थैंक्स गॉड बिहार में मुलायम की सपा JDU और RJD से अलग हो गयी....
मुलायम को पता चल गया कि नितीश तो बीजेपी के साथ सरकार चला चुके हैं नितीश की वजह से बाबरी मस्जिद गिरी दंगे हुए....वगैरा वगैरा।
ये लोग धोखा देकर मुलायम को साथ ले रहे थे जबकि मुलायम 1999 में वाजपेयी सरकार गिरने पर सोनिया को विदेशी मूल का बताकर PM बनने से रोककर और फिर हुए चुनाव में बीजेपी की 5 साल की सरकार बनवाकर 2002 में गोधरा और गुजरात कराकर कल्याण और साक्षी को साथ लेकर अपनी "धर्मनिरपेक्षता" साबित कर चुके हैं
ऐसे में मुलायम जैसे सच्चे और सब से अच्छे "सेक्युलर"
नितीश जैसे बीजेपी के दोस्त का कैसे साथ दे सकते हैं
कमबख्त झूठ बोलकर धोखे से समर्थन लेने की "नाजायज़" और "नापाक" कोशिश कर रहे थे
Thursday, 10 September 2015
"सच्चे सेक्युलर मुलायम"
Wednesday, 9 September 2015
मुस्लिम आबादी
मुस्लिम आबादी की तेज़ बढ़त का कारण मज़हब है?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0शिक्षित और सम्पन्न सभी वर्ग परिवार नियोजन अपनाते रहे हैं!
विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया ने मांग की है कि दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले मुस्लिमों को कानून बनाकर सज़ा देनी चाहिये। हालांकि संविधान ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता और अगर ऐसा कोई पक्षपात पूर्ण कानून बनाया भी गया तो उसको संसद और राज्यसभा पास नहीं करेगी अगर यह काम विवादित भूमि अध्यादेेश की तरह करने की कोेशिश की गयी तो यह सुप्रीम कोर्ट में स्टे हो जायेगा। यह सच तोगड़िया भी जानते होंगे लेकिन उनको राजनीति करनी है सो उन्होंने यह बचकाना बयान दिया। अगर वह बढ़ती आबादी को लेकर वास्तव में चिंतित होते तो सबके लिये अनिवार्य परिवार नियोजन यानी दो बच्चो का कानून बनाने की बात करते और इतना ही नहीं अपनी बीजेपी सरकार को ऐसे सकारात्मक और रचनात्मक सुझाव देते जिससे सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती लेकिन उनको घृणा और अलगाव की राजनीति करनी है जिसके लिये ऐसे बेतुके और अव्यावहारिक बयान ही दिये जा सकते हैं।
धार्मिक आधार पर आबादी के जो आंकड़े सरकार ने पिछले दिनों जारी किये हैं उनमें अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा वर्ग यानी मुसलमानों की आबादी की बढ़त देश के सबसे बड़े हिंदू वर्ग के मुकाबले डेढ़ गुना ज़्यादा है। इससे पता चलता है कि जहां पहली बार देश में हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत से भी कम हो गयी है वहीं मुस्लिम कुल आबादी का 13-8 से बढ़कर 14-2 प्रतिशत हो गये हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1981 से 1991 के दशक में जहां मुस्लिमों की बढ़त दर 32-88 प्रतिशत थी वहीं 1991 से 2001 के दशक में यह घटकर 29-51प्रतिशत हुयी और इस बार 2001 से 2011 के दशक में यह 24-60 प्रतिशत तक गिर गयी है। उधर इसी दौरान तीन दशक में हिंदू आबादी की बढ़त क्रमशः 22-71] 19-92 और इस बार 16-76 तक गिरी है।
यह तथ्य बिल्कुल सच है कि मुस्लिम आबादी हिंदू आबादी ही नहीं अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के मुकाबले भी काफी तेजी़ से बढ़ती रही है लेकिन इन्हीं आंकड़ों में एक आंकड़ा और शामिल है कि तीन दशक में मुस्लिम आबादी की बढ़त मेें हिंदू आबादी की बढ़त के मुकाबले ज्यादा गिरावट आई है। आप इस अंतर को इस तरह से देख सकते हैं कि जहां हिंदू आबादी में 30 साल में 5-95 प्रतिशत कमी आई है वहीं मुस्लिम आबादी की बढ़त में इसी दौरान 8-28 प्रतिशत की कमी आई है। इसे आप चाहें तो इस तरह की परिभाषित कर सकते हैं जैसे पानी से आधा भरे गिलास को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक सोच का पता चलता है। यह ठीक है कि मुस्लिम आबादी की तेज़ बढ़त देश ही नहीं उनके अपने समाज के लिये भी चिंता का सबब है लेकिन यहां इस सत्य को नहीं भुलाया जा सकता कि पहले हिंदू और मुस्लिम समाज में बढ़त का जो अंतर 10 प्रतिशत से ज़्यादा था वह तीन दशक बाद घटकर 8 प्रतिशत से भी कम रह गया है।
