Saturday, 17 October 2026

चिंगारी के 40 साल

*चिंगारी: कागज़ के पन्नो से मोबाइल की स्क्रीन तक विचारधारा की एक लड़ाई!*
*0 दुनिया में हमेशा से दो वर्ग रहे हैं। एक आम आदमी एक खास आदमी। चिंगारी की विचारधारा पीड़ित आम आदमी के पक्ष में रही है। यह लड़ाई चिंगारी दैनिक होने के बाद 40 साल से लगातार लड़ता चला आ रहा है। हालांकि उसने गोदी मीडिया के खिलाफ़ यह दुस्साहस करके इस उसूली लड़ाई की भारी कीमत चुकाई है लेकिन अखबार के पन्नो से शुरू करके आज मोबाइल की स्क्रीन तक आते आते भी उसने तकनीक तो बदली लेकिन सच के साथ रहने का मिज़ाज नहीं बदला। आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। अख़बार भी इस अस्तित्व के संघर्ष से बचे हुए नहीं हैं लेकिन यूपी के बिजनौर जैसे छोटे ज़िले से हिंदी अख़बार चिंगारी सांध्य दैनिक ने ऐसे गलाकाट दौर में भी अपनी विश्वसनीयता, सत्यता और जीवटता को बचाए रखा है।*  
          *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
              चिंगारी सिर्फ़ एक अख़बार का नाम ही नहीं है बल्कि यह एक विचारधारा है, मिशन है और सेवा का अभियान है। यह सबके हित में सोचता है। सबकी बात लिखता है और सबकी ख़बर लेता और देता है। यह धर्म जाति और छोटे बड़े के नाम पर फर्क नहीं करता। यह ज़ालिम और मजलूम की लड़ाई में कमज़ोर का साथ देता है। यह विज्ञापन के लिए खबरों का सौदा नहीं करता। यह उसूलों के लिए कीमत चुकाने को हर समय तैयार रहता है। यह डरता नहीं। यह झुकता नहीं। यह सच कहने से रुकता नहीं। कलम के सिपाही, जनवादी विचारों के धनी और समाजवाद व निष्पक्षता के मसीहा स्व. बाबू सिंह चौहान साहब ने जब चिंगारी का प्रकाशन साप्ताहिक अख़बार के रूप में आज से 76 साल पहले शुरू किया था तो शायद सोचा भी नहीं होगा कि एक ऐसा गोदी मीडिया फेक न्यूज और झूठे सियासी नैरेटिव का पूंजीवादी बेशर्म और अनैतिक दौर भी आएगा जहां सत्य, सिद्धांत और न्यायवादी होना दंड का भागी होना तथा झूठ फरेब और नफ़रत की पत्रकारिता करना सम्मान उन्नति तथा दौलत बरसने का रास्ता बन जायेगा। वैसे तो चिंगारी का प्रकाशन 1950 में ही शुरू हो गया था लेकिन 25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। आज चिंगारी के संपादक प्रखर वक्ता और दक्ष संचालक श्री सूर्यमणि रघुवंशी भी उसी दौरान अपनी पढ़ाई पूरी करके डेस्क पर संपादन का काम संभालना शुरू कर रहे थे। 
       शुरू में बड़े भाई साहब और उस समय बिजनौर टाइम्स के सहयोगी संपादक श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादक की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद मिलनसार इंसान हंसमुख व्यक्तित्व के धनी और ज़मीन से जुड़े श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी। एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अख़बार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अख़बार और चैनल तक इसकी ख़बरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली ख़बरों से अपनी अहम ख़बरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है।
        बिजनौर से निकलकर अब चिंगारी देखते देखते ही उत्तराखंड के साथ ही आसपास के कई सीमावर्ती ज़िलों में भी छाने लगा। कई बार बिजनौर के और कई बार बाहर के बडे़ समाचार पत्र समूहों ने चिंगारी को चुनौती देने के लिये अपना सुबह का अख़बार न चलता देख शाम का अख़बार इस इलाके में प्रकाशित करना चाहा। लेकिन वे नकारात्मक सोच और ईष्या की वजह से कामयाब नहीं हो सके। कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अख़बार लगातार चार दशक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है। चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। आज डिजिटल मीडिया प्रिंट मीडिया के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। हालांकि चिंगारी सहित अनेक अखबारों ने पीडीएफ फॉर्म में अपने डिजिटल वर्जन भी पब्लिश करने शुरू कर दिए हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में चिंगारी न्यूज चैनल वेबसाइट और एप की शक्ल में भी लोगों के लिए सेवाएं धीरे धीरे प्रिंट के साथ साथ उपलब्ध कराने का सफल प्रयास कर रहा है लेकिन यहां उसे एल्गोरिदम और नैरेटिव की लड़ाई में और अधिक संघर्ष करना होगा। आज मीडिया का अधिकांश हिस्सा गोदी मीडिया यानी चाटुकारिता में बदल गया है। रील का ज़माना है, यानी जो ज़्यादा दिखता है वही बिकता है। किसी भी घटना किसी भी समाचार और किसी के भी विचार का केवल कुछ सेकंड या अधिक से अधिक एक दो मिनट का सबसे चर्चित गुस्से वाला गाली वाला सेक्सी वीभत्स रक्तरंजित झूठा आक्रोशित और हिंसक हिस्सा निकालकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है। इससे उसके वीव लाखों करोड़ों में पहुंच जाते हैं। वह लोकप्रिय हो जाता है। कुछ ही पल में सेलिब्रिटी बन जाता है।एकाउंट में कंटेंट का मोटा पेमेंट आ जाता है। यह सब ए आई की मदद से होता है। इसके बाद लोग चाहें या नहीं चाहें यही हिस्सा सबसे ज़्यादा देखा सुना और पढ़ा जाता है। इससे कंटेंट का मूल विचार सिद्धांत और सत्यता कहीं पीछे छूट जाती है। इसके पीछे सत्ता का भी अहम रोल होता है। इसको काउंटर करने के लिए सरकार विरोधी विपक्ष सिविल सोसायटी और बुद्धिजीवी भी ऐसे ही जवाबी ऑडियो वीडियो और टेक्स्ट पर ज़ोर देते हैं। इससे एक बनावटी सियासी और झूठा नैरेटिव लोगों के बीच चल निकलता है जिसका सत्य तथ्य और वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे ही एक दल एक संगठन और कुछ समूहों ने दस लाख से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं जो लगातार इतिहास को तोड़ मरोड़ के अपने एजेंडे के हिसाब से लोगों को परोसते रहते हैं जिससे समाज में फेक न्यूज नफ़रत और बदले की भावना टकराव हिंसा बढ़ रही है। लोग भावुक नादान मासूम भोले और बहुत शरीफ व सीधे हैं तो वे भी ऐसे पोस्ट की क्रॉस चेकिंग नहीं करते जिससे गोदी मीडिया और सोशल मीडिया लगातार आम आदमी को गुमराह कर रहा है और अपने सियासी एजेंडे चुनावी नैरेटिव तथा घृणा हिंसा व बदले की भावना में उलझा कर जीवन के असली मुद्दों रोटी कपड़ा और मकान आदि से भटका रहा है। ऐसे में चिंगारी जैसे मिशनरी सेक्युलर तथा आम आदमी की आवाज़ उठाने वाले क्षेत्रीय अख़बार की जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। चिंगारी की हिम्मत को सलाम और ढेर सारी दुआएं पेश हैं। चिंगारी के नाम एक शेर पेश है...
0 उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।
*नोट लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अखबार के संपादक हैं।*

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