Monday, 21 March 2016

"भारतमाता की जय"

100 बार कहेंगे ‘भारतमाता की जय’!

0क्या आप एक बार कहेंगे भारतमाता के सब बच्चे बराबर हैं? 
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान दिया कि युवाओं को भारतमाता की जय का नारा लगाना चाहिये। उनकी सोच है कि इससे जनता में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना बढ़ेगी। उनको यह भी लगता है कि ऐसा करने से जेएनयू जैसी घटनायें नहीं होंगी। सरसरी तौर पर देखें तो यह बात ठीक भी लगती है। भागवत ने इसके लिये न तो कोई कानून बनाने की बात कही और न ही यह चेतावनी दी कि जो यह नारा नहीं लगायेगा वह देशभक्त नहीं माना जायेगा। लेकिन एमआईएम प्रमुख ओवैसी जो देश के कट्टरपंथी मुसलमानों के नेता बनने का सपना देख रहे हैं, अपने आप ही ऐलान करने लगे कि उनकी गरदन पर कोई छुरी रखकर भी उनसे भारतमाता की जय नहीं कहला सकता।
 
हालांकि राज्यसभा में जाने माने गीतकार जावेेद अख़्तर ने ओवैसी को उनकी जगह बताते हुए तीन बार भारतमाता की जय का नारा लगाकर मुसलमानों की तरफ से माकूल जवाब दे दिया है। लेकिन जिसका डर था वही बात हो गयी। महाराष्ट्र विधानसभा में एमआईएम के एक विधायक को शिवसेना के विधायक ने जबरन ऐसा नारा लगाने को कहा और जब ऐसा नहीं हो सका तो पता नहीं कौन से नियम के तहत उस एमआईएम विधायक को सदन से निलंबित कर दिया गया। हमारा कहना है कि हम 100 बार भारतमाता की जय का नारा लगा सकते हैं। इसमें बुराई क्या है? भारत हमारी मातृभूमि है। देश एक तरह से मां ही तो है।
   
लेकिन  जब उसको देवी बनाकर पूजा करने और ज़ोर ज़बरदस्ती से नारा लगवाने की बात आती है तो वंदेमातरम की तरह उसका एक वर्ग विरोध करने पर उतर आता है। हमारा सवाल यह भी है कि भारतमाता की जय बोलना क्या देशभक्ति का एकमात्र पैमाना बनाया जा सकता है? जो संघ परिवार इस नारे पर इतना ज़ोर दे रहा है और इसको न बोलने वालों को ग़द्दार और देश से निकालने की असंभव बात कह रहा है, क्या वे खुद भारतमाता की परिभाषा जानते हैं? क्या देश सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा है? उसमें रहने वाले उस भारतमाता के बच्चे नहीं हैं? क्या संघ उन बच्चो को बराबर मानता है? नहीं। वो तो केवल हिंदुओं की बात करते हैं।
 
अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को लेकर संघ की क्या सोच है यह बात अब किसी से छिपी नहीं रह गयी है। इससे पहले गुजरात चुनाव के दौरान ज्वाइंट कमैटी ऑफ मुस्लिम ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इंपॉवरमेंट नाम की दस तंजीमों की संयुक्त कमैटी का चेयरमैन सैयद शहाबुद्दीन को बनाया गया था । शहाबुद्दीन की मांग थी कि अगर भाजपा मुसलमानों को लेकर वास्तव में गंभीर है तो 20 ऐसी विधानसभा सीटों पर चुनाव में मुसलमानों को टिकट दें जहां मुसलमानों की आबादी 20 प्रतिशत तक है। साथ ही मोदी से दंगों के लिये माफी मांगने की बिना शर्त बात कही गयी थी। इस तरह की अच्छी पहल कांग्रेस सिखों से माफी मांगकर कर चुकी है।
 
