Saturday, 1 August 2026

ए सी कोच में चोरी

*ए सी कोच में सफ़र करने वाले भी चोरी करते हैं?*
                  *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
               एक अंग्रेज़ी दैनिक की ख़बर के मुताबिक रेलवे के ए सी कोच में सफ़र करने वाले यात्रियों ने पिछले चार साल में 104.51 करोड़ के सामान की चोरी की है। इनमें जनवरी 22 से मई 26 के बीच 1.27 करोड़ बेड रोल, 46.54 लाख फेस टॉवल, 41.13 लाख बेडशीट 12.95 लाख कम्बल व 2.76 लाख तकिए शामिल हैं। हालांकि चोरी की यह रकम रेलवे के अटेंडेंट की सैलरी से हर माह कट जाती है, जिससे रेलवे को कोई नुकसान नहीं हुआ है। हो सकता है इस चोरी में कुछ बाहरी लोग भी शामिल हों लेकिन सवाल यह है कि रेलवे के ए सी कोच में अमीर और मीडियम क्लास लोग ही अधिक यात्रा करते हैं। वे भी चोरी करते हैं?
        आमतौर पर हमारा समाज गरीबों को चोर समझता है। इसकी वजह उनकी आय कम होने से ज़रूरी खर्च पूरे नहीं होना माना जाता है। कुछ लोग उनको नाकारा बताकर भी शॉर्ट कट से पैसा बनाने के आरोप में चोर बता देते हैं। जबकि ग़रीब, अमीर और मीडियम क्लास को पेट भरा होने के बावजूद चोरी करने वाला बताता है। उसका कहना है कि ये वर्ग टैक्स चुराकर ही अमीर बनता है। वे इस वर्ग पर बैंकों का पैसा मारकर दिवालिया बनने से सरकार यानी जनता का धन चुराने का आरोप लगाते हैं। *जबकि सच यह है कि सभी वर्गों में आपको अच्छे बुरे लोग मिल जाएंगे। इसे यह भी कह सकते हैं कि ईमानदार केवल वो है जिसे चोरी का मौक़ा नहीं मिलता है। लेकिन यह भी आधा सच है क्योंकि आपको ऐसे लोग भी सभी क्लास में मिल जायेंगे जो मौक़ा मिलने पर भी कभी चोरी नहीं करते।* 
       इतना ही नहीं आपको कम ही सही आज के कलयुग में भी ऐसे चुनिंदा लोग मिल जाएंगे जिनकी नीयत दूसरे के लाखों करोड़ों रूपये देखकर भी नहीं बिगड़ती। वे किसी का खोया पर्स ज्वैलरी और नोटों का बैग मिलने पर उसे तलाश करके वापस कर देते हैं। जहां तक रेलवे से बिस्तर चादर तकिये और तौलिया चोरी होने का सवाल है, करोड़ो लोग हर साल ए सी ट्रेन में सफ़र करते हैं लेकिन उनमें से 98 से 99% लोग कोई चोरी नहीं करते। लेकिन जो एक दो प्रतिशत चोरी करते हैं, उससे कहा जा सकता है। एक मछली ही तालाब को गंदा करने को काफ़ी है। रेलवे को चाहिए ये सामान देने से पहले लोगों से सिक्योरिटी जमा कराए। लोग खुद सामान वापस देने के लिए उतावले रहा करेंगे। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि हर कोच में कैमरे लगाए जाएं जिससे चोरी करने वालों को न सिर्फ़ पहचाना जा सके बल्कि पकड़ा जा सके और उनसे सामान के साथ भारी जुर्माना और उनको जेल भी भेजा जा सके। 
      *संस्कार ज़मीर और ईमान वाले लोग तो बहुत कम होते हैं जो मौक़ा मिलने पर चोरी धोखा और बे ईमानी नहीं करते वरना पूरी दुनिया में इंसान लगभग एक जैसे ही होते हैं। उनमें लालच झूठ और बे ईमानी मौजूद होती है लेकिन सरकार का सिस्टम मज़बूत हो तो उनको पकड़ लेता है, जिससे वे डरकर अपराध नहीं करते।* मिसाल के तौर पर भारतीय रेलवे में लोग खूब बिना टिकट चलते हैं, लेकिन दिल्ली मेट्रो में चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहां ऐसा करने का सिस्टम ही नहीं है।

जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मनोबल

*सरकार जौहर यूनिवर्सिटी नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ना चाहती है?*
               *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      मौलाना मुहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के कुल 40 में से 38 कमरे बिना नक़्शा पास कराये बनाने के आरोप में रामपुर विकास प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण के आदेश पर हालांकि कमिश्नर आंजनेय कुमार ने फिलहाल तो स्टे कर दिया है, लेकिन योगी और अन्य बीजेपी सरकारों की अब तक की मुस्लिम विरोधी कार्यशैली देेखते हुए लगता नहीं कि यह स्टे स्थायी आदेश में बदलेगा। हालांकि यह मामला राहत नहीं मिलने पर कोर्ट में भी जायेगा लेकिन बड़ी अदालतों का रूख़ भी आजकल सरकार को नाराज़ नहीं करने का साफ़ देखा जा सकता है। दरअसल यह मामला एक यूनिवर्सिटी या गैर कानूनी निर्माण तोड़ने का नहीं मुसलमानों का मनोबल तोड़ने का अधिक लगता है। जिस तरह से देश में अनेक मस्जिद और मदरसे आयेदिन अवैध बताकर तोड़े जा रहे हैं तो ऐसा नहीं है कि केवल यही अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल गैर कानूनी या बिना नक्शा पास कराये बने होंगे। लेकिन निशाना केवल इनको ही मुसलमानों को एक संदेश देने के लिये बनाया जा रहा है। हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभी कहीं कहीं अन्य धर्म वालों के आस्था स्थल और मकान दुकान भी तोड़े जाते हैं लेकिन उनका कारण कुछ और होता है। अयोध्या में राममंदिर के चढ़ावा चोरी और जंतर मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी के बैनर तले देश में हुए युवाओं के अभूतपूर्व आंदोलन से जनता का ध्यान हटाने का भी सरकार का एक मकसद हो सकता है। 
           इससे पहले कई साल तक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने का सरकार का अभियान भी मुस्लिम समाज को लंबे समय तक भय और तनाव में रखने में सफल रहा था। लेकिन बाद में उस समय के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ की बैंच ने आश्चर्यजनक तरीके से हिम्मत और निष्पक्षता दिखाते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहाल रखने का एतिहासिक आदेश दिया था। जिस पर मोदी सरकार इस अहम और संवेदनशील मुद्दे पर कोई अग्रिम कानूनी कार्यवाही नहीं करने पर मजबूर हो गयी थी। लेकिन उसकी मुसलमानों को मुख्यधारा से बाहर रखकर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने उनके साथ कदम कदम पर अन्याय और अत्याचार करने की नीति में कोई खास अंतर नहीं आया है। जौहर यूनिवर्सिटी को सपा के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान को सबक सिखाने के लिये भी निशाने पर लिया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सपा में आय से अधिक सम्पत्ति मामले की जांच झेल चुके पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव, पूर्व सीएम अखिलेश यादव उनके चाचा और अपने राज में चर्चित और सबसे भ्रष्ट रहे शिवपाल यादव तथा राम गोपाल यादव साथ ही सपा में कई अन्य वरिष्ठ नेता मंत्री और अधिकारी भ्रष्ट नहीं थे जो केवल आज़म खान को ही सौ से अधिक मुकदमे कायम कर लगातार जेल में रखा जा रहा है? 
         विपक्ष का सवाल रहा है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी की तरह अनेक सरकारी और निजी यूनिवर्सिटियों में गैर कानूनी निर्माण और अवैध गतिविधियां नहीं हुयीं होंगी लेकिन केवल इसी को निशाने पर लेने का मकसद साफ मुसलमानों को अनपढ़ जाहिल और बेरोज़गार बनाये रखना नहीं माना जाना चाहिये? हालांकि यह बहुत गंभीर आरोप है लेकिन अगर जम्मू के वैष्णोदेवी मेडिकल काॅलेज में मैरिट के आधार पर 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों के एडमिशन होने पर सरकार उस काॅलेज की मान्यता ही रद्द कर देती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है। हाल ही में जंतर मंतर पर सीजेपी के आंदोलन में यूपी गाज़ियाबाद जिले के मसूरी निवासी जुनैद मालिक आंदोलन करने वाले युवाओं को खाना परोस रहा था। उसको दिल्ली पुलिस ने पकड़ लिया। उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर उसके राज्य यूपी ले जाया गया। उससे घंटों तक खाने की फंडिंग को लेकर दर्जनों सवाल पूछे गये। उसको रात के अंधेरे में हाईवे पर छोड़ दिया गया। उसके परिवार को भी पुलिस ने थाने बुलाकर डराया धमकाया। ऐसा और बच्चो के साथ भी हुआ है लेकिन इनमें मुस्लिम और दलित अधिक शामिल हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाला उमर खालिद अपने कई साथियों के साथ संविधान तिरंगा झंडा और भारत माता की जय के नारों के बीच कानून का सम्मान करते हुए भाषण देता था लेकिन उनको सरकार ने कई साल से जेल में डाल रखा है और बेल नियम जेल अपवाद बताने वाली कोर्ट उनको जमानत नहीं दे रही है। जबकि यह कानून ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ केवल मुसलमानों को शरणार्थी के तौर पर आने पर भारत की नागरिकता देने से मना करता है। 
           यूपी के गोरखपुर में जब सरकारी मेडिकल काॅलेज में आॅक्सीजन की सप्लाई ठेकेदार ने भुगतान नहीं होने के कारण काट दी तो वहां सेवा दे रहे बच्चो के डाक्टर कफील खान ने अपनी जेब से प्राइवेट आॅक्सीजन सिलेंडर खरीदकर कई बच्चो की जान बचाई थी। इससे वे हीरो बन गये। लेकिन नतीजा क्या हुआ उनको पुरस्कृत करने की बजाये उल्टा मुसलमान होने की वजह से झूठे आरोप लगाकर कई महीनों के लिये जेल में डाल दिया गया। बाद में वे एक भी आरोप साबित नहीं होने पर कोर्ट से बरी किये गये। कश्मीरी लोगों को धारा 370 हटाने के बाद कई माह तक घरों में लाॅकडाउन लगाकर कैद रखा गया और देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य का पूर्ण राज्य का दर्जा छीनकर केंद्र शासित बना दिया गया। सद्दीक कप्पन नाम का एक राष्ट्रीय पत्रकार हाथरस में हुए दलित युवती के बलात्कार की रिपोर्टिंग करने यूपी आने के लिये जैसे ही मथुरा पहंुचा उसको यूपी पुलिस ने 2020 में विदेशी साज़िश का फर्जी आरोप लगाकर हिरासत में लिया और कई माह तक जेल में रखा। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद रिहा हो सका था। सरकार सड़क पर दस मिनट की नमाज़ पर रोक लगाती है लेकिन इसी रोड हाईवे एक्सप्रैस वे को एक माह के लिये कांवड़ के लिये बंद कर दिया जाता है। अकेले मेरठ दिल्ली एक्सप्रैस वे पर इस दौरान 700 करोड़ के नुकसान का व्यापारियों का अनुमान है। इस दौरान मांस बेचने पर भी रोक लग जाती है। मुस्लिम दुकानदारों होटलों और ढाबों को भी अपनी पहचान सार्वजनिक करने पर मजबूर किया जाता है। जिससे उनका कांवड़ वाले खरीदारी में बहिष्कार कर सकें। 
            सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को आॅप्रेशन सिंदूर सफलतापूर्वक करने के बादवजूद एक मुस्लिम होने की वजह से बीजेपी के एक मंत्री आतंकियों की बहन बताते है और उनको कोई सज़ा नहीं मिलती। पूरे देश में आयेदिन मुस्लिम नामों वाले शहरों कस्बों गांवों और संस्थानों के नाम बदलकर हिंदू धर्म और संस्कृति के अनुसार रखे जा रहे हैं। सवाल है कि क्या यह देश मुसलमानों का नहीं है? किसी भी मुसलमान पर झूठा आरोप लगने पर भी तत्काल केस दर्ज हो जाता है और उसको जेल भेजने के साथ ही उसके दुकान मकान पर बुल्डोज़र भी चल जाता है। उसको ज़मानत भी अकसर देर से मिलती है। बाद में कोर्ट से वह बेकसूर साबित होने पर बरी हो जाता है तो ध्वस्तीकरण से उसके नुकसान का सरकार मुआवज़ा क्यों नहीं देती? हालांकि बुल्डोज़र अब गैर मुस्लिमों के यहां भी कई मामलों में जाने लगा है लेकिन वह भी गैर कानूनी ही है। बोट से गंगा की सैर कर बिरयानी खाने वाले एक दर्जन से अधिक मुस्लिम युवाओं को चिकन की हड्डी नदी में फेंकने पर महीनों के लिए जेल में रखा गया। बिहार से लेकर यूपी और कई बीजेपी शासित राज्यों तक में चुन चुनकर पहले अनेक मुस्लिम माफियाओं का गैर कानूनी तरीके से फर्जी एनकाउंटर करके एक खास संदेश दिया गया। बाद में यह कवायद सभी वर्गों के लिये आम हो चुकी है। गोमांस का आरोप लगाकर कई मुसलमानों की माॅब लिंचिंग की जा चुकी है। बाद में फोरेंसिक जांच में यह मीट भैंस का पाया जाता है। अंतरधार्मिक विवाह का कानून और संविधान में अधिकार होने के बाद भी लव जेहाद बताकर केवल उन मामलों को रोका और मारा पीटा जाता है जिनमें लड़की हिंदू और लड़का मुस्लिम होता है। 
           कई बीजेपी शासित राज्यों में काॅमन सिविल कोड के नाम पर सबके लिये एकसा कानून लाने का दावा कर आदिवासियों को इससे बाहर रखकर केवल मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है। कश्मीर फाइल, केरल स्टोरी, हिजाब विवाद, हज सब्सिडी, कोरोना जेहाद, लैंड जेहाद, थूक जेहाद, यूपीएससी जेहाद, काॅरपोरेट जेहाद, रामनवमी पर शोभायात्रा के नाम पर मुस्लिम बस्तियों और मस्जिदों के सामने आपत्तिजनक नारेबाज़ी, वक्फ बोर्ड कानून के द्वारा उनकी सम्पत्तियों पर सरकार की बुरी नज़र, फिल्मी सितारे शाहरूख़ आमिर और सलमान को तरह तरह से सताना, यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव द्वारा मुसलमानों को टारगेट करने के बाद भी उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होना, इसकी कई मिसाले मौजूद हैं। मुस्लिम विरोधी कई कानून बनाने के साथ ही असम और यूपी के सीएम आयेदिन ऐसे बयान देते रहते हैं जिनसे मुसलमानों को अपमानित प्रताड़ित और उनका मनोबल तोड़ा जा सके। इसलिये जौहर यूनिवर्सिटी तो नया बहाना है, इसके तोड़ने के आदेश के ज़रिये मुसलमानों का मनोबल तोड़ना अधिक प्रतीत होता है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा

