Thursday, 26 February 2026

राहुल गांधी को जेल क्यों नहीं भेजते?

*राहुल गांधी देश के लिये ख़तरा हैं तो सरकार जेल क्यों नहंी भेजती?* 
0 इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों को देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
    *-इक़बाल हिन्दुस्तानी*
      कांग्रेस नेता और लीडर आॅफ अपोज़ीशन राहुल गांधी ने पिछले दिनों मोदी सरकार बीजेपी और संघ पर कई गंभीर राजनीतिक आरोप लगाये। संसद में अपनी बात रखते हुए जब उनको आरोपों को साबित करने की चुनौती दी गयी तो उन्होंने प्रमाण प्रस्तुत करने की हामी भरी। लेकिन तभी सदन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भाजपा नेता जगदंबिका पाल ने मौके की नज़ाकत समझते हुए सरकार की और किरकिरी होने से बचाने के लिये राहुल गांधी को निर्देश दिया कि सबूत पेश करने की कोई ज़रूरत नहीं है, राहुल जल्दी से जल्दी अपनी बात खत्म करें। दरअसल राहुल गांधी ने कुछ समय से मोदी सरकार के खिलाफ बहुत कड़ा रूख़ अपना रखा है। उन्होंने संसद में बोलते हुए आरोप लगाया कि पूर्व सेनाध्यक्ष नरवाणे ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि जब चीन हमारे देश में घुसपैठ कर रहा था तो उनको बार बार अनुमति मांगने पर भी चीन को कड़ा मुंहतोड़ सैनिक जवाब देने की तत्काल छूट नहीं दी गयी। जबकि पीएम मोदी बार बार अपनी छाती 56 इंच बताकर देश को झुकने नहीं देने का झूठा दावा करते रहे हैं। राहुल गांधी का यह भी दावा था कि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौता किया है। उसमें देश के हितों से समझौता किया गया है। इस एकतरफा और ट्रंप के दबाव में किये गये एग्रीमेंट से भारत के किसानों की कमर टूट जायेगी। राहुल गांधी का यह भी आरोप रहा है कि चर्चित और विवादित यौन आरोपों से भरी एप्सटीन फाइल में मोदी सहित उनके एक खास केंद्रीय मंत्री और उनके करीबी एक बड़े उद्योगपति का नाम आया है। इसके साथ ही संसद में जब भी मौका मिलता है, राहुल गांधी मोदी सरकार पर चुनाव आयोग के द्वारा वोट चोरी कर चुनाव जीतने का गंभीर आरोप भी बार बार लगाते आ रहे हैं। इन जैसे और भी कई बड़े राजनीतिक आरोप राहुल गांधी मोदी सरकार के साथ ही बीजेपी और आरएसएस पर लगातार लगाते आ रहे हैं। इसमें कोई नई या आश्चर्य की बात भी नहीं है। क्योंकि विपक्षी नेता का यही काम होता है।
        पहले तो जब वे विपक्ष के नेता के पद पर नहीं थे और संघ परिवार ने उनकी छवि ’’पप्पू‘‘ की बना रखी थी, उनकी बात को कोई खास वेट नहीं मिलता था। राहुल गांधी जब जब विदेश जाते हैं, वहां भी वे भारत में मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे संविधान लोकतंत्र और कानून के राज के खिलाफ कामों पर चिंता जताते रहे हैं। इन सब बातों से मोदी सरकार बीजेपी नेता और संघ राहुल गांधी से बेहद चिढ़ गया है। जैसा कि बीजेपी अपने विरोधियों विपक्षियों और उसको वोट न देने वाले नागरिकों देशद्रोही विदेशी तत्वों के हाथों खेलने वाला और आतंकी व देश की सुरक्षा के लिये खतरा बताकर निशाने पर लेती रही है। वैसे ही अब पीएम मोदी तो पूरी कांग्रेस को नंगा बताते हुए उसके नेताओं को देश को तबाह करने वाला बता चुके हैं। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू उनको देश की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन उनको विदेशी ताकतों की कठपुतली तो बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे उनकी सांसदी निरस्त कर उनको फिर कभी लोकसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही अन्य भाजपा नेता और भी गंदी घटिया और निचले स्तर की भाषा का प्रयोग करते हुए राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि अगर वास्तव में राहुल गांधी इतने बड़े ‘‘कुख्यात अपराधी’’हैं तो सरकार उनके खिलाफ संसदीय या कानूनी कार्यवाही कर अब तक उनको जेल क्यों नहीं भेज रही? ऐसा लगता है कि पहली बार किसी विपक्षी नेता ने साहस दिखाते हुए संसद उसके बाहर देश में और मौका मिलने पर विदेश में मोदी सरकार की तथ्यों तर्कों और प्रमाणों के साथ कथनी करनी में भारी अंतर की पोल खोलकर उसको आईना दिखा दिया है जिससे सरकार तिलमिला बौखला और डर गयी है लेकिन राहुल गांधी का अब तक तो कुछ बिगाड़ नहीं पाई है। सरकार राहुल को जेल भेजकर उनके हीरो बनने से भी डरती है। लगता है भविष्य में किसी पुराने मामले में राहुल गांधी को सज़ा दिलाकर संसद से निकालकर जल्दी ही सबक सिखाया जा सकता है। मोदी सरकार पर इस मामले में शायर ने क्या खूब कहा है- दूसरों पर जब तब्सिरा किया कीजिये, आईना सामने रख लिया कीजिये।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मधुसूदन आनंद

*मधुसूदन आनंदः जिन्होंने देश में किया नजीबाबाद का नाम बुलंद!* 
      -इक़बाल हिन्दुस्तानी
     नजीबाबाद के मूल निवासी वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार मधुसूदन आनंद का बीती 19 फरवरी को निधन हो गया था। वह देश के जानेमाने पत्रकारों में से एक रहे हैं। मधुसूदन आनंद  हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रमुख और सम्मानित व्यक्तित्व थे। उनका जन्म 30 दिसंबर 1952 को बिजनौर जनपद के नजीबाबाद नगर में हुआ था। वे वरिष्ठ लेखक कहानीकार, कवि, निबंधकार, संपादक और पत्रकार थे। उनकी शिक्षा एम.ए. (हिंदी) थी। उनकी प्रमुख रचनाएँ कविता संग्रह पृथ्वी से करें फरमाइश व कहानी संग्रह करौंदे का पेड़, साधारण जीवन, बचपन, थोड़ा सा उजाला निबंध संग्रह जो सामने है। उन्होंने संपादन का काम भी सफलतापूर्वक किया, जिसमें नवभारत टाइम्स के यशस्वी संपादक रहे राजेंद्र माथुर के अग्रलेखों का संचयन भी सम्मिलित है। पत्रकारिता में उनका योगदान याद करें तो मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को गंभीरता, निष्पक्षता, साहित्यिक भाषा शैली की गुणवत्ता और सामाजिक संवेदनशीलता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस क्षेत्र में उनके अविस्मरणीय योगदान के कुछ मुख्य बिंदु इस तरह से गिनाये जा सकते हैं।
      उन्होंने 1974 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में ट्रेनी पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया और नवभारत टाइम्स से सहयोगी संपादक के रूप में लंबे समय तक जुड़े रहे। यह भी बताया जाता है कि उनकी नियुक्ति आरंभ में लेखा विभाग में हुयी थी लेकिन लिखने पढ़ने का बचपन से ही उनको शौक था तो वे कुछ ही समय बाद एकाउंटिंग सैक्शन से संपादकीय विभाग में आ गये। वहां उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा कुछ ही समय में अपने वरिष्ठ साथी पत्रकारों को मनवा दिया। नवभारत टाइम्स में विभिन्न पदों पर काम किया। सब एडिटर, विशेष संवाददाता, सहायक संपादक, संपादकीय पेज प्रभारी, नाइट एडीटर, और अंततः अपनी मेहनत और लगन के बल पर संपादक के पद तक जा पहुंचे पहुंचे। मधुसूदन ने अपनी प्रतिभा व्यवहार कुशलता और योग्यता के बल पर कुछ ही समय में राजधानी दिल्ली के सरकारी क्षेत्र में ऐसी छवि बना ली थी, एक दौर में सत्ता चाहे किसी की भी हो, उनकी पहुंच सीधे पीएमओ तक रहती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में कवरेज के लिये साथ जाने वाले चंद गिने चुने संपादकों में उनका नाम सदैव शामिल रहता था। उनकी विशेषता यह थी कि वे न केवल पीएम की विज़िट में उनसे लगातार साक्षात्कार करते और उनके प्रोग्राम की विस्तृत ख़बर लिखते थे बल्कि वहां से वापस आने के बाद भी उस विदेश यात्रा पर कई कई विशेष संपादकीय लेख और रिपोर्ताज लिखते थे। जिनका उस समय के उनके चाहने वाले पाठक बड़ी अधीरता से इंतज़ार करते थे। उनके नेतृत्व में नवभारत टाइम्स ने राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी संतुलित और विश्वसनीय पत्रकारिता की अपनी सराहनीय नीति बनाए और बचाये रखी। वे निडर, निष्पक्ष और साहित्यिक दृष्टि वाले संपादक माने जाते थे। कुछ समय तक उन्होंने विश्व प्रसिध्द ‘डॉयचे वेले’ में भी संपादक के रूप में काम किया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी महान और यादगार पहचान को दर्शाता है।
          वे ’वॉयस ऑफ अमेरिका’ के नई दिल्ली संवाददाता भी रहे। कुछ समय दैनिक जागरण और नई दुनिया जैसे अन्य समाचारपत्रों से भी जुड़े रहे और अपनी लेखनी की अमिट छाप छोड़ी। बाद के वर्षों में ’भारतीय ज्ञानपीठ’ की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ’नया ज्ञानोदय’ के संपादक के पद पर रहे, जहाँ उन्होंने साहित्य और अपनी सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय विचारधारा को अपनी कलम से और मजबूती प्रदान की। वे इरफान हबीब, रोमिला थापर जैसे विद्वानों के अनुवाद किये लेख बड़े रोचक ढंग से विस्तार से प्रकाशित करते थे, जो तत्कालीन पत्रिका की गुणवत्ता को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है। हिंदी पत्रकारिता में उन्हें उनके सहकर्मी संवाददाता और पाठक उनको मृदुभाषी, विनम्र, समर्पित और साहित्य-प्रेमी संपादक के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने कई युवा पत्रकारों को इस क्षेत्र में भारी प्रतियोगिता और संघर्ष होने के बाद भी कठिन समय में प्रोत्साहित किया और उनके लिये सम्मान के साथ काम करने का माहौल बनाया।
          कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मधुसूदन आनंद ने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यिक गहराई और पेशेवर नैतिकता से न केवल समृद्ध किया बल्कि सफलता की उूंचाई तक पहंुचाया। वे एक ऐसे संपादक थे जो खबरों को सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और साहित्यिक मूल्यों के साथ समायोजित कर जनहित में पेश करते थे। उनकी कमी हिंदी मीडिया और साहित्य जगत में लंबे समय तक खलेगी। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ भी अपने समय में चर्चा मेें रहती थीं। हिंदी कथा-साहित्य में संवेदनशीलता, सूक्ष्म निरीक्षण, सामान्य जीवन की गहराई और मानवीय संबंधों की नाजुक परतों को उकेरने के साथ साथ जनवादी सोच के लिए भी जानी जाती हैं। वे प्रेमचंद की सामाजिक सुधारवादी प्रगतिशील परंपरा से जुड़े हुए रहे हैं, लेकिन आधुनिक संवेदना, शहरी-ग्रामीण संक्रमण और व्यक्तिगत अंतद्वंद्व को अधिक सूक्ष्म ढंग से धरातल से उठाकर प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा सरल, ज़मीन से जुड़ी हुयी, आम आदमी के सुखदुख की प्रतिनिधि मृदु और प्रभावशाली है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बिना अतिरंजना के जन भावनाओं को छू लेती है।

