Sunday, 9 February 2014

मज़दूरों को गुलाम मत बनाओ


मानवीय गरिमा के दायरे में रहें हर तरह के निवेष  !
           -इक़बाल हिंदुस्तानी
0हायर एंड फायर की पॉलिसी से मज़दूर बन जायेंगे फिर गुलाम?
    यह अजीब बात है कि निवेश को लेकर आजकल राज्यों की सरकारों में ऐसी होड़ लगी है कि वे किसी कीमत पर भी उद्योगपतियों के लिये पलक पांवड़ें बिछाकर उनकी शर्तों पर ज़मीन और श्रमिकों को उपलब्ध कराने को तैयार नज़र आती हैं। मिसाल के तौर पर पहले बंगाल से ज़मीन अधिग्रहण विवाद तूल पकड़ने के बाद टाटा की महत्वाकांक्षी योजना लखटकिया नैनो कार गुजरात चली गयी थी और अब हमारे देश की सबसे विशाल कार निर्माता कम्पनी मारूति सुजुकी इंडिया ने हरियाणा मंे अपने पहले से स्थापित प्लांट में लंबी चली हड़ताल के बाद नया कार प्लांट गुजरात के मेहसणा में लगाने का एलान किया है। हम यह नहीं कहना चाहते कि मारूति ने यह फैसला किसी पक्षपात की नीयत से किया है बल्कि हमारा सवाल यह है कि उन हालात पर विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिये जिनमें एक कम्पनी के लिये मानवीय मूल्य, समाज और कानून से बड़ा उसका लाभ हो जाता है।
    यह ठीक है कि मारूति ने यह निर्णय ऐसे समय में लिया है जब उसके विगत त्रिमासिक फायदे मंे रिकॉर्ड 60 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी है। कम्पनी का एकतरफा यह मानना कि इस नुकसान का एकमात्र कारण उसके हरियाणा के गुड़गांव और मानेसर स्थित प्लांटों में लंबे समय से चल रहा मज़दूर आंदोलन है, पूरी तरह ठीक नहीं है। अगर समग्र रूप से निष्पक्ष विश्लेषण किया जाये तो पता चलेगा कि  मुनाफा घटने के पीछे बाज़ार में तेजी से घिरती जा रही मंदी, लगातार कमज़ारे पड़ रहा रूपया और ऑटोमोबाइल मार्केट में दिन ब दिन तेज़ हो रहा आपसी संघर्ष इसके बड़े कारण हैं।
    कम्पनी प्रबंधन यह भूल रहा है कि उसने हरियाणा में अपने संयंत्र में जिस नये मज़दूर संगठन को किसी कीमत पर भी मान्यता नहीं देने की ज़िद की उससे मानेसर प्लांट में दो माह तक हड़ताल रही और नतीजे मंे प्रोडक्शन घट गया। हालांकि गल्ती पर होने की वजह से बाद में प्रबंधतंत्र को झुकना पड़ा लेकिन इस दौरान जो नुकसान होना था वह तो हो चुका था। ज़ाहिर बात है कि जब कम्पनी को नये मज़दूर संगठन को मान्यता देनी ही थी तो यह काम दो माह तक हुए अनावश्यक टकराव से पहले भी हो सकता था और अगर प्लांट में इस अदूरदर्शिता के कारण काम ठप्प रहा हुआ तो इसका ज़िम्मेदार कम्पनी को ही अधिक माना जायेगा।
    दरअसल यह अकेले मारूति का मामला नहीं है बल्कि इससे पहले हांेडा कम्पनी में भी यही कहानी दोहरायी गयी थी। अजीब बात यह है कि इससे सबक लेकर बजाये अपनी गलत नीतियों में सुधार कर भविष्य में टकराव टालने के सकारात्मक रास्ते पर चलने के इस दोपहिया कम्पनी ने भी कर्नाटक और राजस्थान जाने का पलायनवादी रूख़ अपनाना बेहतर समझा। मारूति अप्रत्यक्ष रूप से हरियाणा को यह संदेश और अन्य ऐसे राज्यों को एक तरह से चेतावनी दे रही है कि जो नया संयंत्र वह गुजरात में लगाने जा रही है उसमें 20 लाख कारों का निर्माण होना है जिससे हरियाणा ने एक विशाल निवेश का अवसर खो दिया है। ऐसा ही कुछ इशारा टाटा ने पश्चिमी बंगाल के सिंगूर से ममता बनर्जी के विरोध के बाद अपना प्लांट शिफ्ट करते हुए दिया था।
    उधर गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी विकासपुरूष का तमग़ा अपने गले में किसी कीमत पर भी लटकाये रखने के मोह में मारूति के 18000 करोड़ के इस मेगा प्रोजेक्ट को कब्ज़ाने के लिये प्लांट के लिये किसानों की ज़मीन खाली कराने को बुल्डोज़र चलाने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। साथ ही उनको इस बात से भी कोई सरोकार नहीं है कि ये कम्पनियां उनके राज्य के मज़दूरों के साथ कैसा व्यवहार करेंगी? उनको तो बस यह दिखाई दे रहा है कि उनके यहां किसी कीमत पर भी आये बस भारी भरकम निवेश आना चाहिये। मारूति के इस स्वार्थी और मज़दूर विरोधी कदम से हरियाणा को एक तरह से ब्लैकमेल कर अपनी शर्तों पर चलने को मजबूर करने की सुनियोजित चाल नज़र आ रही है।
     पंूजीवाद की यह त्रासदी और विडंबना है कि इसमें सरकार और कम्पनियों के लिये मुनाफा ही सब कुछ हो जाता है। काफी समय से देश के विभिन्न कोनोें से यह ख़बरे छनकर छनकर आती रही हैं कि निजी क्षेत्र में निवेश और रोज़गार के अवसर बढ़ाने के नाम पर अंधधुंध काम करने के हालात का अमानवीयकरण होता जा रहा है।  मारूति, नैनो और हुंडयी ही नहीं अशोक लीलंेड जैसी बड़ी ऑटो कम्पनियों का भी कमोबेश मज़दूरों को लेकर यही रूख रहता है।  यह उस नीति का हिस्सा है जिसमें मज़दूरों का शोषण और उत्पीड़न होने पर सरकारें अकसर चुप्पी साधकर निजी कम्पनियों के दलालों की भूमिका में खड़ी हो चुकी हैं।