हालांकि दंगों के लिये माफी मांगने या खेद जताने के इस प्रस्ताव पर भी सारा मुस्लिम समुदाय एकमत नहीं है लेकिन यह एक अच्छी शुरूआत हो सकती थी। दरअसल राजनीति के जानकार दावा करते हैं कि मोदी ऐसा कभी नहीं करेंगे और ना ही उन्होंने ऐसा अब तक किया है क्योंकि ऐसा करने से उनका कट्टरपंथी हिंदू समर्थक उनसे नाराज़ हो जायेगा। उनका कहना है कि यह पेशकश इसलिये भी स्वीकार नहीं होगी क्योंकि भाजपा पर आरएसएस का नियंत्रण है और वह किसी कीमत पर नहीं चाहेगी कि जो काम वह अपनी सोची समझी नीति के हिसाब से कर रही है उससे मोदी ज़रा भी पीछे हटे सबको पता है कि भाजपा राममंदिर, मुस्लिम पर्सनल लॉ, अल्पसंख्यक आयोग, कश्मीर की धारा 370, वंदे मातरम, मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हिंदू राष्ट्र, धर्मनिर्पेक्षता और आतंकवाद को लेकर विवादास्पद राय रखती है। इसी साम्प्रदायिक सोच का नतीजा है कि वह आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गये बेक़सूर नौजवानों को आयोग द्वारा जांच के बाद भी रिहा करने के सरकार के प्रयासों का जोरदार विरोध करती है। वह सबको भारतीय ना मानकर हिंदू मानने की ज़िद करती है। वह दलितों के आरक्षण में मुसलमान दलितों को कोटा देनेेेे या पिछड़ों के कोेटे में से अल्पसंख्यकों को कोटा तय करने या सीधे मुसलमानों को रिज़र्वेशन देने का विरोध करती है जबकि सच्चर कमैटी की रिपोर्ट चीख़ चीख़कर मुसलमानों की दयनीय स्थिति बयान कर रही है।
 
भाजपा के नियंत्रणकर्ता आरएसएस के गुरू गोलवालकर के विचार बंच ऑफ थॉट्स में धर्म के आधार पर देशभक्ति का निर्धारण तक किया गया है। भाजपा से हिंदूवादी राजनीति को छोड़ने की आशा करना ठीक ऐसा ही होगा जैसे किसी बार के संचालक से वहां शराब ना पिलाने की मांग करना या नाई से बाल काटने से परहेज़ करने की अपील करना। इतिहास गवाह है कि 1984 में भाजपा लोकसभा की मात्र 2 सीटों तक सिमट कर रह गयी थी लेकिन हिंदूवादी राजनीति करने के लिये जब उसने रामजन्मभूमि विवाद को हवा दी तो वह दो से सीधे 88 सीटों पर जा पहुंची। इसके बाद उसने उग्र हिंदूवाद की लाइन पकड़कर पार्टी को पहले डेढ़ सौ और अब 282 सीटों तक पहुंचा कर अपने बल पर सत्ता तक पहुंचा दिया है।
 
उसके होंठों की तरफ़ न देख वो क्या कहता है,
उसके क़दमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है ं

Wednesday, 16 March 2016

हर्ष फायरिंग

दबंग शराबी के हाथ में बंदूक़ यानी बंदर के हाथ में उस्तरा समझो! यूपी के मेरठ में सगाई समारोह चल रहा था। अचानक किसी ने फायरिंग की और एक गायक जोगेंद्र की मौत हो गयी। दूसरा आदमी गंभीर रूप से घायल हो गया। इससे पहले ऐसी ही हर्ष फायरिंग के दौरान इसी राज्य सीतापुर में एक शादी में दूल्हा अपनी जान से हाथ धो बैठा था। शामली में नवनिर्वाचित सपा ब्लॉक प्रमुख के जुलूस में दबंगों ने जब हर्ष फायरिंग की तो 8 साल का मासूम बच्चा मारा गया था। हालांकि पीड़ित परिवार से सहानुभूति जताने को इस ब्लॉक प्रमुख को सपा से निकाल दिया गया। आरोपियों के खिलाफ रपट भी दर्ज हो गयी। लेकिन कोई भी कार्यवाही उस बच्चे को वापस नहीं ला सकती ।
 
