Sunday, 3 September 2017

E filing not taxpayer

"इस सरकार को एक बहुत खराब बीमारी हो गयी है ओर वह बीमारी यह है कि यदि इनकी योजनाएं फेल हो जाये और झूठ पकड़ा जाने लगे तो कुछ तो भी आंकड़े पेश कर दो यानी खेत की बात पूछी जाए तो खलिहान की बाते बताना शुरू कर दो ऐसे तथ्य बताने लगो जिसके सिर पैर का कोई ठिकाना न हो और यह बीमारी संक्रामक बीमारी है यह तुरंत अपने भक्तों में ट्रांसफर हो जाती हैं

15 अगस्त को मोदी जी लाल किले से ही साफ झूठ बोल गए कि 3 लाख करोड़ का काला धन पकड़ा गया, नए करदाताओं की संख्या के बारे में तो इतना झूठ बोला हैं कि ठीक ठीक खुद को भी याद नही होगा कि किस मंत्री ने क्या बोला है, फिर आखिरी में आकर सुई 56 लाख पर अटकी है

वैसे सरकार ने अगस्त में ही पहली बार अर्धवार्षिक आर्थिक समीक्षा संसद में पेश की थी इसमें इकोनॉमी की हालत चिंताजनक बताई गई थी और इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि “नए कर दाताओँ की संख्या में वृद्धि तथा विमुद्रीकरण के बाद 5.4 लाख नए करदाता उभर कर आए हैं’ ( लिंक कॉमेंट बॉक्स में है )
लेकिन इस दावे को भी झुठला कर वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि पिछले साल के मुकाबले इस साल 56 लाख ज्यादा टैक्सपेयर्स ने ई-रिटर्न फाइल की इसका अर्थ सिर्फ ये है कि जैसा दि वायर के एम के वेणु ने कहा कि , 56 लाख नए करदाता नहीं बढ़े हैं बल्कि इतने लोग ई-फाइलिंग में शिफ्ट हुए हैं, जो कि पहले से चली आ रही है

यानी सिर्फ इ रिटर्न फाइल करने वालो की संख्या बढ़ी है पिछले साल की तुलना में इस वित्त वर्ष में 25 प्रतिशत करदाता बढ़े हैं.श्रीनिवासन जैन ने अपने अध्ययन से बताया कि अगर पुराने आंकड़े देखें तो 25 प्रतिशत की वृद्धि कोई बड़ी बात नहीं है. 2014-15 में 76 लाख करदाता जुड़े थे और 2016-17 में 80.7 लाख जुड़े. बस इतनी सी बात थी

वेसे इस आंकड़े की असली बारीकी भी जान लीजिये की वास्तव में करदाताओ की संख्या बढ़ने का क्या अर्थ है ओर इसका सरकारी खजाने पर कोई असर होता हैं या नही

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने आंकड़ा जारी किया था कि देश की 129.5 करोड़ की आबादी में से मात्र 3.65 करोड़ यानी 2.8 प्रतिशत लोग इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं और रिटर्न दाखिल करनेवालों का 52.3 प्रतिशत हिस्सा ही टैक्स देता है. यानी सिर्फ आधा ही कुछ रकम जमा करता है ,

जेसे 2016 का आंकड़ा है कि इंदौर रीजन में 70 फीसदी करदाता केवल नाममात्र के लिए रिटर्न भरते हैं। टैक्स में उनका कोई योगदान नहीं है कुल 5.20 लाख करदाताइंदौर रीजन में पंजीकृत हैं।-2.5 लाख से कम आय सालाना बताने वाले करदाताकी 3.5 लाख संक्या सबसे अधिक है।2.5 लाख से 5.5 लाख की सालाना आय वाले करदाता- 1 लाख से कुछ ज्यादाहै और 5.50 से 9.50 लाख रुपए सालाना आय वाले करदाता मात्र 35 हजार है यह एक बानगी है पुरे देश की आयकर व्यवस्था की

