Tuesday, 5 June 2018

एनडीए के घटक

बीजेपी पहले पुराने घटक ही संभाल ले!

उपचुनावों में एक के बाद एक मिली लगातार हार से बीजेपी अंदर ही अंदर डर गई है। केंद्रीय मंत्री नकवी ने कहा है कि अगर कोई नया दल एनडीए में शामिल होना चाहता है तो उन्होंने कोई नो एंट्री का बोर्ड नहीं लगाया है।

2014 के चुनाव में बीजेपी को खुद 282 और एनडीए को 300 से अधिक सीटें मिली थीं। खुद बीजेपी को अपने बल पर स्पष्ट बहुमत मिल जाने से उसने सरकार बनने के बाद कभी अपने घटक दलों को कोई महत्व नहीं दिया। उनके कोटे का मंत्री पद देकर बीजेपी ने अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली। मंत्री पद में भी विभाग मोदी ने अपनी मर्जी से दिया। इसके बाद न तो कभी एनडीए के घटक दलों के साथ पीएम मोदी ने कोई बैठक करने की ज़रूरत समझी और न ही उनसे कभी किसी बड़े सरकारी फैसले पर राय ली गई।
हालांकि घटक दलों को यह अहंकार और मनमानी चुभती तो रही लेकिन वे इसलिए शांत रहे क्योंकि वे सरकार को अपने हिसाब से चलने को मजबूर करने की स्थिति में नहीं थे। घटक दलों को यह भी पता था कि जिस सरकार में पूरी कैबिनेट को ही शो पीस बनाकर रख दिया गया हो, वहां उनकी कौन सुनेगा? बहरहाल यह उपेक्षा जब अपमान में बदलती चली गई तो धीरे धीरे घटक दलों में गुस्सा बढ़ने लगा।
सबसे पहले बगावत का बिगुल महाराष्ट्र में शिवसेना ने बजाया। उसने पहले तो राज्य में अपना पुराना दर्जा बहाल करने के लिये सीएम बनाने को काफी हाथ पांव मारे, लेकिन जब बीजेपी इसके लिये तैयार नहीं हुई तो उसने शिवसेना को उसकी हैसियत बताने के लिए शरद पवार की एनसीपी को शिवसेना के सपॉर्ट वापस लेने की धमकी से निबटने को अपने साथ नये घटक के तौर पर लाने का संकेत दिया। इससे शिवसेना और भी नाराज़ हो गई। हालांकि अभी तक उसने मोदी सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है, लेकिन वह अगला चुनाव अलग-अलग लड़ने का ऐलान कर चुकी है। इस के बाद आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू का बीजेपी के साथ विवाद शुरू हुआ। उनका आरोप था कि बीजेपी उनके प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा करके मुकर रही है। इससे आंध्र में विपक्ष नायडू पर भारी पड़ रहा था। बीजेपी के धोखा देने से नायडू ने मोदी सरकार का साथ छोड़ दिया। उधर पंजाब में, अकाली दल से भी बीजेपी के संबंध अच्छे नहीं हैं, लेकिन पंजाब विधानसभा का चुनाव हार जाने की वजह से अकाली दल फिलहाल दबाव में है।

इसलिए वह न चाहकर भी केंद्र की सत्ता का दामन पकड़े रहने को मजबूर है। इसके बाद एनडीए के 4 बड़े घटकों में बड़ा घटक जनता दल यूनाइटेड बचता है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार लालू यादव का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ आने के अपने फैसले को सियासी नुकसान के तौर पर देख रहे है, लेकिन उनके लिये अब राष्ट्रीय जनता दल के दरवाज़े भी धोखा देने से बंद नज़र आ रहे हैं। उधर महागठबंधन की अहम साझेदार रही कांग्रेस भी नीतीश कुमार को गले लगाने को तैयार नहीं है। साथ ही राजद से अलग होकर बीजेपी के साथ आने के बाद नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने जितने भी उपचुनाव लड़े हैं, लगभग सभी में उनकी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए नीतीश कुमार दबी ज़बान से मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं। साथ ही वह अंदर ही अंदर पासवान और उपेंद्र कुशवाह के साथ मिलकर बीजेपी से आधे से अधिक सीटें न मिलने पर एक नया मोर्चा बनाने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में बीजेपी को चाहिए कि नए घटक तलाशने की बजाय पहले पुरानों को ही संभाल कर रखे। ऐसा लगता है कि बीजेपी का जहाज डूबता देख घटक दल उससे कूदने की तैयारी अभी से करने लगे हैं।

Sunday, 3 June 2018

भाजपा का मूल एजंडा

भाजपा मूल एजेंडे पर लौटेगी ?

