Friday, 21 March 2014

अन्ना - बाबा का यू टर्न

अन्ना -बाबा का यू टर्न उनकी विश्वसनीयता घटा रहा है ?
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0 राजनीतिक अनुभव की कमी बार बार उनका इस्तेमाल कराती है!
    शुरू में नज़र तो यह आ रहा था कि योगगुरू बाबा रामदेव और सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनाये जा रहे काहिल रूख़ के खिलाफ एकजुट हो गये हैं। एक दिन के साझा अनशन का हालांकि प्रतीकात्मक  ही महत्व होता है लेकिन पहले बाबा का रामलीला मैदान में शुरू किया गया आंदोलन सरकार ने जिस तरह से कुचलकर उनके खिलाफ कर चोरी का आरोप लगाकर जांच का शिकंजा कसा था उससे लगता था कि अब बाबा अपने बिछाये जाल में खुद फंसकर रह जायेंगे लेकिन जिस तरह से समय ने करवट ली और सरकार एक के बाद एक घोटाले में फंसी और राज्यों से लेकर नगर निगमों के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी उससे चाणक्य के नियमानुसार दुश्मन पर तब हमला करो जब वो चारों तरफ से पहले ही घिरा हो की कहावत को चरितार्थ करते हुए बाबा रामदेव ने भाजपा और मोदी का खुले आम समर्थन करके यूपीए सरकार पर निर्णायक धावा बोल दिया था लेकिन अब ऐसा लगता है कि बाबा की कुछ मांगों को जैसा का तैसा ना मानने पर बाबा भाजपा से कुछ खफा होते जा रहे हैं।
   उनका यह बयान उनकी मोदी से नाराज़गी की तरफ ही इशारा करता है कि वे भाजपा नेतृत्व के गुलाम नहीं हैं। वे उनका समर्थन बिना शर्त नहीं कर सकते । ऐसा लगता है कि बाबा के चहेते कुछ लोगों को भाजपा ने लोकसभा टिकट ना देकर बाबा को यू टर्न लेने के लिये मजबूर कर दिया है। विशेषरूप से बाबा बिजनौर सीट से अपने चहेते स्वामी ओमवेश को भाजपा का टिकट दिलाना चाहते थे, ऐसे ही उत्तराखंड खासतौर पर हरिद्वार सीट पर भी बाबा की पसंद के प्रत्याशी को भाजपा का टिकट नहीं मिला है लेकिन बाबा यहां भूल गये कि एक राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा की अपनी मजबूरी और कमज़ोरियां हैं जिससे वह चाहकर भी बाबा की हर मांग को पूरा नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करने पर उसके कार्यकर्ताओं में रोष और विद्रोह पैदा हो जायेगा और उसको संभालना भाजपा के लिये असंभव हो सकता है।
   बाबा की सारे कर ख़त्म कर बैंकिंग टैक्स और बड़े नोट बंद करने वाली बात भी उनके दबाव देने पर मोदी ने  बेमन से बिना आर्थिक विशेषज्ञों की अंतिम राय जाने बाबा की नाराज़गी से बचने के लिये मजबूरी में मानने का साझा सभा में ऐलान किया था जबकि सरकार बनने पर इस मांग को लागू करना टेढ़ी खीर साबित हो सकती है। उधर अन्ना हज़ारे का साथ जब से आम आदमी पार्टी बनाने को लेकर अरविंद केजरीवाल ने छोड़ा है तब से अन्ना एक तरह से अंडरग्राउंड हो गये हैं। पहले उन्होंने कांग्रेस के इशारे पर बोगस लोकपाल पास कराने के लिये एक बार फिर अनशन का सुनियोजित प्रोग्राम किया। इसके बाद जब केजरीवाल ने उनको उलाहना दिया कि इस सरकारी लोकपाल से चूहां भी नहीं पकड़ा जा सकेगा तो अन्ना ने दावा किया कि इससे शेर को भी पकड़ा जा सकता है।