2014 के आम चुनाव के अगले ही दिन सपा बसपा के असरदार नेताओं के इसी तरह असलाह लहराने के दौरान टकराव बढ़ने पर हवा में फायरिंग से 9 साल का बच्चा नईम मारा गया था। 2012 में जब सपा सरकार बनी थी। उसी समय जीत का जष्न मनाते सपा नेताओं ने कई विपक्षी दलों के नेताओं को हवाई फायरिंग करके सरकार की बानगी  सामने रख दी थी। अगर हिसाब लगायें तो सारे देश में ऐसी फायरिंग आयेदिन होती रहती है। अकेले 2013 में इस तरह की जानलेवा फायरिंग से 1300 लोगों की मौत हो चुकी है। 2012 से 2015 तक देशभर में पकड़े गये गैर कानूनी 36000 हथियारों में से 47 प्रतिशत यूपी के थे। राज्य के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी यानी डीजीपी ने ऐसी घटनायें न रोकने वाले क्षेत्र के थानेदार को व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार बनाया है।
 
सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे मामलों में सख़्त आदेश जारी कर चुका है। सरकार ने चौतरफा बढ़ते हुए दबाव को देखते हुए असलाह के नये लाइसंेंस जारी करने पर रोक लगा दी है। हंगामा और बढ़ेगा तो कुछ और दिशा निर्देश जारी करके औपचारिकता पूरी कर दी जायेगी। हैरत की बात यह है कि सरकार ऐसी घटनायें होने पर लाइसेंसी असलाह धारकों पर तो दिखावे के लिये थोड़ा शिकंजा कसती भी है लेकिन अवैध असलाह वालों का पता लगाना वह भूल जाती है। आंकड़े चौंकाने वाले ये भी है कि 2009 से 2013 तक इस तरह की फायरिंग में जो 15000 मौतें हुयीं हैं। उनमें से 90 प्रतिशत अवैध हथियारों से हुयीं हैं। अवैध असलाह कहां से आता है?
 
इसको पुलिस क्यों नहीं रोक पाती? और इसका निर्माण इतने बड़े पैमाने पर कैसे हो रहा है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। शामली के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का दावा है कि वे ज़िले के दो ही कस्बों से चार माह के दौरान 100 पूरी तरह तैयार और 400 अधबने हथियार बरामद कर चुके हैं। यहां कुछ लोगों का हथियार बनाना पुष्तैनी रोज़गार है। यूपी के पूर्व डीजीपी एन एस सक्सैना का तो यहां तक कहना है कि जितने हथियार पूरे ब्रिटेन और जापान में नहीं होंगे। उससे ज्यादा वैध अवैध असलाह अकेले मुरादाबाद ज़िले में मौजूद है। देश के स्तर पर देखें तो 671 में से 324 ज़िलों में 20 लाख लाइसंेसी हथियार हैं। यह बात खुद सरकार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र देकर मानी है।
 
भारतीय सशस्त्र हिंसा आकलन संस्था ने 2011 में इस तरह की फायरिंग को लेकर जो सर्वे किया। उसका अनुमान है कि देश में लगभग 4 करोड़ लोगों के पास हथियार हैं। हैरत की बात यह है कि इनमें से केवल 15 प्रतिशत के पास ही लाइसेंसी हथियार हैं। खास बात यह है कि पूरे देश में हर्ष फायरिंग की सबसे अधिक घटनायें यूपी और बिहार में दबंग और बाहुबली लोग करते हैं। हालत इतनी खराब है कि जानलेवा फायरिंग की ज़द में देश के पांच बड़े ऐसे शहरों में यूपी के मेरठ कानपुर इलाहाबाद और बनारस शामिल हैं। सवाल यह है कि इस तरह की बढ़ती फायरिंग की घटनाओें को कैसे रोका जाये? सरकार के पास सिवाय कड़े दिशा निर्देश जारी करने की औपचारिकता पूरी कर हाथ पर हाथ रखकर अगली घटना की प्रतीक्षा में बैठ जाने के और कोई चारा नहीं है।
  