मतलब कहने का यह है कि जहां 2001 से 2010 तक हिंदू आबादी में पिछले दशक के मुकाबले 3-16 प्रतिशत की कमी आई वहीं मुस्लिम आबादी में गिरावट की दर बढ़त के बावजूद 4-92 रही जो एक अच्छा संकेत है। हालांकि यह दुष्प्रचार काफी समय से चल रहा है कि अगर मुस्लिमों की आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो देश में एक दिन ऐसा आयेगा कि जब मुस्लिम हिंदुओं से अधिक हो जायेंगे। इसके साथ ही यह भय भी खूब फैलाया जाता है कि उस दिन भारत को इस्लामी राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा और गैर मुस्लिमों पर शरीयत कानून थोपकर उनसे मुगलकाल की तरह जज़िया वसूली की जायेगी। काल्पनिक तौर पर ऐसा अनर्थ होने का समय 220 साल भी तय कर दिया गया था लेकिन एक दश क बाद ही यह दावा झूठा साबित होता नज़र आ रहा है क्योंकि दोनों वर्गों की आबादी का अंतर लगातार कम होता जा रहा है जिससे ऐसा कभी नहीं होगा कि मुस्लिम आबादी देश की सबसे बड़ी आबादी बन जाये।
दूसरा तथ्य इस सारी बहस में यह भुला दिया गया है कि आबादी ज्यादा बढ़ना या तेज़ी से बढ़ना किसी सोची समझी योजना या धर्म विशेष की वजह से नहीं है बल्कि तथ्य और सर्वे बताते हैं कि इसका सीधा संबंध शिक्षा और सम्रध्दि से है। अगर आप दलितों या गरीब हिंदुओं की आबादी की बढ़त के आंकड़े अलग से देखें तो आपको साफ साफ पता चलेगा कि उनकी बढ़त दर कहीं मुस्लिमों के बराबर तो कहीं उनसे भी अधिक है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह केरल सबसे शिक्षित राज्य है और वहां आबादी की बढ़त 4-9 प्रतिशत यानी लगभग ज़ीरो ग्रोथ आ गयी है जिसमें मुस्लिम भी बराबर शरीक है और देश में सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी की बढ़त असम में 30-9 से बढ़कर 34-2 प्रतिशत पाई गयी है जिसका साफ मतलब है कि बंग्लादेशी घुसपैठ से भी यह उछाल आया है।
अब हम आपको एक और रोचक तथ्य बताते हैं कि एक तरफ तो संघ परिवार धर्म के आधार पर जनगणना का विरोध करता है और दूसरी तरफ उसकी सरकार मांग के बावजूद जाति के आधार पर जनगणना के आंकड़े जारी न कर बिना किसी की मांग के बिहार चुनाव से ठीक पहले धार्मिक आधार पर वोटों के ध्ु्रवीकरण की नीयत से धर्म के आधार पर आबादी के आंकड़े जानबूझकर डरावने बनाकर पेश करती है। इससे पहले यही आंकड़े दिल्ली में विधानसभा चुनाव से दो सप्ताह पहले 22 जनवरी 2015 को भारत सरकार की ओर से अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया को उपलब्ध कराये गये थे। दिल्ली में चुनाव 7 फरवरी 2015 को हुआ था। इतना ही नहीं 15 मार्च 2014 को ओपन मैगज़ीन में ^^द अनटोल्ड सेनसस स्टोरी** शीर्षक से यही आंकड़े सार्वजनिक किये गये थे जबकि 7 अपै्रल से 12 मई तक आम लोकसभा चुनाव हुआ था।
सवाल यह है कि इन आंकड़ों को जारी करने का चुनाव के दौरान एक के बाद एक संयोग नहीं हो सकता यह एक सोची समझी योजना का हिस्सा है जिससे राजनीति मुद्दो और विकास के आधार पर न कर धर्मिक आबादी के ध््रुावीकरण के आधार पर लोगों को बांटकर डराकर और भावनाओं में बहाकर वोट लेने की घिनौनी कोशिश बार बार की जाती हैं।