   अन्ना ने यू टर्न लेकर जनलोकपाल की बजाये कांग्रेसी दिखावटी लोकपाल पास कराने का श्रेय तो ले लिया लेकिन इससे अन्ना की छवि पहले से और ख़राब हुयी और उन पर आरोप लगा कि वे यूपीए सरकार से मिल गये हैं। इसके बाद इतना ही काफी नहीं था कि अन्ना जो राजनीतिक दल बनाने से मना करते थे और केजरीवाल से इसी बात पर दूरी इतनी बना ली थी कि उनके दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं गये और किरण बेदी व पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह पर पूरा विश्वास करते रहे। इसके बाद बेदी और सिंह भी उनका साथ छोड़कर भाजपा में चले गये तो अन्ना मैदान में अकेले खड़े नज़र आये। शायद इतना कुछ भी कम था जो अन्ना ने केजरीवाल को नीचा दिखाने के लिये ईर्ष्या के भाव से ओतप्रोत होकर महिलाओं के लिये सबसे असुरक्षित बन चुके बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का सपोर्ट करने का ऐलान कर दिया।
   उनके समर्थन में टीवी पर अन्ना का एक विज्ञापन भी कई दिन तक चला। इसके बाद बारी आई ममता को पीएम पद का प्रत्याशी बनाने को दिल्ली में साझा रैली की। अन्ना को शायद राजनीतिक अनुभव की कमी की वजह से यह अहसास नहीं था कि ममता का जादू केवल बंगाल में चलता है और उनके नाम पर बिना खाना खर्च और तरह तरह के प्रलोभन दिये दिल्ली रैली में लाखों तो क्या हज़ारों की भीड़ भी नहीं आयेगी। उधर ममता को यह खुशफहमी थी कि अन्ना का नाम ही काफी है और भीड़ उनके नाम से अपने आप एकत्र हो जायेगी। बहरहाल ममता और अन्ना दोनों की इस रैली के असफल होने पर पोल भी खुल गयी और अन्ना के रैली में आने से एनवक्त पर मना करने पर यह भी साबित हो गया कि अब अन्ना का खेल भी ख़त्म हो चुका है।
   कहने का मतलब यह है कि एक दो सप्ताह भूखे रहकर कोई अनशन या आंदोलन सफल बना देना अलग बात है और राजनीतिक फैसला करना बिल्कुल अलग बात है। ऐसा लगता है कि बाबा और अन्ना का आंदोलन कांग्रेस को सत्ता से हटाने के बाद भी ख़त्म नहीं होगा यह बात कम लोगों को पता है। अन्ना व्यवस्था बदलने का आंदोलन चला रहे हैं। उनको चुनाव नहीं लड़ना, उनके पास धन और सम्पत्ति नहीं है और उनका परिवार भी नहीं है जिससे उनपर किसी तरह का आरोप चस्पा नहीं हो पा रहा है। अन्ना का अब तक  का जीवन ईमानदार और संघर्षशील रहा है। अन्ना ने महाराष्ट्र मंे शिवसेना सरकार के रहते आध दर्जन भ्रष्ट मंत्रियों को इस्तीफा देने को मजबूर किया है जिससे शिवसेना नेता संसद में बेशर्मी से कह रहे थे कि लोकपाल की कोई ज़रूरत नहीं है। उधर लालू का यह कहना भी सही था कि लोकपाल उनके लिये डेथ वारंट है।
   मुलायम का डर भी सही है कि अगर लोकपाल पास हुआ तो उनको पुलिस गिरफ़तार कर लेगी। भ्रष्ट नेताओं को अगर कमज़ोर लोकपाल से इतना डर लग रहा है तो समझा जा सकता है कि मज़बूत जनलोकपाल से भ्रष्टाचारी कितना घबरा रहे होंगे। बाबा रामदेव ने भी अपने एक दिन के दिल्ली अनशन के दौरान पुलिस के गिरफतार करने के प्रयास पर महिला वस्त्र पहनकर चुपके भागने के एक गलत फैसले से यू टर्न लेकर अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता का परिचय दिया था और अनुमान यह लगाया जा रहा है कि भाजपा के सत्ता में आने पर जिस तरह से जीत के लिये मोदी ने भ्रष्ट और दलबदलू नेताओं को थोक में टिकट दिलाये हैं इस से बनने वाली सरकार से भी अन्ना और बाबा बहुत जल्दी निराश हो सकते हैं जिससे सत्ता की बजाये व्यवस्था बदलने की बार बार मांग करने वाले बाबा और अन्ना एक बार पिफर से नई बनने वाली सरकार के खिलाफ यू टर्न लेकर आंदोलन करते नज़र आ सकते हैं।
0 आज ये दीवार पर्दे की तरह हिलने लगी,

  शर्त लेकिन थी कि बुनियाद हिलनी चाहिये।

Sunday, 16 March 2014

चुनाव का एजंडा विकास....

