आज का विचार
*तीन सौ रुपए के लिए तीन खून, समाज में बढ़ रहा कैसा जनून?*
*इक़बाल हिंदुस्तानी*
देहरादून में 300 रुपए दिहाड़ी कम देने पर प्लंबर राजकुमार ने एक परिवार के 3 लोगों की हत्या कर दी. रमेश कपूर, पत्नी रजनी कपूर और घरेलू सहायिका शीला को पेचकस से गोदकर मार डाला. आरोपी के मुताबिक, दिहाड़ी 600 रुपए तय हुई थी, लेकिन दंपति सिर्फ 300 रुपए दे रहे थे. इसी पर विवाद आगे बढ़ा था. दूसरी ख़बर बिजनौर ज़िले की है जिसमें मामूली विवाद के बाद तीन लोगों को ट्रेक्टर से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया।
पूरे देश में रोज़ छोटी छोटी बातों पर ऐसी ही सैंकड़ो हत्याएं हो रही हैं। हालांकि हर जान कीमती है। हर इंसान अपने परिवार के लिए बहुत अहम होता है। हर कोई समाज में अपनी खास भूमिका निभाता है जो कोई दूसरा नहीं निभा सकता। कोई कह सकता है हत्या करना अपराध है और कानून ऐसे लोगों को सज़ा देगा। लेकिन यहां हमारी चिंता दूसरी है। पहले भी मर्डर होते थे लेकिन वे रेयर होते थे। बहुत कम यानी जमीन जायदाद और ज़ेवर के लिए बड़े मामलों या सुपारी लेकर होते थे। समाज क़त्ल को बहुत बुरा समझता था। लोग क़ातिल से नफ़रत करते थे। उससे दूरी बना लेते थे। कई जगह तो हत्यारों का हुक्का पानी बंद कर दिया जाता था। हालांकि अपराध साबित होने पर भी सज़ा देना कोर्ट का काम है लेकिन जघन्य अपराधी के प्रति समाज परिवार और रिश्तेदारों में तिरस्कार नफ़रत और बुरा समझने का भाव उसको उसकी समाज विरोधी हरकत के लिये एहसास कराना होता था। लेकिन अब यह सब रुटीन बात हो गई है।
हम यह नहीं कह सकते कि हत्या के ऐसे मामलों में कानून अपना काम नहीं करता। बेशक पुलिस वकील और कोर्ट अपना काम आज भी देर सवेर करते ही हैं लेकिन यह भी सच है कि सज़ा मिलने में बहुत लंबा समय लगता है। कई बार जांच ठीक से नहीं होने सबूत मिटाने और गवाहों को डराने धमकाने से आरोप साबित भी नहीं हो पाते। कई बार बड़े और हाईप्रोफाइल मामलों में अभियोज पुलिस और बड़े रसूख वाले लोग हत्या तक के मामलों में पैसे पहुंच और जुगाड़ से जुर्म करके भी बच निकलते हैं जिससे ऐसे ही क्राइम की मंशा रखने वाले निडर होकर हत्या जैसे अपराध बार बार करते हैं।
समाज में बात बात पर लड़ाई झगड़ा और हमले के जुनून पर भी विचार करना होगा। आख़िर क्या वजह है कि 300 रूपये की दिहाड़ी कम मिलने पर एक प्लंबर तीन लोगों की जान ले लेता है? दरअसल समाज का गरीब अनपढ़ और कमज़ोर तबका बड़े लोगों से पहले ही चिढ़ा रहता है। उसको ईर्ष्या होती है कि इतनी मेहनत करके भी उनके पास ठीक से जीवन गुज़ारने के लायक पैसा नहीं है। दूसरी तरफ़ वह देखता है कुछ लोग खानदानी विरासत नंबर दो की दौलत और बे ईमानी से खूब आमदनी कर रहे हैं। हालांकि सब मामलों में तो ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे केस भी काफ़ी हैं। इसके साथ ही उस मजदूर के दिमाग़ में भरा नफ़रत गुस्सा और बदले की भावना का यह बारूद उस समय चिंगारी से ट्रिगर हो जाता है जब कोई उसे उसकी वाजिब जायज़ और कानूनी मजदूरी तय करके भी पूरी नहीं देता। तब वह आपा खो देता है। उसको यह भी लगता है कि इतने बड़े लोगों की शिकायत पुलिस प्रशासन और शासन भी नहीं सुनेगा। कोर्ट में वह वकील की फीस और लंबा टाइम नहीं लगा पाएगा। समाज भी उसके साथ बड़े वीआईपी आदमी के खिलाफ़ खड़ा नहीं होगा। हत्या और हमलों के मामलों में सबसे बड़ी वजह सामने वाले की तीखी ज़बान भी बनती है, अगर वही बात प्यार और नरमी से कही जाए तो छोटे लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है वे पैसे का नुकसान झेल भी जाते हैं लेकिन अपमान धमकी और बदतमीज़ी से बात और बढ़ जाती है। लेकिन जुर्म तो जुर्म है उसे किसी भी हाल में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क़तील शिफ़ाई का शेर है...
*हम हैं अख़लाक़ के बाज़ार में बिकने वाले,*
*कीमतें देखकर ख़रीदार पलट जाते हैं।*
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