Wednesday, 27 February 2019

Record data

"आरक्षण विरोधी अक्सर एक सवाल करते हैं कि हमारे पूर्वजों के कर्मों की सज़ा हमें क्यों मिल रही है ? आखिर हमारा क्या गुनाह है ? शोषण हमारे पूर्वजों ने किया फिर हमें आरक्षण के रूप में सज़ा क्यों मिल रही है.

इसका जवाब बिल्कुल आसान है.

आपके पूर्वजों ने जो शोषण किया उसका असर अभी तक मौजूद है. आपके पूर्वजों ने शूद्रों पर शिक्षा के लिए प्रतिबंध लगाए , उनके पेशे पर प्रतिबंध लगाए , उनके धार्मिक सामाजिक जीवन पर प्रतिबंध लगाए और उन्हें शैक्षिक , सांस्कृतिक और सामाजिक तौर पर हीन बनाये रखा. यह प्रतिबंध सिर्फ कुछ सालों या दशकों तक नहीं था. यह प्रतिबंध हज़ारों साल तक रहा. उत्तर वैदिक से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक का अंतराल करीब तीन हज़ार साल का है. आपके पूर्वजों ने लगभग तीन हज़ार साल तक इस देश की बहुसंख्य आबादी का शोषण किया.

इसका परिणाम क्या हुआ ?

इसका परिणाम ये हुआ कि आज़ादी के बाद शूद्रों का शिक्षा , नौकरी और राजनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व नगण्य था. इन सभी क्षेत्रों में पूरी तरह से शोषक जातियों का कब्ज़ा था. उनके पास वो तमाम संसाधन और अवसर थे जो शूद्रों का शोषण कर हासिल किए गए थे. यह उनके हज़ारों साल के शोषण का ही असर है कि उक्त क्षेत्रों में शोषक जातियों का वर्चस्व आज भी कायम है.

ऐसा नहीं है कि भारत के आज़ाद होते ही या आरक्षण लागू होने की तिथि से ही हज़ारों साल में हुए नुकसान की भरपाई हो गयी या घोषणा के दिन से ही पूर्व में हुए शोषण का असर और उस समय हो रहा शोषण फौरन खत्म हो गया.

वहीं दूसरी तरफ आज़ादी के बाद शोषक जातियों का देश की संपत्ति , शिक्षा , संस्कृति , राजनीति , सामाजिक जीवन आदि सभी क्षेत्रों में वर्चस्व बरकरार था. उनके शोषण के चलते समाज अपने मूल में गैर समतामूलक , भेदभावपूर्ण और शोषक जातियों के अवैध वर्चस्व के अधीन था. वो पहले की तरह ही सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर श्रेष्ठ बने हुए थे.

अपने पूर्वजों के शोषण के ये लाभ उन्हें पहले की तरह आज भी मिल रहे हैं. ऐसा नहीं है कि आज़ादी या आरक्षण लागू होने के बाद एक झटके में सब खत्म हो गया. अपने शोषक पूर्वजों के चलते ही चाहे संपत्ति हो , शिक्षा हो , राजनीति हो , न्यायपालिका , मीडिया या सामाजिक पदानुक्रम हो , सब जगह यही श्रेष्ठ बने हुए हैं और सब जगह इन्हीं का वर्चस्व है.

ऐसे में जब शोषण का असर और इस शोषण के कारण शोषक जातियों को मिलने वाला लाभ आज भी बरकरार है तो ज़ाहिर है दोनों को समाप्त करने की प्रक्रिया भी अभी जारी रहना जरूरी है.

यह तब तक जारी रहेगी जब तक समाज पूरी तरह विविधतापूर्ण , न्यायसंगत और समतामूलक नहीं बन जाता है.