मोदी ने चुनाव का एजेंडा विकास तो बना ही दिया है!
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0 क्षेत्रीय दल सुशासन के बल पर ही इस लहर से बच सकते हैं?
    भाजपा के पीएम पद के प्रत्याशी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी से कोई सहमत हो या असहमत, प्रेम करे या घृणा और समर्थन करे या विरोध लेकिन उनके 2014 के चुनाव को विकास के एजेंडे पर लाकर सत्ताधरी यूपीए गठबंधन के लिये बड़ी चुनौती बन जाने को अब कांग्रेस और सपा के नेता भी स्वीकार करने को मजबूर हो रहे हैं। यह बहस का विषय हो सकता है कि गुजरात पहले से ही और राज्यों के मुकाबले विकसित था या मोदी के शासनकाल में ही उसने विकसित राज्य का दर्जा हासिल किया है लेकिन इस सच से मोदी के विरोधी भी इन्कार नहीं कर सकते कि आज मोदी को भाजपा ने अगर पीएम पद का प्रत्याशी प्रोजेक्ट किया है तो इसके पीछे उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि कम उनका विकासपुरूषवाला चेहरा ज्यादा उजागर किया जा रहा है।
   इतना ही नहीं मोदी भाजपा का परंपरागत एजेंडा राम मंदिर, समान आचार संहिता और कश्मीर की धारा 370 हटाने का मुद्दा कहीं भी नहीं उठा रहे हैं। मोदी, भाजपा और संघ इस नतीजे पर शायद पहंुच चुके हैं कि भाजपा को अगर सत्ता में आना है तो हिंदूवादी एजेंडा छोड़ा भले ही ना जाये लेकिन उस पर ज़ोर देने से शांतिपसंद और सेकुलर सोच का हिंदू ही उनके समर्थन में आने को तैयार नहीं होता। इसलिये बहुत सोच समझकर यह रण्नीति बनाई गयी है कि चुनाव भ्रष्टाचार के खिलाफ और ‘‘सबका साथ सबका विकास‘‘ मुद्दे पर लड़ा जाये तो ज्यादा मत और अधिक समर्थन जुटाया जा सकता है। यही वजह है कि 1991 की तरह ना तो आज देश में मंदिर मस्जिद का मुद्दा गर्म किया जा रहा है, ना ही रामरथ यात्रा निकाली जा रही है और ना ही हिंदू राष्ट्र के नाम पर दंगे भड़काने वाला उन्मादी माहौल बनाया जा रहा है।
   इसके साथ ही भाजपा के वरिष्ठ नेता यह जानते हुए भी कि मुस्लिम उनको अभी खुलकर वोट देने को तैयार नहीं होगा यह प्रयास करते नज़र आ रहे हैं कि कम से कम मुसलमान भाजपा प्रत्याशियों को हराने के एक सूत्री एजेंडे पर ‘‘लोटानमक’’ एक ना करें। इसी रण्नीति के तहत भाजपा मुसलमानों के साथ भी न्याय करने और उससे अगर कोई गल्ती हुयी हो तो माफी तक मांगने को तैयार होने की बात कह रही है। सेकुलर माने जाने वाले नेता चाहे जितने दावे करंे लेकिन मैं यह बात मानने को तैयार नहीं हूं कि गुजरात में मोदी केवल 2002 के दंगों और साम्प्रदायिकता की वजह से लगातार जीत रहे हैं। आज के दौर में मतदान में भी गड़बड़ी इस सीमा तक नहीं की जा सकती कि मीडिया व विपक्ष को पता ही ना चले। सच तो यह है कि देश के 81 करोड़ मतदाताओं में से 47 प्रतिशत युवा है जिनको हिंदू राष्ट्र और राममंदिर से ज्यादा अपने रोज़गार और क्षेत्र के विकास की है।
   देश की जनता भ्र्रष्टाचार से भी तंग आ चुकी है वह हर कीमत पर इससे छुटकारा चाहती है, यही वजह है कि केजरीवाल की जुम्मा जुम्मा आठ दिन की आम आदमी पार्टी से उसे भाजपा से ज्यादा उम्मीद नज़र आई तो उसने आप को सर आंखों पर लेने में देर नहीं लगाई। आज भी केजरीवाल की नीयत पर उसे शक नहीं है भले ही वह उसकी काम करने की शैली और कुछ नीतियों से सहमत नहीं हो। सही मायने में मोदी के गुजरात जाकर केजरीवाल ने जो 16 सवाल उठाये हैं वह सकारत्मक और विकास की नीति पर बहस की शुरूआत मानी जा सकती है।
