Wednesday, 13 May 2026

वामपन्थ कभी खत्म नहीं होगा...

*जब तक शोषण अन्याय रहेगा, तब तक वामपंथ भी रहेगा!* 
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
            देश में पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी थी। संयोग की बात है कि पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के चुनाव में देश के एकमात्र राज्य केरल में बची वामपंथी सरकार भी हार गयी। इसी के साथ ही वामपंथ के चिरपरिचित विरोधी साम्प्रदायिक और पूंजीवादियों ने झूठा राग अलापना शुरू कर दिया कि अब भारत से कम्युनिस्ट विचारधारा हमेशा के लिये खत्म हो गयी। यह उनका बचकाना नादान और मूर्खतापूर्ण दावा है कि भारत ही नहीं दुनिया से कभी कम्युनिस्ट विचारधारा खत्म हो सकती है। उनको पता होना चाहिये कि वामपंथी सोच का अस्तित्व और जन्म मज़दूर किसान गरीब कमजोर दलित और अल्पसंख्यकों के शोषण अत्याचार अन्याय के खिलाफ हुआ है। ज़ाहिर बात है कि जब तक दुनिया और हमारे देश में भी ये सब असमानतायें कमियां और बुराइयां मौजूद हैं तब तक उनके खिलाफ लड़ने की इंसान की इच्छा शक्ति लक्ष्य और सपना भी जीवित रहेगा। इसलिये वामपंथ का कभी अंत नहीं होगा। जब दशकों तक जनसंघ और बीजेपी सत्ता में नहीं आई तो क्या संघ की विचारधारा देश से खत्म हो गयी थी? नहीं क्योंकि विचारधारा का सत्ता से सीधा सरोकार नहीं होता है। अंग्रेजी में एक शब्द विलफुल थिंकिंग है। यह उन दावों के लिये इस्तेमाल होता है। जिनमें आदमी उस तरह की सोच का शिकार होता है जैसा वह देखना चाहता है। सामने सच और हकीकत कुछ और होते हुए भी वह उसको झुठलाता है। मिसाल के तौर पर हिंदुओं का एक वर्ग खुद को सर्वश्रेष्ठ और विश्वगुरू मानता है तो वह वास्तविकता इससे विपरीत होने पर भी इस कल्पना में ही जीता रहता है कि वह जो मानता है वही हो रहा है और वही होगा। ऐसे ही मुसलमानों का कट्टरपंथी तबका अपने इस्लाम को दुनिया का सबसे बेहतरीन मज़हब बताता है और यह भी दावा करता है कि दुनिया में एक दिन सब लोग मुसलमान होंगे और इस्लाम का राज होगा जबकि हकीकत से यह दावा बिल्कुल उल्टा है। ऐसा होने के दूर दूर तक आसार भी नहीं हैं। लेकिन वह हर घटना हर जंग और हर बात को इसी से जोड़कर खुशफहमी में जीता है। जब सोवियत संघ का पराभव हुआ उस समय भी नवउदारवादियों ने दुनिया से वामपंथ की अंतिम विदाई का समूह गान किया था, लेकिन रूस तो फिर से खड़ा हो गया। साथ ही वह दुनिया की पांच वीटो पाॅवर वाले परमाणु शक्ति वाले देशों के क्लब में भी बना हुआ है।
          इतना ही नहीं आज वामपंथी चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को अमेरिका से होड़ कर रहा है। वह तकनीक हथियार और नये नये क्षेत्रों में दुनिया की महाशक्तियों को चुनौती दे रहा है। अपने देश में निर्मित सस्ते माल से चीन ने दुनिया के तमाम देशों को पाट दिया है। दुनिया के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें चल रही हैं। यह ठीक है कि भारत में पश्चिमी बंगाल के बाद त्रिपुरा और अब केरल से कम्युनिस्ट सरकार की विदाई हो गयी है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि बंगाल में सबसे अधिक लंबे समय तक सरकार चलाने का रिकाॅर्ड भी कम्युनिस्टों के नाम 34 साल का है। केरल में बारी बारी से कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन वामपंथी सरकार को रिप्लेस करता रहा है। लेकिन आप तीनों राज्यों में देखें तो भूमि सुधार सार्वजनिक शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था विकेंद्रीयकरण साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिये सामाजिक चेतना सहित मज़दूरों को न्यूनतम सम्मानजनक वेतन गरीबों को जीवन यापन के लिये भूमि बेरोज़गारों को रोज़गार मिलने तक गुजारा भत्ता आदि जनहित की अनेक योजनायें वामपंथियों की