Wednesday, 13 December 2017

बीजेपी एमपी का इस्तीफ़ा

भाजपा सांसद का इस्तीफ़ा बड़ा संदेश

0महाराष्ट्र से भाजपा सांसद नाना पटोले ने लोकसभा और भाजपा से भी त्यागपत्रा दे दिया। गुजरात चुनाव में कांग्रेस इस ख़बर को बड़ा मुद्दा बना सकती थी। लेकिन राहुल ने पूर्व कांग्रेसी इस सांसद को मंच साझा करने लायक नहीं भी समझा। जबकि मोदी जी ने मणिशंकर अय्यर के एक आपत्तिजनक बयान को गुजरात चुनाव में भावुक मुद्दा बनाकर बखूबी भुना लिया।  

  भंडारा-गोंदिया से एनसीपी के दिग्गज नेता प्रफुल्ल पटेल को हराकर भाजपा के टिकट पर 2014 में सांसद चुने गये नाना पटोले ने आरोप लगाया कि भाजपा में लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं बची है। वो कहते हैं कि भाजपा और केंद्र सरकार केवल दो आदमी मोदी और शाह चला तानाशाह की तरह चला रहे हैं। उनका आरोप है कि उन्होंने कई बार पीएम मोदी,महाराष्ट्र के सीएम फडनवीस और भाजपा मुखिया अमित शाह के सामने किसानों की समस्याओं को उठाया। लेकिन न केवल उनकी बातों का कोई संज्ञान नहीं लिया गया बल्कि उनके सवाल पूछने पर उनके साथ ऐसा अजीब और उपेक्षित व्यवहार किया गया।

मानो उन्होंने कोई  अनुशासनहीनता,अपराध या इन नेताओं का अपमान कर दिया हो। नाना का दावा है कि भाजपा और उसकी सरकारें किसान विरोधी हैं। उनका यह भी कहना है कि उन्होंने लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन को एक पत्र लिखकर कृषि,अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी से जुड़े14 अहम मुद्दे पार्टी की तरफ से उठाये थे। इसके बाद जब कोई कार्यवाही होती नज़र आई तो उन्होंने हर मीटिंग मंे यही मुद्दे प्रधानमंत्री मोदी के सामने उठाने शुरू किये। मोदी जी ने इन मुद्दों पर कोई तवज्जो न देते हुए उनके साथ ऐसा बर्ताव किया। मानो वे जनहित को लेकर कोई सवाल कर भारी गलती कर रहे हों।

सितंबर माह में उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह बात जनता के सामने भी रखी कि मोदी जी को यह पसंद नहीं आ रहा है कि कोई उनसे सवाल पूछे। जबकि देश के सबसे बड़े पद पर बैठे नेता से सवाल करना लोकतंत्र में पटोले अपना अधिकार मानते हैं। उनको लगता है कि यह उन मतदाताओं का भी अधिकार है। जिन्होंने उनको भारी वोटों से चुनकर संसद भेजा है। वे यह भी मानते हैं कि अगर वे पीएम सीएम और स्पीकर से जनता की समस्याओं का समाधान नहीं करा सकते तो उनको सांसद बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। हमारे विचार से पटोले पहले भाजपा सांसद हैं जिन्होंने अपना पद छोड़कर यह साबित किया है कि उनकी अंतरात्मा अभी ज़िंदा है।

उनका यह भी आरोप था कि भाजपा सरकार के दौरान किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। इसके बाद उन्होंने सब तरफ निराशा हाथ लगने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिंहा के नेतृत्व में परिणाम की चिंता किये बिना साहस के साथ अकोला में किसानों के पक्ष में आंदोलन में भी हिस्सा लिया था। लेकिन भाजपा और उसकी राज्य व केंद्र सरकार पर न कोई असर होना था न ही हुआ। हो सकता है भाजपा ने मात्र एक सांसद के पार्टी और संसद छोड़कर जाने को बड़ी चिंता का विषय इसलिये न माना हो कि उसके पास पर्याप्त बहुमत है।