अब एक और आंकड़ा देखिए , देश की आबादी का 1.33 प्रतिशत हिस्सा 23 प्रतिशत इनकम टैक्स दे रहा है, जबकि 0.15 प्रतिशत लोग 77 प्रतिशत इनकम टैक्स दे रहे हैं भारत में टैक्स व जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का अनुपात 16.7 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह 25.4 प्रतिशत और जापान ने 30.3 प्रतिशत चल रहा है.मुश्किल यह भी है कि अपने यहां व्यक्ति ही नहीं, कंपनियां भी टैक्स देने में कोताही करती हैं. आकलन वर्ष 2014-15 में रिटर्न दाखिल करनेवाली 7.01 लाख कंपनियों में से 3.66 लाख कंपनियों ने कोई टैक्स नहीं दिया था. लेकिन उसे वसूलना तो दूर रहा बल्कि कार्पोरेट को टेक्स में और छूट दे दी गयी

यानी सीधी बात यह है की आयकर दाताओ की संख्या बढ़ने का अर्थ यह बिलकुल भी नही है कि इसी अनुपात से सरकार का खजाना भी बढ़ रहा है

अब एक ओर कमाल का फिगर आपको बताता हूँ जो इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में दिया गया है आयकर विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, एक शख्स पर 21, 870 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया है. इसकी मात्रा देश को मिले कुल टैक्स की तुलना में 11% है..."
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@ Girish Malviya

Friday, 1 September 2017

क़ुरबानी

*जानवर काटने से ही हो जाती है कुरबानी?*

0मुसलमानों का मानना है कि हज़रत इब्राहीमसे जब अल्लाह ने अपनी राह में सबसे प्यारीचीज़ कुरबान करने को सपने में कहा तो उन्होंनेअपने बेटे हज़रत इस्माईल के गले पर छुरीचलाकर उनकी कुरबानी देनी चाही लेकिनएनटाइम पर अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एकदुम्बा यानी एक जानवर ज़िबह होने के भेजदिया।

इस्लाम सहित सभी धर्म ईमान यानी आस्थासे चलते हैं। उनमें कुछ बातेें बहुत अच्छी हैं।कुछ सामान्य शिष्टाचार और भाईचारे को बढ़ावादेने वाली है। लेकिन आज के दौर के हिसाब सेदेखा जाये तो उनमें कुछ बातें ऐसी भी लगती हैंजिनका आज कोई सीधा सरोकार समाज कीभलाई से नहीं रह गया है। वे रस्में आज केवलएक रीति रिवाज और परंपरा बनकर बेमतलबहो चुकी हैं। खासतौर पर जो लोग तर्कशीलन्यायशील और मानवीय नज़रिये से निष्पक्षताके साथ सोचते समझते हैं। उनको सभी धर्मों केलोग विद्रोही समझते हैं। उनके खिलाफ अकसरफतवे और धर्मद्रोही होने के फरमान भी जारीहोते हैं।

लेकिन इस सवाल का जवाब कोई आस्थावानदेने को तैयार नहीं होता कि समय के साथबदलकर आध्ुानिक प्रगतिशील और वैज्ञानिकदृष्टिकोण न अपनाने से कोई भी देश औरसमाज कैसे उन्नति कर सकता है? *मिसाल केतौर पर हम भी धर्म जाति और क्षेत्र से ऊपरउठकर तार्किक बात करते हैं तो हमारे समाज केकट्टरपंथी अकसर हमसे खफ़ा रहते हैं। हमप्रयास करते हैं कि साल के 364 दिन अपनेपरिवार पड़ौस मुहल्ला और समाज के दूसरेलोगों से तालमेल बनाकर आपसी भाईचारे केसाथ रहें। लेकिन ईद उल जुहा को लेेकरआजतक हम यह नहीं समझ पाये कि क्याकेवल जानवर काट देने से हमारे अंदर कुरबानीका जज़्बा आ जाता है?*

हमने समाज में देखा है कि जो लोग कई दशकसे महंगा बकरा लेकर ईद पर काटते चले आ रहेहैं। वो विवाद होने पर अल्लाह का वास्ता देने परउसकी राह में अपने ही भाई दोस्त या पड़ौसी याहमवतन के लिये छोटी सी चीज़ की कुरबानी देनेको तैयार नहीं होते। आखि़र क्यों? फिर ऐसेलोगों की जानवर की कुरबानी का क्या मकसदरह जाता है? ऐसे ही लोग समाज की भलाईभाईचारा अमन चैन के लिये भी कोई कुरबानीदेने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे ही लोग देश केलिये भी कोई कुरबानी देने को तैयार नहीं होतेहैं। शिया नेता कल्ब ए सादिक ने कोर्ट मेंमुक़दमा हारने या जीतने दोनों पोज़िशन मेंबाबरी मस्जिद से मुसलमानों को दावा छोड़करअपने हिंदू भाइयों की भावना का सम्मान करतेहुए एक छोटी सी कुरबानी की अपील की थी।