देन रही है। केरल में एलडीएफ की सरकार की हार के बाद यह पहला मौका है कि वामराज के एक दौर पर फिलहाल विराम लगा है। लेकिन यह समझना भूल होगा कि अब कम्युनिस्ट सरकार की वापसी नहीं होगी। यह सच है कि 1977 के बाद देश में पहली बार किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है। यह याद रखना चाहिये कि 1957 में जब केरल में पहली बार नंबूदरीपाद के वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे तब वह भारत के ही किसी राज्य नहीं दुनिया में पहली चुनी हुयी कम्युनिस्ट सरकार के मुखिया बने थे। नंबूदरीपाद देश के पहले गैर कांग्रेसी सीएम भी थे। उनकी सरकार को तत्कालीन केंद्रीय कांग्रेसी नेहरू सरकार ने बिना किसी ठोस कारण के दो साल बाद ही बर्खास्त कर दिया था। लेकिन उन्होंने बार बार चुनाव जीतकर केरल को सबसे अधिक साक्षर और मानव मूल्य विकास में अग्रणी बना दिया था। बंगाल में वामपंथी मुख्यमंत्री ज्योति बसु भूमि सुधार पंचायती राज और राजनैतिक स्थिरता के साथ सबसे लंबे समय 23 साल तक राज करते रहे। उनको 1996 में देश में संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रधानमंत्री बनने का मौका भी मिल रहा था लेकिन कम्युनिस्टों की अपने बहुमत से ही पीएम बनने की ज़िद ने भारतीय राजनीति को नई दिशा देने का स्वर्णिम अवसर खो दिया जिसको बाद में वामपंथी इतिहास की हिमालय जैसी भूल माना गया। वर्ना आज देश की राजनीति का रूप रंग कुछ और ही होता।
         यह भी एक सच है कि बदलते हालात के हिसाब से कम्युनिस्ट नहीं बदले और भारत की जाति व्यवस्था को स्वीकार करने की बजाये वर्ग संघर्ष को ही प्राथमिकता देकर पंूजीवाद का लगातार विरोध करते रहे जिससे वामपंथी राज्यों में पूंजी निवेश घटता गया और रोज़गार घटने से प्रति व्यक्ति आय का मुकाबला अन्य राज्यों से करने में समस्या आने लगी। संसद में भी एक दौर था जब कम्युनिस्ट सांसदों की संख्या 60 से अधिक थी लेकिन अमेरिका से परमाणु संधि पर विवाद के बाद कम्युनिस्टों ने यूपीए की मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके साथ ही यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कभी मुख्य विपक्ष बनकर रहने वाले कम्युनिस्ट जाति और धर्म की राजनीति का वर्चस्व बढ़ने पर धीरे धीरे किनारे होते गये। भारत के लोगों में कम्युनिस्टों को लेकर उनके नास्तिक होने का भी सियासी नुकसान हुआ क्योेंकि भारतीय मूल रूप से धार्मिक और अंधविश्वासी होते हैं जबकि वामपंथी धर्म को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में लाने के खिलाफ रहे हैं। साथ ही यह भी रिकाॅर्ड है कि कम्युनिस्टों के राज में एक भी मंदिर मस्जिद नहीं तोड़ी गयी ना ही किसी धर्म के मानने वालों को उनके पूजा या नमाज़ जैसी किसी गतिविधि से रोका गया लेकिन चुनावी राजनीति महंगी और जाति व धर्म आधारित होते जाने से भी वामपंथी खुद को हाशिये पर जाता देखते रहे। सबसे बड़ी कमी उनकी यह रही कि उन्होंने समय रहते लोगों को प्रगतिशील विवेकशील तर्कशील और वैज्ञानिक सोच का नागरिक बनाने को कोई विशेष सांस्कृतिक सामाजिक और चेतना व जागरूकता का सघन अभियान नहीं चलाया जिससे संघ व बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता में आने और लोगों के दिमाग पर मीडिया के ज़रिये कब्ज़ा करने का मौका मिल गया। लेकिन यह भरोसा रखना चाहिये कि जब तक समाज में असमानता पक्षपात और अन्याय है तब तक वामपंथी सोच को दुनिया की कोई ताकत खत्म नहीं कर सकती, भारत भी इसका अपवाद नहीं है। शायर ने कहा है- *मेरे बच्चे तुम्हारे लफ्ज़ को रोटी समझते हैं, ज़रा तक़रीर कर दीजिये कि इनका पेट भर जाये।* 
 *नोट- लेखक चार दशक से अधिक से हिंदी पत्रकारिता और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हैं।*

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