      उनके प्रमुख कहानी संग्रह ’करौंदे का पेड़’, ’साधारण जीवन’, ’बचपन’, ’थोड़ा सा उजाला’’ ने भी पाठकों को कायल कर लिया था। इनमें से कुछ चर्चित कहानियों और उनके संग्रहों का संक्षिप्त विश्लेषण निम्न है-’करौंदे का पेड़’’ शीर्षक कहानी और संग्रह है। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कहानी मानी जाती है। ’कथानक’ एक गरीब मध्यमवर्गीय परिवार में करौंदे का पुराना पेड़ भावनात्मक और स्मृति का प्रतीक बन जाता है। समय के साथ पेड़ सूखता है, लेकिन उसकी यादें और उससे जुड़े स्वाद (करौंदे की चटनी आदि) जीवन की कड़वाहट-मीठेपन को दर्शाते हैं। ’विश्लेषण’ नामक कहानी स्मृति, अभाव, परिवारिक बंधन और प्रकृति से मानवीय लगाव पर केंद्रित है। करौंदा कड़वा फल होने के बावजूद जीवन की आवश्यकता का प्रतीक है। जैसे जीवन में कड़वाहट के बिना मीठा नहीं मिलता। आलोचक इसे नारी-संवेदना और ग्रामीण-शहरी स्मृति के संयुक्त मेल के रूप में देखते पहचानते हैं। पहली कहानी संग्रह होने से इसने उन्हें विशिष्ट कथाकार के रूप में स्थापित किया।
          ’साधारण जीवन’ संग्रह और शीर्षक कहानियाँ ’थीम’’ रोजमर्रा का जीवन, छोटी-छोटी खुशियाँ, संघर्ष और उनकी सार्थकता पर आधारित है। प्रमुख विशेषता मधुसूदन आनंद को असाधारण बनाते हैं। उनकी कहानियाँ मध्यमवर्गीय मनोविज्ञान, रिश्तों की सूक्ष्म दरारें और जीवन की सादगी को उजागर करती हैं। कई कहानियाँ आत्मकथात्मक लगती हैं, जहाँ नजीबाबाद (उनका जन्मस्थान) जैसा कस्बा पृष्ठभूमि बनता है। यह संग्रह ’नॉस्टैल्जिया’ और वर्तमान के साथ टकराव को खूबसूरती से दिखाता है। ’थोड़ा सा उजाला’ भी उनकी सबसे प्रमुख कहानियाँँ में शामिल हैं, जो आलोचकों द्वारा श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ’थीम’ आशा की किरण, अंधेरे जीवन में छोटी रोशनी, आधुनिक जीवन की खोखलापन, लेकिन अंत में मानवीयता की जीत का संदेश देती है। जीवन में पूर्ण सुख नहीं, बस थोड़ी-सी उम्मीद काफी है। ये कहानियाँ शहरी अलगाव, उपभोक्तावाद और संबंधों की कमजोरी’’ को छूती हैं, लेकिन निराशावादी नहीं बल्कि संतुलित और आशावादी हैं। यह कहानी आधुनिक कार्य संस्कृति की खोखली चमक पर व्यंग्य भी करती है। ’शैली’ संयमित, बिना चीख-पुकार के भावुकता को प्रस्तुत करती है। संवाद जीवन के करीब, वर्णन चित्रात्मक लेकिन संक्षिप्त है। ’महत्व’ व ’’नई कहानी’’ आंदोलन के बाद की पीढ़ी में साहित्यिक पत्रकारिता के प्रतीक है। जहाँ कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। उनकी कहानियाँ भावुकता और यथार्थ के बीच संतुलन बनाती हैं, जो हिंदी कथा-साहित्य में बड़ा दुर्लभ है। मधुसूदन आनंद की कहानियाँ पढ़ने से लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता उसके साधारण क्षणों में छिपी है। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे मानवीय संवेदना को कभी पुराना नहीं होने देतीं। मधुसूदन आनंद ने अपनी लेखनी से नजीबाबाद का भी नाम बुलंद किया। हम उनको विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित करते हैं। उनके लिये वसीम बरेलवी का एक शेर याद आ रहा है- जहां भी जायेगा रोशनी लुटायेगा, किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 19 February 2026

हिंदू मुसलमान नहीं...

*हिंदू मुसलमान नहीं भारतीयों की विविधता देखो!* 
O दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं।    
       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम की मध्यप्रदेश यूनिट के सचिव तौक़ीर निज़ामी ने मुसलमानों के बारे में एक विवादित बयान दिया है। उनका दावा है कि सियासी मुसलमान तीन तरह का माना जाता है। उनका कहना है कि कांग्रेस में जूता चाटने यानी गुलामी करने वाला, भाजपा में जूते खाने वाला और एमआईएम में जूते मारने वाला मुसलमान मिलेगा। हालांकि बयान का विरोध बढ़ने पर निज़ामी ने सफ़ाई दी कि उनका मक़सद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि मुसलमानों को राजनीतिक गुलामी से बाहर निकालना था। इससे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत कह चुके हैं कि हिंदू चार तरह के होते हैं। पहला- जो कहते हैं गर्व से कहो हम हिंदू हैं। दूसरेेे कहते हैं गर्व की क्या बात है? तीसरे कहते हैं धीरे बोलो हिंदू हैं। चैथे वे जो भूल गये वो हिंदू हैं। दोनों नेताओं का अपने अपने समाज को लेकर वर्गीकरण गलत है। सच यह है कि देश में मुट्ठीभर लोगों को अपवाद मानकर छोड़ दें तो आज भी अधिकांश लोग खुद को भारतीय मानकर अपनी काॅमन समस्याओं से जूझ रहे हैं। खुद को एक सा मानते हैं। मिसाल के तौर पर क्या हिंदू क्या मुसलमान और क्या किसी और मज़हब के लोग सब आर्थिक शैक्षिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से परेशान हैं। सबको रोज़गार चाहिये। सबको शिक्षा चाहिये। सबको महंगाई से छुटकारा चाहिये। सबको बढ़ते अपराध और घटते न्याय से बराबर चिंता सताती है। भारत के अधिकांश लोग आज भी धर्मनिर्पेक्ष उदार सहिष्णु आपसी प्रेमभाव भाईचारा एकता और सौहार्द से रहना चाहते हैं। इस तरह के दावों से कुछ लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि शायद हिंदू मुसलमान वैसे ही होते होंगे जैसा ये साम्प्रदायिक नेता दावा करते हैं। वास्तविकता यह है कि जिस बीजेपी को संघ नियंत्रित करता है। उसको अपने आज के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक जीवन में भी केवल 37 प्रतिशत वोट ही मिलते हैं। यानी 63 प्रतिशत लोग उनको पसंद ही नहीं करते। साथ ही यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन 37 प्रतिशत में भी केवल 5 से 10 प्रतिशत हिंदू ऐसे होंगे जिनकी सोच संघ के मुस्लिम विरोध पूर्वाग्रह और घृणा से मिलती होगी।
        अन्यथा इनमें से भी बड़ी संख्या उन हिंदुओं की है जो कांग्रेस या अन्य सेकुलर दलों के विकल्प के तौर पर भाजपा को वोट देते हैं और बीजेपी की साम्प्रदायिक व नफरती नीतियों को किसी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी के साथ दस प्रतिशत का एक नया वर्ग लाभार्थी का भी जुड़ा है जिसको अपनी सुविधाओं योजनाओं और भले से मतलब है। अधिकांश सवर्ण जातियां अपने सामाजिक वर्चस्व आर्थिक लाभ और राजनीतिक श्रेष्ठता बनाये रखने के लिये बीजेपी के साथ हैं उनका धर्म साम्प्रदायिकता और मुस्लिम विरोध से कोई खास लेना देना नहीं है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है उनमें भी अधिकांश सेकुलर दलों के साथ रहे हैं और आज भी हैं। इनका पूरा भरोसा आज भी संविधान में है। उनका मानना है कि हिंदू मुसलमान मिलकर ही देश का भला कर सकते हैं। बेशक मुसलमानों में भी हिंदुओं की तरह एक छोटा वर्ग साम्प्रदायिक सोच का है जो अधिकांश उच्च जातियों का है। इनमें से ही अधिकांश अब बीजेपी की बी टीम एमआईएम के साथ जुड़ते जा रहे हैं। लेकिन इनको यह पता नहीं है ये जितने औवेसी के साथ जुड़ते जायेंगे उतने ही सेकुलर हिंदू सेकुलर दलों को छोड़कर बीजेपी के साथ जुड़ते जायेंगे। मुसलमानों का एक तीसरा नादान नासमझ जाहिल या कम पढ़ा लिखा गरीब कमज़ोर पिछड़ी सोच का और मासूम तबका भी है जो फिरकापरस्त तंगनज़र और कट्टरतावादी सोच से ग्रस्त होकर चालाक मक्कार और शातिर अलगाववादी सोच के मुस्लिम नेताओं के झांसे में आकर बहक जाता है और उनको वोट व सपोर्ट देकर अपना ही नुकसान करता है। हमारा तो मानना है कि हिंदू हो या मुसलमान आज नहीं तो कल यह बात समझेगा और एक साथ एक मंच पर आयेगा और ऐसे नेताओं पार्टियों या संगठनों को सपोर्ट करेगा जो उसको धर्म के आधार पर नहीं भारतीय के आधार पर एक नागरिक के आधार पर और एक इंसान के तौर पर देखेंगे मानेंगे और उसकी भलाई के लिये सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के आधार पर बिना किसी पक्षपात भेदभाव और धर्म जाति के अंतर को देखे सबके कल्याण का काम करेंगे। शायर कहता है- रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर एवं पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 16 February 2026

ए आई का डर

*ए आई यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस से क्यों डरी आई टी कंपनियां ?* 
0 यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं।          
     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      एक कंपनी के टैक्निकल मैनेजर की उसके एक जानकार से हुयी बातचीत आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यह बातचीत नये कोडिंग वाले ए आई और एसएएस माॅडल के नाकाम होने को लेकर भारतीय आई टी कंपनियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे ख़तरे को लेकर चर्चा का विषय बनी हुयी है। मैनेजर का कहना है कि हमारे देश का आई टी सैक्टर पिछले कई दशक से जिस एसएएएस माॅडल पर काम कर रहा था वह अब बेकार होने जा रहा है। इसकी वजह यह है कि ए आई का नया परिष्कृत रूप अब तरह तरह के कुछ प्रश्नों का उत्तर देने वाला मात्र चैटबाॅट नहीं रह गया है बल्कि वह विशेषज्ञ मानव की तरह ए आई कामगार बन चुका है। मिसाल के तौर पर मैनेजर अपनी अन्य हल्की और आम बातों के साथ जो सबसे गंभीर और आई टी उद्योग की सबसे बड़ी ख़तरे की घंटी की आहट सुनकर बता रहा है वह यह है कि अब ए आई कानूनी मसौदा बहीखाता प्रूफ रीडिंग इंट्रो हैडिंग काॅलम चैकिंग टैस्टिंग और कोडिंग तक का काम मिनटों नहीं सेकंडों में करके दे रहा है। वह किसी भी विषय पर लेख निबंध और रिपोर्ताज तक पलक झपकते ही उपलब्ध करा रहा है। यही वजह है कि इस कंपनी के मैनेजर ने पिछले दिनों 30 साल से काम कर रहे एक अधेड़ वरिष्ठ तकनीकी प्रोग्रामर अधिकारी को इसलिये हटा दिया क्योंकि जो काम वह एक सप्ताह में करता था उसी काम को प्रबंधक ने इंग्लिश में डायरेक्शन देकर ए आई से दस मिनट में उससे भी बेहतर क्वालिटी में करा लिया। मैनेजर का कहना था कि मानव कर्मचारी के साथ बैठक चर्चा अपडेट और दिशा निर्देश देने और फिर उसको क्राॅस चैक करने में समय और पैसा दोनों ही अधिक लगता है।
       वायरल चैट में इस मैनेजर ने सबसे डरावनी बात जो कही वह यह थी कि अगर उनका इतना पुराना अनुभवी और एक्सपर्ट आई टी कर्मचारी अब कंपनी के लिये निशुल्क भी सेवायें देता तो कंपनी स्वीकार नहीं करती क्यांेकि वह जितना समय इस काम में लगायेगा दूसरी उनकी प्रतियोगी कंपनियां ए आई से सेकंडों में काम लेकर उनकी कंपनी को मार्केट में पीछे छोड़ देंगी। यही वजह है कि जैसे ही यह नया टूल ए आई कंपनी एंथ्रोपिक ने लाॅंच किया खासतौर पर भारतीय तकनीकी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गयी। इतना ही एक सप्ताह के अंदर यह गिरावट फिर से आई और देखते ही देखते 8 दिन में आई टी सैक्टर की कंपनियों को शेयर मार्केट में 6 लाख करोड़ की पूंजी गंवानी पड़ गयी। इस गिरावट के दौर के आगे भी चलने का खतरा आई टी सैक्टर पर मंडरा रहा है। पहले सास माॅडल यानी सोफ्टवेयर एज़ ए सर्विस पर काम करने वाली कंपनियां यूज़र को टूल देती थी जिसके उपयोग और रखरखाव के एवज़ में कंपनी को मोटी फीस मिलती थी। अब ए आई कंपनी ने इस पुराने माॅडल के वजूद को ही चैलंेज कर दिया हैै। जिसमें ए आई स्वयं साॅफ्टवेयर बनायेगा और उसको चलाते हुए मेंटिनेंस भी खुद ही कर लेगा। अब हालत यह होने जा रही है कि 2021 में प्रोग्रामर तलाश करने पर जो 3000 जाॅब दिखती थीं वे अब मात्र 100 के आसपास सिमटती जा रही हैं। हालांकि जब शुरू शुरू में कंप्यूटर आये थे तब भी नौकरियों को लेकर ऐसा ही खतरा माना जा रहा था लेकिन कुछ जाॅब कंप्यूटर से घटे तो नये जाॅब भी भारी संख्या में पैदा हुए लेकिन ए आई को लेकर कुछ अधिक ही पैनिक है। शायर ने कहा है- *यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता, मुझे गिरा के तुम संभल सको तो चलो।।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 13 February 2026