हालांकि भाजपा का मूल एजेंडा तो सदा राम मंदिर धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विवादित मुद्दे रहे हैं। लेकिन 2014 का चुनाव पूर्ण बहुमत से जीतने को उसने सबका साथ सबका विकास सहित अच्छे दिन और काला धन देश में वापसी का नारा भी कुछ और नये मतदाताओं को जोड़ने के लिये दे दिया था।

देश के विभिन्न राज्यों में 11 एमएलए और 4 एमपी के उपचुनाव में से मात्र एक एक सीट जीत पाने और खासतौर पर यूपी में उपचुनाव में हार का चौका लगने के बाद संघ परिवार में बेचैनी शुरू हो गयी है। आरएसएस ने अपने मूल एजेंडे पर मोदी सरकार से 6 माह के भीतर तेज़ी से अमल करने को कहा है। संघ का मानना है कि भाजपा की पहचान उसके मूल एजेंडे से ही बनी है। उसको यह भी लगता है कि राम मंदिर कश्मीर की धारा 370 कॉमन सिविल कोड कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापस बसाने से लेकर नई शिक्षा नीति पर मोदी सरकार सुस्त है।
संघ ने भाजपा से दलितों और मीडियम क्लास के मोहभंग होने को भी गंभीरता से लिया है। संघ की शिकायत यह भी है कि सबका साथ सबका विकास केवल एक नारा बनकर रह गया है क्योंकि केंद्र सरकार ने श्रम कानून कृषि और आर्थिक क्षेत्र को लेकर उसके सुझावों पर कोई ठोस काम ही नहीं किया है। आरएसएस को सबसे अधिक चिंता दलित वोट की सता रही है। उसके अपने अंदरूनी सर्वे में भी यह तथ्य सामने आ रहे हैं कि भाजपा शासित राज्योें में दलित उत्पीड़न की घटनायें अधिक बढ़ रही हैं। संघ परिवार शुरू से ही जानता है कि उसके हिंदूवादी मुद्दों से भाजपा को कभी भी देश में पूर्ण बहुमत नहीं मिल सकता था।
इसीलिये उसने उदारवादी छवि के अटल बिहारी को आगे करके अपने विवादित मुद्दे ठंडे बस्ते में डालकर 1998 में एनडीए की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई थी। हालांकि अच्छे दिन की तरह इंडिया शाइनिंग का उसका दावा भी जनता ने 2004 में सिरे से नकार दिया था। संघ को पता है कि उसकी नीतियां पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के पक्ष में हैं। जिससे उसका परंपरागत मतदाता भी नाराज़ होता चला जा रहा है। पहले व्यापारियों को भाजपा का कोर वोट माना जाता था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद वह उसका दामन छोड़ता नजर आ रहा है।
ऐसे ही मीडियम क्लास जो कभी भाजपा के बहुत गीत गाया करता था। आज आर्थिक बदहाली का सबसे अधिक बोझ उसके ही सर पर पड़ा है। वह भी भाजपा से निराश होता जा रहा है। उधर दलितों के एक बड़े वर्ग ने भाजपा को यह सोचकर वोट दिया था कि जब सबका विकास होगा तो उसका लाभ उनको भी ज़रूर मिलेगा। लेकिन उनको भी यह देखकर झटका लगा है कि उनका विकास तो क्या होता उल्टा उनका उत्पीड़न भाजपा के राज में बढ़ा है। दलित एक्ट से लेकर उनका आरक्षण तक दांव पर लग गया है। ऐसे ही किसानों को उनसे किये वादे भाजपा सरकार द्वारा पूरे ना किये जाने से आघात लगा है।
उन्होंने भी भाजपा से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। हद यह है कि जो जाट किसान से पहले कट्टर हिंदू बनाकर भाजपा ने यूपी के मुज़फफरनगर में अपना ध्रुवीकरण का खेल खेला था। कैराना लोकसभा उपचुनाव में उस जाट किसान ने ही जिन्ना की बजाये गन्ना मुद्दा बनाकर भाजपा को आईना दिखा दिया है। हमें नहीं लगता कि बाकी बचे एक साल में भाजपा अपने मूल एजेंडे को लागू कर पायेगी या उसकी नीयत भी इन मुद्दों को गंभीरता से पूरा करने की है। उधर जनता का रूजहान तेजी से विपक्ष के गठबंधन की तरफ होता जा रहा हैै।

Saturday, 2 June 2018

ये भी ऑनर किलिंग

यह भी तो ऑनर किलिंग ही है ?