लेकिन यह उसकी भूल भी साबित हो सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि भाजपा में अभी और भी असंतुष्ट सांसद हों। जो पटोले जैसे किसी एक सांसद की पार्टी छोड़ने की पहल का इंतज़ार कर रहे हों। हो सकता है कि गुजरात का चुनाव नतीजा भाजपा के खिलाफ आने पर अन्य सांसद मोदी का साथ छोड़ने का मन बना रहे हों। सोचने की बात यह है कि जो भाजपा अब तक दूसरे दलों के सांसद विधायक और नेताओं को अपने दल में लाने में महारत रखती हो उसका एक सांसद ऐसे गंभीर आरोप लगाकर पार्टी को छोड़ता है तो यह बड़ा मामला है।

दरअसल कम लोगों को यह पता है कि मोदी एमपी नहीं चुने गये थे। बल्कि वे सीधे पीएम घोषित करके एक गलत परंपरा के तहत चुनाव जीते। इतना ही नहीं उनके हिसाब से पसंद और पैमाने पर ही अन्य भाजपा नेताओं को टिकट दिये गये। इससे मोदी जी को ऐसा लगना स्वाभाविक ही है कि उनकी वजह से ही भाजपा की सरकार बनी है। नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक मोदी के कई ऐसे फैसले सामने आ चुके हैं। जिनके बारे में उनको पूरा ज्ञान नहीं था। लेकिन वनमैन शो होने की वजह से मोदी हर गलत सही फैसला अकेले करते जा रहे हैं। इससे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली भी दांव पर है।         

0 सभी को छोड़कर खुद पर भरोसा कर लिया मैंने,

 वो मैं जो मुझमें मरने को था ज़िंदा कर लिया मैंने।।                 

Monday, 11 December 2017

निकाय चुनाव

निकाय चुनाव क्या कहते हैं?

0 यूपी के निकाय चुनाव के नतीजे आये कई दिन बीत गये। लेकिन अभी तक यह चर्चा रूकने का नाम नहीं ले रही कि जहां जहां ईवीएम से चुनाव हुए वहां वहां ही बीजेपी अधिक सीटें जीती है। जबकि इस आरोप में दम नहीं है। ऐसा लगता है सच कुछ और ही है।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  यूपी के नगर निगम चुनाव इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से हुए थे। संयोग से इसमें बीजेपी 16 में से 14मेयर जिताने में सफल रही। जबकि नगरपालिका के जो 198 चेयरमैन के चुनाव बैलेट पेपर से हुए थे। उनमें से बीजेपी 77 जीत सकी। ऐसे ही नगरपंचायत के 438 पदों में से बीजेपी123 चेयरमैन बना सकी। इसी तरह से निगम पार्षद के चुनाव में बीजेपी को45 प्रतिशत और पालिका सदस्यों के चुनाव में 17 प्रतिशत ही वोट मिले हैं। जहां तक चेयरमैनी में ज़मानत ज़ब्त होने का सवाल है तो भाजपा के सबसे कम यानी 38 प्रतिशत प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हुयी है।

सोशल नेटवर्किंग साइट पर मोदीभक्तों ने जिस तरह सियासी लाभ के लिये झूठ फैलाने की परंपरा शुरू की थी। अब वो कला मोदी विरोधियों ने भी बखूबी सीख ली है। सबसे पहले बात करते हैं। नगर निगम के चुनाव में भाजपा को इतनी ज़बरदस्त सफलता क्यों मिलीतो इसका जवाब है कि जब 2012 में राज्य में सपा की सरकार थी। तब भी 12 में से 10 मेयर भाजपा के चुने गये थे। तब चुनाव ईवीएम से भी नहीं हुआ था। इसके अलावा इस निकाय चुनाव में जो आंकड़े सामने आये हैं। उनमें एक और खेल किया जा रहा है।

निगम के अलावा पालिका परिषद और नगर पंचायतों के कुल नतीजों की तुलना भाजपा को प्राप्त सीटों से की जा रही है। इसमें चालाकी यह है कि इन चुनाव में सभी दलों से अधिक जीतने वाले निर्दलीयों की संख्या छिपाई जा रही है। सच यह है कि सभी राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों से इस बार आज़ाद उम्मीदवार कहीं अधिक तादाद में जीते हैं। अगर देखना है तो यह देखा जाना चाहिये कि क्या सपा बसपा और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा से अधिक जीतकर आये हैं। जवाब मिलेगा नहीं। इस आंकड़े को इस तरह से भी समझ सकते हैं।