आरक्षण , प्रतिनिधित्व के माध्यम से समाज को इसी दिशा में आगे ले जा रहा है. यह शोषक जातियों के अवैध और अन्यायपूर्ण वर्चस्व को समाप्त कर वंचित वर्गों को शिक्षा , सरकारी नौकरियों और राजनीति में प्रतिनिधित्व दे रहा है जिससे भारत पहले से अधिक विविधतापूर्ण , न्यायसंगत और समतामूलक बन रहा है. यह देश के विकास में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित कर रहा है.

यह किसी को सज़ा नहीं दे रहा है बल्कि उन्हें न्याय दे रहा है जिनके साथ अन्याय करने वाली शोषक जाति से होने के कारण आज आप उनसे बेहतर स्थिति में हैं. यह किसी एक की बेहतर स्थिति का निषेध कर शोषित जातियों को आपके समान ही बेहतर स्थिति में ला रहा है. यह समाज में व्याप्त असंतुलन और विशेषाधिकार को समाप्त कर समानता और संतुलन की स्थिति स्थापित कर रहा है. यह कुछ जातियों के वर्चस्व वाले देश की बजाय सबकी भागीदारी वाला राष्ट्र निर्मित कर रहा है.

किसी को आरक्षण सज़ा या अन्यायपूर्ण लगता है तो इसका मतलब साफ है कि वह वर्चस्ववादी और असमानता का पैरोकार है. वह इस देश के समस्त संसाधनों को अपनी जागीर समझता है. वह नहीं चाहता कि उसमें सबकी हिस्सेदारी हो. वह नहीं चाहता कि देश के विकास में सबकी भागीदारी सुनिश्चित हो. वह अपने जैसे जातिगत प्रिविलेज वाले लोगों से प्रतिस्पर्धा करने में डरता है. वह इस बात से हतोत्साहित रहता है कि वह अपनी जाति वालों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है. उसे देश के इतिहास , समाज और न्याय , समानता व डाइवर्सिटी जैसी अवधारणों की कोई समझ नहीं है.

कभी कोई ऐसा सवाल करने वाला मिले तो चुप मत रहिये. उसे डिटेल में और कायदे से समझाइये...."
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@ Pradyumna Yadav
via - प्रमोद कुमार

Monday, 4 February 2019

हमारे बाबूजी....

जब हमारे बाबूजी ने मायावती की सलाह ठुकरा दी...!

0 1985 के आसपास की बात है। बसपा सुप्रीमो यूपी के बिजनौर ज़िले के नजीबाबाद में राजनीति की शुरूआत कर रही थीं। वे हमारे मौसा जी अब्दुल रहीम दूधवालों के घर पर अकसर आती थीं। हमारे बाबूजी यानी पिताजी और मौसा जी आपस में पक्के दोस्त भी थे। लिहाज़ा बहनजी हमारे घर भी कई बार मीटिंग करती थीं। एक बार बहनजी ने हमारे बाबूजी से कहा अपने बेटे से कहो वो मनुवादी मीडिया यानी अख़बारों से दूर रहेलेकिन हमारे बाबूजी ने मायावती की सलाह ठुकरा दी थी।       

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   हमारे बाबूजी यानी पिताजी मुहम्मद दाऊद मुल्तानी का 12 जनवरी को इंतक़ाल हो गया। वे 80 साल के थे। वे काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनको सांस की बीमारी थी। जो सर्दियों मेें और ज़्यादा बढ़ जाती थी। उनको और भी कई गंभीर रोग हो गये थे। इलाज के लिये उनको बिजनौर देहरादून और कई बड़े शहरों में ले जाया गया। लेकिन डाक्टरों ने उनको लाइलाज घोषित कर दिया था। वैसे तो सब बच्चो को उनके पिता अपनी हैसियत और हालात के हिसाब से प्यार करते ही हैं। लेकिन हमारे बाबूजी में कुछ खास बातें थीं।

