*करनी हैं बातें दो चार... हिंदुस्तानी*
*रक्तदान करने वाले हैं फरिश्ते,*
*जो खून देकर बनाते हैं नए रिश्ते*
खून का एक रिश्ता पैदाइशी होता है, दूसरा कुछ लोग फ़रिश्ता बनकर ज़रूरत मंद लोगों को खून देकर बनाते हैं। पहला रिश्ता खुद बन जाता है तो दूसरा इंसान अपनी मर्ज़ी से बनाता है। आज के दौर में जब आदमी पैसे प्रॉपर्टी या सेक्स के लिये किसी की जान लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है, ऐसे में कुछ इंसानों का बिना किसी स्वार्थ के रक्तदान करना और किसी अंजान इंसान की जान बचाना फरिश्ते से कुछ कम नहीं है।
सरकारी ब्लड बैंक की बात करें तो ज़िले में उसकी क्षमता 350 यूनिट है। लेकिन वहां इस समय 119 यूनिट ही खून उपलब्ध है। उनमें भी केवल 79 यूनिट की जांच हुई है जो तत्काल किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है। इसके बदले पैसा नहीं किसी भी ग्रुप का उतने ही यूनिट खून देना होता है। आंकड़े बताते हैं खून की मांग हमेशा उपलब्ध खून से ज़्यादा बनी रहती है। ज़िले में 80 बच्चे थैलीसीमिया रोग के शिकार हैं। जिनको महीने में दो बार अनिवार्य रूप से ब्लड चढ़ाना होता है। इसके बदले वापस खून देने की कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा एक्सीडेंट ऑपरेशन और एनीमिया के मरीजों को भी समय समय पर खून देना होता है। इस ब्लड बैंक में सबसे कम मिलने वाला ए नेगेटिव,ओ नेगेटिव, और एबी नेगेटिव खून सिर्फ एक से तीन यूनिट ही मौजूद है।
सरकारी स्तर पर जो लोग ब्लड बैंक का प्रबंध करते हैं उनको उसका बाकायदा वेतन मिलता है। सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस बड़ी मानव आवश्यकता सेवा और जनरक्षा को देखते हुए इसमें प्राइवेट संस्थाएं समाजसेवी संगठन और दयालु नागरिक भी सहयोग करने लगे हैं। ज़िले की कई निजी ब्लड बैंक संस्थाओं में नजीबाबाद ब्लॉक की हाजी फहीम अख्तर की टीम भी शामिल है, जो अब तक 2000 यूनिट से ज़्यादा खून डोनेट करा चुकी है। इसमें शैलेंद्र चौधरी जैसे कई अन्य लोगों का भी भारी सपोर्ट है। ज़िले में पचास से अधिक बार खून देने वालों में विकास सेतिया, राहुल राजपूत, नवेद फरीदी शामिल हैं। वहीं नहटोर के महबूब शेख 27 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनको एक बार अपनी बच्ची की जान बचाने को खून की ज़रूरत पेश आई थी, तब से वे अपनी बेटी के जन्मदिन पर हर बार रक्तदान कर रहे हैं।
रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों (जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) की निरंतर जरूरत के बारे में लोगों को बताना। स्वैच्छिक रक्तदाताओं को सम्मान दिया जाना चाहिए। नियमित दान को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। दुनिया में सुरक्षित रक्त की कमी बनी रहती है, खासकर विकासशील देशों में। इस दिन नए रक्त दाताओं को जोड़ने और मौजूदा दाताओं को नियमित बनाने का प्रयास किया जाता है।14 जून की तारीख को रक्तदान दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिन के अवसर पर चुना गया है। वे ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1901 में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप)। इसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। इन्हें आधुनिक रक्तदान का "पिता" माना जाता है। इतिहास देखें तो 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संगठनों (Red Cross, IFBDO, ISBT) ने इसे शुरू किया। 2005 में WHO की विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे वार्षिक वैश्विक कार्यक्रम बना दिया।
हर साल एक नया थीम चुना जाता है, जैसे "One Drop of Humanity. Give Blood. Save Lives." 2026 के लिए टैग लाइन है।
*ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों, बनों में फिरते हैं मारे मारे,मैं उसका बंदा बनूँगा जिसको, ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा।*
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