अधिक बच्चे

*अधिक बच्चो की सलाह देने वाले वे कौन हैं?* 
0 जबकि सच यह है कि न तो एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है और न ही बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज के वास्तविक मुद्दों की चिंता है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं।        
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     एआईएमआईएम के होते हुए मुसलमानों को दुश्मनों की ज़रूरत नहीं है। उसको वैसे ही बीजेपी की बी टीम नहीं कहा जाता है। बल्कि उसकी सियासत उसकी हरकतें और उसके नेताओं के विवादित बयान खुद यह दिखाते हैं कि उनको मुसलमानों की सियासत तो करनी है लेकिन उनके हितों की कोई चिंता नहीं है। हाल ही में एमआईएम के यूपी के अध्यक्ष शौकत अली ने मुरादाबाद में एक जनसभा में कहा कि मुसलमानों को हम दो हमारे दो दर्जन पर अमल करते हुए तेज़ी से जनसंख्या बढ़ानी चाहिये। उनका यह भी दावा कि उनके 8 और उनके बड़े भाई के 16 बच्चे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम आबादी बढ़ने से मुस्लिम समाज और देश मज़बूत होगा। उनका मानना है कि मुसलमानों की आबादी कम होने की वजह से ही मदरसों को आतंक का अड्डा उनकी लिंचिंग दाढ़ी नोचा जाना लड़कियों के नकाब खींचा जाना और किसी भी मांस को गौमांस बताकर उनको आज सताया जा रहा है। इससे पहले आरएसएस के मुखिया भागवत सहित कई हिंदू नेता साक्षी महाराज नवनीत राणा हिमंत विस्व सरमा भी हिंदुओं से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं। वे यहां तक कहते हैं कि अगर हिंदुओं ने अभी भी परिवार नियोजन जारी रखा तो वे जल्दी ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।
     उनका कहना है कि हिंदू समुदाय की घटती जन्मदर से जनसांखिकीय असंतुलन सांस्कृतिक पहचान और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। उनका यह भी दावा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर बढ़ती घुसपैठ और धर्म परिवर्तन से पहले ही हिंदू समाज के लिये चिंता बढ़ गयी है। सच तो यह है कि बच्चे कितने पैदा करने हैं यह परिवारों का निजी मामला है। लेकिन वे यही सवाल मोदी सरकार से नहीं पूछते। दरअसल उनकी असली चिंता हिंदू वोट बैंक की राजनीति है। ऐसे ही एमआईएम नेता सहित कई सिरफिरे मुस्लिम कट्टरपंथी नेताओं की चिंता भी मुस्लिम वोटबैंक को लेकर ही अधिक है। लेकिन उनका यह कहना कुछ भोले भाले और सीधे शरीफ मुसलमानों को इसलिये ज़रूर गुमराह कर सकता है, क्योंकि आज जिस तरह से मोदी सरकार और कुछ राज्यों की बीजेपी सरकारें अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को किसी न किसी बहाने निशाने पर लेती रहती हैं, उससे उनके दिमाग में यह बात घर कर सकती है कि अगर वे अल्पसंख्यक नहीं होते तो उनको इस तरह से पक्षपात अन्याय और अत्याचार का निशाना नहीं बनाया जाता। जबकि सच यह है कि न तो बीजेपी और हिंदूवादी नेताओं को हिंदू समाज की चिंता है और न ही एमआईएम जैसे मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की भलाई से कोई सरोकार है।
       इन दोनों को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता है। एक तरफ यह कहा जाता है कि बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है और इसके खिलाफ तत्काल कानून बनाकर रोक लगाई जानी चाहिये। दूसरी तरफ दोनों वर्गों के कट्टरपंथी नेता अधिक बच्चो की ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ अपील भी कर रहे हैं। नेशनल फेमिली हैल्थ सर्वे-5 के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की जनसंख्या दर तेजी से गिरकर रिप्लेसमेंट रेट यानी 2.1 से भी नीचे आ चुकी है। 2020-25 का यह सर्वे यह भी बताता है कि हिंदुओं की टीएफआर 1.94 तो मुसलमानों की 2.14 रह गयी है। पहले इसमें बहुत अधिक अंतर था लेकिन अब इस दर में सबसे अधिक गिरावट मुसलमानों की आबादी में ही देखी जा रही है। हालांकि हिंदुओं की तुलना में यह अभी भी मामूली सी अधिक है। सर्वे में यह बात भी साफ हो चुकी है कि जनसंख्या बढ़ने का रिश्ता धर्म से नहीं बल्कि सम्पन्नता और शिक्षा से है। जो लोग संगठन व पार्टी मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार और उनको तरह से तरह से अनपढ़ व गरीब बनाये रखने में लगे रहते हैं उनको इस मुद्दे पर चिंता जताने का नैतिक अधिकार नहीं है। ऐसे लोगों के लिये शायर कहता है- सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप, आपका मैयार देखा कितने मैयारी हैं आप।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 9 February 2026

नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का दीपक

*नफ़रत के अंधेरे में मुहब्बत का एक ‘‘दीपक’’* 
0 इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है।
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      उत्तराखंड के कोटद्वार में 70 साल के एक बुजुर्ग वकील अहमद की कपड़े की दुकान का नाम बाबा स्कूल ड्रेस एंड यूनिफाॅर्म है। यह दुकान लगभग चार दशक से इसी नाम पर चल रही है। बताया जाता है कि इसका शाॅप एक्ट इनकम टैक्स और जीएसटी एक्ट आदि कई कानूनों में इसी नाम से बहुत समय पहले से रजिस्ट्रेशन चला आ रहा है। आज तक शासन प्रशासन या पुलिस को इस नाम से दुकान चलाने की कोई शिकायत किसी से नहीं मिली। कोई और आरोप अपराध या कर चोरी का मामला भी इस दुकान स्वामी के नाम पर दर्ज नहीं है। लेकिन कुछ दिन पहले कुछ नफरती चिंटू बाबा शाॅप पर बिना बुलाये मेहमान के तौर पर जा धमके। उन्होंने वरिष्ठ नागरिक वकील अहमद को धमकाया कि अपनी दुकान के नाम से बाबा शब्द हटायंे। वकील अहमद ने वजह पूछी तो दर्जन भर उत्पाती युवक अभद्रता और अपमान पर उतर आये। यह सब होता देख उधर से जा रहे एक ज़िम्मेदार नागरिक आपसी भाईचारे में विश्वास रखने वाले और कानून का सम्मान करने वाले जिम संचालक दीपक कश्यप उर्फ मुहम्मद दीपक ने हिम्मत दिखाते हुए मामले में हस्तक्षेप करते हुए बुजुर्ग का बचाव किया।
         दीपक ने यह जानते हुए भी कि जिनसे वह भिड़ने जा रहा है वे कोई साधारण लोग नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के समर्थक शासन प्रशासन व पुलिस की शह पर उत्पात करने वाले लंपट हैं, यह कहते हुए बुजुर्ग का बचाव किया कि यह देश संविधान कानून और आपसी प्यार मुहब्बत से चलता है। दुकान के नाम से बाबा शब्द नहीं हटेगा। न ही दुकान के मालिक को दुकान या घर छोड़कर राज्य व कस्बे से जाने दिया जायेगा। इस पर उत्पाती युवक दीपक से भिड़ गये लेकिन वे उस समय उसका बहुत कुछ नहीं बिगाड़ पाये। बाद में उन उग्र युवकों के खिलाफ मजबूरी में मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के कारण पुलिस को केस दर्ज करना पड़ा, लेकिन साथ साथ मेल मिलाप और भाईचारा बनाये रखने की कोशिश करने वाले दीपक को भी केस में लपेट लिया गया। इसके बाद जब यह घटना चर्चा का विषय बन गयी तो पुलिस प्रशासन ने कोटद्वार में बाहर से बड़ी तादाद में आकर घटना को कवर करने वाले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट यू ट्यूबर्स और बड़े मीडिया हाउसों को प्रवेश से रोक दिया। लकिन तब तक दीपक सोशल मीडिया पर हीरो बन चुका था।
       इस घटना के बाद आज दीपक के फाॅलोवर 1500 से बढ़कर पांच लाख से अधिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं उसका साथ देने वाले उसके दोस्त विजय रावत का भी पूरे देश में डंका बज रहा है। इससे पहले उत्तराखंड में ही शैला नेगी ने एक अल्पसंख्यक पर रेप का आरोप लगने पर उस क्षेत्र के अन्य मुस्लिम दुकानदारों को भगाये जाने का कड़ा विरोध किया था। यूपी के मथुरा ज़िले के नौझील कस्बे में सरकारी पाठशाला के हेड मास्टर जान मुहम्मद पर एक प्रधान ने झूठे आरोप लगाये थे। जिस पर बीएसए ने उनको तत्काल सस्पैंड कर दिया था। लेकिन उनके क्षेत्र के सैंकड़ों हिंदू छात्रों और अभिभावकों ने जोरदार प्रदर्शन कर उनको तत्काल बहाल करा दिया। ऐसा लगता है कि अब खुद हिंदू जनता का वह बड़ा हिस्सा सामने आने लगा है जो इस तरह की घटिया सियासत से तंग आ चुका है। वह चाहता है कि बढ़ते अपराध महंगाई और बेरोज़गारी जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये। दीपक जैसे लोगों के लिये शायर ने क्या खूब कहा है- *दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग़ कई आंधियों पे भारी है।* 
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 6 February 2026

