Thursday, 23 April 2026

स्मार्ट मीटर का विवाद

*यूपी सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं स्मार्ट मीटर?* 
    -इक़बाल हिंदुस्तानी
 *0 केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने जब से संसद में यह बयान दिया है कि बिजली के प्रिपेड स्मार्ट मीटर बिना उपभोक्ता की सहमति के लगाना गैर कानूनी है। तब से यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड स्मार्ट मीटर लगाने का न केवल विरोध तेज़ हो गया है बल्कि जो स्मार्ट मीटर प्रिपेड कर पहले से लगाये जा चुके हैं उनको भी हटाने या बदलने की मांग हो रही है। इधर स्मार्ट मीटर पर स्मार्ट सियासत करते हुए सपा के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बयान दे दिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की सरकार बनती है तो न केवल स्मार्ट मीटर हटाये जायेंगे बल्कि हर घर को 300 यूनिट बिजली निशुल्क भी दी जायेगी। ऐसे में यूपी की योगी सरकार के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है कि वह स्मार्ट मीटर लगाने पर अड़ी रहे या केवल उनको प्रिपेड करने पर रोक लगाकर देखो और प्रतीक्षा करो की नीति पर चलकर लोगों का विरोध कम होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दे? फिलहाल स्मार्ट मीटर तेज़ चलने और बिना सूचना दिये बकाया एक रूपया होने पर भी बिजली सप्लाई बंद करने तथा रिचार्ज करने पर भी घंटो वापस लाइट चालू न होने की बढ़ती शिकायतों को लेकर जांच के लिये यूपी सरकार ने एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति बनाई है, लेकिन परेशान उपभोक्ता इस समिति की रिपोर्ट आने और रिपोर्ट निष्पक्ष आने के साथ ही उस पर ठोस अमल को लेकर अभी से उंगलियां उठा रहे हैं।*
       यूपी के विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने जनता के पक्ष में आवाज़ उठाने की अपनी मुहिम को जारी रखते हुए नियामक आयोग में आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद से बिल खपत से कहीं अधिक आने की उपभोक्ताओं की शिकायतों में दम है। उनका कहना है कि जब स्मार्ट मीटर लगने के बाद पहले के मुकाबले 84 प्रतिशत अधिक बिल आ रहे हैं तो बिजली की खपत उस अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी है? इस मामले में पश्चिमांचल विद्युत निगम कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा है। उनका यह कहना कि शिकायत मिलने पर स्मार्ट मीटर के संैपल का परीक्षण सीपीआरआई में कराया जाना इस समस्या का समाधान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य के केवल पश्चिमांचल में ही 11,91,440 जो स्मार्ट मीटर लगाये गये हैं उनमें से बिना उपभोक्ताओं की अनुमति के 9,56,744 प्रिपेड में परिवर्तित किये जा चुके हैं। पिछले दिनों नियामक आयोग में 1,93,143 उपभोक्ताओं का प्रिपेड मीटर रिचार्ज होने के बाद भी लंबे समय तक बिजली चालू नहीं होने पर रेगुलेशन 2019 के अनुसार 50 रूपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवज़ा दिये जाने की मांग का मामला सामने आने पर यूपी सरकार के सामने बिजली कंपनियों को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो गयी है। पाॅवर कारपोरेशन प्रबंधन की रिपोर्ट के अनुसार 13 मार्च से 10 अप्रैल की बीच 40,27,307 स्मार्ट प्रिपेड मीटर निगेटिव बैलंेस होने पर बंद किये गये थे, जिनमें से 24,14,179 लोगों ने तत्काल रिचार्ज किया लेकिन केवल 22,21,036 उपभोक्ताओं के ही कनेक्शन निश्चित अवधि यानी दो घंटे के अंदर चालू किये जा सके थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर को बिना उपभोक्ता की सहमति के जबरदस्ती गैर कानूनी तौर पर यूपी सहित कई राज्यों में प्रिपेड क्यों किया जा रहा है? साथ ही रिचार्ज होने पर भी तयशुदा टाइम में सप्लाई चालू क्यों नहीं होती है?