*कॉकरोच आंदोलन सफल लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक बंद हो जाएगा?*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                 कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खत्म कराने को मजबूरी में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा तो हो गया लेकिन संघ बीजेपी और मोदी की कार्यशैली को जानने वालों को पता है, इससे पेपर लीक होना बंद हो ही जाएं यह ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता युवाओं की मांग पूरी होने से उनको लगा है कि सरकार झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। जहां तक सीजेपी के आंदोलन का सवाल है उसकी तुलना जे पे या अन्ना के आंदोलन से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें संगठन प्रबंधन और सरकार से मांगो पर वार्ता करने के लिए निगोशिएशन करने वाले अलग वरिष्ठ अनुभवी और विशेषज्ञ नागरिक मौजूद थे, जो इस आंदोलन में नज़र नहीं आये। सोनम वांगचुक जब सीजेपी के आंदोलन में शरीक हुए तब यह लग रहा था कि अब वे इसकी कमान सीजेपी के मुखिया अभिजीत दीपके से अधिक बेहतर संभाल सकते थे लेकिन उनको पुलिस ने जबरन उठाकर हॉस्पिटल भेज दिया, जिससे वे मुख्य मंच से बाहर हो गए। सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास के नेतृत्व में जो लोग स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से मिलने गए वे पहले दिन तो निराश होकर लौटे लेकिन दूसरे दिन शिक्षा मंत्री को हटवाने में सफल हो गए।
         दरअसल शिक्षा मंत्री को हटाने से यह व्यापक समस्या हल होने वाली नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक या आंदोलन की बड़ी सफलता तो लोगों को दूर से दिखाई दे रही है, है भी लेकिन ठीक ऐसा ही होगा जैसे किसी अस्पताल का पूरा सिस्टम सुविधाएं मशीनें नियम कानून उपलब्ध सीमित दवायें और इलाज की सीमाएं बदले बिना डॉक्टर बदलकर रोगी के ठीक होने की आशा करना। हालांकि सीजेपी के घोषणा पत्र में न्यायिक स्वतंत्रता, महिला आरक्षण, चुनावी अखंडता, मीडिया की जवाबदेही और कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हैं लेकिन फ़िलहाल उन्होंने शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, नीट परीक्षा बार बार रद्द होने से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने के साथ आंदोलन करने वाले बच्चों के खिलाफ़ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करने की मुख्य मांग ही सरकार से मनवाई हैं । सीजेपी के युवा जोश में हैं। उनको अनुभव अभी नहीं है। वे राजनीति की बारीकियां शासन प्रशासन की चालें भी नहीं समझते। साथ ही इस सरकार की बनावट और काम करने के परंपरा से अलग हटकर तौर तरीके और आंदोलन व विरोध को लेकर उसकी नीति भी शायद नहीं जानते थे। उनको यह भी नहीं पता शिक्षा मंत्री ही नहीं सभी कैबिनेट मंत्री और अन्य मंत्री भी पीएमओ यानी मोदी और संघ के दिशा निर्देश से ही सारे काम, फैसले और बयान जारी करते हैं। 
            यहां तक कि बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी बिना मोदी शाह और संघ की सहमति के कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकते। यही वजह है कि बीजेपी में मंत्री या मुख्यमंत्री बनने के लिए जनाधार योग्यता और अधिक राजनीतिक अनुभव नहीं वफ़ादारी कम योग्यता और लोकप्रियता विहीन होना मैरिट माना जाता है। रिकॉर्ड बताता है कि संघ बीजेपी और मोदी कभी भी लोकतांत्रिक उदार और संविधान के अनुसार चलने वाले नहीं रहे हैं। वे सांप्रदायिक कट्टरवादी और पूंजीवादी सोच के होने की वजह से अधिनायकवादी अहंकारी और एक एजेंडे के हिसाब से ही चलते हैं। यही वजह है कि नैतिकता जनभावनाओं का सम्मान और विपक्ष सिविल सोसायटी या विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद फैसले लेने में उनका तनिक भी विश्वास नहीं रहा है अन्यथा नोट बंदी, देश में लॉक डाउन और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान नहीं हुआ होता। पेट्रोल में बिना समुचित चर्चा तैयारी या वाहनों की बनावट की जांच के सीधे दस से बीस प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से खराब हो रही कारों का यह देश में ऐसा ही चौथा मनमाना थोपा गया एकतरफा फैसला है।
          यही वजह है कि मोदी और अन्य बीजेपी सरकारें भ्रष्टाचार अपराध महंगाई बेरोजगारी और ग़रीबी को कोई बड़ी समस्या ही नहीं मानते। जब प्रॉब्लम ही स्वीकार नहीं करते तो इनके समाधान के लिए भी कुछ ठोस काम नहीं करेंगे। मोदी सरकार अपने 12 साल के कार्यकाल में केवल उन आंदोलनकारी किसानों के सामने झुकी थी जिन्होंने तमाम तिकड़मों रुकावटों और सरकारी दमन के बावजूद दिल्ली बोर्डर पर एक साल से अधिक धरना और 700 से अधिक किसानों की जान का बलिदान दिया था। उसकी वजह भी देश की आबादी में किसानों की बड़ी संख्या और यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव में बीजेपी की हार का खतरा था। मोदी सरकार विपक्ष को संसद या बाहर भी विरोध तक नहीं करने देती, साथ ही विपक्ष के सांसदों को शामिल कर बनी संयुक्त संसदीय समितियों को अधिकांश बिल विवाद के बाद भी विचार को या तो भेजे नहीं जाते और अगर मजबूरी में कभी कभी सदन चलाने को ऐसे विधेयक विचार विमर्श को दिए भी जाते हैं तो उनकी सिफ़ारिश को सरकार स्वीकार ही नहीं करती। युवाओं के वर्तमान आक्रोश नाराज़गी और विरोध का कारण मोदी के हर साल दो करोड़ नए रोज़गार का वादा पूरा नहीं होना भी था। इसके साथ ही मोदी जिन अडानी अंबानी जैसे चंद मित्र पूंजिपतियों के हाथ देश की सारी संपत्ति संसाधन और दौलत लुटाते आ रहे हैं उससे भी युवाओं में गुस्सा है। यह ठीक है कि सरकार के हिंदू मुस्लिम एजेंडे को धता बताकर कॉकरोच आंदोलन ने दो सफलताये शुरू में ही हासिल कर ली थी, जिनमें एक आंदोलन करने पर सरकार की बदले की कार्यवाही का भय ख़त्म होना और दूसरा आंदोलन करने वालों से सरकार का अब तक बात नहीं करने का घमंड तोड़ना शामिल था। यह सरकार बड़े से बड़े फैसले बिना सोचे समझे बिना संसद को विश्वास में लिए और बिना नागरिकों से चर्चा किए लेती रही है। 
           6 जून को जब कॉकरोच आंदोलन शुरू हुआ तो सरकार ने उससे तत्काल बात नहीं की लेकिन जब तनाव टकराव और विवाद 20 जुलाई को संसद चलो के आव्हान से काफी बढ़ गया तो समझौता वार्ता शुरू हुई। इसके कई दिन बाद पीएम मोदी ने पेपर लीक के मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनने का कानून बनाने और उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी को हटाने का आदेश देकर ऐसा संदेश देना चाहा जैसे ये कोई बड़े क्रांतिकारी फ़ैसले हों। इसके साथ ही मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक कानून में दस साल सज़ा और दस करोड़ जुर्माने की भी व्यवस्था कर दी है, लेकिन जैसे जनलोकपाल बना लेकिन करप्शन खत्म नहीं हुआ वैसा ही इस कानून का भी हश्र होगा। अंत में कोई विकल्प न बचने पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लिया गया, इसमें में भी पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी नहीं स्वीकार की गई है। मोदी सरकार की विश्वसनीयता साख और छवि अब ढलान पर है, जिससे उसके वादों दावों और आश्वासनों पर सीजेपी क्या कोई भी विश्वास करने को तैयार नहीं होता है। उसने हर समस्या का समाधान हिंदू मुस्लिम झूठ और नफ़रत को बनाकर गोदी मीडिया से ऐसा नैरेटिव बनाकर चुनावी जीत का मैकेनिज्म विकसित कर लिया है जिससे धर्मेंद्र प्रधान को तो क्या कल मोदी को भी अगर पद से हटा दिया जाए तो भी जो नया प्रधानमंत्री बनेगा वो संघ के उसी एजेंडे पर वैसे ही चलेगा जैसे आज मोदी चल रहे हैं। हम सीजेपी के आंदोलन की सफलता को कम करके नहीं आंकना चाहते लेकिन यह ज़रूर कहेंगे कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक की समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि इसके लिए पूरी सरकार व्यवस्था और काफी सीमा तक हमारा अनैतिक समाज भी उत्तरदायी है।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