जिनको हम आप सबके साथ शेयर करना चाहते हैं। जब वे 80 के दशक में बसपा के संस्थापक कांशीराम और मायावती के संपर्क में आये तो हम उनकी सियासी सोच से सहमत नहीं थे। हमारा कहना था कि कोई भी जातिवादी पार्टी अच्छा विकल्प नहीं बन सकती। हमने उनसे यह भी कहा कि बसपा अवसरवादी और केवल दलित हितवादी दल है। बसपा सत्ता पाने के लिये केवल मुसलमानों का खुद को सियासत में आगे बढ़ाने के लिये वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल भर करेगी। लेकिन उनका मानना था कि दलित हमारे देश में सबसे कमज़ोर समाज है।

वे यह भी कहते थे कि मुसलमानों की हालत भी कमोबेश दलितों की तरह हर क्षेत्र में पिछड़ी जैसी होती जा रही है। अगर दो कमज़ोर और पिछड़े वर्ग आपस में मिलकर आगे बढ़ंेगे तो अन्य पिछड़ा वर्ग के अति पिछड़े और उच्च जातियों के गरीब भी उनके साथ आ सकते हैं। इसलिये उन्होंने खुद और हमारे मौसा जी जिनको बहनजी ताऊजी कहती थींसाथ लेकर पूरी मुल्तानी बिरादरी और बिरादरी के असरदार नेता रोशन मुल्तानी सिराजुद्दीन मुल्तानी और शायर अख़्तर मुल्तानी आदि के साथ तन मन धन से बसपा के लिये काम किया।

इसका नतीजा यह हुआ कि पहली बार नजीबाबाद से बसपा का विधायक बल्देव सिंह को चुन लिया गया। इसके बाद बसपा और बहनजी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन जैसे ही बहनजी ने सपा बसपा गठबंधन तोड़ भाजपा के सहयोग से यूपी में सरकार बनाई। बाबूजी और हमारे मौसाजी का बहनजी की अवसरवादी सियासत से मोहभंग हो गया। हालांकि उन दोनों को भी बहनजी ने शपथग्रहण समारोह में लखनऊ बुलाया था। लेकिन मौसाजी तो वहां जाकर तीन दिन तक बहनजी से मुलाकात तक न होने से निराश हुए। बहनजी के आदेश पर वरिष्ठ बसपा नेता नसीमुद्दनी सिद्दीकी मौसाजी की आवभगत ही करते रहे।

उपेक्षा का आभास पहले ही हो जाने से हमारे बाबूजी लखनऊ गये ही नहीं। इसके बाद बहनजी ने कई बार बाबूजी और मौसाजी को याद किया । गैस कनेक्शन के कूपन भेजे। परिवार के बच्चो को सरकारी नौकरी दिलाने का नेताओं वाला झूठा वादा किया। लेकिन उनका तो बहनजी के साथ ही सियासत से भी पूरी तरह रिश्ता ख़त्म हो चुका था। हमारे बाबूजी ने बहनजी को कई बार यह भी याद दिलाया था कि जिस तरह से वे उनके बार बार जोर देने पर भी मुझे और मेरे छोटे भाई शमशाद मुल्तानी व नौशाद मुल्तानी को पत्रकारिता से अलग करने को तैयार नहीं थे।

उसी तरह मेरे बार बार अपील करने पर भी बिना अनुभव किये वे बहनजी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे। हमारे बाबूजी के कुछ उसूल थे। उन्होंने न तो जीवनभर कभी किसी से कोई रक़म किसी काम के लिये खुद उधार ली और न ही हमें लेने दी। वे मुल्तानी बिरादरी के सदर थे। मुल्तानी बिरादरी का नियम था कि कोई शादी में बैंडबाजा नहीं इस्तेमाल करेगा। उनके समझाने के बावजूद जब हमारे परिवार के कुछ लोगों ने उनको बिना बताये हमारी शादी में बैंड बजवाया तो उन्होंने नैतिकता के आधार पर बिरादरी के सदर पद से इस्तीफा दे दिया।