       बिजली निगम और सप्लाई कंपनी का यह दावा भी हवा हवाई साबित हो रहा है कि प्रिपेड मीटर का बैलंेस निगेटिव होने या पहले से रिचार्ज की रकम 30,20,10 प्रतिशत और 0 होने पर एसएमएस एलर्ट भेजा जाता है, लकिन ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा है। इससे उपभोक्ताओं में नाराज़गी गुस्सा और विरोध बढ़ना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि स्मार्ट मीटर अपने आप में एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके लगने और इनको बिना कन्ज्यूमर की परमीशन के मनमाने तरीके से प्रिपेड किये जाने से अपके मीटर का नियंत्रण बिजली कंपनी के हाथ में चला गया है। पहले विभाग एनालाॅग यानी मेकैनिकल मीटर लगाता था। जिसमें घूमने वाली डिस्क होती थी। बिजली खपत के अनुसार कम या तेज़ यह चक्र घूमता रहता था। इसकी रीडिंग मीटर रीडर आकर नोट करता था। खुद उपभोक्ता भी उस रीडिंग और डिस्क की स्पीड चैक करता था। यानी बिजली खपत और उसके बिल में पारदर्शिता थी। लोग बिल आने पर मीटर की रीडिंग से मिलान कर सकते थे। गलती होने पर विभाग में जाकर सम्बंधित अधिकारी या अभियंता से शिकायत कर उसको जांच के बाद ठीक करा सकते थे। उसके बाद अचानक इलैक्ट्राॅनिक डिजिटल मीटर और उसके बाद फिर स्मार्ट मीटर का विचार सामने आया। विभाग का दावा था कि उपभोक्ता पुरानी तकनीक के कारण बिजली चोरी करते हैं, मीटर को बंद कर देते हैं, कई मीटर रीडर खुद लोगों से सेटिंग करके बिजली चोरी कराते है, बड़े अधिकारी बड़ी बिजली चोरी कराते हैं, इसलिये स्मार्ट मीटर लाया गया। लोगों का आरोप था कि कमीशन के चक्कर में निजी बिजली कंपनियों को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। लेकिन इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले लगे पुरानी तकनीक के मीटर से कुछ लोग बिजली चोरी आराम से कर लेते थे जिसकी कीमत बिजली कंपनी बिजली दर बढ़ाकर ईमानदारी से बिल अदा कर रहे लोगों से वसूलती रही हैं। डिजिटल मीटर में भी मीटर रीडर रीडिंग लेने आते थे। उन पर प्रोग्रामिंग और सेटिंग बदलकर उन मीटर्स को तेज़ स्लो और जाम करने का आरोप लगा तो स्मार्ट मीटर आ गया।
         लोगों का कहना था जितनी बिजली खपत पर एनालाॅग मीटर एक यूनिट रीडिंग दिखाता था उतनी ही खपत पर नया डिजिटल मीटर 1.25 या 1.50 यूनिट दिखाने लगा। इसके बाद हालांकि बिजली चोरी की शिकायतें काफी कम हो गयीं क्योंकि डिजिटल मीटर में छेड़छाड़ करना काफी महंगा सौदा था। लेकिन कमीशन के चक्कर में दो तीन साल बाद ही स्मार्ट मीटर लगने लगे। 2018 में स्मार्ट मीटर का टेंडर निकाला गया। इसमें जीनस पाॅवर इनफ्रास्ट्रक्चर्स, सिक्योर मीटर्स लिमिटेड, लाॅर्सन और ट्यूब्रो एवं एचपीएल इलैक्ट्रिक एंड पाॅवर कंपनी को स्मार्ट मीटर का ठेका दिया गया। उपभोक्ताओं को यह कहकर शांत करने का प्रयास किया गया कि उनको इस नये मीटर का कोई भुगतान नहीं करना है। यह सिम से चलने वाले इंटरनेट की तरह का स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी अपने कार्यालय में बैठकर ही कंट्रोल कर सकती है। इसीलिये स्मार्ट मीटर पर लोगों का विश्वास आज तक नहीं है। अब आप इस मीटर की रीडिंग बिलिंग और खपत सिस्टम अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करके भी नहीं देख सकते। आपको केवल अपना पोजिटिव नेगेटिव बैलंेस ही शो होगा। लोगों को लगता है कि बिजली कंपनी उनका खपत खर्च खुद ही समय समय पर बढ़ा देती हैं क्योंकि वे हर टाइम मीटर पर नज़र नहीं रख सकते। ऐसे में विद्युत उपभोक्ताओं के दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि कानून होने के बाद भी उनसे बिना पूछे जबरन स्मार्ट मीटर को प्रिपेड क्यों किया गया है? साथ ही इसके बिल को लेकर भी उनके मन में कई संशय भ्रम और आशंकाये मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यूपी सरकार नये कनेक्शन पर प्रिपेड मीटर और पुराने डिजिटल मीटइ हटाकर नये स्मार्ट मीटर लगाने की अनिवार्यता तो खत्म कर चुकी है लेकिन जिन लाखों लोगों के स्मार्ट मीटर उनकी बिना मर्जी के प्रिपेड किये जा चुके हैं उनको वापस पोस्ट पेड करती है या आने वाले चुनाव में जनता खासतौर पर किसानों की बढ़ती नाराज़गी का चुनाव में नुकसान उठाने का जोखिम लेने को तैयार है?

