-इक़बाल हिंदुस्तानी
*0 इसमें कोई दो राय नहीं पांच राज्यों में आये चुनाव नतीजे बंगाल से काफी अलग हैं। इसके कारण भी अलग अलग हैं। एसआईआर भी इन पांच राज्यों सहित अब तक देश के कुल 14 राज्यों में हो चुकी है लेकिन जिस तरह से बंगाल में 27 लाख लोगों को चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस कारण के वोट डालने से रोक दिया, उससे यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया कि मतदाता सरकार चुनते हैं बल्कि अब आप कह सकते हैं कि सरकार उन मतदाताओं को चुन रही हैं जो उसको सत्ता में लाने के लिये वोट कर सकते हैं। साथ ही एक पेटर्न आप इन चुनाव नतीजों में और देख सकते हैं कि ममता चाहे अपनी हार का एकमात्र कारण चुनावी धांधली बेईमानी और पक्षपात बतायें लेकिन वह राज्य में बीजेपी को स्पेस देने के साथ कैसे इस हार की खुद भी ज़िम्मेदार हैं, सिक्के के दूसरे पहलू की तरह इस लेख में हम तथ्यों और प्रमाणों के साथ आपको बतायेंगे।*
राजनीति के जानकार बताते हैं कि जो दल नेता या गठबंधन कभी न कभी बीेजेपी के साथ अपने स्वार्थ में यह जानने के बाद भी जुड़े हैं कि उसका रास्ता गलत है, उनको देर सवेर भाजपा ने खत्म कर अपने अंदर समा लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर टीएमसी पीडीपी बीजू जनता दल जनता दल यू बसपा शिवसेना जननायक जनता पार्टी अकाली दल और अप्रत्यक्ष रूप से के चंद्रशेखर राव जगन मोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल जैसे नामों की एक लंबी सूची बन सकती है जो कभी न कभी बीजेपी से अपने अवसरवादी सिध्दांतहीन और परंपरागत मूल्यों को ताक पर रखकर निजी स्वार्थ में जुड़े और आज बीजेपी उनको निगल गयी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ममता बनर्जी की हार में केंचुआ का एसआईआर के बहाने वोट चोरी के साथ ही उनकी सरकार के खिलाफ पनप रहा जन असंतोष उनके कैडर का कट मनी वसूलना और उनके खिलाफ 15 साल की एंटी इनकम्बैंसी भी का भी रोल रहा है लेकिन सबसे बड़ी वजह जो लोग भूल चुके हैं। वह यह है कि ममता बनर्जी ने जो बोया आज उनको वह काटना पड़ा है। 29 साल पहले 1997 में ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस नाम से वरिष्ठ बंगाली नेता मुकुल राय के साथ मिलकर नई क्षेत्रीय पार्टी बनाई। उन्होंने अपनी परंपरागत विरोधी कांग्रेस और वामपंथी दलों को खत्म करने और अपने मुस्लिम वोट बैंक को डराकर बीजेपी को बंगाल में प्रवेश कराने में हर तरह का सहयोग दिया। बीजेपी जो पहले से ही कम्युनिस्टों और कांग्रस की विरोधी नहीं शत्रु की सीमा पार करके उनका नाम ओ निशान मिटाना चाहती थी, को बिन मांगी मुराद पूरी करने का अवसर मिल गया। मौका मिलते ही बीजेपी ने टीएमसी के संस्थापक सदस्य और ममता के राइट हैंड समझे जाने वाले मुकुल राय पर छापा मारकर उनको बीजेपी में ले लिया।
इसके बाद ममता खुद 1999 में एनडीए सरकार में शामिल होकर रेल मंत्री बन गयी। जबकि यहीं से उनका राजनीतिक पतन शुरू हो गया। 2001 में रक्षा सौदों में कमीशन खाने का स्टिंग सामने आने पर वह कथित नैतिकता की दुहाई देकर अपना पद त्याग कर एनडीए से अलग हो गयीं। उसके बाद 2001 में ममता ने बीजेपी को अपनी स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में एनडीए में लौटने की संभावना व्यक्त की। 