   गुजरात मंे  पिछले 10 सालों में लघु उद्योगों का बंद होना, बेरोज़गारी बढ़ना, शिक्षित युवाओं को 5300 रू0 मासिक ठेके पर नौकरी देना, सरकारी स्कूलों व अस्पतालों की हालत दयनीय होना, सरकारी कामों में भ्र्र्रष्टाचार बढ़ना, बड़े उद्योगपतियों को किसानों की ज़मीन छीनकर कौड़ियों के भाव देना, केजी बेसिन की गैस के दाम पर  मोदी का चुप्पी साधना, अंबानी परिवार के दामाद सौरभ पटेल को राज्य का मंत्री बनाना, चुनावी हवाई यात्रा का हिसाब ना देना , गुजरात के 800 किसानों का आत्महत्या करना, कच्छ के सिख किसानों की ज़मीन ना छीनने का मोदी का पंजाब में ऐलान करना और फिर भी जबरन भूमि अधिगृहण को सही ठहराने के लिये गुजरात सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना क्या बताता है, नर्मदा का बांध का सारा पानी किसानों को ना देकर उद्योगपतियों को देना, चार लाख किसानों को कई साल से आवेदन के बाद भी बिजली का कनेक्शन ना मिलना और मोदी के साफ सुथरी सरकार देने के दावे की पोल खोलते हुए उनके मंत्रीमंडल में खाद घोटाले में निचली अदालत से तीन साल की सज़ा पा चुके ज़मानत पर चल रहे बाबूभाई बुखारिया और 400 करोड़ के मछली घोटाले में आरोपी पुरूषोत्तम सोलंकी जैसे दागी मंत्रियों का मौजूद होना भ्र्रष्टाचार और विकास को लेकर एक सार्थक और सकारात्मक बहस का आग़ाज़ ही माना जा सकता है।     
     अनुमान यह लगाया जाता है कि गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को दोस्तों और दुश्मनों के बारे में जवाहर लाल नेहरू और पटेल दोनों नेताओं का स्वभाव मिला है। मोदी अपने परिवार से अपने को खुद  ही काट चुके है। यह भी बड़ी वजह है कि मोदी विरोधियों के हाथ उनकी पारिवारिक कमज़ोरियां नहीं लग पाती है। 2002 के दंगों के दाग़ के अलावा मोदी का दामन भ्रष्टाचार को लेकर लगभग बेदाग माना जाता रहा है। दरअसल मोदी भाजपा की कमज़ोरी और ताकत दोनों ही बन चुके है। इस समय हैसियत में वह पार्टी में सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। उन्हें चुनौती देने वाला कोई विकासपुरूषनहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर भाजपा 200 तक लोकसभा सीटें जीत जाती है तो चुनाव के बाद जयललिता, चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और मायावती को राजग के साथ आने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी।
   लोजपा के पासवान और इंडियन जस्टिस पार्टी के उदितराज जैसे दलित नेता पहले ही भाजपा के साथ आ चुके हैं। इन सबके आने के अपने अपने क्षेत्रीय समीकरण और विशेष राजनीतिक कारण है। कोई भाजपा या मोदी प्रेम के कारण नहीं आयेगा। इन सबके साथ एक कारण सामान्य है कि कांग्रेस के बजाये भाजपा के साथ काम करना इनको सहज और लाभ का सौदा लगता है। इस बार जनता का मूड कांग्रेस के साथ ही क्षेत्रीय और धर्मनिर्पेक्ष दलों से भी उखड़ा नज़र आ रहा है, जहां तक केजरीवाल की आप का सवाल है वह अभी राजनीति में बच्चा ही है। मोदी अगर विकास के नारे पर जीतकर सरकार बनाने में सफल हो जाते हैं तो उनकी मजबूरी होगी कि सबका साथ सबका विकास हर हाल में करें।
0कैसे आसमां में सुराख़ हो नहीं सकता,

 एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।।

Monday, 3 March 2014

बीजेपी को मुस्लिम वोट ?


