Tuesday, 14 November 2017

बंगलादेशी हिन्दू

बंगलादेशी हिंदुओं पर जु़ल्म क्यों ?

भारत में अल्पसंख्यकों पर कभी भी कहीं भी हमला होने पर खुद बहुसंख्यक समाज का मानवतावादी एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ मुखर रहता है लेकिन जब ऐसा ही कोई हमला बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर होता है तो वहां का बहुसंख्यक और हमारे यहां का अल्पसंख्यक वर्ग चुप्पी साध लेता है।  

       

   बंगलादेश की राजधानी ढाका से करीब300 किलोमीटर दूर रंगपुर ज़िले के ठाकुरपाड़ा गांव में पिछले दिनों वहां के बहुसंख्यक मुसलमानों की भीड़ ने अचानक अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमला कर उनके दो दर्जन से अधिक घर देखते ही देखते आग के हवाले कर दिये। ख़बर है कि गांव में यह चर्चा फैली थी कि एक हिंदू युवक ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर इस्लाम के खिलाफ कोई आपत्तिजनक पोस्ट की है। बताया जाता है कि इस चर्चा से ठाकुरपाड़ा गांव के आसपास के करीब आधा दर्जन से अधिक गांवों के 20हज़ार से अधिक मुसलमानों की भीड़ ने उत्तेजित होकर हिंदू बस्ती पर धावा बोल दिया।

हालांकि हिंसा की ख़बर मिलने पर तत्काल वहां की पुलिस ने मौके पर पहंुचकर हमलावर भीड़ को काबू करने के लिये फायरिंग और गिरफतारी की कार्यवाही की। लेकिन तब तक दंगाई हिंदू इलाके में लूटपाट कर 30 से अधिक मकानों को आग के हवाले कर चुके थे। सवाल यह है कि ऐसी कैसी धार्मिक भावनायें हैं जो मात्र इस चर्चा पर भड़ककर लोगों को पागल कर देती हैं कि शायद ऐसा हुआ है। शायद ऐसा किसी अल्पसंख्यक युवक ने किया है। ऐसे ही हमले आयेदिन पाकिस्तान मेें ईशनिंदा के आरोप में वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं और ईसाइयों के साथ ही खुद मुसलमानों के उन अल्पसंख्यक वर्गों पर होते हैं।

जो सुन्नी या मुख्य धारा के नहीं माने जाते। इसी तरह हमारे देश में गोहत्या के बहाने आये दिन अल्पसंख्यकों को गाहे ब गाहे निशाना बनाया जाता है। सवाल यह है कि यह कैसी धार्मिक शिक्षा है जो लोगों को बिना किसी ख़बर की पुष्टि किये बिना पुलिस को सूचित किये काूनन अपने हाथ में लेकर बेकसूर और मासूम इंसानों को पीटने जलाने और उनको मौत के घाट उतारने की इजाज़त देती हैजो लोग भारत में अल्पसंख्यकों के साथ ऐसी सुनियोजित हिंसा होने पर आसमान सर पर उठा लेते हैं। वो बंगलादेश और पाकिस्तान सहित दुनिया के दूसरे मुल्कों में ऐसी ही हिंसक घटनायें वहां के अल्पसंख्यकों के साथ होने पर यहां अपराधिक चुप्पी क्यों साध लेते हैं?

हमारा मानना है कि इंसान तो इंसान होता है। उस पर दुनिया के किसी मुल्क में किसी भी आधार पर पक्षपात और हमला होता है तो हम सबको मानवता के नाते उसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिये। अकसर यह देखने में आता है कि जिस धर्म के लोगों के साथ ऐसी दुखद और निंदनीय हिंसक वारदातें होती हैं। केवल उसी वर्ग के लोग इस हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं। इसका मतलब तो यह है कि धर्म के नाम पर जिस आपसी भाईचारे और वसुधैव कुटुंबकम का हम लोग दावा करते हैं। वह केवल दिखावे की बात है।

