Saturday, 11 April 2015

मेरी शायरी


नाम- इक़बाल हिंदुस्तानी
शिक्षा- एम0 कॉम0
पत्रकारिता- 1980 से सक्रिय
सम्पर्क- 9412117990
विशेष
1- लेखक 15 वर्षों से  हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं।
  2- बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल समाचार और विभिन्न स्तम्भों का संपादन कर चुके हैं।
  3- सांध्य दैनिक चिंगारी के 25 वर्षों तक चीफ़ ब्यूरो रहे हैं।
  4- शाह टाइम्स और दैनिक प्रयाण के विशेष प्रतिनिधि रहे हैं।
  5- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर लेखों, कविताओं और ग़जलोें  का प्रकाशन होता रहा है।
  6- आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक  अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं।
  7- रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं।
  8- ज़िले के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में चांदपुर की साहित्यिक संस्था की ओर से जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार द्वारा सम्मानित हो चुके हैं।
9-स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे  और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं।
10- साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन।
11-साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति द्वारा हिंदी ग़ज़लकार दुष्यंत त्यागी स्मृति एवार्ड।
12-श्री बलवीर सिंह वीर सर्वश्रेष्ठ पत्रकार एवार्ड।
13- दिल्ली के कांस्टिट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में वैब पोर्टल प्रवक्ता डॉटकॉम के देश विदेश के 16 सर्वश्रेष्ठ लेखकों में सम्मानित हुए।
14-महिला जागृति मंच द्वारा महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिये लेखन के लिये सम्मान।
15-माता कुसुम कुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी सम्मान समारोह में हिंदी सेवी सम्मान आदि।
पड़ौसी पड़ौसी है हिंदू न मुस्लिम.......
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0हरेक तश्नालब की हिमायत करूंगा,
समंदर मिला तो शिकायत करूंगा।
0 अगर आंच आई किसी जिं़दगी पर,
हो अपना पराया हिफ़ाज़त करूंगा।
0अभी तो ग़रीबों में मसरूफ हंू मैं,
मिलेगी जो फुर्सत इबादत करूंगा।
0 तरक्की की ख़ातिर वो यूं कह रहा था,
मैं जिस्मों की खुलकर तिजारत करूंगा।
0ज़मीर अपना बेचंू जो दौलत कमाउूं,
अब इक रास्ता है सियासत करूंगा।
0 उसूलों पे अपने जो क़ायम रहेगा,
वो दुश्मन भी हो तो मुहब्बत करूंगा।
0पड़ौसी पड़ौसी है हिंदू न मुस्लिम,
मैं बच्चो को यही हिदायत करूंगा।
0 क़लम जो लिखेगा वो बेबाक होगा,
अगर दिल ये माना सहाफत करूंगा।।
शीत लू वर्षा को भी क्यों मुफ़लिसी से बैर है.........
0अब कहां पहले सी खुश्बू है सुमन बदला हुआ,
है हवा बदली हुयी रंग ए चमन बदला हुआ।
0 ताकतो के जुल्म का तो सिलसिला थमता नहीं,
लाख बदली हो ज़मीं और ये गगन बदला हुआ।
0हो रही है ताजपोशी मापिफयाओं की यहां,
रहनुमाओं का हमारे है वचन बदला हुआ।
0 शीत लू वर्षा को भी क्यों मुपफलिसी से बैर है,
मरने वाले हैं वही सब बस कपफन बदला हुआ।
0कौन सी किससे जा मिलेगा रहबरों का क्या पता,
सांप हैं सब एक जैसे सिपर्फ पफन बदला हुआ।
0बात की दुनिया भर की देखो अब ग़ज़ल कहने लगी,
शायरी का लग रहा है आज पफ़न बदला हुआ।
0भूख लाचारी जहां हो आम इंसां का मयार,
कैसे बोले कोई तब तक है वतन बदला हुआ।
0अपनी इज़्ज़त हाथ में होती है अपने सोचलो,
आज तहज़ीब का भी है चलन बदला हुआ।।
      लेकिन किसी के दिल को दुखाना भी नहीं है.....
               -इक़बाल हिंदुस्तानी
       0बच्चे की ज़िद है महंगी बहाना भी नहीं है,
        मिट्टी के खिलौनों का ज़माना भी नहीं है।
      
