Friday, 11 September 2026

हिंदुत्व समर्थक और विरोधी...

*हिंदुत्व के समर्थक और विरोधी, हिंसक होने के अधिक आरोप किस पर हैं?*
                           *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए भाषण में "दिमागी नक्सल" शब्द पर एक पखवाड़े से अधिक समय से चर्चा चल रही है। पहले संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजूजी ने सफ़ाई दी थी कि इस शब्द का विपक्ष से कोई मतलब नहीं है। लेकिन दिमागी नक्सल पर संघ के मुख्य पत्र ऑर्गनाइजर में छपे विस्तृत लेख, बीजेपी के ट्विटर हैंडल पर वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई जैसे बुद्धिजीवीयों को "इंटेलेक्चुअल नक्सल" बताने और इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में पूर्व में आरएसएस से जुड़े रहे बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राम माधव के साप्ताहिक स्तम्भ रामराज्य में प्रकाशित विचारों से स्पष्ट हो गया है कि अर्बन नक्सल दिमागी नक्सल के बाद अब इंटेलेक्चुअल नक्सल नाम से इस आरोप में उन सब लोगों को शामिल कर लिया गया है जो बीजेपी संघ के हिंदुत्व मॉडल से सहमत नहीं हैं, तटस्थ हैं या विरोधी हैं। उन्होंने ऐसा कहकर एक तरह से ईराक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के उस बयान को याद दिला दिया है जिसमें उन्होंने दुनिया के देशों को यह कहकर धमकाया था कि अब बीच का कोई रास्ता नहीं है, इस खाड़ी जंग में या तो आप हमारे साथ रहें नहीं तो आपको चुप रहने पर हमारे खिलाफ़ यानी अमेरिका का दुश्मन माना जायेगा। जबकि इतिहास गवाह है भारत ने तो एक दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की गुटबंदी से बचने के लिए ही गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया था जिसमें न्यायप्रिय तटस्थ और निष्पक्ष विश्व के अनेक देश हमारे साथ जुड़े थे और उस दौर में दुनिया दो ध्रुव से तीन बड़े हिस्सों ने नज़र आने लगी थी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी संघ या पीएम मोदी ने हिंदुत्व विरोधियों या निष्पक्ष बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया हो। संघ परिवार पहले दिन से ही "या तो हमारे साथ नहीं तो हमारा शत्रु" की नीति पर चलता रहा है। यही वजह है कि वे विपक्ष, विरोध करने वाले नागरिक समाज और बीजेपी सरकार के खिलाफ़ जनहित के मुद्दों पर आंदोलन करने वालों को बीजेपी विरोधी सरकार विरोधी या किसी विशेष सरकारी फैसले का विरोधी नहीं सीधे "राष्ट्र विरोधी देशद्रोही और पाकिस्तानी खालिस्तानी" बताकर उनका मनोबल तोड़ते हैं, उन पर विदेशी साज़िश टूलकिट का आरोप लगाते हैं और साथ ही उनको हिंदू विरोधी घोषित करके समाज में उनकी छवि खलनायक की बनाने का प्रयास करते हैं। 
          अगर थोड़ा पीछे चलें तो हम देखते हैं कि हिंसा का आरोप तो वे नक्सल माओवादी और वामपंथी सोच वालों पर लगाते हैं लेकिन खुद बीजेपी संघ पर दंगों के आरोप लगते रहे हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद बाबरी मस्जिद तोड़ने के आरोप हैं। उनके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की विवादित यात्रा से देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़काने का आरोप लगा है। खुद मोदी पर गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों का कोच जलने पर पूरे प्रदेश में भड़के दंगे जानबूझकर नहीं रोकने का विपक्ष आरोप लगाता रहा है। बीजेपी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कुछ अन्य पर तो बाकायदा भगवा आतंकवाद का आरोप रहा है जिससे समझौता एक्सप्रेस ट्रेन सहित मक्का मस्जिद में बम विस्फोट से हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जे एन यू, जादवपुर यूनिवर्सिटी व गार्गी कॉलेज सहित कई गैर हिंदुत्व विचारधारा के संस्थानों संगठनों और व्यक्तियों पर हिंसक जानलेवा और सुनियोजित हमले करने के संघ परिवार पर समय समय पर गंभीर आरोप लगे हैं। गौरी लंकेश नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे जैसे पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट की हत्या कराने में दक्षिणपंथी सोच का हाथ होने का आरोप लगा है।