भारत अमेरिका ट्रेड डील

*अमेरिका भारत ट्रेड डील से किसको क्या फ़ायदा?*
0 ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे।
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      यह खुशी की बात है कि अमेरिका भारत के बीच लंबे समय से पेंडिंग व्यापार समझौता हो गया है। यह भी सही है कि इससे भारत के निर्यातकों को लाभ होगा। यह भी माना जा सकता है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश से हमारे रिश्ते अब बेहतर हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह सौ टके का है कि यह ट्रेड डील किन शर्तों पर हुयी है? हालांकि हमारी सरकार ने न तो पहले यह साफ किया और न ही अब तक विस्तार से यह बताया कि इस व्यापार समझौते की शर्तें क्या हैं? खुद अमेरिकी राष्ट्रपति टंªप ने ही आधी रात को इस डील की जानकारी सार्वजनिक की थी और दावा किया था कि डील के तहत अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगायेगा जो कि पहले 25 प्रतिशत था और रूस से तेल खरीदते रहने पर यह 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। ज़ाहिर है इस मामले में हमारे देश को टैरिफ का कुछ लाभ तो अवश्य ही हुआ है, लेकिन अगर इसे अमेरिका के मुकाबले भारत की अमेरिकी सामान पर टैरिफ ज़ीरो किये जाने के साथ मिलाकर देखें तो यह पक्षपातपूर्ण और अन्याय लगता है। यही वजह है कि व्हाइट हाउस पै्रस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिका की स्पष्ट और बड़ी जीत करार दिया है। अमेरिका का यह भी दावा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डाॅलर का सामान खरीदेगा। 
          जिसमें कृषि उत्पाद, डेयरी प्रोडक्शन यानी दूध मक्खन पनीर दही और आइसक्रीम, पोल्ट्री यानी चिकन अंडे और उससे जुड़े बाइप्रोडक्ट, मांस और अन्य पशु उत्पाद, फल जैसे सेब अंगूर कीवी चेरी ब्लूबेरी बादाम अखरोट साथ ही प्रोसेस्ड फूड व अन्य कई खाने पीने के सामान इस लिस्ट में शामिल हैं। इन सभी आइटम पर भारत का टैक्स शून्य रहेगा। इसका मतलब साफ है कि अमेरिकी उत्पाद भारत के गरीब किसानों के उत्पादों का सीधा मुकाबला करेंगे। अपने स्वदेशी कृषि उत्पादों को पहले की तरह भारत अधिक टैरिफ लगाकर प्रतियोगिता से सुरक्षा प्रदान नहीं कर पायेगा। साथ ही ट्रंप यह भी दावा करते हैं कि भारत ने उनको आश्वासन दिया है कि वह रूस से सस्ता तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिका व वेनेजुएला से मार्केट रेट पर क्रूड आॅयल खरीदेगा। यह बात इसलिये भी सच लगती है कि अमेरिका ने जो 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भारत पर रूस से तेल खरीदने पर लगाया था वह अब हटा लिया गया है। 
       अमेरिका इस डील के बारे में रोज़ सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर रहा है, प्रैस वार्ता कर रहाी है और इस डील को अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश में सरकार ने अव्वल तो इस बारे में अमेरिका के ऐलान के साथ साथ उसी रात कुछ बताने की ज़रूरत नहीं समझी। लेकिन जब विपक्ष और डील के भारतीय जानकारों ने इस डील को किसान विरोधी और भारत के नागरिकों के हितों के खिलाफ होने के दावा किया तो गोदी मीडिया के चैनलों पर सूत्रों के हवाले से इसे बहुत अच्छी डील हवा में बताया जाना लगा। बाद में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने डील की बिना डिटेल शर्तों और प्रमाण के यह दावा ठोक दिया कि इस डील में सब कुछ अच्छा है लेकिन समय बतायेगा कि यह डील कितनी किसके पक्ष में एकतरफा और साथ ही अपमानजनक तरीके से अंजाम तक पहंुची है।
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

मोदी सरकार सही है

नया यूजीसी अधिनियम मोदी सरकार का सराहनीय क़दम!

        -इक़बाल हिंदुस्तानी

0 कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है।

      यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने नये अधिनियम में दलित आदिवासी महिलाओं के साथ ही पिछड़े वर्ग के साथ आयेदिन होने वाले पक्षपात और भेदभाव को परिभाषित कर अन्याय से संरक्षण प्रदान किया है। इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति धर्म लिंग जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जायेगा। प्रत्येक संस्थान में एक इक्वल आॅपोर्चिनिटी सेंटर बनाया जायेगा। जो भेदभाव की शिकायतों को सुनेगा और प्रभावित लोगों की सहायता करेगा। एक शिकायत निवारण तंत्र बनाया गया है जो 24 घंटे सातों दिन काम करेगा और हेल्पलाइन व आॅनलाइन पोर्टल पर आने वाली शिकायतों का समय सीमा के अंतर्गत अनिवार्य कार्यवाही कर समाधान करेगा। अगर इन नियमों का कोई संस्थान समय पर सही से पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करते हुए उसका अनुदान रोकने के साथ ही उसकी मान्यता भी समाप्त की जा सकती है। हर हायर एजुकेशन सेंटर में एक समता समिति बनेगी जिसमें एससी एसटी ओबीसी महिलाओं और दिव्यांगों को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा। जिन वर्गों के साथ पक्षपात भेदभाव और अन्याय रोका जाना है, उसके लिये शिक्षकों के आचरण की एक आचारण संहिता बनाई जायेगी। साथ ही प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाया जायेगा जिससे आयेदिन वंचित वर्गों के साथ होने वाले पक्षपात और अन्याय को रोकने की पुख्ता व्यवस्था को सुनिश्चित किया जायेगा।

      कुछ लोग इस संशोधित अधिनियम का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इसके दुरूपयोग की आशंका है। उनसे पूछा जाना चाहिये कि किस कानून के गलत प्रयोग की आशंका नहीं होती? क्या यूएपीए का गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा है? क्या एनडीपीएस एक्ट और आम्र्स एक्ट का फर्जी इस्तेमाल नहीं होता है? क्या दहेज़ एक्ट का ससुराल पक्ष के निर्दोष सदस्यों को फंसाने के लिये लंबे समय से इस्तेमाल नहीं होता रहा है? क्या दलित एक्ट का मिसयूज़ अकसर नहीं होता है? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार इन कानूनों को बनाती ही नहीं। हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल अलग समस्या है। हमारा समाज और सरकारी सिस्टम ऐसा है कि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल होता आ रहा है। मिसाल के तौर पर भीड़ हिंसा हमारे देश में आम हो गयी है। अकसर बेकसूर लोेगों की माॅब लिंचिंग हो जाती है। किसी को भी अंजान इलाके में डायन गोहत्यारा और बच्चा चोर बताकर पीट पीट कर मार दिया जाता है। लेकिन ऐसे मामले में या तो अकसर रिपोर्ट दर्ज नहीं होती, होती हैं तो हल्की धाराओं में होती हैं या फिर उल्टा मरने वाले के खिलाफ ही फर्जी आरोपों में रपट लिख दी जाती है। जो लोग इस अधिनियम के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं उनको यह भी समझना चाहिये कि अगर वे पक्षपात, उत्पीड़न और अन्याय नहीं करते या आरक्षित वर्ग के हिस्से पर काबिज़ नहीं हैं तो डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। दूसरी कड़वी सच्चाई यह है कि लोकतंत्र बहुमत से चलता है। जिन वर्गों को यूजीसी के नये अधिनियम का लाभ मिलेगा वह सत्ताधारी भाजपा का नया वोटबैंक है। उसकी संख्या आबादी में 85 प्रतिशत से अधिक है तो सरकार उनके मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत सवर्णों की जायज बात भी क्यों सुनेगी? एक शायर ने कहा है-

इस दौर के फरियादी जाएं तो कहां जायें,

सरकार भी तुम्हारी है दरबार भी तुम्हारा है।

हादसा या हत्या?

इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हादसा नहीं ‘अपराधिक हत्या’?
             -इक़बाल हिंदुस्तानी
       अगर हमारा शासन प्रशासन पुलिस और कई अन्य आपात सेवा एजंसियां मिलकर एक नौजवान इंजीनियर को अचानक हादसा होने पर पानी में डूबने से नहीं बचा सकती तो हमारे विश्वगुरू होने और दुनिया की तीसरी चैथी अर्थव्यवस्था होने का क्या मतलब रह जाता है? कुछ दिन पहले ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में 27 साल के इंजीनियर युवराज मेहता की दुखद मौत कई सवाल खड़े करती है। दरअसल युवराज की कार गहरे कोहरे में अचानक भटककर सड़क किनारे निर्माणाधीन एक मकान में खोदे गये बेसमेंट के एक गड्ढे में समा गयी। जिस जगह यह हादसा हुआ वहां एक तीखा मोड़ था। जिससे युवराज घने कोहरे की वजह से उसे देखकर कार मोड़ नहीं पाया। यह हमारे नये बसे नगरों में सड़कों के बुरे डिज़ाइन और मकान दुकान पास हुए नक्शे के हिसाब से न बनाकर गैर कानूनी व नियम तोड़कर बनाये जाने वाले आयेदिन के रिश्वत से होने वाले गलत कामों का भी अंजाम कहा जा सकता है। युवराज ने पानी के गहरे गड्ढे में गिरने के बाद भी अपनी जान बचाने को हिम्मत नहीं हारी और अपना मोबाइल निकाल कर अपने परिवार को सूचना दी। जिस पर उसके पिता ने नोएडा के सरकारी अमले को तत्काल खबर दी। हैरत और दुख की बात यह रही कि पुलिस फायर ब्रिगेड और स्टेट डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स मौके परा समय पर पहुंच गयी लेकिन 90 मिनट तक पानी में जान बचाने को हाथ पांव मार रहे युवराज को बचाने में सब नाकाम रहे। हालांकि बाद में नेशनल डिजास्टर रेस्पोंस फोर्स के जवान भी घटना स्थल पर पहुंचे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि युवराज समय पर सहायता न मिलने से अपनी जान गंवा चुका था। यह ठीक है कि ऐसी मौतें हमारे देश में होना आम बात है। इस मौत पर कोई हंगामा नहीं मचा क्योंकि यह किसी धर्म या जाति की नाक का सवाल नहीं था। यह भी गारंटी नहीं कि ऐसे हादसे आगे नहीं होंगे। सही मायने में देखा जाये तो युवराज की मौत हमारे नाकाम नाकारा और करप्ट सिस्टम की मौत का ऐलान है। हमारी जनता सरकार चुनने या बदलने के दौरान शायद ही ऐसी मौतों से प्रभावित होकर वोट देती हो। कहने को हम 2030 में विश्व की तीसरी बड़ी इकाॅनोमी बनने का दावा करते हैं, लेकिन अगर हम अपने एक युवा इंजीनियर को पानी के एक गड्ढे में गिरने पर उसकी घंटों मौत और ज़िंदगी से लड़ने पर जान नहीं बचा सकते और हमारा सरकारी अमला खड़ा खड़ा तमाशा देखता रहता है तो विश्वगुरू बनने का दावा करना क्या मज़ाक नहीं है? हमारे देश में हर साल साढ़े 9 लाख लोग हादसों में मरते हैं। यह दुनिया के देशों में हादसों में मरने वाले लोगों का दूसरे नंबर का आंकड़ा है। ऐसा नहीं है कि दूसरे देशों में लोग हादसों का शिकार नहीं होते लेकिन हमारे देश में जितनी बड़ी संख्या और जिस प्रशासनिक लापरवाही सरकारी नाकामी और अधिकारियों की रिश्वतखोरी व असंवेदनशीलता व जवाबदेही न होने से लोग बेमौत और असमय मर रहे हैं, वह चिंता और लज्जा की बात है।

बड़ी आबादी का सच

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी अभिषाप या उपहार?