पुलिस का कहना है कि वह कौन से मैकेनिज़्म से यह पता लगाये कि कोई हर्ष फायरिंग करने वाला है? क्या हर बारात शादी और जुलूस में लोगों के शामिल होने से पहले उनकी तलाशी लेना संभव है? फिर एक बात यह भी देखने में आई है कि ऐसी घटनायें करने वाले दबंग माफिया और सत्ता से तार जोड़े शक्तिशाली लोग होते हैं। इनकी पुलिस से भी सैटिंग होती है। शादी हो जुलूस हो या कोई भी जष्न ऐसे मौकों पर लोग अकसर शराब भी पीते हैं। ऐसे में उनके हाथ में हथियार बंदर के हाथ में उस्तरे की तरह होता है। हमें तो लगता है कि कानून से अधिक लोगों को इस बारे में वैचारिक और सामाजिक रूप से जागरूक करके फायरिंग से रोका जा सकता है।
 
समाज को भी चाहिये कि हथियारों का बेजा दिखावा और बात बात पर फायरिंग करने वालों को हीरो नहीं विलेन की नज़र से देखे। जिसके घर प्रोग्राम हो वह भी लोगों से हथियार साथ न लाने की अपील करे। आज तो यही कहना होगा कि फायरिंग कभी खुशी कभी ग़म बन गयी है। आज तो हमारे समाज की हालत यह हो गयी है-
 
जलाके सारे दरख़तों को खुद अपने हाथों से,
अजीब शख़्स है साया तलाश करता है।

वैवाहिक बलात्कार

वैवाहिक बलात्कार: क़ानून अपना काम करेगा!
-इक़बाल हिन्दुस्तानी 

लड़कियों के साथ पक्षपात समाज को घर से ही ख़त्म करना होगा? महिला और बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा भारत में लागू न हो पाने की बात कही है। इसकी वजह वो देश में अशिक्षा गरीबी सामाजिक मूल्य और धार्मिक मान्यतायें बताती हैं। इससे पहले श्रीमती मेनका गांधी ने ऐसा ही एक और विवादित बयान दिया था। उनका कहना था कि हर गर्भवती महिला का भू्रण परीक्षण अनिवार्य बनाया जाना चाहिये। उनको लगता था कि ऐसा करने से कन्या भू्रण हत्या को रोका जा सकेगा। विशेषज्ञों ने इसके विपरीत परिणाम की बात कही तो सरकार को अपना इरादा नेक होते हुए भी कदम वापस खींचने पड़े थे। अब वे खुद महिला होकर मंत्री के रूप में एक ऐसी हल्की बात कह रही हैं।
 
अगर हम समाज की इतनी ही परवाह करते तो समाज सुधारक राजाराम मोहन राय सती प्रथा  के खिलाफ कानून बनाने की मांग क्यों करते? दहेज़ के खिलाफ कानून क्यों बनाया गया है? जबकि यह समाज में आमतौर पर बिना किसी रोकटोक और बिना बुराई माने चलन में है। ट्रेन आने पर जब फाटक बंद होता है तो पैदल यात्रियों को भी ट्रैक से गुज़रने पर कानूनन रोक क्यों लगाई गयी है? क्या ऐसे कोई रूकता है? संविधान में सबको बराबर अधिकार क्यों दिये गये हैं? जबकि समाज पुरूष प्रधान है। यहां तक कि बड़ी संख्या में खुद महिलायें अपने साथ किये जाने वाले पक्षपात को धर्म और परंपराओें के नाम पर न्यायोचित ठहराती देखी जाती हैं।
 