       0दुश्मन से डरके हाथ मिलाना भी नहीं है,
        मेरे सिवा तो कोई निशाना भी नहीं है।
       0चाहता नहीं उसे मैं, छिपाना भी नहीं है,
        उस शख़्स को इस ग़म में रुलाना भी नहीं है।
       0जीना है सर को यूं ही कटाना भी नहीं है,
        जु़ल्मों के आगे सर को झुकाना भी नहीं है।
       0जाहिल था मैं इसीलिये मुफलिस भी बन गया,
        बच्चे पढ़ाउूं कैसे ख़ज़ाना भी नहीं है।
       0तुम साथ दे रहे हो तो कुछ राज़ है ज़रूर,
        तुमने दिये हैं ज़ख़्म भुलाना भी नहीं है।
       0नासूर बन ना जाये कहीं फ़ैसला करो,
        ये ज़ख़्म अभी इतना पुराना भी नहीं है।
 
       0सच्चाई सा़फ़गोई से बेशक बयां करो,
        लेकिन किसी के दिल को दुखाना भी नहीं है।
  नश्तर हमें ही फिर भी चुभाओगे कब तलक.....
      0ये आप जानो रिश्ते बनाओगे कब तलक,
       हमको ये देखना है निभाओगे कब तलक।
      0मुझपर करोगे वार तो हो जाओगे घायल,
       साया हूं आपका मैं मिटाओगे कब तलक।
    
      0दुश्मन अगर हैं आप तो दिखावा भी छोड़ दो,
       दिल में ज़हर है हाथ मिलाओगे कब तलक।
 
      0जिसने तुम्हारे जे़हन में बारूद भरी है,
       राहों में उसकी पलकें बिछाओगे कब तलक।

      0तुम खु़द तो सबके वास्ते करके दिखाओ कुछ,
       फ़िर्क़ापरस्त दल से डराओगे कब तलक।
      0पत्थर थे आप हमने अता की हैं धड़कनें,
       नश्तर हमें ही फिर भी चुभाओगे कब तलक।
      0सर पर लटक रही है जो तलवार देखलूं,
       पुरखों के ताजो तख़्त दिखाओगे कब तलक।

      0टूटे हुए हो अब तो बिखरने की देर है,
       हर राज़ अपने दिल में छिपाओगे कब तलक।।
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      भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां.....
                           
              -इक़बाल हिंदुस्तानी
      
       0आये दिन गिरने लगीं जब गुलशनों में बिजलियां,
        अब संभलकर उड़ रही हैं गुलशनों में तितलियां।
      
       0उनके कपड़ों की नुमाइश का सबब बनती हैं जो,
        मुफलिसों की जान ले लेती हैं वो ही सर्दियां।
       0रहबरी जज़्बात की काबू रखो ये जुर्म है,
        राख़ में तब्दील हो जाती हैं पल में बस्तियां।
       0इस बदलते दौर में तुम भी बदलना सीख लो,
        जुल्म ढाओगे तो इक दिन जल जायेंगी वर्दियां।
       0शीत लू बरखा के डर से हर रितु मंे बंद हैं,
        सोचता हूं क्यों मकानों में लगी हैं खिड़कियां।
       0मौत भी छोटे बड़े में गर फ़र्क करती नहीं,
        भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां।
       0हर कोई अपने सुखों मंे है यहां खोया हुआ,
        जश्न में दब जाती हैं अब तो पड़ौसी सिसकियां।
 
       0महनती क़ाबिल अदब में भी किसी से कम नहीं,
        फिर भी कोई बोझ समझे तो करें क्यां लड़कियां।
       दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन.....
      0शुक्र है मौसम सुहाना हो गया,
       उनके आने का बहाना हो गया।
      0तुम इसे चाहे कोई भी नाम दो,
       मुल्क गै़रों का निशाना हो गया।
    
      0होे हुकूमत पांच दिन तो ठीक है,
       राज बरसों का पुराना हो गया।
 
      0बात कुछ भी हो विदेशी हाथ है,
       यह तो नाकामी छिपाना हो गया।

      0हमको रहबर ने अगर बेचा नहीं,
       फिर लबालब क्यों ख़ज़ाना हो गया।
      0जिसने फ़िर्क़ावारियत की राह ली,
       हाशिये पर वो घराना हो गया।
      0सूफी संतो का जो मरकज़ था कभी,
       धोखेबाज़ों का ठिकाना हो गया।

      0दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन,
       मात खाते अब ज़माना हो गया।।
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     दिलवाली दिल्ली है इस्लामाबाद नहीं है.....
                            -इक़बाल हिंदुस्तानी
       0खुदग़र्ज़ियां तो है मगर जेहाद नहीं है,
        सब भूल गये हम हमें कुछ याद नहीं है।
      
       0बेमेल मुहब्बत का नतीजा ही तो ग़म है,
        शीरीं तो हैं कई मगर फ़रहाद नहीं है।
       0नेपाल है प्यारा हमें लंका भी पसंद है,
        भारत मेरा काबुल नहीं बग़दाद नहीं है।
       0हम में से कोई कुछ हो मुहाजिर तो नहीं है,
         दिलवाली दिल्ली है इस्लामाबाद नहीं है।
       0अपनी बनाई जेल में तू भी तो जा के देख,
        सेवक ही तो है देश का दामाद नहीं है ।
       0उनको तो छेड़ने की भी क़ीमत अदा हुयी,
        हम क़त्ल भी हुए तो इमदाद नहीं है।
       0बर्बाद था बर्बाद है बर्बाद ही रहेगा,
        वो शख़्स जिसको इल्मे अजदाद नहीं है।
 