कुछ लोग केवल उसी हत्या को ऑनर किलिंग समझते हैं जिसमें किसी प्रेमी प्रेमिका का परिवार खाप पंचायत या बिरादरी जाति धर्म या अन्य कारणांे से शादी के लिये तैयार न होने पर उनकी खुद ही निर्मम हत्या कर देते हैं। लेकिन उसको क्या कहंेगे जिसमें ऐसे प्रेमी प्रेमिका परिवार पुलिस या संस्कृति के ठेकेदारों और समाज के डर से खुद ही मौत को गले लगा लेते हैं?

 

पिछले दिनों नजीबाबाद ज़िला बिजनौर यूपी के थाने में एक प्रेमिका ने पुलिस हिरासत में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। आत्महत्या करने वाली प्रेमिका का प्रेमी भी थाने में ही दूसरे कमरे में बंद था। यह प्रेमी जोड़ा देहरादून से भागकर कहीं दूर शादी के इरादे से जा रहा था। मुखबिर की सूचना पर इसे रेलवे स्टेशन पर नजीबाबाद पुलिस ने धर दबोचा। हालांकि दोनों बालिग थे। लेकिन दोनों का धर्म अलग अलग था। दोनों ने पुलिस को बताया कि वे अपनी मर्जी से घर छोड़कर निकले हैं। दोनों ने यह भी बताया कि वे बालिग हैंं।

उनके पास इसका प्रमाण भी था। लेकिन पुलिस ने उनकी एक ना सुनी। न ही पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का सम्मान किया जिसमें सर्वोच्च अदालत कई बार दोहरा चुकी है कि दो बालिग लोगों को अपनी मर्जी से शादी करने साथ घूमने और सेक्स करने तक का अधिकार है। लेकिन पुलिस को तो हिंदूवादियों की नज़र में अपने नंबर बढ़ाने थे। उसको सुप्रीम कोर्ट संविधान और कानून से क्या लेना देना? उसने प्रेमी प्रेमिका को हिरासत में लिया और थाने में बंद कर दिया।

प्रेमिका के परिवार को ख़बर कर दी गयी। प्रेमिका ने सपने में भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि जिन प्यार के दुश्मन घरवालों से बचकर वो अपने प्रेमी के साथ शादी करके जिं़दगी भर के लिये उसकी होने को घर से भागी है। उनके ही हवाले पुलिस उसको उसके हसीन सपने तोड़कर कर सकती है। घबराहट और डर में उसने मौका मिलते ही अपना दुपट्टा पंखे में लटकाकर फांसी लगा ली। उसके पास से डेढ़ लाख रू. भी बरामद हुए। जबकि ये रू. उसने अपने घर से नहीं चुराये थे।

यह रू. उसके प्रेमी के हो सकते हैं। इसके बाद पुलिस ने अपनी गलती मानने और पश्चाताप करने की बजाये अपनी प्रेमिका को सदा के लिये खो बैठे प्रेमी के खिलाफ हत्या के लिये उकसाने सहित तमाम गंभीर धाराओं में केस दर्ज कर उसको जेल भेज दिया। हमारा मानना है कि यह भी एक तरह से ऑनर किलिंग का ही मामला है। देश में ऐसे मामले रोज़ ही होते रहते हैं। केंद्र और आध्ेा से अधिक प्रदेशों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें आने के बाद इस तरह की घटनायें और भी तेजी से बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार ऑनर किलिंग के 2014 में केवल 28 केस दर्ज हुए थे।