लेकिन फिर भी अपराध से लेकर मतदान और हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व से लेकर सम्पत्ति तक में उनको बराबर अधिकार के एक के बाद एक कानून बनाये जा रहे हैं। मंत्री महोदया से पूछा जाना चाहिये कि जब तक समाज खुद महिलाओं दलितों और अल्पसंख्यकों को बराबर अधिकार देने को तैयार नहीं हो जाता तब ऐसे कानून क्यों बनाये जा रहे हैं? यह बात किसी सीमा तक ही ठीक मानी जा सकती है कि केवल कानून बना देने से किसी के साथ न तो पक्षपात पूरी तरह ख़त्म हो जाता है। और न ही उसको बराबर न्याय व अधिकार मिल जाते हैं। लेकिन यह भी वास्तविकता है कि कानून की अपनी भूमिका है। जिस तरह से दहेज़ एक्ट लागू होने से दहेज़ के लिये होने वाली दुल्हनों की हत्याओं के मामले में काफी कमी आई।
 
वैसे ही वैवाहिक बलात्कार कानून लागू होने से वो पुरूष कम से कम ज़रूर ज़ोर ज़बरदस्ती से बाज़ आयेंगे जो कानून का सम्मान करते हैं। अब जब कानून ही नहीं है तो कोई ऐसी हरकत से क्यों रूकेगा? यह आशंका भी अपनी जगह ठीक हो सकती है कि दहेज़ एक्ट की तरह मेरिटोरियल रेप एक्ट बना तो उसका भी जमकर दुरूपयोग होगा। हमारा मानना है कि दुरूपयोग एक अलग समस्या है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम कानून बनाना ही बंद कर दंे। दलित उत्पीड़न अधिनियम का खूब मिसयूज़ होता रहा है। लेकिन यह कानून ख़त्म नहीं किया गया है। दहेज़ एक्ट को लेकर भी अकसर ऐसे आरोप लगते हैं। लेकिन इसका एक सुखद पहलू भी है कि कई बार इस एक्ट के दबाव में परिवार टूटने तलाक होने या पत्नी की हत्या व उसका उत्पीड़न रूका रहता है।
 
बाद में समय के साथ सोच में बदलाव आने या पति पत्नी में अंडरस्टैंडिंग बेहतर बन जाने से तलाक की नौबत टल जाती है। मेनका गांधी की केवल इतनी बात सही मानी जा सकती है कि कानून बनाने के साथ साथ समाज की सोच और महिलाओं को अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत किया जाये। जिससे इस कानून का गलत इस्तेमाल कम से कम हो। जहां तक किसी भी कानून के गलत इस्तेमाल की बात है। इतिहास गवाह है कि किस तरह से आतंवाद निरोधक टाडा और पोटा का जमकर खुद राजनेताओं ने सियासी बदले की भावना से गलत प्रयोग किया था। ऐसे ही नारकोटिक्स ड्रग्स और आर्म्स एक्ट का अधिकांश झूठा ही इस्तेमाल होता है।
 
इसका मतलब यह तो नहीं इन कानूनों को ही ख़त्म कर दिया जाये। और तो और देशद्रोह कानून तक का गलत इस्तेमाल करने के सरकारों पर अकसर आरोप लगते हैं। हां यह बात ठीक है कि वक्त के साथ इस तरह के कानूनों में बदलाव होने चाहिये। साथ ही इनका गलत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही का भी प्रावधान किया जा सकता है। सच तो यह है कि कानून बनाने वालों को कानून बनाकर अपना काम करना चाहिये। इसे न बनाने के बहाने नहीं तलाषने चाहिये। मिसाल के तौर पर कन्याभू्रण हत्या एक ऐसा मामला है जिसमें खुद कन्या के माता पिता उसकी हत्या केवल इसलिये करते हैं कि वह लिंगभेद कर रहे होते हैं। कुछ क्षेत्रों में कन्या के जन्म लेते ही मार देने की परंपरा आज भी मौजूद है।
 
