक संरक्षण है, न कि कोई राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए की गई व्यक्ति विशेष या पार्टी की कार्यवाही।
       पाकिस्तान जैसे कट्टर संकीर्ण और हिंसक गतिविधियों के लिए पहचाने जाने वाले मुल्क में ये क्रांतिकारी उदार और सेक्युलर बदलाव आजकल दुनियाभर में काफी चर्चा में हैं। कुछ लोग इसे अपनी जड़ों की ओर लौटने वाला बड़ा सकारात्मक कदम यानी इतिहास की बहाली मान रहे हैं, तो कुछ विरोधी इसे कुफ्र भारतीय हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने वाला विवादास्पद काम भी बता रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एशिया में भारत पाकिस्तान या बंगलादेश कोई भी मुल्क हो, इनकी सभ्यता संस्कृति और परंपराएं एक ही रही हैं। यह ठीक है कि लोग समय समय पर धर्म बदलते रहते हैं लेकिन उनके पुरखों पूर्वजों और बुजुर्गों की जीवन जीने की शैली वही रहती है, जो हज़ारों साल पहले थी, इसलिए संस्कृति साहित्य और समाज की समृद्ध यादों को साझा विरासत मानकर अपनाया जाना चाहिए जैसा कि पाकिस्तान ने अपनी छवि कट्टर सोच और गैर मुस्लिम तौर तरीकों के विरोध के बावजूद आज सदबुद्धि आने पर किया है, शायद भारत भी अगर बहुसंख्यक राजनीति के ध्रुवीकरण के दौर से एक दिन निकला तो पाकिस्तान की इस उदार सोच का स्वागत करेगा और अपनी उसी पुरानी उदारता धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता को अक्षुण्ण बनाये रखेगा जो उसने हज़ारों साल से बनाए रखकर दुनिया के सामने बेहतरीन मिसाल पेश की है।शकील जमाली का एक शेर याद आ रहा है_
 *पाँव में अब कोई ज़ंजीर नहीं डालते हम,*
*दिल जिधर ठीक समझता है उधर जाते हैं।*

Wednesday, 13 May 2026

चिड़िया का बच्चा

*आज का विचार*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*चिड़िया_का_बच्चा_चाइनीज़_मांझा और हमारा परिवार...* 🤔
कुछ दिन पहले हमारे घर में एक पौधे पर एक खूबसूरत चिड़िया ने घोंसला बनाया। उसके बाद उसने अंडे दिए। उसके बाद एक बच्चा पैदा हुआ। चिड़िया उसकी देखभाल कर ही रही थी। हम लोग भी आंधी या बारिश में उस घोंसले पर कपड़े सुखाने का स्टैंड लगाकर उस पर प्लास्टिक की शीट डाल देते थे। चिड़िया उस मासूम बच्चे के लिए अक्सर अपने मुँह में कीड़े लाती थी और अपने बच्चे को खिलाती थी। कभी कभी चिड़िया बहुत देर से आती या पूरी रात नहीं आती तो बच्चे के भूखा होने और लगातार बोलने पर मेरा बेटा या बेगम उसको चावल या दूध खिलाने पिलाने की कोशिश करते थे। एक छोटी कटोरी में पीने को पानी भी रख दिया था। अभी तक सब ठीक चल रहा था। बच्चा धीरे धीरे बड़ा हो रहा था। उसके पर भी निकलने लगे थे। उड़ने की तैयारी कर रहा था। आँखे खोलता था। मां खाना लाती तो फौरन मुंह खोलता था। ऐसा लगता था उसकी आवाज़ से जैसे चिड़िया के देर से आने की मासूम शिकायत कर रहा है ।अचानक एक दिन उसकी चिड़िया मां जब खाने को कुछ लाई। उसके मुंह में उस खाने को डाल दिया। पता लगा आए दिन लोगों की गर्दन और हाथ काटने को बदनाम चायनीज़ मांझा भी उस खाने के साथ उलझा हुआ था। वही हुआ जिसका डर था कि खाना निगलने से पहले ही मांझा चिड़िया के बच्चे के मुंह में फंस गया। मासूम बच्चा दर्द से चिल्लाने लगा। उसके बोलने की आवाज़ में दर्द की असहनीय तकलीफ़ सुनकर ही महसूस हो रही थी। मैं ने जैसे ही वो मांझा बच्चे के मुंह से निकालना चाहा देखा तो उसके मुंह में जीभ के साथ चिपका हुआ था। इसी दौरान उसकी मां चिड़िया ने बच्चे को खतरा देख मेरे सर पर हमला करना चाहा और ज़ोर ज़ोर चीखना शुरू कर दिया। फिर मेरे बेटे ने चिड़िया के वहां से जाने का वेट करने को कहा। चिड़िया कुछ देर बाद उड़ गई। फिर बेटे ने बड़ी फुर्ती से बच्चे के मुंह में फंसा मांझा छोटी कैंची से काटकर निकाल दिया। इसके बाद बच्चा नॉर्मल हो गया। चिड़िया भी वापस घोंसले में आकर उसके साथ सहज होकर बैठ गई। उसके लिए जो खाना लाई वो बच्चा आराम से खा रहा है। दोनों खुश हैं और इधर हमारा पूरा परिवार भी चिड़िया और उसके बच्चे की खुशी से सकून से है। बच्चे के मुंह से मांझा निकालने और बच्चे व चिड़िया के नॉर्मल हो जाने से ऐसा सुख मिला मानो किसी फैमिली मेंबर का ऑपरेशन कामयाब हो गया हो। चिड़िया जब जब घर में आती है, चहचहाती है, उसका बच्चा बोलता है, तो घर में ऐसे रौनक हो जाती है जैसे परिवार का कोई बच्चा जब खिलखिलाता है तो परिवार खुशी से भाव विभोर हो जाता है। परिंदों की भी अपनी दुनिया है लेकिन जब वे कभी कभी कुछ टाइम के लिए हम इंसानों के साथ रहने लगते हैं तो उनके सुख दुख भी हमारे खुशी ग़म हो जाते हैं। यह हमने इससे पहले भी कई बार शिद्दत से महसूस किया है। आपने भी कभी कभी ऐसा ही महसूस किया होगा। अगर हम में इंसानियत मुहब्बत और संवेदनशीलता है तो हम इंसानों का नहीं सभी जीवों का दर्द और खुशी महसूस कर सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जिसमें पूरी कायनात के जीव मिल जुलकर दुख सुख साझा करके और एक दूसरे की मदद कर के आराम से प्यार से सह अस्तित्व के साथ रह सकते हैं। 
मनव्वर राणा का माँ बच्चे पर लिखा एक शेर याद आ रहा है_*खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी हैं गाँव से,*
*बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही।*

वामपन्थ कभी खत्म नहीं होगा...