कॉकरोच आंदोलन

*क्या कॉकरोच आंदोलन अपना मक़सद हासिल कर सकेगा?*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
            मई माह में कुछ छात्रों और युवाओं ने ऑनलाइन कॉकरोच जनता पार्टी बनाई थी। अभिजीत दीपके के नेतृत्व में बनी इस पार्टी के उसी दिन दो करोड़ फॉलोवर बनने पर लोगों को हैरत हुई थी। इसके मुखिया दीपके जब अमेरिका से 6 जून को भारत लौटे तो युवाओं ने उनको सर आंखों पर लिया। जैसा कि इस पार्टी के नाम से ही लगा कि यह एक सटायर यानी हास्य व्यंग्य के तौर पर मज़ाक में बना हल्का संगठन है। लेकिन जब इसी बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं ने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन का पहला दौर शुरू किया तो लोगों ने इस पार्टी को संजीदगी से लेना शुरू किया। 
                सीजेपी की शुरू में एक ही मांग थी कि बार बार लीक हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर की जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफ़ा दें। जब यह मांग धरने से पूरी नहीं हुई तो सीजेपी ने 20 जून से जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन छेड़ दिया। इस दौरान सोशल एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक सीजेपी के जंतर मंतर पर किए जा रहे आंदोलन में समर्थन देने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने 19 दिन भूख हड़ताल की। उनका वज़न 9 किलो से ज्यादा घट गया। मामला दिल्ली हाईकोर्ट गया। हाईकोर्ट ने सरकार को सोनम की सेहत का ख़्याल रखने को कहा। सरकार ने सोनम को पुलिस से उठवा कर हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। इसके बाद सीजेपी के मुखिया दीपके ने आंदोलन को तेज़ कर दिया। उन्होंने खुद आमरण अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन एक दिन बाद ही उनको कुछ वरिष्ठ नागरिक अनुभवी समाजसेवी और सुलझे हुए राजनेता यह समझाने में सफल हो गए कि धरने अनशन और प्रदर्शन का इस सरकार पर कोई असर नहीं होता। इसके बाद दीपके ने एक दिन में ही अनशन खत्म कर संसद मार्च का ऐलान कर दिया। अब कॉकरोच पार्टी की मांगे बढ़कर शिक्षा मंत्री के रिजाइन के साथ साथ पेपर लीक के सदमे से मरने वाले 21 छात्रों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने तक बढ़ चुकी हैं।
                इस दौरान जब सीजेपी ने जंतर मंतर से संसद की तरफ़ कूच किया तो आश्चर्यजनक ढंग से उनको संख्या चार पांच हज़ार से बढ़कर अचानक एक लाख से भी अधिक हो गई। इस मार्च की अनुमति सरकार से नहीं मिली थी। पुलिस ने संसद से काफी पहले छात्रों के मार्च को रोका। जब वे नहीं रुके तो उन पर लाठी चार्ज किया गया। आरोप है कि पुलिस ने पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक और शॉक बेटन यानी करंट लगाने वाली लाठी का इस्तेमाल भी किया, लेकिन सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया। यह भी चर्चा है कि आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने को पुलिस और अन्य अर्ध सैनिक बलों के साथ सिविल ड्रेस में ऐसे लोग भी लाठी चार्ज कर रहे थे जिनके बारे में यह स्पष्ट नहीं है कि बिना वर्दी बिना बैज और बिना नेम प्लेट के ये प्राइवेट फोर्स किन लोगों की थी। बाद में पुलिस ने इनको अपने ही जवान बताया। कई छात्र छात्राओं ने लाठी चार्ज के दौरान गंभीर चोटें आने जानबूझकर घायल करने और अश्लील हरकतें करने के भी आरोप लगाए हैं। निष्पक्ष जांच के बाद ही पता लगेगा कि प्राइवेट लोग कौन थे और जो आरोप लग रहे हैं उनमें कितना सच है और कितनी अफवाहें हैं।
          समय रहते सरकार ने सीजेपी से बात कर इस आंदोलन को निबटाने की कोशिश नहीं की। जिस दिन संसद मार्च हो रहा था और छात्र छात्राओं पर लाठी चार्ज हुआ उसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने सीजेपी के नेताओं से बात की, लेकिन तत्काल उनकी एक भी मांग नहीं मानी। इससे आंदोलकारी और भड़क गए। बर्बर लाठी चार्ज और युवाओं को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की शिकायतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन कई ग़ैर ज़रूरी और अपेक्षाकृत कम महत्व के मुद्दों पर सु मोटो लेने वाली बड़ी अदालतों ने तत्काल सुनने से इन मामलों को यह कहते हुए मना कर दिया कि कोर्ट को सियासत में मत घसीटिए और इन मामलों में फौरन सुनवाई कोर्ट का कीमती टाइम ख़राब करना माना जाएगा। ऐसे जनहित के मुद्दों पर याचिकाएं सुनते हुए अदालतें काफ़ी समय से इसी तरह का रुखा रुख अपना रही हैं, जिससे सरकार को काफ़ी राहत मिल जाती है।
            कॉकरोच आंदोलन सफल होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मोदी सरकार की अब तक की कार्यशैली देखते हुए यही संकेत मिल रहे हैं कि वह सीजेपी की मांगो को नहीं मानेगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बहुत पहले कह चुके है कि हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते। यह लेख लिखे जाने तक आंदोलन जारी है। घायल छात्र छात्राएं गुस्से में हैं। वे फिर से जंतर मंतर पर जमा हो रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार के इस मिथक को तो तोड़ दिया है कि लोग डर से शासन प्रशासन और पुलिस के खिलाफ़ आंदोलन नहीं करेंगे। इसके साथ ही देर से सही लेकिन सरकार ने सीजेपी नेताओं से बात करके यह भी भ्रम तोड़ दिया कि यह सरकार विरोध करने वालों से बात तक नहीं करती।
          सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस द्वारा कुछ युवाओं को कॉकरोच बताने के जवाब में बनी कॉकरोच जनता पार्टी आज मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है। उसने आंदोलन करके दो मकसद तो शुरू में ही हासिल कर लिए थे। इनमें एक निडर होकर सरकार के खिलाफ़ आंदोलन और दूसरा विरोध करने वालों से कभी भी बात नहीं करने वाली मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा द्वारा सीजेपी नेताओं से समझौता वार्ता करना। अब जबकि विपक्ष भी खुलकर सीजेपी के आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है, सरकार के लिये और मुसीबत बढ़ गई है। सरकार इनकी मांगे मानकर अपनी अब तक किसी आंदोलन के सामने नहीं झुकने की परम्परा नहीं तोड़ना चाहेगी। उसे यह भी डर है कि मंत्री प्रधान का इस्ती़फा लिया तो कल प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा न मांगा जाने लगे। साथ ही ऐसी मांगे बढ़ते जाने और माने जाने से सरकार दब्बू डरपोक और कमज़ोर नज़र आ सकती है। हर विरोध करने वाले को सरकार देशद्रोही खालिस्तानी पाकिस्तानी और विदेशी साज़िश रचने वाला अर्बन नक्सल बताती रही है। मोदी सरकार खुद को सेवक की जगह स्वामी और जनता को आज्ञाकारी सेवक बनाना चाहती है। वह विपक्ष को भी विरोध एक सीमा तक ही करने देती है। केवल एक साल से अधिक आंदोलन करने वाले किसान ही 700 लोगों की बलि देकर मोदी सरकार को पहली बार कृषि कानून वापस लेने को मजबूर कर सके थे। देखना यह है कि सरकार फिर से झुकती है या युवा आंदोलन बिना मकसद हासिल किए कुछ दिन में खत्म हो जाएगा।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

विपक्ष , आधा एनडीए में आधा जेल में?

*2029 के चुनाव तक आधा विपक्ष बीजेपी आधा जेल में होगा?*
       *_इक़बाल हिंदुस्तानी* 
       मानसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार परिसीमन जैसे अहम बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने में जी जान से लगी है। वर्तमान लोकसभा में उसको 362 सांसद चाहिए, आम आदमी पार्टी और टीएमसी के काफी सांसद तोड़कर 332 उसने जुटा लिए हैं। हाल ही में उसने शरद पवार की एनसीपी को एनडीए का समर्थन करने को तैयार कर लिया है। अब उसकी नज़र सपा और द्रमुक पर है, ये दोनों सीधे समर्थन नहीं भी देंगे तो इनको सदन से गायब रहने पर राज़ी किया जा सकता है, जिससे सदन की कुल संख्या कम हो जाएगी और इसके साथ ही टू थर्ड मेजॉरिटी का आंकड़ा भी नीचे आ जाएगा। 
           सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है। यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।
          महाराष्ट्र में शरद पवार आज आत्मघाती फैसला कर रहे हैं, कल ममता बनर्जी ने भी बीजेपी को सपोर्ट करके ऐसी ही गलतफहमी पाली थी। ममता समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। 
         ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। 
         कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् श्री एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। 
         बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। मोदी सरकार विपक्ष को तोड़ने खत्म करने और ईडी सीबीआई इनकम टैक्स के ज़रिए टारगेट करके जिस तरह बीजेपी एनडीए या इंडिया एलाइंस से अलग होकर नया गुट बनाने को ब्लैकमेल करके तानाशाही दिखा रही है, उससे लगता है अगला आम चुनाव आते आते आधे विपक्षी नेता या तो बीजेपी को सपोर्ट करेंगे या फिर जेल में होंगे। 
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*

Wednesday, 15 July 2026

बेकाबू बाइकर्स

*आपकी बाइक है शौक से चलाओ,* 
*दूसरों के लिए आफ़त मत बनाओ*
       *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        आजकल जिस तरह से युवा मोबाइल के दीवाने हैं। उसी तरह से उनका दूसरा प्यार बाइक बन चुकी है। कुछ युवक युवतियां स्कूटर और स्कूटी भी चलाते हैं लेकिन बाइक चलाने वाले उनकी तुलना में कई गुना अधिक हैं। लोवर मीडियम और मीडियम क्लास जहां 75,000 से एक लाख तक की बाइक चलाते हैं, वहीं अपर मीडियम और अपर क्लास बहुत महंगी मॉडर्न और स्पोर्ट बाइक चलाते है। ये अन्य सुविधाओं के साथ ही स्टार्ट होते ही बहुत तेज़ स्पीड पकड़ लेती हैं। असली प्रॉब्लम यहीं से शुरू होती हैं। फैशन और स्पीड का दीवाना युवा ये आधुनिक बाइक चलाते हुए पूरी सावधानी नहीं बरतता। वह हेलमेट नहीं लगाता, डी एल नहीं बनवाता, दो नहीं तीन नहीं चार चार साथियों को बाइक पर बैठाकर गली मुहल्ले में ही नहीं हाईवे और एक्सप्रेस वे पर भी निकल जाता है। खुद की जान के साथ सड़को पर पैदल या दूसरे हल्के वाहनों से जा रहे लोगों की जान भी खतरे में डालता है। कई बार एक्सीडेंट होते हैं। युवा जान से हाथ धो बैठते हैं। मातापिता लाड प्यार में नाबालिग बच्चों को भी टू व्हीलर की चाबी दे देते हैं जोकि नियम कानून ही नहीं उनकी अपनी सुरक्षा के लिए मुसीबत बन जाती है। बड़े चौराहों और राष्ट्रीय राज मार्गों पर तो कभी कभी पुलिस इन वाहनों की चेकिंग करके चालान काट भी देती है, लेकिन नगरो कस्बों गांवों के गली मोहल्लों में ये बाइक सवार युवा सरपट दौड़ते रहते हैं। इनके प्रेशर हार्न से बच्चे बुजुर्ग और बीमार सो नहीं पाते या सोते सोते चौंक कर बार बार जाग जाते हैं। ये अपनी बाइकों में मोडिफाइड साइलेंसर गैर कानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 
        इन अवैध साइलेंसर से बार बार पटाखा फूटने की दिल हिला देने वाली तेज़ आवाजें गूंजती रहती हैं लेकिन इन बेलगाम और बिगड़े हुए युवाओं की मौज मस्ती पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अव्वल तो गली मोहल्लों में इनको पुलिस पकड़ती ही नहीं है, अगर ये गलती से किसी व्यस्त चौराहे या हाईवे पर पकड़े भी जाते है तो अपने परिवार के रसूख का इस्तेमाल नहीं तो यातायात पुलिस की जेब गर्म और कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं होने पर चालान कटवाकर भर देते हैं या कभी कभी मौक़े से दुस्साहस दिखाते हुए भाग भी जाते हैं। कई नगरों में कई सड़कों पर बहुत ऊंचे स्पीड ब्रेकर होने या जाम लगा होने पर ये स्पीड काबू नहीं कर पाने से भयंकर टक्कर भी मार देते हैं और भाग जाते हैं। इन बिगड़े हुए युवाओं की इन लापरवाही मनमानी और खतरनाक बाइक स्टंट से नागरिक बहुत परेशान हैं। वे मंदिर मस्जिद व अन्य धार्मिक स्थलों आश्रमों धर्मशालाओं में पूजा नमाज से लेकर अस्पताल में अमन सकून से इलाज तक नहीं करा पाते। स्कूल कॉलेज के बच्चे इनके हॉर्न और मोडिफाइड साइलेंसर के कर्कश असहनीय शोर से पढ़ भी नहीं पाते। 
        ऐसी बाइक पास से गुजरने मात्र से कई मासूम बच्चे महिलाएं और बूढ़े बुजुर्ग तो एक्सीडेंट के खौफ से बुरी तरह काँप जाते हैं या डिसबैलेंस होकर रास्ते में ही गिरकर चोट खा जाते हैं। इन बेकाबू बाइकर्स के डरावने कोलाहल से कभी कभी अवारा बेसहारा जानवर बौखलाकर रोड पर बेतहाशा दौड़ने लगते है जिससे पैदल या वाहन पर चलते दूसरे लोग उनकी ज़द में आकर बुरी तरह घायल या मौत का शिकार हो जाते हैं। कई बाइक और दूसरे वाहनों की प्रदूषण की जांच या तो बरसों तक होती नहीं या फिर वे फील गुड कराकर फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट हासिल कर लेते हैं, जिससे वे जिधर से निकलते हैं, उधर ज़हरीला धुआँ छोड़ते जाते हैं और लोग उनको बददुआ देते रहते हैं। इनकी इन बढ़ती समाज विरोधी शांति विरोधी और नागरिक सुरक्षा की दुश्मन हरकतों का कोई समाधान सरकार प्रशासन और पुलिस के पास अभी तक नहीं है। काश इन नौजवानों और उनके परिवार वालों को सिविक सेंस नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य बोध हो और वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार संवेदनशीलता और मानवता का पाठ पढ़ा सकें जिससे वे अपनी बाइक को चलती फिरती आफ़त मुसीबत और यमदूत बनने से बच सकें।
*नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है*
(नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं)

अयोध्या चढ़ावा चोरी...

