-इक़बाल हिंदुस्तानी
लल्लन टाॅप टीवी चैनल पर पिछले दिनों डज़ गाॅड एक्ज़िस्ट डिबेट का आयोजन किया गया था। इस बहस में मशहूर फिल्म डाॅयलाग राइटर और शायर जावेद अख़्तर और मुफती शमाइल ने हिस्सा लिया था। यह प्रोग्राम चर्चित हो गया। इसको लाखों लोगों ने देखा सुना। लेकिन बिना किसी जज के यह दावा किया गया कि इस बहस में मुफती शमाइल जीत गये। इसकी वजह शायद भारत में अधिकांश लोगों का आस्तिक होना रहा। बाद में पूरी दुनिया में अपनी लोकप्रियता अचानक बढ़ जाने से मुफती साहब ने एक विवादित बयान दिया कि भारत के मुसलमानों ने शरीयत पर संविधान को तरजीह देकर गलती की है। उनका कहना था कि अगर संविधान और शरीयत में से किसी एक को चुनना हो तो हम शरीयत को चुनेंगे। मुफती साहब भूल गये कि अगर यही बात हिंदू धर्म को मानने वाले कहें तो देश हिंदू राष्ट्र बनने में देर नहीं लगेगी। ऐसे ही जिस देश में जिस मज़हब के मानने वालों की संख्या अधिक होगी वहां उस देश के बहुसंख्यकों का राज हो जायेगा। जबकि लोकतंत्र में बहुमत का शासन होता है। जिसमें सभी धर्म जाति और सोच के लोग शामिल होते हैं। कुछ लोगों का दावा है कि धर्म और संविधान का कोई टकराव ही नहीं तो यह सवाल कहां से आ गया कि दोनों में से एक को चुनो। उनको पता होना चाहिये कि संविधान सेकुलर है। उसके रहते ही सबको अपने अपने मज़हब पर चलने की आज़ादी मिली हुयी है। अगर कोई धर्म को सर्वोपरि मानेगा तो उन मुद्दों पर टकराव होगा जिन पर धर्म और संविधान अलग अलग रास्ता दिखाते हैं। साथ ही धर्मों का आपस में भी झगड़ा बढ़ जायेगा जो पहले ही राजनेता गैंगवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
No comments:
Post a Comment