उनको सिनेमा देखने का भी शौक था। लेकिन एक बार जब उन्होंने देखा हम भी अपने दोस्तों के साथ सिनेमा हाल में फिल्म देखने गये हैं तो उन्होंने उस दिन के बाद सिनेमा हॉल का रूख़ नहीं किया। उन दिनों लड़कियों को शिक्षा दिलाने का दस्तूर नहीं था। लेकिन जब हम बड़े हुए और हमने उनको ऐसा करने के लिये समझाया तो वे राज़ी हो गये। इसका फायदा यह हुआ कि भाइयों के साथ साथ हमारी छोटी बहनों को भी स्कूल जाकर पढ़ने का मौका मिला। हालांकि हमारे परिवार की आर्थिक हालत बहुत मज़बूत नहीं थी। लेकिन हमारे ज़रूरी खर्च से लेकर शिक्षा तक का वे बखूबी इंतज़ाम तब तक करते रहे जब तक हमने पोस्ट ग्रेज्युएट तक की पढ़ाई पूरी नहीं कर ली। जो मकान उन्होंने खरीदा था। उसके मालिक बहुत गरीब और बूढ़े थे। उन्होंने उनको बिना किराये के उसी मकान में जीवनभर रहने की छूट दे दी। बाद में एक वकील के बहकावे में आकर मकान के पूर्व स्वामी ने खुद को मकान का असली मालिक बताते हुए हमारे बाबूजी के खिलाफ कोर्ट में केस कर दिया। हालांकि वो केस हम हाईकोर्ट से जीत गये लेकिन उनकी मानवता और रहमदिली देखिये कि वे जब नगीना या बिजनौर मुकदमे की तारीख पर जाते तो मकान के पूर्व स्वामी का किराया अपने पास से लगाते थे। केस की पैरवी के दौरान कभी कभी उनके पास पैसा न होने पर उनको अपने पास से खाना भी खिलाते थे।

अपने आधा दर्जन भाइयों में हालांकि वे तीन से छोटे थे। लेकिन परिवार की आर्थिक व्यवस्था शादी जायदाद की देखरेख और नये निर्माण का काम उनको ही सौंपा जाता था। जिसको वे बखूबी निभाते थे। कभी पक्षपात का आरोप या कोई विवाद नहीं हुआ। दादिलाही मकान छोटा पड़ता देख उन्होंने अपने बाकी 5 भाइयों के लिये अपना हिस्सा छोड़ दिया। अपने परिवार के लिये अपने हिस्से की दुकान की छत पर अलग मकान अपने खर्च पर बना कर तैयार कर लिया था। अपने सब बहन भाइयों की शादी कारोबार और मकान और दुकान आदि का इंतज़ाम कराने के बाद सबसे बाद में लगभग27 साल की उम्र में अपनी शादी की थी। उनके इस दुनिया से जाने के बाद हमें अहसास हो रहा है कि बच्चो के लिये बाबूजी का क्या मतलब होता है। हम उनकी मग़फ़िरत और जन्नतुल फिरदौस में जगह मिलने की दुआ करते हैं।             

0 वो एक शख़्स तुम्हें याद किया करता था,

  आज मसरूफ़ है बहुत उसे तुम याद करो।।     

सहयोग-नौशाद मुल्तानीशमशाद मुल्तानी  

Sunday, 20 January 2019

सवर्ण आरक्षण?

10 फीसदी रिज़र्वेशनः 90 फीसदी कन्फ़यूज़न!

सवर्णों को दिये जाने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण में मुसलमानों सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों को भी शामिल किया गया है। सवर्ण तो जब केवल जाति व्यवस्था के कारण हिंदुओं में होते हैं तो अन्य समुदायों को इसमें शामिल क्यों किया गया है? दूसरा सवाल यह है कि जब देश में ढाई लाख रू0 से अधिक आय वाले को अमीर मानकर इनकम टैक्स वसूला जाता है तो फिर इस नये आरक्षण में 8 लाख आय वाला तक गरीब कैसे हो गया? सबसे बड़ा मज़ाक यह कि देश में राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक 95 प्रतिशत आबादी की आय 8 लाख से अधिक हैै।

देश में 1000 वर्ग फुट से कम ज़मीन पर मकान वालों की तादाद 90 प्रतिशत है। साथ ही नये आरक्षण के तीसरे आधार यानी कृषि योग्य भूमि 5 एकड़ से कम देश के 87 प्रतिशत किसानों के पास खुद कृषि जनगणना के आंकड़े बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने यह नियम भी बनाया हुआ है कि जो कोई आरक्षण की किसी भी श्रेणी में आवेदन करेगा वो जनरल कोटे का लाभ नहीं ले सकता। इसका मतलब यह हुआ कि अगर ईमानदारी से भी आय प्रमाण पत्र बनवाये गये तो देश के 95 प्रतिशत परिवार इस 10 प्रतिशत नये आरक्षण में यह सोचकर आवेदन करेंगे कि उनका नंबर इसमें आसानी से आ जायेगा।

उधर पहले के 50 प्रतिशत आरक्षण में नया 10 प्रतिशत आरक्षण जोड़ने के बाद जो बाकी का 40 प्रतिशत जनरल कोटा बचेगा। वह केवल मोदी जी के सर्वाधिक अमीर मित्रों अंबानी अडानी और माल्या जैसे गिने चुने पूंजीपतियों के लिये सुरक्षित हो जायेगा। ज़ाहिर सी बात है कि जहां 10 प्रतिशत कोटे में अधिक संख्या में आवेदन आने से इसकी मैरिट बहुत ऊंची चली जायेगी। वहीं बाकी बचे जनरल कोटे में आवेदन करने वाले 5 प्रतिशत सर्वाधिक अमीरों के लिये यही मैरिट बहुत नीचे रहेगी। सवाल यह उठता है कि ऐसे में यह नया 10 प्रतिशत आरक्षण गरीब सवर्णों का नुकसान करेगा या फायदा?

सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह राम मंदिर के मुद्दे पर बार बार चुनाव जीतकर भाजपा चुनाव करीब आने पर ही राम मंदिर बनाने को उतावली दिखाती है। उसी तरह से सवर्ण आरक्षण चुनाव करीब आता देखकर ही क्यों दिया गया है? मोदी जी कांग्रेस और अन्य सेकुलर दलों को चुनाव नज़दीक आने पर तरह तरह के वादे करने पर बहुत कोसते रहे हैं। फिर खुद सवर्णों का वोट खिसकता देखकर चुनाव जीतने के लिये आरक्षण की चाल क्यों चल रहे हैं? इसका मतलब विपक्ष भी ऐसा करके सही ही करता रहा है?

सच यह भी है कि अभी तक अपराजेय लगने वाले मोदी राजस्थान छत्तीसगढ़ और एमपी के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार से घबरा गये हैं। साथ ही दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने वाले सबसे बड़े राज्य यूपी में लोकसभा के 3 उपचुनाव में करारी हार और इसी प्रयोग के सफल होने की वजह से महागठबंधन बना चुके सपा बसपा और लोकदल से भी भाजपा बौखला रही है। हाल ही में हारे तीन राज्यों में जहां भाजपा के पास लोकसभा की कुल 65 में से 62 सीटें थीं। वहीं यूपी में उसके पास 80 में से 73 सीटें थीं। कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस के गठबंधन से भाजपा के पांव तले की ज़मीन खिसक रही है।

बिहार जैसे बड़े राज्य में भी भाजपा गठबंधन की हालत विपक्षी महागठबंधन से कमज़ोर लग रही है। असम में उसका एक मात्र बड़ा घटक अगप उसको छोड़ गया है। आंध्रा में तेलगू देशम ने उसका साथ बहुत पहले छोड़ दिया था। जबकि महाराष्ट्र में शिवसेना उसको एनडीए में रहकर भी नाको चने चबवा रही है। भाजपा को इसके बावजूद नये घटक और नई लोकसभा सीटें मिलती नज़र नहीं आ रही है। लेकिन उसका कम से कम 50 से 100 सीटों का नुकसान का अंदेशा बढ़ता जा रहा है। यह ठीक है कि कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की हैसियत अभी भी भाजपा से काफी कमज़ोर है।