मुसलमानों का वोट भी ले सकती है भाजपा?
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0बाबरी मस्जिद व गुजरात दंगे उसके रास्ते का बड़ा पत्थर बने हैं!
        भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि अगर कोई गल्ती हुयी है तो वे मुसलमानों से सौ बार सिर झुकाकर माफी मांगने को तैयार हैं, हालांकि उनके इस बयान पर संघ परिवार ने ही दबी जुबान से नाराज़गी दर्ज की है लेकिन मिशन मोदी 272 के हिसाब से राजनाथ ने यह सकारात्मक पहल की है। उधर मुसलमानों के सबसे बड़े लीडर समझे जाने वाले सपा के वरिष्ठ नेता आज़म खां ने दो क़दम आगे बढ़कर इसमें यह जोड़ दिया है कि भाजपा को अगर माफी मांगनी ही है तो वह खुलकर स्वीकार करे कि उसने बाबरी मस्जिद शहीद की थी और वह उसे फिर से बनाने को तैयार है। साथ ही खां ने मांग की है कि मोदी गुजरात दंगों की ज़िम्मेदारी कबूल कर दंगापीड़ित मुसलमानों को न्याय दिलायें, उनका पुनर्वास करें और उनको पर्याप्त मुआवज़ा भी दें तो मुसलमान भाजपा को माफ करने के बारे मंे सोच सकता है।
   इसके साथ ही मुसलमानों पर अपनी मज़बूत पकड़ रखने वाले दारूलउलूम देवबंद ने राजनाथ के बयान को सियासी स्टंट बताते हुए सिरे से नकार दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं भाजपा और मोदी की लगाम आरएसएस के हाथ में है और संघ का हिंदूवादी ऐजंडा किसी से छिपा नहीं है। यही वजह है कि मोदी, पूरी भाजपा और संघ ने राजनाथ के बयान को आगे नहीं बढ़ाया है। खुद मोदी बंग्लादेश के घुसपैठियों को लेकर हिंदू और मुस्लिम के आधार पर शरण देने की बात कह चुके हैं। हालांकि मोदी इस बार और चुनाव की तरह हिंदूवादी विवादास्पद मुद्दे जानबूझकर नहीं उठा रहे हैं जिससे मुसलमान भाजपा को वोट भले ही ना करें लेकिन उनका भाजपा प्रत्याशियों को हर कीमत पर हराने का एकसूत्री अभियान ठंडा पड़ सके।
   इसका कुछ ना कुछ असर मुसलमानों पर तो पड़ेगा ही साथ ही इससे वह हिंदू मतदाता जो भाजपा को साम्प्रदायिक मानकर वोट नहीं करता था इस बार कांग्रेस सहित तमाम सेकुलर दलों से मुस्लिमपरस्त नीतियों के कारण नाराज़ होकर मोदी के विकास के दावों को परखने के लिये भाजपा की तरफ़ रूख़ कर सकता है। इससे पहले पार्टी अध्यक्ष राजनानथ सिंह ने जयपुर में मुसलमानोें को आश्वासन दिया था कि भाजपा शासित राज्यों में उनके हितों के रखवाले वह खुद बनेंगे। भाजपा ने विकास और मुस्लिम मुद्दे पर एक सम्मेलन का आयोजन कर मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश की है कि कथित सेकुलर माने जाने वाले दल उनको वोटबैंक मानकर केवल सत्ता पाने के लिये इस्तेमाल करते हैं जबकि भाजपा अल्पसंख्यकों के लिये विज़न डाक्यूमेंट जारी करेगी और हज व वक़्फ पर सकारात्मक बहस चलाकर उनकी भलाई की योजनाएं लागू करने का एजेंडा सामने रखेगी।
