Sunday, 5 July 2026

जनविरोधी फ़ैसले कैसे रुकेंगे?

*सरकारों के जनविरोधी फ़ैसले रोकने के सारे लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो चुके हैं?*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
        ख़बर है कि बंगाल सरकार समाज विरोधी गतिविधियों को रोकने के नाम पर एक नया कानून ला रही है। इस कानून के तहत किसी को भी एक साल तक बिना ज़मानत दिए जेल में रखा जा सकेगा। इस दौरान उसकी प्रॉपर्टी नीलाम कर किसी आंदोलन के दौरान हुई सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जाएगी। ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट के एक से तीन वर्तमान या पूर्व जजों की सलाहकार कमेटी ही कर सकेगी। ऐसे ही जनविरोधी कानून पहले से यूपी गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु में मौजूद हैं। किसी को अपराध की सज़ा मिले इससे कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन सरकार अपने किसी संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी फ़ैसले का विरोध करने पर लोगों को एक साल के लिए बिना ज़मानत दिए जेल में डाल दे यह कैसे कानून का राज माना जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के यूएपीए कानून में भी पहले से ऐसे ही कठोर प्रावधान हैं जिनमें आरोपी को जेल में रहकर खुद को निर्दोष साबित करना होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में भी ऐसे ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ प्रिवेंटिव तरीके अपनाए जाते रहे हैं जिनकी नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों से लगातार आलोचना हुई है। बंगाल सरकार ने स्कूलों में मिड डे मील में अंडे परोसना भी बंद कर दिया है। इसके साथ ही पिछड़ों का सरकारी सेवा और शिक्षा में आरक्षण 17 से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले ईदे कुर्बान पर गाय काटने पर रोक लगाकर उन हिंदू पशु पालकों का भी भारी नुकसान किया था जो साल भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा कुछ कमाई के लिए करते हैं। टेलीग्राफ जैसे बड़े अखबार के एडिटर रहे राजगोपाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार का नाम भी एसआईआर से गायब हो गया है। अब उनका पासपोर्ट भी रिन्यू नहीं हुआ, जिससे वह अपनी बेटी की शादी तक में विदेश नहीं जा सके। इसका कारण टेलीग्राफ में मोदी और बीजेपी सरकार की तीखी आलोचना को भी माना जा रहा है। अगर इतने बड़े पत्रकार के साथ यह बदले की भावना काम कर सकती है तो सोचिए आम आदमी का क्या होगा जो सरकार के गलत कामों का विरोध करता होगा। बीजेपी सरकारों ने धर्म परिवर्तन अंतरधार्मिक प्रेम विवाह और लिव इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य करके अप्रत्यक्ष रूप से असंवैधानिक रोक लगा दी है, क्योंकि अनुमति मांगने पर अनुमति देने की बजाए ये सरकारें ऐसे लोगों का उत्पीड़न शुरू कर देती हैं।कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में रहते जब आतंक विरोधी टाडा और पोटा जैसे विवादित कानून बनते थे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी समीक्षा करता था और वे कई बार निरस्त भी किए गए। लेकिन बीजेपी के राज में विपक्ष की सरकारों के जनहित के कानूनों को तो उसके राज्यपाल और यहां तक कि राष्ट्रपति तक सालों तक रोक कर बैठे रहते हैं लेकिन बीजेपी की राज्य सरकारों का कोई भी विवादित कानून वे कभी नहीं रोकते। गोदी मीडिया भी ऐसे जनविरोधी कानूनों की आलोचना के बजाए उसके पक्ष में एक सुनियोजित अभियान चलाता हुआ नज़र आता है। सबसे दुख और चिंता की बात तो यह है कि अब ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए अव्वल तो सुप्रीम कोर्ट तैयार ही नहीं होता और जब तब याची को हाईकोर्ट जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेता है। जब कोर्ट ऐसे मामले अनचाहे ढंग से सुनता भी है तो सालों तक टालता रहता है। उसके बाद बेंच के किसी जज का ट्रांसफर या रिटायरमेंट होने पर नई बेंच बना देता है। फिर लंबे समय तक वह बेंच फिर से पूरा मामला सुनती है। उसके बाद भी अकसर बेंच फैसले को सुरक्षित रख लेती है। इससे कई बार जब फैसला लंबे समय बाद आता भी है तो मूल मुद्दा ही खत्म हो चुका होता है। जैसे कई बार महाराष्ट्र सहित कई राज्य सरकारों सांसदों और विधायकों के चुनाव को लेकर हुआ है। वैसे तो अधिकांश मामलों में सरकार और कोर्ट एक ही पेज पर नज़र आते हैं। हमारे