ऐसे ही मुसलमान दावा करते हैं कि अगर आपने एक भी बेकसूर इंसान का खून बहाया तो मान लीजिये आपने पूरी इंसानियत का क़त्ल कर दिया। लेकिन व्यवहार में मुसलमान दुनिया के किसी भी कोने में केवल मुसलमानों पर होने वाले जुल्म और हमले के खिलाफ तो सड़कों पर उतरते हैं। लेकिन कभी गैर मुस्लिमों की हत्या की प्रदर्शन कर निंदा नहीं करते। अब समय आ गया है कि सभी मज़हब के ठेकेदारों से यह सवाल पूछा जाये कि जब आपका मज़हब आपको इस तरह का खून खराबा करने की इजाज़त देता ही नहीं तो आप किससे दलाली खाकर या सियासी नेता के बहकाने पर पागल होकर यह अधर्म करते हैं।

साथ ही यह जवाब भी इन कट्टर धार्मिक भेड़ियों से तलब किया जाना चाहिये कि क्यों न धर्म विरोधी निर्लज आचरण के लिये उनको उनके मज़हब से बाहर कर दिया जाना चाहिये?               

मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे,  तहज़ीब सलीक़े की इंसान क़रीने के।।

Sunday, 12 November 2017

इशरत जहां को सलाम करो

                   

*इशरत नायिका है विलेन नहीं!*

0 तीन तलाक़ के खिलाफ़ हिम्मत लगन औरसब्र के साथ सुप्रीम कोर्ट में लड़ने वाली पांचमुस्लिम महिलाओं में से एक इशरत जहां कोनायिका की तरह सम्मान देने की बजाये उनकेही समाज में ज़लील और परेशान किया जा रहाहै। 

       

   ईसा मसीह को जब सलीब पर लटकाया जारहा था। तो उन्होंने दुआ की थी कि खुदा इननादान बंदों को माफ कर देना क्योंकि ये नहींजानते कि यह क्या अनर्थ कर रहे हैं। ईसा मसीहतो ख़ैर एक पैगंबर थे। लेकिन एक साथ तीनतलाक के खिलाफ अपनी गरीबी कमज़ोरी औरपरेशानी के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में लड़ने वालीपश्चिमी बंगाल के हावड़ा की रहने वाली इशरतजहां को भी शायद फैसला अपने पक्ष में आने केबावजूद नहीं पता होगा कि उनको उनका हीमुस्लिम समाज जिसमें औरतें भी शामिल होंगी,उनको एक नेक काम के लिये नायिका की तरहसम्मान और पुरस्कार न देकर उनको परेशानऔर बहिष्कार करेगा।

हालांकि फैसला आते ही कुछ कट्टरपंथियांे नेतभी दबी जुबान में कह दिया था कि जो औरतेंइस्लाम के हिसाब से ही चलेंगी वो तो एक साथतीन तलाक को ही मानेंगी। एक सीनियरमुस्लिम वकील ने एक अजीब सवाल उठा दियाथा कि जो पत्नियां सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बादभी इंस्टंेट ट्रिपल तलाक कबूल कर अपने पतिसे अलग होने को तैयार हो जायेेंगी तो उनकाक्या होगा? यह ठीक ऐसा ही कुतर्क था जैसेकोई मालूम करे कि घरेलू हिंसा कानून होने केबावजूद अगर कोई महिला अपने पति से घर मेंचुपचाप पिटती रहे और थाने में शिकायत न करेतो उनका क्या होगा? अरे भाई जब कानून नहींथा। तब कोई पत्नी पिटकर भी शिकायत नहींकर सकती थी।

जब कानून बन गया तो जो घरेलू हिंसा कीशिकायत पुलिस से करेगा उस पर कानून अपनाकाम करेगा। मिसाल के तौर पर यूपी के मेरठज़िले के सरधना कस्बे में एक मुस्लिम पति नेभरी पंचायत में ही कुछ मौलानाओं के बयानों सेभ्रमित होकर अपनी पत्नी को सुप्रीम कोर्ट केरोक लगाने के बावजूद तीन तलाक एक साथदिये तो शिकायत होने पर पुलिस ने उसकोसुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ चलने परतत्काल गिरफतार कर जेल भेज दिया। साथ हीउसका उसकी पत्नी से रिश्ता ख़त्म भी नहींमाना जायेगा। इसके साथ ही उसे जेल से वापसआकर अपनी पत्नी के साथ बिना हलाला करायेऔर बिना दुबारा निकाह किये रहने से भीकानूनन नहीं रोका जा सकेगा।