*जब तक शोषण अन्याय रहेगा, तब तक वामपंथ भी रहेगा!* 
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
            देश में पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी थी। संयोग की बात है कि पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के चुनाव में देश के एकमात्र राज्य केरल में बची वामपंथी सरकार भी हार गयी। इसी के साथ ही वामपंथ के चिरपरिचित विरोधी साम्प्रदायिक और पूंजीवादियों ने झूठा राग अलापना शुरू कर दिया कि अब भारत से कम्युनिस्ट विचारधारा हमेशा के लिये खत्म हो गयी। यह उनका बचकाना नादान और मूर्खतापूर्ण दावा है कि भारत ही नहीं दुनिया से कभी कम्युनिस्ट विचारधारा खत्म हो सकती है। उनको पता होना चाहिये कि वामपंथी सोच का अस्तित्व और जन्म मज़दूर किसान गरीब कमजोर दलित और अल्पसंख्यकों के शोषण अत्याचार अन्याय के खिलाफ हुआ है। ज़ाहिर बात है कि जब तक दुनिया और हमारे देश में भी ये सब असमानतायें कमियां और बुराइयां मौजूद हैं तब तक उनके खिलाफ लड़ने की इंसान की इच्छा शक्ति लक्ष्य और सपना भी जीवित रहेगा। इसलिये वामपंथ का कभी अंत नहीं होगा। जब दशकों तक जनसंघ और बीजेपी सत्ता में नहीं आई तो क्या संघ की विचारधारा देश से खत्म हो गयी थी? नहीं क्योंकि विचारधारा का सत्ता से सीधा सरोकार नहीं होता है। अंग्रेजी में एक शब्द विलफुल थिंकिंग है। यह उन दावों के लिये इस्तेमाल होता है। जिनमें आदमी उस तरह की सोच का शिकार होता है जैसा वह देखना चाहता है। सामने सच और हकीकत कुछ और होते हुए भी वह उसको झुठलाता है। मिसाल के तौर पर हिंदुओं का एक वर्ग खुद को सर्वश्रेष्ठ और विश्वगुरू मानता है तो वह वास्तविकता इससे विपरीत होने पर भी इस कल्पना में ही जीता रहता है कि वह जो मानता है वही हो रहा है और वही होगा। ऐसे ही मुसलमानों का कट्टरपंथी तबका अपने इस्लाम को दुनिया का सबसे बेहतरीन मज़हब बताता है और यह भी दावा करता है कि दुनिया में एक दिन सब लोग मुसलमान होंगे और इस्लाम का राज होगा जबकि हकीकत से यह दावा बिल्कुल उल्टा है। ऐसा होने के दूर दूर तक आसार भी नहीं हैं। लेकिन वह हर घटना हर जंग और हर बात को इसी से जोड़कर खुशफहमी में जीता है। जब सोवियत संघ का पराभव हुआ उस समय भी नवउदारवादियों ने दुनिया से वामपंथ की अंतिम विदाई का समूह गान किया था, लेकिन रूस तो फिर से खड़ा हो गया। साथ ही वह दुनिया की पांच वीटो पाॅवर वाले परमाणु शक्ति वाले देशों के क्लब में भी बना हुआ है।
          इतना ही नहीं आज वामपंथी चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को अमेरिका से होड़ कर रहा है। वह तकनीक हथियार और नये नये क्षेत्रों में दुनिया की महाशक्तियों को चुनौती दे रहा है। अपने देश में निर्मित सस्ते माल से चीन ने दुनिया के तमाम देशों को पाट दिया है। दुनिया के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें चल रही हैं। यह ठीक है कि भारत में पश्चिमी बंगाल के बाद त्रिपुरा और अब केरल से कम्युनिस्ट सरकार की विदाई हो गयी है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि बंगाल में सबसे अधिक लंबे समय तक सरकार चलाने का रिकाॅर्ड भी कम्युनिस्टों के नाम 34 साल का है। केरल में बारी बारी से कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन वामपंथी सरकार को रिप्लेस करता रहा है। लेकिन आप तीनों राज्यों में देखें तो भूमि सुधार सार्वजनिक शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था विकेंद्रीयकरण साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिये सामाजिक चेतना सहित मज़दूरों को न्यूनतम सम्मानजनक वेतन गरीबों को जीवन यापन के लिये भूमि बेरोज़गारों को रोज़गार मिलने तक गुजारा भत्ता आदि जनहित की अनेक योजनायें वामपंथियों की देन रही है। केरल में एलडीएफ की सरकार की हार के बाद यह पहला मौका है कि वामराज के एक दौर पर फिलहाल विराम लगा है। लेकिन यह समझना भूल होगा कि अब कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं होगी। यह सच है कि 1977 के बाद देश में पहली बार किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है। यह याद रखना चाहिये कि 1957 में जब केरल में पहली बार नंबूदरीपाद के वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे तब वह भारत के ही किसी राज्य नहीं दुनिया में पहली चुनी हुयी कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया बने थे। नंबूदरीपाद देश के पहले गैर कांग्रेसी सीएम भी थे। उनकी सरकार को तत्कालीन केंद्रीय कांग्रेसी नेहरू सरकार ने बिना किसी ठोस कारण के दो साल बाद ही बर्खास्त कर दिया था। लेकिन उन्होंने बार बार चुनाव जीतकर केरल को सबसे अधिक साक्षर और मानव मूल्य विकास में अग्रणी बना दिया था। बंगाल में वामपंथी मुख्यमंत्री ज्योति बसु भूमि सुधार पंचायती राज और राजनैतिक स्थिरता के साथ सबसे लंबे समय 23 साल तक राज करते रहे। उनको 1996 में देश में संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिल रहा था लेकिन कम्युनिस्टों की अपने बहुमत से ही पीएम बनने की ज़िद ने भारतीय राजनीति को नई दिशा देने का स्वर्णिम अवसर खो दिया जिसको बाद में वामपंथी इतिहास की हिमालय जैसी भूल माना गया। वर्ना आज देश की राजनीति का रूप रंग कुछ और ही होता।
         यह भी एक सच है कि बदलते हालात के हिसाब से कम्युनिस्ट नहीं बदले और भारत की जाति व्यवस्था को स्वीकार करने की बजाये वर्ग संघर्ष को ही प्राथमिकता देकर पंूजीवाद का लगातार विरोध करते रहे जिससे वामपंथी राज्यों में पूंजी निवेश घटता गया और रोज़गार घटने से प्रति व्यक्ति आय का मुकाबला अन्य राज्यों से करने में समस्या आने लगी। संसद में भी एक दौर था जब कम्युनिस्ट सांसदों की संख्या 60 से अधिक थी लेकिन अमेरिका से परमाणु संधि पर विवाद के बाद कम्युनिस्टों ने यूपीए की मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके साथ ही यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कभी मुख्य विपक्ष बनकर रहने वाले कम्युनिस्ट जाति और धर्म की राजनीति का वर्चस्व बढ़ने पर धीरे धीरे किनारे होते गये। भारत के लोगों में कम्युनिस्टों को लेकर उनके नास्तिक होने का भी सियासी नुकसान हुआ क्योेंकि भारतीय मूल रूप से धार्मिक और अंधविश्वासी होते हैं जबकि वामपंथी धर्म को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में लाने के खिलाफ रहे हैं। साथ ही यह भी रिकाॅर्ड है कि कम्युनिस्टों के राज में एक भी मंदिर मस्जिद नहीं तोड़ी गयी ना ही किसी धर्म के मानने वालों को उनके पूजा या नमाज़ जैसी किसी गतिविधि से रोका गया लेकिन चुनावी राजनीति महंगी और जाति व धर्म आधारित होते जाने से भी वामपंथी खुद को हाशिये पर जाता देखते रहे। सबसे बड़ी कमी उनकी यह रही कि उन्होंने समय रहते लोगों को प्रगतिशील विवेकशील तर्कशील और वैज्ञानिक सोच का नागरिक बनाने को कोई विशेष सांस्कृतिक सामाजिक और चेतना व जागरूकता का सघन अभियान नहीं चलाया जिससे संघ व बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता में आने और लोगों के दिमाग पर मीडिया के ज़रिये कब्ज़ा करने का मौका मिल गया। लेकिन यह भरोसा रखना चाहिये कि जब तक समाज में असमानता पक्षपात और अन्याय है तब तक वामपंथी सोच को दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती, भारत भी इसका अपवाद नहीं है। शायर ने कहा है- *मेरे बच्चे तुम्हारे लफ्ज़ को रोटी समझते हैं, ज़रा तक़रीर कर दीजिये कि इनका पेट भर जाये।* 
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से हिंदी पत्रकारिता और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हैं।*