वहीं 2015 में ऐसे मामलों की तादाद बढ़कर 192 हो गयी। कानून विशेषज्ञ अनिल एवं रंजीत मल्होत्रा का शोध बताता है कि दर्ज होने वाले केस चूंकि बहुत कम होते हैं। इसलिये ऑनर किलिंग के मामले कम से कम हर साल 1000 से अधिक होते हैं। उनका तो यहां तक कहना है कि हरिणा पंजाब और यूपी में ही कम से 700 से 900 मामले ऑनर किलिंग के हो रहे हैं। जबकि शेष देश में ऐसे मामलों की संख्या 100 से 300 तक सीमित है। सोचने की बात यह है कि जब हम मुस्लिम देशों मंे तालिबान को इस जेहादी सोच के लिये आयेदिन कोसते हैं कि वे लोगों पर जबरन अपनी सोच थोप रहे हैं। जो उनकी बात नहीं मानता उनको वे बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार देते हैं। क्या अपने बच्चो की ऑनर किलिंग करने वाले या पुलिस के डर से उनको आत्महत्या के लिये मजबूर करने वाले तालिबान से कुछ कम जालिम माने जा सकते हैं?

Thursday, 31 May 2018

उपचुनाव में bjp की हार

उपचुनावः मोदी नहीं बीजेपी की हार ?

देश के विभिन्न राज्यों में 4 लोकसभा और 10 विधानसभा उपचुनाव में से बीजेपी मात्र एक एमपी और एक एमएलए जिता पाई है। क्या इस परिणाम को बीजेपी सरकार की उल्टी गिनती चालू होना माना जा सकता है? क्या विपक्ष के एक होने से इन नतीजों को आने वाले तीन राज्यों और 2019 के आम चुनाव की बानगी माना जाये?

कर्नाटक में स्पष्ट  बहुमत न मिलने और बाद में बहुमत का जुगाड़ करने में सुप्रीम कोर्ट के बीच में आकर दीवार बन जाने से बीजेपी अभी वहां सरकार न बना पाने के सदमे से उबर भी नहीं सकी थी कि अब उपचुनाव की नतीजे उसके लिये अपशकुन बनकर आए हैं। सबसे अधिक उसे यूपी की कैराना सीट की हार चुभेगी। इसकी वजह यह है कि यूपी न केवल सबसे बड़ा प्रदेश है, बल्कि यहां पीएम मोदी का चुनाव क्षेत्र वाराणसी भी है। साथ ही 2014 के चुनाव में बीजेपी को यूपी से सबसे अधिक कुल 80 में से 73 सीटें मिलीं थीं।

यहां बीजेपी को एक खतरा पहले ही एसपी-बीसएसपी के गठबंधन से पिछले दिनों मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की खाली हुई लोकसभा की सीट गोरखपुर और फूलपुर पर शर्मनाक हार से महसूस हो रहा था, लेकिन वह इसको यह कहकर अनदेखा कर रही थी कि उसको अंदाज़ा नहीं था कि एसपी और बीएसपी चुनाव के एनमौके पर यह गठबंधन करेंगी। हालांकि कैराना का तो उसे पहले से पता था। असल में कैराना कोई आम लोकसभा सीट नहीं है। यहां से बीजेपी के पूर्व एमपी हुकम सिंह के निधन के बाद यह चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। बीजेरी ने सहानुभूति वोट से जीत के लिये उनकी पुत्री मृगांका सिंह को चुनाव में उतारा था, लेकिन यहां विपक्ष ने कांग्रेस सहित लोकदल को अपने महागठबंधन में शामिल कर बीजेपी को धूल चटा दी है। सबसे बड़ी बात यह हुई कि जिन अजीत सिंह को बीजेपी सियासी तौर पर ख़त्म करना चाहती थी। उन अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी ने जाट वोट बैंक को फिर से मुसलमानों के साथ, उन्हें बीजेपी के हिंदू ध्रुवीकरण की एकमात्र उम्मीद पर पानी फेर दिया है। हैरत की बात यह है कि यहां दलितों को भी आरएलडी को वोट देने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

उधर महाराष्ट्र की भंडारा गोंदिया सीट पर एनसीपी ने कांग्रेस के सहयोग से बीजेपी को पटखनी देकर पुराना गठबंधन ताज़ा कर दिया है। हालांकि महाराष्ट्र की ही पलघर लोकसभा सीट बीजेपी ने उपचुनाव में जीत ली है, लेकिन इससे पहले एमपी की रतलाम पंजाब की गुरदासपुर राजस्थान की अजमेर और अलवर सीट भी लोकसभा उपचुनाव में बीजेरी गंवा चुकी है। ऐसे ही विधानसभा की 10 सीटों के उपचुनाव में बीजेपी केवल उत्तराखंड की थराली सीट बचा सकी है।

