Friday, 11 September 2026

आईफोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था

*आई फ़ोन नहीं बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल भी जानलेवा है?*
                 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
             महाराष्ट्र के संभाजी नगर में एक बच्चे ने आई फ़ोन लेने की ज़िद पूरी नहीं होने पर जान दे दी। सतही तौर पर देखें तो बेशक आत्महत्या की वजह आई फोन ही नज़र आती है लेकिन बड़े परिप्रेक्ष्य में गहराई से देखें तो एक बड़ी वजह हमारा बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था व विकास का उपभोक्तावादी असमान आय वाला असफल पूंजीवादी मॉडल भी है। आई फोन वाली घटना पर बाद में पहले इसी मॉडल पर बात करते हैं। एलपीजी यानि लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल मतलब उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की पूंजीवादी नीतियों ने आज पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हमारा देश भी 1991 से मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता छोड़कर पूरी तरह पूंजीवादी मॉडल को अपना रहा है। दक्षिणपंथी अधिकांश राजनीतिक दल पूरी तरह इस मॉडल के पक्ष में रहे हैं। भारत में भी बीजेपी ने 2014 से चुनाव अपने बल पर जीतने के बाद सांप्रदायिकता और कॉर्पोरेट का एक कॉकटेल बना लिया है। कहा जाता है कि कॉर्पोरेट ने चुनाव से पहले ही मोदी को पीएम मैटीरियल मानकर उनकी जीत के लिये पैसा पानी की तरह बहाया था। मोदी ने सत्ता हासिल करते ही बाक़ी बची हुई समाजवादी नीतियों को भी तिलांजलि देने की नीयत से पूरी तरह क्रोनी कैपिटलिज़्म को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सबको पता है *पूंजीवाद उपभोक्तावाद को खुलकर बढ़ावा देता है। कॉर्पोरेट विज्ञापनों के ज़रिए बाज़ार में ऐसा माहौल बनाता है जिससे लोग उसके मोहपाश में फंसकर गैर ज़रूरी चीज़ें अधिक खरीदने लगते हैं। पैसा पास नहीं हो तो उधार लेते हैं। बाज़ार लोगों के दिमाग़ को कंट्रोल करने लगता है। कंपनियां अपनी बिक्री और बेतहाशा मुनाफा कमाने के एकसूत्री लक्ष्य को हासिल करने के लिए बाज़ार को उन सामानों से पाट देती हैं जो लोगों की वास्तविक या बुनियादी जरूरतों का नहीं होता। चंद पूंजीपतियों को देश के सब संसाधन कारोबार और मोनोपली वाली उत्पादन की कंपनियां सौंप देने से उनका अर्थव्यवस्था पर एकक्षत्र कंट्रोल हो गया है। आज देश में बाज़ार तय कर रहा है कि लोग क्या खायेंगे क्या पहनेंगे और क्या क्या खरीदेंगे?* 
         इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन लोगों की इतनी आमदनी नहीं है कि वे आई फोन या कोई और महंगा गैजेट खरीद सकें उनको उसके बिना समाज में हीन भावना भी बाज़ार महसूस कराता है। यह समाज में फैशन बन जाता है। ऐसे में लोग ये विलासिता की चीज़ें उधार किश्तों पर खरीद लेते हैं। बाद में जब अचानक नौकरी चली जाती है या कोई और बड़ा खर्च स्वास्थ्य शिक्षा या शादी का आ जाता है तो कर्ज़ की किश्तें रुक जाती हैं। ऐसे में क़र्ज़ देने वाली कंपनी अपने ऑफिस से से ही आपका उधार खरीदा गया मोबाइल अपने सिस्टम से लॉक कर देती है और लाखों का मोबाइल अचानक डब्बा बनकर वेस्ट मैटिरियल बनकर एक कोने में चला जाता है। यह आघात गरीब और मीडियम क्लास लोग क्या किसी भी वर्ग के आदमी को बर्दाश्त नहीं होता। क़र्ज़ पर लिए और भी सामान का किश्तें रुक जाने पर कंपनी के दबंगों द्वारा यही हश्र होता है। उसके बाद इस सदमे में डूबा बच्चा हो बड़ा हो या कोई बुद्धिजीवी अवसाद में चला जाता है। तनाव और दुख में आत्मघाती कदम भी उठा लेता है जिससे वह खुद ही नहीं पूरा परिवार तबाह हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। चलना भी चाहिए। समाज में सम्मान से रहने को कई मामलों में साथ चलना पड़ता भी है लेकिन हम सबका आर्थिक स्तर समझ का स्तर शिक्षा का स्तर और आय इतनी नहीं है कि हम अमीर लोगों या विकसित देशों की बराबरी कर सकें। आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां रोज़गार बढ़ने की बजाए कई क्षेत्रों में तो घट रहे हैं ए आई की वजह से कुछ कंपनियों में नौकरी कम हो रही हैं। ट्रैजिडी यह है कि देश की कुल आय और प्रॉपर्टी का बड़ा हिस्सा चंद पूंजिपतियों की तिजोरी तक सीमित होता जा रहा है। आम आदमी के पास जब पर्याप्त आय नहीं होगी तो रहने को अच्छा घर पौष्टिक खाना स्टैंडर्ड का रहन सहन पहनावा अच्छी शिक्षा और बेहतर चिकित्सा कहां से आयेगी? *यही वह पूंजीवादी असफल ग़ैर समावेशी विकास का जानलेवा मॉडल है जिससे कोई बच्चा पेपर लीक होने से कोई परीक्षा में असफल होने से कोई इंटरव्यू में पक्षपात होने से कोई नौकरी नहीं मिलने से कोई नौकरी छूट जाने से तो कोई इंसान क़र्ज़ अदा नहीं कर पाने से कोई बीमारी का महंगा इलाज नहीं करा पाने से कोई किसान फ़सल उजड़ जाने से कोई पीड़ित थाने में रिपोर्ट नहीं होने से कोई कोर्ट में केस हार जाने से कोई स्कैम में लाखों का फ्रॉड होने से और कोई आई फोन नहीं खरीद पाने से जान देने को मजबूर हो जाता है।*