    पार्टी उपाध्यक्ष मुख़्तार अब्बास नक़वी का दावा है कि कांग्रेस के 50 साल के राज में मुसलमान विकास के आखि़री पायेदान पर चला गया है। उनका कहना है कि कांग्रेस जैसे धर्मनिर्पेक्ष दल वोटों की खातिर ही भाजपा और साम्प्रदायिकता का हल्ला मचाते हैं। उनका यह भी कहना है कि भाजपा सभी वर्गों को साथ लेकर चलना चाहती है। बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाये जाने के बाद मोदी ने महासचिवों और कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के सदस्यों की पहली बैठक में ही अल्पसंख्यकों तक पहुंचने की कवायद शुरू करने पर जोर दिया है। इससे पहले गुजरात चुनाव के दौरान ज्वाइंट कमैटी ऑफ मुस्लिम ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इंपॉवरमेंट नाम की दस तंजीमों की संयुक्त कमैटी का चेयरमैन सैयद शहाबुद्दीन को बनाया गया था ।
    शहाबुद्दीन की मांग थी कि अगर भाजपा मुसलमानों को लेकर वास्तव मंे गंभीर है तो 20 ऐसी विधानसभा सीटों पर चुनाव में मुसलमानों को टिकट दें जहां मुसलमानों की आबादी 20 प्रतिशत तक है। सवाल अकेला यह नहीं है कि मोदी गुजरात के दंगों के लिये गल्ती मानते हैं कि नहीं बल्कि यह है कि भाजपा अपनी मुस्लिम विरोधी सोच को बदलती है कि नहीं। सबको पता है कि भाजपा राममंदिर, मुस्लिम पर्सनल लॉ, अल्पसंख्यक आयोग, कश्मीर की धारा 370, वंदे मातरम, मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हिंदू राष्ट्र, धर्मनिर्पेक्षता और आतंकवाद को लेकर विवादास्पद राय रखती है। इसी साम्प्रदायिक सोच का नतीजा है कि वह आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गये बेक़सूर नौजवानों को आयोग द्वारा जांच के बाद भी रिहा करने के सरकार के प्रयासों का जोरदार विरोध करती है। वह सबको भारतीय ना मानकर हिंदू मानने की ज़िद करती है।
   वह दलितों के आरक्षण में मुसलमान दलितों को कोटा देनेेेे या पिछड़ों के कोेटे में से अल्पसंख्यकों को कोटा तय करने या सीध्ेा मुसलमानों को रिज़र्वेशन देने का विरोध करती है जबकि सच्चर कमैटी की रिपोर्ट चीख़ चीख़कर मुसलमानों की दयनीय स्थिति बयान कर रही है। भाजपा के लिये एक मिसाल यह सामने है कि आन्ध्र प्रदेश की सरकार ने उन 70 मुस्लिम नौजवानों से खुलेआम माफी मांगी है जिनको मई-2007 के हैदराबाद की मक्का मस्जिद बम धमाकों के आरोप में पुलिस की हिंसा और अपमान का पांच साल तक बेकसूर होने के बावजूद शिकार होना पड़ा था। इस मामले मंे राज्य सरकार ने 20 लोगों को तीन तीन लाख और बाकी को 20-20 लाख रू. का मुआवज़ा भी दिया है। वहां की सरकार ने एक अच्छा क़दम यह उठाया है कि इन बेगुनाह युवकों को चरित्र प्रमाण भी जारी किया है जिससे इनको भविष्य में आतंकवादी कहे जाने के किसी लांछन का सामना ना करना पड़े।