इसके बाद लड़का और लड़की में खाने पीने से लेकर बोलने, चलने, हंसने, नाचने गाने, कपड़े पहनने, बाहर घूमने जाने, शिक्षा लेने, शौक पूरे करने, गाली देने मारने पीटने और उसके बाद शादी करने को लेकर जमकर पक्षपात होता है। बाल विवाह पर कानूनी रोक बहुत पुरानी बात नहीं है। शाहबानो केस हो या राजस्थान का रूपकुंवर सती कांड राजनेता अपने वोटबैंक के चक्कर में अकसर प्रगतिशील कानून बनाने से बचते हैं। लिंगभेद पर आधारित खाप पंचायतों के फैसले देश में खूब चर्चा में आते रहते हैं लेकिन वोटबैंक के लालची हमारे नेता देश को बर्बर युग में ले जाने में कोई बुराई नहीं समझते। ऐसे ही स्त्री विरोधी फतवे आयेदिन आते रहते हैं लेकिन कट्टरपंथियों के डर से सबने अपराधिक चुप्पी साध रखी है। हमारी महान सभ्यता संस्कृति और सभी के धर्मों की खूब दुहाई दी जाती है लेकिन हमारी कई परंपरायें दिखावा और ढोंग से अधिक कुछ नहीं है। 
 
बदनज़र उठने ही वाली थी किसी गै़र की जानिब,
अपनी बेटी का ख़याल आया तो दिल कांप गया।

Monday, 29 February 2016

Anti reservation answer

दोस्तो मैं कुछ दिनों से देख रहा हूँ की फेसबुक पर कोई भी मुह उठाकर आरक्षण के विरोध में अपने तर्क एक ज्ञानी की तरह देता है । ज्ञानियों के तर्क कुछ
इस प्रकार होते है

१-आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिएहै
२- आरक्षण से अयोग्य व्यक्ति आगे आते है।
३- आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है।
४- आरक्षण ने ही जातिवाद को जिन्दा रखा है।
५- आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए था।
६- आरक्षण के माध्यम से सवर्ण समाज की वर्तमान पीढ़ी को दंड दिया जा रहा है।

इन ज्ञानियों के तर्कों का जवाब प्रोफ़ेसर विवेक कुमार जी ने दिया है जो इस प्रकार हैं

१- पहले तर्क का जवाब:-
आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, गरीबों की आर्थिक वंचना दूर करने हेतु सरकार अनेक कार्य क्रम चला रही है और अगर चाहे तो
सरकार इन निर्धनों के लिए और
भी कई कार्यक्रम चला सकती है। परन्तु आरक्षण हजारों साल से सत्ता एवं संसाधनों से वंचित किये गए समाज के
स्वप्रतिनिधित्व की प्रक्रिया है।
प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु
संविधान की धरा 16 (4) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330, 332 एवं 335 के तहत कुछ जाति विशेष को दिया गया है।