       0बेटा ना सही बेटी भी है आंख का तारा,
        जा पूछ जिसके घर औलाद नहीं है।
     किसी दिन आपसे पूछेगा ये बच्चा बड़ा होकर.....
         -इक़बाल हिंदुस्तानी
      0इसी मिट्टी में रहना है खुशी से या ख़फ़ा होकर,
       कहां हम जायेंगे बतलाइये तुमसे जुदा होकर।
      0ये है वक़्ती सभी नज़दीकियां धोखा ना खा जाना,
       हमारे वोट मांगेंगे ये सब हम पर फ़िदा होकर।
    
      0तुम्हारी भूल को हम 6 दिसंबर याद रक्खेंगे,
       हज़ारों साल लिपटेंगी तुम्हें अब ये बला होकर।
 
      0विरासत क़र्ज़ की हिस्से में मेरे क्यों आई,
       किसी दिन आप से पूछेगा ये बच्चा बड़ा होकर।

      0दिया क्या है हमें तुमने बड़ा आसान है कहना,
       समझता है हर एक बेटा ये सच्चाई पिता होकर।
      0जे़हन रखना खुला गर सेहन में दीवार हो जाये,
       कभी शर्मिंदगी होगी नहीं भाई सगा होकर।
      0ग़ज़ल जो इश्क़ के पैकर से बाहर आ जाये,
       तुम्हारे शेर गंूजेंगे ग़रीबों की सदा होकर।

      0हमारी देशभक्ति का कोई भी इम्तहां ले ले,
       वतन महफूज़ रखना है हमें खुद भी फ़ना होकर।।
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      खूं बहाके दंगों में जन्नतें नहीं मिलती.....
                            -इक़बाल हिंदुस्तानी
       0महनती ग़रीबों को देवता बना देना,
        कुदरती वसाइल पर सबका हक़ लिखा देना।      
     
       0लोग जिनके ज़हनों को रहनुमा चलाते हैं,
        अब भी वो गुलामी में जी रहे बता देना।
       0सच को सच बताने की क़ीमतें जो चाहते हैं,
        उनकी खुद की क़ीमत भी माथे पर लिखा देना।
       0जुल्म और हक़तल्फ़ी ख़ामोशी से देखे जो,
        मर चुका ज़मीर उसका उसको ये बता देना।
      
       0कश्तियां किनारों तक हर दफ़ा नहीं जाती,
        साहिलों पे जाने को तैरना सिखा देना ।
       0मुल्क से बड़ा कुछ भी जो कोई समझता हो,
        इस तरह के लोगों को मौत की सज़ा देना।
       0खूं बहाके दंगों में जन्नतें नहीं मिलती,
        ज़िंदगी ख़ज़ाना है यूं ही मत लुटा देना।
 
       0सीधे सादे लोगों में दुश्मनी जो फैलायें,
        ऐसी सब किताबों को आग में जला देना।
           
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      आप हम से मिले जिं़दगी की तरह.....
                            -इक़बाल हिंदुस्तानी
       0खिल उठी जिं़दगी फिर कली की तरह,
        आप हम से मिले जिं़दगी की तरह।      
     
       0जब उसे पा लिया हम ने चाहा जिसे,
        ग़म भी लगने लगे खुशी की तरह।
       0ख़ास अंदाज़ हैं अपने जीने के भी,
        दुश्मनी भी जो की दोस्ती की तरह।
       0चैन मिल पायेगा मेरे दिल को तभी,
        मुझ पे छा जाइये चांदनी की तरह।
      
       0आपके मुंतज़िर हम हैं दीदार को,
        लम्हा लम्हा लगे है सदी की तरह ।
       0जलके मरती रहीं आपकी बेगमें,
        आप भी तो जलें अब सती की तरह।
       0सब धरी रह गयीं मौत की साज़िशें,
        आप हम से मिले जिं़दगी की तरह।
 
       0आप ने कर दिया एक पड़ौसी का खूं,
        आप लगते नहीं आदमी की तरह।।
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मेरी पसन्द के शेर


0ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा कांटोंभरा बिस्तर नहीं देखा।
0 आज सड़कों पर लिखे सैकड़ों नारे न देख,
   घर अंध्ेारे देख तू आकाश के तारे न देख ।।
0ये दौलत आदमी की मुफलिसी को दूर करती है,
मगर कमज़र्फ़ इंसां को और भी मग़रूर करती है ।
सभी खुश हैं मैं परदेस जाकर लाऊंगा दौलत,
मगर एक मां है जो इस शर्त का नामंजूर करती है।
0 रोटी नहीं तो क्या हुआ तू सब्र तो कर,
आजकल जे़रे बहस है दिल्ली में यह मुद्दा ।
0इब्तिदा ए इष्क है रोता है क्या,
आगे आगे देखिये होता है क्या।
0 सिर्फ़ एक क़दम उठा था गलत राहे शौक में,
    मंज़िल  तमाम  उम्र  मुझे  ढूंढती  रही ।। 
0मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
  तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादान है।
                 मां
कौन कहता है कि मां में नहीं मिलती ममता,
तुम तो एक बार पुत्र बनकर दिखाओ यारो।
बंधे हुए हो तुम आंचल से अपनी पत्नी के,
कभी तो ममतामयी गोद में आओ यारो।
रखके सूखे में वो गीले में ही सो जाती है,
तुम भी एक रात उसे ऐसे सुलाओ यारो।
सुनके आवाज़ आपकी वो भागती है सदा,
कभी आवाज़ पे उसकी भी तो आओ यारो।
हम बड़े फख्र से कहते हैं मेरी पत्नी है,
कभी तो फख्र से मां को भी मिलाओ यारो।
है अगर चाह के जन्नत मिले इस दुनिया में,
तो चरण में ही ध्यान मां के लगाओ यारो।।
-जनप्रिय गुप्ता,
उपज़िलाधिकारी,
खतौली, मुज.नगर
मेरा प्यारा भारत देश....-एसडीएम,नजीबाबाद
0है एकता में अनेकता पारस्परिक सत्कार है,
उत्सव में रंगों की छठा उल्लास है प्यार है।
0समरसता और सौहार्द के सारांश का यह देश है,
आनंद अरू अनुराग के श्रेयांस का यह देश है।
0यहां अतिथि देवो भव यहां प्रीत की ही रीत है,
सत्यम शिवम अरू सुंदरम जैसे यहां पे गीत है।
0‘वसुधा कुटुम्ब’ है यहां परहित सरिस ही धर्म है,
यहां लोक संग्रह भाव से करते सदा हम कर्म है।
0सर्वस्व के कल्याण अरू सुख शांति का यह देश है,
ऐश्वर्य का सौंदर्य का आध्यात्म का ये देश है।।
-जेपी गुप्ता,उपज़िलाधिकारी,नजीबाबाद

0उसूलों पर जो आंच आये तो टकराना ज़रूरी है,
   जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है।
   नई नस्लों की खुद मुख़्तारियों को कौन समझाये
   कहां से बचके चलना है कहां जाना ज़रूरी है।।
-वसीम बरेलवी
0 अजीब लोग हैं क्या खूब मुंसफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदकशी की है।
इसी लहू में तुम्हारा सफीना डूबेगा,
ये क़त्ल नहीं तुमने खुदकशी की है।।   
0 न इधर उधर की बात कर यह बता क़ाफिला क्यों लुटा,
  मुझे रहज़नों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है।।
                                     -अज्ञात
0 कोई थकान थी नहीं जब तक सफ़र में था,
मंज़िल जो मिल गयी तो बदन टूटने लगा।
जब तक मैं गै़र था वो मनाता रहा मुझे
मैं उसका हो गया तो वो ही रूठने लगा।।
                     -राजन स्वामी
0मैं चुप रहा ये सोचकर अपनों के दरमियां,
सब बोलने लगे तो घर टूट जायेगा।।
0अजीब सुलगती हुयीं लकड़िया हैं ऐ दोस्त,
मिलें तो जलने लगें अलग हों तो जे़हर उगलें।
                -अज्ञात
0 चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया,
  पत्थर को बुत की शुक्ल में लाने का शुक्रिया,
  तुम बीच में न आती तो कैसे बनाता सीढ़ियां,
  दीवारों में मेरी राह में आने का शुक्रिया।।
                 -अज्ञात
0 दुख नहीं कोई कि अब उपलब्ध्यिों के नाम पर,
  और कुछ हो या ना हो आकाश सी छाती तो है।।
                        -दुष्यंत कुमार
0 मैं वो साफ़ ही न कहदूं जो है फ़र्क़ तुझमें मुझमें,
     तेरा ग़म है ग़म ए तन्हा मेरा ग़म ग़म ए ज़माना।।
0 मसलहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
  तू नहीं समझोगे सियासत तू अभी नादान हो।।
                   -अज्ञात
0 अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार,
  घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तेहार।
  मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं,
  बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।।
                     -दुष्यंत कुमार
वो जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई।
0 क़तरा गर एहतजाज करे भी तो क्या करे
   दरिया तो सब के सब समंदर से जा मिले।
   हर कोई दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,
   फिर यह भी चाहता है मुझे रास्ता मिले।।
                  -वसीम बरेलवी
0 कैसे आसमान में सुराख़ हो नहीं सकता,
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
-दुष्यंत कुमार
0 जिन पत्थरों को हमने अता की थी धड़कनें,
  जब बोलने लगे तो हम ही पर बरस पड़ें।।
                     -अज्ञात
0 यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें,
  इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।
  किसी के वास्ते राहें कहां बदलती हैं,
  तुम अपने आपको बदल सको तो चलो।।
                    -निदा फ़ाज़ली