दरअसल हमारा समाज पुरूष प्रधान होने केसाथ ही कट्टर नासमझ नादान दकियानूसीअंधविश्वासी आस्थानवान धर्मभीरू औरपरंपरावादी भी है। इसका नतीजा यह होता हैकि चंद मौलाना संत और बाबा ओझा समाजको जैसे चाहे वैसे हांक लेते हैं। हैरत और दुखकी बात यह है कि जिस इशरत जहां को इसबात का श्रेय दिया जाना चाहिये था कि उसनेमुस्लिम समाज की लाखों तीन तलाक़ पीड़ितमहिलाओं के हक़ की लड़ाई अपने खर्च अपनेसमय और अपनी बहादुरी से लड़कर पूरे महिलावर्ग को एक राहत खुशहाली और उनका सदियोंसे मारा जा रहा हक़ दिलाया है। उसको इस्लामविरोधी मुस्लिम समाज की दुश्मन और काफ़िरोंके हाथ में खेलने वाली संघ परिवार की एजेंटबताकर उल्टे सामाजिक बहिष्कार किया जा रहाहै।

ऐसा ही हमारे निष्पक्ष बेबाक और मानवीयआधार पर लेख ब्लॉग लिखने एवं बोलने परअकसर मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी नाराज़ होजाते हैं। कुछ कुफ्र के फ़तवे का डर दिखाते हैंतो कुछ तरह तरह से नुकसान पहंुचाने कीधमकी भी देते हैं। हालांकि हम पर तो इनहरकतों का कोई असर पड़ता नहीं लेकिन इशरतजहां जैसी पीड़ित ज़रूर टेंशन मेें होगी।

0 ये लोग पांव नहीं जे़हन से अपाहिज हैं,

  उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाताहै।                     

Saturday, 11 November 2017

स्मॉग

दिल्ली में स्मॉग है कहां?

दिल्ली को दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बताकर ‘बदनाम’ किया जा रहा है। मोदी सरकार को चाहिये ऐसा‘प्रोपेगंडा’ करने वालों के खिलाफ‘देशद्रोह’ की कार्यवाही करे। हम इस मामले में मोदीभक्तों के साथ हैं। यह नाकाम विपक्ष की ‘साज़िष’ लगती है।

हज़ार बार बता दिया कि विकास के सामने आजकल प्रदूषण कोई मुद्दा नहीं है। इतने बड़े बड़े बांध बन गये। कहीं प्रदूषण से कोई समस्या खड़ी हुयी। लेकिन ये कथित बुध््िदजीवी बार बार न जाने कहां से दिल्ली के स्मॉग को हर साल ही बड़ा मुद्दा बनाने पर तुले हैं। दूसरी तरफ पता नहीं मीडिया को क्या हो गया है? अच्छा खासा अब तक राष्ट्रहित में हर मुद्दे पर मोदी सरकार का आंख बंद कर साथ दे रहा था। लेकिन अचानक भटक गया है। पिं्रट के साथ ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया कुछ ज़्यादा ही स्मॉग को लेकर चिल्ला रहा है। अरे भाई अगर यह इतनी बड़ी प्रॉब्लम होती तो सरकार इसके लिये अब तक ज़रूर कुछ बड़े फैसले कर चुकी होती।

हर साल कई साल से इन दिनों दो चार दिन के लिये दिल्ली में स्मॉग आता ही है। कोई पहली बार तो आया नहीं है। जो दिल्लीवासी इतना घबरा रहे हैं । अब देखिये ना बिहार और असम में हर साल कई दिनों तक बाढ़ आती है तो आती है। वो तो हर साल आयेगी न? इसमें सरकार क्या कर सकती है?कुछ आपदायेें भगवान भरोसे भी छोड़ दिया करो। अब दिल्ली में जब सर्दी दस्तक देती है तो उसके पीछे पीछे कोहरा भी आता ही है। अब ऐसा तो हो नहीें सकता कि सर्दी आये और कोहरा ना आये। ऐसे ही हर साल इन दिनों सर्दी की शुरूआत के साथ ही स्मॉग भी आने लगा है।

