Saturday, 1 August 2026

कॉकरोच आंदोलन

*क्या कॉकरोच आंदोलन अपना मक़सद हासिल कर सकेगा?*
              *इक़बाल हिंदुस्तानी*
            मई माह में कुछ छात्रों और युवाओं ने ऑनलाइन कॉकरोच जनता पार्टी बनाई थी। अभिजीत दीपके के नेतृत्व में बनी इस पार्टी के उसी दिन दो करोड़ फॉलोवर बनने पर लोगों को हैरत हुई थी। इसके मुखिया दीपके जब अमेरिका से 6 जून को भारत लौटे तो युवाओं ने उनको सर आंखों पर लिया। जैसा कि इस पार्टी के नाम से ही लगा कि यह एक सटायर यानी हास्य व्यंग्य के तौर पर मज़ाक में बना हल्का संगठन है। लेकिन जब इसी बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर युवाओं ने पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन का पहला दौर शुरू किया तो लोगों ने इस पार्टी को संजीदगी से लेना शुरू किया। 
                सीजेपी की शुरू में एक ही मांग थी कि बार बार लीक हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर की जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफ़ा दें। जब यह मांग धरने से पूरी नहीं हुई तो सीजेपी ने 20 जून से जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन छेड़ दिया। इस दौरान सोशल एक्टिविस्ट और शिक्षाविद सोनम वांगचुक सीजेपी के जंतर मंतर पर किए जा रहे आंदोलन में समर्थन देने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। उन्होंने 19 दिन भूख हड़ताल की। उनका वज़न 9 किलो से ज्यादा घट गया। मामला दिल्ली हाईकोर्ट गया। हाईकोर्ट ने सरकार को सोनम की सेहत का ख़्याल रखने को कहा। सरकार ने सोनम को पुलिस से उठवा कर हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया। इसके बाद सीजेपी के मुखिया दीपके ने आंदोलन को तेज़ कर दिया। उन्होंने खुद आमरण अनशन करने का ऐलान कर दिया। लेकिन एक दिन बाद ही उनको कुछ वरिष्ठ नागरिक अनुभवी समाजसेवी और सुलझे हुए राजनेता यह समझाने में सफल हो गए कि धरने अनशन और प्रदर्शन का इस सरकार पर कोई असर नहीं होता। इसके बाद दीपके ने एक दिन में ही अनशन खत्म कर संसद मार्च का ऐलान कर दिया। अब कॉकरोच पार्टी की मांगे बढ़कर शिक्षा मंत्री के रिजाइन के साथ साथ पेपर लीक के सदमे से मरने वाले 21 छात्रों के परिवारों को एक एक करोड़ मुआवज़ा और सोनम वांगचुक को रिहा करने तक बढ़ चुकी हैं।
                इस दौरान जब सीजेपी ने जंतर मंतर से संसद की तरफ़ कूच किया तो आश्चर्यजनक ढंग से उनको संख्या चार पांच हज़ार से बढ़कर अचानक एक लाख से भी अधिक हो गई। इस मार्च की अनुमति सरकार से नहीं मिली थी। पुलिस ने संसद से काफी पहले छात्रों के मार्च को रोका। जब वे नहीं रुके तो उन पर लाठी चार्ज किया गया। आरोप है कि पुलिस ने पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक और शॉक बेटन यानी करंट लगाने वाली लाठी का इस्तेमाल भी किया, लेकिन सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया। यह भी चर्चा है कि आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने को पुलिस और अन्य अर्ध सैनिक बलों के साथ सिविल ड्रेस में ऐसे लोग भी लाठी चार्ज कर रहे थे जिनके बारे में यह स्पष्ट नहीं है कि बिना वर्दी बिना बैज और बिना नेम प्लेट के ये प्राइवेट फोर्स किन लोगों की थी। बाद में पुलिस ने इनको अपने ही जवान बताया। कई छात्र छात्राओं ने लाठी चार्ज के दौरान गंभीर चोटें आने जानबूझकर घायल करने और अश्लील हरकतें करने के भी आरोप लगाए हैं। निष्पक्ष जांच के बाद ही पता लगेगा कि प्राइवेट लोग कौन थे और जो आरोप लग रहे हैं उनमें कितना सच है और कितनी अफवाहें हैं।
