Saturday, 26 March 2022
कांग्रेस और भाजपा
भाजपा और मुसलमान
Sunday, 13 March 2022
2022 की जीत
मायावती और मुसलमान
बहनजी मुसलमानों की नहीं बसपा चिंता करें!
0बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि मुसलमानों ने बसपा को वोट नहीं दिया। क्या मुसलमानों ने उनसे वादा किया था? जिससे उनका काफी कोर वोट दलित भी सपा को सत्ता में आने से रोकने के लिये भाजपा में चला गया। उनका यह भी दावा है कि केवल बीएसपी ही बीजेपी को सरकार बनाने से रोक सकती थी। उनको यह भी पता चल गया कि उनको मीडिया ने भाजपा की बी टीम बताकर बदनाम किया है। हैरत की बात यह है कि बहनजी जितनी चिंता मुसलमानों की भाजपा के राज में कर रही हैं उतनी दलितों की नहीं कर रही कि उनका क्या होगा? वे अपने सबसे खास सतीश मिश्रा से बृहम्ण वोट का भी हिसाब नहीं मांग रहीं हैं? यह भी नहीं बता रहीं कि जो टिकट उन्होंने दलित वोटबैंक के एवज़ में बेचे उनके पैसे वापस होंगे या नहीं?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
आम भारतीयों की एक मिसाल है घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। इसमें संशोधन कर अम्मा की जगह बहनजी भी किया जा सकता है। सबको पता है कि बसपा में टिकट करोड़ों में बिकता है। इसको आप जबरन पार्टी चंदा भी कह सकते हैं। जबकि इसके विपरीत अन्य दल अपने प्रत्याशियों को टिकट के साथ चुनाव ठीक से लड़ने को लाखों रूपया पार्टी फंड भी देते हैं। हमने इस बारे में पता किया तो कई बसपा प्रत्याशियों ने करोड़ों में टिकट खरीदने का यह कारण बताया कि इससे उनको बसपा का एकमुश्त दलित वोट बैंक बोनस के तौर मिल जाता है। लेकिन इस बार जिस तरह से खदु दलित वोट का बड़ा हिस्सा बसपा को छोड़ अपनी विरोधी समझी जाने वाली भाजपा में चला गया। उससे यह मिथक भी टूट गया है। कायदे से तो बहनजी को उन 402 प्रत्याशियों के टिकट के पैसे वापस करने चाहिये। जिनको वे अपने दलित वोट भी नहीं दिला सकीं हैं। भविष्य में बसपा के टिकट के खरीदार काफी कम हो जायेंगे। वैसे भी यह दुकानदारी उन कर्मठ और गरीब बसपा कार्यकर्ताओं व नेताओं के खिलाफ थी जो लंबे समय से बसपा में काम करने के बावजूद टिकट नहीं खरीद पाते थे। बहनजी का यह भी कहना है कि मीडिया ने उनको भाजपा की बी टीम बताकर बदनाम कर दिया। क्या वास्तव में ऐसा नहीं है? बहनजी को जवाब देना चाहिये कि जब सब विपक्षी दलों के बड़े बड़े नेता मोदी सरकार और राज्य की भाजपा सरकारों की जांच की आंच झेल रहे हैं तो औवेसी और वे ही इस तरह की छापेमारी और जेल से कैसे बचे हुए हैं? जबकि उनके खिलाफ तो गंभीर घोटालों के आरोप व केस हैं। बहनजी को यह भी बताना चाहिये कि जब मान्यवर कांशीराम ने पहली बार मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और साझा सरकार बनी तो सपा से आधी सीटें होते हुए भी उन्होंने सपा से धोखा करते हुए मुलायम सरकार से समर्थन वापस लेकर भाजपा के साथ मिलकर चोर दरवाजे से सरकार क्यों बनाई? इतना ही नहीं इसके बाद दो दो बार वे भाजपा के समर्थन से सीएम क्यों बनीं? उनके कानूनी सलाहकर सतीश मिश्रा ने बेशक उनकी पैरवी कर उनको जेल जाने से बचाया लेकिन उनकी आत्मघाती सलाह पर बहनजी ने उन ही बृहम्णों के लिये बसपा के दरवाजे क्यों खोले जिनको दलित अपना सबसे बड़ा विरोधी मानता है? जिस बसपा को मान्यवर कांशीराम ने लंबा संघर्ष करके डीएस 4 और बामसेफ के द्वारा राजनीति में स्थापित किया था। उनके मिशन में साथ चलने वाले पुराने नेताओं स्वामी प्रसाद मौर्य लालजी वर्मा व राम अचल राजभर जैसे ज़मीन से जुड़े पुराने दो दर्जन दलित और पिछड़े नेताओं को बाहर का रास्ता क्यों