Tuesday, 5 May 2026

मज़दूर असंतोष

*बीजेपी अब विपक्ष मुक्त भारत बनाने में सफल हो जायेगी?* 
      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      प्रतिष्ठा और चर्चा का सवाल बना बंगाल का चुनाव विपक्ष की सबसे मज़बूत और लड़ाकू समझने जाने वाली ममता बनर्जी से बीजेपी ने जीत लिया है। पांच राज्यों तमिलनाडु केरल बंगाल असम और पुडुचेरी में हुए चुनाव में लगभग वैसे ही नतीजे आये हैं जैसाकि जानकारों को आशंका या अनुमान थे। हालांकि तमिलनाडु को लेकर कम लोगों को अंदाज़ था कि वहां पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके पार्टी दोनों प्रमुख दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को इतना पीछे छोड़कर अपने बल पर बहुमत की ओर बढ़ सकती है। लेकिन असम और केरलम में आशा के अनुरूप ही परिणाम आ रहे हैं। सबसे अधिक चर्चा शंका और विवाद बंगाल के नतीजों को लेकर ही चल रहा था। यह स्पश्ट जनादेश नहीं कहा जा सकता। एग्ज़िट पोल अधिकांश बीजेपी की जीत पहले ही बता रहे थे लेकिन उनकी विश्वसनीयता इतनी खराब हो चुकी है कि कोई न्यूटल आदमी उनकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा था। जहां तक बीजेपी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दावों का सवाल है वे हर राज्य में चुनाव से पहले ही हर चरण में एकतरफा बहुमत चुनाव बाद बंपर जीत और शपथ लेने की बात इतने अधिक आत्मविश्वास से कहते हैं कि जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं। उनका ऐसा कहने के पीछे एक और मकसद रहता है कि विपक्ष के कार्यकर्ता नरवस हो जायें, बीजेपी के नेता और वर्कर जोश से भर जायें और साथ ही मतदाताओं का वह वर्ग जो अंतिम समय तक यह तय नहीं कर पाता कि उसको किस दल को वोट देना है वह इनकी अतिश्ययुक्त बातों में आकर बीजेपी को केवल इसलिये वोट दे दे कि जब यही पार्टी जीतने जा रही है तो वह अपना वोट क्यों खराब करे? अमित शाह जब जब यह कहते हैं कि बीजेपी अब देश पर 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को उनकी बात पर विश्वास नहीं होता है। लेकिन अब धीरे धीरे यह बात साफ होती जा रही है कि अमित शाह ऐसा दावा क्यों करते हैं? कुछ जानकार लोगों का कहना है कि बीजेपी जिस हिंदुत्व साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध की नफरती राजनीति करती है उससे एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं लेकिन बार बार काठ की हांडी नहीं चढ़ती। लेकिन गुजरात में सबसे लंबा तीन दशक का राज इस तरह की विवादित राजनीति से सफल बनाकर और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ के बाद अब असम में तीसरी बार जीतने जा रही बीजेपी ने उन लोगों के दावों को झुठला दिया है जो यह कहते हैं कि आर्थिक मुद्दे अंततः धर्म व नफरत की सियासत पर भारी पड़ेंगे।
        सच यह है कि आज बीजेपी के मतदाता समर्थक और सहयोगी दलों को उसकी महंगाई बेरोज़गारी पूंजीवादी गरीब विरोधी और अपराध बढ़ाने वाली राजनीति से भी कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। साथ ही बीजेपी ने अपने परंपरागत हिंदू वोटबैंक के कुछ मामलों में खफा होकर छिटकने के डर से केंचुआ यानी केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलीभगत करके एसआईआर के बहाने अपने विरोधियों के लाखों वोट थोक में काटकर और अपने समर्थकों के फर्जी वोट जुड़वाकर पहले से जीते राज्य कभी न गंवाने और विपक्ष शासित राज्यों को चुनाव में उससे छीनकर अब कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि रूस चीन और तुर्की की तरह विपक्ष मुक्त बनाने का अभियान शुरू कर दिया है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती भी नज़र आ रही है। केंचुआ का खुला एकतरफा झुकाव मीडिया का पक्षपात केंद्रीय जांच एजंसियों का विपक्ष और बीजेपी विरोधी सोच वालों के खिलाफ दुरूपयोग पुलिस प्रशासन और बुलडोजर का अन्यायपूर्ण गैर कानूनी दंडित करने वाला इस्तेमाल और कोर्ट का सरकार के साथ सुर में सुर मिलाना बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जो