Friday, 11 September 2026

दावत है प्यार...

*दावत है प्यार, न तो अधिकार न ही व्यापार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              मध्य प्रदेश के दमोह की एक ख़बर पढ़ी। पहले हंसी आई, फिर हम संजीदा हो गए। एक वकील दोस्त ने दूसरे वकील दोस्त को बर्थ डे पार्टी नहीं देने पर 41,250 ₹ के हर्जाने का नोटिस भेजा है। विशाल सिंह का आरोप है कि उनके मित्र गोविंद तिवारी ने लिखित इकरारनामा करने के बाद भी दावत नहीं दी, जिससे उनको उस दिन खाना होटल में खाना पड़ा, साथ ही तनाव इतना बढ़ गया कि हॉस्पिटल में इलाज कराया गया। तनाव व इलाज का हर्जाना नोटिस देकर दोस्त से मांगा गया है। उधर दोस्त का दावा है कि वे पार्टी दे चुके हैं जिसके बिल भी मौजूद है।
      यह मामला तो जांच के बाद तय होगा, कौन झूठा और कौन सच्चा है। लेकिन क्या आप और हम समाज परिवार और दोस्तों में इस तरह के मामले आएदिन नहीं देखते रहते हैं? दावत पार्टी और नाश्ते तक को लेकर कुछ लोग बड़े क्रेज़ी रहते हैं। कई लोग दावत कर कर के अच्छे दोस्त बन जाते हैं तो कुछ दोस्त दावत नहीं करके दुश्मन बना लेते हैं। दावत कब अदावत बन जाए, पता ही नहीं लगता है। दरअसल दावत को लेकर हम लोगों की सोच अजीब है। दावत दो लोगों दो परिवारों या दो समूहों के बीच प्यार और सम्मान बढ़ाने के लिए होती है। दावत किसी का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है जो हर हाल में होनी ही चाहिए नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे, क्रोधित हो जाएंगे और सामने वाले से न सिर्फ़ रिश्ता तोड़ लेंगे बल्कि खुद को अपमानित समझकर उससे दुश्मनी पर उतर आएंगे? 
          कुछ लोग अपनी ससुराल में दावत अपना हक़ समझते हैं। कुछ लोग शादी या जन्म दिन की पार्टी में नहीं बुलाए जाने पर खफा हो जाते हैं। कुछ लोग सपरिवार न बुलाये जाने पर आक्रोश दर्ज कराते हैं। कुछ लोग दावत का मीनू अपने स्तर या पसंद का नहीं होने पर भी बुरा समझते हैं और सामने वाले की औकात बताने लगते हैं। कुछ लोग बारात में नाश्ते को लेकर बड़े परेशान रहते हैं कि कहीं लेट होने पर नाश्ता न निकल जाए। कुछ लोग शादी करने को रिश्ते के लिए जब कहीं जाते हैं तो नाश्ते के आइटम गिनकर और उनकी कीमत आंककर यह तय करते हैं कि सामने वाले की हैसियत कैसी है? कुछ लोग दावत में मीट नहीं परोसने पर सामने वाले को कंजूस घोषित कर देते हैं तो कुछ लोग चिकन, मटन और बड़े जानवर के गोश्त के हिसाब से सामने वाले के स्टेटस को तय करते हैं। कुछ लोग खाने से पहले स्टार्टर बाद में स्वीट साथ में कोल्ड्रिंक और नाश्ते में ड्राई फ्रूट से अपना सम्मान तोलते हैं।
         दावत की चर्चा चल रही है तो एक और बात पर गौर कीजिये। कुछ दोस्त और रिश्तेदार अक्सर दावत करते हैं, कुछ कभी कभी और कुछ कभी नहीं। इसके पीछे उनकी आर्थिक स्थिति उनकी सोच उनकी सीमित या उदार समझ उनका आपसे करीबी या दूर का रिश्ता या उनके दिल में आपके लिए मुहब्बत इज़्ज़त या सबके लिए तंग दिली फराग दिली या मजबूरी न जाने कितनी वजह हो सकती है। दावत व्यापार नहीं है कि आपने की तो सामने वाला भी करेगा, उतनी ही करेगा या वैसी ही करेगा जैसी आपने की है। 
       हमारे शहर में एक मॉर्निंग वॉकर ग्रुप था। दो दर्जन से अधिक लोग थे। रोज़ सुबह साथ घूमने जाते थे। पहले वापसी में चाय पीने लगे। फिर पकौड़ी समोसे नाश्ते में शामिल हुए। फिर दावतों का सिलसिला शुरू हुआ। सबने बारी बारी दावत शुरू की। कुछ लोग पहले दिन से ही दावत खिलाने की हालत में नहीं थे। वे पहली दावत से ही किनारा कर गए। कुछ जाते रहे, खाते रहे, लेकिन जब उनकी बारी आई, तो अचानक गायब हो गए। बदले की दावत मांगने वाले उनको कॉल करने लगे, कभी बात हुई कभी नहीं हुई। फिर कॉल नो रिप्लाई होने लगी। दावत के दीवाने उस दोस्त के घर पहुंच गए। वो मिला तो बहुत ज़लील किया। फिर उसने घर जाने पर दोस्तों से मिलना भी बंद कर दिया। फिर उसको सड़क बाज़ार या शादी में मिलने पर दावत के लिए याद दिलाया गया। दावत न होनी थी न ही हुई। दोस्ती खत्म हो गई। ग्रुप भी बिखर गया। मॉर्निंग वॉक भी उनमें से अब कम लोग ही करते हैं। आखिर में यही कहा जा सकता है दावत प्यार दोस्ती और इज़्ज़त के लिए होती है उसे बदला व्यापार या अधिकार समझने की भूल कभी भी मत कीजिये। दावत को दावत रहने दीजिये अदावत में मत बदलिए प्लीज़।
*बहुत कुछ जान के जाना है तुम को*
*बड़ी मुश्किल से पहचाना है तुम को*
*मुझे जो तुम समझते हो ग़लत है*
*किसी दिन ये भी समझाना है तुम को।*
नोट_लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर हैं।

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