हमारी जानकारी में किसी भी बड़े उलेमा नेउनकी अपील का समर्थन नहीं किया है। साल मेंअकेला कुरबानी का दिन ऐसा आता है। जबहमारा परिवार हम से नाराज़ रहता है। हम अपनेपरिवार की खुशी के लिये एक दिन की हीपिकनिक या और किसी खुशी के लिये 10 से20 हज़ार भी खर्च कर देते हैं। लेकिन 5 हज़ारकी कुरबानी का भी खर्च करने में हमें इस लियेपरेशानी होती है क्योेंकि हमें आज तक इससवाल का जवाब नहीं मिला कि जब हम में एकदूसरे के लिये समाज और देश के लिये कुरबानीका जज़्बा ही मौजूद नहीं है तो सिर्फ जानवरकाटने की रस्म अदा करने से क्या फायदा होगा?हो सकता है इस्लामी आलिमों की नज़र में हमगुनाहगार हों।

उनका दावा है मुसलमान होने के लिये उनकीबताई सभी बातें बिना दिमाग का इस्तेमाल कियेमाननी होती हैं। लेकिन हमारा सोचना तो यह हैकि बिना कुरबानी के भी अगर एक मुसलमान मेंकुरबानी का जज़्बा मौजूद है तो वह उसमुसलमान से ज़्यादा बेहतर इंसान है जो महंगेजानवर की कुरबानी दिखावे के लिये कर रहा है।कम से कम जो लोग इस मौके पर अपने गैरमुस्लिम हमवतनों की भावनाओं का सफाईएकांत और सार्वजनिक स्थानों का गलतइस्तेमाल न करने का भी ख़याल नहीं रखतेउनकी कुरबानी से क्या हासिल होने वाला है?

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोईदरार,

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तेहार।

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं,

बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।

Thursday, 31 August 2017

डर और लालच

*डर-लालच के कंट्रोल में हम सब?*

*ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया डर और लालच की गिरफ़्त में है। जो इन दोनों से बाहर निकलजाता है। वो दुनिया को हिलाने और बदलने कीशक्ति पा जाता है।*

साइंस से पहले आदमी नेचर से डरता था।इसीलिये उसने उसकी पूजा करनी शुरू कर दी।धीरे धीरे प्रकृति का रहस्य खुला लेकिन आदमीका डर यानी अंधविश्वास बना रहा। इसके बादजाति और धर्म भी एक दूसरे को डराने के कामआने लगे। इतना ही नहीं इनमें से मज़हब या पंथतो बाकायदा डर और लालच पर ही पूरी तरह सेटिका रहा है। धर्म के जानकार कहते हैं कि ऐसाकरोगे तो स्वर्ग में जाओगे। यानी लालच। दूसरीतरफ कहते हैं कि ऐसा नहीं करके उसके उल्टाकरोगे तो नर्क में जाओगे। यानी डर। ये कोईनहीं कहता कि अच्छे काम करना हमारा नैतिकमानवीय और संवैधानिक कर्तव्य है। अजीबबात यह है कि समाज में जब जब शिक्षा औरजागरूकता बढ़ने से अंधविश्वास कुछ कम होनेलगता है।

तब तब डर का माहौल फिर से ताज़ा कियाजाता रहा है। हद यह है कि डर और लालच कामाहौल बनाये रखने वालों को खुद सवालों सेबड़ा डर लगता है। उनको अपनी पोल खुल जानेका डर भी लगा रहता है। जिसकी मिसालआपने बाबा राम रहीम के चेलों की हरकतेंरिकॉर्ड कर करे पत्रकारोें की पिटाई के तौर परदेखी होगी। मिसाल के तौर पर व्यापारी को घाटेका डर छात्रों को फेल होने का डर औरत कोइज़्ज़त खोने का का डर और बीमार को मरनेका डर दिखाकर ही उनसे मनचाहा पैसा वसूलकिया जाता है। अजीब बात यह है कि कई बारमहिला को बदनामी का डर दिखाकर उसकीआबरू से खिलवाड़ किया जाता है। फिर भीइसका कारण उसकी आबरू बच जाना बतायाजाता है।

