*ट्रेन कोच एसी हो या नॉन एसी, डिस्टर्ब न हो किसी की प्राइवेसी*
*इक़बाल हिंदुस्तानी*
ख़बर है बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और कर्नाटक संगीत की गायिका शिवश्री स्कन्दप्रसाद एक ट्रेन के ए सी कोच में सफ़र कर रही थी। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, डिब्बे में सवार लगभग 40 यात्री का ग्रुप में लगातार शोर कर रहे थे। उन्होंने टीटी से अपना कोच बदलने की मांग की लेकिन बर्थ उपलब्ध नहीं होने से यह संभव नहीं हो सका। पांच घंटे के सफ़र के दौरान पहले तो उन्होंने उस यात्री समूह की टीटी से शिकायत की जो कार्ड खेल रहे थे और ज़ोर ज़ोर फिल्मी गाने गा रहे थे। टीटी ने एक बार उनको चुप भी कराया मगर कुछ देर बाद वे फिर से वही हरकतें करने लगे। शिवश्री ने अपनी लंबी पोस्ट में ऐसे लोगों से भविष्य में सफ़र के दौरान दूसरों की प्राइवेसी सुविधा और तकलीफ़ न पहुंचाने और सभ्य व्यवहार की अपील की है।
शिवश्री की इस शिकायत, समस्या और सलाह को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे साथ वाले दूसरे लोगों को लगे हम एक तमीज़ वाले इंसान हैं। इसे आप सिविक सेंस या कॉमन सेंस भी कह सकते हैं। दरअसल हम लोग शोर अनाधिकार चेष्टा और अनचाही चीज़ों के इतने आदी हो गए हैं कि जब कोई इन अवांछनीय और निजता को ठेस पहुंचाने वाली हरकतों पर आपत्ति करता है तो समाज के बड़े वर्ग को वही आदमी ऐसा लगता है जैसे वह किसी दूसरे ग्रह से आया हो। आपने भी ट्रेन बस या सार्वजनिक स्थानों पर अकसर देखा होगा लोग जो मर्ज़ी चाहे मनमानी करते रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि वे जहां हैं वह जगह केवल उनकी निजी नहीं है। अगर आप सार्वजनिक स्थान पर हैं तो आपका फ़र्ज़ है कि आप साथ वाले या पास वाले लोगों को किसी भी तरह से अपनी किसी भी हरकत से परेशान नहीं करें। मिसाल के तौर पर ज़ोर ज़ोर बोलना, हंसना और मोबाइल पर स्पीकर ऑन कर तेज़ आवाज़ में सर्फिंग करना सभ्य सुसंस्कृत और जिम्मेदार नागरिकों को बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। इसके लिए हेड फ़ोन इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही कॉल पर तेज़ आवाज़ में बात करना भी शालीनता नहीं माना जाता। बेहतर है ऐसे में चैट या एसएमएस से जवाब दें।
इतना ही नहीं कुछ यात्री डिब्बे में अपने बच्चों को खेलने के लिए छोड़ देते हैं जो बाक़ी मुसाफिरों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। कुछ लोग लगातार हंसी मज़ाक और गाली गलौच के साथ घटिया बहस करते हैं। कुछ यात्री अपने पैर सामने वाले की सीट पर रखते हैं और कुछ ढेर सारा सामान बर्थ पर रख देते हैं। कुछ बिना टिकट और बिना रिजर्वेशन के ही दूसरे की सीट/बर्थ हथिया लेते हैं और ख़ाली करने को कहने पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। कुछ कोच के गेट पर खड़े रहकर ट्रेन से उतरने चढ़ने वालों को जगह ही नहीं देते। कुछ फ़र्श पर कपड़ा बिछाकर सो जाते हैं जिससे बर्थ वाले यात्री इधर उधर जाने में दिक्कत महसूस करते हैं। कुछ तेज़ गंध वाला खाना गुटका या शराब पीने लगते हैं। कुछ पान गुटके की पीक और बीड़ी सिगरेट का धुआं छोड़ते रहते हैं। कुछ दूसरों की फ़ोन स्क्रीन को झांकते हैं और ख़ास तौर पर लेडीज़ को नीचे से ऊपर तक बेशर्मी से घूरते रहते हैं या लाइट बंद होने पर छेड़छाड़ भी कर देते हैं। कुछ देर रात तक भी लाइट बंद नहीं करने देते जिससे दूसरे यात्री ठीक से सो नहीं पाते। कुछ बिना परमिशन सामने वाले की बातचीत में शामिल हो जाते हैं जो सलीके के खिलाफ़ माना जाता है। ऐसी और भी अनेक बातें, हरकतें और घटनाएं यहां गिनाईं जा सकती हैं जिससे साथ सफ़र कर रहे दूसरे यात्री असहज हो जाते हैं लेकिन पता नहीं कब कुछ भारतीय दूसरों की प्राइवेसी नागरिक बोध और सभ्यता को समझेंगे। ऐसे लोगों के लिए शायर कहता है...
*सलीक़ा यूं तो आता है बक़द्र ए ज़र्फ़ इन्सां को,*
*सलीक़ा जिसको कहते हैं बड़ी मुश्किल से आता है।*
No comments:
Post a Comment