Thursday, 7 May 2026

टीएमसी की हार

*बंगाल में टीएमसी की हार, ममता खुद भी ज़िम्मेदार?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
   *0 इसमें कोई दो राय नहीं पांच राज्यों में आये चुनाव नतीजे बंगाल से काफी अलग हैं। इसके कारण भी अलग अलग हैं। एसआईआर भी इन पांच राज्यों सहित अब तक देश के कुल 14 राज्यों में हो चुकी है लेकिन जिस तरह से बंगाल में 27 लाख लोगों को चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस कारण के वोट डालने से रोक दिया, उससे यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया कि मतदाता सरकार चुनते हैं बल्कि अब आप कह सकते हैं कि सरकार उन मतदाताओं को चुन रही हैं जो उसको सत्ता में लाने के लिये वोट कर सकते हैं। साथ ही एक पेटर्न आप इन चुनाव नतीजों में और देख सकते हैं कि ममता चाहे अपनी हार का एकमात्र कारण चुनावी धांधली बेईमानी और पक्षपात बतायें लेकिन वह राज्य में बीजेपी को स्पेस देने के साथ कैसे इस हार की खुद भी ज़िम्मेदार हैं, सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस लेख में हम तथ्यों और प्रमाणों के साथ आपको बतायेंगे।*
        राजनीति के जानकार बताते हैं कि जो दल नेता या गठबंधन कभी न कभी बीेजेपी के साथ अपने स्वार्थ में यह जानने के बाद भी जुड़े हैं कि उसका रास्ता गलत है, उनको देर सवेर भाजपा ने खत्म कर अपने अंदर समा लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर टीएमसी पीडीपी बीजू जनता दल जनता दल यू बसपा शिवसेना जननायक जनता पार्टी अकाली दल और अप्रत्यक्ष रूप से के चंद्रशेखर राव जगन मोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल जैसे नामों की एक लंबी सूची बन सकती है जो कभी न कभी बीजेपी से अपने अवसरवादी सिध्दांतहीन और परंपरागत मूल्यों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ में जुड़े और आज बीजेपी उनको निगल गयी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी की हार में केंचुआ का एसआईआर के बहाने वोट चोरी के साथ ही उनकी सरकार के खिलाफ पनप रहा जन असंतोष उनके कैडर का कट मनी वसूलना और उनके खिलाफ 15 साल की एंटी इनकम्बैंसी भी का भी रोल रहा है लेकिन सबसे बड़ी वजह जो लोग भूल चुके हैं। वह यह है कि ममता बनर्जी ने जो बोया आज उनको वह काटना पड़ा है। 29 साल पहले 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस नाम से वरिष्ठ बंगाली नेता मुकुल राय के साथ मिलकर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी परंपरागत विरोधी कांग्रेस और वामपंथी दलों को खत्म करने और अपने मुस्लिम वोट बैंक को डराकर बीजेपी को बंगाल में प्रवेश कराने में हर तरह का सहयोग दिया। बीजेपी जो पहले से ही कम्युनिस्टों और कांग्रस की विरोधी नहीं शत्रु की सीमा पार करके उनका नाम ओ निशान मिटाना चाहती थी, को बिन मांगी मुराद पूरी करने का अवसर मिल गया। मौका मिलते ही बीजेपी ने टीएमसी के संस्थापक सदस्य और ममता के राइट हैंड समझे जाने वाले मुकुल राय पर छापा मारकर उनको बीजेपी में ले लिया।
         इसके बाद ममता खुद 1999 में एनडीए सरकार में शामिल होकर रेल मंत्री बन गयी। जबकि यहीं से उनका राजनीतिक पतन शुरू हो गया। 2001 में रक्षा सौदों में कमीशन खाने का स्टिंग सामने आने पर वह कथित नैतिकता की दुहाई देकर अपना पद त्याग कर एनडीए से अलग हो गयीं। उसके बाद 2001 में ममता ने बीजेपी को अपनी स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में एनडीए में लौटने की संभावना व्यक्त की। 2003 में ममता फिर से एनडीए सरकार में बिना विभाग की मंत्री बन गयीं। इसी साल ममता ने आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के एडिटर तरूण विजय की वामपंथी आतंक पर लिखी गयी किताब के विमोचन समारोह में अपनी हाज़िरी लगाई। संघी अख़बार के संपादक ने उनको बंगाल की दुर्गा बताकर हाथो हाथ राजनीतिक हिसाब बराबर कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ संघी लेखक और राज्यसभा सांसद बलवीर पंुज ने ममता को सदन में ‘‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं’’ कहकर नवाज़ा। इतना ही नहीं बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ हिंसक संघर्ष में टीएमसी और संघ एक ही पेज पर खुलकर आ गये। ममता ने संघ से मेलजोल बढ़ाते हुए आरएसएस के मोहन भागवत मदन दास देवी और शेषाद्रि चारी को सच्चा देशभक्त बताया। 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता की सादगी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में शामिल हैं, जो सियासत का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये नहीं करते हंै। इसके बाद हालांकि ममता ने यह ज़ाहिर किया कि वह बीजेपी संघ और एनडीए से दूरी बना चुकी हैं लेकिन तमाम विरोध असहमति और आपत्ति के बावजूद जब संसद में सीएए के खिलाफ मतदान की बारी आई तो टीएमसी के आठ सांसद गायब हो गये और एनडीए का यह विवादित विधेयक बिना पर्याप्त सांसदों के आराम से पास हो गया।
         ममता ने संविधान विरोधी विधेयक रोकने को न तो पार्टी का कोई व्हिप जारी किया और न ही पार्टी लाइन से हटकर लापता होने वाले आठ सांसदों के खिलाफ कोई अनुशासन की कार्यवाही ही की। 2021 में मुकुल राय बीजेपी से टीएमसी में आ गये और बोले बीजेपी और टीएमसी दोनों एक सी ही पार्टी हैं। ममता उनके इस बयान पर भी चुप रहीं। जुलाई 2022 में वाइस प्रेसिडंेट के इलैक्शन में ममता की पार्टी ने अचानक विपक्ष की साझा उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का विरोध कर अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी की बी टीम होने का एक और प्रमाण दे दिया। सियासत के जानकार यह देखकर हैरत में पड़ गये कि जिन जगदीप धनकड़ ने बंगाल का राज्यपाल रहते ममता सरकार का काम करना दूभर कर दिया था उनको ही जिताने के लिये टीएमसी सदन में उनके खिलाफ वोट न करके अप्रत्यक्ष मदद करने को कैसे तैयार हो गयी? ममता बनर्जी बार बार इंडिया गठबंधन को भी धोखा देती रही हैं। बंगाल में उनकी पार्टी की हार पांच प्रतिशत वोटों से हुयी है लेकिन दोनों अलग अलग लड़कर सात प्रतिशत वोट लेने वाले इंडिया गठबंधन के घटक कांग्रेस और कम्युनिस्टों को उन्होंने बार बार प्रस्ताव देने के बावजूद कभी साथ मिलकर लड़ने की हामी नहीं भरी। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहां ममता की हार के लिये केंचुआ और मोदी सरकार का खुला पक्षपात बे ईमानी और हर र्मार्चे पर उनको घेरना है वहीं ममता का संघ और बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक फासिस्ट और नफरत की सियासत करने वाली पार्टी से कभी खुलकर तो कभी छिपकर अनैतिक सियासत करना आज उनको अन्य बीजेपी सहयोगियों की तरह खा गया है। शायर ने कहा है- तू किसी और से ना हारेगा, तुझको तेरा ग़रूर मारेगा, तुझको दस्तार जिसने बख़्शी है, तेरा सर भी वही उतारेगा।
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से पत्रकारिता शायरी लेखन अख़बार संपादन और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हुए हैं।*