*अयोध्या चढ़ावा चोरी: वकील अपना काम नहीं करेंगे तो कानून अपना काम कैसे करेगा?*
          _*इक़बाल हिंदुस्तानी*
                    अयोध्या बार एसोसिएशन ने एलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के किसी आरोपी की कोई वकील कानूनी पैरवी नहीं करेगा। अगर एसोसिएशन के फैसले का उल्लंघन करते हुए कोई वकील ऐसा करता है तो उस पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जायेगा। हमारा कहना है कि अपराधी कोई भी हो उसको सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन हर आरोपी अपराधी ही हो यह ज़रूरी नहीं होता। कानून के राज में जब तक कोई आरोपी अपराधी साबित नहीं हो जाता उसको किसी भी प्रकार से किसी भी स्तर पर किसी के भी द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार कितना ही गम्भीर अपराध का आरोपी हो उसको दंड दिए जाने से पहले अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखने का कानूनी अधिकार दिया गया है। अयोध्या के अधिवक्ताओं के संगठन ने आरोपियों को कानूनी सहायता नहीं देने का जो फ़ैसला किया है, वह अपने आप में कानून के राज की मूल भावना के खिलाफ़ है। कानून की पढ़ाई, डिग्री और अदालत में प्रैक्टिस के लिए बार कौंसिल में रजिस्ट्रेशन से पहले प्रत्येक अधिवक्ता को शपथ पत्र देना होता है कि वह संविधान के अनुसार कानून का पालन करते हुए अपने पेशे के नियम के मुताबिक किसी जरूरतमंद को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं करेगा। इसके बावजूद कोई एक दो वकील व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि उनकी पूरी यूनियन एक आवाज़ में एक साथ एक प्रस्ताव पास करके अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा और दान चोरी के आरोपियों के केस कानूनी पैरवी के लिये लेने से खुले आम इन्कार कर रही है। 
              यहां यह स्पष्ट कर दें हमारा अभिप्राय इस मामले में यह बिल्कुल नहीं है कि चढ़ावा चोरी के अपराधियों को दंड नहीं मिले। हम चाहते हैं इस केस में जो भी अपराधी साबित हों उनको न केवल सज़ा मिले बल्कि कड़ी और शीघ्र सज़ा दी जाए जिससे भविष्य में कोई इस तरह की निर्लज्ज और राम भक्तों की भावनाओं को आहत करने वाली घटिया हरकत करने से पहले सौ बार सोचे और चोरी करने से डरे व बचे। अजीब बात यह है कि कानून की पैरवी करने वाले वकील ही धार्मिक भावनाओं को संविधान से ऊपर रखकर आरोपियों को कानूनी सहायता प्रदान करने से मना कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के इस बारे में साफ़ और सख़्त स्टैंडिंग ऑर्डर हैं कि संविधान और न्यायपालिका के नियम अनुसार कोई वकील किसी आरोपी की पैरवी करने से मना नहीं कर सकता, बशर्ते कि उसने उससे पहले ही दूसरे पक्ष का केस लड़ने को अनुबंध नहीं कर लिया हो। *2010 में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ़ सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने किसी भी बार एसोसिएशन के इस तरह के प्रस्ताव को गैर कानूनी बताते हुए निरस्त कर दिया था। यह मामला कोयमबटूर के एक वकील और पुलिस वाले के बीच विवाद से शुरू हुआ था। इसके बाद अधिवक्ताओं ने पुलिस के मामलों की कानूनी पैरवी करने से मना कर दिया था। मद्रास हाईकोर्ट के द्वारा वकीलों के इस फैसके को वकालत के प्रोफेशन के खिलाफ़ बताने के बाद बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट अपील में गई थी। *उत्तराखंड में एक वकील की हत्या के मामले में जब वकीलों ने आरोपियों को कानूनी सहायता देने से मना किया तो तब भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा प्रस्ताव गैर कानूनी बताते हुए हत्या आरोपियों की पैरवी करने से रोकने या इस दौरान कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने पर वकीलों को कोर्ट की मानहानि का केस दर्ज कराने की कड़ी चेतावनी दी थी।* 
            *इतना ही नहीं बार कौंसिल ऑफ इंडिया भी इस बारे में स्पष्ट कह चुका है कि कोई भी वकील किसी भी आरोपी को कानूनी पैरवी करने से मना नहीं कर सकता।* बार कौंसिल का यहां तक कहना है कि वकील फीस भी केस की नेचर गंभीरता और स्तर के हिसाब से ले सकता है, इतनी नहीं मांग सकता जिससे आरोपी अनावश्यक और अव्यवहारिक मानकर भुगतान करने में असमर्थ हो और उसको जानबूझकर कानूनी बचाव से वंचित कर दिया जाए। कौंसिल का कहना था कि अगर एसोसिएशन के फैसले के खिलाफ जाकर कोई वकील किसी आरोपी का कोई केस कोर्ट में लड़ता है तो उस अधिवक्ता पर एसोसिएशन न तो कोई अर्थदंड लगा सकती है और न ही उसकी सदस्यता निरस्त की जा सकती है। 
            *संविधान का अनुच्छेद 22 (1) हर किसी को यह मौलिक अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद का वकील अपने कानूनी बचाव में रखना चाहे तो वकील उसको कानूनी सेवाएं देने से इन्कार नहीं कर सकता। सेक्शन 14 हर भारतीय नागरिक को समान कानूनी अधिकार और सुरक्षा की गारंटी देता है तो आर्टिकल 39 ए राज्य को निर्देश देता है कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से न्याय मिलना सुनिश्चित किया जा सके। संविधान यहां तक कहता है कि किसी नागरिक को गरीब कमज़ोर अशिक्षित या विकलांग होने के कारण मुकदमे के दौरान कानूनी बचाव से वंचित नहीं किया जा सकता और यह सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह असमर्थ होने पर आरोपी को सरकारी वकील कानूनी बचाव के लिए उपलब्ध कराए।* 
             अगर आज वकीलों के इस अवैध प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तो कल डॉक्टर ऐसे आरोपियों के इलाज को यह कहकर मना करने लगेंगे कि आरोपियों ने उनकी धार्मिक भावना या अस्पताल पर हमला करके आहत किया है। दूसरे पेशे वाले भी उनके नक़्शे कदम पर चलकर देश में कानून की बजाए अराजकता की स्थिति पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस गलत सिलसिले को यहीं रोकना ज़रूरी है। यही वजह है कि 26/11 के मुंबई हमले के पाकिस्तानी आरोपी अजमल कसाब को मौके से रंगे हाथ गोली चलाते हुए निर्दोष लोगों का खून बहाते हुए पकड़े जाने के बावजूद कोर्ट में केस चलाने के दौरान सरकार ने उसके कानूनी बचाव को अपने खर्च पर सरकारी वकील उपलब्ध कराया था। उसको बाद में कानून ने अपना काम पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से करते हुए फांसी की सज़ा दी, लेकिन देश विदेश में यह संदेश गया कि उसको वास्तव में अपराधी साबित होने के बाद ही मृत्युदंड दिया गया और सही न्याय हुआ।
              यह भी विडंबना और विरोधाभास ही कहा जाएगा कि अयोध्या के इन वकीलों ने ही दो जुलाई को राम जन्मभूमि थाने में ट्रस्ट से जुड़े कुछ बड़े पदाधिकारियों के खिलाफ़ नामज़द रिपोर्ट दर्ज करने को तहरीर दी और आरोप लगाया कि छोटे कर्मचारियों की आड़ में कुछ बड़े लोगों को बचाया जा रहा है। वकीलों ने अपनी मांग के समर्थन में प्रदर्शन भी किया लेकिन अब तक इनकी दी तहरीर पर कोई एफआईआर होने की अधिकृत सूचना नहीं है। खुद सरकार ने इस मामले में तब एसआईटी बनाई जब यह मामला सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ट्वीट करके सार्वजनिक कर दिया। साथ ही कानून को अपना काम करने से रोकने या कुछ छिपाने के आरोप सरकार पर इसलिए भी लगने शुरू हुए क्योंकि उसने तत्काल एफआईआर करने की बजाए पहले एसआईटी बनाई। चर्चा है कि इस दौरान आरोपियों को चोरी का माल ठिकाने लगाने का अवसर मिल गया। अगर कानून को ठीक से काम करने दिया जाता तो पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती, फिर तत्काल आरोपियों को हिरासत में लिया जाता, उनसे सख्ती से पूछताछ होती, उनकी गिरफ्तारी होती, रिमांड पर लिया जाता, उनकी निशानदेही पर चोरी की रकम और दूसरी बेशकीमती सोने चांदी की भेंट की गईं चीज़ें बरामद की जाती, उनके घर दुकान और संपत्ति सील की जाती, उनके बैंक खाते सीज़ किए जाते, उनसे जुड़े लोगों पर नज़र रखी जाती और उनके घरों कार्यालयों व अन्य संबंधित भवनों की निगरानी भी की जाती जिससे वे अब तक चुराया गया चढ़ावा दान और उससे बनाई गई संपत्ति ज़ेवर और बैंक लॉकर से माल ठिकाने नहीं लगा सकें। 
             अंत में यही कहा जा सकता है कि ट्रस्ट की पहली जिम्मेदारी ऐसी पारदर्शी विश्वसनीय और अभेद्य व्यवस्था बनाने की थी जिसमें चोरी हो ही नहीं, लेकिन अगर मानवीय भूल तकनीकी चूक और व्यवहारिक गलती से चोरी का संगीन अपराध हो ही गया था तो ट्रस्ट सरकार पुलिस और वकीलों को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे जनता में यह संदेश जाए कि कानून को अपना काम निष्पक्ष स्वतंत्र और संवैधानिक तरीके से नहीं करने दिया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इतने गंभीर और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करके राम भक्तों और आम आदमी को अच्छा संदेश नहीं दिया है। वहां एक माह से अधिक समय के बाद सुनवाई शुरू होने जा रही है।अभी भी समय है कि जनता का विश्वास कानून के राज में बहाल करने को इस मामले में त्वरित कड़ी और निष्पक्ष कार्यवाही को देश के तटस्थ धार्मिक संतों गणमान्य समाजसेवी और प्रतिष्ठित निष्पक्ष नागरिकों की एक कमेटी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज की अध्यक्षता में बनाकर निश्चित समय में जांच कराई जाए और दोषियों को कड़ा दंड दिया जाए। 
*उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़*
*हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा*

Tuesday, 7 July 2026

सिया केतन और चेतन

*आज का विचार... इक़बाल हिंदुस्तानी*
*सिया, यह तू ने क्या कर दिया,*
 *ना नहीं की , मर्डर कर दिया?*
        पुणे की सिया पर आरोप है। उसने अपने मंगेतर केतन का अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर मर्डर कर दिया। वह साहस करके इस शादी को ना भी बोल सकती थी, लेकिन उसने दुस्साहस दिखाते हुए अपने होने वाले पति को खाई में धक्का दे दिया। हाल ही में इस तरह की और भी घटनाएं सामने आईं हैं। मेघालय में हनीमून के दौरान राजा रघुवंशी को विवाह के चौदह दिन बाद ही उसकी पत्नी ने मार दिया था। दिलीप यादव की सुपारी हत्या का आरोप है। मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत का ब्ल्यू ड्रम हत्याकांड पहले ही कुख्यात हो चुका है। सब्ज़ी विक्रेता धन्ना लाल सैनी की हत्या भी मीडिया में सुर्खियां बनी थीं। देहरादून का राजेश गुलाटी हत्या केस लोगों के दिमाग़ में अभी तक ताज़ा है।
        *एक सर्वे एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं और लड़कियों द्वारा अपने पतियों या प्रेमियों को खुद मार देने या सुपारी किलर से हत्या कराने के सालभर में 300 केस सामने आते हैं तो पतियों या प्रेमियों द्वारा पत्नियों और प्रेमिकाओं को इसी तरह क़त्ल करने के एक साल में 7000 मुकदमे दर्ज होते हैं। इस जानकारी से यह गलतफहमी दूर हो जानी चाहिए कि लेडीज़ या प्रेमिकाएं बड़े पैमाने पर इस तरह की हत्याएं कर या करा रही हैं। सच यह है कि पुरुष प्रधान समाज में आज भी इस तरह के अपराध के मामलों में मर्द औरतों से बहुत आगे हैं।*
         हमारा मकसद यहां हत्यारी महिलाओं प्रेमिकाओं और पत्नियों को क्लीन चिट देना नहीं है, लेकिन इन चंद घटनाओं से यह निष्कर्ष निकालना कि अब महिलाएं पुरुषों की तरह क्रूर और ज़ालिम हो चुकी हैं, थोड़ा जल्दबाजी होगी। कुछ मामलों में प्रेमी प्रेमिकाएं जबरन अनचाहा रिश्ता होने से आत्महत्या भी कर लेते हैं। सिया केतन और चेतन का ही केस गौर से गहराई से और आराम से देखें तो पता चलता है कि सिया अपने माता पिता के असहनीय दबाव में इस अनचाही शादी के लिये ना बोलने का साहस नहीं दिखा पाई और उसने अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर केतन को कुछ इस तरह ठिकाने लगाने की साज़िश रची जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। लेकिन हुआ उल्टा। वह अपने अरबपति परिवार को इस शादी के लिए मना करके इसलिए भी नाराज़ नहीं करना चाहती थी क्योंकि वे उसे ऐसा करने पर अपनी संपत्ति घर और परिवार से अलग करने की चेतावनी दे रहे थे। वे परिवार की साख और सम्मान भी खराब होने की दुहाई दे रहे थे। सिया उनका दिल भी नहीं तोड़ना चाहती थी, लेकिन अपने प्रेमी को भी नहीं छोड़ना चाहती थी। वह भारी द्वंद्व और कशमकश में फंसी हुई थी। हमारा कहना है कि परिवार बच्चों को अच्छी समझ शिक्षा और संस्कृति सिखायें जिससे वे शादी के मामलों में उनकी बात मानें लेकिन अगर वे सहमत नहीं हो पाएं तो बेटे बेटियों को जबरदस्ती जान लेने या जान देने को कभी भी मजबूर नहीं करें।

Sunday, 5 July 2026

जनविरोधी फ़ैसले कैसे रुकेंगे?