इसके अलावा बिहार की जोकिहाट सीट राजद ने बीजेपी के सहयोगी जनता दल यूनाइटेड से इतने भारी अंतर से छीनी है कि उतने उसके कुल वोट भी नहीं है। इससे पहले भी आरजेडी से नीतीश की पार्टी एक और उपचुनाव बुरी तरह हार चुकी है। इससे बीजेपी के लिए यह खतरा बढ़ गया है कि कहीं नीतीश कुमार एक बार फिर से उसका साथ न छोड़ भागें। भाजपा के लिये खतरे की घंटी इस बात से बज रही है कि एक तरफ तो वह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बार-बार उछाल रही है। दूसरी तरफ, उसी कांग्रेस का एक प्रत्याशी महाराष्ट्र के पलूस काडेगांव में निर्विरोध चुना गया है।

हालांकि बीजेपी इन उपचुनावों पर यह सफाई देगी कि इनके परिणामों से उसकी सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। साथ ही सोचने वाली बात यह भी है कि जब किसी राज्य के चुनाव में पीएम मोदी लगातार थोक में चुनाव रैली करते हैं, तो वहां बीजेपी लगातार जीत दर्ज करती चली आ रही है। हालांकि कैराना चुनाव में मोदी ने रोड शो और जनसभा की थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी यहां हिंदू कार्ड खेलने की नाकाम कोशिश की थी, लेकिन लोगों ने जिन्ना की बजाय गन्ना मुद्दे को वोट देते हुए अपने पुराने जाट नेता चौधरी अजीत सिंह की पार्टी लोकदल को एक बार फिर से जीवनदान दे दिया है। सबको पता है कि बीजेपी के पास केंद्र और किसी भी राज्य में उपलब्ध्यिों के नाम पर कुछ खास नहीं है, लेकिन देखना यह है कि अब एमपी राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव के साथ केंद्र के एक साल बाद आ रहे आम चुनाव में जीतने के लिए बीजेपी क्या बड़े बदलाव करती है?

रेल हादसे

हादसे होते रहते हैं, अफ़सर सोते रहते हैं!

2012 में बनी अनिल काकोदकर समिति ने 5 साल के भीतर रेलवे के सभी मानव रहित फाटक ख़त्म करने की सिफारिश की थी । लेकिन हुआ क्या पहले जुलाई 2016 में वाराणसी इलाहाबाद रेल खंड के मानव रहित फाटक पर बच्चो की गाड़ी ट्रेन से टकराई। इसके बाद पिछले दिनों कुशीनगर में फिर से स्कूल वैन ऐसे ही मानरहित फाटक पर टकरा गयी। इसमें भी कई बच्चे जान गंवा बैठै। उधर रेलवे बुलैट ट्रेन चलाने में लगा है।