निगम पार्षदों के चुनाव में भाजपा 45सपा 15 बसपा 11 और कांग्रेस अपने8 प्रतिशत प्रत्याशी जिता सकी है। मतलब साफ है कि भाजपा के मुकाबले अन्य विरोधी दल मिलकर भी मात्र 34 प्रतिशत प्रत्याशी जिता सके हैं। अगर पालिका परिषद के सभासदों का आंकड़ा देखेें तो भाजपा के 17प्रतिशत के मुकाबले सपा 9 बसपा 5और कांग्रेस 3 प्रतिशत ही सदस्य चुनवाने में कामयाब रही है। ज़मानत ज़ब्त उम्मीदवारों का हिसाब जोड़ें तो कांग्रेस के 87 प्रतिशत बसपा के 73प्रतिशत और सपा के 52 प्रतिशत के मुकाबले भाजपा के सबसे कम यानी38 प्रतिशत उम्मीदवार ही ज़मानत गंवाने वालों में शामिल है।

यानी एक तरह से भाजपा को हारने के बावजूद इन तीनों विरोधी दलों के मुकाबले अधिक वोट मिले हैं। हालांकि निकाय चुनाव की विधानसभा या लोकसभा के चुनाव के साथ तुलना हर मामले में नहीं की जानी चाहिये। लेकिन खुद भाजपा ने गुजरात में अपने नवनिर्वाचित मेयरों को चुनाव प्रचार के लिये भेजकर इसको जनादेश का नमूना बताया है। सच तो यह है कि इन चुनावों में देश प्रदेश में कोई सरकार नहीं चुनी जाती जिससे लोग सियासी दलों से ज़्यादा निर्दलीयों पर दांव लगाते हैं। दूसरे भाजपा के लिये इतनी चिंता की बात ज़रूर है कि 8माह पहले उसे मिला 39 प्रतिशत वोट घटकर 31 प्रतिशत रह गया है।                   

0 एक उम्र वो थी कि जादू में भी था यक़ीन,

  एक उम्र ये है कि हक़ीक़त पर भी शक है।।                   

Tuesday, 5 December 2017

राममंदिर ही बनेगा?

मंदिर या मस्जिद तो कोर्ट ही तय करेगा!

0 आरएसएस प्रमुख भागवत जी ने कहा है कि अयोध्या के विवादित स्थान पर राम मंदिर ही बनेगा। हम सोच रहे थे कि देश संविधान के हिसाब से चलेगा। अगर ऐसा होता तो यह फैसला तो सुप्रीम कोर्ट को करना है कि वहां क्या बनेगालेकिन भागवत जी ने यह बयान देकर साफ़ कर दिया है कि देश आरएसएस के हिसाब से चलेगा।  

        

  बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि का विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। बाबरी मस्जिद के पक्षकार बार बार ऐलान कर रहे हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट का जो भी फै़सला इस बारे में आयेगा। उसको हर हाल में मानेंगे। उनका पक्ष दस्तावेज़ी सबूत के हिसाब से मज़बूत हो सकता है। शायद इसी लिये उनको यह भरोसा होगा कि सबसे बड़ी अदालत का फैसला उनके पक्ष में ही आयेगा। दूसरे रामजन्मभूमि का दावा धार्मिक और भावनात्मक अधिक है। सबको पता है कि कोर्ट और कानून के समक्ष भावनाओं का कोई मतलब नहीं है। लंबे समय से मंदिर पक्ष के लोग यह दावा करते रहे हैं कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर तोड़कर ही बनाई गयी थी।

जिससे वहां फिर से राम मंदिर बनाया जाना हिंदुओं का अधिकार है। लेकिन इस दावे के पक्ष में आज तक कोर्ट में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है। विवादित स्थल की भूगर्भीय जांच भी हो चुकी है। लेकिन उस जांच में भी कोई ऐसा पक्का प्रमाण सामने नहीं आया है। जिससे इस दावे को कानूनन सही साबित किया जा सके। लेकिन हैरत की बात यह है कि पहले विवादित स्थल पर कई दशकों तक ताला लगा रहा। उसके बाद शाहबानो केस में कांग्रेस की राजीव सरकार ने पहले मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेेके।