अरे भाई दिल्ली में पूरे भारत से लोग आते हैं तो किसी को कभी कोई प्रॉब्लम नहीं होती तो स्मॉग भी आ गया। अब ऐसा तो है नहीं कि दिल्ली इसी स्मॉग की वजह से सांस नहीं ले पा रही। दिल्ली में पहले ही इतने वाहन हैं कि उनकी वजह से प्रदूषण हो ही रहा है। साथ साथ हर दिन नये वाहन सड़कों पर आते जा रहे हैं। उनको सरकार लोकतंत्र में कैसे रोक सकती है? दिल्ली में इंडस्ट्री भी बड़े पैमाने पर लगी हुयी हैं। उनमें बड़ी तादाद में लोगों को रोज़गार भी मिला हुआ है। इस तरह से अगर इंडस्ट्रीज़ की चिमनियों से धुआं निकल रहा है तो सरकार क्या करे?

अब यह तो संभव नहीं कि आप गुड़ खायें और गुलगुलों से परहेज़ भी करें। ऐसे ही दिल्ली में विकास होगा तो निर्माण भी होगा। और जब निर्माण होगा तो ध्ूाल भी उड़ेगी। इसमें सरकार क्या कर सकती है? अब इस‘मामूली नुकसान’ यानी प्रदूषण की वजह से दिल्ली का विकास तो रोका नहीं जा सकता। ऐसे ही दिल्ली में जो वाहन चल रहे है। बताया जाता है कि उनमें से जो वाहन डीज़ल से चलते हैं। उनसे अधिक प्रदूषण होता है। अब इनमें जो बसें या ट्रक हैं। उनके बारे में तो सोचा जा सकता है। लेकिन जो अत्यधिक ‘गरीब’ लोग डीजल से चलने वाली 50 लाख तक की ‘सस्ती’कारें जैसे तैसे अपना पेट काटकर खरीद रहे हैं।

उनको सरकार किस मंुह से रोक सकती है? ऐसे ही पड़ौस के राज्यों पंजाब और हरियाणा में किसान पराली जलाते हैं। बताया जाता है कि उसका ध्ुाआं दिल्ली व एनसीआर में हर साल स्मॉग बनकर कई दिन तक के लिये ठहर जाता है। यह मामला भी काफी नाजुक है। एक तो देशभर का किसान पहले ही आर्थिक तंगी से अपनी जान दे रहा है। अब उसको पराली भी ना जलाने दी जाये तो वह और नाराज़ हो जायेगा। इस समय सरकार का सारा फोकस उन व्यापारियों पर है। जो जीएसटी की वजह से ख़फ़ा है। पराली पर किसानों से फिर किसी साल निबटेंगे।

दिल्ली सरकार कहती है कि यह केंद्र सरकार का काम है। केंद्र सरकार कहती है कि नहीं यह पड़ौस के राज्यों की कानून व्यवस्था का सवाल है। एनजीटी कहती है कि प्रदूषण रोको चाहे जो करना पड़े। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि पता लगाओ यह किसका काम है। हम समझते हैं कि दो चार दशक में पता लग ही जायेगा।

0खुदा के हाथ मत सौंप सारे कामों को,

बदलते वक़्त पे कुछ इख़्तियार भी रख।।

Thursday, 9 November 2017

नोटबन्दी का एक साल

नोटबंदीः क्या खोया क्या पाया?

0 8 नवंबर को नोटबंदी का एक साल पूरा हो गया। सरकार जहां 99 प्रतिषत पुराने 500 और 1000 के नोट बैंक में वापस आ जाने के बावजूद नोटबंदी के सफल होने का दावा करती है। वहीं विपक्ष 200 लोगों के इसमें मरने से इसको पूरी तरह नाकाम बताता है। लेकिन सच्चाई कहीं इसके बीच है।

नोटबंदी का फैसला करप्शन कालाधन और आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक को ख़त्म करने के दावे के साथ लेने का मोदी सरकार ने दावा किया था। जानकारों का कहना था कि इसके लिये सरकार ने नीयत ठीक भी हो तो पूरी तरह से होमवर्क नहीं किया था। यह बात तब किसी हद तक सही होती भी नज़र आई जब सरकार को 50 दिन की नोटबंदी के दौरान लगभग 100 बार नियम बदलने पड़े। उधर सरकार का कहना था कि सैध््दांतिक रूप से सही होने के बाद भी कई बार फैसले लागू करने में व्यवहारिक कठिनाइयां आती ही हैं।