परिसीमन बिल गिरा

*जिस विपक्ष के आप दुश्मन हैं, वह सरकार को सपोर्ट क्यों करेगा?* 
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*        
0 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार का 131 वां संविधान संशोधन विधेयक पहला बिल है। जो केंद्र सरकार के तमाम दांव पेंच विपक्ष को डराने धमकाने और महिला वोटों के लिये ललचाने के बादवजूद तीन चैथाई बहुमत यानी 528 मंे से 352 की जगह 298 मिलने से हासिल कर पाने से औंधे मुंह गिर गया। मोदी सरकार पहले ही जानती थी कि वह सीएए या अन्य धन विधेयक बताकर विवादित बिलों की तरह राज्यसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भी जैसे साम दाम दंड भेद से सामान्य बहुमत का जुगाड़ करके अपने बिल पास कराने में सफल रही है। इस बार ठीक वैसा ही होना मुश्किल नहीं नामुमकिन है। लेकिन उसको इतना भरोसा ज़रूर था कि अगर यह बिल किसी तरह से पास हो गया तो वह महिलाओं को यह कहकर खुश करेगी कि उसने महिलाओं का आरक्षण लागू करने के लिये आवश्यक संसदीय कार्यवाही अंजाम तक पहंुचा दी और अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो वह राजनीतिक लाभ लेने के लिये विपक्ष के खिलाफ विशेष तौर पर बंगाल और तमिलनाडू में यह प्रचार जमकर करेगी कि विपक्ष महिला विरोधी है। लेकिन विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जिस राजनीतिक दूरअंदेशी और सूझबूझ से मोदी सरकार की इस चाल को नाकाम करते हुए महिला आरक्षण का समर्थन और संविधान संशोधन विधेयक गिराकर चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर कराने और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कराने का बीजेपी को एक तरफा लाभ पहंुचाने वाला दांव नाकाम किया उससे अब मोदी सरकार काफी सदमें में नज़र आ रही है। हालांकि यह अभी भविष्य के गर्भ में है कि मोदी सरकार इन हालात में 2029 के आम चुनाव में वर्तमान 543 संसदीय सीटों पर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू कर पायेगी या नहीं? लेकिन 2023 में 106 वां संविधान संशोधन पास कराने के बाद मोदी सरकार ने जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया था वह 16 अपै्रल की अधिसूचना जारी होने से लागू हो चुका है। इसके साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या 2029 के आम चुनाव से पहले जनगणना और नया परिसीमन पूरा हो पायेगा? क्योंकि अब तक का कानून यह है कि हर नई जनगणना के बाद संसदीय और राज्यों की विधानसभाओं का नया परिसीमन होना चाहिये। विपक्ष यह भी जानता है कि जिस तरह से बीजेपी सरकार के रहते अब तक असम और कश्मीर में नया परिसीमन इस तरह से किया गया है कि इससे बीजेपी को राजनीतिक लाभ और विपक्ष को नुकसान हुआ है।
        विपक्ष को पूरी आशंका है और सही भी है कि ऐसा ही लोकसभा का नया परिसीमन करने के दौरान किया जायेगा। यह नाराज़गी और डर खासतौर पर दक्षिण के राज्यों तमिलनाडू केरल कर्नाटक और आंध्रा में अधिक देखा जा रहा है। लेकिन आंध्रा में चन्दर बाबू नायडू का गठबंधन एनडीए यानी बीजेपी के साथ होने से वहां इस मुद्दे पर सत्ताधारी राजनेताओं में तो अधिक हलचल नहीं है लेकिन जनता में अन्य दक्षिणी राज्यों की तहर ही बेचैनी और सीटें व राज्य का कोटा घटने की आशंका मौजूद है। हो सकता है नायडू को इसका राजनीतिक नुकसान भी पहुंचे। 1951 में तत्कालीन 489 संसदीय सीटों को बढ़ाकर 494 और 1961 के बाद 522 और अंतिम बार 1971 में 543 नई जनगणना और परिसीमन के बाद किया गया था। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दक्षिण के जो राज्य देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कर परिवार नियोजन कर रहे हैं। अगर उत्तर भारत की तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से सीटों का परिसीमन कर उनके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ती है तो इससे एक नया विरोधाभास खड़ा होगा। उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बढ़ता देख तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42 वां संशोधन कर नये परिसीमन को 2001 तक के लिये रोक दिया था। इसका मकसद देश में परिवार नियोजन को बढ़ावा देना था। सन 2000 में 91 वां संविधान संशोधन कर एनडीए की वाजपेयी सरकार ने इस रोक को आगामी 25 साल और बढ़ाकर नये परिसीमन की मयाद 2026 कर दी। नये परिसीमन पर इस 50 साल की रोक का मकसद जनसंख्या का टीएफआर 2.1 यानि जन्म और मृत्यु दर समानता पर लाकर स्थिर करना था। संविधान सभा की सदस्य रेणुका राय का कहना था कि भविष्य में जब सबको समान अवसर मिलेंगे तो योग्य महिलाएं जनरल सीटों पर ही अपनी भागीदारी खुद बढ़ाती जायेंगी। बदकिस्मती से ऐसा व्यवहारिक रूप से कई दशक तक भी हो नहीं सका। जहां तक इंडिया गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों का मोदी सरकार के संविधान संशोधन बिल के विरोध का सवाल है। यह राजनीतिक गुणा भाग से तो स्वाभाविक ही है। मोदी सरकार बनने के बाद से जितना विपक्ष का दानवीकरण किया गया है। इतना देश स्वतंत्र होने के बाद से किसी सरकार ने नहीं किया। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब पीएम मोदी उनकी सरकार में शामिल मंत्री उनके बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें पुलिस प्रशासन अन्य जांच एजंसियां और उनका गोदी मीडिया ईडी सीबीआई इनकम टैक्स जीएसटी विभाग विभिन्न आयोग ट्रिब्यूनल यहां तक कि कुछ कोर्ट तक विपक्ष और उसके नेताओं को निशाने पर नहीं लेते हों। यहां तक कि कांग्रेस और सेकुलर दलों को तो देशद्रोही राष्ट्रविरोधी और विदेशी टूलकिट का एजेंट तक बताया जाता है।
         विपक्षी नेताओं पर पूरे देश में जगह जगह ऐसी बातों बयानों और भाषणों के लिये भी एफआईआर दर्ज करा दी जाती हैं जिनका उनसे कोई मतलब वास्ता भी नहीं होता। उनको सोशल मीडिया पर अकसर ट्राॅल किया जाता है। कुछ अंधभक्त तो उनसे नफरत और विरोध में इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनको और उनके परिवार महिलाओं और मासूम बच्चों तक पर बेशर्मी से कीचड़ उछालते हैं। उनको संसद में बोलने का अवसर नहीं दिया जाता, बोलने के दौरान उनका माइक बंद कर दिया जाता है, उनको जबरन सदन से बाहर निकाल दिया जाता है, उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जाता है, यहां तक कि नेता विपक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता छीनकर उनका घर रातो रात खाली करा लिया जाता है। ऐसा ही कई अन्य विपक्षी नेताओं महुआ मोइत्रा आादि के साथ समय समय पर अन्याय और पक्षपात किया जाता है। इतना ही नहीं विपक्ष की महाराष्ट्र की तरह कई राज्यों में सरकारें गिराकर बीजेपी अपने या एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में जबरन अवैध और असंवैधानिक रूप से सरकार बना लेती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि विपक्ष को सरकार विश्वास में कैसे ले सकती है और 131 वां संविधान संशोधन कैसे पास करा पाती? मोदी सरकार और विपक्ष के बीच न केवल 36 का आंकड़ा है बल्कि भारी अविश्वास और तनाव टकराव हर समय बना रहता है जिसके लिये खुद मोदी सरकार की मनमानी तानाशाह और फासिस्ट तौर तरीकों वाली कार्यशैली उत्तरदायी है। इस लिये नया परिसीमन और संसद की सीटें बढ़ाने वाला बिल बिना विपक्ष के सहयोग के न तो पास होना था और न ही हुआ और भविष्य में इसकी संभावना तब तक नहीं होगी जब तक मोदी सरकार बीजेपी संघ उसके प्रकोष्ठ और उसके वरिष्ठ नेता विपक्ष को टारगेट करना बदनाम करना और पक्षपात पूर्ण एसआईआर के द्वारा चुनाव में लेवल प्लेंयिंग फील्ड खत्म कर वोट चोरी कर चुनाव जीतने का विरोधी दलों का आरोप गलत साबित कर उनसे सौहार्दपूर्ण लोकतांत्रिक समानता और मैत्रीपूर्ण सम्बंध स्थापित कर सही मायने में संवैधानिक परंपराओं निष्पक्षता और सम्मान का परिचय नहीं देती है। एक शेर याद आ रहा है-
