Friday, 13 February 2026

अधिक बच्चे

*अधिक बच्चो की सलाह देने वाले वे कौन हैं?* 
0 जबकि सच यह है कि न तो एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है और न ही बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज के वास्तविक मुद्दों की चिंता है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं।        
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम के होते हुए मुसलमानों को दुश्मनों की ज़रूरत नहीं है। उसको वैसे ही बीजेपी की बी टीम नहीं कहा जाता है। बल्कि उसकी सियासत उसकी हरकतें और उसके नेताओं के विवादित बयान खुद यह दिखाते हैं कि उनको मुसलमानों की सियासत तो करनी है लेकिन उनके हितों की कोई चिंता नहीं है। हाल ही में एमआईएम के यूपी के अध्यक्ष शौकत अली ने मुरादाबाद में एक जनसभा में कहा कि मुसलमानों को हम दो हमारे दो दर्जन पर अमल करते हुए तेज़ी से जनसंख्या बढ़ानी चाहिये। उनका यह भी दावा कि उनके 8 और उनके बड़े भाई के 16 बच्चे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम आबादी बढ़ने से मुस्लिम समाज और देश मज़बूत होगा। उनका मानना है कि मुसलमानों की आबादी कम होने की वजह से ही मदरसों को आतंक का अड्डा उनकी लिंचिंग दाढ़ी नोचा जाना लड़कियों के नकाब खींचा जाना और किसी भी मांस को गौमांस बताकर उनको आज सताया जा रहा है। इससे पहले आरएसएस के मुखिया भागवत सहित कई हिंदू नेता साक्षी महाराज नवनीत राणा हिमंत विस्व सरमा भी हिंदुओं से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं। वे यहां तक कहते हैं कि अगर हिंदुओं ने अभी भी परिवार नियोजन जारी रखा तो वे जल्दी ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।
     उनका कहना है कि हिंदू समुदाय की घटती जन्मदर से जनसांखिकीय असंतुलन सांस्कृतिक पहचान और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। उनका यह भी दावा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर बढ़ती घुसपैठ और धर्म परिवर्तन से पहले ही हिंदू समाज के लिये चिंता बढ़ गयी है। सच तो यह है कि बच्चे कितने पैदा करने हैं यह परिवारों का निजी मामला है। लेकिन वे यही सवाल मोदी सरकार से नहीं पूछते। दरअसल उनकी असली चिंता हिंदू वोट बैंक की राजनीति है। ऐसे ही एमआईएम नेता सहित कई सिरफिरे मुस्लिम कट्टरपंथी नेताओं की चिंता भी मुस्लिम वोटबैंक को लेकर ही अधिक है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। जबकि सच यह है कि न तो बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज की चिंता है और न ही एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है।
       इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं। नेशनल फेमिली हैल्थ सर्वे-5 के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की जनसंख्या दर तेजी से गिरकर रिप्लेसमेंट रेट यानी 2.1 से भी नीचे आ चुकी है। 2020-25 का यह सर्वे यह भी बताता है कि हिंदुओं की टीएफआर 1.94 तो मुसलमानों की 2.14 रह गयी है। पहले इसमें बहुत अधिक अंतर था लेकिन अब इस दर में सबसे अधिक गिरावट मुसलमानों की आबादी में ही देखी जा रही है। हालांकि हिंदुओं की तुलना में यह अभी भी मामूली सी अधिक है। सर्वे में यह बात भी साफ हो चुकी है कि जनसंख्या बढ़ने का रिश्ता धर्म से नहीं बल्कि सम्पन्नता और शिक्षा से है। जो लोग संगठन व पार्टी मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार और उनको तरह से तरह से अनपढ़ व गरीब बनाये रखने में लगे रहते हैं उनको इस मुद्दे पर चिंता जताने का नैतिक अधिकार नहीं है। ऐसे लोगों के लिये शायर कहता है- सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप, आपका मैयार देखा कितने मैयारी हैं आप।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

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