इसलिये जनहित में बार बार नियम बदलने में काई बुराई नहीं है। लेकिन सरकार आज तक इस बात का जवाब नहीं दे पाई कि जब उसको कुल चलन के नोटों में से लगभग 86 प्रतिशत नोट हटाने थे तो उसने जनता की सुविधा के लिये विकल्प के तौर पर पहले ही इतनी ही मुद्रा छापकर तैयार क्योें नहीं की? दूसरे जो 2000 का नया नोट छापा गया उसके लिये एटीएम को पहले ही कैलिब्रेट क्यों नहीं किया गया? तीसरे 100 और 50 के छोटे नोटों की आपूर्ति पहले से ही बढ़ाकर बाज़ार के चलन में इनकी हिस्सेदारी कुल मुद्रा में कम से कम 50 प्रतिशत तक करके जनता को भारी मुसीबतों से बचाने के लिये कोई फैसला क्यों नहीं लिया गया?

इसके साथ ही बैंकों के मैनेजर और स्टाफ ने मिलकर सरकार की कालेधन को निकालने की योजना को अपनी जेब भरकर जो चूना लगाया उसके बारे में पहले से कोई तैयारी क्योें नहीं की गयी थी? साथ ही कालाधन रखने वालों ने जिस तरह से अपना कालाधन जनधन खातों और सोने में खपाया उसको लगाम लगाने में भी सरकार असहाय नज़र आई। जब नोटबंदी चल ही रही थी। तभी आतंकवादियों और नक्सलवादियों के पास से नये 2000के नोट बरामद होने शुरू हो चुके थे। साथ ही बाज़ार में नये नक़ली नोट भी आने लगे।

इतना ही नहीं पहले 500 और 1000के जो नक़ली नोट बाज़ार में चलन मंे थे। उनमें से अधिकांश बैंकों में इसलिये जमा हो गये क्योंकि सब बैंकोें में न तो नकली नोट चैक करने वाली मशीनें थीं और न ही उनको भारी भीड़ के बीच आपाधापी मेें इनको चैक करने का होश ही मिल पा रहा था। यह आशंका भी पहले से ही थी कि कालाधन रखने वाले इसको ठिकाने लगाने के लिये जुगाड़ ज़रूर लगायेगें। उन्होंने कामयाबी के साथ ऐसा किया भी। लेकिन सरकार उनको ऐसा करने से नहीं रोक पाई। यह सरकार की नाकामी ही मानी जायेगी।

लेदेकर सरकार का सारा ज़ोर अब इस बात पर है कि बाज़ार में नोटों की कम उपलब्ध्ता से लोग डिजिटल मनी की ओर बढ़े हैं। लेकिन यह भी आंशिक सच है। जैसे ही बाजार में पर्याप्त नोट पहंुच गये लोग फिर से नकद लेनदेन करने लगे। उधर नोटबंदी से कारोबार एक तरह से चौपट हो गया। सरकार का दावा है कि उसने बहुत बड़ी तादाद में फर्जी और नकली कंपनियों को इस दौरान पहचाना हैै। इसके साथ ही सरकार ने बड़ी रकम बैंकों मंे जमा कर आयकर रिटर्न न भरने वालों पर नज़र गड़ाई है। लेकिन इन मामलों को करप्ट सरकारी मशीनरी से अंजाम तक पहुंचान कठिन है।

सोचा था जाकर हम उससे फ़रियाद करेंग,

कमबख़्त वो भी उसका चाहने वाला निकला ।।

धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिर्पेक्षता कोई समस्या नहीं!