*सरकारों के जनविरोधी फ़ैसले रोकने के सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो चुके हैं?*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी प्रॉपर्टी नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व जजों की सलाहकार कमेटी ही कर सकेगी। ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से यूपी गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी को अपराध की सज़ा मिले इससे कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन सरकार अपने किसी संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत दिए जेल में डाल दे यह कैसे कानून का राज माना जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं जिनमें आरोपी को जेल में रहकर खुद को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी ऐसे ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ प्रिवेंटिव तरीके अपनाए जाते रहे हैं जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों से लगातार आलोचना हुई है। बंगाल सरकार ने स्कूलों में मिड डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवा और शिक्षा में आरक्षण 17 से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईदे कुर्बान पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशु पालकों का भी भारी नुकसान किया था जो साल भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई के लिए करते हैं। टेलीग्राफ जैसे बड़े अखबार के एडिटर रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हुआ, जिससे वह अपनी बेटी की शादी तक में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से असंवैधानिक रोक लगा दी है, क्योंकि अनुमति मांगने पर अनुमति देने की बजाए ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंक विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनते थे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के राज में विपक्ष की सरकारों के जनहित के कानूनों को तो उसके राज्यपाल और यहां तक कि राष्ट्रपति तक सालों तक रोक कर बैठे रहते हैं लेकिन बीजेपी की राज्य सरकारों का कोई भी विवादित कानून वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना के बजाए उसके पक्ष में एक सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है। सबसे दुख और चिंता की बात तो यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और जब तब याची को हाईकोर्ट जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामले अनचाहे ढंग से सुनता भी है तो सालों तक टालता रहता है। उसके बाद बेंच के किसी जज का ट्रांसफर या रिटायरमेंट होने पर नई बेंच बना देता है। फिर लंबे समय तक वह बेंच फिर से पूरा मामला सुनती है। उसके बाद भी अकसर बेंच फैसले को सुरक्षित रख लेती है। इससे कई बार जब फैसला लंबे समय बाद आता भी है तो मूल मुद्दा ही खत्म हो चुका होता है। जैसे कई बार महाराष्ट्र सहित कई राज्य सरकारों सांसदों और विधायकों के चुनाव को लेकर हुआ है। वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और कोर्ट एक ही पेज पर नज़र आते हैं। हमारे चीफ़ जस्टिस कुछ भी दावा करें लेकिन उनके कई फैसले चीख़ चीख़ कर बोल रहे हैं कि वे फैसले जनता के कम सत्ता के पक्ष में अधिक झुके नज़र आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिए। एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं न्यूटल लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई साल से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उनको चार्जशीट दाखिल कर दोषी साबित नहीं किया गया है लेकिन बेल नियम जेल अपवाद कहने वाला कोर्ट उनको फिर भी ज़मानत नहीं देता है। सी ए ए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ उन्होंने शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उस दौरान ही सुनियोजित दंगा हुआ और उनको उनके साथियों सहित दंगे के आरोप में गम्भीर धाराएं लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है। महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवर को मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, नहीं तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू नहीं किए जाएंगे। यूपी में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के स्टैंडिंग ऑर्डर के बावजूद आरोपियों के घर पर तत्काल नियम विरुद्ध बुलडोजर चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियां उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाही करता है। देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मीट के साथ पकड़कर गौमांस बताया जाता है, पीटा जाता है, मॉब लिंच कर दिया जाता है, बाद में मांस की जांच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाऊस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर दुकान और दूसरी प्रॉपर्टी भी ध्वस्त कर दिए जाते हैं। नागरिकता साबित करने को लेकर एसआईआर में जिन प्रमाण पत्रों को मान्यता दी गई थी अब उनको भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट तक को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताकर नागरिकता साबित करने का डाक्यूमेंट होने से मना कर दिया है। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 कागज़ दिखाने के बावजूद भारतीय नागरिक मानने से मना कर दिया, जबकि इन कागज़ात में 1951 की वो एनआरसी भी थी जिसमें उसके दादा दादी का नाम मौजूद है। अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है लेकिन वहां के लिये महंगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात होती नहीं, दूसरे सबसे बड़ी अदालत भी ऐसे मामलों में लोगों को अकसर निराश ही कर रही है, इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है। कभी कभी कुछ हाईकोर्ट अपवाद स्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियां कर देते हैं जिनसे हल्की सी उम्मीद की किरण दिखती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही कई मुकदमे लोगों पर दर्ज हो जाते हैं। यूपी के कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि उस पर सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में 39 मुकदमे अब तक दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता विपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना प्रदर्शन तो दूर किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी हमें मिलने नहीं देती, ऐसा लगता है राज्य में इमरजेंसी लगी है। बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहां की सरकारों ने राज्यों की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट सुनवाई दौरान 27 लाख लोगों को अगली बार वोट दे देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों की मज़ाक भी उड़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो कोर्ट असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने को तैयार नहीं हो और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी नहीं करने दिया जा रहा तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है?

देर ना हो जाए कहीं...

*आज की बात... हिंदुस्तानी*
*इम्तेहान हो या प्लेन व रेल, कैसे बने समय से तालमेल?*
        पिछले दिनों हुई नीट की चर्चित परीक्षा में कुछ बच्चों को समय पर नहीं पहुंचने पर सेंटर में एंट्री नहीं मिली। इससे उनका पेपर छूट गया। उनका एक साल भी खराब हुआ और उनके परिवार का लाखों रुपया भी। इससे कुछ बच्चों ने आहत होकर अपनी जान भी दे दी। लेकिन यह कोई हल नहीं है। कुछ लोग ट्रेन से जाने के लिए भी रेलवे स्टेशन के लिए देर से पहुंचते हैं। ऐसा ही कई लोगों के साथ अपनी तय समय पर टेक ऑफ करने वाली फ्लाइट को लेकर भी होता है। बस छूटने पर तो लोग कुछ देर बाद दूसरी बस से निकल जाते हैं। लेकिन कारपोरेट कॉलेज हॉस्पिटल और कई जगह अब नौकरी करने वालों की हाज़िरी डिजिटल सिस्टम से लगती है। लेट जाने पर उस दिन उनकी छुट्टी लग जाती है या फिर काम पर लेने के बाद भी आधे दिन की सैलरी काट ली जाती है। बोर्ड के एक्जाम में भी देर से जाने वालों को पेपर छूटने पर फेल होने सप्लीमेंट्री आने या फिर से परीक्षा देने का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
      सवाल यह है इतना बड़ा नुकसान टेंशन और कैरियर को ख़तरा होने के बावजूद बच्चे शिक्षक और नौकरी पेशा लोगों के साथ आम आदमी भी बार बार क्यों लेट होते हैं? हम लोग पहले से गैप लेकर घर से क्यों नहीं निकलते, दूसरों का नुकसान देखकर भी सबक नहीं सीखते और खुद का एक बार कैरियर खराब होने पर भी अगली बार बदलाव नहीं करते। क्या हम लोग नहीं जानते कि घर से देर से या बिल्कुल क्लोज़ टाइम पर निकलने से हम अपनी मंज़िलों पर टाइम पर नहीं पहुंच पाएंगे। ट्रेन कैंसिल या लेट भी हो सकती है। क्या नीट जे ई ई और टेट जैसी परीक्षा हमारी वजह से निर्धारित समय से लेट की जा सकती हैं ? क्या ट्रेन और फ्लाइट किसी व्यक्ति विशेष के कारण देर से चलेंगे? क्या ऑफिस का डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम हमारी लेट लतीफी की वजह से हटा दिया जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर हम घर से टाइम पर नहीं निकले तो ग़लती किसकी है? अगर हमें टाइम पर रिक्शा नहीं मिली तो कौन जिम्मेदार है? अगर सड़क पर जाम लगा है तो कोई क्या कर सकता है? गलती चाहे सरकार पुलिस और सिस्टम की हो लेकिन ये ऐसे सवाल हैं जिनका हल खुद हमको ही तलाशना है। हल यह है कि हम समय से सोयें, समय पर उठने को एक नहीं दो दो अलार्म लगाएं, समय कम हो तो नाश्ता खाना और नहाना स्किप कर दें, रिक्शा नहीं मिले तो घर के वाहन से स्टेशन पहुंचे, परीक्षा ट्रेन और फ्लाइट के समय से एक दो घंटे पहले पहुंचने का प्लान बनाएं जिससे कुछ लेट भी हो जाएं तो समय पर एंट्री मिल जाए, अगर एक ही बस ट्रेन या फ्लाइट मंज़िल पर जाती हो तो एक दिन पहले पहुंच जाएं और किसी रिश्तेदार जान पहचान वाले या होटल में कमरा लेकर नाइट स्टे भी कर सकते हैं लेकिन देर से जाने का कोई बहाना नहीं चलेगा।