    वैश्वीकरण, उदारीकरण और किसी कीमत पर भी निजीकरण की सरकारी नीति ने मज़दूर आंदोलनों को उत्पादन विरोधी ठहराकर न केवल एक तरफ समेट दिया है बल्कि उनको न्याय और समानता के लिये आवाज़ उठाने पर एक तरह से विकास विरोधी और देशद्रोही तक माना जाता है। 
     एक सोची समझी योजना के तहत ऐसा माहौल बना दिया गया है जहां स्थायी नौकरी, सरकारी नौकरी और सम्मानजनक वेतन और अन्य सुविधाओं की मांग करने वाले मज़दूर संगठन विलेन और प्रगति में बाधक नज़र आयें। निवेश बढ़ाने के नाम पर मज़दूरों को हायर एंड फायर की पॉलिसी के तहत पूरी तरह गिनी पिगबनाकर रख दिया गया है। उनसे बड़ी बड़ी मल्टी नेशनल कम्पनियां भी सस्ते श्रम के चक्कर में आठ की बजाये 12 से 16 घंटे काम बिना ओवरटाइम और इन्क्रीमेंट के एक तरह से जबरन लेने की कोशिश खुलेआम कर रही हैं। एक तो पहले ही सरकारंे श्रम कानून लागू करने को बेमन से तैयार होती थीं लेकिन आज तो एक षड्यंत्र के तहत कानून का दख़ल एक तरह से ख़त्म ही हो चुका है।
    अव्वल तो सरकारें निजी कम्पनियों की मनमानी पर लगाम लगाने को तैयार नहीं हैं उूपर से हमारे भ्रष्ट इंस्पेक्टर अपनी जेबें भरने को हर समय लार टपकाते खुद कम्पनियों के दरवाजे़ पर कानून का सौदा करने को तैयार खड़े दिखाई देते हैं।
    गहराई से देखा जाये तो ऐसा लगता है कि दास प्रथा फिर से लौट आई है। हमारी सरकार की आंखे अमेरिका सहित दुनिया के 80 देशों में फैल चुके ऑक्युपाई वाल स्ट्रीट आंदोलन से अभी नहीं खुल रही है। ऐसेेे हालात बनाये जा रहे हैं जहां आप तनाव और दबाव में आकर नौकरी छोड़कर घर का रास्ता तो ले सकते हैं लेकिन अपनी सेेेेवा के बदले उचित वेतन और सुविधाएं ही नहीं स्वतंत्र सोच, मानवीय गरिमा, परिवार, समाज और देशहित की बात नहीं सोच सकते। आज कम्पनी जिस मज़दूर की बदौलत मोटे मुनाफे कमा रही हैं उससे उनको पर्याप्त वेतन ही नहीं पेंशन, बीमा, शिक्षा और चिकित्सा सब तरह की कानूनी ज़िम्मेदारियों से बरी हो चुकी हैं।
    उन्होंने यह काम संविदा पर ठेकेदार से कराना शुरू कर दिया है। एक तरफ कीपोस्ट पर बैठे प्रबंधकों को पगार के तौर पर करोड़ों का पैकेज दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ मज़दूरों को कम से कम देकर अधिक से अधिक काम लेने की होड़ इन ज़रख़रीद मैनजरों में मची रहती है।
    नया फंडा यह है कि घाटा होने पर यही कम्पनियां सरकार से बेलआउट पैकेज के नाम पर अरबों रूपया झटक ले रही हैं। निजी कम्पनियों की यही कलाकारी है कि वे सेवा के लक्ष्य ऐसे तय करती है कि कामगार अपनी नौकरी बचाने को बिना ओवरटाइम का भुगतान लिये 16 से 18 घंटे काम करने को मजबूर हो चुका है। हालत इतनी ख़राब हो चुकी है कि अब इंटरनेट के युग में मज़दूर ही नहीं क्लर्कों और मैनेजरों तक से लैपटॉप पर घर से भी काम कराया जा रहा है। मुश्किल से चार घंटे की नींद और काम करते करते ही खाना, नाश्ता और घर आये मेहमानों से से बातें कर लेना आम बात हो चुकी है। समाजसेवा और रिश्तेदारी निभाने को तो वहां कोई समय बचता ही नहीं है।
    संयुक्त परिवारों और दुख सुख में शरीक होने से तौबा कर चुके कामगार कभी कभी तो इतना व्यस्त और टार्गेट में उलझे होते हैं कि अपने बच्चो और मांबाप को दवाई तक दिलाने का समय नहीं निकाल पाते। जब परिवार के लिये ही समय नहीं है तो ऐसे में साहित्य, कला, संस्कृति, मनोरंजन, त्यौहार, समाज, पड़ौसी, सैक्स और खेल आदि के बारे में तो सोचना ही हिमाकत है।
    इसी तनाव और दबाव का नतीजा है कि युवा तेजी से ब्लडप्रैशर, हार्ट प्रॉब्लम, नपंुसकता और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों के तेजी से शिकार बनते चले जा रहे हैं। कम्पनियों ने कामगारों के साथ दो चार अपवाद छोड़ दें तो क्या किया है इसको एक आंकड़े से समझा जा सकता है 1998 की तुलना में 2008 में प्रति मज़दूर ने जहां अपना योगदान शुध्द मूल्य सृजन में दो लाख से बढ़ाकर छह लाख पहंुचा दिया है वहीं उसका वेतन नेट वैल्यू एडेड की तुलना में 18 से घटकर मात्र 11 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद हमारे उद्योगपति सरकार पर यह दबाव डालते रहते हैं कि श्रम कानून पुराने हो चुके हैं, उनको या तो ख़त्म कर दिया जाये या फिर इतना उदार बनाया जाये जिससे कम्पनियों को कानून का कोई डर न रहे।