हर रेल हादसे के बाद सरकार जागती है। अधिकारी मौके पर पहंुचते हैं। बड़े बड़े नेता दुर्घटना में जान गंवा बैठे लोगों के परिवारों के लिये सहानुभूति जताते हुए कुछ मुआवज़ा देने का ऐलान कर देते हैं। इसके बाद धीरे धीरे सरकार और लोग इस एक्सीडेंट को भूल जाते हैं। जुलाई 2016 के हादसे के बाद रेलमंत्री ने बड़े ज़ोरशोर से दावा किया था। उनका कहना था कि गणेश चतुर्थी 2018 तक ऐसे सभी मानव रहित रेलवे फाटक हटा दिये जायेंगे। लेकिन ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है। इससे पहले एक सुझाव यह भी आया था कि ऐसे सभी मानव रहित फाटकों पर भारतीय अंतरिक्ष संगठन ‘इसरो’ द्वारा विकसित उपग्रह आधारित चिप प्रणाली लगा दी जाये।
इस चिप की विशेषता यह बताई गयी थी कि जब रेल फाटक से 500 मीटर दूर होगी। तभी इस मानव रहित फाटक पर बहुत तेज़ आवाज़ में हूटर बजने लगेगा। इससे यह होता कि वहां से अपनी ध्ुान में गुज़र रहे राहगीरों को यह पता चल जाता कि रेल नज़दीक आ चुकी है। लेकिन नेताओं के और दावों की तरह यह केवल हवाई घोषणा बनकर ही रह गयी। रेलवे ने मानव रहित फाटकों पर गेटमित्र या गेटमैन की तैनाती ना होने तक यह चिप लगाना भी गवाराह नहीं किया। इससे यह पता चलता है कि रेलवे के पास धन के अभाव से अधिक नीयत और इरादे की कमी है।
ऐसा लगता है कि उसको इस बात से कोई सरोकार ही नहीं कि जनता की जान को उसके मानव रहित फाटक कितना बड़ा जोखि़म बने हुए हैं। यह ठीक है कि रेलवे की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन यह भी सच है कि किसी भी सरकार में उसके सत्ताधारी नेताओं के साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों के रूख़ में कोई परिवर्तन नहीं आता है। रेलवे के अधिकारी भी इसका अपवाद नहीं है। वे सत्ता बदलने का भी कोई विशेष असर नहीं लेते। लालफीताशाही और सरकारी अफ़सरों की लेटलतीफी की हालत यह है कि वे तब तक किसी योजना पर काम करने को तैयार नहीं होते जब तक कि उनकी जेब गर्म न हो जाये।
साथ ही वे ऐसे ऐसे लापरवाही और मनमानी के जनविरोधी काम भी बेधड़क करते हैं। जिनसे आम जनता की जान पर बन आती है। उनको यह भी पता है कि वे भ्रष्ट नेताओें और जनप्रतिनिधियों की आंख के तारे बने रहेंगे। अगर वे उनकी चापलूसी करते हुए उनको फीलगुड कराते रहें। अधिकारियों को यह कभी एहसास होता ही नहीं कि वे सत्ताधारी नेताओं या मंत्री एमपी और एमएलए नहीं बल्कि संविधान के हिसाब से सीध्ेा जनता के सेवक हैं।
उनकी पहली जवाबदेही आम जनता के लिये ही होनी चाहिये। लेकिन देखने मंे यह आता है कि सरकारी अधिकारी और कर्मचारी खुद को जनता का पालनहार और दाता समझ कर चलते हैं। उनमें मानवीयता और भावनाओं का घोर अभाव है। इसी का नतीजा है कि चाहे कितनी बड़ी दुर्घटना हो जाये और चाहे जितने लोगों की जान चली जाये सरकारी मशीनरी लगातार सोती रहती है।
0 कुछ ना कहने से भी छिन जाती है एजाजे़ सुख़न,
जु़ल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है ।।

Tuesday, 29 May 2018

मोदी की लोकप्रियता

मोदी की लोकप्रियता बरक़रार!

केंद्र में मोदी सरकार बने चार साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान उनके किये वादे और दावे कितने पूरे हुए इस पर अलग अलग राय हो सकती है। लेकिन उनके समर्थकों में उनका विश्वास और लोकप्रियता कमोबेश पहले की तरह बरक़रार लगती है। यह विचार का विषय है कि बिना किसी ठोस उपलब्धि के भी मोदी का जादू लोगों पर कैसे और क्यों चल रहा है?