इसके बाद जब रामजन्मभूमि का विवाद तूल पकड़ा तो हिंदूवादी शक्तियों को खुश करने के लिये विवादित स्थल का ताला खुलवा कर उनको वहां पूजा की छूट दे दी गयी। इसके बाद ज़ाहिर है कि जवाबी तौर पर बाबरी मस्जिद पक्ष भी सड़कों पर उतर आया। नतीजा यह हुआ कि कारसेवा के बहाने भाजपा की कल्याण सरकार की मिलीभगत से बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी। हालांकि आज तक इस मामले की जांच ही चल रही है। सरकार को 25साल बाद भी यह पता नहीं चल सका कि बाबरी मस्जिद किसने तोड़ी?

अब जब मामला निचली अदालत से हाईकोर्ट होता हुआ सुनवाई के लिये सबसे बड़ी अदालत मंे विचाराधीन है तो आरएसएस प्रमुख दावा कर रहे हैं कि विवादित स्थान पर तो हर हाल में राम मंदिर ही बनेगा। उनका ऐसा दावा किसी हद तक ठीक भी है क्योंकि संघ परिवार संविधान कानून और कोर्ट की परवाह नहीं करता। उनका यह दावा भी रहा है कि संघ एक गैर राजनीतिक संगठन है। वे इस आरोप से भी साफ़ इन्कार करते रहे हैं कि वे भी यूपीए की मनमोहन सरकार को जैसे सोनिया गांधी चलाती थीं। वैसे ही भाजपा की मोदी सरकार को पर्दे के पीछे से संघ चलाता है।

उनका दावा रहा है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है। सबूत तो सोनिया के मनमोहन सरकार बैकडोर से चलाने का भी नहीं था। लेकिन यही वो बुनियादी अंतर है। जो संघ ने देश में फैला रखा है। वे खुद जब कोई गलत काम करते हैं तो उसको बहुसंख्यकों के हित में बताकर गलत नहीं मानते हैं। लेकिन जब वो ही काम अल्पसंख्यक सेकुलर दल या कम्युनिस्ट करते हैं तो संघ आसमान सर पर उठा लेता है कि देखो ये लोग न तो देश का कानून मानते हैं और न ही संविधान। सवाल यह है कि जब भागवत जी खुद संविधान से बाहर जा रहे हैं तो क्या कहेंगे।                  

 

Thursday, 30 November 2017

रेशम खान बनेगी चेयरपर्सन

*रेशम खां भारी अंतर से बनेंगी चेयरपर्सन!*

0 यूपी के बिजनौर ज़िले की नजीबाबाद पालिका सीट के चुनाव में सपा प्रत्याशी और निवर्तमान चेयरमैन मुअज़्ज़म खां की पत्नी सबिया निशात उर्फ़ रेशम खां भारी अंतर से चेयरपर्सन बनने जा रही हैं। उनको 20 से 22000वोट मिलने का अनुमान है। जबकि उनकी मुख्य प्रतिद्वन्द्वी मानी जा रही भाजपा प्रत्याशी ज्योति राजपूत को 4से 5000 और बसपा प्रत्याशी रिहाना परवीन को 6 से 7000 वोट मिलने की संभावना है।  

      

  नजीबाबाद। नगरपालिका सीट पर सपा और साइकिल चिन्ह की जीत चार चार बार हो चुकी है। संयोग से विगत चुनाव में सपा ने चुनाव चिन्ह पर स्थानीय निकाय चुनाव नहीं लड़े थे। लेकिन यहां से सपा के नेता मुअज़्ज़म खां चुनाव जीते थे। इससे पहले दो बार वर्तमान सपा विधायक तसलीम अहमद और एक बार नईमा यास्मीन भी साइकिल निशान पर चेयरमैन बन चुके हैं। 1988 में सबसे पहले मुअज़्ज़म खां के चाचा और ईमानदार छवि के धनी मरहूम अख़्तर खां साहब जब चुनाव जीते थे तो तब भी उनका निशान साइकिल ही था।

