*प्रिशा बेटा ईश्वर से कहना हम सबको कभी माफ़ नहीं करे...?*
हल्दौर के पत्रकार भाई संजीव मिश्रा की सात साल की बेटी प्रिशा अब इस दुनिया में नहीं है। उसको बुख़ार था। उल्टी आ रही थीं। इस मौसम में यह आम बात है। संजीव मिश्रा उसको बिजनौर इलाज को लाये थे। शायद सोचा होगा बिजनौर बड़ा शहर है। अच्छा इलाज मिलेगा। लेकिन यहां तो नजीबाबाद रोड के एक अस्पताल में कई घंटे इलाज ही नहीं हुआ। डॉ ने देखा तक नहीं। उसको दूसरे हॉस्पिटल में रेफर भी नहीं किया। यह हॉस्पिटल है या बूचड़खाना? डॉ को लोग भगवान का दर्जा देते हैं क्योंकि वे मरते लोगों को दूसरा जीवन देते हैं। लेकिन यहां तो डॉ "यमराज" बन गए। इतने क्रूर, इतने स्वार्थी और इतने असंवेदनशील?
जब हमने रात को यह खबर सुनी, खाना नहीं खाया गया। भूख गायब हो गई। रात भर नींद भी नहीं आई। उस मासूम बच्ची का चेहरा नज़रों में घूमता रहा। आँखों में खुद ही आंसू आते रहे। दिल दुखता रहा। वो नादान बच्ची ज़िन्दा आई थी और एक दिन बाद उसकी डैड बॉडी घर लौटी। उसके और उसके मातापिता के कितने सपने रहे होंगे। वो बड़ी होती। पढ़ती लिखती। कुछ बनती। हो सकता था देश और समाज के लिये कुछ नया करती। अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती। उसकी शादी होती। हंसता खेलता परिवार होता। मातापिता नाना नानी बनते। कितने खुश होते सब। लेकिन एक भूल एक गलती और आपराधिक लापरवाही ने उस घर का गोद लिया एक मात्र चिराग़ भी बुझा दिया। अब संजीव भाई और उनकी पत्नी उनके परिवार के दूसरे लोग किस के सहारे जियेंगे? किसके लिए जिएंगे? ज़िंदगी में एक बड़ा शून्य आ गया। एक खालीपन आ गया। एक बड़ी कमी आ गई। अब उनको दुनिया वैसी नहीं लगेगी जैसी प्रिशा के ज़िंदा रहते लगती थी। सब खोखला बेमतलब और बेकार नज़र आयेगा।
प्रिशा बेटा यह उम्र नहीं थी तेरे जाने की, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। प्रिशा बेटा हम सब तेरे गुनहगार है। हमारा पूरा सिस्टम तेरा "हत्यारा" है। आरोप है इसी अस्पताल में ऐसे तीन केस तीन माह में हो चुके हैं। ऐसे और भी जानलेवा अस्पताल होंगे। ऐसे और भी लापरवाह डॉक्टर होंगे। बेशक अच्छे अस्पताल और अच्छे डॉक्टर भी हैं। लेकिन शासन प्रशासन और समाज बुरे लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। हमारा सारा सिस्टम लगभग फेल हो चुका है। ऐसी कोई घटना होती है तो कुछ पल कुछ घंटे और कुछ दिन क्षणिक आवेश में हंगामा मचता है। फिर जांच होती है। फिर कुछ दिन बाद जांच कंप्रोमाइज हो जाती है। जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली जाती है। उस पर ठोस एक्शन नहीं होता। मेडिकल ही नहीं सभी फील्ड में लगभग ऐसा ही है। सब जगह सेटिंग करने वाले बैठे हैं। बस कीमत अलग अलग है। बस उन तक पहुंच होनी चाहिए। इंसान की जान सबसे सस्ती है। हम लोग ज़िंदा लाशें बन चुके हैं। हमारा ज़मीर हमारी आत्मा हमारा ईमान कब के मर चुके है। ऐसा लगता है हम लोग इस धरती पर बोझ हैं। हम में भावनाएं नहीं हैं। प्रिशा हम शर्मिंदा है। प्रिशा बेटा हम सब पापी हैं। प्रिशा बेटा हमें माफ़ मत करना, ईश्वर से कहना हमारे समाज को ऐसी सज़ा दे जिससे हम पैसे की जगह इंसान की जान की कीमत समझें। ईश्वर से शिकायत करना जिससे हम लोग सुधर जाएं। शायद वरिष्ठ पत्रकार भाई सूर्यमणि रघुवंशी और उनके साथी पत्रकार धरना नहीं देते तो डॉ माफ़ी भी नहीं मांगते। भला हो बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह एडवोकेट और किसान यूनियन अराजनीतिक के पदाधिकारियों व अन्य समाजसेवी संस्थाओं का जिन्होंने मानवता दिखाते हुए इस धरने को तत्काल सपोर्ट किया। आजकल हमारे समाज का यह हाल है...
*मौत के डर से नाहक परेशान हैं,*
*आप ज़िंदा कहां हैं जो मर जाएंगे.*
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