    हम यह भूल रहे हैं कि कम्पनियों का काम केवल मुनाफा कमाना नहीं उसमें काम करने वाले सभी लोगों को मानवीय और गरिमापूर्ण जीवन जीने लायक वेतन और सुविधायें देना भी है जिसको लागू करना सरकार का कर्तव्य है।     

मुस्लिम: आरक्षण नहीं उच्च शिक्षा

मुसलमानांे को आरक्षण से पहले उच्च ि‍ श्‍क्षा की ज़रूरत है!
           -इक़बाल हिंदुस्तानी
0अब तक उनको सभी राजनीतिक दलों द्वारा भावनाओं में बहाकर मात्र वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है!
     आजकल मुसलमानों को राज्य और केंद्र सरकार की ओर से सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण देने की ज़ोरशोर से वकालत की जा रही है। हम यहां इस बात पर चर्चा नहीं करना चाहते कि यह कवायद इस समय यूपी का चुनाव नज़दीक देखकर मुसलमानों को वोटों के लिये पटाने के लिये की जा रही है या वास्तव में उनका भला करने की नीयत है? अगर उनका वाक़ई कल्याण करना है तो केवल आरक्षण से काम नहीं चलेगा। क्योंकि आरक्षण पिछड़ों के कोटे से उनको अगर दिया भी जाता है तो यह असली सवाल जल्दी ही सामने आ जायेगा कि दलितों की तरह उनके लिये नौकरियां तो उपलब्ध करा दी गयीं लेकिन वे इतने पढ़े लिखे, सम्पन्न और सक्षम हैं ही नहीं कि उनको आरक्षित सेवाओं का पूरा लाभ दिया जा सके। फिर निजीकरण के इस दौर में सरकारी नौकरियां बची ही गिनती की हैं। इसलिये केवल आरक्षण से पूरी कौम का भला नहीं हो सकता। इसके लिये तो सबका विकास ही एकमात्र रास्ता है।
   जहां तक उच्च शिक्षण संस्थाओं में उनको आरक्षण देने की बात है तो  मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा को लेकर अकसर यह बहस  होती रही है कि वे दीनी तालीम को ही असली शिक्षा क्यों समझते हैं ? एक आंकड़ें से इस बात को समझा जा सकता है। एक शिकायत यह की जाती है कि मुसलमानों की आबादी तो देश मंे सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 13.5 प्रतिशत है जबकि खुद मुसलमानों के दावे के अनुसार असली आबादी 20 परसेंट से भी अधिक हैं, और  उनकी भागीदारी सरकार की ए क्लास सेवाओं में मात्र एक से दो प्रतिशत है। इसका कारण उनके साथ पक्षपात होना बताया जाता है जबकि हमें यह बात पूरी तरह ठीक इसलिये नज़र नहीं आती क्योंकि एक तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिये चयन का तरीका इतना पारदर्शी और निष्पक्ष है कि उसमें भेदभाव की गुंजाइश ही नहीं है।
   इसका सबूत सहारनपुर मदरसे के एक मौलाना और कश्मीर का वह युवा शाह फैसल है जिसने कुछ साल पहले आईएएस परीक्षा में टॉप किया था। एक वजह और है। इस तरह की सेवाओं के लिये ग्रेज्युएट होना और महंगी कोचिंग हासिल करना आजकल ज़रूरी माना जाता है जबकि मुसलमानों में स्नातक पास की दर 3.6 प्रतिशत है। साथ ही इंग्लिश मीडियम कालेज और महंगी कोचिंग की सुविधा उनको उपलब्ध नहीं है। अधिकांश मुसलमान चूंकि गरीब और पिछड़े हैं लिहाज़ा वे इस स्तर तक आसानी से पहंुच ही नहीं पाते। ऐसा सच्चर कमैटी की रिपोर्ट में दर्ज है। एक समय था जब सर सैयद अहमद खां ने इस ज़रूरत को समझा था और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की स्थापना की।
    मुसलमानों के धार्मिक नेताओं ने उनको अंग्रेज़ों का एजेंट बताया गया और बाक़ायदा अंग्रेज़ी पढ़ने और उनके खिलाफ़ अरब से फ़तवा लाया गया। उनको चंदे के तौर पर जूते भेंट किये गये लेकिन उनको अपनी कौम से दिली हमदर्दी थी सो उन्होंने बुरा नहीं माना और लगातार अपने मिशन में बदनामी और जान का ख़तरा उठाकर भी लगे रहे। मुसलमानों को यह बात समझनी होगी कि आज केवल मदरसे की तालीम से वे दुनिया की दौड़ में आगे नहीं बढ़ सकते।
    मैं अपने शहर नजीबाबाद ज़िला बिजनौर यूपी मंे देखता हूं। यहां मुसलमानों की आबादी 65 प्रतिशत से अधिक है। यहां 12 इंटर कालेज हैं जिनमें से केवल 2 मुस्लिमों के हैं। दो डिग्री कालेजों मंे से उनका एक भी नहीं है। इन 14 में से 4 जिनमें दोनों डिग्री कालेज भी शामिल हैं, एक और अल्पसंख्यक समाज जैन बंधुओं के बनाये हुए हैं। मात्र एक प्रतिशत आबादी वाले सिख समाज का भी एक इंटर कालेज है। ईसाई तो बेहतरीन सैंट मैरिज़ स्कूल हर नगर कस्बे की तरह यहां भी चला ही रहे हैं। मज़ेदार बात यह है कि जो दो कालेज मुस्लिमों के हैं उनमें भी प्रबंधतंत्र में भयंकर विवाद है। हम यह नहीं कहना चाहते कि उनको दूसरे कालेजों में प्रवेश नहीं मिलता या उनको वहां नहीं पढ़ना चाहिये बल्कि इससे उनके आधुनिक और प्रगतिशील शिक्षा के प्रति रुजहान का पता चलता है।
