Thursday, 4 June 2026

बेटी की शादी बनाम बेटी की जान

*क्या बेटी की शादी बचाना उसकी जान बचाने से ज़्यादा ज़्ारूरी है?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
          भोपाल की ट्विशा शर्मा की हत्या या आत्महत्या तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि यह मामला न तो पहला है न ही आखि़री। हम इस बात पर भी अधिक ज़ोर नहीं देंगे कि दहेज़ की नाजायज़ मांग और नहीं मिलने पर बहु को सताना असहनीय यातनायें देना और अंत में क्रूरता की सारी सीमायें पार करते हुए उसको मार डालना हमारे समाज में कितना आम हो चुका है। हमारा सवाल यह है कि जब ट्विशा के माता पिता को यह बात साफ साफ पता लग चुकी थी कि उनकी बेटी को ससुराल में तरह तरह से परेशान किया जा रहा है और उसकी जान को ख़तरा है। तब भी वे अपनी बेटी को तलाक दिलाकर घर लाने की बजाये उसके घर आने पर बार बार समझाकर उसके ससुराल मौत के मुंह में क्यों भेज रहे थे? अगर ट्विशा के परिवार वाले कम शिक्षित या बेहद गरीब होते तब भी यह माना जा सकता था कि वे उसकी शादी फिर से करने के लिये इतना धन नहीं जुटा सकते थे। लेकिन ट्विशा का मामला इस कैटेगिरी मंे भी नहीं आता है। उसकी शादी डेटिंग एप के द्वारा समर्थ से दिसंबर 25 में हुयी थी। 12 मई 2026 को छह माह बाद ही ट्विशा ससुराल में फंदे से लटकी मिली। समर्थ एक वकील है जबकि उसकी मां ज़िला जज के पद से रिटायर हुयी थी। आरोप है कि ट्विशा की सास बेटे की पसंद की वजह से अतंर्जातीय विवाह को मजबूर हुयी लेकिन बहु को धार्मिक मंत्र याद नहीं होना और उसको बिना बताये घर से बाहर जाना स्वीकार नहीं था। सवाल यह है कि जो महिला ज़िला जज के पद पर रह चुकी हो और उससे न केवल दूसरे लोगों को न्याय देने की आशा की जाती हो बल्कि उससे अपनी सोच समझ और दृष्टिकोण प्रगातिशील तार्किक और विवेकशील होने की अपेक्षा की जाती हो वह भी इतनी दकियानूसी अंधविश्वासी और अमानवीय कैसे हो सकती है?
       बताया जाता है कि उसकी सास को अपनी बहु का अपनी मां से बहुत बात करना और उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता कोई और होने का भी शक था। ये सब विवाद बहस और आरोप ट्विशा के परिवार को भी पता थे। जिनको लेकर अकसर उसके घर में झगड़ा होता था। लेकिन ट्विशा के घर वाले उसको हर बार यही समझाते थे कि वह संयम से काम लो प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। ट्विशा ने अपने परिवार को यह भी बताया था कि उसका पति न केवल ड्रग लेता है बल्कि गुस्से में इतना बेकाबू हो जाता है कि वह उसके साथ किसी दिन कोई भी बड़ी अनहोनी कर सकता है। लेकिन उसके घर वाले उसको फोन पर मिलने पर और मायके आने पर हर बार यही समझाते रहे कि उसको अपनी ससुराल में ही एडजस्ट करना है। यानी एक तरह से उन्होंने अपनी बेटी की जान की कीमत पर भी उसके लिये घर वापसी के दरवाजे़ पूरी तरह बंद कर दिये। उन्होंने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि एक बार बेटी घर से डोली में जायेगी तो फिर उस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी। इसका मतलब बेटी के साथ उसके ससुराल वाले कुछ भी अनर्थ और अन्याय अत्याचार करें लेकिन बेटी को उसके माता पिता घर वापस लाने की बात सोच भी नहीं