           -इक़बाल हिंदुस्तानी

     भारत इस समय विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बना हुआ है। हिंदूवादी नेता आयेदिन जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग करते रहते हैं। विहिप के पूर्व मुखिया प्रवीण तोगड़िया ने हाल ही में यह मांग दोहराई है। दरअसल उनको इस तरह की मांग से अल्पसंख्यक मुसलमानों को टारगेट कर अपना हिंदू वोट बैंक मज़बूत बनाने का राजनीतिक मकसद पूरा करना अधिक होता है। उनको यह पता नहीं है कि जब चीन दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था तो उसने एक बच्चे का कानून बनाया था। इसके बाद जब इस नीति से चीन को नुकसान हुआ तो उसने 2016 में यह कानून खत्म कर दिया। फिर चीन ने तीन साल तक के बच्चो के पालने के लिये सालाना 42000 सरकारी मदद देनी शुरू की। कई राज्यों ने वहां दूसरा व तीसरा बच्चा पैदा होने पर एकमुश्त बड़ी रकम देनी शुरू की। यहां तक कि बच्चो की पढ़ाई और परवरिश पर खर्च में बड़ी आयकर छूट भी दी। लेकिन आबादी एक बार घटने लगी तो फिर किसी भी तरह बढ़ी नहीं। अब सारे उपाय नाकाम होने पर चीन ने गर्भनिरोधक पर भारी कर लगाया है जिससे लोग अधिक बच्चे पैदा करें लेकिन जनता का कहना है कि बच्चो को पालना गर्भनिरोधक पर अधिक टैक्स देने से महंगा है। भारत में टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 यानी आबादी स्थिर रहने पर आ गयी है। अगर यह इससे भी कम हुयी तो हमारी हालत भी चीन जैसी हो जायेगी।

बंगाल में घुसपैठ?

*ब्ंागाल में घुसपैठ रोकने को सुरक्षा ग्रिड बनायेगी केंद्र सरकार...* 

       गृहमंत्री अमित शाह ने आरोप लगाय है कि अपना वोटबैंक बढ़ाने के लिये पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी बंग्लादेश से घुसपैठ करने वालों को बढ़ावा दे रही हैं। उनका यह भी कहना है कि केंद्र सरकार ऐसा किसी कीमत पर नहीं होने देगी। शाह का दावा है कि घुसपैठ की समस्या को जड़ से खत्म करने को उनकी सरकार सुरक्षा ग्रिड बनायेगी। सवाल यह है कि राजनीतिक लाभ के लिये अगर राजनेता एक दूसरे पर इतने गंभीर आरोप लगा सकते हैं तो फिर घुसपैठ की समस्या का वास्तविक समाधान कैसे और कौर करेगा? सबको पता है कि सीमा सुरक्षा का काम सीमा सुरक्षा बल करता है। इस बल की कमान केंद्र सरकार के हाथ में है। क्या यह संभव है कि किसी राज्य की सरकार केंद्र सरकार से छिपाकर अपने राज्य में राजनीतिक लाभ के लिये अवैध लोगों की घुसपैठ कराये और केंद्र सरकार को भनक तक ना लगे। या केंद्र सरकार को इस बात का पता भी हो जैसा कि अमित शाह दावा कर रहे हैं फिर भी वे राज्य सरकार के सामने घुटने टेक दें? दूसरा सवाल यह है कि अगर केंद्र सरकार को पता है कि बंगाल में घुसपैठ हो रही है तो उन्होंने अपने जांच कराकर कितने बंग्लादेशियों को उनके देश वापस भेजा? उनको ऐसा करने से कौन रोक रहा है? जो सुरक्षा ग्रिड शाह अब बनाने की बात कह रहे हैं उस ग्रिड हो अब तक क्यों नहींे बनाया गया? सीमा पर घुसपैठ रोकने की ज़िम्मेदारी आखिर केंद्र सरकार की है तो उनको किससे अनुमति लेनी है? कहीं ऐसा तो नहीं जिस राज्य में भी चुनाव आता है वहां भाजपा मोदी सरकार केंचुआ के साथ मिलकर एक योजना के तहत पहले घुसपैठ का आरोप लगाती हैै और फिर विपक्ष के समर्थक माने जाने वाले वोटों में से एक हिस्से को इस बहाने बड़ी तादाद में काटकर चुनाव जीत लेती है। उसके बाद घुसपैठ के सारे आरोप सारे दावे और सारे वादे भुलाकर अगल राज्य के चुनाव में लग जाते हैं। बिहार में भी यह प्रयोग सफल रहा है। एक शायर ने कहा है-
0 लोगों के सर ऐब को मढ़ना सीख गये,
हम भी बेबात झगड़ना सीख गये।
उड़ना कब सीखेंगे चिड़िया के बच्चे,
सांप के बच्चे पेड़ पर चढ़ना सीख गये।।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।

प्रेम विवाह के खिलाफ सरकार?

*लव मैरिज रोकने के लिये विवाह पंजीकरण कठिन...* 

      यूपी सहित कई राज्यों में धार्मिक रीति रिवाज से शादी होने के बाद सरकारी कार्यों के विवाह का पंजीकरण काफी समय पहले अनिवार्य किया जा चुका है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन अब यूपी सरकार ने चुपचाप मैरिज एक्ट के तहत होने वाले रजिस्ट्रेशन के नियम बदल दिये हैं। इसमें यह ज़रूरी कर दिया गया है कि जो भी जोड़ा अपनी शादी का सरकारी पंजीकरण करायेगा वह अपने परिवार के सदस्यों को गवाह के तौर पर अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रार के सामने पेश करेगा। वैसे तो अधिकांश मामलों में परिवार के लोग गवाही दे ही देते हैं। लेकिन जिन मामलों में युवक युवती ने प्रेम विवाह किया होता है। उनमें उनके परिवार के लोग कई बार जाति या धर्म अलग अलग होने की वजह से विरोध करते हैं। ऐसे में जब कोई अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करेगा तो वे उसका पंजीकरण कराने में साथ कैसे दे सकते हैं? सवाल यह है कि जब संविधान बालिग लड़के लड़की को अपनी पंसद की शादी करने की इजाज़त देता है तो सरकार कैसे संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन कर ऐसे नियम या कानून बना सकती है जिससे युवा पीढ़ी अपने परिवार के नहीं चाहने पर अपनी पसंद के लड़के लड़की से विवाह ही नहीं कर सके। यही शाॅर्ट कट सरकारें धर्म परिवर्तन के मामलों में भी अपना रही हैं। ऐसा लगता है कि सरकारें अपना राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर भी नियम कानून बनाने पर तुली हैं।

संविधान के अनुसार कानून

*उत्तराखंड सरकार संविधान की भावना के अनुकूल बिल लाये...* 

       उत्तराखंड सरकार कथित लैंड जेहाद के खिलाफ एक बिल लाने जा रही है। आज तक लवजेहाद की भी परिभाषा तय नहीं हुयी लेकिन अब एक वर्ग विशेष को टारगेट करने के लिये तथाकथित लैंड जेहाद के बहाने एक नया कानून बनाने के लिये उत्तराखंड सरकार विचार कर रही है। पर्वतीय राज्य की सरकार से पूछा जाना चाहिये कि क्या अल्पसंख्यक इस देश के के नागरिक नहीं हैं? उनको भी दूसरे धर्मों के लोगों की तरह देश के किसी भी राज्य में ज़मीन खरीदने बसने और कारोबार करने का संविधान ने समान अधिकार नहीं दिया है? अगर कोई अल्पसंख्यक उत्तराखंड में भूमि खरीदता है तो यह लैंड जेहाद कैसे हो गया? दरअसल हिंदू वोट बैंक की राजनीति करते करते अधिकांश भाजपा सरकारों ने झूठ नफरत और भय फैलाने की राजनीति का सहारा लेकर कई बार कई राज्यों की सत्ता में कब्ज़ा जमाया है। इन सरकारों ने मीडिया के ज़रिये एक झूठा नेरेटिव पेश कर बात बात पर लवजेहाद थूकजेहाद और लैंडजेहाद का आरोप लगाकर बहुसंख्यकों में मन में अल्पसंख्कों के लिये एक सोची समझी योजना के तहत डर और घृणा पैदा कर सत्ता हासिल करने का बहाना तलाश लिया है। जबकि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

धर्म बड़ा या संविधान

*धर्म नहीं हमारा संविधान ही सब से उूपर है!* 

                 -इक़बाल हिंदुस्तानी

      लल्लन टाॅप टीवी चैनल पर पिछले दिनों डज़ गाॅड एक्ज़िस्ट डिबेट का आयोजन किया गया था। इस बहस में मशहूर फिल्म डाॅयलाग राइटर और शायर जावेद अख़्तर और मुफती शमाइल ने हिस्सा लिया था। यह प्रोग्राम चर्चित हो गया। इसको लाखों लोगों ने देखा सुना। लेकिन बिना किसी जज के यह दावा किया गया कि इस बहस में मुफती शमाइल जीत गये। इसकी वजह शायद भारत में अधिकांश लोगों का आस्तिक होना रहा। बाद में पूरी दुनिया में अपनी लोकप्रियता अचानक बढ़ जाने से मुफती साहब ने एक विवादित बयान दिया कि भारत के मुसलमानों ने शरीयत पर संविधान को तरजीह देकर गलती की है। उनका कहना था कि अगर संविधान और शरीयत में से किसी एक को चुनना हो तो हम शरीयत को चुनेंगे। मुफती साहब भूल गये कि अगर यही बात हिंदू धर्म को मानने वाले कहें तो देश हिंदू राष्ट्र बनने में देर नहीं लगेगी। ऐसे ही जिस देश में जिस मज़हब के मानने वालों की संख्या अधिक होगी वहां उस देश के बहुसंख्यकों का राज हो जायेगा। जबकि लोकतंत्र में बहुमत का शासन होता है। जिसमें सभी धर्म जाति और सोच के लोग शामिल होते हैं। कुछ लोगों का दावा है कि धर्म और संविधान का कोई टकराव ही नहीं तो यह सवाल कहां से आ गया कि दोनों में से एक को चुनो। उनको पता होना चाहिये कि संविधान सेकुलर है। उसके रहते ही सबको अपने अपने मज़हब पर चलने की आज़ादी मिली हुयी है। अगर कोई धर्म को सर्वोपरि मानेगा तो उन मुद्दों पर टकराव होगा जिन पर धर्म और संविधान अलग अलग रास्ता दिखाते हैं। साथ ही धर्मों का आपस में भी झगड़ा बढ़ जायेगा जो पहले ही राजनेता गैंगवार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

वामपंथी रास्ते पर कांग्रेस

वामपंथियों की जगह कांग्रेस लेगी अब...

       2025 में आरएसएस के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के भी 100 साल पूरे हो गये। लेकिन जिस तरह से संघ ने अपनी स्थापना का शतक पूरा होने पर थोड़ा सा जश्न मनाया, वामपंथियों ने इस तरह के भी किसी समारोह की औपचारिकता नहीं की। हालांकि दोनों के वर्तमान हालात में ज़मीन आसमान का अंतर है। एक ओर संघ और जिसके राजनीतिक घटक जनसंघ को कभी राजनीति में अछूत माना जाता था। वह आज केंद्र सहित अनेक राज्यों में सत्ता में है। एक तरह से संघ का स्वर्णिम काल चल रहा है। दूसरी तरफ एक समय 2004 में जिस कम्युनिस्ट पार्टी के संसद में 65 सांसद हुआ करते थे और बंगाल केरल व त्रिपुरा में अपनी सरकार हुआ करती थी। आज उन वामपंथियों के मात्र 9 सांसद हैं। अब किसी भी राज्य में उनकी अपनी सरकार नहीं है। यहां तक कि यूपी बिहार सहित कई राज्यों में उनके कई एमपी और दर्जनों विधायक भी नहीं बचे हैं। अगर कहीं किसी सेकुलर गठबंधन के साथ जुड़कर उनके चंद एमएलए चुने भी गये हंै तो उनको उंगलियों पर गिना जा सकता है। इसकी वजह यह है कि हमारे भारतीय समाज में जिस तरह से धर्म और जाति के आधार पर पंूजीवादी शक्तियों ने अपनी सियासी चालें चलीं और चुनाव लड़ना जीतना और सत्ता में आकर काॅरपोरेट के पक्ष में काम कर उनसे मोटा चंदा लेकर फिर से बार बार चुनाव जीतना बेहद महंगा कर दिया उससे वामपंथी सत्ता से दूर होते चले गये। लेकिन संतोष की बात यह है कि जहां भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी मज़बूत हुयी और लगातार तीन बार से चुनाव जीतकर सत्ता में बनी हुयी है। वहां कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की तरह वामपंथी रास्ता पकड़ लिया है। यह तय है कि आज नहीं तो कल लोग जब भी सत्ता बदलने का मन बनायेंगे वे भाजपा को त्यागकर कांग्रेस के पास ही जायेंगे। यही वजह है कि मोदी बीजेपी और संघ का सारा डर सारा विरोध और दिन रात नेहरू पर आरोप कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने को उन राज्यों में भी लगाये जाते हैं जहां कांग्रेस का नाम ओ निशान भी नहीं बचा है। आज भी अखिल भारतीय स्तर पर विचारधारा वाली कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसका संगठन समर्थन और थोड़ा बहुत प्रभाव भारत के हर हिस्से में है। एक शायर ने कहा है-

0 ये लोग औरों के दुख जीने निकल आये हैं सड़कों पर,

  अगर सिर्फ अपना ही ग़म होता तो यूं धरने नहीं देते।।

नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।

दिग्विजय भी थरूर बनेंगे?