यह भी वास्तविकता है कि भाजपा बहुमत के लिये कम पड़ने पर 50 सीटें आराम से कारपोरेट मीडिया और आरएसएस के बल पर जुटा लेगी जबकि विपक्ष 25 सीटें भी ऐसे में जुटा पायेगा यह कहना बहुत ही मुश्किल होगा। भाजपा अपनी हालत पतली देखकर यूनिवर्सल बेसिक इनकम का ऐलान करने की भी सोच रही है। यह एक तरह से गेमचेंजर फैसला हो सकता है। मोदी सरकार किसानोें को भी हर फसल के हिसाब से एकमुश्त सहायता देने की योजना बना रही है।

लेकिन इन सब योजनाओें घोषणाओं और अन्य चुनावी चालों के बावजूद 2014 के मुकाबले इस बार मुसलमानों के साथ ही दलितों किसानों व्यापारियों नौजवानों और निष्पक्ष व उदार हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग मोदी सरकार को चुनावों में एक मौका और देने को तैयार नज़र नहीं आ रहा है। 10 फीसदी गरीब सवर्ण  आरक्षण अभी तो संविधान संशोधन करके लोकसभा राज्यसभा और राष्ट्रपति के अनुमोदन तक की बाधायें पार कर गया है। लेकिन संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने के बाद भी यह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने से नहीं रोका जा सकेगा।

साथ ही संविधान के मूल ढांचे में आरक्षण का आधार गरीबी न होने से यह कोर्ट में टिकना कठिन है। उधर अब तक आरक्षण का विरोध करने वाले सवर्णों को भी इस सवाल का जवाब देना होगा कि अब उनको यह मिलने से कैसे गैर बराबरी ख़त्म करेगा? साथ ही वे आरक्षण को अयोग्यता बढ़ाने वाला क़दम मानते थे तो इस नये आरक्षण को क्यों स्वीकार कर रहे हैं?

इसके साथ ही 50 प्रतिशत की सीमा हटने से भविष्य में जहां पिछड़ी जातियां अपना आरक्षण 27 प्रतिशत से बढ़ाकर अपनी जनसंख्या के हिसाब से लगभग 54 प्रतिश करने की मांग करेंगी तो उधर जाट पटेल मराठा मुसलमान और गूजर भी अपने अपने लिये आरक्षण के लिये पहले से अधिक उग्र व हिंसक होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। हमें तो लगता है कि इस चुनावी आरक्षण से सवर्णों को 10 प्रतिशत लाभ मिलने की बजाये 90 प्रतिशत कन्फ़यूज़न ही अधिक पैदा होगा।

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादान है।।

Friday, 18 January 2019

सूर्येमणि रघुवंशी जी की क़लम को सलाम

सूर्यमणि भाई आपका सम्मान और बढ़ा!

चिंगारी पश्चिमी यूपी का जाना पहचाना दैनिक अख़बार बन चुका है। इसके संपादक भाई सूर्यमणि रघुवंशी एक बेहतरीन पत्रकार के साथ ही एक उम्दाह इंसान भी हैं। आपकी क़लम आम आदमी के दुखदर्द उजागर करती है तो कभी कभी ज़ालिमों के खिलाफ़ शोले भी उगलती है। पिछले दिनों एक सप्ताह तक जब पिंटू भाई ने ‘सम्मान की चाह’ जैसे एक अलग विषय पर लगातार लिखा तो उनके पिता और हमारे गुरू मूर्धन्य राष्ट्रीय ख्याति के चिंतक विचारक और पत्रकार स्व. बाबूसिंह चौहान साहब के ललित निबंधों की याद ताज़ा हो गयी। आपका सम्मान हम सबकी नज़रों में पहले से और ज़्यादा बढ़ गया है।