जिनके पास दुनिया मेें डरने का कोई कारण नहींहोता उनको मरने के बाद का डर दिखाया जाताहै। कमाल की बात यह है कि तंत्र मंत्र का ढांेगकरने वाले ओझाओं का सारा कारोबार ही डरसे चलता है। वे उूपरी हवा जिन्न भूत और बुरीआत्माओं के साये का डर दिखाकर धन दौलतही नहीं कई बार कुछ लोगों का सबकुछ लूट लेतेहैं। कहा जाता है कि अफ़वाहें डर को पर लगातीहैं। इससे डर हवा में उड़ने लगता है। अफ़वाहेंमूर्ख फैलाते हैं। उनको नफ़रत करने वाले घड़तेहैं। साथ ही अपना दिमाग इस्तेमाल न करनेवाले उनको चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं।फासिस्ट शक्तियां अकसर अफवाहों का सहारालेती हैं। वे सबसे पहले मीडिया पर कब्ज़ाकरती हैं।

जैसाकि आजकल हो रहा है। आजकल नेता भीइन अफवाहों का खूब लाभ उठाने लगे हैं। वेदूसरे दलों के नेताओं को अपने दल में आने केलिये मजबूर करने को उनको सीबीआई जांचका डर दिखाते हैं। कुछ को भारी रकम कालालच देकर ख़रीद लेते हैं। अफवाहों से लोगडर जाते हैं। यह मनोविज्ञान है कि डरा हुआआदमी आपसे कभी सवाल नहीं पूछ सकता।सत्ताधरी यही चाहते हैं। आजकल देश में कहाजा रहा है कि मोब लिंचिंग से अल्पसंख्यक डरेहुए हैं। जब जगह जगह उनका मज़हब देखकरबीफ़ या देशद्रोह के बहाने उनको मारा जा रहा हैतो उनका डरना स्वाभाविक ही है। हैरत की बातयह है कि बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों सेडराने का काम बड़ी तेज़ी से चल रहा है।

वजह पूरी दुनिया में मुसलमानों की छविआतंकवादी की बन गयी है। कुछ उनकेकट्टरपंथियों ने काम भी ऐसे ही किये हैं। इसकेपीछे अमेरिका और पश्चिमी देशों का क्या रोलहै। उसको पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दियागया है। भारत में एक संस्था और राजनीतिकदल लंबे समय से बहुसंख्यक हिंदुओं का डराताआ रहा है कि अगर मुसलमानों को दबाकर नरखा गया तो ये देश का एक और बंटवारा करदेंगे। यह भी दावा किया जाता है कि मुसलमानोंकी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। यह भीबहकाया जाता है कि जल्दी ही मुसलमान देश मेंबहुसंख्यक हो जायेेंगे। फिर ये भारत को भीइस्लामी राष्ट्र बनाकर पहले की तरह हिंदुओं सेजज़िया वसूलेंगे।

जबकि ये बातें कोरा झूठ हैं। खुद भारत सरकारके जनगणना के ताज़ा आंकड़े इस अफवाह कोझुठलाते हैं। लेकिन बेचारे हिंदुओं को लगातारडराकर सत्ता में बैठे चालाक लोग कभीगोरखपुर अस्पताल कभी शामली रेल दुर्घटनाऔर तो कभी चंडीगढ़ में बाबा रामरहीम सेनिबटने के बहाने सैकड़ोें की तादाद में लोगों केमरने पर भी मुसलमानों से डराने का एक सूत्रीफार्मूला अपनाये हुए हैं। ऐसे ही मुसलमानों कोउनके कट्टरपंथी डराकर अकसर उकसाते रहतेहैं। जिससे बार बार टकराव दंगे और नफ़रतलगातार बढ़ती जा रही है। पता नहीं कितनानुकसान उठाकर सभी मज़हब के लोगों कीआंखे खुलेंगी जिससे वे सच को देख समझसकें।

मेरे बच्चे तुम्हारे लफ़्ज़ को रोटी समझते हैं,

ज़रा तक़रीर कर दीेजे कि इनका पेट भरजाये।

 