दिग्विजय सिंह भी शशि थरूर के रास्ते पर...

      ऐसा लगता है कि कांग्रेसी अधिक दिन तक सत्ता से बाहर नहीं रह सकते। पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने पीएम मोदी की शान में कसीदे पढ़े। इससे पहले यही घटिया काम गुलाम नबी आज़ाद करके अपनी अलग पार्टी बना चुके थे। अब लगभग उसी भाषा शैली और अंदाज़ में एमपी के पूर्व सीएम और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मोदी बीजेपी और आरएसएस की भूरि भूरि प्रशंसा कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि 70 सालों के एकक्षत्र राज में इन जैसे कुछ कांग्रेसियों ने इतना माल नंबर दो से कमाया है कि उसको बचाने के लिये संघ का थोड़ा सा दबाव पड़ते ही ये लोग दंडवत हो जाते हैं। यही वजह है कि कमलनाथ हों या दिग्विजय सिंह राहुल गांधी इनसे बहुत खफा रहते हैं लेकिन सोनिया गांधी के दरबारी होने की वजह से ये कांग्रेस में बने हुए हैं। जबकि सच यह है कि इनकी वजह से कांग्रेस को कोई राजनीतिक लाभ तो दूर उल्टा नुकसान ही हो रहा है। राजस्थान में वहां के पूर्व कांग्रेसी सीएम अशोक गहलौत ने युवा कांग्रेसी नेता सचिन पायलट को सीएम बनने का मौका न देकर चुनाव में गुटबंदी के चलते कांग्रेस को सत्ता से बाहर कराकर ही दम लिया। यही हाल एमपी में कमलनाथ ने युवा कांग्रसी नेता ज्योतिराज्य सिंधिया को सत्ता में भागीदारी न देकर कांग्रेस की कब्र खोदकर बीजेपी को सत्ता थाली में रखकर परोस कर किया।

बांग्लादेश में हिंदू उत्पीड़न

बंग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू उत्पीड़न सहन नहीं होगा...

       पड़ौसी देश बंग्लादेश में जब से चुनावों का ऐलान हुआ है। वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। वहां हालात तेज़ी से खराब हो रहे हैं। वहां दक्षिणपंथी राजनतिक शक्तियां लगातार शक्तिशाली होती जा रही हैं। पूर्व पीएम शेख़ हसीना जब से सत्ता छोड़कर शरण लेने भारत आई हैं। उनकी पार्टी उनके नेताओं और बंग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान से जुड़े हर मामले में वहां की कार्यवाहक सरकार दुश्मनों की तरह पेश आ रही है। उन्होंने हसीना की पार्टी पर चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी है। यानी उनको पता है कि अगर रोक नहीं लगाई तो हसीना की पार्टी फिर बहुमत ला सकती है। साथ ही अल्पसंख्यक हिंदू विरोधी भावनायें भड़काकर बहुसंख्यकवाद की घटिया सियासत भी वहां परवान चढ़ाने की कोशिश जारी है। लेकिन वहां के कार्यवाहक सरकारी मुखिया मुहम्मद यूनुस को यह नहीं भूलना चाहिये कि कोई भी देश अपने अल्पसंख्यक नागरिकों को सताकर न तो प्रगति कर सकता है और न ही देश में स्थायी शांति स्थापित कर सकता है। यही बात भारत पर भी लागू होती है।

एसआईआर : यूपी में 2.89 करोड़ वोट कटेंगे...

एसआईआर: यूपी में 2 करोड़ 89 लाख वोट कटने का मतलब?

                 -इक़बाल हिंदुस्तानी

      बिहार के बाद देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव आयोग का एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है। संयोग और आश्चर्य की बात यह है कि जिस बंगाल में एसआईआर को लेकर सबसे अधिक घमासान मचा था। वहां मात्र 58 लाख वोटर के नाम लिस्ट से काटे गये हैं। इनमें भी बंग्लादेशी घुसपैठियों की गिनती इस लायक नहीं है कि केंचुआ उनकी संख्या को सार्वजनिक करे। जबकि राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी का दावा है कि इनमें से 32 लाख वो मतदाता हैं जिनके नाम 2025 की लिस्ट में थे लेकिन 2002 की सूची में नहीं होने से ये अपने प्रपत्र जमा नहीं कर सके हैं। यह राज्य की सीएम ममता बनर्जी का ही रौद्र रूप था जिससे चुनाव आयोग अपने आका के इशारे के बाद भी बिहार जैसा सियासी खेल वहां नहीं कर सका है। अब चुनाव आयोग के अनमेप्ड वोटर कहे जाने वाले ये लोग बड़ी संख्या में अपने दस्तावेज़ लेकर फिर से चुनाव आयोग के दर पर दस्तक देने पहंुच रहे हैं। उधर देश की सियासत को सबसे अधिक बनाने बिगाड़ने वाले बीजेपी शासित यूपी में 2 करोड़ 89 लाख वोटर के नाम कटने से राजनीतिक क्षेत्रों में भूचाल सा आ गया है। जानकारों का कहना है कि यह सब केंद्र और राज्य के शासकों में चल रही गुटबंदी का परिणाम है। इस बहाने यूपी के अगले चुनाव में सीएम योगी को सत्ता से बाहर करने की रण्नीति पर चर्चा चल रही है। विपक्ष नेता अखिलेश यादव ने यह कहकर आग में घी डालने का काम किया है कि हमने अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कड़ी निगरानी में बीजेपी को खासतौर पर पिछड़े दलितों और अल्पसंख्यकों के वोट काटने की साज़िश को रोका है।

राइट टू डिस्कनेक्ट

*राइट टू डिस्कनेक्ट विधेयक क्या है, इसकी ज़रूरत क्यों व किसको है?* 
0 पिछले दिनों लोकसभा में एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पेश किया था। हालांकि यह प्राइवेट बिल था जिसको पास नहीं होना था और न ही यह पास हुआ लेकिन इस बिल को पेश कर सुले ने पूरे देश का ध्यान इस ओर आकृष्ट ज़रूर कर दिया कि क्या ऐसा एक कानून होना चाहिये जिससे कार्यालायों या वर्क फ्राॅम होम करने वाले लोगों से ड्यूटी खत्म होने के बाद उनके आॅफिस उनके आॅफिसर यहां तक कि उनके बाॅस भी उनसे कनेक्ट नहीं हो सकें। यानी सेवा के घंटो के बाद किसी नागरिक का डिस्कनेक्ट होना उसका बुनियादी अधिकार है। इंसान कोई मशीन नहीं है कि आप उसको 24 घंटे और सप्ताह के सातों दिन कंपनी के काम मंे व्यस्त रखें। वास्तव में ऐसे कानून की ज़रूरत तो है।    
     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
       फ्रांस की एक बड़ी अदालत ने पिछले दिनों एक फैसला दिया जिसमें सरकार को यह निर्देश दिया गया कि वह यह सुनिश्चित करे कि किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को इस बात के लिये नौकरी से निकाला नहीं जाना चाहिये कि अपनी ड्यूटी खत्म होने के बाद उसने कंपनी के किसी अधिकारी या मालिक की काॅल अटंेड नहीं की। कोर्ट का साफ कहना था कि राइट टू डिस्कनेक्ट एक्ट के तहत आॅफिस से जाने के बाद किसी वर्कर का आॅफिस संबंधी काम से जुड़ा फोन काॅल उठाना या ना उठाना उसका निजी मामला है। यह काम या कंपनी के प्रति लापरवाही या कमी नहीं मानी जा सकती। वहां 2017 मंे ही राइट टू डिस्कनेक्ट कानून लागू हो चुका है। ऐसे ही 1914 में अमेरिका में वहां के जाने माने काॅरपोरेटर और फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड ने सबसे पहला काम अपनी कंपनी के मज़दूरों के काम के घंटे नौ से घटाकर आठ और वेतन 2.34 डाॅलर से सीधे दोगुना यानी 5 डाॅलर कर दिया था। उन्होंने असेंबली लाइन तकनीक का उपयोग करके आॅटोमोबाइल के प्रोडक्शन में क्रांति ला दी थी।
        उनके इस कदम से कारें आम लोगों के लिये काफी सस्ती हो गयी थीं। इससे श्रमिकों को स्थिरता उच्च मनोबल और आर्थिक समृध्दि मिली जिससे वे अपनी ही कंपनी में बनी कार खरीदने की हैसियत में आ गये। फोर्ड के इस कदम को फोर्डिज़्म कहा गया और इससे अमेरिकी मीडियम क्लास के विकास में भी सहायता मिली। फोर्ड ने इसे लाभ का मालिक और कर्मचारियों के बीच वाजिब वितरण बताया था जिससे उच्च वेतन और सस्ती चीजों का उत्पादन बढ़ा। अब हम मूल विषय पर आते हैं। हालांकि राइट टू डिस्कनेक्ट का अभियान जर्मनी फ्रांस सहित यूरूप के कई देशों सहित विश्व स्तर पर 2017-18 में अपने चरम पर था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सांसद और वरिष्ठ पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले ने दरअसल मूल राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पहली बार 2018 में ही लोकसभा में पेश किया था। लेकिन उस समय पर इस पर कोई खास चर्चा नहीं हुयी। इस बार फिर से सुले ने यह प्राइवेट मेंबर बिल-2025 संसद में पेश किया है। हालांकि सबको पता है कि सुले का यह बिल केवल चर्चा के लिये है। बिना सरकार की तरफ से पेश किये इसका पास होना असंभव है। लेकिन अच्छी बात यह है कि देश में इस बिल के मूल विचार को लेकर चर्चा चल निकली है। इसका प्रभाव यहां तक है कि केरल सरकार ने अपने स्तर पर एक ऐसा ही बिल लाने का निर्णय लिया है। इस तरह के कानून की आवश्यकता इसलिये भी महसूस की जा रही है कि आज के दौर में वर्कर्स के घर आने के बाद काॅल और ईमेल का जो सिलसिला शुरू होता है वह सेकंड शिफ्ट कहलाने लगा है। स्टेनफोड रिसर्च बताती है कि काॅरपोरेट सप्ताह में कर्मचारियों से 72 घंटे काम लेना चाहता है। जबकि आदर्श काम के घंटे 50 से 55 ही माने जाते हैं। पूंजीवाद की सोच के उद्योगपतियों को फोर्ड की यह खोज समझने की ज़रूरत है कि वर्कर जितना कम टाइम काम करेगा उसको अधिकतम आराम मिलेगा और ऐसा करने से एक तो काम के दौरान दुर्घटना होने की आशंका कम होती जायेगी दूसरी बात उसके काम की गुणवत्ता लगातार बेहतर होती जायेगी।
          जब वर्कर्स की नींद पूरी नहीं होगी उनके काम करने का उत्साह गुणवत्ता और लगन कम ही होती रहेगी। इसलिये यह मांग तेज़ होती जा रही है कि एक तो काम से घर लौटने के बाद या वर्क फ्राम होम करने वाले कर्मचारियों को काॅल या ईमेल नहीं किया जाना चाहिये और अगर ऐसा मना करने के बावजूद भी होता है कि वर्कर्स को राइट टू डिस्कनेक्ट के तहत यह अधिकार होगा कि वह अपना फोन स्विच आॅफ कर ले या ऐसा एप लगाकर सेटिंग बदल दे कि ऐसी अवांछित काॅल टैक्स्ट और मेल आॅटो मोड में खुद ही डिलीट होती रहे। ब्लैक बेरी मोबाइल में यह आॅपशन इन बिल्ट आने लगा है जिससे सर्विस आॅवर के बाद कर्मचारी को कंपनी आॅफिस से आने वाले ईमेल स्वतः ही रूक जाते हैं। यह भी माना जाता है कि अगर ऐसा कोई कानून बन भी जाता है तो कंपनी अनेक तरीकों से वर्कर्स पर दबाव बनाकर उससे एग्रीमेंट कर सकती है कि उसको काम के बाद घर जाने पर भी काॅल और मैसेज से कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन अगर कंपनी ने उसके ना चाहते हुए उसको राइट टू डिस्कनेक्ट कानून के तहत घर पर काॅन्टैक्ट करना जारी रखा तो बड़ी संख्या में मामले कोर्ट में जायेंगे। पंूजीवादी व्यवस्था में कंपनी एक और तरीके से अपने कर्मचारी को परेशान कर सकती हैं कि अगर उनको कर्मचारी का घर जाने के बाद कंपनी की काॅल और संदेश का जवाब नहीं देना बुरा लगता है तो वह या तो उसको अधिक समय पर आॅफिस रोकर बिना ओवर टाइम दिये काम लेंगी या फिर उसको किसी और बहाने से बाहर का रास्ता दिखा देंगी जिसके लिये कोई भी कर्मचारी तैयार नहीं होता। कहने का मतलब यह है कि राइट टू डिस्कनेक्ट कानून बन भी जाये तो वर्तमान व्यवस्था में लागू करना भी काफी कठिन काम होगा लेकिन इस स्तर पर भी यह विचार ग़जब का है। कानून बन जाये तो उसको लागू करने के तौर तरीके भी अमल में देर सवेर आने ही लगेंगे। एक शायर ने कहा है-
 *0 मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,* 
 *उसको छुट्टी ना मिली जिसने सबक याद किया।।* 
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर हैं।