भाई सूर्यमणि रघुवंशी जी ने जिस दिन पहली बार सम्मान की चाह पर लिखा, हमने सोचा उनके जे़हन में रूटीन में एक विचार आया होगा। जिस पर उन्होंने लीक से अलग हटकर अपने दिल की बात अग्रलेख में कह दी है। लेकिन जब पूरा संपादकीय पढ़ा तो पता लगा कि बात अभी बाकी है। जब दूसरे दिन फिर से इसी विषय पर पढ़ा तो लगा कि बात तो अभी बाकी रह गयी थी। लेकिन एडिटोरियल के अंत में उस दिन फिर लिखा था-जारी। तीसरे दिन जब सम्मान की चाह पर पढ़ा तो लगा कि पिंटू भाई ने तो कमाल ही कर दिया।
हमारे आसपास घूम रही उन घटनाओं सच्चाइयों और हकीकतों को शब्दों में एक के बाद एक फूल की तरह विचार की माला में पिरो दिया। इतना ही नहीं उनका एक वाक्य तो दिल को छू गया। ‘‘कितने ही सफेदपोश मिल जायेंगे जिन्हें हर सप्ताह कोई न कोई अवार्ड मिल ही जाता है। दूर दूर से अवार्ड कमा लाते हैं। जिन शहरों का नाम उन्होंने खुद नहीं सुना, वहां भी जाकर सम्मानित हो जाते हैं। अलबत्ता उनमें से कितने सम्मान ‘ससम्मान’ मिलते हैं, यह शोध का विषय है।
’’ साथ ही जिस तरह से भाईसाहब ने वास्तविक सम्मान के लिये नजीबाबाद के विधायक रहे कामरेड मास्टर रामस्वरूप को याद किया वहीं उलेढ़ा के निवासी संघ परिवार से जुड़े मानननीय अमर सिंह को पूर्व मंत्री के तौर पर सादगी के लिये नहीं भूले। संपादक जी ने बिजनौर की नई बस्ती से लेकर कई और क्षेत्रों की कई ऐसी महान हस्तियों की भी चर्चा सम्मान की चाह सिरीज़ में की जिन्होंने अपना सारा जीवन समाजसेवा के लिये समर्पित कर दिया। लेकिन कभी सम्मानित पुरस्कृत और लाभान्वित होने की इच्छा ज़ाहिर नहीं की। ऐसी ही कुछ शख़्सियत हमारे नजीबाबाद में और भी हुयीं हैं।
मिसाल के तौर पर उद्योगपति पूर्व चेयरमैन और समाजसेवी स्व. नरेशचंद अग्रवाल का नाम सादगी संवेदनशीलता और सम्मान की चाह के बिना खामोशी से जनसेवा के काम करते रहने के लिये हमेशा याद रखा जायेगा। वे हर तरह से लोगांे की मदद करते थे। लेकिन कभी प्रचार समाचार फोटो कार्ड में नाम मुख्य आतिथि और प्रोग्राम की सदारत यहां तक या मंच पर बैठने का प्रस्ताव तक स्वीकार नहीं किया। वे कहते थे कि उनका काम ही उनका सम्मान है। सबसे बड़ी बात समाजसेवा के सारे काम अपने निजी धन से करते थे। ऐसे ही अनाथ और विकलांग आश्रम प्रेमधाम के फादर शिब्बू और फादर बेनी हैं।
जो दिन रात बिना किसी सम्मान की चाह के सैंकड़ों बेसहारा बच्चों की सेवा मंे लगे रहते हैं। आजकल हम भी उन बच्चो की सेवा को कभी कभी वहां जाते हैं। बड़ा आत्मसंतोष मिलता है। आज लोग जनप्रतिनिधि बनकर जनता का धन कमीशन और घोटाले करके खुलेआम खा रहे हैं। साथ ही समय समय पर यह पब्लिसिटी और दावे करने से नहीं चूकते कि उन्होंने अमुक अमुक काम करके जनता पर बहुत बड़ा एहसान किया है। वे किसी प्रोग्राम मेें जाने के बदले आयोजकों से सम्मान पाने के लिये बड़ी बड़ी शर्तें रखते हैं। कुछ फर्जी समाजसेवी खुद अपने चेलों से आयेदिन अपना सम्मान कराते घूमते हैं।