Tuesday, 5 May 2026

मज़दूर असंतोष

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

बंगाल में बीजेपी

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

Wednesday, 29 April 2026

राकेश अग्रवाल जी

*चंद्रा_कत्था_इंडस्ट्रीज_के_स्वामी_राकेश_अग्रवाल जी_नहीं_रहे*😢
नजीबाबाद जिला बिजनौर यूपी, स्थित चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के एम डी, चंद्रा ग्रुप के मुखिया स्व. श्री सुभाष चंद अग्रवाल के छोटे भाई पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ समाजसेवी स्व. नरेशचंद्र अग्रवाल के भतीजे , रामलीला कमेटी के संरक्षक और वरिष्ठ समाजसेवी व सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री राकेश कुमार अग्रवाल का 23 मार्च की रात दुखद निधन हो गया है। वे आगामी 10जुलाई को पूरे 75 वर्ष के होने वाले थे। उनको मंगलवार सुबह 10 बजे नजीबाबाद उनके स्टेशन रोड स्थित निवास चंद्रा हाउस पर लाया गया। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार के नमामि गंगा घाट पर 25 मार्च को 11.30 बजे होगा। #उनकी_शवयात्रा_सुबह_9_30_बजे_उनके_रेलवे_स्टेशन_रोड_स्थित_निवास_चंद्रा_हाउस_से_चलेगी।
     श्री अग्रवाल चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज के साथ ही मानसरोवर बॉटलिंग कंपनी, मानसरोवर पेपर मिल, चंद्रा केमिकल, चंद्रा फ्रेगरेंस आर सी ए लीजिंग जैसी चंद्रा ग्रुप की अन्य अनेक कंपनियों के डायरेक्टर रहे और सीकेआई छाप कत्था कच्छ के साथ ही उनकी कंपनी के दिलरुबा पान मसाले ने देश विदेश में अपनी बेहतरीन इमेज बनाई जिससे नजीबाबाद को भी प्रसिद्धि मिली। उनकी थम्सअप फैक्ट्री के प्रोडक्ट भी अपने विशेष स्वाद के लिए पूरे भारत में मशहूर हुए और कई बार विले पार्ले ग्रुप मुंबई से एमबीसीएल को इसके लिए विशेष पुरस्कार मिले। उन्होंने गैर हिंदी भाषी देशों और भारत के राज्यों में हिंदी के लिए विशेष सेवा करने वाले विद्वानों को कई साल तक माता कुसुम कुमारी सम्मान देकर भी नजीबाबाद का नाम रोशन किया जिसकी चर्चा आकाशवाणी और दूरदर्शन से होने से लोग नगर व जनपद को अलग से पहचानने लगे थे। उनके चंद्रा ग्रुप से न केवल कई कंपनी बल्कि बड़ी संख्या में रोज़गार पैदा हुए जिससे नगर का विकास हुआ।
      राकेश जी कुछ माह से बीमार चल रहे थे। वे दिल्ली के एक बड़े हॉस्पिटल में भर्ती थे। उनका वहां जाने माने विशेषज्ञ डॉक्टर्स गहन चिकित्सा कक्ष में इलाज कर रहे थे। इससे पहले उनका उपचार कुछ समय तक मुंबई के अस्पताल में भी हुआ था। स्वास्थ्य कुछ बेहतर होने के बाद उनको दिल्ली स्थित उनके राजधानी वाले फ्लैट पर शिफ्ट कर दिया गया था। इस दौरान वे डॉ के परामर्श पर समय समय पर ट्रीटमेंट के लिए चिकित्सालय जाते रहते थे। एक सप्ताह पूर्व उनकी तबियत अधिक खराब हुई तो उनको अस्पताल में एडमिट कर दिया गया था। जहां उनका आईसीयू में रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर इलाज कर रहे थे। भर्ती होने के बाद उनकी तबीयत में विशेष सुधार नहीं हुआ और वे दिन ब दिन कमज़ोर होते गए। बेहतरीन डॉक्टर शानदार सुविधाओं वाले अस्पताल और हर संभव दवा के द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने पर भी उनको बचाया नहीं जा सका और उन्होंने सोमवार की रात 9.10 बजे अंतिम सांस ली। 
उल्लेखनीय है कि राकेश जी का व्यवहार परिवार कंपनी स्टाफ और समाज के सभी वर्गों के साथ बहुत उदार स्नेहशील और सहयोग करने वाला था। उनको सभी वर्गों के लोग पसंद करते थे। वे आर्ट ऑफ लिविंग, रामलीला कमेटी लायंस क्लब माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान सहित अनेक सामाजिक साहित्यिक और धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़े थे। नगर जनपद और देश के कोने कोने से जुड़े उनके मित्रो संबंधियों और सहयोगियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके साथ तीन दशक से अधिक सीकेआई में सर्विस करते हुए उनको हमने एक संरक्षक के रूप में महसूस किया। हमारी ओर से भी उनको विनम्र श्रद्धांजलि। 

Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?