काज़ी इसफरुल हक़ जकी

*क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की: सूद को छोड़ा,ग़रीबों को बैंकिंग से जोड़ा!*
0 जिस तरह से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने वाले सर सÕयद अहमद खां ने बहुत पहले यह समझ लिया था कि मुसलमानों को विकास से जोड़ना है तो उनको हायर एजुकेशन में आगे लाना होगा। उसी तरह से यहां 1971 में मुस्लिम फंड कायम करने वाले जलालाबाद निवासी क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की ने आधी सदी पहले यह जान लिया था कि अगर गरीब लोगों को कर्ज़ के चक्रवृध््िद ब्याज और उनके मकान दुकान को नीलाम होने से बचाना है तो उनको मामूली खर्च पर लोन देना होगा, साथ ही कट्टरपंथी कुछ भी आरोप लगाते रहें लेकिन जो लोग सूद के डर से अपना पैसा बैंकों में जमा करने को तैयार नहीं हैं उनको बिना ब्याज छोटी छोटी बचत जमा करके हिंदू मुस्लिम समाजसेवा के काम में लगाना है।    
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      1940 में नजीबाबाद के पास स्थित कस्बा जलालाबाद में पैदा हुए क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की का 26 नवंबर को इंतकाल हो गया था। 55 साल पहले उनके बड़े भाई शहर क़ाज़ी इज़हारूल हक़ के पास 70 के दशक में जमीयत उलेमा हिंद से जुड़े कुछ लोग आये। उन्होंने उनसे नजीबाबाद में भी एक ऐसा बैंकिंग सिस्टम चालू करने की बात कही जैसा देवबंद में बिना सूद के एक इदारा पहले से ही चल रहा था। दरअसल बिना सूद का बैंक रामपुर के पास एक कस्बे में चलने की जानकारी उस टाइम के जाने माने उलेमा और दारूल उलूम देवबंद के संचालक मौलाना असद मदनी को 1960 के आसपास मिली थी। वहां मदनी साहब किसी इजलास में शरीक होने के लिये गये थे। जब उनको उस इलाके के बंजारा जाति के मुसलमानों ने पहली बार इस तरह के फंड के बारे में बताया जिसमें अमीर लोग अपना फालतू पैसा बिना किसी सूद की नीयत के फंड में जमा करते हैं और ज़रूरतमंद गरीब लोगों को सोना चांदी के जे़वर ग्रवीं रखकर उस पैसे से छोटे छोटे कर्ज दिये जाते हैं तो उनको यह आइडिया इस्लामी हिसाब से होने वाली बैंकिंग के लिहाज़ से मुनासिब लगा। मदनी साहब ने बाद में इस तरह के फंड को देवबंद में कुछ लोगों को खोलने के लिये पे्ररित किया। यह फंड वहां खुला लेकिन मदनी साहब उनके इदारे दारूल उलूम और जीमयत उलेमा हिंद का इससे कोई सरोकार नहीं रखा गया। बाद में जमीयत के ही कुछ लोग जब नजीबाबाद में ऐसा नो प्रोफिट नो लाॅस वाला बिना सूद का इदारा खोलने के लिये शहर क़ाज़ी इज़हारूल हक़ के पास गये तो उन्होंने यह काम अपने छोटे भाई क़ाज़ी इस्फ़ारूल हक़ ज़की को सौंप दिया।
       क़ाज़ी जी ने इस फंड के सिस्टम को समझने के लिये देवबंद जाकर वहां ऐसा ही इदारा चलाने वाले हसीब साहब से पूरी जानकारी हासिल की। बाद में उन्होंने नजीबाबाद वापस आकर शहर के ज़िम्मदार हैसियतदार और सम्पन्न लोगों की मुस्लिम फंड के नाम से एक रजिस्र्ड कमैटी बनाई। जिसमें पत्रकार असद खां हाजी तस्लीम आढ़ती डाॅ जब्बार साहब और हाजी मुमताज़ चूड़ीवाले जैसे अनेक जानी माने लोग शामिल थे। फंड का पहला आॅफिस मुगलूशाह में हाफ़िज़ नूर मुल्तानी की दुकान में खोला गया। कुछ ही महीने बाद इस दफतर को रम्पुरा में यासीन डायमंड वालों के घर लाया गया। यहां लगभग 6 साल चलने के बाद वर्तमान हेड आॅफिस में यह फंड शिफ्ट हुआ। शुरू में इसमें जेवर रखकर जो कर्ज दिया जाता था उसके लिये काॅस्ट आॅफ लोन फाॅर्म बेचा जाता था। जिसकी दस बीस पचास और सौ रूपये कीमत होती थी। लेकिन बाद में यह सिस्टम बंद कर कर्ज पर मासिक रूप से कुछ मामूली फीस तय कर दी गयी। लेकिन इसको भी चक्रवृध््िद ब्याज से दूर रखा गया। इसके बाद स्टाफ की सेलरी स्टेशनरी घर और दुकान से जमा रकम की वसूली के लिये दिये जाने वाले कमीशन के बढ़ते हुए खर्च निकालने के लिये फंड में जमा एक्सट्रा पैसा बैंक में एफडी किया जाने लगा। इससे जो भारी कमाई शुरू हुयी उससे एक के बाद एक दिल्ली मुंबई सूरत वगैरा में फंड ने कार्यालय के लिये अपनी खुद की ज़मीन और उस पर निर्माण शुरू करा दिया। आज फंड में 700 से अधिक लोग काम करते हैं। जो भी सोना चांदी रखकर लोगों ने कर्ज लिया था। उसको वापस न लेने के बाद भी उसमें से एक ग्राम भी आज तक बेचा नहीं गया है।
       इस दौरान सरकार और आरबीआई के बदलते नियमों के तहत फंड का काम सीमित कर अल नजीब मिल्ली म्युचुअल बेनिफिट्स निधि लिमिटेड खोली गयी है। जिसमें जमाकर्ताओं को कंपनी को होने वाले प्रोफिट में हिस्सेदारी दी जाती है। इससे से क़ाज़ी जी पर लगातार लगने वाले सूदी कारोबार के आरोप पर भी कुछ हद तक लगाम तो लगी है लेकिन आज भी मुस्लिम फंड का वजूद कायम होने और पहले के कारोबार से जुटाये गये ब्याज के पैसे से ही सारा सिस्टम चलने से कुछ कट्टरपंथी आलिम इस तरह के कारोबार को हराम करार देते हैं। हालांकि क़ाज़ी जी ने इस विशाल आय से आगोश चैरिटेबिल हाॅस्पिटल नजीबाबाद आईटीआई लाइबे्ररी आंखों के आॅप्रशन के सालाना निशुल्क कैंप लखनऊ की समाजसेवी संस्था कल्याण करोति के सहयोग से विकलांग लोगों को बड़े पैमाने पर उपकरण हर साल गरीब लोगों को कंबल और लिहाफ़ भूकंप पीड़ितों की मदद बाढ़पीड़ितों की सहायता कोरोना लाॅकडाउन में घरेलू सामान की किट रोज़ा अफ़तार होली मिलन प्रोग्राम और कांवड़ती सेवा शिविर जैसे समाजसेवा और हिंदू मुस्लिम एकता के अनेक प्रोग्राम कराते रहे लेकिन जो कट्टरपंथी उनको सूद का हराम कारोबार करने वाला बताते थे वे होली और कांवड़ पर लगने वाले मुस्लिम फंड के सेवा शिविर की आलोचना ही करते रहे। क़ाज़ी जी सिटी प्रैस क्लब सहित कई समाजसेवी अदबी और कल्चरल व शैक्षिक संस्थाओं के संरक्षक और सदर व मैनेजर जैसे अहम पदों पर भी रहे और बराबर अपनी काबिलियत समय और पैसे से मदद करते रहे। हालांकि अब मुस्लिम फंड और अल नजीब संस्था उनके परिवार के लोग चला रहे हैं जिसके प्रबंधन व संचालन में पारदर्शिता और निष्पक्षता की उनके विरोधी लगातार मांग करते रहे हैं लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद संस्था के आर्थिक हालात अब अच्छे नहीं माने जाते हैं। बहरहाल क़ाज़ी जी ने जो कुरबानी दी कट्टरपंथी वर्ग के ताने सुने और समाजसेवा की उसकी दूसरी मिसाल बड़ी मुश्किल से ही देखने को मिलती है। एक शायर ने कहा है-
0 शोहरत मिली तो नींद भी अपनी नहीं रही,
गुमनाम जिं़दगी थी तो कितना सकून था।।
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर हैं।*