यह ठीक है कि जनसंख्या विस्फोट को रोकने को सभी को परिवार नियोजन अपनाना चाहिये और स्वयं भारत सरकार के जनगणना के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि मुस्लिम भी समय के साथ विकास और प्रगति में भागीदारी बढ़ने और उच्च शिक्षित होते जाने के साथ बड़ी संख्या में परिवार सीमित करने के लाभ समझकर परिवार नियोजन अपना रहे हैं लेकिन अगर मुस्लिम का ही कोई वर्ग विशेष बच्चो को अल्लाह की देन बताकर ऐसा करने से परहेज़ करता है तो भाजपा की पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार सबके लिये अनिवार्य परिवार नियोजन कानून बनाने से पीछे क्यों हट रही है] संघ परिवार तो मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ़ रहा है उसको तो वोटबैंक की राजनीति की चिंता नहीं करनी चाहिये और मुस्लिम आबादी बढ़ने का हव्वा दिखाकर हिंदुओं को भयभीत करने की ओछी राजनीति से बचना चाहिये वर्ना लोग यही कहेंगे कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने का और होते हैं और भाजपा के सरकार बनाने से पहले के सारे दावे ^^जुमले** ही अधिक थे......।
0उसके होंटो की तरफ़ न देख वो क्या कहता है]
उसके क़दमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।।
Friday, 4 September 2015
कट्टर बनाम तर्कशील
कल तक हम जिस कट्टरपंथ और तालिबानी सोच के लिये पाकिस्तान को कोसते थे आज वो ही संकीर्णता और असहनशीलता हमारे यहाँ पाँव पसार रही है...
अब इतना कहना बाक़ी है कि आज के समाज के सोचने समझने का जो स्तर या वजह है
अगर आप लोगों का ब्रेनवाश किये बिना अपनी बात सिर्फ अभिवक्ति की आज़ादी के नाम पर अपने तरीके से दोहराये जाएंगे तो तर्कशील लोगों के लिये मुश्किलें और हत्याएं और बढ़ती जाएंगी।
कट्टर और संकीर्ण तत्व बाक़ायदा नफ़रत और हिंसा फैलाने के लिये सुनियोजित काम कर रहे हैं
तर्कशील लोग जनता में जागरूकता और वैज्ञानिक सोच फैलाने के लिये क्या कर रहे हैं???
कट्टरता के क्या क्या नुकसान हैं
और उदारता के क्या क्या फ़ायदे हैं
ये बात आम आदमी को अभियान चलाकर समझानी होगी। इस में सियासी दख़ल रोकना होगा।
बिना माइंडसेट बदले आपकी सारी अच्छी और प्रगतिशील बातें किताबों और बयानों तक सीमित होकर रह जाएंगी।
इसलिये अब वक़्त आ गया है हम लोग भी समाज को जगाने उसे ठीक रास्ता दिखाने और बहकाने से बचाने को वैचारिक संघर्ष को तेज़ करें चाहे इसमें हमें बड़ी से बड़ी क़ुरबानी ही क्यों न देनी पड़े
जैसी देश की आज़ादी में दी थी
कौन कौन तैयार है बताओ ❓
आज भरे चौराहे पर कोई जुर्म होता है
कोई रोकता टोकता नहीं ये तो अलग बात है
घटना के बाद गवाह नहीं बनता कोई
इसिलिय लोगों को केस के लिये फ़र्ज़ी गवाह लाने पड़ते हैं
Fehmeeda riyaz
पाकिस्तान की शायरा फ़हमीदा रिआज़ की कविता एक के बाद एक तीन रेशनलिस्ट्स नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे और एम् एम् कालबुरगी की हत्या के बाद याद आ रही है.
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तुम बिलकुल हम जैसे निकले
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अब तक कहाँ छुपे थे भाई
वो मूर्खता वो घामड़पन
जिसमे हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई बहुत बधाई
प्रेत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उलटे काज करोगे
अपना चमन दराज़ करोगे
तुम भी बैठे करोगे सोंचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
होगा कठिन यहाँ भी जीना
रातों आ जायेगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
यहां भी सबकी साँस घुटेगी
कल दुःख से सोंचा करती थी
सोंच के बहुत हँसी आज आई
तुम बिलकुल हम जैसे निकले
हम दो क़ौम नहीं थे भाई !
