0 ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं।
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*
दो चार दिन में खत्म होने का दावा कर अमेरिका इज़राइल द्वारा शुरू किया गया ईरान युध्द एक महीने से अधिक होने के बावजूद चल रहा है। ऐसा लगता है कि ईरान ने आखिरी सैनिक और आखिरी गोली खत्म होने तक सीज़फायर नहीं करने का दुस्साहसी फैसला कर रखा है। यानी हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेेंगे वाली कहावत लागू हो रही है। ट्रंप एक तो पहले ही स्थिर दिमाग वाले इंसान नहीं हैं। दूसरे उनमें घमंड और बड़बोलापन भरा हुआ है जिसकी वजह से वे ईरान पर हमला करके फंस चुके हैं। अब उनको समझ नहीं आ रहा है कि जंग बीच मेें रोककर भागे तो दुनिया में अमेरिका की नाक कट जायेगी। अगर वे जंग जारी रखते हैं तो भी उनको जल्दी ही जीत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है। ऐेसे में वे कभी यह झूठा दावा करते हैं कि उनका ईरान पर हमले का मकसद पूरा हो गया है। जिसमें वे कहते हैं कि ईरान का परमाणु प्रोग्राम मिसाइल भंडार और सैनिक क्षमता सब कुछ पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। लेकिन जब ईरान लगातार इजराइल और खाड़ी के देशों में अमेरिकी बेस पर और तेज़ हमले करता है तो उनके दावों की पोल खुल जाती है। इसके बाद ट्रंप बौखलाकर नया झूठ बोलते हैं कि ईरान से सीज़फायर पर बात चल रही है। लेकिन ईरान बिना देर किये किसी भी तरह की समझौता वार्ता का खंडन कर देता है। इसके बाद ट्रंप एक बार फिर बयान जारी करते हैं कि हमारी ईरान से मित्र देशों के ज़रिये गोपनीय समझौता वार्ता जारी है। तब ईरान ऐसी बातचीत शुरू करने के लिये कुछ नामुमकिन शर्ते रख देता है। जिनमें जंग में हुआ नुकसान अमेरिका से दिलाने ईरान को भविष्य में किसी तरह का हमला नहीं करने की गारंटी देने और परमाणु प्रोग्राम जारी रखने की आज़ादी देने सहित उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग शामिल होती है। इसके साथ ही वह होरमुज़ जलडमरू मध्य पर लगातार अपना कब्जा जारी रख वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से टोल वसूली कर अपना पिछले कई दशक हुआ नुकसान पूरा करने की छूट चाहता है।
ज़ाहिर बात है कि अमेरिका इन मांगों को पूरा नहीं करेगा। लेकिन सवाल फिर वही आ जाता है कि ईरान इस समय चित भी मेरी पट भी मेरी वाला अमेरिका का ही खेल खेल रहा है और जिस अमेरिका का यह मनमानी का रिकाॅर्ड रहा है वह सांप छछूंदर की हालत में फंस चुका है। अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ नो किंग के बैनर तले 80 लाख लोग सड़क पर उतर आये हैं। इससे ट्रंप को आने वाले मिड टर्म चुनाव में हारने का डर भी सता रहा है। उधर नाटो अमेरिका का साथ नहीं दे रहा है। इसके साथ ही ईरान के हमलों से बचाने में नाकाम होने पर खाड़ी देश अमेरिका से बुरी तरह नाराज़ हो गये हैं। इसके साथ ही पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा होने और दाम बढ़ते जाने से अमेरिका के मित्र देशों का दबाव भी ट्रंप पर हर हाल में जल्दी से जल्दी जंग रोकने का बढ़ता जा रहा है। जहां तक ईरान के एटमी प्रोग्राम को खत्म करने का ट्रंप के दावे का सवाल है। ओएसआईएनटी का 24 मार्च को एक विश्लेषण सामने आया है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को यज़्द का ग्रेनाइट किला बताया गया है। ईरान ने अपना एटमी प्रोग्राम इमाम हुसैन बेस नाम के एक मल्टी लेवल बंकर में कई सुरक्षा से परतों से लैस कर रखा है। यह शिरकुह ग्रेनाइट से बना है। यह ग्रेनाइट ज़मीन के सबसे कठोर पत्थरों में से एक माना जाता है। इसकी संपीड़न शक्ति यानी कंप्रेसिव स्ट्रैंथ 25 से 40,000 पीएसआई मानी जाती है। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि सादा कंक्रीट 5000 पीएसआई तो हायर पाॅवर वाला 30,000 माना जाता है लेकिन यज़्द ग्रेनाइट इससे दस हज़ार अधिक पीएसआई वाला है। अमेरिका का सबसे पाॅवरफुल बंकर बस्टर बम जीबीयू-57 एमओपी इस तरह की चट्टान को केवल 6 से 10 मीटर तक ही भेद सकता है। जबकि यज्द ग्रेनाइट की सिक्योर्टी परत 500 मीटर से अधिक मोटी अंडर ग्राउंड है। इस तरह आप इस बंकर को 440 मीटर डैड एरिया कह सकते हैं। इसके साथ ही ईरान ने मिसाइल मेट्रो यानी आॅटोमैटिक रेल सिस्टम पहाड़ के अंदर बना रखा है। यह सिस्टम असैंबली हाॅल गोला बारूद डिपो और पर्वत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित कम से कम दस निकास रास्तों को जोड़ती है।
इस सिस्टम से ईरान लाॅंचर रेल पर पहले निकास द्वार की तरफ आता है, फिर सतह से उूपर जाता है। मिसाइल दागता है। इसके फौरन बार वापस अंडर ग्राउंड हो जाता है। इसके साथ एंट्री गेट को बख्तरबंद एयरलाॅक से सील कर दिया जाता है। यदि प्रवेश द्वार किसी हमले में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तो उनको अंदर से हाईपाॅवर वाले कंक्रीट से तत्काल मरम्मत कर सील कर दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया दुश्मन के जवाबी हमले में लगने वाले समय से आधे से भी कम में पूरी हो जाती है। यही वजह है कि अमेरिका इज़राइल हमवाई हमलों से केवल उन गिने चुने राॅकेट लांचरों को नष्ट कर पाये हैं जो ज़मीन की सतह पर मौजूद थे।यह भी बताया जाता है कि तकनीक के मामले में चीन रूस और उत्तरी कोरिया ईरान की भरपूर सहायता कर रहे हैं। जिससे वह दुश्मन के ठिकानों को खोजने निशाना लगाने और उसके आईरन डोम जैसे एंटी सैप्टर को चकमा देने में काफी सीमा तक सफल हो रहा है। ट्रंप ईरान की इस रण्नीति से बौखलाकर कभी उसको परमाणु हमले की धमकी देते हैं तो कभी उसके सबसे बड़े एनर्जी सेंटर खार्ग पर हमला कर कब्जा़ करने की बात करते हैं। ट्रंप अपनी सेना ईरान भेजने का इरादा भी जताते हैं लेकिन वियतनाम ईराक और अफगानिस्तान की कई दशक की नाकामी उनके कदम रोक देती है। कहने का मतलब यह है कि ट्रंप चारों तरफ से फंस चुके हैं। उनके अरबों मिलियन डाॅलर के खर्च पर ईरान कुछ हज़ार की हल्की मिसाइल और ड्रोन हमले करके उनको खूब चिढ़ा रहा है। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि अगर कोई देश कोई संगठन या कोई आदमी अपने सर पर कफन बांधकर अपने से कई गुना ताक़तवर से हिम्मत और बेहतर रण्नीति के साथ हारने और नुकसान उठाने का जोखिम उठाकर भिड़ जाये तो उसकी सर्वशक्तिमान या अजेय होने की पोल ऐसे ही खुल जाती है जैसे आज अमेरिका और इजराइल की खुल रही है। ईरान जंग जब भी खत्म होगी दुनिया पहले से काफी बदल जायेगी। शायर ने कहा है- मुश्किल कोई आन पड़े तो घबराने से क्या होगा, जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा।
*नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*
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