नजीबाबाद का होली मिलन_जेपी गुप्ता

सोशल मीडिया से......... हिंदुस्तानी 
*नजीबाबाद में होली मिलन ईद मिलन नरेश चंद जी का सराहनीय कदम था...* जे पी गुप्ता, पूर्व उपजिलाधिकारी 
जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
~~~~~~~~~~~~~~
       जीवन जब राष्ट्रीयता से ओतप्रोत होती है तब वह धर्म जाति संप्रदाय इन बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ जाती है. ऐसे ही एक शख्स की याद आज ताज़ा हो गई जिसका नाम है इक़बाल हिंदुस्तानी और ठिकाना है नजीबाबाद उत्तरप्रदेश. इस शख्स का वास्तविक नाम इक़बाल अहमद शेख था पर हिंदुस्तान की आत्मा को अपनी आत्मा में बसाकर वह व्यक्ति इक़बाल हिंदुस्तानी हो गया और यही नाम सभी रेकार्ड में दर्ज करा लिया.मुझे याद है कि नजीबाबाद की खूबसूरत धरती पर होली व ईद की मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द को ध्यान में रखते हुए एक बहुत ही खूबसूरत परंपरा स्व. श्री नरेश अग्रवाल जी द्वारा शुरू कि गई थी जो लगातार वहां पर निभाई जा रही थी. जिसमें होली के त्योहार पर होली मिलन का कार्यक्रम मुस्लिम समाज द्वारा और ईद की त्यौहार पर ईद मिलन कार्यक्रम हिंदू समाज द्वारा आयोजित किया जाता था. संजोग बस मुझे भी प्रशासक के रूप में वहां कार्य करने का अवसर मिला. हिंदू लोगों द्वारा ईद मिलन का सुंदर कार्यक्रम आयोजित किया जाता था और होली के अवसर पर होली मिलन कार्यक्रम मुस्लिम लोगों द्वारा. अपने कार्यकाल की दौरान ईद मिलन कार्यक्रम का सुन्दर आयोजन में मुख्य अतिथि की रूप में शिरकत करने का मौका मिला और उसके बाद होली मिलन कार्यक्रम जिसमें मुशायरा का कार्यक्रम होता था.होली मिलन कार्यक्रम की रूपरेखा देखकर मैंने कहा कि इसमें केवल मुशायरा ना होकर होली के गीत आदि भी शामिल किए जाने चाहिए तो आयोजन में शामिल कुछ लोगों द्वारा कहा गया की मुशायरा के साथ संगीत का कार्यक्रम करने से मुस्लिम समाज नाराज हो सकता है क्योकि मुआहरा मे अदब का एक अलग स्थान है.. मैंने देखा कि कुछ आयोजक तो इतना डर गए की कार्यक्रम की शुरुवात में वो मंच पर आने से कतराते रहे. ऐसे में इकबाल हिंदुस्तानी की हिम्मत देखने के काबिल थी. उन्होंने कहा कि मैं एसडीएम साहब के इस प्रस्ताव से बिल्कुल सहमत हूं और इसके लिए उन्होंने बहुत खूबसूरत प्लान किया.होली मिलन में कार्यक्रम का आगाज मुशायरे से किया गया और बीच-बीच में इस बात का अनाउंस करते रहे कि होली मिलन में खुद प्रशाशक साहेब होली गीत प्रस्तुत करेंगे तथा सनव्वर अली खान साहब संगीत पर प्रशासक साहेब कि लिखी गजल पेश करेंगे. धीरे-धीरे लोगों के अंदर उत्साह इस कदर बढ़ता गया कि उन्होंने आगे मुशायरा सुनने से पहले होली गीत सुनने की मांग कर दी और वह कार्यक्रम इतना जबरदस्त सफल हुआ जिसमें हिंदू मुस्लिम सभी लोग मिलकर खूब झूमे और नाचे. यहाँ तक कि मंच पर नोटों की बौछार भी कर दी. श्री नरेश अग्रवाल जी के उसे रोपे गए पौधे को सदा के लिए हरा भरा रखने के उद्देश्य से मैंने यह भी प्रस्ताव रखा था कि उक्त कार्यक्रम आगे नगर पालिका परिषद द्वारा कराया जा सकता है ताकि कार्यक्रम कभी वंद ना हो. आज जब पता चला कि अब होली मिलन का वो कार्यक्रम बंद हो चूका है तो पुरानी याद याद ताजा हो गई.
 सांप्रदायिक सौहार्द पर आधारित उस कार्यक्रम को क्यों बंद किया गया यह तो पता नहीं लेकिन मुझे लगता है कि वर्तमान कमिश्नर आदरणीय श्री aanjaney कुमार सिंह जी से अगर लोग मुलाकात करें और उसके इतिहास से अवगत कराएं तो शायद फिर एक बार होली मिलन और ईद मिलन का कार्यक्रम गुलजार हो सकता है.
 वर्ष 2011-2012 में होली मिलन कार्यक्रम की निजामत करते हुए मेरे मित्र इकबाल हिंदुस्तानी जी चित्र में देखे जा सकते हैं।
*नजीबाबाद में उपजिलाधिकारी रहे और कवि श्री जे पी गुप्ता की फेसबुक वॉल से*

निठारी कांड का अंजाम?

*निठारी कांडः कोली बरी, आखि़र 19 बच्चो का हत्यारा कौन था?* 
0 2006 में नोएडा के पास के गांव निठारी के एक के बाद एक कई बच्चे अचानक गायब हो गये थे। बाद में नोएडा के सैक्टर 31 मकान नंबर डी 5 के निवासी मोहिंदर सिंह पंढेर के पीछे स्थित नाले से खुदाई में 19 कंकाल मिले तो पूरे देश में हंगामा मच गया। इस मामले में शक होने पर पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को 29 दिसंबर 2006 को गिरफतार कर जेल भेज दिया गया। लेकिन जांच एजेंसियों की नालायकी फर्जी सबूत गढ़ने और नाकामी के चलते पहले पंढेर और बाद में 13 नवंबर 2025 को कोली को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। इस केस में आरोपियों का मीडिया ट्रायल भी साथ साथ चल रहा था। जिससे कोर्ट पर इस मामले के आरोपियों को जल्दी और सख़्त सज़ा देने का दबाव भी था।    
 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
       नोएडा के पास स्थित निठारी गांव के 13 बच्चो को काम और चाॅकलेट देने के बहाने पहले पंढेर के बंगले पर लाने फिर उनको काटकर उनके मांस को पकाने और खाने का आरोप बंगले के मालिक मोहिंदर सिंह पंढेर और उसके घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली पर था। सबूत के नाम पर पुलिस के पास कोली का एक कन्फेशन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जिसमें उसने माना था कि हां उसने यह सब किया है। पुलिस के अनुसार कोली ने यह भी स्वीकार किया था कि वह अगवा बच्चियों को बंगले पर लाने के बाद जब उनके मांस को काटता था तो कई बच्चियां बेहोश हो जाती थी और कुछ मौके पर ही मर जाती थी। पुलिस का दावा था कि वह लड़कियों को चाकू या आरी से काटता था। पुलिस का कहना था कि मांस काटने और पकाकर खाने के बाद वह बच्चियों के बाकी बाॅडी पार्ट बंगले के पीछे नाले में फेंक देता था।
      2009 में कोली को 14 साल की एक ऐसी ही गुमशुदा लड़की की हत्या के आरोप में एक कोर्ट ने सज़ा ए मौत सुना दी। 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी फांसी की सज़ा कन्फर्म भी कर दी। इसके बाद फांसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में यूपी के गवर्नर और 2014 में राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका निरस्त कर दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका भी निरस्त कर दी। इसके बाद 7 सितंबर 2017 को जब उसको फांसी लगाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। जल्लाद को भी बुला लिया गया था। उसकी फांसी का समय भी जेल में सुबह 5.30 बजे का तय हो चुका था। इसके बाद अचानक सुप्रीम कोर्ट की सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने फांसी के आदेश को यह कहकर चुनौती दी कि ऐसा आदेश कानूनन तीन जजों की बेंच खुली कोर्ट में ही दे सकती थी। उसी रात फांसी से मात्र 4 घंटे पहले अपने घर पर जस्टिस दत्तू ने जस्टिस अनिल आर दवे के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के दो और जजों के साथ एक बेंच गठित की और कोली की फांसी पर स्टे कर दिया। हालांकि अकतूबर 2014 में इस बेंच ने भी कोली की सज़ा ए मौत को बरकरार रखा। लेकिन उस दिन फांसी टलना ही कोली के लिये जीवनदान बन गया। फांसी के खिलाफ मुकदमे लड़ने के लिये देशभर में अपनी छवि बना चुके मंुबई के जानेमाने सीनियर वकील युग चैधरी ने यह केस अपने हाथ में ले लिया। चैधरी आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से इंगलिश लिटरेचर में डाॅक्ट्रेट और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री लेकर भारत आये थे। उनकी लीगल टीम में शामिल पायोशी राय सिध्दार्थ और नन सिस्टर शीबा जाॅस ने कोली के केस की बारीकी से स्टडी और जबरदस्त पैरवी की। चैधरी का कहना था कि यह पूरा केस फर्जी था।
         उनका यह भी कहना था कि कोली एक गरीब घरेलू नौकर था, इस वजह से महंगे वकील हायर कर अपना कानूनी बचाव ठीक से नहीं कर सका। चैधरी की टीम ने इस केस की ऐसी पैरवी करनी शुरू कर दी कि जनवरी 2015 में हाईकोर्ट ने कोली की फांसी की सज़ा उम्रकैद में बदल दी। इस दौरान 2010 से 2021 के बीच कोली के खिलाफ चल रहे 12 अन्य बच्चो की हत्या के मामलों में उसको लगातार सज़ा ए मौत दी जाती रही। इसकी वजह यह भी मानी गयी कि उसको मीडिया द्वारा लगातार सीरियल किलर और उसके मालिक पंढेर के घर को बूचड़खाना बताया जा रहा था। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे सुनवाई के दौरान सीरियल किलर कहा तो निचली अदालतों पर निर्णय देते समय इस टिप्पणी और मीडिया का दबाव माना गया। इसके बाद चैधरी की लीगल टीम की जोरदार पैरवी के बाद 16 अकतूबर 2021 को हाईकोर्ट ने अपील करने पर कोली को 12 हत्या के मामलों में बरी कर दिया। सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन वह निरस्त हो गयी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फांसी के फैसलों को मीडिया के दबाव में दिया गया बताया। इसके बाद कोली को तत्काल जेल से रिहा करने के आदेश सबसे बड़ी अदालत ने दिये तो कोली जेल से बाहर आ गया। कोली के वकील चैधरी का कहना था कि कोली उत्तराखंड के मंगरू खाल गांव का रहने वाला गरीब दलित है। जब चैधरी उससे उसकी कानूनी मदद करने को पहली बार मिले तो वह बहुत उदास और डरा हुआ था। जनवरी 2007 में जब उसको पहली बार कोर्ट में पेश किया गया था तो उसको वकीलों ने बहुत बुरी तरह पीटा था।
        कोली का यह भी कहना था उसको सरकार से उपलब्ध वकीलों ने बचाने की बजाये उल्टा फंसाने वाला काम किया था। उसको पुलिस ने पकड़ने के बाद 8 साल तक गैर कानूनी तौर पर एकांतवास में रखा था। कानूनन ऐसा कोर्ट के आदेश के बाद केवल 3 माह के लिये ही किया जा सकता है। उसने अपने खिलाफ गवाहों से जिरह करने के लिये जेल में रहते हुए कानून की पढ़ाई शुरू कर दी थी। कोली के खिलाफ सबसे बड़ा और एक मात्र सबूत उसका पुलिस की 60 दिन हिरासत में एक मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में लिया गया बयान था। कोली ने अपने नये वकील चैधरी को बताया कि इस बयान को जबरन रिकाॅर्ड करने के लिये पुलिस ने उसको बिजली के असहनीय झटके दिये उल्टा लटकाकर पीटा उसका मुंह घंटों तक पानी में डुबोया उसके नाखून प्लास से खींचे गये उसकी गुदा में पैट्रोल भरा गया उसके गुप्तांग को जलाया गया और उसका दिन रात यह धमकी देकर मानसिक उत्पीड़न किया गया कि भीड़ उससे बुरी तरह खफा है और पुलिस की बात ना मानने पर उसके परिवार को भीड़ के हवाले कर दिया जायेगा। सवाल यह है कि अगर कोली और पंढेर बेकसूर थे तो वे रिहा हो गये उनको बरी किया ही जाना था लेकिन उन 19 बच्चियों को किसने मारा? 19 साल बाद भी पुलिस और सीबीआई उनके असली हत्यारों को क्यों नहीं पकड़ सकी? अगर ऐसे चर्चित वीभत्स और आत्मा को झकझोरने वाले हत्या के सामूहिक मामलों में भी कातिल सज़ा नहीं पा सकते तो हमारी सरकार कोर्ट पुलिस और सिस्टम किस लिये बना है??? 

एक शायर ने कहा है-
 *0 तुम अदालतों में बैठकर चुटकुले लिखो,* 
 *हम सड़कों दीवारों पर इंसाफ़ लिखेंगे।।* 
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर हैं।*