Thursday, 2 July 2026

कांग्रेस और मुस्लिम

*मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आने लगे क्या दलित पिछड़े भी आयेंगे?*
                 *_इक़बाल हिंदुस्तानी*
        सपा और कांग्रेस में यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर बयानबाजी तेज़ होती जा रही है। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली और क्षेत्रीय दलों के प्रति उदारता न दिखाने पर नाराज़गी जताई है तो उधर कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा से कांग्रेस को बराबर सम्मान और सीट शेयर करने की दो टूक मांग की है। असम में बदरुद्दीन अजमल की ए आई यूडीएफ से लगभग आधा मुस्लिम वोट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ शिफ़्ट होने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ए आई यूडीएफ का 2021 का वोट 10 प्रतिशत से अधिक था जो इस साल घटकर 5.46 प्रतिशत रह गया। उसको कुल दो सीट मिली। कांग्रेस को वहां 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिला और उसने 19 सीट जीतीं जिनमें से 18 विधायक मुस्लिम हैं। दिल्ली में आपका मुस्लिम वोट 10.8 प्रतिशत घटा है और इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के साथ गया है। *सीएसडीएस लोकनीति और मीडिया विश्लेषण से पता लगता है कि कांग्रेस को उसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में मुस्लिम 80 प्रतिशत तक, दलित 60 प्रतिशत तक आदिवासी 50 प्रतिशत तक और पिछड़े 30 से 40 प्रतिशत तक कुछ प्रदेशों तक सीमित हैं। जबकि उच्च जातियों में केवल उदार एवं सेक्युलर परिवार के गिने चुने लोग ही कांग्रेस को वोट करते हैं। इनका अधिकांश वोट बीजेपी या उसके घटकों को जाता है। कांग्रेस उच्च सम्पन्न और मध्य वर्ग में काफ़ी कमज़ोर हो चुकी है। कांग्रेस का असर हिमाचल कर्नाटक तेलंगाना राजस्थान मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ केरला उत्तराखंड पंजाब में मुख्य दल के रूप में मौजूद है। इतिहास गवाह है कुछ राज्यों में कांग्रेस एक बार चुनाव हारी तो फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। मिसाल के तौर पर 1967 में तमिलनाडु 1977 में बंगाल 1989 में यूपी 1990 के दशक में बिहार और गुजरात में 1995 में महाराष्ट्र 2013 में दिल्ली 2016 में असम 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद वह इन राज्यों में आज तक सत्ता से बाहर है।*
            ऐसा नहीं है, मुस्लिम कांग्रेस से बहुत खुश है, बल्कि वह यह समझ गया है कि क्षेत्रीय और खास तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टियां बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकती। इस बदलाव की शुरुआत दिल्ली में आप को छोड़कर कांग्रेस की तरफ गए मुस्लिम वोट के बड़े हिस्से से हो चुकी है। चर्चा है जिस तरह से आप के राज्यसभा सदस्य बीजेपी में गए हैं, इससे नाराज़ मुस्लिम वोट आगे चुनाव में आप को और अधिक छोड़कर कांग्रेस के साथ जुड़ेगा। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बंगाल में टीएमसी से छिटक कर जो 60 विधायक और 20 सांसद एनडीए यानी बीजेपी के समर्थन में गये हैं, उससे आगे मुसलमान बंगाल में भी ममता को छोड़कर राहुल की कांग्रेस या कुछ हिस्सा कम्युनिस्टों के साथ जुड़ सकता है। यही वजह है कि यूपी में सपा के सांसदों को तोड़ने की चर्चा फिलहाल ठंडी पड़ गई है। संघ इस राजनीतिक समीकरण को समझकर आशंकित है कि अगर अधिकांश मुस्लिम वोट से जीते सपा एमपी तोड़कर बीजेपी या एनडीए में लाए गए तो मुस्लिम आगे से सपा पर भरोसा न कर बड़ी संख्या में कांग्रेस या आंशिक रूप से आज़ाद समाज पार्टी जैसे नए जन्मे दलों में दलित मुस्लिम गठजोड़ बनाने को जा सकते है। बीजेपी के लिए यह समीकरण सबसे घातक माना जाता है। दरअसल मुस्लिम कांग्रेस सपा बसपा या आरजेडी जैसे किसी दल को जिताने के लिए कभी वोट नहीं देता है। वह तो हर उस सेक्युलर पार्टी को वोट देता रहा है जो भी बीजेपी को गारंटी से हरा सकता हो। यही वजह है उसको पार्टी बदलने में तनिक भी दिक्कत नहीं होती। मुस्लिम अब पूरे देश में महसूस कर रहा है कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को नहीं हरा सकते। उल्टा वे बीजेपी के दबाव में काम करते हैं। बीजेपी को बैकडोर से सपोर्ट तक कर देते हैं और सेक्युलर कांग्रेस का विरोध करते हैं। हद तो यह है कि जब लालच और दबाव ब्लैकमेल की सीमा तक पहुंच जाता है तो इन दलों के जनप्रतिनिधि टूट कर उसी बीजेपी में या उसके गठबंधन में चले जाते हैं जिसको हराने को मुस्लिम समाज ने इनको वोट दिया था। मुस्लिम जानते हैं कि अकेले उनके वोट से कांग्रेस वापस सत्ता में नहीं आ सकती, लेकिन वे इसकी पहल यह सोचकर कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल दलित और पिछड़े भी जब बीजेपी से नाराज़ होंगे तो कांग्रेस में आ सकते हैं।
            1989 से पहले का रिकॉर्ड देखें तो कांग्रेस का एक वोट बैंक हुआ करता था। जिनमें ब्राह्मण मुस्लिम और दलित समाज मुख्य रूप से शामिल थे। इस समीकरण के बल पर कांग्रेस ने देश और राज्यों में कई दशक तक एकक्षत्र राज किया। विडंबना यह रही कि फिर भी कांग्रेस ने अपने वोट बैंक को स्थायी रूप से अपना बनाए रखने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। उल्टा हुआ यह कि सत्ता का अधिकांश लाभ पहले से ही सम्पन्न सक्षम और संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा उच्च वर्ग यानी स्वर्ण जातियां विशेष रूप से ब्राह्मण लेते रहे। कांग्रेस ने दलितों मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने के लिए एक नकारात्मक काम किया। उसने संघ को फलने फूलने दिया। बीजेपी को सांप्रदायिकता की राजनीति करने दी। उसके राज में खूब दंगे हुए, हजारों लोग मारे गए, जिनमें मुस्लिम अधिक होते थे। उनके कारोबार तबाह कर दिए गए। घर जलाए गए। महिलाओं से बलात्कार हुए। महीनों कर्फ़्यू लगा रहता था। फिर दिखावे के लिए जांच आयोग बनते थे। उनकी कई साल बाद रिपोर्ट आती थी, लेकिन किसी को सज़ा नहीं मिलती थी। कांग्रेस जानती थी दंगे होते नहीं, सुनियोजित तरीके से कराए जाते हैं। एक तरह से कांग्रेस आज की टीएमसी की तरह मुसलमानों दलितों को बीजेपी से डराकर वोट लेने की राजनीति कर रही थी। दलितों को वह बीजेपी के सत्ता में आने पर आरक्षण और संविधान खत्म होने का भय दिखाती थी। जब इससे भी काम नहीं चला तो कांग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को खुश करने के बदले हिंदूवादी लोगों को भी खुश करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना विवादित बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना था। इससे सांप्रदायिक जिन्न बोतल से बाहर आ गया और धीरे धीरे कांग्रेस को पूरी तरह खा गया। *जहाँ तक पिछड़ों का सवाल है, उनकी आबादी 1931 की जातीय गणना के अनुसार 54 प्रतिशत मानी जाती है लेकिन कांग्रेस से अधिकांश पिछड़े दूरी बनाए रहे जो विकल्प मिलने पर बीजेपी के पाले में चले गए। इतिहास बताता है नेहरू सरकार ने पिछड़ों के आरक्षण पर 1953 में काका कालेलकर आयोग बनाया था। आयोग ने 2399 पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सफारिश की लेकिन नेहरू ने जाति के आधार पर रिजर्वेशन नहीं देने की नीति के कारण इस को लागू नहीं किया। इसके बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग बनाया। इंदिरा सरकार को 1980 में 3743 पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की इस आयोग ने सिफारिश की लेकिन कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। दस साल बाद वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार ने इन सिफारिशों को लागू किया।* इससे अधिकांश पिछड़ी जातियां कांग्रेस से विमुख हो गईं। क्षेत्रीय दल भी क्योंकि अलग अलग प्रदेशों में एक दो दबंग पिछड़ी जातियों का नेतृत्व अधिक कर रहे थे, ऐसे में अधिकांश पिछड़े बीजेपी के साथ हिंदुत्व के अभियान में शामिल हो गए। पिछले दिनों राहुल ने रायबरेली में आज़ादी की दलित योद्धा वीरा पासी की विशाल मूर्ति का अनावरण कर दलितों को सांकेतिक सम्मान दिया है। अब राहुल गांधी ने इस भूल को सुधारने के लिए जिस तरह संविधान दलित पिछड़ों के आरक्षण, जातीय जनगणना और संवैधानिक समानता की मांग उठानी शुरू की है, उससे आशा है कि दलित पिछड़े भी बीजेपी से निराश हुए तो कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं।

Sunday, 28 June 2026

घरेलू औरत

*आज की बात...हिंदुस्तानी*
*घरेलू औरत नहीं है बेकार,*
*उसके काम की वैल्यू 30 हज़ार*
          सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों दुर्घटना मृत्यु के एक मामले में मुआवजा तय करते हुए घरेलू औरत के काम की कीमत 30,000 रुपए मासिक मानी है। साथ ही कोर्ट ने हर तीन साल में इसमें 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और अगर वो महिला कोई और काम भी करती हो तो उसकी कीमत अलग से जोड़ने को कहा है। 
     कुछ लोग केवल उन महिलाओं के काम की वैल्यू समझते हैं, जो घर से बाहर जाकर बिज़नेस या नौकरी करती हैं। उनका मानना है कि जो कमाकर नहीं लाता वो बेकार है। जबकि आप हिसाब जोड़ें तो महिलाएं घर में सुबह सबसे पहले उठती हैं और सबसे बाद में सोती हैं। घर से बाहर काम करने वाले हर पुरुष के काम के घंटे तय होते हैं, छुट्टी भी मिलती है, वो खुद भी अवकाश लेता है और वह एक्स्ट्रा काम करता है तो उसको डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान भी होता है। जबकि घर की महिला को ऐसा कुछ नहीं मिलता। उसको पर्याप्त आराम भी नहीं मिलता। साथ ही उसकी नींद के घंटे भी कम हो जाते हैं। अगर आप उनके खाना बनाने नाश्ता बनाने बार बार चाय बनाने सफ़ाई कपड़े व बर्तन धोने प्रेस करने बिस्तर बिछाने बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल त्यौहार पर अतिरिक्त तैयारी करने, शादी बर्थडे या बच्चा पैदा होने पर एक्स्ट्रा काम का बोझ झेलने, बच्चों को होम वर्क कराने, उनको स्कूल छोड़ने और लेने जाने, उनकी माता पिता की और अपनी व कभी कभी पति की भी दवाई लाने, लाइन में लगकर सरकारी राशन लाने, पर्दे साफ़ करने, घर के जाले झाड़ने, सोफों के कवर बदलने, बच्चों के खिलौने संभालकर रखने, मेहमानों को अटेंड करने, टंकी में पानी भरने, घर का सामान खरीदने को लिस्ट बनाने, परिवार की तरफ़ से दूसरे रिश्तेदारों के लेनदेन का हिसाब रखने, सबके सोने पर लाइटें बंद करने, घर में पेंट होने पर सामान हटाने फिर सेट करने, बाज़ार से कपड़ों सहित घरेलू इस्तेमाल का सामान खरीदने आदि का बेतहाशा काम वो करती हैं।
       देश की जीडीपी में घरेलू महिलाओं के काम का 17 प्रतिशत योगदान माना जाता है। फिर भी लिंग के आधार पर महिलाओं के घरेलू काम को फ्री समझा जाता है और उनको बेकार। जबकि आर्थिक समानता के हिसाब से देखें तो सबको वेतन नहीं मिलने बावजूद घरेलू महिलाओं का घर के काम में जो योगदान माना गया है, उतना देश के आधे से अधिक पुरुष भी नहीं कमाते। घरेलू महिलाएं एक तरह से राष्ट्र निर्माता हैं। वे देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाती हैं। ऐसी सभी महिलाओं को हमारा सलाम।

Sunday, 21 June 2026

पानी की वैल्यू समझिए

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*किफायत से खर्च करें पानी,* 
*वरना हो जायेगी परेशानी...*
         एक विद्वान ने कहा है। लोग चीज़ों की वैल्यू मिलने से पहले और उनके खोने के बाद ही समझते हैं। हम लोग जिस पश्चिमी यूपी में रहते हैं। उसको बहुत से वरदान कुदरत ने दिए हैं। उनमें से एक पर्याप्त पानी भी है। यही वजह है इस इलाक़े की खेती अच्छी है। घरों में भी जल निगम नगर निगम और स्थानीय निकाय भरपूर पानी सप्लाई करते हैं। कई शहरों में पानी मामूली टैक्स देकर अनलिमिटेड मिलता है। कुछ लोग इसका इसीलिए दुरूपयोग भी करते हैं। वे पानी भरकर नहीं रखते। टूटी खुली छोड़ देते हैं। पानी बेवजह बहता रहता है। वे पीने के इस पानी से अपने वाहन भी धोते हैं। अपने मकान दुकान के सामने खूब पानी का छिड़काव करते हैं। छतें भी बार बार पानी से धोते हैं। कुछ ने अवैध रूप से पालिका के पानी से व्यवसाय कर पैसा कमाने का रास्ता भी तलाश लिया है। कुछ घर के बाथरूम में घंटों नहाते रहते हैं। कुछ टॉयलेट के फ्लश को शौच के साथ ही पेशाब करने पर भी बार बार चलाते हैं। 
              कुछ शेविंग करते हुए वाश बेसिन का नल लगातार खुला रखते हैं। आर ओ में भी दो तिहाई पानी बर्बाद होता है। कुछ पानी भरने के लिए मोटर चलाकर भूल जाते हैं और घंटों पानी नाली में बहता रहता है। कुछ गमलों में वेस्ट पानी की जगह पेयजल ही डालते हैं। कुछ लोग छतें ठंडी करने को बहुत पानी रात को खुली हवा में सोने के लिये बर्बाद करते हैं। बर्तन धोने के लिए भी कुछ महिलाएं एक बार टूटी खोलकर तब तक बंद नहीं करती जब तक सब बर्तन नहीं धुल जाते। कुछ घर दुकान और सड़क को साफ करने की जगह सैंकड़ो लीटर पानी रोज़ डालते हैं। ऐसे लोगों से पानी वेस्ट न करने को कहो तो वे कहते हैं, हमारा वाटर कनेक्शन है, हम चाहे जितना पानी बहाएं आपको क्या प्रॉब्लम है। उनको कौन बताए ज़मीन के नीचे से आ रहा पानी उनका नहीं सब नागरिकों का है और लगातार वाटर लेवल नीचे जा रहा है। 
     *कम लोगों को पता है कि राजस्थान महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु और दिल्ली के कई इलाकों में ज़मीन के नीचे पानी पूरी तरह खत्म हो चुका है। यहां दो से पांच दिन में सरकारी और प्राइवेट टैंकर से पानी आता है। यहां प्रति व्यक्ति 20 से 40 लीटर पानी खरीदा जाता है। जबकि जरूरत 200 से 500 लीटर की होती है। यह पानी एक, डेढ़ से दो रुपए लीटर तक और कहीं कहीं 30 रु बोतल से 160 रु प्रति जार मिलता है। प्रति परिवार को 1500 से 8000 रु पानी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। इसलिए आज और अभी से पानी का दुरुपयोग बंद कर दीजिये।*