भूमि अधिग्रहण का विवाद

भूमि अधिग्रहण क़ानूनः विपक्ष का विरोध के लिये विरोध?
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0विकास और किसान दोनों का ख़याल रखना होगा सरकार को।
       ‘सबका साथ सबका विकास’ जिस नारे को लेकर मोदी जीते आज भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन को लेकर विपक्ष ने उनकी ऐसी छवि बना दी है जिससे यह लग रहा है कि वे किसान विरोधी और कारपोरेट समर्थक हैं। इस छवि को नुकसान भाजपा को दिल्ली के चुनाव में भी पहुंच चुका है। यह भी अनुमान है कि आगे भी जो चुनाव राज्यों में होंगे अब भाजपा को मोदी लहर का उतना लाभ नहीं होगा जितना हरियाणा झारखंड कशमीर और महाराष्ट्र में हो चुका है। इससे पहले मोदी सरकार के पहले आम बजट को लेकर भी ऐसा संदेश गया कि वे पूंजीपति समर्थक और आम आदमी के विरोधी हैं। साथ ही आयकर की सीमा न बढ़ने से मीडियम क्लास भी उनसे ख़फ़ा होता नज़र आया।
       अगर थोड़ा पीछे चलें तो हम पायेंगे भूमि अधिग्रहण का मुद्दा हमारे समाज में इतना महत्वपूर्ण और संवेदनशील है कि पश्चिम बंगाल में 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा की नैनो के लिये जबरन ज़मीन छीनने के अकेले कदम ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हुए सत्ता से बेदखल कर दिया। इससे पहले यूपी में भट्टा पारसोल की ज़मीन किसानों से जबरन छीनने में मायावती सरकार का भ्रष्टाचार के और मुद्दों के साथ साथ बड़ा हाथ रहा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी सरकार का उद्योगपतियों की तरफ झुकना और सिंचाई घोटालों के बावजूद कर्ज में डूबे किसानोें की आत्महत्या पर कान न देना भी वहां से उनकी सरकार की विदाई का बड़ा कारण माना जाता है। इससे पहले यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में किसानों की बड़े पैमाने पर कर्ज माफी उसकी दोबारा जीत की बड़ी वजह बनी थी।
       2010 में ही 15964 किसान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार आत्महत्या कर चुके हैं। एक महीने में आन्ध्रा में 90 किसान और एक सप्ताह मंे ही विदर्भ मंे 17 किसान अपनी जान दे चुके हैं। पंजाब के 89 फीसदी किसान कर्ज में डूबे हैं। प्रति कृषि परिवार पर पौने दो लाख रूपये का कर्ज यानी प्रति हेक्टेयर भूमि पर 50,140 रूपये का कर्ज है। 1995 से 2010 के बीच कर्ज़ में फंसे ढाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार देश का हर दूसरा किसान कर्ज़दार है। अधिकतर कृषि अनुसंधान केंद्र बंद पड़े हैं। कृषि अनुसंधान के लिये अमेरिका के साथ 1000 करोड़ का समझौता किया गया है। इसके लिये हमें 400 करोड़ रू. देकर अपने कृषि वैज्ञानिकों को अमेरिका से ज्ञान दिलाना है जिससे मोनसेंटो और वॉलमार्ट जैसी मल्टीनेशनल कम्पनियां अपने स्वार्थ साध सके।
     कृषि क्षेत्र में विश्व व्यापार संगठन के दबाव में लगातार सब्सिडी कम करती जा रही सरकार यह सोचने का तैयार नहीं है कि अमेरिका, चीन और यूरूप के देश खेती में उल्टे सब्सिडी बढ़ा क्यों रहे हैं। लुधियान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा जनवरी 2010 में जारी शोध के अनुसार पंजाब के 40 फीसदी छोटे किसान या तो ख़त्म हो गये या फिर खेत मज़दूर बन चुके हैं। वहां सिंचाई के परंपरागत तरीकों से मंुह मोड़कर 15 लाख नलकूप लगाने का नतीजा यह हुआ कि भूजल स्तर 20 फुट नीचे चला गया। मल्टीनेशनल कम्पनियों के दबाव में लगातार उर्वरक कारखाने बंद किये जा रहे हैं। आज हालत यह है कि डाय ऑफ पोटाश यानी डीएपी की कुल मांग का 90 फीसदी और म्यूरेट ऑफ पोटाश की डिमांड का 100 प्रतिशत आयात किया जा रहा है। इसके साथ ही इंपोर्टेड पोटाश की कीमत में दोगुने से अधिक और डीएपी के मूल्य में 83 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुयी है।