सकते। हैरत और दुख की बात यह रही कि बेटी ने बार बार न केवल मौखिक सीधे मिलकर बल्कि व्हाट्सएप चैट में भी ससुराल में अपनी जान को ख़तरा बताया लेकिन ’’कन्यादान’’ करने वाला समाज असंवेदनशील बना रहा। कुछ लोग शादी को सात जन्मांे का संबन्ध बताते हैं। लेकिन वे यह नहीं मानते कि शादी एक जुआ भी है। जिसका होने के बाद ही पता चलता है कि सही हुयी या गलत। अगर हम यह बात स्वीकार कर लें कि हमसे रिश्ता चुनते हुए गल्ती भी हो सकती है तो उसको तलाक दिलाकर खत्म किया जा सकता है। जिस शादी में कुछ महीने बाद ही यह बात पता लग गयी थी कि न केवल पति नशेड़ी और गुस्सैल बल्कि ट्विशा की सास भी बहुत पुराने विचारों दकियानूसी और सख्त मिज़ाज की महिला है, उसमें किसी अनहोनी के होने की प्रतीक्षा करने की क्या ज़रूरत थी?
         हालांकि यह सच है कि लड़की चाहे उच्च शिक्षित हो अमीर हो या फिर बहुत कमाने वाली बड़े पद पर आसीन हो लेकिन अगर एक बार उसका तलाक हो गया तो समाज उसको ‘सेकेंड हैंड’ की संज्ञा देकर उसका पक्ष न जानकर उसकी दूसरी शादी के विकल्प कम कर देता है। साथ ही अगर उसके साथ कोई बच्चा भी मौजूद हो तो उसकी दूसरी शादी और भी कठिन हो जाती है। जबकि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता है। यही हमारे समाज को दोगलापन अन्याय और पक्षपात है। तलाकशुदा और साथ में पहले पति से बच्चे वाली की तो बात ही क्या है अगर किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार हो जाये और उसमें उसकी ज़रा भी गल्ती नहीं हो तब भी समाज उसकी शादी तो दूर उसके साथ ही उसके परिवार का जीना भी हराम कर देता है। ट्विशा के मामले का एक दुखद पहलू यह भी है कि उसके केस से एक बार फिर साबित हुआ कि कानून सबके लिये बराबर नहीं है। पहले तो उसके केस को आत्महत्या बताकर पुलिस ने तीन दिन तक पूर्व जिला जज उसकी सास के दबाव में एफआईआर ही नहीं लिखी। बाद में जब तीन दिन बाद रपट लिखी भी तो पुलिस ने उसके परिवार की तहरीर के बजाये अपने हिसाब से हल्की धाराओं और कमज़ोर आरोपों के साथ खानापूरी की। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सास अपने रसूख के बल पर कुछ ही घंटों मंे ज़मानत हासिल करके आराम से अपने घर चली गयी। इतना ही नहीं पुलिस ने उसके आरोपी पति को फरार होने का पूरा मौका दिया। बाद में ट्विशा के सेना में जनरल भाई ने जब रिटायर सैन्य कर्मियों के संगठन को यह सब बताया तो उन्होंने पुलिस प्रशासन और शासन के खिलाफ मोर्चा खोलकर रिपोर्ट तरमीम कराई, दोबारा ट्विशा की डैडबाॅडी का पोस्टमार्टम हुआ और उसकी सास की ज़मानत खारिज कर केस की जांच सीबीआई को दे दी गयी। इसके साथ ही भागने का कोई रास्ता न बचता देख उसके पति समर्थ ने भी कोर्ट में सरेंडर कर दिया। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने उसको और उसकी मां पूर्व जज को रिमांड पर लेकर उस सख्ती और थर्ड डिग्री से पूछताछ नहीं की जिसके लिये हमारी पुलिस पहचान रखती है। शायर कहता है- तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी, जो शाख़ ए नाजु़क पे आशियाना बनेगा ना पायेदार होगा।
*नोट- लेखाक पत्रकारिता और आकाशवाणी से चार दशक से अधिक समय से जुड़े हुए हैं।*

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