वे 3800 वोट के अंतर से समाजसेवी शिक्षाविद और मिलनसार पूर्व पालिका चेयरमैन स्व. नरेशचंद अग्रवाल से चुनाव जीते थे। हालांकि नगर में लोकप्रिय समाजसेवी और हिंदू मुस्लिम एकता के धनी तो स्व. अग्रवाल ही थे। लेकिन अंत में चुनाव में साम्प्रदायिक ध्ु्रावीकरण से ऐसा हुआ था। इस बार नगर में कुल मतदाता 69,344 थे। चुनाव आयोग के अनुसार 37,669 वोट पोल हुए हैं।2012 की जनगणना के अनुसार यहां मुस्लिम आबादी 74 प्रतिशत है। इसके पांच साल में और बढ़ जाने के ही आसार हैं। इस हिसाब से यहां सपा प्रत्याशी रेशम खां के पक्ष में मुस्लिम वोटों का ज़बरदस्त ध््रुावीकरण हुआ है।

हालांकि कहने को उनका मुकाबला भाजपा और बसपा प्रत्याशियों से माना जा रहा था। लेकिन चुनाव क़रीब आते आते वे अपने दोनों विरोधियों से इतना अधिक आगे निकल गयीं कि उन दोनों के वोट जोड़कर भी उनको नहीं हराया जा सकेगा। साथ ही उनकी जीत का अंतर भी इतना भारी होगा कि उनके विरोध में खड़े शेष सातोें प्रत्याशी भी मिलकर उतने वोट नहीं ले सकेंगे। उनके पति सपा नेता और निवर्तमान चेयरमैन मुअज़्ज़म खां के नगर में कराये गये कामों का तो उनको फ़ायदा मिला ही है।

साथ ही दो बार लोकप्रिय चेयरमैन और एक बार विधायक रहे वर्तमान सपा विधायक तसलीम अहमद के उनके पक्ष में खुलकर आ जाने से उनको मुस्लिम के साथ ही तसलीम की सेकुलर छवि होने से हिंदू वोट भी काफी तादाद में मिलने का लाभ मतदान के समय साफ दिखाई दिया है। मिलनसारी में खुद मुअज़्ज़म खां का रिकॉर्ड भी अच्छा रहा है। सही मायने में नजीबाबाद मेें इलेक्शन उस दिन सलेक्शन में बदल गया था। जिस दिन रेशम खां को सपा ने सिंबल दिया था। उनकी जीत तो उस दिन से ही तय मानी जा रही थी। एक दिसंबर को तो उनकी जीत का मात्र अंतर पता लगना है।

भाजपा प्रत्याशी को साम्प्रदायिक ध््राुवीकरण के बावजूद हिंदुओं का एकतरफा वोट नहीं मिल सका है। भाजपा का एक गुट उनका विरोध कर रहा था। जीएसटी और नोटबंदी से व्यापारी मतदान को काफी कम निकले। उधर बसपा प्रत्याशी को लेकर मुसलमानों में कोई समर्थन में जोश या मुअज़्ज़म खां को लेकर विरोध में कोई लहर भी नहीं थी। लेकिन कई साल से एक्टिव युवा सपा नेता फैसल को एनटाइम पर टिकट न मिलने से सपा के कुछ समर्थकों ने हाथी पर भी मुहर लगवाई है।                  

Sunday, 26 November 2017

मदरसे

मदरसे आधुनिक क्यों नहीं बनते?

0 सराकर ने मदरसों में एनसीइआरटी की किताबें अनिवार्य करके बिल्कुल ठीक फै़सला किया है। अगर और बच्चो की तरह मुस्लिम बच्चे आध्ुानिक शिक्षा नहीं लेंगे तो उनका भविष्य अंधकारमय ही रहेगा।

जब भी कोई सरकार खासतौर पर भाजपा सरकार मदरसों को लेकर कोई प्रगतिशील फैसला करती है। कुछ कट्टर और संकीर्ण लोग उस पर हायतौबा मचाने लगते हैं। मुसलमानों को यह बात समझने की ज़रूरत है कि अगर सरकार मदरसों में इस्लामी तालीम के साथ ही आधुनिक शिक्षा भी देना चाहती है तो इससे खुद मुसलमानों का ही फ़ायदा है। अब वो समय नहीं रहा कि किसी मुस्लिम बच्चे को केवल दीनी तालीम देकर उसको अपनी ज़िंदगी गुज़र बसर के लिये उसके हाल पर छोड़ दिया जाये। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जो बच्चे केवल दीनी तालीम लेकर मदरसों से पढ़कर निकलते हैं।