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर देश की धर्मनिर्पेक्षता पर ज़ोरदार हमला बोला है। हालांकि यह उनका निजी विचार नहीं है बल्कि यह संघ परिवार के ही एजेंडे का एक सोचा समझा हिस्सा है। लेकिन इस तरह वे यूपी में अपनी नाकामियों को बहुत दिन तक छिपा नहीं पायेंगे। क्योंकि यह असली मुद्दा नहीं है।

जब आदमी परेशान होता है तो वह किसी की कोई भी बात विकल्प के तौर पर मानने को जल्दी ही तैयार हो जाता है। देश कांग्रेस और उसके जैसे सेकुलर दलों के करप्शन वंशवाद परिवारवाद अल्पसंख्यकवाद और जातिवाद से आज़ादी के बाद 60 साल में काफी तंग आ चुका था। ऐसे में लोहा गरम देखकर आरएसएस ने मोदी को गुजरात के कथित विकास मॉडल और हिंदुत्व के तड़के के साथ देश की जनता के सामने विकल्प के तौर पर पूरी तैयारी के साथ पेश कर दिया। जनता खासतौर पर हिंदुओं को यह आईडिया काफी अपील कर गया। मोदी पीएम बन गये।

साढ़े तीन साल बीत गये लेकिन आज तक उनकी कोई ठोस उपलब्धि जनता के सामने नहीं है। उल्टा नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक से अर्थव्यवस्था चौपट है। इसके बाद यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव भी मोदी को ब्रांड बनाकर भाजपा ने जीत लिये। इसके बाद यह समस्या सामने आई कि यूपी जैसे बड़े राज्य का सीएम किसे बनाया जाये? संघ परिवार ने बहुत सोच समझकर फायरब्रांड हिंदुत्ववादी नेता योगी आदित्यनाथ को यूपी जैसे उलझे हुए विशाल प्रदेश का मुख्यमंत्री बना तो दिया। लेकिन आज तक न तो योगी और न ही संघ परिवार ऐसी कोई योजना सामने रख सका है।

जिससे लगे कि उनके पास यूपी के विकास का कोई व्यापक एजेंडा हो। दरअसल चुनाव जीतना अलग बात है। इसके बाद कामयाब सरकार चलाना बिल्कुल दूसरी बात है। सपा बसपा के दौर में भी यूपी के साथ यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम आती थी कि ये पार्टियां जातीय समीकरण के हिसाब से मुस्लिम धार्मिक तुष्टिकरण से जीतने का जुगाड़ तो कामयाबी से कर लेती थीं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद टोटकों से सरकार चलती थी। कभी सैफई उत्सव में करोड़ो फंूके जाते थे तो कभी अंबेडकर पार्क में हाथियोें की मूर्तियों पर अरबों रूपया पानी की तरह बहाया जाता था।

यानी इन क्षेत्रीय जातिवादी परिवारवादी भ्रष्ट दलों को यही मालूम नहीं था कि यूपी की सबसे बड़ी समस्यायें क्या हैं? और उनका समाधान करने का टाइमबाउंड रोडमैप क्या होना चाहिये? इस बार मोदी की तथाकथित विकास पुरूष की झूठी घड़ी हुयी छवि के बल पर बड़ी उम्मीदों से यूपी की जनता ने भाजपा को यूपी की बागडोर सौंपी थी। लेकिन उन्होंने भविष्य मेें अपना विकल्प तैयार करने को भाजपा के किसी अनुभवी और योग्य नेता को यूपी की कमान न देकर योगी जैसे एक धार्मिक मठ के मुखिया को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया।

योगी ने आते ही जो दावे किये थे। उनकी सरकार को 6 माह से अधिक हो चुके हैं। एक भी वादा पूरा होता नज़र नहीं आ रहा है। यहां तक की यूपी की सड़के 100 दिन में गड्ढा मुक्त तक नहीं हो पाईं हैं। एंटी रोमियो अभियान दिखावा बनकर रह गया है। कानून व्यवस्था पहले की तरह रामभरोसे चल रही है। योगी की नाक के नीचे गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में मासूम बच्चों की मौत लगातार जारी है। योगी मोदी की तरह ही सबसे बड़े पद पर आसीन होकर अभी भी चुनाव मोड में लगते हैं। यही वजह है कि वे यूपी को चमकाने की बजाये धर्मनिर्पेक्षता अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और मदरसों पर फोकस कर हिंदू वोटबैंक मज़बूत करने में लगे हैं।

उनको याद रखना चाहिये कि जनता ने उनको एक मौका दे दिया है। हो सकता है। उनकी लुभावनी बातों में आकर एक मौका आगे और मिल जाये। लेकिन अगर वे राज्य व केंद्र की सरकार में रहकर भी केवल बयानबाज़ी से सेक्युलर दलों को कोसते रहेंगे तो जनता उखाड़ फैंकेगी।

कहां तो चिराग़ तय था हरेक घर के लिये,

कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये ।

Saturday, 4 November 2017

चिंगारी

चिंगारी: आंधियों के बीच एक दीया!