२- दूसरे तर्क का जवाब
योग्यता कुछ और नहीं परीक्षा के प्राप्त अंक के प्रतिशत को कहते हैं। जहाँ प्राप्तांक के साथ साक्षात्कार होता है, वहां प्राप्तांकों के साथ आपकी भाषा एवं व्यवहार को भी योग्यता का माप दंड मान लिया जाता है।
अर्थात obc/sc/st के
छात्र ने किसी परीक्षा में 60 % अंक प्राप्त किये और सामान्य जाति के किसी छात्र ने 62 % अंक प्राप्त किये तो आरक्षित जाति का छात्र अयोग्य है और सामान्य जाति का छात्र योग्य है।
आप सभी जानते है की परीक्षा में प्राप्त अंकों का प्रतिशत एवं भाषा, ज्ञान एवं व्यवहार के आधार पर योग्यता की अवधारणा नियमित की गयी है जो की अत्यंत त्रुटिपूर्ण और अतार्किक है। यह स्थापित सत्य है कि किसी भी परीक्षा में अनेक आधारों पर अंक प्राप्त किये जा सकते हैं। परीक्षा के अंक विभिन्न कारणों से भिन्न हो सकते है। जैसे कि किसी छात्र के पास सरकारी स्कूल था और उसके शिक्षक वहां नहीं आते थे और आते भी थे तो सिर्फ एक।
सिर्फ एक शिक्षक पूरे विद्यालय के लिए जैसा की प्राथमिक विद्यालयों का हाल है, उसके घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था, उसके पास किताब नहीं थी, उस छात्र के पास न ही इतने पैसे थे कि वह ट्यूशन लगा सके।
स्कूल से आने के बाद घर का काम भी करना पड़ता।
उसके दोस्तों में भी कोई पढ़ा लिखा नहीं था। अगर वह मास्टर से प्रश्न पूछता तो उत्तर की बजाय उसे डांट मिलती आदि।
ऐसी शैक्षणिक परिवेश में अगर उसके परीक्षा के नंबरों की तुलना कान्वेंट में पढने वाले
छात्रों से की जायेगी तो क्या यह तार्किक होगा।
इस सवर्ण समाज के बच्चे के पास शिक्षा की पीढ़ियों की विरासत है। पूरी की पूरी
सांस्कृतिक पूँजी, अच्छा स्कूल, अच्छे मास्टर, अच्छी किताबें, पढ़े-लिखे माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नातेदार, पड़ोसी, दोस्त एवं मुहल्ला। स्कूल जाने के लिए कार या बस, स्कूल के बाद ट्यूशन या माँ-बाप का पढाने में
सहयोग। क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों के मध्य परीक्षा में प्राप्तांक योग्यता का निर्धारण कर सकते हैं?

क्या ऐसे दो विपरीत
परिवेश वाले छात्रों में भाषा एवं व्यवहार की तुलना की जा सकती है?
यह तो लाज़मी है की सवर्ण समाज के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की परीक्षा में प्राप्तांक एवं भाषा के आधार पर योग्यता का निर्धारण अतार्किक एवं अवैज्ञानिक नहीं तो और क्या है?

३- तीसरे और चौथे तर्क का जवाब

भारतीय समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है, जो छः हज़ार जातियों में बंटा है और यह छः हज़ार जातियां लगभग ढाई हज़ार वर्षों से मौजूद है। इस श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक समूहों जैसे दलित,
आदिवासी एवं पिछड़े समाज को सत्ता एवं संसाधनों से दूर रखा गया और इसको धार्मिक व्यवस्था घोषित कर स्थायित्व प्रदान किया गया।
इस हजारों वर्ष पुरानी श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने
के लिए एवं सभी समाजों को बराबर –बराबर का प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान में कुछ जाति विशेष को आरक्षण दिया गया है। इस प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित करने की चेष्टा की गयी है कि वह अपने हक की लड़ाई एवं अपने समाज की भलाई एवं बनने वाली नीतियों को सुनिश्चित कर सके।

अतः यह बात साफ़ हो जाति है कि जातियां एवं जातिवाद भारतीय समाज में पहले से ही विद्यमान था। प्रतिनिधित्व
( आरक्षण) इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए लाया गया न की इसने जाति और जातिवाद को जन्म दिया है। तो जाति पहले से ही विद्यमान थी और आरक्षण बाद में आया है।
अगर आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देता है तो, सवर्णों द्वारा स्थापित समान-जातीय विवाह, समान-जातीय दोस्ती एवं रिश्तेदारी क्या करता है?
वैसे भी बीस करोड़ की आबादी
में एक समय में केवल तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिलने की व्यवस्था है, बाकी 19 करोड़ 70 लाख लोगों से सवर्ण समाज आतंरिक सम्बन्ध क्यों नहीं स्थापित कर पाता है?
अतः यह बात फिर से
प्रमाणित होती है की आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता में पहले से ही विद्यमान है।