    उधर सरकार उर्वरक सब्सिडी घटाती जा रही है और जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान घटकर 14.4 प्रतिशत ही रह गया है। महाराष्ट्र के यवतमाल के कोठवाडा के 45 वर्षीय किसान गजानन ने आत्महत्या से पहले अपने सुसाइड नोट में कांग्रेस को वोट ना देने की अपील की थी। भारत में 52 फीसदी लोग आज भी कृषि से जुड़े हैं लेकिन पहले जीडीपी में 50 फीसदी योगदान करने वाली खेती का प्रतिशत लगातार घट रहा है। 2004/05 में जहां यह 19 फीसदी था वहीं 2008/09 में 15.7 और अब 14.6 फीसदी रह गया है। इसी का नतीजा है कि 2002 में प्रति व्यक्ति खाद्यान उपलब्धता 495 ग्राम थी वही 2008 में 436 ग्राम रह गयी। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक हमारी आबादी 130 करोड़ और खाद्यान आवश्यकता 3400 लाख टन होगी लेकिन 1990 से 2007 के बीच कृषि उत्पादन वृध्दि दर 1.2 रह गयी जबकि जनसंख्या वृध्दि दर 1.7 से कुछ ही कम है।
    हालत यह है कि 40 फीसदी किसान रोज़गार का विकल्प मिलने पर खेती छोड़ने को तैयार बैठे हैं। अंतर्राष्ट्रीय खाद्य्य नीति शोध संस्थान की वर्ल्ड हंगर रिपोर्ट 2011 के मुताबिक 81 देशों की सूची में नेपाल, पाकिस्तान, रवांडा व सूडान जैसे देश भी हम से ऊपर हैं। दुनिया में भुखमरी का शिकार हर पांचवा आदमी भारतीय है। यह हो भी क्यों न? हमारे देश में आज भी 60 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी गांवों और खेती किसानी पर निर्भर करती है। किसान के लिये उसकी ज़मीन कोई मज़दूर की नौकरी नहीं है जो यहां से छिनी तो वहां मिल गयी। मज़दूर को तो उसके रोज़गार से मतलब होता है। अगर पगार पहले से भी अधिक है तो उसको नौकरी छिनने का दुख नहीं बल्कि खुशी होती है।
     अच्छी दिहाड़ी और बढ़िया काम करके अधिक कमाई के लिये अपने परिवार को छोड़कर वह गांव कस्बे ज़िले राज्य से न केवल महानगरों में चला जाता है बल्कि कई बार उसको विदेश जाने में भी दिक्कत नहीं होती लेकिन किसान का अपनी पुश्तैनी ज़मीन से एक अलग तरह का रिश्ता होता है। उसका उस ज़मीन से लगाव और अपनापन होता है। उसको वह कम या अधिक ज़मीन आत्निर्भरता सम्मान और स्वाभिमान का अहसास कराती है। यह ठीक है कि सरकार को देश और जनता का विकास करना है तो उसको कारखानों स्कूलों अस्पतालों रक्षा रेलवे बिजली घर और दूसरे सार्वजनिक कामों के लिये ज़मीन तो लेनी होगी। सवाल यह है कि ज़मीन का असली मालिक तो किसान ही है तो सरकार ज़बरदस्ती कैसे कर सकती है? केवल अच्छी कीमत देने से किसान खुश नहीं हो सकता।
     अव्वल तो किसान को पर्याप्त और समय पर मुआवज़ा मिलता नहीं और अगर मिल भी जाये तो किसान को मुआवज़े में मिले करोड़ों रूपये भी कुछ ही समय में ख़त्म हो जाते हैं क्योंकि रूपयों से कारोबार करना किसान ही नहीं हर किसी को आता ही नहीं। दूसरे इस भारी भरकम रकम से कई बार परिवार के युवा गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। वह रूपये बैंक में रखकर उसके ब्याज से भी जीवनभर गुज़ारा नहीं कर सकता। उसको उसकी ज़मीन अधिग्रहण कर उसमें लगने वाले प्रोजैक्ट में नौकरी दी जाये तो भी उसका काम चलना मुश्किल है।इसकी वजह यह होती है कि खेती करने वाले का स्वभाव नौकरी करना होता ही नहीं।
     सरकार भी किसानोें के वोट से चुनी गयी है इसलिये उसकी ज़िम्मेदारी किसानों के प्रति अधिक है। यह ठीक है कि जो भूमि अधिग्रहण कानून यूपीए सरकार ने बनाया था उसमें कुछ खामियां हो सकती हैं जिसके चलते दो लाख करोड़ से अधिक की कई परियोजनायें सामाजिक प्रभाव और पर्यावरण कारणों के साथ ही किसानों की सहमति अनिवार्य होने से अटकी पड़ी हैं। चुनाव के दौरान जयंती टैक्स और पॉलिसी पैरालेसिज़ को लेकर मोदी ने कांग्रेस की मनमोहन सरकार पर करारे हमले भी किये थे जिससे उनपर उद्योगों के लिये बिना बाधा ज़मीन उपलब्ध कराना और उसके विरोध में ज़मीन मालिक किसानों का कोर्ट जाने का रास्ता बंद करना भी समझ में आता है लेकिन यहां विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस विरोध के लिये विरोध पर उतर आये तो रास्ता बीच से होकर ही निकाला जा सकता है।
     मोदी सरकार को अब सत्ता में आकर यह बात बेहतर तरीके से समझ में आ रही होगी कि विपक्ष में रहकर थोक में आरोप दावे और वादे करना और बात है और सत्ता में आने के बाद काम करना कितना मुश्किल है। कोई माने या न माने  मोदी सरकार की इमेज भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर किसान विरोधी तो बन ही रही है।
0सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राहे शौक़ में,
मंज़िल थी कि तमाम उम्र मुझे ढंूढती रही ।।





