Wednesday, 21 October 2026

इंसानियत का मज़हब

*इंसान का इंसान से हो भाईचारा,*
*यही मज़हब यही पैग़ाम हमारा !*
                 *इक़बाल हिंदुस्तानी*
              17 अक्टूबर की चिंगारी में जनाब गिज़ाल मेहदी का लेख "हिंदू समाज, मुस्लिम समाज या इंसानी समाज..." आज के दौर का बहुत बड़ा सवाल है। वे इंसानियत की खिदमत का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। उनको बधाई। आज के दौर में ऐसे लेख चिंगारी जैसा निष्पक्ष अख़बार और उसके मानवता प्रेमी संपादक श्री सूर्यमणि रघुवंशी ही छाप सकते हैं। आज जब हर बात हर घटना हर चीज़ को धर्म के चश्मे से देखा जाता है, तमाम देश धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग हो रही हैं, और धर्म के बहाने गैंग बनाकर दंगे और "गैंगवार" सी चल निकली है, ऐसे में इंसानियत की बात करना अपने आप में बहुत बड़े दिल खुली समझ और इंसान की साझा ज़रूरतों पर फ़ोकस करना हिम्मत की बात है। एक समय था जब मज़हब समाज में बुराई को ख़त्म करने और अच्छाई को फैलाने के लिये आए थे। कुछ आज भी यही काम कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं उस जंगल युग में धर्मों ने समाज सुधार चरित्र निर्माण और परस्पर भाईचारे को बढ़ावा दिया लेकिन कालान्तर में धर्मों के नाम पर सांप्रदायिकता कट्टरता और सियासी युद्ध होने लगे, जिससे आंकड़े बताते हैं जितने लोग दुनिया में अब तक हुई देशों के बीच जंगो में नहीं मरे उससे ज्यादा आस्था के नाम पर हुए कत्लेआम में मारे गए। धर्मों में समय के अनुकूल जो सुधार बदलाव और गैर ज़रूरी रस्मों के विलोपन होने चाहिए थे, वे नहीं हुए जिससे टकराव बढ़ता गया और यह आज भी तमाम मुल्कों में दंगों हिंसा और पक्षपात के रूप में जारी है।
           जब कोई भी बच्चा पैदा होता है तो वह इंसान ही होता है। बाद में उसका परिवार उसे अपने धर्म के रंग में ढाल देता है। उसके बड़े होने का वेट भी नहीं किया जाता। उस बच्चे के सामने सभी धर्मों को रखा जाए, बताया जाए और पढ़ाया जाए उसके बाद यह फैसला उस पर छोड़ दिया जाए कि वह किस आस्था को स्वीकार करता है। लेकिन हमारा समाज हमारा परिवार और हमारी दुनिया के अधिकांश देश यह मानकर चलते हैं कि जो धर्म उनका है केवल वही सही है। यही वजह है कोई बच्चा बड़े होकर अगर अपना जन्मजात धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म अपना ले या केवल सभी धर्मों से किनारा कर ले तो उसके पूर्व धर्म के लोग उसके दुश्मन बन जाते हैं। कई देशों और धर्मों में तो धर्म बदलने या आज का मज़हब छोड़कर इंसानियत का मज़हब अपनाने पर हत्या तक कर दी जाती है। कई धर्म वाले ऐसे मानवता प्रेमी का सामाजिक बहिष्कार करने लगते हैं। कई मामलों में अलग अलग धर्म होने पर प्रेमी प्रेमिका को धर्म के ठेकेदार शादी नहीं करने देते। हमारे देश में तो इस तरह के विवाह रोकने को बाकायदा लव जेहाद नाम देकर कानून भी बन गया है। लेकिन इसके अमल में भी धर्म देखकर पक्षपात हो रहा है।
        पीयू रिसर्च 2025 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में कोई भी धर्म नहीं मानने वालों की तादाद 1 अरब 90 करोड़ हो चुकी है, जो हर साल तेज़ी से बढ़ रही है। इन लोगों को मज़हबी लोगों से कोई विरोध नाराज़गी या रंजिश नहीं है। उधर धर्म मानने वालों के साथ दो बड़ी प्रॉब्लम है। इन आस्था वालों को नास्तिकों से बड़ी समस्या है। ये कहते हैं धर्म तो सबको मानना चाहिए। इनका दूसरा दावा होता है कि केवल उनका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इस दावे से धर्मों के अनुयायियों में आपस में ही वर्चस्व की लड़ाई होने लगती है। कई मुल्कों में कई दशकों से हो भी रही है। जिसमें करोड़ो लोग मर चुके हैं ।हमारे देश में भी हिंदू मुस्लिम की बांटो और राज करो की सांप्रदायिक सियासत काफ़ी समय से फल फूल रही है। अजीब बात यह है किसी भी धर्म के मानने वालों के पास ऐसा कोई प्रमाण तथ्य या गवाह नहीं है जिससे वे यह साबित कर पाएं कि केवल वे ही सही हैं लेकिन दावा सब यही करते हैं। इसके साथ ही वे समय के साथ बदलाव को तैयार नहीं होते। आस्था क्योंकि भावनाओं से जुड़ी होती है तो वे तथ्य सत्य और बदलाव को स्वीकार नहीं करते। वे अंधविश्वास दकियानूसी परंपराओं और जादू व जिन्न भूत के भी शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले लोग हैं जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानते हैं। वे सबसे बड़ा धर्म मानवता और नैतिकता को कहते हैं और उस पर अमल भी करते हैं लेकिन वे संस्कृति स्वस्थ परंपरा और अध्यात्म को नहीं नकारते। वे यह दावा भी नहीं करते कि केवल वे ही सही हैं। उनके द्वारा आस्तिकों के साथ नफ़रत भेदभाव या सामूहिक हत्या का भी कोई प्रमाण आंकड़ा या ख़बर नहीं है। बेहतर हो कि सबको धर्म मानने या नहीं मानने और धर्म बदलने की आज़ादी हो जिससे आपसी टकराव नहीं हो और लोग कोई सा भी धर्म मानने के बावजूद पहले खुद को इंसान मानें जिससे विश्व के देशों के बीच और लोगों के बीच अमन चैन भाई चारा व प्रेम भावना बनी रहे। निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है...
*घर से मस्जिदें बहुत दूर हैं चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।*
नोट= लेखक नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉगर और तर्कशील समाज अखबार के संपादक हैं।

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