2003 में ममता फिर से एनडीए सरकार में बिना विभाग की मंत्री बन गयीं। इसी साल ममता ने आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के एडिटर तरूण विजय की वामपंथी आतंक पर लिखी गयी किताब के विमोचन समारोह में अपनी हाज़िरी लगाई। संघी अख़बार के संपादक ने उनको बंगाल की दुर्गा बताकर हाथो हाथ राजनीतिक हिसाब बराबर कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ संघी लेखक और राज्यसभा सांसद बलवीर पंुज ने ममता को सदन में ‘‘हमारी प्यारी ममता दी साक्षात दुर्गा हैं’’ कहकर नवाज़ा। इतना ही नहीं बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ हिंसक संघर्ष में टीएमसी और संघ एक ही पेज पर खुलकर आ गये। ममता ने संघ से मेलजोल बढ़ाते हुए आरएसएस के मोहन भागवत मदन दास देवी और शेषाद्रि चारी को सच्चा देशभक्त बताया। 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने ममता की सादगी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ममता उन बिरले राजनीतिज्ञों में शामिल हैं, जो सियासत का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिये नहीं करते हंै। इसके बाद हालांकि ममता ने यह ज़ाहिर किया कि वह बीजेपी संघ और एनडीए से दूरी बना चुकी हैं लेकिन तमाम विरोध असहमति और आपत्ति के बावजूद जब संसद में सीएए के खिलाफ मतदान की बारी आई तो टीएमसी के आठ सांसद गायब हो गये और एनडीए का यह विवादित विधेयक बिना पर्याप्त सांसदों के आराम से पास हो गया।
ममता ने संविधान विरोधी विधेयक रोकने को न तो पार्टी का कोई व्हिप जारी किया और न ही पार्टी लाइन से हटकर लापता होने वाले आठ सांसदों के खिलाफ कोई अनुशासन की कार्यवाही ही की। 2021 में मुकुल राय बीजेपी से टीएमसी में आ गये और बोले बीजेपी और टीएमसी दोनों एक सी ही पार्टी हैं। ममता उनके इस बयान पर भी चुप रहीं। जुलाई 2022 में वाइस प्रेसिडंेट के इलैक्शन में ममता की पार्टी ने अचानक विपक्ष की साझा उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा का विरोध कर अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी की तरह बीजेपी की बी टीम होने का एक और प्रमाण दे दिया। सियासत के जानकार यह देखकर हैरत में पड़ गये कि जिन जगदीप धनकड़ ने बंगाल का राज्यपाल रहते ममता सरकार का काम करना दूभर कर दिया था उनको ही जिताने के लिये टीएमसी सदन में उनके खिलाफ वोट न करके अप्रत्यक्ष मदद करने को कैसे तैयार हो गयी? ममता बनर्जी बार बार इंडिया गठबंधन को भी धोखा देती रही हैं। बंगाल में उनकी पार्टी की हार पांच प्रतिशत वोटों से हुयी है लेकिन दोनों अलग अलग लड़कर सात प्रतिशत वोट लेने वाले इंडिया गठबंधन के घटक कांग्रेस और कम्युनिस्टों को उन्होंने बार बार प्रस्ताव देने के बावजूद कभी साथ मिलकर लड़ने की हामी नहीं भरी। इस तरह हम कह सकते हैं कि जहां ममता की हार के लिये केंचुआ और मोदी सरकार का खुला पक्षपात बे ईमानी और हर र्मार्चे पर उनको घेरना है वहीं ममता का संघ और बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक फासिस्ट और नफरत की सियासत करने वाली पार्टी से कभी खुलकर तो कभी छिपकर अनैतिक सियासत करना आज उनको अन्य बीजेपी सहयोगियों की तरह खा गया है। शायर ने कहा है- तू किसी और से ना हारेगा, तुझको तेरा ग़रूर मारेगा, तुझको दस्तार जिसने बख़्शी है, तेरा सर भी वही उतारेगा।
*नोट- लेखक चार दशक से अधिक से पत्रकारिता शायरी लेखन अख़बार संपादन और आकाशवाणी से एक कलाकार के तौर पर जुड़े हुए हैं।*
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