 *चाकू की पसलियों से सिफ़ारिश तो देखिये,* 
 *वे चाहते हैं काटने में उनको मदद करे।*

हुमायूं कबीर की पोल खुली

*मुसलमानों को नई पार्टी नहीं नई सोच की ज़रूरत है !*
       _इक़बाल हिंदुस्तानी 
0बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का सियासी शिगूफा छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का बीजेपी से करोड़ों रूपये लेकर चुनाव लड़ने का स्टिंग आॅप्रेशन कितना सच है यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस स्टिंग से इस आरोप को बल मिला है कि हुमायूं अपने निजी लाभ के लिये बीजेपी से मिले हुए हैं। ऐसे ही आॅल इंडिया मुस्लिम इत्तेहाद ए मुस्लिमीन के सदर असदउद्दीन ओवैसी पर जानकारों को काफी समय से शक है कि सदर साहब अपने 15000 करोड़ के कारोबार को बिना किसी जांच छापे और दबाव के सुरक्षित चलाने के लिये अपनी पार्टी को बीजेपी के इशारे पर मुसलमानों के वोट बांटने के लिये एक मोहरे के तौर पर सियासत में इस्तेमाल हो रहे हैं। इतना ही नहीं असम में पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद से जुड़े रहे मौलाना बदरूद्दीन अजमल पर भी एआईयूडीएफ बनाकर मुस्लिम वोट को कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी से अलग कर राज्य में बीजेपी की सरकार बार बार बनने का रास्ता साफ करने का आरोप लगता रहा है।     
      हुमायूं कबीर के बारे में यह स्टिंग आॅप्रेशन सामने आया है कि उन्होंने मुसलमानों को बंगाल में टीएमसी से अलग कर बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने के लिये एक हज़ार करोड़ का सौदा किया है। उसके बाद इस स्टिंग के असली नकली होने को लेकर दोनों पक्षों में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। हालांकि इस स्टिंग की निष्पक्ष जांच होने तक दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सच क्या है लेकिन सियासत में कभी कभी केवल आरोपों चर्चाओं और अफवाहों से ही राजनीतिक नफा नुकसान वक्ती तौर पर जो होना है वह तो हो ही जाता है। इस स्टिंग के बाद ममता बनर्जी के इस आरोप को पर लग गये हैं कि हुमायूं बीजेपी का ही आदमी है। इसके बाद ओवैसी ने हुमायूं की जनता उन्नयन पार्टी से अपना गठबंधन तत्काल तोड़ लिया है। इससे जउपा को भी अब पहले की तरह मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात पहले दिन से ही शक के दायरे में थी कि जिस पांच सौ साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को संघ और बीजेपी कई दशक से नेस्तो नाबूद करने पर तुले थे, और आखिरकार 1992 में उसको तोड़ भी दिया गया फिर कोर्ट का आस्था के आधार पर फैसला आया और उस जगह राम मंदिर बनाया गया। ऐसे में हुमायूं के बाबरी के नाम के पर बंगाल में कारसेवा से फिर से एक मस्जिद का बनाना और उस पर संघ परिवार का चुप रहना यहां तक कि कोर्ट का उस पर स्टे न देना समझ से बाहर था। अब यह राज़ काफी हद तक खुल गया है। ऐसे ही जिस तरह की संदिग्ध बांटने वाली और सेकुलर दलों से मुसलमानों को अलग करने वाली घटिया सियासत ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कर रही है। जिसमें वह कई राज्यों में कुछ हद तक सफल भी होती नज़र आ रही है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि ओवैसी मुसलमानों की दुश्मन नंबर वन मानी जाने वाली बीजेपी की जगह सेकुलर दलों का ही विरोध क्यों करते हैं? ओवैसी को गोदी मीडिया में विपक्ष केेेे नेता राहुल गांधी से कई गुना अधिक कवरेज क्यों दी जाती है?