   दूसरी तरफ देखिये नजीबाबाद में पिछले दिनों मस्जिदों का नवीनीकरण और नये मदरसे बनाने का बड़े पैमाने पर अभियान चल रहा है। हो सकता है यह अभियान कमोबेश और स्थानों पर भी चल रहा हो लेकिन मुझे वहां के बारे में पक्का मालूम नहीं है। नजीबाबाद की लगभग पचास मस्जिदों को सजाने संवारने में दस लाख से लेकर एक करोड़ रुपया तक ख़र्च किया जा रहा है। इस रुपये का अधिकांश हिस्सा स्थानीय मुसलमानों ने अपने खून पसीने की कमाई से चंदे की शक्ल में दिया है। ऐसा ही कुछ मामला मदरसों के नवीनीकरण और नवनिर्माण का भी है।
   इन मदरसों का मौलाना सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद आध्ुानिकीकरण कर साइंस और मैथ पढ़ाने को तैयार नहीं हैं, ऐसे में मुसलमान दुनियावी, अंग्रेजी मीडियम और उच्च शिक्षा जब नहीं लेंगे तो वे आरक्षण पाकर भी कैसे आगे बढ़ सकते हैं। इस पर बहस होनी ही चाहिये कि इसी मज़हबी कट्टरता की सोच की वजह से भी तो कहीं उनकी आज यह हालत नहीं हुई?
   किसी भी रोग के इलाज के लिये सबसे पहले यह मानना पड़ता है कि आप बीमार हैं। अगर आप अपनी कमियों और बुराइयों के लिये किसी दूसरे की साज़िश को ज़िम्मेदार ठहराकर केवल कोसते रहेंगे तो कभी समस्या का हल नहीं निकल पायेगा। यह आरोप लगाना बहुत आसान है कि हमारे साथ पक्षपात होता है। अगर आज मुसलमान शिक्षा, व्यापार, राजनीति, अर्थजगत, विज्ञान, तकनीक, शोध कार्यों, सरकारी सेवाओं और उद्योग आदि क्षेत्रों में पीछे है तो इसके लिये उनको अपने गिरेबान मंे झांककर देखना होगा न कि दूसरे लोगों को दोष देकर इसमें कोई सुधार होगा। समय के साथ बदलाव जो लोग स्वीकार नहीं करते उनको तरक्की की दौड़ में पीछे रहने से कोई बचा नहीं सकता।
   अंधविश्वास और भाग्य के भरोसे पड़े रहने से जो कुछ आपके पास मौजूद है उसके भी खो जाने की आशंका अधिक हैं। हम यह नहीं कह सकते कि प्रगति और उन्नति के लिये हम अपने मज़हब को छोड़कर आध्ुानिकता और भौतिकता के नंगे और स्वार्थी रास्ते पर आंखे बंद करके चल पड़ें लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज के दौर में जो लोग आगे बढ़कर अपना हक़ खुद हासिल करने को संगठित और परस्पर सहयोग और तालमेल का रास्ता दूसरे लोगों के साथ नहीं अपनायेंगे उनको पिछड़ने से कोई बचा नहीं सकता। मुसलमानों को यह सोचना होगा कि समाज के दूसरे वर्गों के साथ कैसे मिलजुलकर कट्टरपंथ को छोड़कर हर क्षेत्र में आगे बढ़ना है।
    मुस्लिम समाज को लेकर कुछ लोगांे ने यह राय बना रखी है कि यह एक बंद सोच का समाज है जिसे भावनाओं में बहाकर वोट लिये जा सकते हैं। हिंदू समाज को भी कुछ समय तक इस तरीके से वोेटों की राजनीति के लिये इस्तेमाल किया गया लेकिन वह जल्दी ही इस चक्रव्यूह से बाहर निकल आया जिससे वोटों के सौदागरों का वोटबैंक का खेल वहां अधिक नहीं चल पाया लेकिन कुछ दल और नेता मुसलमानों की समस्याओं को हल करने की बजाये उनको भड़का कर वोट तो ले लेते हैं लेकिन उनको मात्र बातों से खुश रखना चाहते हैं।
    उर्दू , मुस्लिम यूनिवर्सिटी, मुस्लिम पर्सनल लॉ, शरीयत, बाबरी मस्जिद, भाजपा, तसलीमा नसरीन और सलमान रूशदी कुछ ऐसे भावुक मुद्दे नेताआंे ने मुसलमानों को हमेशा उलझाने के लिये बना रखे हैं जिनसे बाहर निकलने की कोई कोशिश परवान चढ़ाने की कोई कोशिश कोई करता है तो उन लोगों को अपनी राजनीति ख़तरे में नज़र आने लगती है। बिरादरी और धर्म से उूपर उठकर वोट करने से जो विकास होगा स्वाभाविक रूप से उसका लाभ मुस्लिमों को भी मिलेगा। सड़क, स्कूल, अस्पताल और कारखाने अगर किसी राज्य में लगते हैं तो उस विकास का लाभ अपने आप ही मुस्लिम आबादी को भी मिलना तय है।
    दरअसल इस बात को संजीदगी से समझने की ज़रूरत है कि कोई भी पार्टी या नेता अगर किसी भी वर्ग या जाति को यह सपना दिखाता है कि वह ही उसका एकमात्र मसीहा है तो वह सरासर झूठा और मक्कार होता है। अगर कोई विकास होगा ही नहीं तो चंद लोगों को छोड़कर एक बिरादरी या धर्म के लोगों को भी क्या लाभ हो सकता है? जिस प्रकार बसपा की सरकार में मायावती ने यह भ्रम फैलाया है कि वह दलितों की एकमात्र मसीहा हैं उनके कामों से यह साबित नहीं किया जा सकता कि उन्होंने दलितों की भलाई के लिये कोई ठोस काम किये हैं। हां दलित विद्वानों और महापुरूषों के नाम पर उन्होंने पार्क, योजनाएं और ज़िले बनाकर दलितों को मानसिक रूप यह सम्मान और आभास ज़रूर कराया है कि वे भी सत्ता में आकर अपना सर गर्व से उूंचा कर सकते हैं।   
     ऐसे ही यूपी के कई बार सीएम रहे मुलायम सिंह यादव यह खास ध्यान रखते हैं कि ऐसे कौन से बयान हैं जो देकर मुसलमानों को खुश किया जा सकता है। भाजपा और शिवसेना भी यही काम हिंदुओं के द्वारा करने की कोशिश करके फेल हो चुकी हैं। अब सबका विकास ही एकमात्र रास्ता बचा है।
  0 मेरे  बच्चे  तुम्हारे  लफ्ज़ को रोटी समझते हैं,

