Saturday, 1 August 2026

विपक्ष , आधा एनडीए में आधा जेल में?

*2029 के चुनाव तक आधा विपक्ष बीजेपी आधा जेल में होगा?*
       *_इक़बाल हिंदुस्तानी* 
       मानसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार परिसीमन जैसे अहम बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने में जी जान से लगी है। वर्तमान लोकसभा में उसको 362 सांसद चाहिए, आम आदमी पार्टी और टीएमसी के काफी सांसद तोड़कर 332 उसने जुटा लिए हैं। हाल ही में उसने शरद पवार की एनसीपी को एनडीए का समर्थन करने को तैयार कर लिया है। अब उसकी नज़र सपा और द्रमुक पर है, ये दोनों सीधे समर्थन नहीं भी देंगे तो इनको सदन से गायब रहने पर राज़ी किया जा सकता है, जिससे सदन की कुल संख्या कम हो जाएगी और इसके साथ ही टू थर्ड मेजॉरिटी का आंकड़ा भी नीचे आ जाएगा। 
           सपा जनता दल बीजू जनता दल राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यू सेक्युलर जनता दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तमिल मनीला कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस आदि अनेक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को तोड़कर ही बनी हैं, जिससे ये अपना अस्तित्व, सत्ता और कॉमन वोट बैंक बचाने के लिए बीजेपी से बड़ा दुश्मन कांग्रेस को समझकर अवसरवादी राजनीति अधिक करती रही हैं, लेकिन अब इनको समझना होगा बसपा जेडीयू शिवसेना एनसीपी बीजेडी टीएमसी की तरह बारी बारी से बीजेपी इनको खत्म कर देगी, क्योंकि बीजेपी से आरपार की लड़ाई लड़ने को जो विचारधारा, स्पष्ट लक्ष्य और अखिल भारतीय संगठन चाहिए वो केवल कांग्रेस के पास है। यही वजह है कि बीजेपी विरोधी दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी के साथ सभी वर्गों का कुछ हिस्सा क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कांग्रेस के साथ धीरे धीरे कई राज्यों में शिफ़्ट होने लगा है।
          महाराष्ट्र में शरद पवार आज आत्मघाती फैसला कर रहे हैं, कल ममता बनर्जी ने भी बीजेपी को सपोर्ट करके ऐसी ही गलतफहमी पाली थी। ममता समझती थी उनको विपक्ष के तौर पर उभर रही या मिलीभगत से आगे लाई जा रही बीजेपी से कोई ख़तरा नहीं है क्योंकि 28 प्रतिशत मुसलमान वोट का अधिकांश हिस्सा और लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिंदू वोट उनके साथ हमेशा रहेगा, जिससे उनकी जीत कोई नहीं रोक सकता। यही वजह थी दीदी ने कई बार कांग्रेस और विपक्षी दलों को धोखा दिया और एक बार विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार उप राष्ट्रपति के पद के प्रत्याशी का विरोध तक कर दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इंडिया गठबंधन को कोई भाव नहीं दिया और बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस व लेफ्ट को ज़ीरो पर आउट कर दिया। इतना ही नहीं जब बीजेपी के गवर्नर ने उनको सरकार चलाने में कदम कदम पर बाधाएं खड़ी करनी शुरू की तो उन्होंने एक तरह से मोदी शाह के सामने सरेंडर कर इंडिया गठबंधन से पूरी तरह किनारा कर लिया। शायद यही वजह थी कि वे बीजेपी को सियासी फ़ायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने गोआ राज्य तक चुनाव लड़ने पहुंच गईं। वे ऐसा करने में काफी हद तक सफल भी रहीं। 