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आप में फूट

आप में फूट: वजह केजरीवाल में सत्ता का अहम आया?
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण अल्पमत में हैं लेकिन ग़लत नहीं।
   भ्रष्ट और साम्प्रदायिक के साथ यथास्थितिवादी वो लोग आम आदमी पार्टी में सत्ता में आते ही फूट पड़ने से बड़े खुश नज़र आ रहे हैं जो दावा करते रहे हैं कि इस देश में कुछ भी कभी भी नहीं बदल सकता। उनको यह भी कहने का मौका मिल गया है कि ‘‘पॉवर मेक्स करप्ट एंड एब्सैलूट पॉवर मेक्स एब्सैलूट करप्ट’’। इस अंग्रेज़ी कहावत को एक और तरह से कह सकते हैं कि खुदा जब हुस्न देता है तो नज़ाकत आ ही जाती है। आज दिल्ली की 70 में से 67 सीट जीतकर आप सिक्किम की गण संग्राम परिषद से ज़रा सी ही पीछे रह गयी है जिसने वहां एक बार विधानसभा चुनाव में सभी सीटें जीत लीं थी। समय समय की बात है जो केजरीवाल कल तक उन परंपरागत राजनीतिक दलों को वनमैन शो और तानाशाही तरीकों से चलाने के लिये कोसते थे आज खुद इस सच और हकीकत को भूल रहे हैं कि दिल्ली में अगर आज वह सीएम बने हैं तो इसका अकेला श्रेय केवल उनको ही नहीं दिया जा सकता।
   आप को दिल्ली की सत्ता में पहुंचाने से लेकर उसके गठन संगठन और मनन चिंतन तक में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे निष्पक्ष और ईमानदार चिंतकों का भी बड़ा योगदान है। अगर आज ये दोनों अरविंद केजरीवाल को यह बात याद दिला रहे हैं कि वह भी एक मानव हैं और उनसे भी भूलचूक हो सकती हैं तो इसमें बुराई और झूठ क्या है? पार्टी और सरकार को ठीक से चलाने के लिये एक पोलिटिकल अफ़ेयर कमैटी यानी पी ए सी बनाई ही इस लिये गयी थी जिससे वो मामले जिसमें केजरीवाल अकेले फ़ैसले लेने के लिये न तो सक्षम हैं और न ही उनको यह अधिकार है, अगर पी ए सी शोपीस बना कर रखी जायेगी तो उसका क्या मतलब रह जायेगा? केजरीवाल कोई  अतिमानव, अवतार या भगवान नहीं हैं जिनको किसी मामले में किसी की सलाह या मार्गदर्शन की ज़रूरत न हो।
    यह ठीक है कि पी ए सी में यादव और भूषण को 8 के मुकाबले 11 मतों से बहुमत के आधार पर मतदान करके लोकतांत्रिक तरीके से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है लेकिन यह सच भी सामने आ गया है कि ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि केजरीवाल ने दो टूक कह दिया था कि उन दोनों के पी ए सी में रहते वे आज़ादी से काम नहीं कर पायेंगे। सोचने की बात है कि आप स्वतंत्रता चाहते हैं या स्वछंदता? केजरीवाल सीध्ेा जनता द्वारा सीएम नहीं चुने गये हैं। उनको विधायकों के बहुमत से मुख्यमंत्री बनाया गया है। कल अगर आध्ेा से अधिक विधायक उनके सीएम पद पर रहने के खिलाफ हो जायें तो वे अपनी सारी योग्यता और ईमानदारी के बावजूद एक मिनट भी इस पद पर नहीं रह पायेंगे। विधायक पार्टी के ज़रिये टिकट प्रचार और लक्ष्य सामने रखने से चुने गये हैं।