दिखाया? ऐसे ही पूर्व शिक्षा मंत्री शाकिर अली से लेकर नसीमुद्दीन सिद्दीकी तक एक दर्जन बड़े मुस्लिम नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनते ही पार्टी से बाहर क्योें किया गया? इतना ही जि़ला बिजनौर में ही बसपा की स्थापना से जुड़े शेख सुलेमान पप्पू और जावेद आफताब एडवोकेट जैसे पुराने नेताओं को बसपा से बाहर जाने को मजबूर किसने किया? पिछले लोकसभा चुनाव में सपा बसपा का गठबंधन हुआ। बसपा को सपा का वोट ट्रांस्फर हुआ जिससे वह शून्य से 10 सीट पर पहुंच गयी। लेकिन दलित वोट सपा में ना जाने से वह एक भी नया एमपी नहीं जिता सकी। फिर भी बहनजी ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की कहावत याद दिलाते हुए गठबंधन किसके दबाव में तोड़ा? बहनजी ने न केवल बार बार बयान दिया कि हमारी बड़ी दुश्मन भाजपा नहीं सपा है बल्कि सपा के मुसलमाना के सामने मुसलमान और यादव के सामने यादव प्रत्याशी जानबूझकर इस रण्नीति के तहत उतारे जिससे पिछले चुनाव की तरह इनके वोट बंट जायें और भाजपा आराम से जीत जाये? बसपा के प्रोग्राम में आप सलाम या नमस्ते भी नहीं कर सकते, आपको जयभीम का अभिवादन की करना होगा तो मुसलमान या सवर्ण व पिछड़े आपकी गुलामी क्यों स्वीकार करें? बसपा के हर बैनर पोस्टर और बोर्ड पर दलित महापुरूष अंबेडकर नारायण गुरू ज्योति बा फुले और कांशीराम का नाम व फोटो आपको लगानी ज़रूरी है लेकिन अन्य समाज के महापुरूषों का उल्लेख नहीं होगा, क्यों? ऐसे ही बसपा के राज में बहनजी ने कई जिलों के नाम बदलकर गौतमबुध्द नगर और ज्योति बा फुले नगर तो किये लेकिन इनमें से कोई भी मुस्लिम पिछड़ा या दलित के नाम पर नहीं रखा। बहनजी को वोट और टिकट बेचने को नोट सबसे चाहिये। लेकिन काम व नाम केवल दलितों के होंगे। इतना ही नहीं बहनजी ने कई बार मुसलमानों पर खुलेआम आरोप लगया कि उनका एक प्रत्याशी मेरठ में कट्टरपंथी था तो उसको बसपा का टिकट देकर दलित समाज का वोट भाजपा को दिलाकर उसको हरवा दिया? बहनजी को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि वे अगर भाजपा की बी टीम नहीं हैं तो पूरे चुनाव मंे चुपचाप अपने घर में छिपकर क्यों बैठी रहीं? क्या यह चर्चा सही है कि वे अंदरखाने भाजपा से गुप्त समझौता कर चुकी हैं जिससे भविष्य में उनको भाजपा सरकार न केवल अभयदान जारी रखेगी बल्कि कोई बड़ा पद भी दे सकती है? बहनजी अपनी कमियां नालायकी और गलत नीतियां छिपाकर जिस तरह से मुसलमानों को टारगेट कर रही हैं। उससे मुसलमानों का नहीं बसपा और दलितों का अधिक नुकसान होगा। जहां तक दलितों के साथ मुसलमानों के मिलकर भाजपा को हराने का सवाल है। वह इसलिये व्यवहारिक नहीं रह गया कि मुसलमानों का भरोसा बहनजी पर नहीं है। इतना ही नहीं पहले तो उनको शक था लेकिन इस चुनाव से उनको पूरा यकीन हो गया है कि बसपा भाजपा की बी टीम ही है। बहनजी को यह नहीं मालूम यह उनका आखि़री चुनाव था। जिस तरह से महाराष्ट्र में अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी खत्म हो गयी उसी तरह से यूपी से बसपा गायब हो रही है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है। वे भाजपा राज में जीना सीख रहे हैं। उनको भी विभिन्न सरकारी स्कीमों का लाभ बराबर नहीं उनकी आबादी से अधिक मिल रहा है। लाॅ एंड आॅर्डर की सख़्ती से भी अधिकांश मुसलमानों को कोई शिकायत नहीं है। यही वजह है कि उनका कुछ वोट भी दलितों की तरह भाजपा को जा रहा है। रही बात पक्षपात अन्याय और अत्याचार की वो उनपर दलितों की तरह पहले भी होता था। अब भी कम अधिक हो रहा है। बहनजी दलितों और अपनी बसपा की चिंता करें उनका क्या होगा???