          समय रहते सरकार ने सीजेपी से बात कर इस आंदोलन को निबटाने की कोशिश नहीं की। जिस दिन संसद मार्च हो रहा था और छात्र छात्राओं पर लाठी चार्ज हुआ उसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने सीजेपी के नेताओं से बात की, लेकिन तत्काल उनकी एक भी मांग नहीं मानी। इससे आंदोलकारी और भड़क गए। बर्बर लाठी चार्ज और युवाओं को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की शिकायतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन कई ग़ैर ज़रूरी और अपेक्षाकृत कम महत्व के मुद्दों पर सु मोटो लेने वाली बड़ी अदालतों ने तत्काल सुनने से इन मामलों को यह कहते हुए मना कर दिया कि कोर्ट को सियासत में मत घसीटिए और इन मामलों में फौरन सुनवाई कोर्ट का कीमती टाइम ख़राब करना माना जाएगा। ऐसे जनहित के मुद्दों पर याचिकाएं सुनते हुए अदालतें काफ़ी समय से इसी तरह का रुखा रुख अपना रही हैं, जिससे सरकार को काफ़ी राहत मिल जाती है।
            कॉकरोच आंदोलन सफल होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मोदी सरकार की अब तक की कार्यशैली देखते हुए यही संकेत मिल रहे हैं कि वह सीजेपी की मांगो को नहीं मानेगी। केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बहुत पहले कह चुके है कि हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते। यह लेख लिखे जाने तक आंदोलन जारी है। घायल छात्र छात्राएं गुस्से में हैं। वे फिर से जंतर मंतर पर जमा हो रहे हैं। उन्होंने मोदी सरकार के इस मिथक को तो तोड़ दिया है कि लोग डर से शासन प्रशासन और पुलिस के खिलाफ़ आंदोलन नहीं करेंगे। इसके साथ ही देर से सही लेकिन सरकार ने सीजेपी नेताओं से बात करके यह भी भ्रम तोड़ दिया कि यह सरकार विरोध करने वालों से बात तक नहीं करती।
          सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस द्वारा कुछ युवाओं को कॉकरोच बताने के जवाब में बनी कॉकरोच जनता पार्टी आज मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है। उसने आंदोलन करके दो मकसद तो शुरू में ही हासिल कर लिए थे। इनमें एक निडर होकर सरकार के खिलाफ़ आंदोलन और दूसरा विरोध करने वालों से कभी भी बात नहीं करने वाली मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा द्वारा सीजेपी नेताओं से समझौता वार्ता करना। अब जबकि विपक्ष भी खुलकर सीजेपी के आंदोलन के साथ खड़ा हो गया है, सरकार के लिये और मुसीबत बढ़ गई है। सरकार इनकी मांगे मानकर अपनी अब तक किसी आंदोलन के सामने नहीं झुकने की परम्परा नहीं तोड़ना चाहेगी। उसे यह भी डर है कि मंत्री प्रधान का इस्ती़फा लिया तो कल प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा न मांगा जाने लगे। साथ ही ऐसी मांगे बढ़ते जाने और माने जाने से सरकार दब्बू डरपोक और कमज़ोर नज़र आ सकती है। हर विरोध करने वाले को सरकार देशद्रोही खालिस्तानी पाकिस्तानी और विदेशी साज़िश रचने वाला अर्बन नक्सल बताती रही है। मोदी सरकार खुद को सेवक की जगह स्वामी और जनता को आज्ञाकारी सेवक बनाना चाहती है। वह विपक्ष को भी विरोध एक सीमा तक ही करने देती है। केवल एक साल से अधिक आंदोलन करने वाले किसान ही 700 लोगों की बलि देकर मोदी सरकार को पहली बार कृषि कानून वापस लेने को मजबूर कर सके थे। देखना यह है कि सरकार फिर से झुकती है या युवा आंदोलन बिना मकसद हासिल किए कुछ दिन में खत्म हो जाएगा।
*नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।*

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