Thursday, 29 October 2026

चंद्रमणि रघुवंशी

*श्री चंद्रमणि रघुवंशी: 50 साल से क़लम और रिक्शा वालों का साथ निभाने वाला एक बेमिसाल पत्रकार...*
                  *इक़बाल हिंदुस्तानी*
               बिजनौर टाइम्स के संपादक, श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, पंजीकृत के संरक्षक और बिजनौर रिक्शा चालक एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री चंद्रमणि रघुवंशी बहुआयामी प्रतिभा के धनी है। यह कला, शक्ति और क्षमता उनको उनके पिता स्व. श्री बाबूसिंह चौहान साहब और माता स्व. विमला देवी से विरासत में भी मिली है। एक तरह से पत्रकारिता समाज हित में लेखन और गरीब व कमज़ोर लोगों के पक्ष में संघर्ष करने की शिक्षा उनको अपने घर से घुट्टी में मिली है। उन्होंने "कोख से कारा तक" जैसी कई कालजयी किताबें भी लिखी हैं। वे बेहतरीन कविताएं भी लिखते रहे हैं। 
        सबसे बड़ी बात वे सिर्फ़ लिखते ही नहीं, बोलते ही नहीं बल्कि अपनी समाजसेवी सोच को जीते भी हैं। वे आधी सदी से समाज के सबसे कमज़ोर ग़रीब और हाशिये पर समझे जाने वाले श्रमिक रिक्शा वालों के लिए उनका नेतृत्व करके संबल बने हुए हैं। उन्होंने अपनी जवानी से लेकर आज लगभग 75 साल की उम्र में भी रिक्शा वालों का साथ नहीं छोड़ा है। वे पिछले दिनों 50 वीं बार रिक्शा चालक एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए हैं। हालांकि पिछले एक दशक से वे गंभीर रूप से बीमार हैं। वे कई रोगों का शिकार हैं। उनको चलने फिरने में भी परेशानी होती है। वे वाकर के सहारे चलते हैं। वे कई बार गंभीर इन्फेक्शन होने पर कई माह दिल्ली के बड़े अस्पतालों में भी भर्ती रहे, लेकिन स्वस्थ होते ही अख़बार और रिक्शा यूनियन को अपनी सेवाएं फिर से देने लगे। वे डॉक्टर्स की सलाह के बावजूद घर में बिस्तर तक सीमित होने को तैयार नहीं हैं । समाज में विभिन्न गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहने की कोशिश करते हैं। उन्होंने आज तक किसी राजनीतिक दल की सदस्या नहीं ली जिससे रिक्शा वालों के लिए यूनियन के बैनर से खुद ही संघर्ष किया, बड़ा आंदोलन किया और बहुत बार रिक्शाओं की हड़ताल कराकर उनकी जायज़ मांगे मानने के लिए पुलिस, प्रशासन और शासन को झुकने के लिए मजबूर किया।
        श्री चंद्रमणि रघुवंशी की रिक्शा यूनियन के लिये उपलब्धियां गिनने बैठें तो लिस्ट बहुत लंबी है लेकिन उनके खास खास काम देखें तो श्री चंद्रमणि उस दौर में रिक्शा वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए जब पैडल रिक्शा चलाने वालों को नीची निगाह से देखा जाता था। आज ई रिक्शा तो कई पढ़े लिखे बेरोजगार युवा और उम्रदराज़ लोग आराम से चला रहे हैं। यह वह ज़माना था जब रिक्शा वाले को कोई भी किसी छोटी सी बात पर दुत्कार देता था, पीट देता था या उसको धमका देता था। श्री चंद्रमणि जो एलएलबी यानी कानून के जानकार भी थे, जब रिक्शा यूनियन से जुड़े तो उन्होंने उनकी गरिमा सम्मान और रोज़ी को कानूनी संरक्षण दिलाने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। रिक्शा चालकों के बुनियादी अधिकार, सम्मानजनक किराया, अफोर्डेबल रोड टैक्स, आसान पंजीकरण और उनके साथ मानवीय व्यवहार के लिए श्री चंद्रमणि ने लंबी लड़ाई लड़ी। कम लोगों को पता होगा पहले  ई रिक्शा का टैक्स 15 साल का 22000 एक साथ जमा करना होता था, जबकि ई रिक्शा की ह्रास के बाद आयु दस साल ही मानी जाती है, जो ग़रीब रिक्शा चालकों के लिए बहुत बड़ा बोझ था। श्री रघुवंशी ने इसके लिए ज़िला स्तर के साथ ही शासन से लंबी लिखा पढ़ी करके इस कर को 1000 रुपये साल करा दिया। इससे आर्थिक रूप से कमज़ोर रिक्शा वालों को बहुत बड़ी राहत मिली। इसके साथ ही ई रिक्शा को मोटर व्हीकल एक्ट से निकालकर म्युनिस्पल एक्ट में लाने की मांग भी उन्होंने समय समय पर की जिससे रिक्शा चालकों का टैक्स कम हो और रजिस्ट्रेशन सरल व सुगम हो सके। 
              एक आंकड़े के अनुसार बिजनौर में 3500 से अधिक रिक्शा हैं, जिन से लगभग 1.75 लाख लोग जुड़े हुए हैं। जाने माने राष्ट्रीय साहित्यकार और इम्फाल यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के प्रमुख रहे डॉ देवराज ने अपनी डायरी/संस्मरण में श्री चंद्रमणि रघुवंशी के ऐसे कई संघर्षों, फोन वार्तालापों और रिक्शा वालों की स्थिति में सुधार लाने के उनके सतत प्रयासों का विस्तार से वर्णन किया है। देश के कई मीडिया संस्थानों अखबारों और चैनलों ने भी समय समय पर समाज के सबसे कमज़ोर दमित और पीड़ित रिक्शा चालकों के लिए उनके किए संघर्ष, नियमित रूप से अधिकारियों से संपर्क और पत्राचार पर कई लेख समाचार और साक्षात्कार प्रकाशित किए हैं। श्री चंद्रमणि रघुवंशी को पत्रकार के रूप में शानदार लिखने के साथ रिक्शा वालों के लिये ठोस भलाई का काम करने पर कई संस्थाएं सम्मानित भी कर चुकी हैं। उनकी प्रेरणा से ही आज रिक्शा यूनियन से कई और पत्रकार जैस सूर्यमणि रघुवंशी अनिल चौधरी, मरगूब रहमानी और पूर्व चेयरमैन शमशाद अंसारी आदि जैसे समाजसेवी भी जुड़ चुके हैं। वास्तव में श्री चंद्रमणि रघुवंशी एक बेहतरीन पत्रकार के साथ ही एक बेमिसाल समाजसेवी, संवेदनशील इंसान और गरीबों के मसीह का फ़र्ज़ भी अदा कर रहे हैं, जो आज के युवाओं के लिये एक प्रेरणा श्रोत और लेखन के साथ व्यवहार में समाजसेवा की एक शानदार मिसाल हैं। पत्रकारिता हो या समाजसेवा एक शायर ने क्या ख़ूब कहा है...
*इतनी आसानी से मिलती नहीं फ़न की दौलत,*
*ढल गई उम्र तो ग़ज़लों पे जवानी आई।*

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