Tuesday, 6 October 2026

चालान नहीं हेलमेट

*अच्छा है हेलमेट बांटो अभियान,* 
*एक्सीडेंट में बचेगी लोगों की जान*
            *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              बिजनौर ज़िले में एसपी श्री विश्नोई के निर्देश पर आजकल अच्छा यातायात सुरक्षा अभियान चल रहा है। पहले नियम के अनुसार बिना हेलमेट टू व्हीलर चलाने वालों का 1000 रुपए का चालान काटा जाता था। अब ऐसे लोगों को मौके पर ही 800 रुपए का हेलमेट खरीदने को प्रेरित कर सेफ रवाना किया जा रहा है। यह मांग बहुत दिन से हम जैसे बहुत से पत्रकार, समाजसेवी और सोशल एक्टिविस्ट पुलिस से करते आ रहे थे कि बिना हेलमेट वालों के चालान काटने की बजाए उनको हेलमेट हाथों हाथ खरीदने को कहा जाए, अब ज़िले में पुलिस ने ऐसा अभियान पांच दिन के लिए चलाकर अब तक लगभग 500 हेलमेट जनपद के विभिन्न नगरों कस्बों और गांवों के आसपास चैकिंग प्वाइंट पर वाहन चालक लोगों को उपलब्ध कराए हैं।
          हालांकि यह काम अगर केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा होता तो और भी अच्छा था। लेकिन शासन केवल चालान की रकम बढ़ाकर हर बार यह मानता है कि इससे लोग अधिक जुर्माना देते हुए डरेंगे और यातायात नियमों का पालन करने लगेंगे। लेकिन मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्टेशन एंड हाइवे के आंकड़े बताते हैं कि वाहनों के कुल 45000 करोड़ के चालान पेंडिंग पड़े हुए हैं। यह इतना बड़ा आंकड़ा है कि शायद किसी छोटे राज्य का कुल वार्षिक बजट इसके बराबर होगा। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लंबित पड़े चालानों की रकम वसूलने को सरकार से कोई नई रणनीति बनाने को कहा था। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि अगर लोग एक से अधिक चालान होने पर भी बेफिक्र होकर गाड़ी चला रहे हैं और बार बार ट्रैफ़िक रूल तोड़ रहे हैं तो उनके चालान की रकम उनके बिजली के बिल में जोड़कर भेजी जानी चाहिए और अगर वे फिर भी बिल चालान की राशि सहित जमा नहीं करते तो उनकी बिजली काट देनी चाहिए। लेकिन सरकार इस प्रस्ताव पर राज़ी नहीं थी तो उसने भविष्य में ऐसे वाहनों को सीज़ करने का शपथ पत्र कोर्ट में दिया जिनके चालान कटने के बाद लंबे समय से पेंडिंग पड़े हुए हैं।
       हमारे देश समाज और नागरिकों की समझ अजीब है। इनको अपनी जान सुरक्षित रखने के लिए लगाए जाने वाले हेलमेट के लिए भी चालान का डर दिखाना होता है लेकिन बार बार समझाने और चालान कटने के बाद भी अधिकांश लोग हेलमेट लगाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं। कुछ लोग पुलिस चैकिंग को देखकर हैंडिल पर टंगा हेलमेट लगा लेते हैं और आगे बढ़ते ही फिर से उतार देते हैं। कुछ लोग रास्ता बदलकर निकल जाते हैं । कुछ लोग सौ दो सौ और पांच सौ किमी तक का सफ़र बाइक और कार से दिल्ली मुंबई तक बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के पूरा कर लेते हैं और इन बड़े शहरों में एंट्री लेते हुए यह सोचकर हेलमेट और सीट बेल्ट लगाते हैं कि यहां पुलिस चालान करने में सख़्त है। मतलब जान बचाने की परवाह नहीं पुलिस और चालान के डर से ट्रैफ़िक नियम का पालन करते हैं। बिनजौर एसपी के हेलमेट उपलब्ध कराओ सराहनीय अभियान से लोग जितनी बार पकड़े जाएंगे उनके पास उतने ही हेलमेट जमा होते जाएंगे तो वे चालान और फालतू हेलमेट खरीदने से बचने और दुर्घटना होने पर अपनी जान की सलामती के लिए शायद हेलमेट लगाने की आदत डाल लें, वैसे तो टू व्हीलर पर बैठी दूसरी सवारी और बच्चों को भी हर हाल में हेलमेट लगाना ही चाहिए।
*नहीं है वजह ज़रूरी के जब हो,तब मर जाएँ,*
*उदास लोग हैं, मुमकिन है बे सबब मर जाएँ ।*
नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अख़बार के संपादक हैं।