परिसीमन बिल गिरा

*जिस विपक्ष के आप दुश्मन हैं, वह सरकार को सपोर्ट क्यों करेगा?* 
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*        
0 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार का 131 वां संविधान संशोधन विधेयक पहला बिल है। जो केंद्र सरकार के तमाम दांव पेंच विपक्ष को डराने धमकाने और महिला वोटों के लिये ललचाने के बादवजूद तीन चैथाई बहुमत यानी 528 मंे से 352 की जगह 298 मिलने से हासिल कर पाने से औंधे मुंह गिर गया। मोदी सरकार पहले ही जानती थी कि वह सीएए या अन्य धन विधेयक बताकर विवादित बिलों की तरह राज्यसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भी जैसे साम दाम दंड भेद से सामान्य बहुमत का जुगाड़ करके अपने बिल पास कराने में सफल रही है। इस बार ठीक वैसा ही होना मुश्किल नहीं नामुमकिन है। लेकिन उसको इतना भरोसा ज़रूर था कि अगर यह बिल किसी तरह से पास हो गया तो वह महिलाओं को यह कहकर खुश करेगी कि उसने महिलाओं का आरक्षण लागू करने के लिये आवश्यक संसदीय कार्यवाही अंजाम तक पहंुचा दी और अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो वह राजनीतिक लाभ लेने के लिये विपक्ष के खिलाफ विशेष तौर पर बंगाल और तमिलनाडू में यह प्रचार जमकर करेगी कि विपक्ष महिला विरोधी है। लेकिन विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जिस राजनीतिक दूरअंदेशी और सूझबूझ से मोदी सरकार की इस चाल को नाकाम करते हुए महिला आरक्षण का समर्थन और संविधान संशोधन विधेयक गिराकर चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर कराने और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कराने का बीजेपी को एक तरफा लाभ पहंुचाने वाला दांव नाकाम किया उससे अब मोदी सरकार काफी सदमें में नज़र आ रही है। हालांकि यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि मोदी सरकार इन हालात में 2029 के आम चुनाव में वर्तमान 543 संसदीय सीटों पर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू कर पायेगी या नहीं? लेकिन 2023 में 106 वां संविधान संशोधन पास कराने के बाद मोदी सरकार ने जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया था वह 16 अपै्रल की अधिसूचना जारी होने से लागू हो चुका है। इसके साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या 2029 के आम चुनाव से पहले जनगणना और नया परिसीमन पूरा हो पायेगा? क्योंकि अब तक का कानून यह है कि हर नई जनगणना के बाद संसदीय और राज्यों की विधानसभाओं का नया परिसीमन होना चाहिये। विपक्ष यह भी जानता है कि जिस तरह से बीजेपी सरकार के रहते अब तक असम और कश्मीर में नया परिसीमन इस तरह से किया गया है कि इससे बीजेपी को राजनीतिक लाभ और विपक्ष को नुकसान हुआ है।
        विपक्ष को पूरी आशंका है और सही भी है कि ऐसा ही लोकसभा का नया परिसीमन करने के दौरान किया जायेगा। यह नाराज़गी और डर खासतौर पर दक्षिण के राज्यों तमिलनाडू केरल कर्नाटक और आंध्रा में अधिक देखा जा रहा है। लेकिन आंध्रा में चन्दर बाबू नायडू का गठबंधन एनडीए यानी बीजेपी के साथ होने से वहां इस मुद्दे पर सत्ताधारी राजनेताओं में तो अधिक हलचल नहीं है लेकिन जनता में अन्य दक्षिणी राज्यों की तहर ही बेचैनी और सीटें व राज्य का कोटा घटने की आशंका मौजूद है। हो सकता है नायडू को इसका राजनीतिक नुकसान भी पहुंचे। 1951 में तत्कालीन 489 संसदीय सीटों को बढ़ाकर 494 और 1961 के बाद 522 और अंतिम बार 1971 में 543 नई जनगणना और परिसीमन के बाद किया गया था। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दक्षिण के जो राज्य देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कर परिवार नियोजन कर रहे हैं। अगर उत्तर भारत की तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से सीटों का परिसीमन कर उनके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ती है तो इससे एक नया विरोधाभास खड़ा होगा। उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बढ़ता देख तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42 वां संशोधन कर नये परिसीमन को 2001 तक के लिये रोक दिया था। इसका मकसद देश में परिवार नियोजन को बढ़ावा देना था। सन 2000 में 91 वां संविधान संशोधन कर एनडीए की वाजपेयी सरकार ने इस रोक को आगामी 25 साल और बढ़ाकर नये परिसीमन की मयाद 2026 कर दी। नये परिसीमन पर इस 50 साल की रोक का मकसद जनसंख्या का टीएफआर 2.1 यानि जन्म और मृत्यु दर समानता पर लाकर स्थिर करना था। संविधान सभा की सदस्य रेणुका राय का कहना था कि भविष्य में जब सबको समान अवसर मिलेंगे तो योग्य महिलाएं जनरल सीटों पर ही अपनी भागीदारी खुद बढ़ाती जायेंगी। बदकिस्मती से ऐसा व्यवहारिक रूप से कई दशक तक भी हो नहीं सका। जहां तक इंडिया गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों का मोदी सरकार के संविधान संशोधन बिल के विरोध का सवाल है। यह राजनीतिक गुणा भाग से तो स्वाभाविक ही है। मोदी सरकार बनने के बाद से जितना विपक्ष का दानवीकरण किया गया है। इतना देश स्वतंत्र होने के बाद से किसी सरकार ने नहीं किया। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब पीएम मोदी उनकी सरकार में शामिल मंत्री उनके बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें पुलिस प्रशासन अन्य जांच एजंसियां और उनका गोदी मीडिया ईडी सीबीआई इनकम टैक्स जीएसटी विभाग विभिन्न आयोग ट्रिब्यूनल यहां तक कि कुछ कोर्ट तक विपक्ष और उसके नेताओं को निशाने पर नहीं लेते हों। यहां तक कि कांग्रेस और सेकुलर दलों को तो देशद्रोही राष्ट्रविरोधी और विदेशी टूलकिट का एजेंट तक बताया जाता है।
         विपक्षी नेताओं पर पूरे देश में जगह जगह ऐसी बातों बयानों और भाषणों के लिये भी एफआईआर दर्ज करा दी जाती हैं जिनका उनसे कोई मतलब वास्ता भी नहीं होता। उनको सोशल मीडिया पर अकसर ट्राॅल किया जाता है। कुछ अंधभक्त तो उनसे नफरत और विरोध में इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनको और उनके परिवार महिलाओं और मासूम बच्चों तक पर बेशर्मी से कीचड़ उछालते हैं। उनको संसद में बोलने का अवसर नहीं दिया जाता, बोलने के दौरान उनका माइक बंद कर दिया जाता है, उनको जबरन सदन से बाहर निकाल दिया जाता है, उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जाता है, यहां तक कि नेता विपक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता छीनकर उनका घर रातो रात खाली करा लिया जाता है। ऐसा ही कई अन्य विपक्षी नेताओं महुआ मोइत्रा आादि के साथ समय समय पर अन्याय और पक्षपात किया जाता है। इतना ही नहीं विपक्ष की महाराष्ट्र की तरह कई राज्यों में सरकारें गिराकर बीजेपी अपने या एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में जबरन अवैध और असंवैधानिक रूप से सरकार बना लेती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि विपक्ष को सरकार विश्वास में कैसे ले सकती है और 131 वां संविधान संशोधन कैसे पास करा पाती? मोदी सरकार और विपक्ष के बीच न केवल 36 का आंकड़ा है बल्कि भारी अविश्वास और तनाव टकराव हर समय बना रहता है जिसके लिये खुद मोदी सरकार की मनमानी तानाशाह और फासिस्ट तौर तरीकों वाली कार्यशैली उत्तरदायी है। इस लिये नया परिसीमन और संसद की सीटें बढ़ाने वाला बिल बिना विपक्ष के सहयोग के न तो पास होना था और न ही हुआ और भविष्य में इसकी संभावना तब तक नहीं होगी जब तक मोदी सरकार बीजेपी संघ उसके प्रकोष्ठ और उसके वरिष्ठ नेता विपक्ष को टारगेट करना बदनाम करना और पक्षपात पूर्ण एसआईआर के द्वारा चुनाव में लेवल प्लेंयिंग फील्ड खत्म कर वोट चोरी कर चुनाव जीतने का विरोधी दलों का आरोप गलत साबित कर उनसे सौहार्दपूर्ण लोकतांत्रिक समानता और मैत्रीपूर्ण सम्बंध स्थापित कर सही मायने में संवैधानिक परंपराओं निष्पक्षता और सम्मान का परिचय नहीं देती है। एक शेर याद आ रहा है-
 *चाकू की पसलियों से सिफ़ारिश तो देखिये,* 
 *वे चाहते हैं काटने में उनको मदद करे।*