Friday, 19 June 2026

योग दिवस

आज का विचार... हिंदुस्तानी 
*योग धार्मिक नहीं शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है!*
              21 जून हर वर्ष योग दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पूजा पाठ नहीं बल्कि हर देश हर जाति और हर धर्म के मानने वालों के लिए वरदान है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में विभिन्न योग नियमित रूप से करने से न केवल शरीर बल्कि आपका मन भी निरोग और समग्र स्वास्थ्य लाभ होते हैं। योग से इंसान के दिल दिमाग़ को ऑक्सीजन की बेहतर सप्लाई होती है। उसके जिस्म के साथ उसके मन की कैफ़ियत भी बदलने लगती है। टेंशन ब्लड प्रेशर और दिल घबराने की शिकायत कम होने लगती है। योगा करने से पॉजिटिव सोच पैदा होती है। काल्पनिक डर सोच से दूर चले जाते हैं। समझ उदार होने लगती है। 
           संवेदनशील और संयमी व्यवहार भी योग से आने लगता है। समस्याओं से लड़ने की क्षमता और समाज के साथ मिलकर चलने की कला भी योग का बाई प्रोडक्ट माना जाता है।यह प्राचीन भारतीय परंपरा आसन, प्राणायाम, ध्यान और नैतिक अनुशासन पर आधारित है, जो शरीर और मन को संतुलित करती है। वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे Johns Hopkins, Healthline, NCCIH आदि) के अनुसार शारीरिक लाभ में योग आसनों से मांसपेशियां मजबूत होती हैं, जोड़ लचीले बनते हैं और गिरने का खतरा कम होता है। पीठ दर्द, गठिया और जोड़ों की समस्या में राहत कई अध्ययनों में योग को पीठ दर्द और गठिया के लक्षणों को कम करने में प्रभावी पाया गया है। यह रक्तचाप कम करता है, सूजन घटाता है और हृदय रोग के जोखिम को कम करता है।श्वसन, ऊर्जा और चयापचय में सुधार के अनुसार बेहतर सांस लेने से ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ती है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। बेहतर मुद्रा, हड्डियों की मजबूती, नींद की गुणवत्ता में सुधार और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होना भी इसके लाभ हैं। तनाव, चिंता और अवसाद में कमी गहरी सांस और ध्यान से कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है, मन शांत रहता है।
       एकाग्रता, जागरूकता और भावनात्मक संतुलन बच्चों से लेकर वयस्कों तक फोकस बढ़ाता है और आत्म जागरूकता विकसित करता है। समग्र कल्याण के हिसाब से देखें तो नींद बेहतर होती है, मूड अच्छा रहता है और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
           स्वामी विवेकानंद, बी.के.एस. आयंगर, पट्टाभि जोइस जैसे योग गुरुओं ने इसे पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाया।संयुक्त राष्ट्र की भूमिका देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया। इसे 175+ देशों ने समर्थन दिया। यहां तक कि सऊदी अरब जैसे देशों में भी स्कूल-कॉलेज में योग आ चुका है। नियमित अभ्यास से ही पूर्ण लाभ मिलता है। लेकिन पहले से बीमार दर्द के शिकार और सीनियर सिटीजन को ट्रेनर से जानकारी करके ही योग करना चाहिए।
*ज़ाहिदे तंग नज़र ने मुझे काफिर समझा ।* *और काफिर ये समझते हैं मुसलमान हूँ मैं ।।*

यूसुफ़ पठान का दलबदल

*एक अनैतिक समाज में सिर्फ़ सेलिब्रिटी ही ईमानदार कैसे होगा ?*
             *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                      बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गई। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए?क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था? 
        यहां यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है? यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बे ईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताख पर रख दिया है।
       यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही है और इंसान हिंदू हो या मुसलमान कभी भी बे ईमान हो ही सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये ललचा ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलाट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है। विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद कल मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा। 
            यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है उनको पुलिस ईडी सीबीआई इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो। वह भी इसी देश इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बे ईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है। यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है अब उनका दलबदल भी उसी डर लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों सांसदों को क्या बे ईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है? यह भी हो सकता है वे आज़म ख़ान उमर खालिद नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के मुख्याओं का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो अगर कोई इंसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा। 
*"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"*

Sunday, 14 June 2026

रक्तदान दिवस

*करनी हैं बातें दो चार... हिंदुस्तानी*
*रक्तदान करने वाले हैं फरिश्ते,*
*जो खून देकर बनाते हैं नए रिश्ते*
       खून का एक रिश्ता पैदाइशी होता है, दूसरा कुछ लोग फ़रिश्ता बनकर ज़रूरत मंद लोगों को खून देकर बनाते हैं। पहला रिश्ता खुद बन जाता है तो दूसरा इंसान अपनी मर्ज़ी से बनाता है। आज के दौर में जब आदमी पैसे प्रॉपर्टी या सेक्स के लिये किसी की जान लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है, ऐसे में कुछ इंसानों का बिना किसी स्वार्थ के रक्तदान करना और किसी अंजान इंसान की जान बचाना फरिश्ते से कुछ कम नहीं है।
      सरकारी ब्लड बैंक की बात करें तो ज़िले में उसकी क्षमता 350 यूनिट है। लेकिन वहां इस समय 119 यूनिट ही खून उपलब्ध है। उनमें भी केवल 79 यूनिट की जांच हुई है जो तत्काल किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है। इसके बदले पैसा नहीं किसी भी ग्रुप का उतने ही यूनिट खून देना होता है। आंकड़े बताते हैं खून की मांग हमेशा उपलब्ध खून से ज़्यादा बनी रहती है। ज़िले में 80 बच्चे थैलीसीमिया रोग के शिकार हैं। जिनको महीने में दो बार अनिवार्य रूप से ब्लड चढ़ाना होता है। इसके बदले वापस खून देने की कोई शर्त नहीं है। इसके अलावा एक्सीडेंट ऑपरेशन और एनीमिया के मरीजों को भी समय समय पर खून देना होता है। इस ब्लड बैंक में सबसे कम मिलने वाला ए नेगेटिव,ओ नेगेटिव, और एबी नेगेटिव खून सिर्फ एक से तीन यूनिट ही मौजूद है।
      सरकारी स्तर पर जो लोग ब्लड बैंक का प्रबंध करते हैं उनको उसका बाकायदा वेतन मिलता है। सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इस बड़ी मानव आवश्यकता सेवा और जनरक्षा को देखते हुए इसमें प्राइवेट संस्थाएं समाजसेवी संगठन और दयालु नागरिक भी सहयोग करने लगे हैं। ज़िले की कई निजी ब्लड बैंक संस्थाओं में नजीबाबाद ब्लॉक की हाजी फहीम अख्तर की टीम भी शामिल है, जो अब तक 2000 यूनिट से ज़्यादा खून डोनेट करा चुकी है। इसमें शैलेंद्र चौधरी जैसे कई अन्य लोगों का भी भारी सपोर्ट है। ज़िले में पचास से अधिक बार खून देने वालों में विकास सेतिया, राहुल राजपूत, नवेद फरीदी शामिल हैं। वहीं नहटोर के महबूब शेख 27 बार रक्तदान कर चुके हैं। उनको एक बार अपनी बच्ची की जान बचाने को खून की ज़रूरत पेश आई थी, तब से वे अपनी बेटी के जन्मदिन पर हर बार रक्तदान कर रहे हैं।
     रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है। सुरक्षित रक्त और रक्त उत्पादों (जैसे प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) की निरंतर जरूरत के बारे में लोगों को बताना। स्वैच्छिक रक्तदाताओं को सम्मान दिया जाना चाहिए। नियमित दान को प्रोत्साहित करना भी जरूरी है। दुनिया में सुरक्षित रक्त की कमी बनी रहती है, खासकर विकासशील देशों में। इस दिन नए रक्त दाताओं को जोड़ने और मौजूदा दाताओं को नियमित बनाने का प्रयास किया जाता है।14 जून की तारीख को रक्तदान दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन कार्ल लैंडस्टीनर के जन्मदिन के अवसर पर चुना गया है। वे ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1901 में ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज की (A, B, AB और O ब्लड ग्रुप)। इसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। इन्हें आधुनिक रक्तदान का "पिता" माना जाता है। इतिहास देखें तो 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य संगठनों (Red Cross, IFBDO, ISBT) ने इसे शुरू किया। 2005 में WHO की विश्व स्वास्थ्य सभा ने इसे वार्षिक वैश्विक कार्यक्रम बना दिया।
हर साल एक नया थीम चुना जाता है, जैसे "One Drop of Humanity. Give Blood. Save Lives." 2026 के लिए टैग लाइन है।
*ख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों, बनों में फिरते हैं मारे मारे,मैं उसका बंदा बनूँगा जिसको, ख़ुदा के बंदों से प्यार होगा।*

Tuesday, 9 June 2026

कांग्रेस बनाम अवसरवादी क्षेत्रीय दल

*अवसरवादी क्षेत्रीय दल इंडिया गठबंधन की ताकत नहीं कमज़ोरी हैं?*
_इक़बाल हिंदुस्तानी 
*सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है, यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।*
        सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और राहुल गांधी सोनिया गांधी ने ठीक ऐसा ही करते हुए अपने विधायकों और सांसदों की बगावत का शिकार लगातार कमज़ोर होती जा टीएमसी को इंडिया गठबंधन की बैठक में पूरे मान सम्मान से शरीक कर लिया। कांग्रेस भूल गई यह वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने कांग्रेस को बंगाल में तोड़कर टीएमसी बनाई थी। इतना ही ममता ने 2016 में कांग्रेस के जीते 44 और लेफ्ट के 32 विधायकों को भी तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया था। इसके बाद कांग्रेस के एकमात्र एमपी अधीर रंजन चौधरी को बहरामपुर से हराने के लिए दीदी गुजरात से क्रिकेटर यूसुफ़ पठान को ले आई और तमाम तिकड़मों से उनको हराकर ही दम लिया। इससे पहले दीदी कांग्रेस को झटका देने के लिए वाजपेयी सरकार में केंद्र में मंत्री बन गयीं थी। इतना ही नहीं दीदी ने 2011 का चुनाव जीतने से पहले बकायदा पत्र लिखकर बीजेपी से लेफ्ट और कांग्रेस को खत्म करने के लिए मदद मांगी। बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह वाजपेयी के निर्देश पर बंगाल गये और टीएमसी बीजेपी की इस बारे में व्यापक योजना बनी। फिर एक सोची समझी रणनीति के तहत दीदी ने एक के बाद कदम उठाते हुए लेफ्ट और कांग्रेस को बंगाल में पूरी तरह हाशिए पर पहुंचा दिया। उनके कार्यालयों पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को सताया गया और बीजेपी की शाह मोदी शैली अपनाते हुए उनको टीएमसी में आने को मजबूर किया गया। कुछ को बात नहीं मानने पर जेल भेजा गया, कुछ का कारोबार तबाह कर दिया गया। दीदी समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। ऐसे लोगों के लिये ही शायर ने कहा है....
*उसके होंठो की तरफ़ न देख वो क्या कहता है,*
*उसके कदमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।*

Monday, 8 June 2026

रियाजउद्दीन गद्दे वाला


*आज के माहौल में रियाजउद्दीन जैसे लोग फ़रिश्तों जैसे ही हैं*
              आज हम देखते हैं अधिकांश लोग इतने आत्ममुग्ध और असंवेदनशील होते जा रहे हैं कि थोड़े से फायदे के लिये किसी की जान ले लेते हैं या ज़रा सा त्याग करना पड़ जाए तो मुंह फेरकर निकल जाते हैं। लेकिन संतोष की बात यह है कि दूसरों के लिये अपना अब कुछ न्योछावर करने वाले रियाजउद्दीन जैसे संत लोग भी इसी दुनिया में मौजूद हैं।
            रियाजुद्दीन मंसूरी मालवीय नगर दिल्ली के हौज रानी इलाके में गद्दे और रजाई की दुकान चलाते हैं। वे पिछले चालीस साल से वहाँ रहते और व्यापार करते हैं। उनके बेटे अरमान भी उनके साथ काम करते हैं। वे सिविल डिफेंस वॉलंटियर भी हैं।
        पिछले दिनों 4 जून को जब इलाके के मशहूर फ्लोरिश स्टे होटल में जब आग लगी तो कुछ लोग जान बचाकर भाग गए, कुछ ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी लेकिन रियाजउद्दीन ने मुसीबत के टाइम भी अपने होश हवास पर काबू रखते हुए वो किया जो वो कर सकते थे।
          मालवीय नगर के हौज रानी में पांच मंजिला होटल में जिस समय भीषण आग लगी। तो लोग जान बचाने के लिए खिड़की से मदद मांग रहे थे। उस समय अफरातफरी का माहौल था। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि जब तक फायर ब्रिगेड और सरकारी सहायता नहीं पहुंचे तब तक इतनी बड़ी सीढ़ी कहां से लायें और इन लोगों की जान कैसे बचाएं। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हो गई ,और अनेक जख्मी भी हुए हैं।मरने वालों में कई विदेशी मेहमान भी शामिल थे। होटल के सामने ही रियाजुद्दीन की रज़ाई गद्दों की दुकान है। जब लोग ऊपरी मंजिलों से धुएँ और लपटों से बचने के लिए खिड़कियों से कूदने को मजबूर हुए, तब रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके बेटे अरमान ने तुरंत अपनी दुकान से दो दर्जन से अधिक गद्दे और रजाइयाँ निकालकर सड़क पर बिछा दीं। इससे कूदने वालों को गंभीर चोटों से बचाया गया।
      रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने कम से कम 8 से 10 लोगों की जान बचाई कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस संख्या को 20 तक भी बताया गया है। लेकिन यहां तादाद का सवाल नहीं है बल्कि रियाजउद्दीन की नीयत इरादे और इंसानियत की भावना का है। उन्होंने उन मृतकों को ढकने के लिए चादर भी उपलब्ध कराईं। जिनको तमाम कोशिशों के बावजूद जलने दम घुटने के कारण मरने से बचाया नहीं जा सका।
       मानवता के इस नेक काम में अगर आर्थिक नुकसान की बात करें तो रियाज़उद्दीन के लगभग दो से चार लाख रुपये के गद्दे रजाई का इस्तेमाल हुआ या जल गये, लेकिन उन्होंने इसकी फ़िक्र न करते हुए कहा कि “इंसानियत के लिए आगे आए, कुछ जानें बच पाईं, यही सबसे बड़ी बात है।”
 ख़बर है कि उन्हें सरदार पटेल सेवा दल जैसी संस्थाओं ने सम्मानित किया है और एक लाख रुपये की सहायता राशि दी गई है। समाजसेवी इंसानियत पसंद और आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले लोग उनके लिए सरकार से पर्याप्त मुआवजे की मांग भी कर रहे हैं क्योंकि उनका नेक काम के दौरान व्यापारिक नुकसान हुआ। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनको सम्मानित करने और पुरस्कृत करने का ऐलान भी किया है, लेकिन यह नहीं पता आज की राजनीति के चलते यह काम कब होगा या होगा भी नहीं?
        यह घटना इंसानियत और साहस की मिसाल बन गई है। रियाजुद्दीन जैसे आम नागरिकों ने दिखाया कि संकट के समय कोई भी फरिश्ता बन सकता है।
रियाजउद्दीन ने शायर की इस सोच को ताज़ा कर दिया है...
*ग़मो की आँच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग जो किसी पर भी डालकर देखो, तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो।*