एजंसियां बार बार भारत के बारे में यह दावा कर रही हैं कि यहां लोकतंत्र संविधान और कानून का राज समाप्त होता जा रहा है, लगता है पूरी तरह गलत भी नहीं है। बंगाल का मामला एसआइआर को लेकर इसलिये शुरू से विवाद में रहा कि यहां केंचुआ ने बीजेपी को सियासी फायदा पहुंचाने के लिये एक नई कवायद लाॅजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर शुरू की जिससे 2002 की मतदाता सूची में नाम होने के बाद भी 27 लाख से अधिक लोगों को नाम में मामूली गल्तियां होने की वजह से वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया। इन विवादित नामों पर विचार करने के लिये दिखावे के लिये न्याधिकरण बनाये गये लेकिन उनमें समय पर सुनवाई नहीं हुयी। इन लोगों ने अपने कागजात भी जमा किये लेकिन नाम नहीं जुड़े। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष सही मानते हुए इतनी बड़ी संख्या को अगले चुनाव में वोट डालने की बात कहकर उनका संवैधानिक अधिकार छीनने में साथ दिया। इतना ही नहीं ढाई लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बल बंगाल में चुनाव की निगरानी करने को उतारे गये। वहां की पुलिस और प्रशासन को अविश्वसनीय मानकर एक तरह से चुनाव में किनारे कर दिया गया। जबकि इससे पहले वहां बड़े बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुनाव आयोग ने अपने यानी बीजेपी के हिसाब से इधर उधर करके सत्ताधारी टीएमसी को पूरी तरह असहाय और असंबध्द सा कर दिया। साथ ही पहली बार अभूतपूर्व तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंचुआ के कहने से अपनी पूरी टीम चुनाव कराने के लिये बंगाल में उतार दी।
     जब इन न्यायिक अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगे और सत्ताधारी ममता बनर्जी के समर्थकों ने इनके विवादित और पक्षपातपूर्ण निर्णयों के खिलाफ आंदोलन करना चाहा तो केंद्र सरकार ने इस तरह के विरोध को सख्ती से कुचलते हुए एनआईए को जांच सौंपकर कड़ा डरावना संदेश दिया कि ऐसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को आतंक और देशद्रोही घटना मानकर कुचल दिया जायेगा। इसके बाद जनता के किसी वर्ग की एसआईआर और तरह तरह के घुसपैठियों के बहाने से भारतीय नागरिकों के वोट काटने की इस मुहिम के विरोध की हिम्मत नहीं हुयी। यह बात भी सामने आई कि जिन 27 लाख लोगों के वोट काटे गये उनमें से अधिकांश वे मुसलमान हैं जिनको ममता का वोट बैंक माना जाता है। अगर 294 सीटों के हिसाब से देखा जाये तो इससे हर सीट पर लगभग 10 हज़ार वोट का अंतर आ जाता है। ऐसे में दस हज़ार के कम अंतर से जो 40 सीटें टीएमसी ने पिछले चुनाव में जीती थीं वे ज़ाहिर बात है कि इस बार हारने जा रही हैं। देश को यह समझने की ज़रूरत है कि बंगाल का चुनाव रूटीन चुनाव नहीं है जिसकी हार जीत से कोई अंतर नहीं पड़ता हो बल्कि हम तो एसआईआर शुरू होने के बाद से ही लगातार सोशल मीडिया पर यह आशंका जताते रहे हैं कि चुनाव बीजेपी के पक्ष में जा चुका है, अब केवल 4 मई को यह एलान होगा कि बीजेपी कितनी सीटों के अंतर से जीतती है, आज हमारा यह अनुमान सही साबित हो गया। यह देश के बचे हुए विपक्ष शासित उन राज्यों के लिये खतरे की घंटी है जो अभी तक एसआईआर और केंद्रीय जांच एजंसियों के एकतरफा पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल को केवल राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ झारखंड हरियाणा महाराष्ट्र और दिल्ली के लिये ही खतरा मानकर चल रहे थे। इसके साथ विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप उनको जीएसटी पीएम आवास योजना आयुष्मान कार्ड मनरेगा और अन्य केंद्रीय योजनाओं में पक्षपात करना हमारे संवैधानिक ढांचे पर सीधा हमला माना जाता रहा है लेकिन संविधान और नागरिक अधिकारों का कस्टोडियन माना जाना वाला सुप्रीम कोर्ट कदम कदम पर निराश करता आ रहा है।
 *नोट- लेखक आकाशवाणी और पत्रकारिता से चार दशक से अधिक से जुड़ हुए हैं।*

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