         ठीक यही खेल आम आदमी पार्टी के केजरीवाल खेलते आ रहे थे। ऐसा लगता है वे एक तयशुदा मकसद के तहत दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर बीजेपी को दिल्ली की गद्दी सौंपने आए थे। वे सेक्युलर से ज़्यादा राष्ट्रवादी और हिंदूवादी दिखने पर ज़ोर देते थे।उन्होंने गुजरात में विधानसभा चुनाव में थोक में आप प्रत्याशी उतारकर बीजेपी को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में टीएमसी आप और शरद पवार की एनसीपी तक कांग्रेस के सेक्युलर वोट काटने का काम एक सोची समझी योजना के तहत कर रही थी। राजनीति के कुछ जानकारों को लगता है शरद पवार इतने घाघ राजनेता हैं कि उनके इशारे पर ही एनसीपी में पहली टूट हुई थी जिसमें उनके भतीजे अजीत पंवार ने सुबह सवेरे बीजेपी की अल्पमत सरकार बनाने के लिए पार्टी में विद्रोह करके डिप्टी सीएम की शपथ ले ली थी, यह अलग बात है उस समय यह सरकार बहुमत साबित करने से पहले ही अजीत की घर वापसी से गिर गई और शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विपक्ष की कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से नई सरकार बन गई। लेकिन उसके बाद शिवसेना को तोड़कर बनाई गई शिंदे गुट की सरकार में जिस तरह एनसीपी का बड़ा गुट अजीत पवार के नेतृत्व में शामिल हुआ उससे साबित हुआ यह पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। 
         कहने का अभिप्राय यह है कि ममता केजरीवाल शिंदे की तरह शरद पवार की विपक्षी गठबंधन के प्रति निष्ठा पहले से ही संदिग्ध रही है। इसकी एक और बड़ी वजह शरद पवार के संबंध पहले से अडानी से प्रगाढ़ होना भी माना जाता है। यह भी देखने को मिला कि एनसीपी में इस बड़ी टूट के बाद शरद पवार ने न तो असली पार्टी होने की कानूनी लड़ाई मजबूती से लड़ी और न ही कोई जन आंदोलन करके अपनी बची हुई पार्टी खड़ी करने की कोशिश की। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में जब बीजेपी पर बे ईमानी से चुनाव जीतने के आरोप लगे तब भी सीनियर पवार मुखर नहीं हुए। इसके बदले में उनको मोदी सरकार ने पदम् श्री एवार्ड दिया और उन पर ईडी का छापा डाले जाने की जो चर्चा थी उस पर कभी अमल नहीं हुआ। इसके साथ ही यूपी में बसपा उड़ीसा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव जिस तरह से विपक्ष में होते हुए कांग्रेस का विरोध और पर्दे के पीछे से बीजेपी को गाहे ब गाहे सपोर्ट करके यह गलतफहमी पाले थे कि इससे बीजेपी उनको बख्श देगी, आज इन दलों को खत्म कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि जो उनको सत्ता या अवसरवाद के लिए छिपा या खुला समर्थन देगा सबसे पहले उनको ही खत्म किया जाएगा। 
         बिहार में नीतीश इसकी बड़ी मिसाल हैं, उनकी पार्टी भी कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी की तरह बीजेपी के हाथों आज खत्म होने के कगार पर है। बेहतर हो कांग्रेस को अपने लिए बीजेपी से बड़ा ख़तरा समझने वाले क्षेत्रीय दलों को इंडिया गठबंधन से या तो दूर ही रखा जाए या उनका कांग्रेस में विलय की शर्त पर स्वागत किया जाए। जिस तरह से पलटू राम की छवि बनाने वाले अवसरवादी नीतीश को इंडिया गठबंधन ने 2024 के आम चुनाव से पहले भावी पीएम घोषित करने की शर्त पर शामिल करने से ठीक ही दो टूक मना कर दिया था, उसी तरह केजरीवाल और ममता जैसे विचारधारा सिद्धांत और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास न रखने वाले क्षेत्रीय दलों को भी गठबंधन में बिना शर्त शामिल करना ताकत की बजाय कमज़ोरी ही अधिक साबित होगा। मोदी सरकार विपक्ष को तोड़ने खत्म करने और ईडी सीबीआई इनकम टैक्स के ज़रिए टारगेट करके जिस तरह बीजेपी एनडीए या इंडिया एलाइंस से अलग होकर नया गुट बनाने को ब्लैकमेल करके तानाशाही दिखा रही है, उससे लगता है अगला आम चुनाव आते आते आधे विपक्षी नेता या तो बीजेपी को सपोर्ट करेंगे या फिर जेल में होंगे। 
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं*

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