          साथ ही सारे विपक्षी दलों उनके नेताओं यहां तक कि उनको चंदा देने वाले व्यापारी व्यवसायी और काॅरपोरेट तक पर बार बार परेशान करने की नीयत से सीबीआई इडी और इनकम टैक्स सहित तमाम जांच एजंसियों के छापे मारने वाली बीजेपी सरकार ओवैसी पर कभी कोई छापा जांच या मुकदमा दायर क्यों नहीं करती? ऐसे और भी कई गंभीर आरोप और संदेह ओवैसी पर किये जाते रहे हैं जिन पर आज तक वह कोई ठोस सफाई जवाब या वजह नहीं बता सके हैं। जहां तक असम के मौलाना अजमल का सवाल है। उनके ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करते ही मौलाना मदनी की जमीयत ए उलेमा ने कड़ा विरोध जताते हुए उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मौलाना अजमल का भी बहुत बड़ा इत्र का कारोबार है लेकिन इस इत्र से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने की बदबू आती रही है। पिछली बार चुनाव में असम में मौलाना अजमल की सांप्रदायिक पार्टी से कांग्रेस को गठबंधन का भारी सियासी नुकसान हुआ था वर्ना राजनीतिक जानकारों का कहना था कि माहौल ऐसा था कि कांगे्रस पांच साल पहले ही असम में सरकार बना सकती थी। इस बार कांग्रेस के सत्ता में वापसी के अच्छे आसार इस लिये भी माने जा रहे हैंे कि उसने मौलाना की एआईयूडीएफ से खुद को अलग कर लिया है। वैसे तो यह साफ नहीं कि मौलाना का भी अलग पार्टी बनाकर मुसलमानों के वोट बांटने से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाना या अपने अरबों के इत्र कारोबार को आराम से बिना सरकारी दखल के चलाना सोची समझी योजना का हिस्सा है या यह महज़ इल्ज़ाम ही है लेकिन इतना तो साफ है कि मौलाना हों ओवैसी हों या हुमायूं इनके जैसे स्वार्थी संदिग्ध और बीजेपी की बी टीम माने जाने वाले सेकुलर दलों से अलग चलकर मुसलमानों के वोट सेकुलर दलों से काटने को चुनाव लड़ना यह चीख चीख कर बताता है कि कुछ तो पर्दे के पीछे चल ही रहा है। अधिकांश मुसलमान इस तरह की चाल साज़िश और मिलीभगत को समझ रहा है तो चंद कट्टर तंगनज़र और फिर्कापरस्त मुसलमान इनके झांसे में आकर अपना वोट इनको देकर दो चार या पांच दस हज़ार के अंतर से बीजेपी या उसके घटकों को जिताने का औज़ार भी बनने लगा है।
             यह सही है कि हर धर्म जाति या क्षेत्र के लोगों में आपको ओवैसी हुमायूं और मौलाना अजमल जैसे नासमझ नादान या जानबूझकर मीर जाफर बनने वाले चालाक मक्कार और धूर्त नेता भी मिल ही जायेंगे लेकिन आज का सियासी दौर यह कहता है कि मुसलमानों को किसी मुस्लिम नेता या दल के बीजेपी की तरह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता जातिवाद झूठ नफरत और हिंसा की घटिया राजनीति के झांसे में न आकर सेकुलर सर्वहारा और गरीब हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहिये। जिसके लिये उनको नई मुस्लिम पार्टी नये आग उगलने वाले भाषण देने वाले नेता या बिके हुए सेकुलर दल विरोधी संकीर्ण नेता की नहीं बल्कि नई सोच की ज़रूरत है। बाकी उनकी जायज़ शिकायतंे मांगे और अधिकार बीजेपी जैसी पार्टी का अराजक राज का दौर खत्म होने या उसके सत्ता से धीरे धीरे बाहर होने के बाद ही मिल सकता है। एक पत्रकार के तौर पर हमने 40 साल में देखा है कि मुसलमानों का जितना पैसा मस्जिद मदरसा तब्लीगी जमात हज कुरबानी मुशायरा महंगी शादी दहेज़ बाइक मोबाइल कवाब पार्टी कव्वाली उर्स वगैरा में खर्च होता है। उतना स्कूल काॅलेज यूनिवर्सिटी धर्मार्थ अस्पताल धर्मशाला आंखों के आॅपे्रशन का कैम्प