Sunday, 11 October 2026

हिंदुत्ववादी राज में हिंदुओं का भला?

*क्या बीजेपी के "हिंदुत्ववादी" राज से हिंदुओं का कुछ वास्तविक भला हुआ है?*
                     *इक़बाल हिंदुस्तानी*
         क्या अब तक बीजेपी समर्थक रहे हिंदुओं का धीमा ही सही मगर बीजेपी से मोहभंग हो रहा है? क्या हिन्दुत्ववादी राज से उनका कुछ वास्तविक भला नहीं हुआ है जिससे ब्रांड मोदी तेज़ी से अपनी चमक खो रहा है? क्या आरएसएस का हिन्दुओं के लिए लाया गया धार्मिक सांस्कृतिक और मानसिक तुष्टीकरण का अतीतजीवी मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक मॉडल आर्थिक असफलताएं बढ़ते जाने से नाकाम होने लगा है? यही वजह है कि बीजेपी को एसआईआर के बहाने चुनाव आयोग से मिलकर वोट चोरी के विपक्ष के आरोप झेलने पड़ रहे हैं और उसका विरोध बढ़ता ही जा रहा है। बीजेपी के राज में बरसों के संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के विवादित फैसले से राम मंदिर बना लेकिन इसके बाद हुए 2024 के आम चुनाव में बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। इतना ही नहीं अयोध्या वाले राज्य यूपी में उसकी संसदीय सीट 62 से घटकर 33 रह गई। इसका मतलब इस काम से हिंदू खुश नहीं हुए? बीजेपी सरकार ने कश्मीर से राज्य को विशेष अधिकार देने वाली धारा 370 हटा दी जबकि पूर्वोत्तर व पर्वतीय कई राज्यों में ऐसी ही धाराएं आज भी लागू हैं, तो इससे हिंदू समाज को क्या मिला? ऐसे ही वह अपने पुराने एजेंडे के तीसरे अहम काम कॉमन सिविल कोड को एक एक कर सभी बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों में लागू करेगी तो इससे हिंदुओं को क्या लाभ होगा? मोदी सरकार ने सीएए पास कर सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की व्यवस्था कर दी इससे कट्टर हिंदू धार्मिक आधार पर कुछ खुश हो सकते हैं लेकिन ऐसा तो कांवड़ वालों पर फूल बरसाकर, उनकी सरकारी मशीनरी से सेवा कराकर, आएदिन धार्मिक शोभायात्रा निकालकर, उनमें शामिल उद्दंड युवाओं से मुस्लिम बस्ती में उनके घरों मस्जिदों और मदरसों के सामने आपत्तिजनक नारे लगवाकर उनको अपमानित कराकर उनके यहां लगे इस्लामी झंडो को उतारकर भगवा झंडे फहराकर, कोई भी झूठा सच्चा आरोप लगते ही उनके घरों दुकानों और इबादतगाह पर बुलडोज़र चलवाकर, सावन मास में मांस का कारोबार बंद कर, किसी भी मांस को गोमांस बताकर उनको पीटने, मॉब लिंचिंग करने और जेल भेजने या यूपी में पाँव में गोली मारकर हाफ़ एनकाउंटर करने सड़क या सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ पढ़ने से रोकने उनके ख़िलाफ़ संघ और बीजेपी नेताओं के ज़हरीले बयान जारी करने और मुस्लिम हिस्ट्रीशीटर या हत्या बलात्कार के मामले में पीड़ित पक्ष ग़ैर मुस्लिम होने पर उनका फर्ज़ी एनकाउंटर करने, लव जेहाद लैंड जेहाद और थूक जेहाद के नाम पर उनको फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर जेल भेजने फिर उमर खालिद की तरह लंबे समय तक ज़मानत नहीं होने देने, सपा नेता आज़म ख़ान, जौहर यूनिवर्सिटी और गोरखपुर अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों को मरने से बचाने वाले डॉ कफ़ील खान को ही उल्टा जेल भेज देने से हिंदुओं को क्या फायदा हुआ है? क्या यह पर उत्पीड़न सुख का मामला है जिसमें हिंदुओं को केवल मुस्लिम समाज के साथ किए जा रहे पक्षपात से मानसिक खुशी मिल रही है जिसमें हिंदुओं का आर्थिक नुकसान भी हो तो वे झेल रहे हैं? क्या हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के झूठे प्रोपेगैंडा से ऐसा माइंड सेट बना दिया गया है जिससे उसको वही ठीक और अपने लिए बेहतर लगता है जो बीजेपी सरकारें उनके खिलाफ़ भी कर रही हैं?
           एक सर्वे के अनुसार देश में 8 करोड़ से अधिक युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं न ही पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई ट्रेनिंग कर रहे हैं और न ही नौकरी तलाश कर रहे हैं। इन्होंने एक तरह से जॉब मिलने की उम्मीद भी छोड़ दी है। एनएसएसओ 2017-18 के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षित बेरोजगारी बढ़कर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह पिछले 45 साल की सबसे अधिक बेरोजगारी बताई जाती है। हालांकि 2025 में पी एल एफ एस के आंकड़ों के अनुसार इसमें कुछ सुधार देखा गया जिससे यह आंकड़ा घटकर 11 प्रतिशत तक आ गया। लेकिन इस मामले में सिविल सोसायटी निष्पक्ष एजेंसियां और वर्ल्ड रैंकिंग में भारत सरकार के विभिन्न आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठने लगे हैं। इसके साथ ही विभिन्न न्यूटल एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद देश और विभिन्न राज्यों में अपराध महंगाई भुखमरी और भ्रष्टाचार का ग्राफ़ भी तेज़ी से बढ़ा है। जबकि सही रिपोर्ट नहीं होने से कई राज्यों में सच छिपाया भी जाता है।