केंद्र में जब चार साल पहले भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी। उस समय कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए-2 की सरकार से जनता का बुरी तरह मोहभंग हो चुका था। उस समय मनमोहन सरकार 2जी 3जी सहित आदर्श घोटालों से बुरी तरह घिरी थी। यहां तक कि कोल घोटाले के छींटे तो सीध्ेा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दामन तक पहंुच चुके थे। ऐसे में आरएसएस ने एक सोची समझी योजना के तहत गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र दोमोदर मोदी का नाम चुनाव से पहले ही पीएम पद के संभावित प्रत्याशी के तौर पर आगे रखकर जबरदस्त चुनाव प्रचार शुरू किया।
तब तक भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता एल के आडवाणी को पाकिस्तान जाकर जिन्नाह के मज़ार पर फातेहा पढ़ने की सज़ा के तौर पर उनका सियासी जनाज़ा निकाला जा चुका था। इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर मोदी की ज़बरदस्त चुनाव रैलियों से देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जनता को लगा कि मोदी मानव न होकर मानो कोई देवता या भगवान हैं। जनता उनके लच्छेदार भाषणों और कांग्रेस पर हमला करने वाले तीखे बयानी हमलों में बह गयी। इसके बाद जब हम आज मोदी जी की उपलब्ध्यिों को देखते हैं तो पता चलता है कि उन्होंने हर साल युवाओं को दो करोड़ रोज़गार देने का वादा करके रिझाया था।
लेकिन मोदी सरकार हर साल 3.4 लाख ही रोज़गार ही दे पा रही है। मोदी जी ने किसानों से उनकी उपज का समर्थन मूल्य लागत का डेढ़ गुना देने का वादा किया था। लेकिन वास्तव में किसान को उसकी लागत भी नहीं मिल पा रही है। मोदी जी का कालेधन को वापस 100 दिन में लाने का वादा था। लेकिन 100 दिन तो दूर अब वे कालाधन लाने की कोई समय सीमा ही बताने को तैयार नहीं हैं। हालत यह है कि भाजपा मुखिया अमित शाह तो उस वादे को ही एक जुमला बताकर खारिज कर चुके हैं। करप्शन के आरोपी सांसदों और विधायकों के मुक़दमे विशेष अदालतों में एक साल के भीतर तय करने का मोदी जी का दावा हवा हो चुका है।
इतना ही नहीं खुद मोदी जी की भाजपा ने अपराधियों और गंभीर आरोपियों को चुनाव जीतने की खातिर भाजपा में भी बड़े पैमाने पर लिया और उनको थोक में चुनाव लड़ने को टिकट भी दिये हैं। गंगा को साफ करने के लिये नमामि गंगे योजना का आवंटित बजट चार साल में 10 प्रतिशत भी खर्च नहीं हो सका है। ऐसे ही सत्ता के मोह मेें कश्मीर की धारा 370 खत्म करने की बजाये उस अलगाववादी पीडीपी से भाजपा ने साझेदारी कर ली है। जिस पर पहले तरह तरह के खुद भाजपा आरोप लगाती थी। समान नागरिक संहिता की तो मोदी जी कभी बात ही नहीं करते।
पता नहीं उनको कौन सा अल्पसंख्यक वोटबैंक का डर सताता है। कश्मीरी पंडितों की वापसी भी आज तक नहीं हो सकी है। सेना की हालत सुधारने के दावे भी मोदी सरकार के धरे के धरे रह गये हैं। देश मंे 100 स्मार्ट सिटी बनाने का दावा था। लेकिन चार साल में एक भी शहर स्मार्ट नहीं बन सका है। गोमांस को लेकर जो दावे किये गये थे। वे भी हवाई साबित हुए हैं क्योंकि गोमांस निर्यात में आज भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। अलबत्ता इतना ज़रूर हुआ है कि अल्पसंयकों को गोरक्षकों के नाम पर जगह जगह डरा धमकाकर मारे जाने की चंद घटनाओं से उनमें डर पैदा हुआ है।
दलितों को पहले से ज्यादा दबंगों द्वारा सताया जा रहा है। उधर जिन पिछड़ों के वोट थोक में हिंदुत्व के नाम पर लिये गये थे। उनको आरक्षण से वंचित कर सवर्णांे को खुलेआम उनके हिस्से के कोटे पर तैनात किया जा रहा है। कुल मिलाकर तीसरे साल जहां नोटबंदी ने लोगों के रोज़गार छीने थे। वहीं चौथे साल में जीएसटी से कारोबार तबाह और बर्बाद हो रहे हैं। लेकिन एक बात माननी होगी कि कांग्रेस अन्य विरोधी दल सेकुलर बुध््िदजीवी और खासतौर पर मुसलमानों को लेकर संघ परिवार ने देश में जो माहौल बना दिया है।
उससे हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग बिना ठोस उपलब्ध्यिों और आर्थिक व्यापारिक व सामाजिक नुकसान झेलकर भी मोदी के मोहपाश में बंधा है। आशंका यह है कि आम चुनाव में बचे एक साल में मोदी सरकार अपने कामों में सुधार की बजाये देश में एक बार फिर से गुजरात के 2002 के दंगों की तरह ऐसा नफ़रत भय और हिंदू राष्ट्रवाद का जिन्न बोतल से निकालकर बाहर लायेगी जिससे जनता असली मुद्दों पर उनसे जवाब तलब न कर साम्प्रदायिकता और घृणा व भय की लहर में बहकर एक बार फिर से उनको चुनेगी?
ये लोग पांव नहीं जे़हन से अपाहिज हैं,
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता हैै ।।