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुण गाना
आगे गड्ढा है ये मत देखो
वापस लाओ गया ज़माना
बश्ट (practice) करो तुम्हें आ जायेगा
उलटे पाँव चलते जाना
ध्यान न मन में दूजा आये
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप सा करते जाओ
बारम-बार यही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत
कैसा आलिशान था भारत
फिर तुमलोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना.
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Maturity
What is Maturity ?
Maturity is when you stop trying to change people, and instead focus on changing yourself.
Maturity is when you accept people for who they are.
Maturity is when you understand that everyone is right in their own perspective.
Maturity is when you learn to "let go".
Maturity is when you are able to drop "expectations" from a relationship and give for the sake of giving.
Maturity is when you understand that whatever you do, you do for your own peace.
Maturity is when you stop proving to the world how intelligent you are.
Maturity is when you focus on positives in people.
Maturity is when you do not seek approval from others.
Maturity is when you stop comparing yourself with others.
Maturity is when you are at peace with yourself.
Maturity is when you can differentiate between "need" and "want, and you can let go of your wants.
Maturity is when you stop attaching "happiness" to material things.
Be simple.. Be positive..Be relax.. Show Maturity
Dushyant kumar
नज़र-नवाज़ नजारा बदल न जाए कही
जरा-सी बात है मुह से निकल न जाए कही
वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है
मेरे बयान को बंदिश न लग जाये कही
यो मुझको खुद पे बहुत एतबार है लेकिन
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कही
चले हवा तो किवाडो की बंद कर लेना
ये गर्म राख शरारो में ढल न जाए कही
तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कही
कभी मचान पे चढ़ने की आरजू उभरी
कभी ये डर की सीढ़ी फिसल न जाए कही
ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है
चलो, यहाँ से चले, हाथ जल न जाए कही
~ दुष्यंत कुमार
मायने
नज़र-नवाज=आँखों को आनंद देने वाली चीज,
बंदिश=रोक,
शरारे=चिंगारिया
धर्म
तेज़ी से एक दर्द
मन में जागा
मैंने पी लिया,
छोटी सी एक ख़ुशी
अधरों में आई
मैंने उसको फैला दिया,
मुझको सन्तोष हुआ
और लगा –
हर छोटे को
बड़ा करना धर्म है ।
दुष्यंत कुमार
इन रास्तों के नाम लिखो एक शाम और।
या इनमें करो रौशनी का इंतज़ाम और। ।
आंधी में सिर्फ हम ही उखड़कर नहीँ गिरे।
हम से जुड़ा हुआ था कोई एक नाम और।।
दुष्यन्त कुमार जी।
ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
पर पाँवों किसी तरह से राहों पे तो आए
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए
जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए
चट्टानों से पाँवों को बचा कर नहीं चलते
सहमे हुए पाँवों से लिपट जाते हैं साए
यों पहले भी अपना—सा यहाँ कुछ तो नहीं था
अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए.
~दुष्यंत कुमार
संग्रह: साये में धूप
: होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्दे की कोशिश तो तो देखिए ।
गूँगे निकल पड़े हैं जुबाँ की तलाश में ,
सरकार के ख़िलाफ़ ये साजिश तो देखिए ।
बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन ,
सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए ।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए ।
जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ ,
इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए ।
~ दुष्यंत कुमार
मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।।
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है।
हर किसी का पाँव घुटनो तक सना है।।
दुष्यंत जी
: अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार
दुष्यंत कुमार
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं।
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो।
ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।।
दुष्यंत जी।
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीँ।
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।
दुष्यंत जी।
: एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है
एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है
मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है
: चीथड़ों में वो मिला था कल मुझे फूटपाथ पर।
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।।
दुष्यंत जी।
: खण्डहर बचे हुए हैं इमारत नहीं रही।
अच्छा हुआ के सर पे कोई छत नहीं रही।
हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया।
हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही।
दुष्यंत कुमार
: जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए
चट्टानों से पाँवों को बचा कर नहीं चलते
सहमे हुए पाँवों से लिपट जाते हैं साए
यों पहले भी अपना—सा यहाँ कुछ तो नहीं था
अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए.