           किसान आंदोलन, सी ए ए के खिलाफ़ शाहीन बाग़ आंदोलन और भीमा कोरे गांव में दलित सम्मेलन में हिंसा के गंभीर आरोप भी संघ परिवार पर लगे हैं लेकिन इसमें सत्ता पक्ष ने उल्टा आरोप लगाने वाले यानी पीड़ित समझे जाने वाले पक्ष को ही यूएपीए जैसे मुकदमों में जेल भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर हमला करने वाले तेजिंदर सिंह बग्गा को जिस तरह बीजेपी ने पार्टी में लिया और फिर पंजाब की आप सरकार की कानूनी कार्यवाही से केजरीवाल के मानहानि के केस में बचाया, उस तरह के भी यहां छोटे बड़े दर्जनों अनेक मामले इसके अलावा भी गिनवाए जा सकते हैं लेकिन उससे यह साबित नहीं होता कि अकेले बीजेपी और संघ ही ऐसे हिंसा के आरोपों से घिरे हैं, हां ये आरोप अधिक अवश्य हैं।
      *अगर मुख्य विपक्षी दल की बात करें तो कांग्रेस का दामन 1984 की सिख विरोधी हिंसा से दाग़दार है। तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने इस एकतरफा सिख नरसंहार को यह कहकर जस्टिफाई करने की अनैतिक कोशिश भी की थी कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती काँपती ही है। ऐसा ही मिलता जुलता बयान गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन सीएम मोदी ने देते हुए कहा था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। अगर अन्य विपक्षी दलों का रिकॉर्ड देखें तो उनमें से वामपंथी दलों और टीएमसी पर सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे हैं। यूपी में सपा और बिहार में राजद पर भी कभी कभी माफियाओं की शह पर हिंसा और कुछ बड़े अपराधों के आरोप लगे हैं। ऐसे ही अन्य क्षेत्रीय विपक्षी दलों पर छिटपुट हिंसा के आरोप लगते रहे हैं लेकिन इनमें महाराष्ट्र की शिवसेना का विशेष रूप से उत्तर भारतीयों और दंगों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा का विवादित इतिहास है, जो लंबे समय से बीजेपी के साथ गठबंधन में रही और हिंदूवादी सोच से ही प्रेरित रही है। *आज के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो बीजेपी के विभिन्न प्रकोष्ठ जिनमें बजरंग दल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, हिंदुत्व से असहमत लोगों के साथ हिंसा करने के बहुतायत आरोपों से घिरे हुए हैं। इनमें विशेष रूप से गौ मांस, गो हत्या, लव जेहाद, धर्म परिवर्तन जैसे विभिन्न फर्ज़ी जेहाद, मॉब लिंचिंग कांवड़ खंडित होने पर हिंसा,मस्जिद मदरसों और चर्चों पर झूठी सूचनाओं के आधार पर हमले और हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के झूठे सच्चे आरोप लगाकर हिंसा करने के थोक में आरोप लगते रहे हैं।* इससे एक ट्रेंड पता लगता है कि जो आरोप लगा रहे हैं वे हिंसा के अधिक आरोपी हैं और जो संविधान लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्मनिरपेक्षता समानता मानवता आंदोलन विरोध प्रदर्शन धरना समाजवाद नैतिकता आरक्षण और सबके लिए सस्ती शिक्षा स्वास्थ्य व रोज़गार की मांग करते हैं, लेकिन हिंसा का सहारा नहीं लेते उनको आरोप लगाकर सत्ता के बल पर विलेन बनाया जा रहा है।
