Thursday, 28 May 2026

कुरबानी का जज़्बा

*आज का विचार*
    _इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सिर्फ़ जानवर ज़िबाह मत कीजिये, क़ुर्बानी का जज़्बा भी पहचानिये..*
     मुसलमान साल में दो त्यौहार खासतौर पर मनाते हैं। एक ईद उल फ़ित्र और दूसरा ईद उज्जुहा। इस ईद को ईद ए क़ुर्बान या बकराईद भी कहा जाता है। इस ईद पर साहिब ए हैसियत मुसलमान जानवर की कुर्बानी देते हैं। जानवर के मीट के तीन हिस्से बनाए जाते हैं। एक खुद रखते हैं दूसरा अपने परिचितों को देते हैं और तीसरा ग़रीब और ज़रूरतमंदों को भेजा जाता है। जिस तरह हज के लिये जायज़ कमाई ज़रूरी है, वैसे ही क़ुरबानी के लिए हलाल पैसा खर्च करना शर्त है। इसके साथ ही आप पर किसी का कर्ज़ नहीं होना चाहिए। जो असली बात लोग भूल जाते हैं वो यह है कि जानवर की क़ुरबानी देने के साथ आपके दिल में अल्लाह की राह में इंसानियत मुल्क और आपसी रिश्तों को बचाने के लिए भी क़ुर्बानी का जज़्बा होना चाहिए। यह नहीं हो सकता आप हज़रत इब्राहीम की रस्म पूरी करने के लिए अल्लाह की राह में जानवर तो क़ुर्बान करें लेकिन अगर अपने सगे भाई पड़ौसी या हमवतन के लिए अपने पैसे जायदाद या किसी भी तरह के हित की थोड़ी से कुर्बानी देने की ज़रूरत आए तो पीछे हट जाएं। कुरबानी का मकसद अपनी हसद लालच हिंसा टकराव गुस्सा झूठ जुर्म और नफ़रत जैसी तमाम बुराइयों को भी कुरबान करना होता है। अगर सरकार कह रही है सड़क पर नमाज़ मत पढ़ो तो यह जानते हुए भी कि दूसरे धर्म के लोगों को ऐसा नहीं कह रही है, हम इसलिए रोड पर इबादत नहीं करेंगे क्योंकि इससे राहगीरों को आने जाने में तकलीफ़ होती है और अपने किसी भी मज़हबी काम से किसी को तकलीफ़ देना इस्लाम ने मना किया है। बाक़ी लोग क्या करते हैं और सरकार उनको क्यों करने देती है यह मुसलमानों का मामला नहीं है। मुसलमानों को अच्छी बातें सीखनी हैं उनपर अमल करना है और दूसरे लोगों से बेहतर मिसाल पेश करनी है। ऐसे लोगों के लिए ही शायर ने कहा है_
*मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,*
*उसको छुट्टी न मिली जिसने सबक़ याद किया।*

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