बुजुर्ग बेशकीमती इंसान


*बुज़ुर्ग होते हैं बेशकीमती इंसान, इनकी अनदेखी से होगा नुकसान!*
                    *इक़बाल हिंदुस्तानी*
       एक अक्टूबर को हर साल वृद्ध दिवस मनाया जाता है। इस दिन जितनी अच्छी सच्ची और भावुक बातें मंच से वक्ता बोलते हैं, काश वे वास्तविक जीवन में भी साकार होती तो वृद्धों की ज़िन्दगी कितनी आसान, सुखद और सुंदर होती?सीनियर सिटीजन होने से पहले ही हमें एक पत्रकार के तौर पर बुजुर्गों के प्रोग्राम में जाने का कई बार मौका मिला है। वहां हमने कार्यक्रम की कवरेज के साथ ही कई बार मुख्य वक्ता के रूप में वृद्धों और युवाओं की बात भी रखी। कई बार ऐसे आयोजनों का संचालन करने का अवसर भी मिला। जब हमने निज़ामत के दौरान कुछ भावुक शेर पढ़े तो कई बुजुर्गों की आँखें गीली हो गईं। शायद उनको अपनी व्यथा उन पंक्तियों में सुनने को मिली जो वे बहुत दिन से खुद भुगत रहे थे। कई बार हमने युवा पीढ़ी की तरफ से भी उनका पक्ष रखा, उनकी व्यस्तता और मजबूरियां बयान की जिससे दोनों जेनरेशन के बीच संवाद का एक सेतु बन सके। लेकिन सीनियर सिटीजन को यह दुख सताता ही रहा कि उनके बच्चे उनको उस तरह से ट्रीट क्यों नहीं करते जैसा वे चाहते हैं। 
         काशी के एक वृद्धा आश्रम "अपना घर" से पिछले दिनों एक बड़ी दुखद पीड़ादायक और निराश करने वाली ख़बर आई। पता लगा पिछले साल जिन 55 बुजुर्गों ने इस आस में दम तोड़ा कि उनसे मिलने उनके बच्चे एक दिन ज़रूर आयेंगे। उनके परिवार रिश्तेदार और जानकार कोई नहीं आया। इस समाचार का सबसे अधिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला पक्ष यह है कि जो उंगलियों पर गिनने लायक़ चंद बच्चे या परिवार उन बुजुर्गों के आये भी तो वे मरने के बाद भी मातम करने आंसू बहाने या ग़म में नहीं उनकी ज़मीन जायदाद और बीमा लेने को ज़रूरी औपचारिकता पूरी करने, उनका डीएनए सैंपल लेने और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने को मजबूरी में आए थे।
         यह ख़बर पढ़ने के बाद पूरे दिन हमारे दिमाग़ में हलचल चलती रही। रात में भी यह डरावना घिनौना और कड़वा सच बार बार दस्तक देता रहा कि हमारा समाज कितना स्वार्थी लालची और असंवेदनशील हो गया है। कितने क्रूर बेरहम और मतलबी हैं हम लोग जो उन मातापिता को उम्र बढ़ने पर बोझ समझने लगते हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन हमें जन्म देने से लेकर पालने पोसने पढ़ाने लिखाने और शादी से लेकर रोज़गार दिलाने तक में समर्पित कर दिया। बताते हैं जब कोई मां किसी बच्चे को जन्म देती है तो उसको आम इंसान के मुकाबले प्रसव में सात गुना दर्द होता है। कई मां की जान बच्चे पैदा करते हुए चली जाती है। नौ महीने वह खुद से ज़्यादा बच्चे का पेट में ख़्याल रखती है। उसका मन न भी हो तो भी बच्चे की सेहत के लिए खाती है। बच्चे को जन्म देकर कई साल तक ठीक से सो नहीं पाती। खुद गीले में सोती है बच्चे को आराम से सुलाती है। बच्चा जागता है तो वह भी जागती रहती है। जितनी बार रात को बच्चा उठता है रोता है उतनी बार उसको फीड कराती है, साफ़ करती है और दुलारती है। मां की कुर्बानियां अनगिनत है। 
       ऐसे ही बाप का मामला है। कहते हैं बाप जहां जाना भी पसंद नहीं करता, अपने बच्चों के लिए वहां भी हाथ फैला देता है। वह दिन रात काम करता है और अपने बच्चों को बेहतर जीवन स्तर देता है। उनको उच्च शिक्षा दिलाता है। चाहे इसके लिए कर्ज़ लेना पड़े। जो वह खुद नहीं बना अपने बच्चों को बनाना चाहता है। उनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देता है। उनको उस मकाम तक पहुंचा देता है जहां से खुद छोटा नज़र आता है, हारा हुआ लगता है और कमज़ोर लगता है लेकिन फिर भी खुश होता है। इसलिए बच्चों को चाहिए कभी भी मातापिता दादा दादी नाना नानी और किसी भी बुज़ुर्ग को बोझ नहीं समझें, उनको दूध से भाग जाने वाला जानवर नहीं समझें और साथ ही उनको आर्थिक लाभ नहीं देने वाला बुढ़ापे बीमारी और बुरे वक़्त में बेजान सामान नहीं समझें हमेशा भला करने वाला सलाह देने वाला और पूरे परिवार का संरक्षक बेशकीमती इंसान ही समझें।
*मेरी आंखों का तारा ही मुझे आँखें दिखाता है,*
*सिखाया बोलना जिसको वो चुप रहना सिखाता है।*