Saturday, 26 August 2017

3 तलाक़ का अंत

*तीन तलाक सुधार का अंत नहीं शुरुआत है!*
बहुमत से ही सही सुप्रीम कोर्ट ने आशा केअनुरूप एक साथ तीन तलाक़ पर रोक लगा दीहै। 1985 में भी सबसे बड़ी अदालत ने शाहबानों के केस में संवैधनिक और मानवीय आधार पर शाहबानों के पक्ष में एतिहासिकफैसला दिया था। लेकिन उस समय वोटबैंक के चक्कर में कांग्रेस की तत्कालीन राजीव सरकार ने उस फैसले को कानून बनाकर पलट दिया। लेकिन आज केंद्र में भाजपा की सरकार है।आज हालात बदले हुए हैं। दूसरी बात खुद मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग खुलकर सुप्रीमकोर्ट के फैसले के पक्ष में आ गया है। साथ ही सेकुलर दल भी फैसले के साथ दिखने को मजबूर लग रहे हैं। मुट्ठीभर कट्टरपंथी औरमौलाना न पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ पर सुप्रीमकोर्ट द्वारा विचार करने के पक्ष में थे।

न ही आज हैं। लेकिन एक बड़ा परिवर्तन उनमेंभी देखने में आ रहा है कि वे खुलकर इस फैसलेका विरोध करने या सड़कों पर आंदोलन करनेका अल्टीमेटम देने से बच रहे हैं। ऐसा लगता हैकि वे कोई बीच का रास्ता निकालने की सोच रहेहैं। जिससे उनकी मुस्लिम समाज पर पकड़ भीपहले की तरह बनी रहे और वे सुप्रीम कोर्ट सेभिड़ने से भी बच जायें। लेकिन यह उनकीखुशफहमी होगी अगर वे ये मानकर चल रहे होंकि मामला यहीं ख़त्म हो जायेगा। दरअसल यहफैसला इंस्टेंट तीन तलाक का अंत नहीं बल्किमुस्लिम पर्सनल लॉ के ऐसे सभी प्रावधानों कोख़त्म करने की शुरूआत है। जो संविधानसमानता और मानवता की भावना के खिलाफजाते हों।

आप नोट कर लो जल्दी ही याचिकाकर्ता पीड़ितमहिलायें हलाला और मुस्लिम पुरूषों केबहुविवाह का मुद्दा सर्वोच्च अदालत के सामनेउठाने जा रही हैं। उधर भाजपा की मोदी सरकारइस फैसले के आलोक में विधि आयोग कीसमान नागरिक संहिता के लिये आने वालीसिफारिशों की प्रतीक्षा कर रही है। इस समयभले ही सरकार ने मौके की नज़ाकत को देखतेहुए इस बारे मेें कोई कानून बनाने की ज़रूरत सेमना कर दिया हो। लेकिन वह इस बारे में चुपबैठने वाली नहीं है। संघ उसको ऐसा कानून याकॉमन सिविल कोड उसके एजेंडे के हिसाब सेबनाने को हर हाल में मजबूर करेगा। इससे होगायह कि सरकार ऐसा करेगी तो सुप्रीम कोर्ट उसको नहीं रोकेगा और जैसा कि अब सुप्रीम कोर्टने किया है तो सरकार इस फैसले को नहींपलटेगी।

अगर कट्टरपंथी या चंद मौलाना इस बारे में कोईहंगामा करते भी हैं तो सरकार उसको आसानीसे अनदेखा कर देगी। इसकी वजह इस मामले मेंसेकुलर दलों का हिंदू वोट बैंक पहले हीखिसककर पूरी तरह भाजपा के पाले में चलेजाने से डरकर खामोश या तटस्थ बने रहनाहोगा। हमें लगता है कि यह एक सकारात्मकशुरूआत है। भले ही भाजपा पर मुस्लिम विरोधीहोने का आरोप हो लकिन इस मामले में वहसेकुलर दलों से अधिक प्रगतिशील औरआधुनिक नज़र आ रही है। आप चाहें तो इसकोकुछ मुसलमानों को गोरक्षकों के द्वारा पीटपीटकर मारने और मीट बंद करने की तरहभाजपा सरकार का मुसलमानोें को एक औरसबक सिखाने वाला बदले की भावना का कदमभी मान सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने तीन तलाक केखिलाफ अपनी मंशा पहले ही ज़ाहिर कर दी है।मुस्लिम संस्थाओं का दावा है कि तीन तलाक़उनके पर्सनल लॉ का एक अहम हिस्सा है।उनका यह भी कहना है कि पर्सनल लॉ उनकेमज़हब की ही आचार संहिता है। साथ साथ वेयह भी जता रहे हैं कि पर्सनल लॉ को संविधानसे मान्यता मिली हुयी है। देखने सुनने में उनकीबात एक हद तक ठीक ही नज़र आती है।लेकिन इसमें एक पेंच फंस गया है। इस्लाम केजानकारों का कहना है कि इस्लाम की बुनियादकुरआन पाक पर टिकी है। कुरआन पाक में एकसाथ कहीं भी तीन तलाक़ की इजाज़त नहीं दीगयी है। मुस्लिम उलेमा का कहना है कि उनकेलिये जितना अहम कुरआन पर चलना है।