    पार्टी आज जहां पहुंची है उसमें आप नेताओं ही नहीं कार्यकर्ताओं का भी बड़ा योगदान है। इतना ही नहीं आप के समर्थकों का भी उसको सत्ता की इस दहलीज़ तक ले जाने में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग है लेकिन सीएम बनकर केजरीवाल को ऐसा लग सकता है कि केवल उनकी वजह से आप यहां तक पहुंची है। यह गलतफहमी केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद भी कुछ समय तक कुछ लोगों को रही लेकिन धीरे धीरे यह सच सामने आया कि अगर संघ परिवार नहीं चाहता तो मोदी पीएम नहीं बन सकते थे और अगर कारपोरेट सैक्टर पैसा पानी की तरह नहीं बहाता तो भी भाजपा की सरकार सेंटर में नहीं आ पाती और एक और वजह कि अगर यूपीए की सत्ता भ्र्र्र्रष्टाचार के एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ने के बाद भी इतना अहंकार न दिखाती और राहुल गांधी में ज़रा भी नेतृत्व के गुण होते तो मोदी आज देश के प्रधनमंत्री नहीं बन पाते।
    कहने का मतलब यह है कि सत्ता में आना और सफल सरकार चलाना एक टीमवर्क होता है जो इस सच को नहीं मानता उसको यह कड़वी हकीकत देर सवेर समय मनवा देता है। कल तक जो मोदी भाजपा के लिये हर राज्य के चुनाव में जीत की गारंटी लग रहे थे दिल्ली में जनता ने उनको आईना दिखा दिया है। अगर केजरीवाल सत्ता की हनक में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे आम आदमी पार्टी के नींव के पत्थरों को एक एक करके पार्टी पर अपना वर्चस्व बनाने के लिये निकाल निकाल कर बाहर फैंकते रहे तो कल आप के वरिष्ठ नेता मयंक गांधी जैसे और बड़े नेता उनसे नाराज़ होकर उन उसूलों की याद दिलाते रहेंगे जिनके लिये आम आदमी पार्टी का गठन लीक से अलग हटकर किया गया था। केजरीवाल यह भूल रहे हैं कि वे सीएम बनने के बाद भी पार्टी और आलोचना से उूपर नहीं हैं।
     कल केजरीवाल अगर सीएम न रहें या आप में न रहें तो इसका यह मतलब नहीं है कि आप ख़त्म हो जायेगी। आप एक उसूल और विचारधारा वाली पार्टी है जो किसी व्यक्ति की मोहताज नहीं हो सकती। आप का गठन केवल सत्ता पाने के लिये नहीं बल्कि और दलों से अलग तरह की राजनीति करने के लिये किया गया है। केजरीवाल को आज नहीं तो कल यह वास्तविकता स्वीकार करनी होगी कि तमाम काबलियत और खूबियों के बावजूद उनमें कुछ गंभीर खामियां भी हैं जिनका हल आप की पी ए सी कर सकती है। आज भले ही केजरीवाल सीएम होने की वजह से पी ए सी में अपना बहुमत होने की वजह से यादव और भूषण को बाहर का रास्ता दिखाने में कामयाब रहे हों लेकिन कल वे खुद पी ए सी में उसूलों की लड़ाई को लेकर अल्पमत में आ सकते हैं।
     इसकी वजह यह भी होगी कि वे सोनिया, मुलायम या मायावती की तरह वनमैन शो पार्टी नहीं चला सकते क्योंकि वे आप के अलग तरह की सियासत करने की वजह से अपने साथ खड़े अंधसमर्थकों को अपने साथ बनाये रखने के लिये सत्ता की रेवड़ी नहीं बांट सकते। अगर केजरीवाल ने सत्ता का अहम छोड़कर समय रहते भूलसुधार नहीं किया तो यह बात नोट कर लीजिये कि आम आदमी पार्टी का पतन शुरू हो चुका है और जब भी दिल्ली में चुनाव होंगे उनका ग्राफ नीचे ही आयेगा भले ही वह दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब ही क्यों न हो जायें।
0सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राहे शौक़ में,
मंज़िल थी कि तमाम उम्र मुझे ढंूढती रही ।।

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