~दुष्यंत कुमार
संग्रह: साये में धूप
बगीचा......
कहाँ तो तय था चरागाँ हर घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं सहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो कमीज तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हंसी नजारा तो है नजर के लिए
वो मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए
तेरी निजाम है , सिल दे जबाने़ शायर को
ये ऐहतियात जरूरी है इस बहर के लिए
जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए.....
दुष्यंत
पटेल आरक्षण
आरक्षण का विकल्प और वोटबैंक की राजनीति!
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0पटेल आंदोलन जातियों के टकराव की वजह न बन जाये!
पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आज गुजरात में आंदोलन चल रहा है लेकिन इसका बिना सोचे समझे राजनीतिक कारणों और पीएम मोदी को सबक सिखाने की नीयत से ध्ूार्ततापूर्ण समर्थन करने वाले बिहार के सीएम नीतीश कुमार और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भूल रहे हैं कि ऐसा ही आंदोलन धीरे धीरे उनके राज्यों में भी अन्य उच्च जातियां शुरू कर सकती हैं तब उनके सामने बचाव का कोई रास्ता नहीं होगा। इस मामले में जनता दल यू के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने परिपक्वता का परिचय दिया है। उनका कहना है कि आरक्षण पिछड़ों और दलितों को जिस आधार पर दिया गया है उसका संविधान में बाकायदा प्रावधान है। कौन सी जातियां पिछड़ी हैं इसको तय करने के लिये एक आयोग बना हुआ है। यूपीए सरकार ने जाते जाते राजनीतिक चाल के तौर पर जाटों को आरक्षण दिया था जबकि इसके लिये पिछड़ा वर्ग आयोग ने जाटों को पिछड़ा वर्ग की कसौटी पर खरा नहीं माना था।
इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार के इस बेतुके फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया। ऐसा ही महाराष्ट्र में मराठों के साथ होने जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर कल तक आरक्षण का विरोध करने वाली उच्च जातियां क्यों खुद को पिछड़ा घाषित कर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में कम योग्यता पर प्रवेश का लाभ लेना चाहती हैं? सच यह है कि उच्च जातियों में भी मुट्ठीभर लोग ही सम्पन्न और विकसित हो सके हैं। उनका बड़ा वर्ग भी अन्य पिछड़ी, अनुसूचित जातियों और आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की तरह ही गरीब और बेरोज़गार है। सरकारी आंकड़ें बार बार चीख़ चीख़ कर बता रहे हैं कि देश के 80 प्रतिशत लोग 20 रू0 रोज़ पर गुज़ारा करने के लिये अभिषप्त है तो सोचने की बात है कि ये 80 फीसदी लोग केवल पिछड़े और दलित व मुस्लिम ही तो नहीं हो सकते।
इनमें उच्च जातियों का भी एक बड़ा वर्ग मौजूद है। एक अच्छी और आदर्श व्यवस्था में सभी को अपनी बुनियादी जीवन यापन की सुविधायें मिलनी चाहियें लेकिन हमारे नेताओं ने जो विकास का मॉडल अपनाया है वह हमारी ज़रूरतों के अनुकूल नहीं है। परिणाम सामने है कि सन 2000 में जहां देश के एक प्रतिशत नागरिकों के पास देश की कुल सम्पत्ति का 37 प्रतिशत हिस्सा था वहीं आज यह बढ़ते बढ़ते 2014 में 49 प्रतिशत पहुंच गया है। इसका मतलब यह है कि देश की आधी सम्पत्ति देश के केवल सवा करोड़ लोगों के पास है और बाकी आधी सम्पत्ति में देश के 124 करोड़ लोग गुज़ारा कर रहे हैं। अगर आंकड़ों को और खंगाला जाये तो पता चलेगा कि देश के सबसे गरीब 10 प्रतिशत लोगों की आय में देश के सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों के मुकाबले जो अंतर सन 2000 में 1840 गुना का था वह आज बढ़ते बढ़ते 2450 गुना हो गया है।
गांधी जी का हमेशा कहना था कि यह अंतर 10 गुना से अधिक नहीं होना चाहिये वर्ना निचले वर्गों में असंतोष और विरोध पैदा होना शुरू हो जायेगा। पटेल आंदोलन देश की शांति और सौहार्द के लिये आगे चलकर जातियों के टकराव की आशंका से गंभीर चुनौती बन सकता है लेकिन हमारे राजनेता वोटबैंक की ओछी सियासत से बाज़ नहीं आ रहे और इस आंदोलन को गुजरात के विकास मॉडल की हवा निकलना बताकर आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। उनसे पूछा जाना चाहिये जब यूपी में जाट आरक्षण के लिये आंदोलन करते हैं और राजस्थान में गूजर रेल रोकते हैं तब यह कौन सा विकास मॉडल चौपट होता है? जब मराठे आरक्षण के लिये सड़कों पर उतर आयेंगे और पटेल जाट गूजर व मराठों को देखकर उूंची जातियां सभी प्रदेशों में आरक्षण को उतावली होकर अराजकता फैलाने लगेंगी तब यह किस किस विकास मॉडल की नाकामी होगी?
