हाईकोर्ट का जुर्माना व फटकार, यूपी के अफ़सरों में होगा सुधार?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की छात्रा आकृति चैधरी पर गलत तरीके से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए लगाने पर वहां के डीएम और पुलिस अफसरों पर पांच लाख जुर्माना और कड़ी फटकार लगाई है। हालांकि यूपी सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है लेकिन केस के तथ्यों व प्रमाणों से वहां से भी उसको राहत मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं। ऐसे ही देवरिया में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के आरोप में उच्च न्यायालय ने वहां के एसएचओ के वेतन से काटकर 65000 रूपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस के जवाबों से नाराज़ होकर उसको ‘‘झूठों का झुंड’’ तक बता दिया। उधर नोएडा में ही एक छात्र को जंतर मंतर के आंदोलन में हिस्सा लेने के आरोप में एक मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताते हुए कोर्ट की मानहानि की कार्यवाही की चेतावनी दी है।
नोएडा के मामले में कोर्ट ने छात्रा आकृति पर एनएसए लगाने को पूरी तरह गलत बताते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत बताया। आपको याद दिला दें कि आकृति दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ ही सोशल एक्टिविस्ट है। आकृति को नोएडा में हुए मज़दूर आंदोलन के आरोप में अप्रैल 26 में गिरफतार कर पांच माह से जेल में रखा गया था। आकृति पर मज़दूर आंदोलन मंे 13 अप्रैल को हुई हिंसा फैलाने का आरोप था जबकि उसको 12 अप्रैल को ही पकड़कर पुलिस ने जेल भेज दिया था। इससे पहले आकृति ने मज़दूरों के बीच केवल एक बार भाषण दिया था जिसमें उसने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाये रखने की अपील भी की थी। आकृति पर दूसरा आरोप व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसमें हिंसक विचार फैलाने का था। जांच में पाया गया कि ग्रुप शिक्षा व समाजसेवा के लिये था लेकिन इसमें पहचान छिपाकर नोएडा के दो पुलिसवाले शामिल हो गये थे। हैरत की बात यह रही कि यही पुलिसवाले विवादित पोस्ट डाल रहे थे। ग्रुप में शामिल अमनपसंद और कानून का पालन करने वाले सदस्यों ने इन पोस्ट पर आपत्ति की और इनको तत्काल डिलीट भी कर दिया था। यहां जो मामले दिये गये हैं वे हाल ही के हैं। कोर्ट पहले भी कई बार यूपी सरकार पुलिस और प्रशासन को नियम कानून व संविधान के हिसाब से काम करने को सख्त लहजे में निर्देश दे चुका है। किसी भी आरोपी के घर पर बुल्डोज़र चलाने, एनकाउंटर करने और फर्जी केस बनाकर किसी को भी हिरासत में लेने पूछताछ के नाम पर रिमांड पर लेकर थर्ड डिग्री देने और एनएसए व यूएपीए जैसे बेहद कड़े कानून का सत्ता के इशारे पर गलत इस्तेमाल करने के कई मामलों में कोर्ट पहले भी शासन प्रशासन और पुलिस को कड़ी चेतावनी दे चुका है।
देखने मंे यह आ रहा है कि कुछ अधिकारी संविधान से अधिक अपने आकाओं को खुश करने के लिये कानूनी गैर कानूनी काम करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जनसेवक हैं। उनको वेतन जनता के दिये कर से मिलता है। आज नहीं तो कल सरकार बदल सकती है। उनकी जवाबदेही नियम कानून और उनके किये गये कामों के हिसाब से बाद में भी कभी ना कभी हो ही सकती है। वे भी एक दिन कानून के शिकंजे में फंस सकते हैं। उनका असली काम जनता की रक्षा करना उसकी सेवा करना और जनहित की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाना है। लेकिन आज अनेक भ्रष्ट अफसर लालच अच्छी पोस्टिंग रिश्वत की मोटी कमाई और अपनी कानून के खिलाफ पहले की गयीं कारगुजारियां छिपाने के लिये सत्ताधारी दल के लिये उसका राजनीतिक पक्षपातपूर्ण भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक एजेंडा लागू करने का औज़ार बने हुए हैं। अगर कोर्ट उनको ऐसे ही हर गलती हर अन्याय और हर मनमानी पर फटकार लगाकर जुर्माना लगाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बेलगाम नौकरशाही को अपनी वर्दी अपनी नौकरी और जुर्माने से बचाने को मजबूर होकर संविधान के दायरे में ही काम करना होगा। फिर हाशिये पर पड़े अच्छे ईमानदार और योग्य अधिकारियों को अपना काम सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय करने का मौका भी मिलेगा। क़तील शिफाई का एक शेर याद आ रहा है- हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले, क़ीमते देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और तर्कशील समाज अखबार के चीफ एडिटर हैं।
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