        अब बात करते हैं उस घटना पर जिसमें महाराष्ट्र के संभाजीनगर का एक बच्चा आई फोन लेने की ज़िद में पास की 300 मीटर ऊंची पहाड़ी पर चढ़ गया। उसको बचाने उसके पिता पहाड़ी पर चढे़ तो वे भी उसके साथ साथ संतुलन खोने से फिसलकर नीचे गिर गये। यह अनर्थ देखकर उस बच्चे की मां ने भी पहाड़ी से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान सदमें में दे दी। कुछ ही पल में देखते ही देखते पूरा परिवार मौत के आगोश में समा गया। दिल्ली में एक वेंडर ने महंगा आई फ़ोन फाइनेंस कराया था। वह जब उसके लोन की किश्तें टाइम पर जमा नहीं कर पाया तो उसने भी जान देने को यमुना में छलांग लगा दी लेकिन पास के लोगों ने उसे बचा लिया। सतही तौर पर देखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि मोबाइल की वजह से तीन जानें चली गयीं। कुछ को लगता है कि आईफोन की वजह से ऐसा हुआ क्योंकि मोबाइल तो आजकल लगभग सभी के पास हैं। इस परिवार के पास भी होगा। अगर नहीं भी होता तो पहले से मांग कर रहे बच्चे को कोई सस्ता सा मोबाइल दिलाना कौन सी बड़ी बात थी? लेकिन आई फोन चूंकि बहुत महंगा होता है इसलिये यह परिवार आईफोन नहीं दिला पाया होगा जिससे पूरा परिवार असमय ही काल के गाल में समा गया?
          बच्चा चला गया उसके मातापिता चले गये यानी पूरा परिवार खत्म हो गया। कभी कभी हम चीज़ों को बहुत सतही तौर पर देखते हैं। उसकी वजह यह है कि हमें केवल जितना बाहर से दिखता है। यानी जितनी जानकारी हमारे सामने आती है। उसी पर चर्चा करते हैं। यह स्वाभाविक भी है। यह कहना बहुत आसान है कि आज मोबाइल ने बच्चो को बिगाड़ दिया है। उनको ज़िद्दी बना दिया है। कुछ लोग बड़ों के भी मोबाइल के इस्तेमाल के नुकसान गिनाने लगते हैं। कुछ कहते हैं कि जब से मोबाइल आया हर कोई मोबाइल में ही लगा रहता है। वह किताब अखबार और परिवार को समय नहीं देता। वह सामाजिक नहीं रह गया है। वह अनैतिक होता जा रहा है। वह मोबाइल पर पोर्न देखता है। फिल्में देखता है। गाने सुनता है। रील देखता है। अंजान लोगों से चैट करता है। हर समय व्हाट्सएप फेसबुक एक्स थ्रेड यू ट्यूब ईमेल और इंस्टाग्राम पर लगा रहता है। किसी के पास परिवार से बात करने साथ बैठने खाना खाने नाश्ता करने और पिकनिक के लिये भी टाइम नहीं है। यहां तक कि जब लोग किसी ग़म या खुशी के प्रोग्राम में भी जाते हैं वहां भी अपने मोबाइल में ही बिज़ी रहते हैं। लेकिन सच केवल इतना ही नहीं है।
        मोबाइल पूरी दुनिया में आया है। वहां भी ये सभी एप चलते हैं। वहां भी लोग चैट करते हैं। हर देश में मनोरंजन करने वाले लोग हैं। वहां लोगों को ये सब शिकायते मोबाइल से नहीं हैं। उन्होंने अनुशासन अपनाया हुआ है। उनके यहां नैतिकता मौजूद है। उन्होंने एक सिस्टम बनाया हुआ है। यानी उनको मोबाइल से कोई शिकायत नहीं है। वे मोबाइल को इस्तेमाल करते हैं। वे मोबाइल के एडिक्शन के शिकार नहीं हैं। सच यह है कि अगर इंसान परिवार और समाज मोबाइल ही नहीं हर चीज़ का व्यवस्थित सुनियोजित और समय के हिसाब से नपा तुला इस्तेमाल करे तो मोबाइल ही नहीं किसी चीज़ से कोई परेशानी नहीं होगी। अति हर चीज़ की बुरी होती है।
   इसलिये सावधान रहें सजग रहें और अपनी सीमा में रहकर ही खरीदारी करें। अपने बच्चों को शुरू से ही अपनी आय अपनी खरीद क्षमता और अपनी उपभोग सीमा से परिचित करायें, अच्छे बच्चे के संस्कार सिखायें और उनसे समय समय पर अनुशासन व अच्छे नागरिक बनने अच्छा इंसान बनने और माता पिता का कहना मानने के फायदे बतायें। बच्चों से संवाद बनाये रखें। इसके साथ ही हमें ज़रूरत और विलासिता की इच्छा में भी अंतर करना सीखना चाहिए। उपभोक्तावाद बाज़ार के जाल और विज्ञापनों के चंगुल से अपने बच्चों परिवार और खुद को बचाने का प्रयास करें। फिलहाल बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बचने निबटने और नुकसान कम करने का यही तरीका है। वसीम बरेलवी ने शायद ऐसे ही बच्चों के लिए एक शेर कहा है...
*"नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,*
*कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है"*

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