सच यह है कि यह एक अनार सौ बीमार वाली कहानी है। सरकारी नौकरियां दिन ब दिन कम होती जा रही हैं लेकिन भ्रष्टाचार और अंग्रेजी हनक के चलते आज भी युवा उससे ज्यादा वेतन की प्राइवेट नौकरी छोड़कर सरकारी सेवा के पीछे भाग रहा है। इसमें जाकर उसका मकसद जनता की सेवा करना नहीं बल्कि बेतहाशा दौलत रिश्वत व कमीशन में कमाना और लोगों पर रौब गांठना भी होता है। अब उच्च जातियों के युवाओं को यह बात भी चुभने लगी है कि उससे कम योग्य दूसरी जाति का युवा कल जब आरक्षण की बदौलत अफसर बनकर आता है तो उनको व्यापारी या उद्योगपति के तौर पर उनसे अमीर होने के बाद भी उनकी जीहुजूरी और सम्मान करना पड़ता है। आज मामूली सरकारी नौकरी चाहे वो प्राइमरी के टीचर और डीएम के चपरासी की ही हो समाज में सम्मान और कमाई के हिसाब से देखा जाये तो अच्छी खासी कंपनी से भी बढ़कर है।
गुजरात में पटेल समाज यह भी देख रहा है कि बीजेपी और मोदी को शीर्ष पर पहंुचाकर कांग्रेस जैसे सेकुलर दलों और मुसलमानों को हिंदुत्व के एजेंडे से सबक सिखाकर उनको क्या मिला? अब पटेल जैसे उच्च वर्ग के वो लोग खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं जिनको यह लगता था कि वे संघ परिवार के एजेंडे पर चलकर प्रगति कर सकते हैं। वे देख रहे हैं कि जीडीपी शेयर मार्केट और विदेशी निवेश के भारी भरकम बड़े सरकारी दावों से उनके हिस्से में कुछ भी खास नहीं आया है। वे यह भी जानते हैं कि आज जिन जातियों को आरक्षण के दायरे में रखा गया है वे 52 प्रतिशत पिछड़े 22.5 प्रतिशत दलित और कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत मुस्लिम मिलाकर लगभग 85 प्रतिशत हो जाते हैं। अभी जातिगत जनगणना के आंकड़े आये नहीं हैं जिस दिन वे सार्वजनिक हो जायेेंगे ये जातियां आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत हटाकर वास्तविक आबादी के अनुपात में आरक्षण मांगेगी।
यही वजह है कि देश में वोटबैंक की राजनीति के चलते आरक्षण ख़त्म करना तो दूर कोई उच्च जाति का नेता भी इसके विकल्प पर विचार करने का बयान तक देने से डर रहा है। यही वजह है कि पटेल और जाट भी इसे ख़त्म करना असंभव मानकर इसी में घुसकर इसमें अपना हिस्सा बांटना चाहते हैं लेकिन ऐसा आरक्षित जातियां किसी कीमत पर होने नहीं देंगी जिससे इसका हल यही है कि सरकार सर्वसमावेशी विकास की तरफ बढ़ते हुए लोगों के बीच आय में लगातार बढ़ रही खाई को कम करने का प्रयास शुरू करे और सबके लिये मनरेगा तरह 100 दिन नही ंसाल के 365 दिन रोज़गार की गारंटी करे नहीं तो पटेल आंदोलन तो मात्र बानगी है आगे लोगों को मंदिर मस्जिद या भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर लड़ाना और अपना एजेंडा आगे बढ़ाना कठिन होने जा रहा है।
0ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा कांटोंभरा बिस्तर नहीं देखा।।