उतना ही अमल शरीअत पर करना ज़रूरी है।उनका यह भी दावा है कि शरीयत मंे एक साथदी गयी तीन तलाक़ भी जायज़ करार दी गयी है।अब सवाल आता है कि फिर दुनिया के लगभगदो दर्जन मुस्लिम देशों ने इस तरह की तलाक परकानूनन पाबंदी क्यों लगा दी है? तो मज़हब केठेकेदारों का बड़ा रक्षात्मक जवाब होता है किअगर दुनिया के तमाम देश कुछ गलत कर रहे हैंतो क्या ज़रूरी है कि वे भी उस गुनाह में शरीकहो जायें? अब ज़ाहिर सी बात है कि इस्लामीमामले तो इस्लामी उलेमा ही तय करते रहे हैं।अगर सियासी हिसाब से न देखकर इस मामलेको सामाजिक और मानवीय आधार पर देखाजाये तो संविधान धर्मों की तरह लिंग के आधारपर कोई अंतर भारतीयोें में नहीं करता।

चाहे वो चंद मुस्लिम औरतें ही हों। लेकिन वे हीतीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गयी हैं।संविधान ही हमारे देश को सेकुलर स्टेट बनाताहै और संविधान ने ही सबको बराबर अधिकारदिये हैं। अगर हमें संविधान के हिसाब से देश कोचलाना है तो उसकी सारी बातों को माननाहोगा। ऐसा नहीं हो सकता कि मीठा मीठा गप्प।और कड़वा कड़वा थू। जब सती प्रथा पर रोकलगाई गयी थी। तब भी हिंदू धर्म को ख़तरे मेंबताया गया था। आज नहीं तो कल इस मुद्दे परकोई भी सरकार हो कट्टरपंथियों से दो दो हाथकरने ही पड़ेंगे।

0ऐसा लगता है शायद यह दौर ए तबाही है,

शीशे की अदालत है पत्थर की गवाही है।

दुनिया में कहीं ऐसी तमसील नहीं मिलती,

क़ातिल ही मुहाफ़िज़ है क़ातिल ही सिपाही है।

Thursday, 24 August 2017

चोटी कटने का डर

आदमी पर आदमी का काबू पाने औरअपनी मर्जी से हांकने का सबसे बड़ाहथियार हमेशा से डर रहा है। लालच शायदउससे छोटा तरीकाहोगा क्योंकि वह सब परलागू नहीं हो पाता है। 

चोटी काटने के शक में यूपी के आगरा मेंएकबुजुर्ग महिला मानदेवी की भीड़ ने पीटपीटकरहत्या कर दी। इससे पहले भी डायनहोने के आरोप में कई महिलाओं को भीड़ नेऐसे ही कईराज्यों में मौत के घाट उतारा है।कुछ उग्रगोरक्षक भी बहाना भले ही गाय कालेते होंलेकिन अंदर से मुस्लिम आबादीबढ़ने औरभारत के एक दिन इस्लामी राष्ट्रबनने केकाल्पनिक दुष्प्रचार और अफवाहोंसे डरकर हीकई जगह पीट पीटकर कुछमुसलमानों कोडराने के लिये ही मार चुके हैं।पहले राजस्थानके बीकानेर नोखा में लड़कीकी चोटी कटने कीख़बर आई। बाद मेंजोधपुर के पास नागौर पालीव सिरोही केगांवों से भी एक के बाद एक ऐसीख़बरेंअचानक थोक मेें आने लगीं।