खेलकूद सांस्कृतिक प्रोग्राम विकलांगों की मदद विधवा व अनाथ बच्चो की देखभाल गरीब मगर काबिल बच्चो की कोचिंग साम्प्रदायिक एकता व भाईचारे के लिये मिलन प्रोग्राम या चैरिटी के कामों में खर्च नहीं होता। आज वक़्त की मांग है कि मुसलमान डबल सी यानी कैरेक्टर व कंडक्ट मतलब किरदार व अख़लाक़ और डबल ई यानी एजुकेशन व इकाॅनोमी मतलब तालीम व पैसा कमाने पर कट्टरपंथी दकियानूसरी और अंधविश्वासी सोच छोड़कर पूरा ज़ोर दें। उनको तालीम में भी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी और व्यवसायिक शिक्षा पर तवज्जो देनी होगी। उनको परिवार नियोजन भी अपनाना होगा। उनको बैंक और बीमा के क्षेत्र में जो सुविधायें दूसरे समाज के लोग ले रहे हैं। उनका कथित वर्जित सहारा भी कट्टरपंथी लोगों की दकियानूसी बातें अनसुनी करके लेना होगा। आज दरअसल पैसा और शिक्षा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  
*0 लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के संपादक हैं।*

ईरान ने अमेरिका का घमंड तोड़ा

*ईरान ने अमेरिका के सुपरपाॅवर होने का भरम तोड़ दिया है!*
0 ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं।
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*    
          दो चार दिन में खत्म होने का दावा कर अमेरिका इज़राइल द्वारा शुरू किया गया ईरान युध्द एक महीने से अधिक होने के बावजूद चल रहा है। ऐसा लगता है कि ईरान ने आखिरी सैनिक और आखिरी गोली खत्म होने तक सीज़फायर नहीं करने का दुस्साहसी फैसला कर रखा है। यानी हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेेंगे वाली कहावत लागू हो रही है। ट्रंप एक तो पहले ही स्थिर दिमाग वाले इंसान नहीं हैं। दूसरे उनमें घमंड और बड़बोलापन भरा हुआ है जिसकी वजह से वे ईरान पर हमला करके फंस चुके हैं। अब उनको समझ नहीं आ रहा है कि जंग बीच मेें रोककर भागे तो दुनिया में अमेरिका की नाक कट जायेगी। अगर वे जंग जारी रखते हैं तो भी उनको जल्दी ही जीत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है। ऐेसे में वे कभी यह झूठा दावा करते हैं कि उनका ईरान पर हमले का मकसद पूरा हो गया है। जिसमें वे कहते हैं कि ईरान का परमाणु प्रोग्राम मिसाइल भंडार और सैनिक क्षमता सब कुछ पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। लेकिन जब ईरान लगातार इजराइल और खाड़ी के देशों में अमेरिकी बेस पर और तेज़ हमले करता है तो उनके दावों की पोल खुल जाती है। इसके बाद ट्रंप बौखलाकर नया झूठ बोलते हैं कि ईरान से सीज़फायर पर बात चल रही है। लेकिन ईरान बिना देर किये किसी भी तरह की समझौता वार्ता का खंडन कर देता है। इसके बाद ट्रंप एक बार फिर बयान जारी करते हैं कि हमारी ईरान से मित्र देशों के ज़रिये गोपनीय समझौता वार्ता जारी है। तब ईरान ऐसी बातचीत शुरू करने के लिये कुछ नामुमकिन शर्ते रख देता है। जिनमें जंग में हुआ नुकसान अमेरिका से दिलाने ईरान को भविष्य में किसी तरह का हमला नहीं करने की गारंटी देने और परमाणु प्रोग्राम जारी रखने की आज़ादी देने सहित उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग शामिल होती है। इसके साथ ही वह होरमुज़ जलडमरू मध्य पर लगातार अपना कब्जा जारी रख वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से टोल वसूली कर अपना पिछले कई दशक हुआ नुकसान पूरा करने की छूट चाहता है।