चीफ़ जस्टिस कुछ भी दावा करें लेकिन उनके कई फैसले चीख़ चीख़ कर बोल रहे हैं कि वे फैसले जनता के कम सत्ता के पक्ष में अधिक झुके नज़र आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिए। एसआईआर से जुड़े विवादों पर चुनाव आयोग ने पिछले कई वर्षों में विपक्ष ही नहीं न्यूटल लोगों को भी बुरी तरह निराश किया है। उमर खालिद और उनके साथ कई साल से जेल में बंद लोगों का मामला तो और भी गंभीर है। आज तक उनको चार्जशीट दाखिल कर दोषी साबित नहीं किया गया है लेकिन बेल नियम जेल अपवाद कहने वाला कोर्ट उनको फिर भी ज़मानत नहीं देता है। सी ए ए जैसे विवादित कानून के खिलाफ़ उन्होंने शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। उस दौरान ही सुनियोजित दंगा हुआ और उनको उनके साथियों सहित दंगे के आरोप में गम्भीर धाराएं लगाकर आज तक जेल में बंद रखा गया है। महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा चलाने वाले लाखों ड्राइवर को मराठी जानना अनिवार्य कर दिया गया है, नहीं तो उनके ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू नहीं किए जाएंगे। यूपी में लंबे समय से फ़र्ज़ी एनकाउंटर और हाफ एनकाउंटर हो रहे हैं। किसी भी अपराध का आरोप लगाकर किसी को भी पकड़ा जाता है। सुप्रीम कोर्ट के स्टैंडिंग ऑर्डर के बावजूद आरोपियों के घर पर तत्काल नियम विरुद्ध बुलडोजर चला दिया जाता है। अब ऐसे मामलों में न तो विपक्ष बोलता है और न ही अपने ही आदेशों की धज्जियां उड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय कोई सख्त कार्रवाही करता है। देश के इसी सबसे बड़े राज्य में किसी को भी किसी तरह के मीट के साथ पकड़कर गौमांस बताया जाता है, पीटा जाता है, मॉब लिंच कर दिया जाता है, बाद में मांस की जांच में आरोप झूठे निकलते हैं। कई अल्पसंख्यकों के स्लॉटर हाऊस ऐसे ही आरोप लगते ही सील कर दिए गए हैं। उन पर गैंगस्टर एक्ट लगाकर उनके घर दुकान और दूसरी प्रॉपर्टी भी ध्वस्त कर दिए जाते हैं। नागरिकता साबित करने को लेकर एसआईआर में जिन प्रमाण पत्रों को मान्यता दी गई थी अब उनको भी मानने से इनकार किया जा रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट तक को मात्र यात्रा दस्तावेज़ बताकर नागरिकता साबित करने का डाक्यूमेंट होने से मना कर दिया है। उधर गौहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक बुजुर्ग द्वारा 15 कागज़ दिखाने के बावजूद भारतीय नागरिक मानने से मना कर दिया, जबकि इन कागज़ात में 1951 की वो एनआरसी भी थी जिसमें उसके दादा दादी का नाम मौजूद है। अब इस अभागे असमी मुसलमान के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का ही विकल्प बचा है लेकिन वहां के लिये महंगा वकील करना अव्वल तो सबके बस की बात होती नहीं, दूसरे सबसे बड़ी अदालत भी ऐसे मामलों में लोगों को अकसर निराश ही कर रही है, इसलिए किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है। कभी कभी कुछ हाईकोर्ट अपवाद स्वरूप ऐसे फैसले और टिप्पणियां कर देते हैं जिनसे हल्की सी उम्मीद की किरण दिखती है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट की एक बेंच ने कहा सरकार लोगों को गुलाम बनाना चाहती है, क्योंकि उसके ख़िलाफ़ आंदोलन या विरोध करते ही कई मुकदमे लोगों पर दर्ज हो जाते हैं। यूपी के कांग्रेस के एक बड़े छात्र नेता का कहना है कि उस पर सरकार के विरोध में आंदोलन करने के आरोप में 39 मुकदमे अब तक दर्ज हो चुके हैं। उधर नेता विपक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि सरकार धरना प्रदर्शन तो दूर किसी की हत्या होने पर उसके परिवार से भी हमें मिलने नहीं देती, ऐसा लगता है राज्य में इमरजेंसी लगी है। बंगाल और बिहार में एसआईआर से छूट गए लोगों को वहां की सरकारों ने राज्यों की समाज कल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित करने ऐलान पहले ही कर दिया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट सुनवाई दौरान 27 लाख लोगों को अगली बार वोट दे देने की बात कहकर उनके नागरिक अधिकारों की मज़ाक भी उड़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनावों की निष्पक्षता पहले ही संदेह के घेरे में हो कोर्ट असंवैधानिक सरकारी फैसलों को रोकने को तैयार नहीं हो और सरकार के जनविरोधी फ़ैसलों का किसी भी स्तर पर विरोध भी नहीं करने दिया जा रहा तो जनता के पास क्या विकल्प बचता है?

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