            *कोई भी विचारधारा, हिंसा और अपराध के हिसाब से देखें तो सुप्रीम कोर्ट और अनेक उच्च न्यायालयों (विशेष रूप से केरल हाईकोर्ट) ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि केवल किसी विचारधारा (मिसाल के तौर पर माओवाद या नक्सलवाद ) को मानना या उससे हमदर्दी रखना तब तक अपराध की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि वह आदमी उस विचार को बाकी नागरिकों पर जबरन थोपने के इरादे से हिंसा नहीं करता या कानून के राज, संविधान और लोकतंत्र को चुनौती नहीं देता।खास तौर से, इस सिद्धांत को मजबूत करने वाले प्रमुख मामले इस प्रकार हैं-1. थवाहा फजल बनाम भारत संघ (2021) - सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि "सिर्फ माओवादी साहित्य पास में होना या किसी विशेष विचारधारा के प्रति झुकाव होना गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक आरोपी किसी आतंकी गतिविधि या हिंसा को अंजाम देने के इरादे से सक्रिय रूप से नहीं जुड़ता, तब तक केवल वैचारिक जुड़ाव के आधार पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। 2. अरूप भूइयां बनाम असम राज्य (2011 और 2023 पुनर्विचार याचिका पर ) इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्यायशास्त्र के 'क्लियर एंड प्रेजेंट डेंजर' (स्पष्ट और वर्तमान खतरा) सिद्धांत का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी प्रतिबंधित संगठन की केवल निष्क्रिय सदस्यता तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि वह सदस्य लोगों को हिंसा के लिए नहीं उकसाता या खुद हिंसा में शामिल नहीं होता। हालांकि, 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी पीठ ने सुरक्षा कारणों से 'प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने' को अपराध माना, लेकिन बिना हिंसा या उकसावे के केवल विचारधारा रखने को अभी भी अपराध नहीं माना जाता है। 3. श्याम बालकृष्णन बनाम केरल राज्य (2015) (सुप्रीम कोर्ट द्वारा समर्थित सिद्धांत के आधार पर ) इस विषय पर सबसे स्पष्ट टिप्पणी केरल हाईकोर्ट ने 2015 में की थी, जिसे बाद के कानूनी सिद्धांतों में आधार बनाया गया।अदालत ने कहा था कि "माओवादी होना कोई अपराध नहीं है।"*
               इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के अनुसार कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा: "भले ही माओवादियों की राजनीतिक विचारधारा हमारे संवैधानिक ढांचे से मेल न खाती हो, लेकिन किसी व्यक्ति को केवल इस विचारधारा को मानने के लिए तब तक गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता, जब तक कि वह देश के संविधान, लोकतंत्र और कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए किसी हिंसक या अवैध गतिविधि में शामिल न हो।" द हिंदू समाचार पत्र के मुताबिक इस फैसले का मुख्य निष्कर्ष यह था कि अदालतों का स्पष्ट मत है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां 'विचारों की स्वतंत्रता' (संविधान के आर्टिकल 19 के तहत ) हर नागरिक को प्राप्त है। कोई भी विचारधारा चाहे वह कितनी भी कट्टरपंथी क्यों न हो तब तक कानूनी दायरे में है जब तक वह शांतिपूर्ण है। जैसे ही उसमें हिंसा, हथियारों का इस्तेमाल या देश को तोड़ने की साजिश शामिल होती है, वह कानूनन अपराध बन जाती है। इस हिसाब से भी "दिमागी नक्सल" अपराधी नहीं माने जा सकते जबकि संघ परिवार लगातार ऐसे फैसले ऐसे विवादित बयान और माहौल बनाता रहा है जिससे हिंसा को बढ़ावा देने के उस पर आरोप बढ़ते जा रहे हैं।

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