हुमायूं कबीर की पोल खुली

*मुसलमानों को नई पार्टी नहीं नई सोच की ज़रूरत है !*
       _इक़बाल हिंदुस्तानी 
0बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का सियासी शिगूफा छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का बीजेपी से करोड़ों रूपये लेकर चुनाव लड़ने का स्टिंग आॅप्रेशन कितना सच है यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस स्टिंग से इस आरोप को बल मिला है कि हुमायूं अपने निजी लाभ के लिये बीजेपी से मिले हुए हैं। ऐसे ही आॅल इंडिया मुस्लिम इत्तेहाद ए मुस्लिमीन के सदर असदउद्दीन ओवैसी पर जानकारों को काफी समय से शक है कि सदर साहब अपने 15000 करोड़ के कारोबार को बिना किसी जांच छापे और दबाव के सुरक्षित चलाने के लिये अपनी पार्टी को बीजेपी के इशारे पर मुसलमानों के वोट बांटने के लिये एक मोहरे के तौर पर सियासत में इस्तेमाल हो रहे हैं। इतना ही नहीं असम में पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद से जुड़े रहे मौलाना बदरूद्दीन अजमल पर भी एआईयूडीएफ बनाकर मुस्लिम वोट को कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी से अलग कर राज्य में बीजेपी की सरकार बार बार बनने का रास्ता साफ करने का आरोप लगता रहा है।     
      हुमायूं कबीर के बारे में यह स्टिंग आॅप्रेशन सामने आया है कि उन्होंने मुसलमानों को बंगाल में टीएमसी से अलग कर बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने के लिये एक हज़ार करोड़ का सौदा किया है। उसके बाद इस स्टिंग के असली नकली होने को लेकर दोनों पक्षों में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। हालांकि इस स्टिंग की निष्पक्ष जांच होने तक दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सच क्या है लेकिन सियासत में कभी कभी केवल आरोपों चर्चाओं और अफवाहों से ही राजनीतिक नफा नुकसान वक्ती तौर पर जो होना है वह तो हो ही जाता है। इस स्टिंग के बाद ममता बनर्जी के इस आरोप को पर लग गये हैं कि हुमायूं बीजेपी का ही आदमी है। इसके बाद ओवैसी ने हुमायूं की जनता उन्नयन पार्टी से अपना गठबंधन तत्काल तोड़ लिया है। इससे जउपा को भी अब पहले की तरह मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात पहले दिन से ही शक के दायरे में थी कि जिस पांच सौ साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को संघ और बीजेपी कई दशक से नेस्तो नाबूद करने पर तुले थे, और आखिरकार 1992 में उसको तोड़ भी दिया गया फिर कोर्ट का आस्था के आधार पर फैसला आया और उस जगह राम मंदिर बनाया गया। ऐसे में हुमायूं के बाबरी के नाम के पर बंगाल में कारसेवा से फिर से एक मस्जिद का बनाना और उस पर संघ परिवार का चुप रहना यहां तक कि कोर्ट का उस पर स्टे न देना समझ से बाहर था। अब यह राज़ काफी हद तक खुल गया है। ऐसे ही जिस तरह की संदिग्ध बांटने वाली और सेकुलर दलों से मुसलमानों को अलग करने वाली घटिया सियासत ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कर रही है। जिसमें वह कई राज्यों में कुछ हद तक सफल भी होती नज़र आ रही है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि ओवैसी मुसलमानों की दुश्मन नंबर वन मानी जाने वाली बीजेपी की जगह सेकुलर दलों का ही विरोध क्यों करते हैं? ओवैसी को गोदी मीडिया में विपक्ष केेेे नेता राहुल गांधी से कई गुना अधिक कवरेज क्यों दी जाती है?
          साथ ही सारे विपक्षी दलों उनके नेताओं यहां तक कि उनको चंदा देने वाले व्यापारी व्यवसायी और काॅरपोरेट तक पर बार बार परेशान करने की नीयत से सीबीआई इडी और इनकम टैक्स सहित तमाम जांच एजंसियों के छापे मारने वाली बीजेपी सरकार ओवैसी पर कभी कोई छापा जांच या मुकदमा दायर क्यों नहीं करती? ऐसे और भी कई गंभीर आरोप और संदेह ओवैसी पर किये जाते रहे हैं जिन पर आज तक वह कोई ठोस सफाई जवाब या वजह नहीं बता सके हैं। जहां तक असम के मौलाना अजमल का सवाल है। उनके ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करते ही मौलाना मदनी की जमीयत ए उलेमा ने कड़ा विरोध जताते हुए उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मौलाना अजमल का भी बहुत बड़ा इत्र का कारोबार है लेकिन इस इत्र से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने की बदबू आती रही है। पिछली बार चुनाव में असम में मौलाना अजमल की सांप्रदायिक पार्टी से कांग्रेस को गठबंधन का भारी सियासी नुकसान हुआ था वर्ना राजनीतिक जानकारों का कहना था कि माहौल ऐसा था कि कांगे्रस पांच साल पहले ही असम में सरकार बना सकती थी। इस बार कांग्रेस के सत्ता में वापसी के अच्छे आसार इस लिये भी माने जा रहे हैंे कि उसने मौलाना की एआईयूडीएफ से खुद को अलग कर लिया है। वैसे तो यह साफ नहीं कि मौलाना का भी अलग पार्टी बनाकर मुसलमानों के वोट बांटने से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाना या अपने अरबों के इत्र कारोबार को आराम से बिना सरकारी दखल के चलाना सोची समझी योजना का हिस्सा है या यह महज़ इल्ज़ाम ही है लेकिन इतना तो साफ है कि मौलाना हों ओवैसी हों या हुमायूं इनके जैसे स्वार्थी संदिग्ध और बीजेपी की बी टीम माने जाने वाले सेकुलर दलों से अलग चलकर मुसलमानों के वोट सेकुलर दलों से काटने को चुनाव लड़ना यह चीख चीख कर बताता है कि कुछ तो पर्दे के पीछे चल ही रहा है। अधिकांश मुसलमान इस तरह की चाल साज़िश और मिलीभगत को समझ रहा है तो चंद कट्टर तंगनज़र और फिर्कापरस्त मुसलमान इनके झांसे में आकर अपना वोट इनको देकर दो चार या पांच दस हज़ार के अंतर से बीजेपी या उसके घटकों को जिताने का औज़ार भी बनने लगा है।
             यह सही है कि हर धर्म जाति या क्षेत्र के लोगों में आपको ओवैसी हुमायूं और मौलाना अजमल जैसे नासमझ नादान या जानबूझकर मीर जाफर बनने वाले चालाक मक्कार और धूर्त नेता भी मिल ही जायेंगे लेकिन आज का सियासी दौर यह कहता है कि मुसलमानों को किसी मुस्लिम नेता या दल के बीजेपी की तरह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता जातिवाद झूठ नफरत और हिंसा की घटिया राजनीति के झांसे में न आकर सेकुलर सर्वहारा और गरीब हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहिये। जिसके लिये उनको नई मुस्लिम पार्टी नये आग उगलने वाले भाषण देने वाले नेता या बिके हुए सेकुलर दल विरोधी संकीर्ण नेता की नहीं बल्कि नई सोच की ज़रूरत है। बाकी उनकी जायज़ शिकायतंे मांगे और अधिकार बीजेपी जैसी पार्टी का अराजक राज का दौर खत्म होने या उसके सत्ता से धीरे धीरे बाहर होने के बाद ही मिल सकता है। एक पत्रकार के तौर पर हमने 40 साल में देखा है कि मुसलमानों का जितना पैसा मस्जिद मदरसा तब्लीगी जमात हज कुरबानी मुशायरा महंगी शादी दहेज़ बाइक मोबाइल कवाब पार्टी कव्वाली उर्स वगैरा में खर्च होता है। उतना स्कूल काॅलेज यूनिवर्सिटी धर्मार्थ अस्पताल धर्मशाला आंखों के आॅपे्रशन का कैम्प खेलकूद सांस्कृतिक प्रोग्राम विकलांगों की मदद विधवा व अनाथ बच्चो की देखभाल गरीब मगर काबिल बच्चो की कोचिंग साम्प्रदायिक एकता व भाईचारे के लिये मिलन प्रोग्राम या चैरिटी के कामों में खर्च नहीं होता। आज वक़्त की मांग है कि मुसलमान डबल सी यानी कैरेक्टर व कंडक्ट मतलब किरदार व अख़लाक़ और डबल ई यानी एजुकेशन व इकाॅनोमी मतलब तालीम व पैसा कमाने पर कट्टरपंथी दकियानूसरी और अंधविश्वासी सोच छोड़कर पूरा ज़ोर दें। उनको तालीम में भी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा पर तवज्जो देनी होगी। उनको परिवार नियोजन भी अपनाना होगा। उनको बैंक और बीमा के क्षेत्र में जो सुविधायें दूसरे समाज के लोग ले रहे हैं। उनका कथित वर्जित सहारा भी कट्टरपंथी लोगों की दकियानूसी बातें अनसुनी करके लेना होगा। आज दरअसल पैसा और शिक्षा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  
*0 लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के संपादक हैं।*