       ज़ाहिर बात है कि अमेरिका इन मांगों को पूरा नहीं करेगा। लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है कि ईरान इस समय चित भी मेरी पट भी मेरी वाला अमेरिका का ही खेल खेल रहा है और जिस अमेरिका का यह मनमानी का रिकाॅर्ड रहा है वह सांप छछूंदर की हालत में फंस चुका है। अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ नो किंग के बैनर तले 80 लाख लोग सड़क पर उतर आये हैं। इससे ट्रंप को आने वाले मिड टर्म चुनाव में हारने का डर भी सता रहा है। उधर नाटो अमेरिका का साथ नहीं दे रहा है। इसके साथ ही ईरान के हमलों से बचाने में नाकाम होने पर खाड़ी देश अमेरिका से बुरी तरह नाराज़ हो गये हैं। इसके साथ ही पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा होने और दाम बढ़ते जाने से अमेरिका के मित्र देशों का दबाव भी ट्रंप पर हर हाल में जल्दी से जल्दी जंग रोकने का बढ़ता जा रहा है। जहां तक ईरान के एटमी प्रोग्राम को खत्म करने का ट्रंप के दावे का सवाल है। ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं। इसके साथ ही ईरान ने मिसाइल मेट्रो यानी आॅटोमैटिक रेल सिस्टम पहाड़ के अंदर बना रखा है। यह सिस्टम असैंबली हाॅल गोला बारूद डिपो और पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित कम से कम दस निकास रास्तों को जोड़ती है।
         इस सिस्टम से ईरान लाॅंचर रेल पर पहले निकास द्वार की तरफ आता है, फिर सतह से उूपर जाता है। मिसाइल दागता है। इसके फौरन बार वापस अंडर ग्राउंड हो जाता है। इसके साथ एंट्री गेट को बख्तरबंद एयरलाॅक से सील कर दिया जाता है। यदि प्रवेश द्वार किसी हमले में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तो उनको अंदर से हाईपाॅवर वाले कंक्रीट से तत्काल मरम्मत कर सील कर दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया दुश्मन के जवाबी हमले में लगने वाले समय से आधे से भी कम में पूरी हो जाती है। यही वजह है कि अमेरिका इज़राइल हमवाई हमलों से केवल उन गिने चुने राॅकेट लांचरों को नष्ट कर पाये हैं जो ज़मीन की सतह पर मौजूद थे।यह भी बताया जाता है कि तकनीक के मामले में चीन रूस और उत्तरी कोरिया ईरान की भरपूर सहायता कर रहे हैं। जिससे वह दुश्मन के ठिकानों को खोजने निशाना लगाने और उसके आईरन डोम जैसे एंटी सैप्टर को चकमा देने में काफी सीमा तक सफल हो रहा है। ट्रंप ईरान की इस रण्नीति से बौखलाकर कभी उसको परमाणु हमले की धमकी देते हैं तो कभी उसके सबसे बड़े एनर्जी सेंटर खार्ग पर हमला कर कब्जा़ करने की बात करते हैं। ट्रंप अपनी सेना ईरान भेजने का इरादा भी जताते हैं लेकिन वियतनाम ईराक और अफगानिस्तान की कई दशक की नाकामी उनके कदम रोक देती है। कहने का मतलब यह है कि ट्रंप चारों तरफ से फंस चुके हैं। उनके अरबों मिलियन डाॅलर के खर्च पर ईरान कुछ हज़ार की हल्की मिसाइल और ड्रोन हमले करके उनको खूब चिढ़ा रहा है। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि अगर कोई देश कोई संगठन या कोई आदमी अपने सर पर कफन बांधकर अपने से कई गुना ताक़तवर से हिम्मत और बेहतर रण्नीति के साथ हारने और नुकसान उठाने का जोखिम उठाकर भिड़ जाये तो उसकी सर्वशक्तिमान या अजेय होने की पोल ऐसे ही खुल जाती है जैसे आज अमेरिका और इजराइल की खुल रही है। ईरान जंग जब भी खत्म होगी दुनिया पहले से काफी बदल जायेगी। शायर ने कहा है- मुश्किल कोई आन पड़े तो घबराने से क्या होगा, जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा।
 *नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*