कुछ अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर जनाज़ों और अंतिम शवयात्रा तक में शामिल होने के दौरान अपनी झूठी उपलब्ध्यिां ये सोचकर बयान करने से नहीं चूकते जिससे लोग उनका सम्मान करें। उनको यह नहीं पता कि यह पब्लिक है। यह सब जानती है। उनके अपने मंुह से की गयी तारीफ़ तो दूर उनके चमचों और चेलों द्वारा की गयी फ़र्जी और नक़ली प्रशंसा और सम्मान समारोह प्रतीक चिन्हों और बड़ी बड़ी शील्डों तक का आम जनता संज्ञान नहीं लेती। हंसी तो इस बात पर आती है कि उनका नाम और फोटो दिखावे के प्रायोजित और डुप्लीकेट सम्मान की ख़बर अख़बार में देखकर जानकार लोग उनको मन ही मन दो चार गालियों से और नवाज़ते रहते हैं।
लेकिन इन धोखेबाज़ ग़लतफहमी का शिकार और अज्ञानता की अंध्ेारी दुनिया में जी रहे झूठमूठ के नक़ली सम्मान का लबादा ओढ़े नादान व मूर्ख कलाकारों को यह अहसास तक नहीं है कि सम्मान इन टोटकों और जुगाड़ों से नहीं बल्कि दिल की गहराई से मिलता है। सम्मान तब ही मिल सकता है। जब कोई आपका नहीं आपके कामों आपके इरादों और नीयत का सम्मान करता हो। अगर आप में मानवता है। संवेदनशीलता है। रिश्तों का अहसास है। समाजसेवा की निःस्वार्थ भावना है। निष्पक्षता है। बड़ो का सम्मान और बच्चों के लिये प्यार है।
देशप्रेम है। दयाभाव है। संयम है। सहनशीलता है। क्षमा करने की उदारता है। बिना गल्ती और नुकसान किये भी दूसरे का दिल दुखने पर माफी मांगने की फरागदिली है। इनमें से बहुत सारी खूबियां बहुत कम लोगों में होती हैं। लेकिन उन कम लोगों में भाई सूर्यमणि रघुवंशी भी शामिल हैं। हर किसी के दुख सुख में शरीक होते हैं। हर छोटे बड़े आदमी से सहज मुलाकात को उपलब्ध रहते हैं। अहंकार उनको छूकर भी नहीं गया है। ज़रूरत आने पर हर किसी की मदद करते हैं।
शालीनता और संस्कार के धनी हैं। उन्होंने हमसे भी पारिवारिक रिश्तों को हमेशा निभाया है। हमारी बेटी की शादी में न केवल नजीबाबाद आये बल्कि घंटों हमारे साथ खड़े रहकर हमारे सभी मेहमानों से ऐसे खुश अख़लाकी दिल की गहराई और प्यार मुहब्बत से मिले कि हमारे पत्रकार दोस्त कहने लगे कि सूर्यमणि जी ने आपको आज आपके बड़े भाई की कमी महसूस नहीं होने दी। सही मायने में हम पिंटू भाई आपको सच्चे सम्मान का पात्र समझते हैं।
ग़मों की आंच पर आंसू उबालकर देखो,
बने रंग जो किसी पर भी डालकर देखो ।
तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी,
किसी के पांव से कांटा निकालकर देखा।।