४- पांचवे तर्क का जवाब

प्रायः सवर्ण बुद्धिजीवी एवं मीडिया कर्मी फैलाते रहते हैं कि
आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए है, जब उनसे पूंछा जाता है कि आखिर कौन सा आरक्षण दस वर्ष के लिए है तो मुह से आवाज़ नहीं आती है।
इस सन्दर्भ में केवल इतना जानना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजनैतिक आरक्षण जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और
332 में निहित है,
उसकी आयु और उसकी समय-सीमा दस वर्ष निर्धारित की गयी थी।
नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए
आरक्षण की कोई समय सीमा सुनिश्चित नहीं की गयी थी।

५- छठे तर्क का जवाब

आज की सवर्ण पीढ़ी अक्सर यह प्रश्न पूछती है कि हमारे पुरखों के अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, छल कपटता, धूर्तता आदि की सजा आप वर्तमान पीढ़ी को क्यों दे रहे है?
इस सन्दर्भ में दलित युवाओं का मानना है कि आज की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पूँजी का किसी न किसी के रूप में लाभ उठा रही है। वे अपने पूर्वजों के स्थापित किये गए
वर्चस्व एवं ऐश्वर्य का अपनी जाति के उपनाम, अपने कुलीन उच्च वर्णीय सामाजिक तंत्र, अपने सामाजिक मूल्यों, एवं मापदंडो, अपने तीज त्योहारों, नायकों, एवं नायिकाओं, अपनी परम्पराओ एवं भाषा और पूरी की पूरी ऐतिहासिकता का उपभोग कर रहे हैं।
क्या सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपने सामंती सरोकारों और सवर्ण वर्चस्व को त्यागने हेतु कोई पहल कर रही है?
कोई आन्दोलन या अनशन कर रही है?
कितने धनवान युवाओ ने अपनी पैत्रिक संपत्ति को दलितों के उत्थान के लिए लगा दिया या फिर दलितों के साथ ही सरकारी स्कूल में ही रह कर पढाई करने की पहल की है?
जब तक ये युवा स्थापित मूल्यों की संरचना को तोड़कर नवीन संरचना कायम करने की पहल नहीं करते तब तक दलित समाज उनको भी उतना ही दोषी मानता रहेगा जितना की उनके
पूर्वजों को।

मंदिरों में घुसाया जाता है .....
जाति देखकर
किराये पर कमरा दिया जातै है...
जाति देखकर
होटल में खाना खिलाया जाता है..
जाति देखकर
कमरा किराये पर दिया जाता है..
जाति देखकर
मकान बेचा जाता है...
जाति देखकर
शादी विवाह कराये जाते है
जातिया देखकर,,,
वोट दिया जाता है..
जाति देखकर
मृत पशु उठवाये जाते है..
जाति देखकर
गाली दी जाती है..
जाति देखकर
साथ खाना खाते है..
जाति देखकर
बेगार कराई जाती है..
जाति देखकर
धिक्कारा जाता है..
जाति देखकर
बाल काटे जाते है..
जाति देखकर
ईर्ष्या पैदा होती है..
जाति देखकर

पर आपको आरक्षण चाहिये आर्थिक आधार पर......
जाति आधारित समाज में समता के लिए आरक्षण
लोकतांत्रिक राष्ट्र में अत्यावश्यक है...
क्योंकि जाति है तो आरक्षण है.....
वरना संसार के
दूसरे किसी देश में जाति नहीं है इसलिये आरक्षण नहीं
है...