  ज़्ारा तक़रीर कर दीजिये कि इनका पेट भर जाये।

जबतक सहेंगी तब तक अन्याय


महिलाओं से अन्याय तब तक होगा जब तक वे सहंेगी!
     -इक़बाल हिंदुस्तानी
0केवल कानून बनाना ही नहीं बल्कि उनका संघर्ष और सशक्तिकरण है समस्या का सही हल?
        अन्नपूर्णा मित्तल जी ने प्रवक्ता डॉटकॉम पर जब महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय और अत्याचार पर लेख लिखा होगा तो सोचा होगा कि यहां उनको बहस का एक ऐसा मंच मिलेगा जहां उनके दर्द को केेवल महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरूष लेखक और पाठक भी समझेंगे और सोच विचार कर उसका कोई ठोस समाधान निकालने का प्रयास करेंगे लेकिन यहां तो एक दो प्रतिक्रियाओं को छोड़कर सब उनके पीछे ऐसे हाथ धोकर पड़ गये जैसे उन्होंने सारे पुरूष समाज की थाने में रपट करा दी हो। वास्तव में ऐसा ही अकसर यूपी के थानों में पीड़ितों के साथ होता है कि जब वे किसी सामर्थवान या वीआईपी की शिकायत लेकर वहां एफआईआर लिखाने जाते हैं तो पुलिस आरोपी से फीलगुड कर उल्टा उसको ही जेल की हवा खिला देती है।
     यह सवाल बार बार उठता है कि समाज में नारी के साथ पक्षपात और अन्याय कब तक होता रहेगा। हमारा जवाब सदा यही होता है कि जब तक वे इस अत्याचार और शोषण को सहती रहेगी। हालांकि आज के ज़माने में उनके साथ यह सब कुछ केवल इसीलिये ही नहीं होता क्योंकि वे महिला हैं बल्कि इसकी एक वजह यह भी है कि वे कमज़ोर हैं। मिसाल के तौर पर बच्चो, विकलांगों, कमज़ोरों, मज़दूरों और गरीबों के साथ भी कमोबेश वह सब कम या ज़्यादा अकसर होता है जो महिलाओं के साथ होता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम दिखावे और ढोेंग के कारण यह सच स्वीकार ही नहीं करते कि नारी के साथ लिंग के कारण भी पक्षपात होता है जिसके लिये हमारे धर्म, परंपरायें , स्वार्थ, अनैतिकता और पुरूषप्रधान समाज और शोषणवादी सोच ज़िम्मेदार हैं।
    मिसाल के तौर पर 17 नवंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने एयर इंडिया को यह आदेश दिया है कि वह विमान में उड़ान के दौरान काम करने वाली महिलाओं को सुपरवाइज़र बनाने से वंचित करके संविधान के खिलाफ काम कर रहा है। लिहाज़ा उनको भी पुरूषों की तरह सुपरवाइज़र बनाया जाये। इतना ही नहीं रिटायरमेंट की उम्र भी एयर इंडिया मंे महिला और पुरूष कर्मचारियों की अलग अलग होती है। महिला कर्मचारी नियुक्ति के बाद चार वर्ष के भीतर अगर गर्भवती हो जाती थी तो उसको नौकरी से निकाल दिया जाता था। उसका वज़न मानक से अधिक होने पर विमान से बाहर की सेवा पर भेज दिया जाता था। देश की पहली आईपीएस किरण बेदी को एक महिला होने के कारण सरकार ने कई बार प्रमोशन से वंचित रखा।
     सेना में कमीशन को लेकर भी बार बार महिलाओं के साथ दोहरे मापदंड अपनाने की शिकायतें मिलती रहती हैं। समान काम के बावजूद उनको समान वेतन नहीं दिया जाना तो आम बात है। उनको यह भी कहा जाता है कि रात की पारी में काम न करें। कानूनी भाषा में महिला के लिये ‘‘रखैल’’ शब्द का इस्तेमाल हाल तक अदालतों में होता रहा है। संविधान का अनुच्छेद 15 हर नागरिक को बिना लैंगिक और जातीय पक्षपात के मुक्त जीवन का अधिकार देता है। लड़की की ऑनर किलिंग एक कड़वी सच्चाई है ही।
     व्यवहार में देखा जाये तो लड़की की भ्रूणहत्या से लेकर दहेज़ के लिये उसे बहु बनने पर जलाकर मारने की घटनायें आज भी बड़े पैमाने पर हमारे समाज में हो रहीं हैं। उनको खिलाने पिलाने से लेकर पढ़ाने लिखाने तक में पक्षपात होता है। जब हम शादी के लिये लड़के का रिश्ता तलाश करते हैं तो अकसर लड़की को लड़के से उम्र, लंबाई और पढ़ाई में थोड़ा छोटा रखते हैं। वजह वही पुरूष का अहंकार जिसमें उसकी पत्नी उससे बड़ी नहीं बल्कि बराबर भी नहीं चाहिये। यही कारण है कि जहां महिला नौकरी या कारोबार करती है वहां परिवार में अकसर उससे टकराव शुरू हो जाता है वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर गलत बात सहन नहीं करती और पति  व सास ससुर उसे भोली गाय समझकर पहले की तरह दबाते और सताते हैं।
    इसका नतीजा कई बार अलगाव के रूप में सामने आता है तो पुरूषप्रधान समाज कहता है कि जिस घर मंे महिला कमायेगी वहां तो यह अशुभ और मनहूस झगड़ा होगा ही। ऐसे ही लड़की एक बेटी, बहन और पत्नी के रूप में बाप, भाई और पति की अपनी सुरक्षा के लिये मोहताज रहती है। रात तो रात महिला दिन में भी अकेले जाने पर छेड़छाड़ और बलात्कार का अकसर शिकार हो जाती है। खुद करीबी रिश्तेदार यहां तक कि कई बार बाप, भाई और गुरूजन तक उसकी अस्मत का न केवल सौदा कर देते हैं बल्कि खुद भी मंुह काला करने से बाज़ नहीं आते। वेश्यावृत्ति के ध्ंाधे मंे भी अधिकांश मामलों में महिला को पुरूष ही धकेलते हैं। अपवादों से कोई सटीक राय नहीं बनाई जा सकती।
   जहां तक महिला द्वारा महिला पर जुल्म करने का आरोप है तो वह तो ठीक ऐसे ही है जैसे देश की गुलामी में खुद कई गद्दार भारतीय जयचंद और मीरजाफर भी शामिल थे। महिलाओं के कम या उत्तेजक कपड़ों की वजह से अगर बलात्कार होते तो बुर्केवाली, आदिवसाी और बच्चियों के साथ दुराचार क्यों होते हैं ? यह सवाल अपने आप में बेहद गंभीर है कि एक उच्चशिक्षित महिला के साथ भी अगर उसका पति और सास ससुर खुद उच्चशिक्षित होकर भी लालच और पुरूषप्रधान समाज की सोच के कारण ऐसा वहशी और दरिंदगी वाला दर्दनाक व्यवहार करते हैं तो यह एक बार फिर से सोचना पड़ेगा कि हम कितने सभ्य और संस्कृत हैं?
   महिला का भावुक और त्यागी होना भी उसके साथ अन्याया का कारण बनता है। वह जज़्बात में बहकर पुरूषों पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेती है जिससे उसके साथ धोखा और ब्लैकमेल होता है। ऐसा लगता है कि हम आज भी जंगलयुग में रह रहे हैं जहां शेर जो करता है वही सही होता है। यह तो मत्स्य न्याय वाली बात है कि छोटी मछली को बड़ी मछली आज भी हमारे समाज में खा रही है। लगातार महिला सशक्तिकरण और अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की इसका एकमात्र समाधान है। इसमें कुछ समय लगेगा लेकिन यकीन कीजिये लंबे समय तक महिलाओं के साथ यह गैर बराबरी चल नहीं पायेगी। नारी जाति की ओर से एक शेर यहां सामयिक लग रहा है-
    0हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,

     वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।

पाक : पिद्दी न पिद्दी का शोरवा...

पाकिस्तानः पिद्दी न पिद्दी का शोरवा...-इक़बाल हिंदुस्तानी
      एक कहावत है कि जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की तरफ भागता है, इसमें यह और जोड़ा जा सकता है कि जब पाकिस्तान की तबाही आती है तो वह अमेरिका जैसी महाशक्ति को आंखे दिखाता है। पाकिस्तान के सेनाप्रमुख जनरल परवेज़ कयानी ने जब यह चेतावनी दी थी कि अमेरिका हमें ईराक या अफगानिस्तान न समझे क्योंकि हमारे पास परमाणु बम है, तब कुछ लोगों को यह लगा होगा कि शायद वाक़ई अमेरिका को एक बार फिर सोचना चाहिये कहीं ऐसा न हो कि अमेरिका के अधिक दबाव बनाने से पाक बौखलाकर कोई अतिवादी क़दम उठा बैठे लकिन अब पता चला है कि अमेरिका तो अमेरिका है खुद भारत के जंग के अलावा कोई रास्ता न बचने जैसे कड़े बयानों से 26/11 के मुंबई हमलों के बाद कैसे पाकिस्तान की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी थी। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालीज़ा राइस ने अपनी किताब नो हाई ऑनर्समें इसकी विस्तार से चर्चा की है।
     अमेरिका की भी अजब कहानी है जब तक भारत कश्मीर  और पूरे देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का दंश अकेले झेलता रहा तब तक उसको आतंकवाद के वैश्विक ख़तरे का अहसास नहीं हुआ लेकिन जब वलर््ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला हुआ तो उसको पूरी दुनिया ख़तरे मंे नज़र आने लगी। उसने दो टूक एलान कर दिया कि जो इस मामले में उसका साथ नहीं देगा वह आतंकवाद के पक्ष में माना जायेगा। हमले के एक माह बाद ही अमेरिका ने अक्तूबर 2001 में अलकायदा को इसका ज़िम्मेदार ठहराकर अफगानिस्तान पर धावा बोल दिया।
   अरबो डालर, लाखों  नागरिकों और हज़ारों सैनिकों की जान जाने के बाद अमेरिका को पता चला कि समस्या की जड़ तो पाकिस्तान में है। पहले तो उसने  दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी माने जाने वाले ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में न केवल खोज निकाला बल्कि बिना पाक सरकार की मदद और जानकारी के मौत के घाट भी उतार दिया। अब उसने पाक सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह नाटक न करके आतंकवाद के पूरी तरह सफाये के लिये बिना शर्त कार्यवाही में अमेरिका का साथ दे नहीं तो बर्बादी और दुश्मनी को झेलने को तैयार हो जाये।
     दरअसल सारा विवाद उस हक़्कानी ग्रुप पर कार्यवाही करने का है जिसको पाकिस्तान की सेना अपनी बहुत बड़ी पूंजी मानकर चल रही है। उधर अमेरिका ने तय कर लिया है कि हक़्कानी आतंकवादी समूह को ठिकाने हर हाल में लगाना है। 2014 तक अमेरिका को नाटो के साथ ही अफगानिस्तान से विदा होना है लिहाज़ा वह उससे पहले ही आतंकवाद के सारे बीज वहां से चुनचुन कर ख़त्म करना चाहता है लेकिन पाकिस्तान और कट्टरपंथी वहां इसके बाद दूसरा ही खेल खेलने की तैयारी किये बैठे हैं। इसी मुद्दे को लेकर पाक अमेरिकी सम्बंध लगातार बिगड़ रहे हैं।
    एक तरफ अमेरिका पाक के न चाहते हुए भी उसपर आतंवाद के पूरी तरह सफाये के लिये अपना साथ हर स्तर पर देने का भारी दबाव बना रहा है तो दूसरी तरफ वह अपने बल पर ही उत्तरी वज़ीरिस्तान में हक़्कानी समूह से जबरदस्त टकराव के लिये तैयारी कर रहा है। अमेरिका को यह विश्वास हो चुका है कि उसकी सारी कवायद तब तक बेकार है जब तक कि वह हक़्क़ानी समूह का सफाया कर उससे काबुल के अमेरिकी दूतावास पर हमले का हिसाब बराबर नहीं कर लेता।
     पाकिस्तान सरकार का हक़्कानी पर धावा न बोलने का एक कारण यह तो है ही कि वह उसे बाद में अफगानिस्तान में अपने लिये इस्तेमाल करना चाहता है लेकिन साथ ही यह भी एक बड़ी वजह है कि उसे लग रहा है कि हक़्कानी समूह से वह पार नहीं पा सकेगा और तालिबान की तरह उसकी दुश्मनी अमेरिका के जाने के बाद उसे और भी भारी पड़ सकती है। पाक सेना को याद है कि पहले वह वजीरिस्तान में तालिबान के हाथों शिकस्त खा चुकी है। उधर अमेरिका को अहसास हो चुका है कि हक्कानी समूह पाक की ही एक छद्म फौज है।
     सच तो यह है कि अमेरिका और पाक के सम्बंध सीआईए के एजेंट रेमंड डेविस की पाक में गिरफ़्तारी के बाद से ख़राब होने शुरू हो गये थे। ओबामा डेविस को काफी लंबी जद्दो जहद के बाद ही आज़ाद करा पाये थे जिससे अमेरिका को लगा कि वह पाक को विश्वसनीय नहीं मान सकता। इसके बाद अमेरिका ने जब ओसामा को एबटाबाद में बिना पाक सरकार को बताये घुसकर मारा तो न केवल पाकिस्तान पूरी दुनिया मंे शर्मिंदा हुआ बल्कि यह बात भी खुल गयी कि अब अमेरिका उसको विश्वास के लायक नहीं मानता।
     खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली कहावत चरितार्थ करते हुए पाक फौज बार बार अमेरिका को गीदड़ भभकी देकर यह दिखाने का दंभी और दिखावटी प्रयास कर रही है कि हम किसी से कम नहीं। यही वजह है कि रेमंड डेविस के मामले में ही नहीं वह पहले 9/11 के बाद अलकायदा पर हमले को लेकर भी ऐसे ही तेवर अमेरिका को दिखा चुका है लेकिन जैसे ही तत्कालीन प्रेसिडेंट जार्ज बुश के इशारे पर रिचर्ड आर्मिटेज ने उसको सबक़ सिखाने की चेतावनी दी थी तो वह इसके लिये सारी शर्तें मानने को तैयार हो गया था।
   पाकिस्तान भूल रहा है कि उसने दशकों पुराने तालिबानी सम्बंध भुलाने मंे कुछ ही मिनट का समय लगाया था और अफगानिस्तान में न चाहते हुए भी अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को मजबूरी में तैयार हो गया था, यह अलग बात है कि बाद में उसने बीच बीच में ओसामा को बचाने से लेकर अमेरिका के साथ विश्वासघात करने के अपने दोगले कारनामे जारी रखे लेकिन अमेरिका सब कुछ जानकर भी खामोश इसलिये रहा कि उसके पास उस समय कोई विकल्प नहीं था लेकिन अब ऐसा नहीं है।
    इस मामले में पाकिस्तान जानता है कि भारत और अमेरिका में ज़मीन आसमान का अंतर है। अगर वह अफगानिस्तान में अमेरिका के सैनिकों पर परमाणु हमला करने का दुस्साहस भूल से भी कर बैठा तो उसको ओबामा पूरी तरह तबाह और बर्बाद करके कहीं का नहीं छोड़ेंगे। पाक जानता है कि भारत से भी वह आमने सामने की जंग में कभी नहीं जीत पायेगा जिससे वह आतंकी निशाना छिप छिप कर साधता रहता है लेकिन अमेरिका के साथ वह ऐसा भी नहीं कर सकता क्योंकि अमेरिका के पास पाक पर हमला करने के बाद खोने के लिये कुछ भी नहीं है।
    बराक हुसैन ओबामा को बार बार यह अहसास हो रहा है कि अगर पाकिस्तान ईमानदारी से आतंक से लड़ने में अरबों डॉलर की मदद के बाद भी उसका साथ देने को तैयार नहीं है तो उसे सबक सिखाने के अलावा चारा भी क्या है?
0 बरस बरस के चुकाना है उसे अश्को से,
कभी ज़मीन से बादल ने जो उधारी की।
अजब नहीं कि उसे आईना न पहचाने,

