Saturday, 1 August 2026

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा

*कॉकरोच आंदोलन सफल लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक बंद हो जाएगा?*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
                 कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खत्म कराने को मजबूरी में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्ती़फा तो हो गया लेकिन संघ बीजेपी और मोदी की कार्यशैली को जानने वालों को पता है, इससे पेपर लीक होना बंद हो ही जाएं यह ज़रूरी नहीं है। अलबत्ता युवाओं की मांग पूरी होने से उनको लगा है कि सरकार झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। जहां तक सीजेपी के आंदोलन का सवाल है उसकी तुलना जे पे या अन्ना के आंदोलन से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि उनमें संगठन प्रबंधन और सरकार से मांगो पर वार्ता करने के लिए निगोशिएशन करने वाले अलग वरिष्ठ अनुभवी और विशेषज्ञ नागरिक मौजूद थे, जो इस आंदोलन में नज़र नहीं आये। सोनम वांगचुक जब सीजेपी के आंदोलन में शरीक हुए तब यह लग रहा था कि अब वे इसकी कमान सीजेपी के मुखिया अभिजीत दीपके से अधिक बेहतर संभाल सकते थे लेकिन उनको पुलिस ने जबरन उठाकर हॉस्पिटल भेज दिया, जिससे वे मुख्य मंच से बाहर हो गए। सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास के नेतृत्व में जो लोग स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से मिलने गए वे पहले दिन तो निराश होकर लौटे लेकिन दूसरे दिन शिक्षा मंत्री को हटवाने में सफल हो गए।
         दरअसल शिक्षा मंत्री को हटाने से यह व्यापक समस्या हल होने वाली नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक या आंदोलन की बड़ी सफलता तो लोगों को दूर से दिखाई दे रही है, है भी लेकिन ठीक ऐसा ही होगा जैसे किसी अस्पताल का पूरा सिस्टम सुविधाएं मशीनें नियम कानून उपलब्ध सीमित दवायें और इलाज की सीमाएं बदले बिना डॉक्टर बदलकर रोगी के ठीक होने की आशा करना। हालांकि सीजेपी के घोषणा पत्र में न्यायिक स्वतंत्रता, महिला आरक्षण, चुनावी अखंडता, मीडिया की जवाबदेही और कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल हैं लेकिन फ़िलहाल उन्होंने शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, नीट परीक्षा बार बार रद्द होने से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने के साथ आंदोलन करने वाले बच्चों के खिलाफ़ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करने की मुख्य मांग ही सरकार से मनवाई हैं । सीजेपी के युवा जोश में हैं। उनको अनुभव अभी नहीं है। वे राजनीति की बारीकियां शासन प्रशासन की चालें भी नहीं समझते। साथ ही इस सरकार की बनावट और काम करने के परंपरा से अलग हटकर तौर तरीके और आंदोलन व विरोध को लेकर उसकी नीति भी शायद नहीं जानते थे। उनको यह भी नहीं पता शिक्षा मंत्री ही नहीं सभी कैबिनेट मंत्री और अन्य मंत्री भी पीएमओ यानी मोदी और संघ के दिशा निर्देश से ही सारे काम, फैसले और बयान जारी करते हैं। 
            यहां तक कि बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी बिना मोदी शाह और संघ की सहमति के कोई बड़ा फैसला नहीं कर सकते। यही वजह है कि बीजेपी में मंत्री या मुख्यमंत्री बनने के लिए जनाधार योग्यता और अधिक राजनीतिक अनुभव नहीं वफ़ादारी कम योग्यता और लोकप्रियता विहीन होना मैरिट माना जाता है। रिकॉर्ड बताता है कि संघ बीजेपी और मोदी कभी भी लोकतांत्रिक उदार और संविधान के अनुसार चलने वाले नहीं रहे हैं। वे सांप्रदायिक कट्टरवादी और पूंजीवादी सोच के होने की वजह से अधिनायकवादी अहंकारी और एक एजेंडे के हिसाब से ही चलते हैं। यही वजह है कि नैतिकता जनभावनाओं का सम्मान और विपक्ष सिविल सोसायटी या विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद फैसले लेने में उनका तनिक भी विश्वास नहीं रहा है अन्यथा नोट बंदी, देश में लॉक डाउन और जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था को इतना नुकसान नहीं हुआ होता। पेट्रोल में बिना समुचित चर्चा तैयारी या वाहनों की बनावट की जांच के सीधे दस से बीस प्रतिशत एथेनॉल मिलाने से खराब हो रही कारों का यह देश में ऐसा ही चौथा मनमाना थोपा गया एकतरफा फैसला है।