वे या तो किसी मदरसें में ही उस्ताद बनकर दीनी तालीम दे सकते हैं या फिर उनको किसी मस्जिद में इमामत या मुअजि़्ज़न की नौकरी मिल सकती है। जिसमें वे नमाज़ पढ़ाते हैं और अज़ान दे सकते हैं। इसके अलावा उनका कोई उज्जवल भविष्य कहीं नज़र नहीं आता है। कम लोगों को पता होगा कि मदरसे और मस्जिद में इन लोगोें को मौलवी मुअज़्ज़न और उस्ताद के नाते जो वेतन मिलता है। वह बहुत मामूली होता है। जिससे खुद इनका अकेले गुज़ारा होना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सोचने की बात यह है कि फिर इनके परिवार का पालन पोषण कैसे होगा?

मदरसों से फ़ारिग ऐसे तालिब इल्मों को किसी और मुस्लिम इदारे से भी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती है। इसका नतीजा यह होता है कि ऐसे लोग लंबे समय तक अपना परिवार जोड़ने से बचते हैं। हालांकि मुस्लिम समाज के पास आर्थिक आय का बहुत बड़ा श्रोत वक्फ़ की अरबों की रूपये की जायदाद हैं। लेकिन इनमें बंदरबांट चल रही है। बताया जाता है कि वक्फ़ की देश में कुल जायदाद डीआरडीओ और रेलवे के बाद सबसे बड़ी सम्पत्ति है। इसके साथ ही मुसलमान हर साल अपनी पंूजी पर 40 हज़ार करोड़ ज़कात निकालने का दावा भी करते हैं।

लेकिन इतनी बड़ी रक़म केवल आंकड़ा ही है या वास्तव में यह पैसा किसी एक फंड में जमा भी होता है। आज तक इसका कोई अधिकृत हिसाब किताब सामने नहीं आया है। कहने का मतलब यह है कि अगर मुसलमान मदरसों का आध्ुानिकीकरण सरकार के बार बार प्रस्ताव और सहायता के बाद भी नहीं करेंगे तो वे अपने हाथ से ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे होंगे। मुस्लिम समाज के एक कट्टर वर्ग ने यह हव्वा भी फैलाया हुआ है कि सरकार मदरसों को किसी न किसी तरह से अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। यह मात्र अफवाह और दुष्प्रचार ही अधिक है।

इसी तरह की अफवाह पोलियो की दवा को लेकर फैलाई गयी थी कि इसके पीने से मुस्लिम बच्चे सदा के लिये नपंुसक हो सकते हैं। जबकि यह भी झूठ था। सरकार की मंशा फिलहाल तो मात्र इतनी ही है कि मदरसे के बच्चे भी दीनी तालीम के साथ साथ साइंस अंग्रेज़ी और गणित की शिक्षा हासिल करें। सोचने की बात है कि इससे सरकार को क्या हासिल होना है और मुसलमानों का क्या नुकसान हो सकता है? जवाब में यही सामने आता है कि मदरसे चलाने वाले मुस्लिम समाज पर अपना वैचारिक नियंत्रण रखना चाहते हैं।

वे मदरसों की बेतहाशा आय भी छिपाना चाहते हैं। उनको आशंका है कि सरकार इस बहाने से मदरसों में हस्तक्षेप कर उनके अकूत आमदनी के ज़रिये को एक दिन ख़त्म कर सकती है। जबकि ऐसा नहीं है।

0 मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे,

तहज़ीब सलीक़े की इंसान क़रीने के ।।

Thursday, 23 November 2017

पद्मावती

पदमावती का विरोध तो होना ही था?