ईरान ने अमेरिका का घमंड तोड़ा

*ईरान ने अमेरिका के सुपरपाॅवर होने का भरम तोड़ दिया है!*
0 ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं।
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*    
          दो चार दिन में खत्म होने का दावा कर अमेरिका इज़राइल द्वारा शुरू किया गया ईरान युध्द एक महीने से अधिक होने के बावजूद चल रहा है। ऐसा लगता है कि ईरान ने आखिरी सैनिक और आखिरी गोली खत्म होने तक सीज़फायर नहीं करने का दुस्साहसी फैसला कर रखा है। यानी हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेेंगे वाली कहावत लागू हो रही है। ट्रंप एक तो पहले ही स्थिर दिमाग वाले इंसान नहीं हैं। दूसरे उनमें घमंड और बड़बोलापन भरा हुआ है जिसकी वजह से वे ईरान पर हमला करके फंस चुके हैं। अब उनको समझ नहीं आ रहा है कि जंग बीच मेें रोककर भागे तो दुनिया में अमेरिका की नाक कट जायेगी। अगर वे जंग जारी रखते हैं तो भी उनको जल्दी ही जीत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है। ऐेसे में वे कभी यह झूठा दावा करते हैं कि उनका ईरान पर हमले का मकसद पूरा हो गया है। जिसमें वे कहते हैं कि ईरान का परमाणु प्रोग्राम मिसाइल भंडार और सैनिक क्षमता सब कुछ पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। लेकिन जब ईरान लगातार इजराइल और खाड़ी के देशों में अमेरिकी बेस पर और तेज़ हमले करता है तो उनके दावों की पोल खुल जाती है। इसके बाद ट्रंप बौखलाकर नया झूठ बोलते हैं कि ईरान से सीज़फायर पर बात चल रही है। लेकिन ईरान बिना देर किये किसी भी तरह की समझौता वार्ता का खंडन कर देता है। इसके बाद ट्रंप एक बार फिर बयान जारी करते हैं कि हमारी ईरान से मित्र देशों के ज़रिये गोपनीय समझौता वार्ता जारी है। तब ईरान ऐसी बातचीत शुरू करने के लिये कुछ नामुमकिन शर्ते रख देता है। जिनमें जंग में हुआ नुकसान अमेरिका से दिलाने ईरान को भविष्य में किसी तरह का हमला नहीं करने की गारंटी देने और परमाणु प्रोग्राम जारी रखने की आज़ादी देने सहित उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग शामिल होती है। इसके साथ ही वह होरमुज़ जलडमरू मध्य पर लगातार अपना कब्जा जारी रख वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से टोल वसूली कर अपना पिछले कई दशक हुआ नुकसान पूरा करने की छूट चाहता है।
       ज़ाहिर बात है कि अमेरिका इन मांगों को पूरा नहीं करेगा। लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है कि ईरान इस समय चित भी मेरी पट भी मेरी वाला अमेरिका का ही खेल खेल रहा है और जिस अमेरिका का यह मनमानी का रिकाॅर्ड रहा है वह सांप छछूंदर की हालत में फंस चुका है। अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ नो किंग के बैनर तले 80 लाख लोग सड़क पर उतर आये हैं। इससे ट्रंप को आने वाले मिड टर्म चुनाव में हारने का डर भी सता रहा है। उधर नाटो अमेरिका का साथ नहीं दे रहा है। इसके साथ ही ईरान के हमलों से बचाने में नाकाम होने पर खाड़ी देश अमेरिका से बुरी तरह नाराज़ हो गये हैं। इसके साथ ही पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा होने और दाम बढ़ते जाने से अमेरिका के मित्र देशों का दबाव भी ट्रंप पर हर हाल में जल्दी से जल्दी जंग रोकने का बढ़ता जा रहा है। जहां तक ईरान के एटमी प्रोग्राम को खत्म करने का ट्रंप के दावे का सवाल है। ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं। इसके साथ ही ईरान ने मिसाइल मेट्रो यानी आॅटोमैटिक रेल सिस्टम पहाड़ के अंदर बना रखा है। यह सिस्टम असैंबली हाॅल गोला बारूद डिपो और पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित कम से कम दस निकास रास्तों को जोड़ती है।
         इस सिस्टम से ईरान लाॅंचर रेल पर पहले निकास द्वार की तरफ आता है, फिर सतह से उूपर जाता है। मिसाइल दागता है। इसके फौरन बार वापस अंडर ग्राउंड हो जाता है। इसके साथ एंट्री गेट को बख्तरबंद एयरलाॅक से सील कर दिया जाता है। यदि प्रवेश द्वार किसी हमले में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तो उनको अंदर से हाईपाॅवर वाले कंक्रीट से तत्काल मरम्मत कर सील कर दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया दुश्मन के जवाबी हमले में लगने वाले समय से आधे से भी कम में पूरी हो जाती है। यही वजह है कि अमेरिका इज़राइल हमवाई हमलों से केवल उन गिने चुने राॅकेट लांचरों को नष्ट कर पाये हैं जो ज़मीन की सतह पर मौजूद थे।यह भी बताया जाता है कि तकनीक के मामले में चीन रूस और उत्तरी कोरिया ईरान की भरपूर सहायता कर रहे हैं। जिससे वह दुश्मन के ठिकानों को खोजने निशाना लगाने और उसके आईरन डोम जैसे एंटी सैप्टर को चकमा देने में काफी सीमा तक सफल हो रहा है। ट्रंप ईरान की इस रण्नीति से बौखलाकर कभी उसको परमाणु हमले की धमकी देते हैं तो कभी उसके सबसे बड़े एनर्जी सेंटर खार्ग पर हमला कर कब्जा़ करने की बात करते हैं। ट्रंप अपनी सेना ईरान भेजने का इरादा भी जताते हैं लेकिन वियतनाम ईराक और अफगानिस्तान की कई दशक की नाकामी उनके कदम रोक देती है। कहने का मतलब यह है कि ट्रंप चारों तरफ से फंस चुके हैं। उनके अरबों मिलियन डाॅलर के खर्च पर ईरान कुछ हज़ार की हल्की मिसाइल और ड्रोन हमले करके उनको खूब चिढ़ा रहा है। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि अगर कोई देश कोई संगठन या कोई आदमी अपने सर पर कफन बांधकर अपने से कई गुना ताक़तवर से हिम्मत और बेहतर रण्नीति के साथ हारने और नुकसान उठाने का जोखिम उठाकर भिड़ जाये तो उसकी सर्वशक्तिमान या अजेय होने की पोल ऐसे ही खुल जाती है जैसे आज अमेरिका और इजराइल की खुल रही है। ईरान जंग जब भी खत्म होगी दुनिया पहले से काफी बदल जायेगी। शायर ने कहा है- मुश्किल कोई आन पड़े तो घबराने से क्या होगा, जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा।
 *नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Tuesday, 17 March 2026