          यही वजह है कि मोदी और अन्य बीजेपी सरकारें भ्रष्टाचार अपराध महंगाई बेरोजगारी और ग़रीबी को कोई बड़ी समस्या ही नहीं मानते। जब प्रॉब्लम ही स्वीकार नहीं करते तो इनके समाधान के लिए भी कुछ ठोस काम नहीं करेंगे। मोदी सरकार अपने 12 साल के कार्यकाल में केवल उन आंदोलनकारी किसानों के सामने झुकी थी जिन्होंने तमाम तिकड़मों रुकावटों और सरकारी दमन के बावजूद दिल्ली बोर्डर पर एक साल से अधिक धरना और 700 से अधिक किसानों की जान का बलिदान दिया था। उसकी वजह भी देश की आबादी में किसानों की बड़ी संख्या और यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव में बीजेपी की हार का खतरा था। मोदी सरकार विपक्ष को संसद या बाहर भी विरोध तक नहीं करने देती, साथ ही विपक्ष के सांसदों को शामिल कर बनी संयुक्त संसदीय समितियों को अधिकांश बिल विवाद के बाद भी विचार को या तो भेजे नहीं जाते और अगर मजबूरी में कभी कभी सदन चलाने को ऐसे विधेयक विचार विमर्श को दिए भी जाते हैं तो उनकी सिफ़ारिश को सरकार स्वीकार ही नहीं करती। युवाओं के वर्तमान आक्रोश नाराज़गी और विरोध का कारण मोदी के हर साल दो करोड़ नए रोज़गार का वादा पूरा नहीं होना भी था। इसके साथ ही मोदी जिन अडानी अंबानी जैसे चंद मित्र पूंजिपतियों के हाथ देश की सारी संपत्ति संसाधन और दौलत लुटाते आ रहे हैं उससे भी युवाओं में गुस्सा है। यह ठीक है कि सरकार के हिंदू मुस्लिम एजेंडे को धता बताकर कॉकरोच आंदोलन ने दो सफलताये शुरू में ही हासिल कर ली थी, जिनमें एक आंदोलन करने पर सरकार की बदले की कार्यवाही का भय ख़त्म होना और दूसरा आंदोलन करने वालों से सरकार का अब तक बात नहीं करने का घमंड तोड़ना शामिल था। यह सरकार बड़े से बड़े फैसले बिना सोचे समझे बिना संसद को विश्वास में लिए और बिना नागरिकों से चर्चा किए लेती रही है। 
           6 जून को जब कॉकरोच आंदोलन शुरू हुआ तो सरकार ने उससे तत्काल बात नहीं की लेकिन जब तनाव टकराव और विवाद 20 जुलाई को संसद चलो के आव्हान से काफी बढ़ गया तो समझौता वार्ता शुरू हुई। इसके कई दिन बाद पीएम मोदी ने पेपर लीक के मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनने का कानून बनाने और उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी को हटाने का आदेश देकर ऐसा संदेश देना चाहा जैसे ये कोई बड़े क्रांतिकारी फ़ैसले हों। इसके साथ ही मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक कानून में दस साल सज़ा और दस करोड़ जुर्माने की भी व्यवस्था कर दी है, लेकिन जैसे जनलोकपाल बना लेकिन करप्शन खत्म नहीं हुआ वैसा ही इस कानून का भी हश्र होगा। अंत में कोई विकल्प न बचने पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लिया गया, इसमें में भी पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी नहीं स्वीकार की गई है। मोदी सरकार की विश्वसनीयता साख और छवि अब ढलान पर है, जिससे उसके वादों दावों और आश्वासनों पर सीजेपी क्या कोई भी विश्वास करने को तैयार नहीं होता है। उसने हर समस्या का समाधान हिंदू मुस्लिम झूठ और नफ़रत को बनाकर गोदी मीडिया से ऐसा नैरेटिव बनाकर चुनावी जीत का मैकेनिज्म विकसित कर लिया है जिससे धर्मेंद्र प्रधान को तो क्या कल मोदी को भी अगर पद से हटा दिया जाए तो भी जो नया प्रधानमंत्री बनेगा वो संघ के उसी एजेंडे पर वैसे ही चलेगा जैसे आज मोदी चल रहे हैं। हम सीजेपी के आंदोलन की सफलता को कम करके नहीं आंकना चाहते लेकिन यह ज़रूर कहेंगे कि केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पेपर लीक की समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि इसके लिए पूरी सरकार व्यवस्था और काफी सीमा तक हमारा अनैतिक समाज भी उत्तरदायी है।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

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