जब पुलिस ने एकाएक बढ़े ऐसे मामलोंकीजांच संजीदगी से शुरू की तो पता लगाकि कईमामले झूठे हैं। एक लड़की ने अपनेबाल खुद हीकाटे और अगले दिन ब्यूटीपार्लर जाकरबॉबकट सैटिंग करा आई। एकजगह पति पत्नीके झगड़े में मियां ने खुदबीवी की चोटी गुस्सेमंे काट डाली। बाद मेंलोकलाज के डर से यहअफवाह फैला दीकि उसकी चोटी रात में सोतेसमय किसी नेकाट दी। गुजरात में भी जब इसतरह कीघटनायें बढ़ने लगीं तो पुलिस नेपीड़ितों सेसख़्ती से पूछताछ की तो अधिकतरमामलोंमें यह पब्लिसिटी स्अंट या अफवाहसाबितहुयीं। इस दौरान अंधविश्वासों काकारोबारकरने वाले ओझा भी मौका भांपकरसक्रियहो गये।

उन्होंने चोटी कटने से बचाने के नाम पर घरोंमें2100 से 5100 रू. लेकर अनर्थ टालनेवालीमूर्तियां स्थापित करनी शुरू कर दीं।इसके साथही उन्होंने अपने हलवाई भाइयोंके हितों काख़याल रखते हुए निर्मल बाबाकी तरह कृपापाने को चोटी कटने से बचानेके लिये जलेबीखीर खाने की भी सलाह देनीशुरू कर दी।अफवाहों को जब पर लगे तो वेयूपी से बिहारझारखंड होते हुए उत्तराखंडकी पहाड़ियों परजा चढ़ीं। इस दौरान समाजविज्ञानियों औरबुध्दिजीवियों ने जो सवालउठाया उसका जवाबआज तक किसी केपास नहीं है कि अमीर उच्चशिक्षित और बड़ेपदों पर बैठीं महिलाओं कीचोटी कटने कीएक भी घटना सामने क्यों नहींआई? उनकोजिन्न भूत उूपरी हवा और दिव्यशक्ति नेकैसे छोड़ दिया?

किसी भी पॉश कॉलोनी ऑफिसरकॉलोनीसैनिक कॉलोनी पुलिस कॉलोनीऔर फिल्मसिटी यानी वीवीआईपी क्षेत्र मेंरहने वालीमहिला की चोटी न कटने काआखि़र राज़ क्याहै? गांवों और कस्बों में भीकेवल उन हीमहिलाओं की चोटी कटी जोगरीब या लोवरमीडियम क्लास लेडीज़ खुलेमें या असुरक्षितघरों में रहती हैं। इसकामतलब साफ है कि यहकिसी इंसान की हीशरारत है। आपको यादहोगा कि 21 सितंबर1995 को इसी तरह कीअफवाहों और लोगोंके अवचेतन में पहले सेमौजूद अंधविश्वासके कारण ही देशभर में गणेशजी की मूर्तियोंको दूध पिलाया गया था।

इसके बाद मुुंहनोचवा और मंकीमैन भीसालभरसे अधिक समय तक कमज़ोरआत्मविश्वासवालों को जगह जगह लगातारडराते रहे औरफिर एक दिन बिना पुलिस केएनकाउंटर यापकड़े ही तड़ीपार हो गये।आपने शायद इसबात पर गौर नहीं कियाहोगा कि जब येअफवाहें जोरशोर से फैलतीहैं तो सरकारें या तोअपनी किसी नाकामी सेलोगों का ध्यान हटानेको इस दौरान राहतकी सांस लेती हैं। या फिरकोई ऐसा बड़ाजनविरोधी फैसला अंजाम देदेती हैं।जिसको अफवाहें न फैलने पर शायदभारीविरोध का सामना करना पड़ता। यहमहज़संयोग होता है या फिर सोची समझीचाल? आपअगर विचार करें तो आपकोअंधविश्वास विरोधीअभियान चलाने वालेनरेेंद्र डाभोलकर की हत्याभी इसी जं़जीरकी एक कड़ी नज़र आयेगी।

इसके साथ ही रचनात्क और वैज्ञानिक सोचकोबढ़ावा देेने वाले गोविंद पांसारे और एमएमकालबुर्गी की जान लेना भी उसी डर काएकहिस्सा रहा है। जिसका कारोबार समाजके उसधर्मभीरू और बुज़दिल नादाननागरिक कोखौफज़दा करने में ये लोगदीवार बनने लगेथे।   

0मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,

  तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादानहै।