-इक़बाल हिंदुस्तानी
*0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?