फिल्म पद्मावती अभी सेंसर बोर्ड से पास नहीं हुयी है। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई फैसला देने से भी मना कर दिया है। यानी अभी चंद पत्रकारों के अलावा यह फिल्म किसी ने भी नहीं देखी है। फिर भी बिना देखे सुनी सुनाई बातों पर इसका विरोध बढ़ता जा रहा है।

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती का बढ़ता विरोध और सेंसर बोर्ड का इस पर कोई फैसला लेने से बचना यह बता रहा है कि हमारे देश में कानून का नहीं भीड़ का राज हो चुका है। उधर कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाने वाली भाजपा गुजरात चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ लेेने के लिये इस फिल्म का विरोध कर अपने हिंदू वोट बैंक को साधने में कोई शर्म नहीं महसूस कर रही है। भाजपा के दो मुख्यमंत्री भी इस जलती आग में हाथ सेंकने को खुलकर राजपूतों के आंदोलन के पक्ष में बयान दे चुके हैं। करनी सेना भी शिवसेना और मनसे की तरह इस फिल्म के रिलीज़ होने पर कानून हाथ में लेने की खुलेआम धमकी दे रही है।

लेकिन यही काम अगर अल्पसंख्यक या दलित करते तो भाजपा सरकारों का रूख़ अलग होता। क्षेत्रीय दलों की जातिवाद की निर्लज राजनीति के बाद अब धर्म और सम्प्रदाय की घातक राजनीति करने में भाजपा को तनिक भी लोक लाज का ख़याल नहीं आ रहा है। अगर आप गहराई से देखें तो यह भाजपा का ही सोचा समझा खेल रहा है कि चाहे सत्ता की हो चाहे संगठन की हो या फिर चाहे भीड़ की हो अगर आपके पास किसी भी तरह की शक्ति है तो आप कुछ भी कर सकते हैं। कानून आपका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। बाबरी मस्जिद के ढहाने से लेकर गुजरात के दंगों तक यह साफ समझा जा सकता है कि इस सबसे किस दल को वोटों का लाभ हुआ है?

लेकिन ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि सत्ता में आने तक तो इन हथकंडों का नाजायज़ लाभ उठाया जा सकता है। लेकिन सरकार बनने के बाद आपके हाथ कानून और संविधान से बंध जाते हैं। अगर आप भीड़ को अपने राजनीतिक लाभ के लिये कानून हाथ में लेने को उकसायेंगे या उनको अराजकता फैलाने देंगे तो आप विपक्ष में रहकर तो बच भी जायेंगे और सरकार को उसकी नालायकी या बल प्रयोग करने पर उसको अत्याचारी बताकर अपने वोट भी बढ़ा सकते हैं। लेकिन जब आप खुद सत्ता में आ जाते हैं तो यह सब फंडे उल्टा असर दिखाने लगते हैं।

गुर्जर आंदोलन जाट आरक्षण और बाबा राम रहीम के मामले में हरियाणा में भाजपा सरकार की इस तरह की हरकतों को लेकर पहले ही काफी किरकिरी हो चुकी है। लेकिन इतनी फज़ीहत जनधन का नुकसान और हाईकोर्ट से डांट खाने के बावजूद भी न तो हरियाणा की और न ही भाजपा की किसी और राज्य सरकार ने कोई सबक सीखा है। कहने का मतलब यह है कि पद्मावती को लेकर जो कुछ हो रहा है। वह सामान्य मामला नहीं है। भाजपा की केंद्र में भी सरकार है। उस राज्य में भी उसकी ही सरकार है जहां पद्मावती को लेकर हंगामा हो रहा है।

सवाल यह है कि मुसलमानों से घृणा और भय की राजनीति करते करते क्या भाजपा अब हिंदुओं केे उस उदार सहिष्णु और तार्किक वर्ग को भी कट्टर हिंदुओं के बल पर डरा धमकाकर चुप होने को मजबूर करेगी जो उसकी हिंदूवादी नीतियों से कभी सहमत नहीं रहा है। अगर ऐसा होता है तो जानकारों की यह आशंका सही साबित होगी कि साम्प्रदायिकता तानाशाही और नफ़रत अपने आत्मघाती कामों से खुद ही अपनी कब्र खोदती रहती है। एक दिन आता है जब वह उसमेें दफ़न हो जाती है।

मुझे क्या ग़रज़ है तेरी हस्ती मिटाने की,

तेरे आमाल काफी हैं तेरी तबाही के लिये।