इसी तरह जो अंधेरों से उसने यारी की।।    

प्रेस पर शिकंजा...


प्रैस पर कानूनी शिकंजा यानी बंदर के हाथ मंे उस्तरा?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0 ख़राब लोगों के हाथ में अच्छा कानून भी बेलगाम हो जाता है!
           मीडिया खासतौर पर प्रैस पर अपने अपने अनुभव से कानूनी शिकंजा कसने की जोरशोर से मांग कर रहे लोगों को शायद यह पता नहीं है कि वर्तमान कानूनों रहते ही कोई अख़बार और उसके पत्रकारों को सबक सिखाने की ठान ले तो कितनी आफत आ जाती है। सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सरकार के तेवर भी दरअसल अश्लील और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कंटेंट से नहीं बल्कि अरब क्रांति के डर से सहमे हुए हैं। अब वे यह बात साफ साफ खुलकर कह तो नहीं सकते कि हम इस डर से इंटरनेट की निगरानी चाहते हैं लेकिन वही मामला प्रैस के लिये चलाया जा रहा है।
    हम यह दावा नहीं करते कि मीडिया पूरी तरह साफ सुथरा है लिहाज़ा इस पर किसी तरह की रोक टोक नहीं लगनी चाहिये बल्कि हमारा कहना तो यह है कि जो लोग इस बात की पैरवी कर रहे हैं कि मीडिया पर कानूनी शिकंजा कसने के लिये नये कानून और कड़े नियम बनाये जाने चाहिये वे ठीक नहीं कह रहे क्योंकि मौजूदा कानून के तहत भी प्रैस और चैनलों को सही रास्ते पर चलाया जा सकता है।
    प्रैस को राहे रास्त पर लाने के लिये बेहद उतावले मेरे कुछ वरिष्ठ पत्रकार साथियों ने प्रैस काउंसिल के चेयरमैन और पूर्व जज मार्कंडय काटजू के सुर में सुर मिलाकर यह मांग तेज कर दी है कि सरकार ऐसा कुछ करे जिससे प्रैस को गल्ती करने पर कड़ा दंड दिया जा सके। उनको पता होना चाहिये कि टाइम्स नाउ चैनल ने गाज़ियाबाद के भविष्यनिधि घोटाले के एक समाचार के दौरान मानवीय भूल से न्यायमूर्ति पी के सामंत की जगह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश पी बी सावंत की तस्वीर दिखा दी थी। जैसे ही चैनल को इस गल्ती का एहसास हुआ उसने इस भूल के लिये जस्टिस सावंत से सार्वजनिक रूप से सीध्ेा सीधे क्षमा मांगी। इतना ही नहीं यह माफी भी एक नहीं अनेक बार मांगी गयी लेकिन जस्टिस सावंत ने चैनल को बख़्शने से दो टूक मना कर दिया। खैर यह उनका कानूनी अधिकार है। जस्टिस सावंत ने इस मानहानि के लिये मुंबई हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
     वहां टाइम्स चैनल ने अपना पक्ष रखते हुए सफाई दी कि यह सब कुछ जानबूझकर जस्टिस सावंत का अपमान करने या किसी बदले की भावना से नहीं किया गया बल्कि तकनीकी कमी और नाम मिलता जुलता होने से भूलवश हो गया जिसके लिये चैनल कई बार स्थिति स्पश्ट कर चुका है और माफी भी मांग चुका है। इसके बावजूद कानून ने अपना काम किया और चैनल को आदेश दिया कि जस्टिस सावंत को मानहानि के एवज में 100 करोड़ हर्जाना दिया जाये। चैनल ने इसके खिलाफ जब सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो चैनल से कहा गया कि वह अपील से पहले 20 करोड़ नक़द और 80 करोड़ की बैंक गारंटी पेश करे। जाहिर सी बात है कि चैनल को अपील के लिये ऐसा ही करना होगा।
    हालांकि पूर्व जस्टिस काटजू ने इस मामले पर कोर्ट से चैनल को राहत देने की अपील की है लेकिन वे जस्टिस रहे हैं और वर्तमान में प्रैस काउंसिल के चेयरमैन हैं जो चाहें कह सकते हैं लेकिन हम तो एक आम आदमी या मामूली कलमकार होने की वजह से इस मामले में अपनी कोई राय भी नहीं दे सकते क्योंकि इतना ज्ञान ही नहीं है कि कौन सी बात या शब्द से माननीय न्यायालय या न्यायधीश महोदय की मानहानि की आशंका हो सकती है।
    इस मामले में मैं अपने मीडिया के साथियों और पूर्व जस्टिस काटजू साहब से पूरे अदब और एहतराम के साथ यह गुज़ारिश करना चाहता हूं कि जब मानहानि का इतना मज़बूत और सक्षम कानून मौजूद है जिसमें एक आदमी की गलत फोटो लगने से एक मीडिया हाउस को 100 करोड़ हर्जाना भरने को कहा जा सकता है तो और क्या सीधे फांसी लगाने का कानून इस भ्रष्ट सरकार से बनवाना चाहते हो जो आयेदिन अन्ना हज़ारे के आंदोलन के लिये मीडिया को कोेेसती है जबकि अपने गिरेबान में झांकने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं सरकार वर्तमान कानूनों का ही दुरूपयोग करते हुए अन्ना की कोर कमैटी के सदस्यों के खिलाफ कौन सी कोर कसर छोड़ रही है जो वर्तमान मानहानि कानून के रहते वह नया कानून बनाकर अपने खिलाफ कुछ लिखने बोलन पर पत्रकारों का जीना हराम कर देगी।
   एक बार इसी समस्या को महसूस करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यहां तक कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग होने के बावजूद मैं यही कहूंगा कि इस पर किसी तरह की कानूनी रोकटोक नहीं लगाई जानी चाहिये क्योंकि यह ठीक ऐसा ही होगा जैसे जुर्म करने से पहले ही किसी को मात्र अपराध करने की आशंका में उसकी आज़ादी को छीन लेना। अगर मिसाल के तौर पर देखा जाये तो टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद विरोधी कानून इसीलिये हटाये गये क्योंकि उनका दुरूपयोग पुलिस कर रही थी। जब तक हमारे समाज और सरकार में इतनी नैतिकता और ईमानदारी न आ जाये हम व्यक्तिगत स्वार्थ की बजाये देशहित और जनहित को उूपर रख सकें तब तक प्रैस पर और कड़ी कार्यवाही करने का कोई कानून बनाकर सरकार के हाथ में देने का मतलब होगा बंदर के हाथ में उस्तरा।
   जिस तरह से आज सेना को दिये गये विशेष सशस्त्र सुरक्षा बल कानून का दुरूपयोग किये जाने का विवाद चल रहा है और जिस तरह से पुलिस अपने असीमित अधिकारों का अकसर कमजोर और गरीब लोगों पर गलत इस्तेमाल करती है या फिर गणमान्य और अमीर लोगों को ब्लैकमेल करती है वैसे ही कल प्रैस के साथ होगा अगर नया कड़ा कानून बनता है। सरकार का वश नहीं चलता वर्ना वह एमरजैंसी की तरह यह ज़रूरी करदे कि कोई भी लेख या समाचार छपने या दिखाने से पहले उससे पास कराना ज़रूरी होगा। याद रखिये अगर मीडिया के लिये कोई नया सख़्त कानून और बनाया जाता है तो वह बंदर के हाथ में उस्तरे की तरह ही माना जायेगा।
    जब तक पूरी व्यवस्था ईमानदार और पारदर्शी नहीं बनती तब तक अकेले प्रैस या टीवी चैनल के लिये अलग से नियामक और सेंसरशिप बनाना मेरे विचार से आ बैल मुझे मार वाली ही बात होगी। सरकार सीबीआई और सीवीसी का कैसा इस्तेमाल करती है यह हम देख ही रहे हैं। फिलहाल जो कानून मौजूद हैं वही पर्याप्त हैं बशर्ते कि लोग अपने अधिकारों के लिये जागरूक होने के साथ साथ खुद भी ईमानदार और जानकार हों जिससे वे कानून का सहारा लेने का साहस दिखा सकें आज तो अधिकांश खुद गड़बड़ हैं जिससे वे किसी दूसरे के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करते हुए इसलिये भी डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि सामने वाला चिढ़कर फिर उनकी बखिया उधेड़ दे। दुष्यंत कुमार की चार लाइनें याद आ रही हैं-
0 आज ये दीवार पर्दे की तरह हिलने लगी,
  षर्त लेकिन थी कि बुनियाद हिलनी चाहिये।
हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गांव में,

हाथ लहराते हुए हर लाष चलनी चाहिये।।

सरकार अब तो जागो !