Thursday, 4 June 2026

बेटी की शादी बनाम बेटी की जान

*क्या बेटी की शादी बचाना उसकी जान बचाने से ज़्यादा ज़्ारूरी है?* 
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
          भोपाल की ट्विशा शर्मा की हत्या या आत्महत्या तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगी लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि यह मामला न तो पहला है न ही आखि़री। हम इस बात पर भी अधिक ज़ोर नहीं देंगे कि दहेज़ की नाजायज़ मांग और नहीं मिलने पर बहु को सताना असहनीय यातनायें देना और अंत में क्रूरता की सारी सीमायें पार करते हुए उसको मार डालना हमारे समाज में कितना आम हो चुका है। हमारा सवाल यह है कि जब ट्विशा के माता पिता को यह बात साफ साफ पता लग चुकी थी कि उनकी बेटी को ससुराल में तरह तरह से परेशान किया जा रहा है और उसकी जान को ख़तरा है। तब भी वे अपनी बेटी को तलाक दिलाकर घर लाने की बजाये उसके घर आने पर बार बार समझाकर उसके ससुराल मौत के मुंह में क्यों भेज रहे थे? अगर ट्विशा के परिवार वाले कम शिक्षित या बेहद गरीब होते तब भी यह माना जा सकता था कि वे उसकी शादी फिर से करने के लिये इतना धन नहीं जुटा सकते थे। लेकिन ट्विशा का मामला इस कैटेगिरी मंे भी नहीं आता है। उसकी शादी डेटिंग एप के द्वारा समर्थ से दिसंबर 25 में हुयी थी। 12 मई 2026 को छह माह बाद ही ट्विशा ससुराल में फंदे से लटकी मिली। समर्थ एक वकील है जबकि उसकी मां ज़िला जज के पद से रिटायर हुयी थी। आरोप है कि ट्विशा की सास बेटे की पसंद की वजह से अतंर्जातीय विवाह को मजबूर हुयी लेकिन बहु को धार्मिक मंत्र याद नहीं होना और उसको बिना बताये घर से बाहर जाना स्वीकार नहीं था। सवाल यह है कि जो महिला ज़िला जज के पद पर रह चुकी हो और उससे न केवल दूसरे लोगों को न्याय देने की आशा की जाती हो बल्कि उससे अपनी सोच समझ और दृष्टिकोण प्रगातिशील तार्किक और विवेकशील होने की अपेक्षा की जाती हो वह भी इतनी दकियानूसी अंधविश्वासी और अमानवीय कैसे हो सकती है?
       बताया जाता है कि उसकी सास को अपनी बहु का अपनी मां से बहुत बात करना और उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता कोई और होने का भी शक था। ये सब विवाद बहस और आरोप ट्विशा के परिवार को भी पता थे। जिनको लेकर अकसर उसके घर में झगड़ा होता था। लेकिन ट्विशा के घर वाले उसको हर बार यही समझाते थे कि वह संयम से काम लो प्रतीक्षा करो और समय बीतने के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। ट्विशा ने अपने परिवार को यह भी बताया था कि उसका पति न केवल ड्रग लेता है बल्कि गुस्से में इतना बेकाबू हो जाता है कि वह उसके साथ किसी दिन कोई भी बड़ी अनहोनी कर सकता है। लेकिन उसके घर वाले उसको फोन पर मिलने पर और मायके आने पर हर बार यही समझाते रहे कि उसको अपनी ससुराल में ही एडजस्ट करना है। यानी एक तरह से उन्होंने अपनी बेटी की जान की कीमत पर भी उसके लिये घर वापसी के दरवाजे़ पूरी तरह बंद कर दिये। उन्होंने उस कहावत को चरितार्थ कर दिया कि एक बार बेटी घर से डोली में जायेगी तो फिर उस घर से उसकी अर्थी ही निकलेगी। इसका मतलब बेटी के साथ उसके ससुराल वाले कुछ भी अनर्थ और अन्याय अत्याचार करें लेकिन बेटी को उसके माता पिता घर वापस लाने की बात सोच भी नहीं सकते। हैरत और दुख की बात यह रही कि बेटी ने बार बार न केवल मौखिक सीधे मिलकर बल्कि व्हाट्सएप चैट में भी ससुराल में अपनी जान को ख़तरा बताया लेकिन ’’कन्यादान’’ करने वाला समाज असंवेदनशील बना रहा। कुछ लोग शादी को सात जन्मांे का संबन्ध बताते हैं। लेकिन वे यह नहीं मानते कि शादी एक जुआ भी है। जिसका होने के बाद ही पता चलता है कि सही हुयी या गलत। अगर हम यह बात स्वीकार कर लें कि हमसे रिश्ता चुनते हुए गल्ती भी हो सकती है तो उसको तलाक दिलाकर खत्म किया जा सकता है। जिस शादी में कुछ महीने बाद ही यह बात पता लग गयी थी कि न केवल पति नशेड़ी और गुस्सैल बल्कि ट्विशा की सास भी बहुत पुराने विचारों दकियानूसी और सख्त मिज़ाज की महिला है, उसमें किसी अनहोनी के होने की प्रतीक्षा करने की क्या ज़रूरत थी?
         हालांकि यह सच है कि लड़की चाहे उच्च शिक्षित हो अमीर हो या फिर बहुत कमाने वाली बड़े पद पर आसीन हो लेकिन अगर एक बार उसका तलाक हो गया तो समाज उसको ‘सेकेंड हैंड’ की संज्ञा देकर उसका पक्ष न जानकर उसकी दूसरी शादी के विकल्प कम कर देता है। साथ ही अगर उसके साथ कोई बच्चा भी मौजूद हो तो उसकी दूसरी शादी और भी कठिन हो जाती है। जबकि पुरूषों के साथ ऐसा नहीं होता है। यही हमारे समाज को दोगलापन अन्याय और पक्षपात है। तलाकशुदा और साथ में पहले पति से बच्चे वाली की तो बात ही क्या है अगर किसी लड़की या महिला के साथ बलात्कार हो जाये और उसमें उसकी ज़रा भी गल्ती नहीं हो तब भी समाज उसकी शादी तो दूर उसके साथ ही उसके परिवार का जीना भी हराम कर देता है। ट्विशा के मामले का एक दुखद पहलू यह भी है कि उसके केस से एक बार फिर साबित हुआ कि कानून सबके लिये बराबर नहीं है। पहले तो उसके केस को आत्महत्या बताकर पुलिस ने तीन दिन तक पूर्व जिला जज उसकी सास के दबाव में एफआईआर ही नहीं लिखी। बाद में जब तीन दिन बाद रपट लिखी भी तो पुलिस ने उसके परिवार की तहरीर के बजाये अपने हिसाब से हल्की धाराओं और कमज़ोर आरोपों के साथ खानापूरी की। इसका नतीजा यह हुआ कि उसकी सास अपने रसूख के बल पर कुछ ही घंटों मंे ज़मानत हासिल करके आराम से अपने घर चली गयी। इतना ही नहीं पुलिस ने उसके आरोपी पति को फरार होने का पूरा मौका दिया। बाद में ट्विशा के सेना में जनरल भाई ने जब रिटायर सैन्य कर्मियों के संगठन को यह सब बताया तो उन्होंने पुलिस प्रशासन और शासन के खिलाफ मोर्चा खोलकर रिपोर्ट तरमीम कराई, दोबारा ट्विशा की डैडबाॅडी का पोस्टमार्टम हुआ और उसकी सास की ज़मानत खारिज कर केस की जांच सीबीआई को दे दी गयी। इसके साथ ही भागने का कोई रास्ता न बचता देख उसके पति समर्थ ने भी कोर्ट में सरेंडर कर दिया। लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने उसको और उसकी मां पूर्व जज को रिमांड पर लेकर उस सख्ती और थर्ड डिग्री से पूछताछ नहीं की जिसके लिये हमारी पुलिस पहचान रखती है। शायर कहता है- तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी, जो शाख़ ए नाजु़क पे आशियाना बनेगा ना पायेदार होगा।
*नोट- लेखाक पत्रकारिता और आकाशवाणी से चार दशक से अधिक समय से जुड़े हुए हैं।*

Thursday, 28 May 2026

मॉडर्न बहु

*आज का विचार... हिंदुस्तानी*
*लोगों का काम है कहना,* 
*आपका हक़ है ज़िन्दा रहना*
            अब तक सुना पढ़ा था बच्चे ने फेल होकर प्रेमी प्रेमिका ने प्यार में धोखा खाकर या किसी ने कर्ज़ में डूबकर आत्महत्या कर ली। लेकिन अपनी पुत्र वधु स्नेहा के मॉडर्न लाइफ़ स्टाइल से आहत होकर सास ससुर ने हरियाणा में अपनी जान दे दी। इसके पीछे की वजह जानकर आपको भी दुख होगा। हैरत भी होगी। हुआ यह कि स्नेहा दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी एक खुले विचारों की लड़की है। स्नेहा की लव मैरिज हरियाणा के पानीपत के गांव नारा निवासी आशीष के साथ परिवार की सहमति से ही हुई थी। आशीष अपने माता पिता राजेश और पत्नी सुमन का इकलौता बेटा है। चूंकि स्नेहा मॉडर्न परिवार से थी और गांव के माहौल में ढलना नहीं चाहती थी। सास-ससुर को उसके छोटे कपड़ों से परेशानी थी। उसके पहनावे और रहन-सहन को लेकर अक्सर घर में टोका-टाकी होती थी। सुमन और राजेश चाहते थे कि बहू सूट और साड़ी पहने, लेकिन स्नेहा को यह रोकटोक मंजूर नहीं थी। 
      जिसकी वजह से परिवार में अक्सर झगड़ा होता रहता था। पिछले दिनों फिर इसी बात को लेकर जबरदस्त विवाद हुआ, जिसके बाद स्नेहा के सास ससुर राजेश और सुमन ने विषैला सल्फ़ाज़ खा लिया। दोनों को इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। एक ही घर से दो अर्थियां उठने से पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। 
         सुसाइड की खबर मिलते ही मौके पर पहुंची पुलिस ने बहू पर सुसाइड के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। परिजनों ने बताया कि बहू दिल्ली के मॉडर्न परिवार में पली-बढ़ी थी और वह शादी के बाद गांव के माहौल में ढलने को किसी कीमत पर भी तैयार नहीं थी। तलाक़ ही एक रास्ता था जिसके लिए पति तैयार नहीं था। 
      उसका पति भी उसको अपने तरीके से जीने की आज़ादी देने के पक्ष में था। वह दिल्ली का कल्चर छोड़ना नहीं चाहती थी। उसके पहनावे और रील्स बनाने के शौक को लेकर अक्सर सास ससुर और गांव वाले टोका-टाकी करते थे, जो धीरे-धीरे बड़े क्लेश का रूप लेने लगा। सवाल यह है कि आप जिस परिवेश में रहते हैं जिस सोच के हैं और जिस जीवन शैली को पसंद करते हैं उसके जैसी ही बहु लानी चाहिए, लेकिन क्योंकि लड़के ने सोशल मीडिया पर प्रेमिका बनी लड़की से अपनी पसंद से लव मैरिज की थी तो सास ससुर को शादी की सहमति नहीं देनी थी। अगर आपका लड़का नहीं मानता तो आपको उससे संबंध तोड़ लेने थे या सीमित कर लेने थे। अपने लड़के और मॉडर्न बहु को कहीं शहर में रखना था। 
     अगर गांव में रखना मजबूरी थी तो लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह नहीं करनी थी क्योंकि लोगों का काम है कहना, और आपका हक़ है सम्मान के साथ ज़िंदा रहना। गांव हो या शहर हर किसी को अपने हिसाब से शादी करना अपने तरीके से जीना और अपनी पसंद के कपड़े व खाना बुनियादी अधिकार है। इस अलग राय सोच और समझ को लेकर झगड़ा करना गांव वालों के ताने सुन कर अपमानित महसूस करना और यहां तक कि जान दे देना ठीक नहीं माना जा सकता। सास ससुर को हर हाल में ज़िंदा रहने का उसी तरह अधिकार है जैसे बहु को अपने छोटे कपड़ों और खुले विचारों के साथ जीना पसंद रहा है। अंजुम रहबर का एक शेर याद आ रहा है...
*उसकी पसंद और थी मेरी पसंद और,*
*इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा।*