       2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदुओं की आबादी लगभग 80 प्रतिशत थी। ज़ाहिर बात है अगर बेरोजगारी महंगाई अपराध और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो इसका असर बड़ी आबादी पर उसके अनुपात में अधिक ही होगा। देश में सरकारी शिक्षा स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था की हालत भी अच्छी नहीं है जिससे सभी भारतीय परेशान हैं। भ्रष्टाचार की हालत तो यह है कि अब सत्ताधारी नेताओं और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कहने पर भी थाने तहसील में बिना रिश्वत के कानूनी काम भी नहीं होते। सरकारी ठेकों में कमीशन पहले से बढ़ते जाने के आरोप ठेकेदार गाहे ब गाहे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सुधार नहीं है। नए बने रोड हाइवे एक्सप्रेस वे और पुल आएदिन गिरते रहते हैं। सड़क दुर्घटनाये बढ़ती जा रही हैं। 80 करोड़ से अधिक भारतीय सरकारी राशन में मिलने वाले फ्री पांच किलो अनाज पर गुज़ारा कर रहे हैं। किसानों की आय नहीं बढ़ने से वे रोज़ आत्महत्या करते हैं। कहने का मतलब यह है जीडीपी के आंकड़े अर्थव्यवस्था का आकार और विश्वगुरु बनने के सरकारी दावों के बावजूद आम भारतीय परेशान है जिसमें हिंदुओं की संख्या ही सबसे अधिक है। इतना ही नहीं दुनिया में प्रतिष्ठित विश्वसनीय और अपनी उच्चतम साख रखने वाली इंटरनेशनल एजेंसियों और देशों के वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स (157/180), ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (130/193), करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (91/180), ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (129/148), एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (176), ग्लोबल पीस इंडेक्स (116/163), डेमोक्रेसी/फ्रीडम इंडिसेज, वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट और रुल ऑफ लॉ इंडेक्स में भारत 2014 के बाद से काफ़ी नीचे जा चुका है। जबकि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, सैन्य क्षमता, और एसडीजी इंडेक्स में हमारे देश ने पहले से कुछ बेहतर रैंक हासिल की है।इसके साथ ही नोटबंदी लॉकडाउन जीएसटी से आर्थिक नुकसान और कोरोना से जो लाखों मौतें हुईं उसका अधिक शिकार कौन हुआ? बिना किसी रिसर्च विचार विमर्श और 2023 से पहले बनी कारों के लिए भी 20 प्रतिशत एथेनॉल पेट्रोल में मिलाने से किस वर्ग का अधिक नुकसान हो रहा है? शेयर मार्केट और डालर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिरने से कौन लोग लाखों करोड़ का घाटा संख्या में अधिक झेल रहे हैं? 
     सवाल यह है कि बीजेपी जिन हिंदुओं की भलाई का दावा हिंदुत्ववादी अपने राज में करती है, उससे आम हिंदू को क्या मिला है? क्या समुदाय के तौर पर हिंदुओं का ग़ैर हिंदुओं के मुकाबले कोई विशेष अतिरिक्त और उल्लेखनीय भला हुआ है? विडंबना तो यह है कि कई क्षेत्रों में आर्थिक आधार पर पिछड़े लोगों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने के आंकड़े देखे जाएं तो उनमें ग़ैर हिंदू कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं से भी आगे हैं। मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना में मुसलमान लाभार्थी वर्ग के आंकड़े उनकी आबादी से अधिक बताए जाते हैं। यही हाल हर माह मिलने वाले निशुल्क पांच किलो सरकारी अनाज और विधवा व वृद्धा पेंशन का बताया जाता है लेकिन इसका कोई ठोस आंकड़ा सरकार ने दावों के बावजूद हाल फिलहाल उपलब्ध नहीं कराया है लेकिन ज़मीन पर देखें तो इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि इन सरकारी सुविधाओं जिनमें हर घर जल , आयुष्मान और पीएम किसान योजना का लाभ कमोबेश सबको मिल ही रहा है। इसके विपरीत अधिक शिक्षा उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में आगे होने से हिंदू समुदाय को अपेक्षित जॉब उपलब्ध नहीं होने से कम मिल रहे हैं जबकि अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिम समाज में दस्तकार मजदूर छोटे बड़े पेशे जैसे राज मिस्त्री पेंटर कारपेंटर नाई हलवाई रिक्शाचालक टैक्सी ड्राइवर मैकेनिक वेल्डर रसोइया हेल्पर चपरासी हॉकर प्लंबर इलेक्ट्रिशियन और सब्ज़ी फल विक्रेता का कोई भी काम नौकरी और कारीगरी करके अपना पेट हिंदुओं के अनुपात में अधिक आसानी से पालते मिल जायेंगे। इससे बीजेपी समर्थक हिंदुओं को निराशा होना स्वाभाविक है। लेकिन सौ टके का सवाल यह है जब तक निष्पक्ष और लेवल प्लेइंग फ़ील्ड पर ईमानदारी से चुनाव नहीं होंगे तब तक बीजेपी एंटी इनकंबेंसी और अपने समर्थक हिंदुओं की नाराज़गी के बाद भी सत्ता से हटेगी कैसे?

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