लालच बुरी बला


*अधिक फायदे के लालच में फंसे तो पछताना पड़ेगा....*
कम पढ़े लिखे गरीब और सीधे सादे लोगों को कुछ महीने साल और अवधि के बाद कोई न कोई कंपनी फर्म और व्यक्ति धोखा देकर ठग लेता है, लेकिन इस लूट का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाता है। एक बार मशहूर ठग नटवर लाल से एक पत्रकार ने सवाल किया कि आप लोगों को बार बार कैसे ठगने में कामयाब हो जाते हैं तो नटवर का जवाब था कि हम नहीं ठगते इंसान का लालच उसको नुकसान उठाने को मजबूर करता है। नटवर का दावा था दुनिया में जब तक लालच है, उसका ठगी का धंधा पुलिस नहीं कोई भी नहीं रोक सकता। पिछले दिनों नजीबाबाद में हर्षवाड़ा बाईपास पर स्थित कंपनी ड्रीम सन शाइन डिजिटल लोगों का करोड़ों रुपया ठगकर फ़रार हो चुकी है। यह न तो पहली बार हुआ और न आखिरी बार। इससे पहले अमरीन एप्लाइंसेज़ नाम की कंपनी भी ऐसे ही लोगों को ठग कर भाग चुकी है। इसकी वजह यह है कि गरीब अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग या कुछ उच्च शिक्षित भी जागरूकता के अभाव में लालच के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। उनका दिमाग़ यह काम नहीं करता कि दुनिया में ऐसा कौन सा बिज़नेस हो सकता है जिसमें घाटा न होने की गारंटी हो? साथ ही हर महीने 5 से 10% प्रॉफिट कैसे और कहां से मिल सकता है? ड्रीम डिजिटल ने भी लोगों को एक ही रात में लखपति बनने का सपना दिखाया करोड़ों का चूना लगाया और रातों रात फरार हो गई। हमने जब इस बारे में तफसील से जानकारी की तो पता लगा पहले यह कंपनी ढाई प्रतिशत ब्याज मासिक दे रही थी, फिर पांच फ़ीसदी किया और अब रमज़ान की बरकत बताकर नौ परसेंट रिटर्न कर दिया था। कुछ लोगों को मोटा कमीशन देकर लोगों को इनके जाल में फंसाने को लगा रखा था। अनेक लोगों ने जो प्रॉफिट इस कंपनी से कमाया था, वो भी और अधिक फ़ायदा कमाने को इसी में रि इनवेस्ट करते गए। कुछ ने अपनी ज़मीन ज़ेवर और बैंक से एक प्रतिशत मासिक ब्याज पर क़र्ज़ लेकर भी बड़ी रकम लगा रखी थी। कंपनी का दावा था कि उनका मुंबई में मिनरल वाटर का बड़ा कारोबार है, जिसमें रॉ मैटीरियल यानि पानी की कोई कीमत नहीं अदा करनी होती, बस उसको पैक करके मार्केट में बेचने से मुनाफा 25/50 परसेंट तक है। जिसमें से वो खर्च निकालकर 5 से 10 प्रतिशत अपने निवेशकों को दे रही है, जबकि यह कोरा झूठ था। इस लेखक ने पता किया कंपनी का मुंबई नहीं देश में कहीं भी कोई भी कारोबार नहीं था, जो पता दिया था वो भी फर्जी था। जो नम्बर दिए थे वो कभी बोलते ही नहीं थे। साथ ही कंपनी का आरबीआई में कोई रजिस्ट्रेशन नहीं था। जानकारी करने पर इस लेखक ने अपने कई मित्रों और रिश्तेदारों को इस कंपनी से दूर रहने की सलाह दी थी, जिससे उनका भारी नुकसान बच गया और वे इस लेखक को आज शुक्रिया बोल रहे हैं। भविष्य में भी हमारा सभी को मशवरा है ऐसे लालच धोखे और फर्जी कंपनी के जाल में फंसकर निवेश नहीं करें नहीं तो जीवन भर पछताना पड़ेगा। यह भी याद रखें एक बार आपको आर्थिक झटका लगा तो फिर संभलना मुश्किल हो जाता है। 
*नोट_लेखक वरिष्ठ पत्रकार लेखक और ब्लॉगर हैं।*