सरकार बात जूते से चांटे तक आ पहुंची है, अब तो जागो!
           -इक़बाल हिंदुस्तानी
0बेशक हिंसा गलत है लेकिन कानून की सुन कौन रहा है?
   केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को सरदार हरविंदर सिंह ने चांटा मार दिया। इस चांटे की गूंज पूरे देश में सुनी जा रही है। यह थप्पड़ दरअसल शरद पवार या एक मंत्री को नहीं बल्कि पूरी सरकार को पड़ा है। जो कांग्रेस नेता इसके लिये भाजपा नेता यशवंत सिन्हा को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं उनका कहना कुछ ऐसा ही है जैसे कोई सरकार किसी खुफिया एजंसी को इस बात के लिये दोषी ठहराये कि उसके यह बात कहने से ही पड़ौसी देश ने हमला किया कि हमला हो सकता है। यह तो सिन्हा जी की दूरअंदेशी की बात है कि उन्होंने माहौल देखते हुए लोगों के गुस्से को समय से पहले ही पहचाना।
   हालांकि लोकतंत्र में हिंसा के लिये कोई जगह नहीं होती लेकिन यहां सवाल यह उठ रहा है कि क्या वास्तव में हमारे देश में लोकतंत्र है? क्या कानून की बात सुनी जाती है? क्या जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से बुरी तरह परेशान है यह बात राजनेताओं को अभी तक पता नहीं लगी है। अन्ना हज़ारे ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया तो पहले उनको सर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबा बताया गया। फिर उनके आंदोलन के पीछे विदशी शक्तियां और अमेरिका का हाथ देखा गया। फिर उनको तिहाड़ जेल में बंद कर दिया गया। फिर उनके पीछे संघ परिवार को बताया गया।
    यानी इतनी विशाल भीड़ सब संघ के इशारे पर जमा हो गयी। कमाल है। सरकार इतनी कमज़ोर और संघ इतना मज़बूत। पहले अन्ना का अनशन लंबा खींचकर उनको स्वर्ग पहंुचाने का इंतज़ार करते रहे फिर जब पूरे देश में उबाल आने लगा तो मजबूर होकर बेमन से आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते मंे डालने की नीयत से लटका दिया गया। फिर टीम अन्ना का चरित्रहनन व उत्पीड़न किया गया। अभी भी लोगों को विश्वास नहीं है कि सरकार मज़बूत जनलोकपाल बिल पास कर ही देगी। क्या करें पुलिस और अफसरों की तरह हमारी सरकार के विश्वास का भी दिवाला निकल चुका है।
  एक कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अपराध की रपट थाने में लिखाने जाओ तो पुलिस नहीं लिखती। अगर किसी सिफारिश या पहंुच से यह चमत्कार हो भी जाये तो दूसरी पार्टी से पैसा खाकर एफ आर लगाने का विकल्प खुला है। अगर यह भी नहीं हुआ तो केस कमज़ोर बनादेेंगे। फिर अदालत में अ से आजा द से देजा ल से लेजा त से तारीख़ का दसियों साल तक खेल चलता रहेगा। कई लोग मर जाते हैं लेकिन मुकदमों जीहां मुंह क़दमों में फैसले नहीं होते। मालिकों को मकान दुकान और अपना हिस्सा जीते जी नहीं मिलता और चुनाव में धंाधली होने पर पूरा कार्यकाल बीत जाता है लेकिन यह तय नहीं हो पाता कि वास्तव में चुनाव में कोई गड़बड़ थी या नहीं?
   सरकारी सस्ता गल्ला वाला चीनी खाकर तेल पी जाता है और सरकारी डाक्टर चोट लगने के बावजूद बिना पैसा खाये असली मेडिकल तो नहीं बनाता लेकिन जेब गर्म कर आपके विरोधी को फर्जी गंभीर चोटों का प्रमाण पत्र तुरंत पकड़ा देता है जिससे आपको सबक सिखाकर वह झूठी एफआईआर दर्ज करा देता है। अब पुलिस भी फीलगुड करके फौरन एक्टिव हो जाती है। आपको पकड़ भी लेती है और थाने में आप पर थर्ड डिग्री भी इस्तेमाल कर देती है। ये तो दो चार मिसालें हैं। आप सरकार से जुड़े किसी काम के लिये चले जायें कहीं आपकी सुनवाई नहीं होगी।
    लोग तरह तरह की मांगों को लेकर रोड और रेल का चक्का जाम कर देते हैं सरकार वोटों का गणित देखकर गंूगी बहरी बनी रहती है। जो लोग यह दुहाई दे रहे हैं कि अपनी बात चांटा मारकर नहीं शांति से और कानून के दायरे में कही जानी चाहिये हम भी उनसे सहमत हैं लेकिन सवाल यह है कि जब कानून अपना काम नहीं करेगा तो कोई न कोई हरविंदर तो अपना हाथ चलायेगा ही।
     कृषिमंत्री पवार को बलविंदर द्वारा मारे चांटे पर एक घटना याद आ रही है। बिजनौर ज़िले के वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक स्व0 बाबू सिंह चौहान साहब ने एक बार अनाज की कमी के चलते अपने अख़बार में कई दशक पहले 1964 में एक ख़बर छाप दी थी। ख़बर का हेडिंग था-भूखा मानव क्या करेगा। इस ख़बर में यह लिखा था कि जब बाज़ार में खाद्यान की कमी के चलते अनाज काफी महंगा बिक रहा था। ऐसे में एक गरीब रिक्शावाला जिसके बच्चे रोटी न मिलने से दो दिन से भूखे थे। बाज़ार में एक किराने की दुकान पर गया। उसने दो किलो आटा तुलवाया। जब वह लालाजी को पैसे देने लगा तो वह कम थे। लालाजी ने उससे और पैसे देने को कहा।
   उसने कहा कि उसके पास और धन नहीं है। इसपर लालाजी ने उसे आटा देने से मना कर दिया। वह ज़िद पर अड़ गया कि वह आटा लेकर ही जायेगा। बहस और जोर ज़बरदस्ती के बाद वह गरीब रिक्शावाला अपने बच्चो की भूख मिटाने को आटा छीनकर भागने लगा। इसपर बाज़ार में लोग उसके पीछे भागने लगे। उसे पकड़कर आटा छीन लिया गया। उसको धेखेबाज़ और लुटेरा बताया गया। पहले मारा पीटा गया फिर पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस और प्रशासन ने उसकी व्यथा न सुनकर उसका चालान कर दिया। ऐसे में चौहान साहब की इंसानियत जागी और उन्होंने यह समाचार इस शीर्षक से जब छापा तो पॉवर के नशे में चूर तत्कालीन ज़िलाधिकारी ने चौहान साहब के खिलाफ ही उल्टे मोर्चा खोल दिया।
   उनको इस मानवता प्रेमी समाचार के प्रकाशन के लिये जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही अख़बार और परिवार को भी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। कहने का मतलब यह है कि हमारे राजनेता और अधिकारी केवल कानून की दुहाई देते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि यह नौबत क्यों आती है कि लोग कानून का सहारा न लेकर अपने तरीके से थप्पड़ जैसी कार्यवाही करने पर उतर आते हैं।
    यह ठीक है कि किसी भी सभ्य समाज में थप्पड़ मारकर किसी समस्या का समाधन नहीं किया जा सकता लेकिन यह सवाल भी तो अपनी जगह खड़ा है कि जब नेता प्यार और अमन से की जाने वाली मांग पर कान न देकर केवल तभी सुनते हों जब उनकी जान पर बन आये। आयेदिन देखने में आ रहा है कि दुर्घटना होने पर कोई भी अधिकारी और पुलिस तब तक मौके पर नहीं आते जब तक कि लोग जाम न लगायें। इतना ही नहीं एक्सीडेंट के ज़िम्मेदार भी तब तक मुआवज़ा देने को तैयार नहीं होते जब तक कि जनता किसी तरह का दबाव न बनाये। पुलिस रपट भी जाम या प्रदर्शन के बाद ही लिखती है।
    सरकार माओवादियों और आतंकवादियों से बात करने को बिना शर्त तैयार रहती है लेकिन राजधनी में प्रदर्शन कर मांगपत्र देने वालों पर लाठीचार्ज और गोली चलवाती है। उत्तराखंड में स्वामी निगमानंद आमरण अनशन करते करते मर जाते हैं और मणिपुर में इरोम शर्मिला दस साल से अपफस्पाके खिलाफ भूख हड़ताल करती रहती है लेकिन कोई सुनवाई करने को तैयार नहीं होता। एक बात हमारे नेता और अधिकारी कान खोलकर सुन लेें कि हिंसा का समर्थन न करने के बावजूद अगर वे लोगों के दुख तकलीफ पर गूंगे बहरे बने रहेंगे तो यह स्वाभाविक है कि अब लोग और अधिक सहन नहीं करेंगे। बात अब जूते से चांटे तक आ पहंुची है अभी भी नहीं जागे तो फिर मत कहना कि भारत की सहनशील जनता ‘‘ऐसा’’ भी कर सकती है???
0अब तख़्त हिलाये जायेंगे,
 अब ताज उछाले जायेंगे।
 बढ़ते भी चलो कटते भी चलो,
बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत,
बढ़ते ही चलो कि अब डेरे,

मंज़िल पे ही डाले जायेंगे।।