0 आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। इस भौतिकतावादी सोच से मीडिया भी नहीं बचा है। लेकिन यूपी के बिजनौर जैसे छोटे और पिछड़े हुए ज़िले से हिंदी अख़बार चिंगारी सांध््य दैनिक ने ऐसे में भी अपनी विश्वसनीयता के बल पर खुद को मशाल बनाया है।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। उस समय चिंगारी के संरक्षक और सर्वे सर्वा वरिष्ठ पत्रकार चिंतक व विचारक स्व. बाबू सिंह चौहान से उनके कुछ मित्रों और शुभचिंतकों ने बिना किसी लाग लपेट के कहा था कि चिंगारी का भविष्य उज्जवल नहीं है।

उनकी भावना आगाह करने को अच्छी भले ही रही होगी लेकिन उनको पूरी आशंका इस बात की थी कि शाम का अख़बार वह भी दैनिक चलाना और भी कठिन ही नहीं एक तरह से नामुमकिन काम है। लेकिन अपनी धुन के पक्के वामपंथी सोच के पैरोकार स्व. चौहान साहब ने नकारात्मक बातों पर कान न देकर अपना मिशन शुरू कर दिया। शुरू में उनके बड़े पुत्र श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादन की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद उनके छोटे पुत्र मिलनसार इंसान श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी।

इसमें कोई दो राय नहीं चिंगारी का 32साल का सफर उसके साइज़ उसके कागज़ या उसकी छपाई की किसी खास तकनीक की वजह से नहीं बल्कि पाठकों में उसकी विश्वसनीयता की वजह से आगे बढ़ता गया है। चिंगारी के हैडिंग शेर ओ शायरी की तरह रदीफ काफ़िये के हिसाब से तुकांत होने को लोगों ने हाथो हाथ लिया। चिंगारी लोगों के लिये चटपटी और गुदगुदाने वाली ख़बरोें के साथ ही शाम की चाय का साथी बन गया। इसके बाद इसमें ख़बरों का ऐसा सैलाब आया कि इसके पन्ने लगातार बढ़ाने पड़े। लेकिन कीमत वही रखी गयी।

एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अख़बार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अख़बार और चैनल तक इसकी ख़बरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली ख़बरों से अपनी अहम ख़बरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है।

चिंगारी अपने संस्थापक और राष्ट्रीय स्तर के मूर्धन्य पत्रकार रहे स्व. चौहान साहब के दिखाये गरीब और कमज़ोर समर्थक रास्ते पर आज भी तमाम कठिनाइयों के बावजूद चल रहा है। इसके पाठकोें की तादाद ही नहीं बढ़ी बल्कि इसके सहयोगी संवाददाता विज्ञापनदाता और शुभचिंतक भी इसके तेवर और इसके संपादक पिंटू भाई की खुशअख़लाकी डाउन टू अर्थ छवि सादगी नफ़ासत सदाकत और सहाफत के लोग कायल होेते गये।

बिजनौर से निकलकर अब चिंगारी देखते देखते ही उत्तराखंड के साथ ही आसपास के कई सीमावर्ती ज़िलों में भी छाने लगा। कई बार बिजनौर के और कई बार बाहर के बडे़ समाचार पत्र समूहों ने चिंगारी को चुनौती देने के लिये अपना सुबह का अख़बार न चलता देख शाम का अख़बार इस इलाके में प्रकाशित करना चाहा। लेकिन वे नकारात्मक सोच और ईष्या की वजह से कामयाब नहीं हो सके। कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अख़बार लगातार तीन दशक से अधिक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है।

चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। हमारी शुभकामनायें चिंगारी उसके संपादक और सभी संवाददाताओं को है।                   

0 नज़र बचाके निकल सकते हो निकल जाओ,

  मैं इक आईना हूं मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है ।।