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Saturday, 19 February 2022
योगी बनाम अखिलेश
0यूपी में चुनाव से एक माह पहले ऐसा लग रहा था कि भाजपा सरकार एक बार फिर आराम से जीतकर वापस आ जायेगी। फिर चुनाव पास आते आते यह लगा कि अगर 19 प्रतिशत मुसलमान और 21 प्रतिशत दलित एक साथ बसपा के साथ आये तो उनके साथ योगी सरकार से विभिन्न कारणों से नाराज़ अन्य 5 से 10 परसेंट अन्य हिंदू जुड़ने से मायावती योगी के सामने बड़ी चुनौती बन सकती हैं। लेकिन चुनाव का पहला चरण आते आते तस्वीर यह बनी कि यूपी में अचानक 10 से 11 परसेंट यादव वोटबैंक वाली सपा भाजपा के सीधे मुकाबले में आकर खड़ी हो गयी। इसकी वजह यह रही कि संघ परिवार के मीडिया ने सोची समझी रण्नीति से जानबूझकर यह कमज़ोर समीकरण खड़ा करना चाहा था लेकिन मुसलमानों किसानों व जाटों ने इसे पलट दिया है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 39.67 सपा को 21.82 तो बसपा को 22.23 परसेंट वोट मिले थे। दिलचस्प बात यह थी कि 2012 2014 2017 और 2019 के चार चुनाव एक के बाद एक बुरी तरह हारने के बावजूद बसपा के साथ उसका दलित और उसमें भी जाटव वोट पूरी तरह उसका कोर वोटबैंक बना हुआ था। उधर सपा का यादव वोट जो पहले ही दलित वोटबैंक का आधा था। उसका काफी बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ चले जाने का अनुमान लगाया जा रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कि जिस पश्चिमी यूपी में यादव जाति का वोट ना के बराबर है। वहां सपा केवल मुसलमान वोट के सहारे चुनाव मैदान में उतरती थी। आपको यह जानकर हैरत होगी कि 2017 के चुनाव में सपा यूपी की 400 में से आधी से कम यानी 150 सीटों पर ही भाजपा से सीधे लड़ रही थी। इसकी वजह यह थी कि उसने गठबंधन में 100 से अधिक सीटें कांग्रेस को दी थी। जिनमें से वो 6.3 परसंेट वोट के साथ मात्र 7 सीटें जीत सकी थी। ऐसे ही बसपा ने जिन 100 सीटों पर अपने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। उनमें से मात्र 5 उम्मीदवार ही जीते थे। इसकी वजह यह थी कि जिन मुस्लिम बहुल सीटों पर सपा के पास मुस्लिम वोट के अलावा भाजपा की हिंदू लहर के जवाब में कोई दूसरा वोट पहले ही मौजूद नहीं था। उन पर बसपा के 100 मुस्लिम उम्मीदवारों के द्वारा काफी अच्छी तादाद में मुस्लिम वोट बांटने के बावजूद खुद हारने और सपा के अपने विरोधी उम्मीदवार को पूरा मुस्लिम वोट ना लेने देकर उसको भी हरा देने से चमत्कारिक तौर पर भाजपा की बल्ले बल्ले हो गयी। ऐसे ही पूर्वांचल की 50 से अधिक सीटों पर शिवपाल यादव की प्रसपा ने अधिकांश यादव प्रत्याशी उतारकर सपा के लिये हम तो डूबंेगे सनम तुम को भी ले डूबेंगे की कहावत लागू कर दी थी। हालांकि अपवाद के तौर पर जिन सीटों पर सपा बसपा के सवर्ण उम्मीदवार थे। उनमें से कुछ के अपनी अपनी जाति के वोटबैंक को अपने साथ काफी हद तक ले आने और उधर मुसलमान या दलित वोट एकमुश्त मिल जाने से वे कुछ सीटों पर भाजपा पर भारी पड़ गये थे। लेकिन उस चुनाव में पीएम मोदी द्वारा कब्रिस्तान शमशान कैराना पलायन मुज़फ्फरनगर दंगे और ईद दिवाली पर बिजली बराबर ना आने के झूठे आरोपों से चुनाव का इतना अधिक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो गया था कि भाजपा के अलावा अन्य सभी दल हिंदू विरोधी से नज़र आने लगे थे। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा के सवर्ण हिंदू वोट बैंक में बड़ी संख्या में गैर यादव पिछड़ी जातियां गैर जाटव दलित जातियां भी जुड़ने से उसका वोट दोगुना होकर लगभग सपा बसपा के वोट के बराबर हो गया। 2017 के चुनाव परिणाम आने के बाद मुसलमानों को यह लगा कि उन्होंने भाजपा को हराने के एक सूत्री प्रोग्राम के चलते सपा और बसपा के मज़बूत उम्मीदवारों को जिताने के चक्कर में अपना वोट बांटकर उल्टा भाजपा का ही भला कर दिया है। दूसरी तरफ चुनाव बाद जिस तरह से मायावती ने मुसलमानों को बुरा भला कहा और एक के बाद एक विवादित बयान दिये। उससे भी मुसलमानों को समझ आने लगा कि बहनजी का रूख़ सपा की बजाये भाजपा के प्रति नरम है। इतना ही नहीं मायावती ने 2019 के लोकसभा चुनाव में शून्य से 10 सीट पर पहुंचकर भी सपा पर झूठा आरोप लगाया कि उसकी वजह से बसपा को नुकसान हुआ। जबकि सच यह था कि सपा को दलित वोट ट्रांस्फर ना होने से एक भी सीट का लाभ नहीं हुआ था। मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ते हुए यह भी नहीं सोचा कि सपा का मुस्लिम वोट जो उसको मिला है। अगर वह विधानसभा चुनाव में भी साथ रहेगी तो गारंटी से दलित मुस्लिम व कुछ अन्य वोट लेकर सपा से भी अधिक विधयक जिता सकती हैं। ऐसे में यह शक विश्वास में बदलने लगा कि बहनजी के तार कहीं और जुड़े हैं। खासतौर पर मुसलमानों को लगने लगा कि घोटालों की जांच होने पर लालू यादव की तरह बहनजी जेल जाने से डरकर भाजपा के इशारे पर ऐसी चालाकी से सियासत कर रही हैं। जिससे मुसलमान वोट बंट जाये और उसका नुकसान सपा को तो लाभ भाजपा को हो? ऐसे में इस बार मुसलमान ने 2017 की ज़बरदस्त हार से सबक सीखते हुए यह तय किया कि चाहे सपा हारे या जीते लेकिन वह सपा गठबंधन के साथ ही रहेगा। उसने उन सीटोें पर भी बसपा और उसके मुस्लिम उम्मीदवारों को नकार दिया जो मुसलमानों का आधे से कम वोट लेकर ही गारंटी से जीत सकते थे। इसके साथ किसान आंदोलन ने खासतौर पर जाटों को भाजपा के खिलाफ मोेर्चा खोलकर सपा के साथ लोकदल के गठबंधन से सपोर्ट करने से कुछ अन्य पिछड़ी जातियों को भी योगी सरकार के खिलापफ एकजुट कर दिया। जाट एक ऐसी शक्तिशाली जाति है। जिसके सपा के साथ आने से कुछ अन्य जातियां भी योगी सरकार से जो पहले से खफा चल रही थीं, गोलबंद होने लगीं। जिसमें राजभर मौर्य और सैनी आदि शामिल हैं। कोरोना के दौरान जिस तरह से योगी सरकार ने तानाशाही दिखाई और महंगाई व बेरोज़गारी आवारा पशुओं के कारण लोग लगातार परेशान होते गये उससे धीरे धीरे यूपी में मुख्य विरोधी दल सपा बनती गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि सपा गठबंधन अब तक हुए चुनावी चरणों में काफी आगे चलते हुए भाजपा को बाकी चुनाव मंे भी कांटे की टक्कर देता नज़र आ रहा है।