   पुलिस ने मालेगांव, अजमेर दरगाह व समझौता एक्सप्रैस मामलों में जिन बेकसूर मुस्लिम युवकों को पकड़ा था उनमें से लगभग सभी निर्दोष पाये गये क्योंकि जांच में इन विस्फोटों में हिंदूवादी संगठनों का हाथ पाया गया था। गुजरात की मोदी सरकार और भाजपा भी चाहे तो एक बार नरसंहार के लिये मुसलमानों से खुले दिल से माफी मांगे और उनके साथ पक्षपात बंद कर उनका पुनर्वास शुरू करे तो आज नहीं तो कल इस खाई को पाटा जा सकता है, नहीं तो भाजपा और मोदी को इस भूल की बड़ी सियासी कीमत लगातार चुकानी पड़ेगी। भाजपा के मुसलमानों के तुष्टिकरण के आरोप को खुद भारत सरकार के आंकड़े झुठलाते हैं। भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के अनुसार 1947 में देश में मुस्लिमों में साक्षरता का प्रतिशत 30 था जबकि यह उच्च शिक्षा के हिसाब से 8.5 था।
   आज जब देश में साक्षरता का प्रतिशत 70 पहंुच चुका है तो मुसलमानों में उच्च शिक्षा का प्रतिशत मात्र 2.4 है। ऐसे ही आबादी में 8.5 प्रतिशत का अंतर होने से अल्पसंख्यकों को जहां 1.20 लाख तो दलितों व आदिवासियों को 9.5 लाख छात्रवृत्ति दी जा रही है। मुस्लिम आबादी और उसकी पुलिस में मौजूदगी के हिसाब से देखा जाये तो यूपी में 19 फीसदी होने के बावजूद मात्र 4.73 प्रतिशत, बिहार में 25 की जगह 8.19, बंगाल में 17 की जगह 7.35, असम में 31 की जगह 4.42, और इसके विपरीत महाराष्ट्र में आबादी 10.06 प्रतिशत होने के बाद भी जेलों में बंद मुसलमानों की तादाद 32.4 फीसदी, गुजरात में 9.06 के मुकाबले जेल में 25 प्रतिशत और दिल्ली में 11.7 प्रतिशत आबादी के बरक्स जेल में बंद मुसलमानों का प्रतिशत 29 है।
   अगर इस बात को पलटकर देखा जाये तो मुसलमानों को उनकी आबादी के हिसाब से हर क्षेत्र में बहुत कम हिस्सा मिलने से यह गैर मुस्लिमों का तुष्टिकरण जाने अनजाने हो रहा है। इतिहास गवाह है कि 1984 में भाजपा लोकसभा की मात्र 2 सीटों तक सिमट कर रह गयी थी लेकिन हिंदूवादी राजनीति करने के लिये जब उसने रामजन्मभूमि विवाद को हवा दी तो वह दो से सीधे 88 सीटों पर जा पहुंची। इसके बाद उसने उग्र हिंदूवाद की लाइन पकड़कर पार्टी को डेढ़ सौ सीटों तक पहुंचा दिया। राजनाथ या मोदी ही नहीं भाजपा जब तक आरएसएस के नियंत्रण में अपनी साम्प्रदायिक राजनीति छोड़कर सभी भारतीयोें के लिये ईमानदारी से भलाई का काम करना शुरू नहीं करती तब तक भ्रष्ट कांग्रेस की जगह क्षेत्रीय दल चुनाव में उससे आगे आते जायेंगे, यह बात 2014 के चुनाव में एक बार फिर साबित हो सकती है।  
  0उसके होठों की तरफ़ ना देख वो क्या कहता है,

   उसके क़दमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है।।

Tuesday, 18 February 2014

केजरीवाल आज़ाद ?

दिल्ली में बनेगी अब भाजपा की सरकार?
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0केजरीवाल कांग्रेस भाजपा को पूरे देश में घेरने को हुए आज़ाद!
    आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में 49 दिन में ही धराशायी हो गयी। इस दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सरकार का वीआईपी कल्चर और लालबत्ती का आतंक ही ख़त्म नहीं किया बल्कि इस छोटे से कार्यकाल मंे अपने वादे के मुताबिक 400 यूनिट तक बिजली के दाम कम कर आधे और हर महीने 20 हज़ार लीटर पानी हर घर को निशुल्क देने का काम कर दिखाया।
    इसके साथ ही निजी बिजली कम्पनियों के खातों की जांच कैग से कराने, 5500 ऑटो परमिट जारी करने, पानी टैंकर माफिया का काला ध्ंाधा बंद करने, भ्रष्टाचार रोकने को हेल्पलाइन, महिलाओें की सुरक्षा के लिये महिला गठन की प्रक्रिया की शुरूआत, नर्सरी स्कूलों की मनमानी रोकने को हेल्पलाइन और निजी स्कूलों का मेनेजमैंट कोटा ख़त्म करना, 58 नये रैनबसेरे, हायर एजुकेशन के लिये 10 हज़ार स्कॉलरशिप, करप्शन के खिलाफ़ लड़ने के दौरान शहीद हुए सिपाही के परिवार को एक करोड़ की मदद, ठेके पर चल रही नौकरियों को स्थायी करने की प्रक्रिया शुरू, 1984 के सिख विरोधी नरसंहार की जांच के लिये एसआईटी का गठन और दिल्ली में रिटेल में एफडीआई पर रोक, गैस घोटाले को लेकर मुकेश अंबानी और केंद्र के दो मंत्रियों के खिलाफ रपट के ऐसे फैसले लिये जिनको दो दशक के अपने लंबे कार्यकालों में कांग्रेस और भाजपा आज तक नहीं ले पाईं।
   इस दौरान दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और दिल्ली पुलिस की कमान दिल्ली सरकार के हाथ सौंपने की मांग को लेकर पूरी केजरीवाल कैबिनेट ने रेल भवन के पास धरना देकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और आन्ध््राा के सीएम किरण रेड्डी को भी पीछे छोड़ दिया और धरना तभी ख़त्म हुआ जब उनकी दो पुलिस अधिकारियोें को जांच के दौरान पद से हटाने की मांग मान ली गयी। केजरीवाल जिस जनलोकपाल के मुद्दे पर सियासत में आये और सरकार बनाई उसी को लेकर उनकी सरकार चली  भी गयी लेकिन वे जानते हैं कि उनकी सरकार की इस कुर्बानी से दिल्ली ही नहीं देश की जनता उनकी क़ायल हो गयी है।
   पहले तो केजरीवाल बहुमत ना मिलने से सरकार बनाना ही नहीं चाहते थे लेकिन जब कांग्रेेस ने आप को बिना शर्त बिना मांगे आपकी ही शर्तों पर उसको सरकार बनाकर अपने वादे पूरे करने की चुनौती दी तो उन्होंने जनता की राय जानी और जब वह राय कांग्रेस के सपोर्ट से सरकार बनाने के पक्ष में आ गयी तो केजरीवाल ने 28 दिसंबर को दिल्ली के सीएम की शपथ ले ली। केजरीवाल जानते थे कि उनकी सरकार का जीवन लंबा नहीं है लकिन जब कांग्रेस और भाजपा ने उनको हर सही गलत बात पर विरोध के लिये विरोध को घेरना शुरू किया तो उन्होंने जनलोकपाल बिल सीध्ेा विधनसभा में रखकर मतदान कराने का सुनियोजित फैसला किया जिससे यह साफ हो सके कि भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस भाजपा दोनों की मिलीभगत है।
   जो भाजपा कर्नाटक में युदियुरप्पा को साथ लेने में बुराई नहीं समझती और उसके पीएम पद के दावेदार गुजरात में नौ साल तक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं करते उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती थी। ऐसे ही 43 साल तक लोकपाल बिल को लटकाये रखने वाली कांग्रेस जनलोकपाल, केजरीवाल के धरने और उनके विद्रोही तौर तरीकों को लेकर लगातार संविधान, परंपरा, नियम और कानून की दुहाई देती रही लेकिन यह भूल गयी कि तेलंगाना के मुद्दे पर संसद में उसके मंत्री और दूसरे सांसद क्या अराजकता फैला रहे हैं और यह कि केजरीवाल सत्ता परिवर्तन को नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिये आये थे जो काफी हद तक करने में वे कामयाब रहे हैं।
   केजरीवाल ने जनलोकपाल पर अपनी सरकार शहीद करके इस्तीफा देने के साथ विधानसभा भंग कर नये चुनाव कराने की सिफारिश भी की थी लेकिन जब उन्होंने इस्तीफा दिया तब तक उनकी सरकार अल्पमत में आ चुकी थी, ऐसी हालत में लेफ्टिनेंट गवर्नर उनकी सिफारिश मानने का मजबूर नहीं थे सो कांग्रेस सोची समझी योजना के तहत प्रेसीडेंट रूल लगाने के साथ ही विधानसभा भंग नहीं की गयी है बल्कि निलंबित रखी गयी है।
   इससे यह संभावना है कि लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा जैसे तैसे दिल्ली में अपनी सरकार बनाने में सफल हो जाये। इससे कांग्रेस और भाजपा दोनों को यह लाभ नज़र आ रहा है कि शीघ्र चुनाव होने पर केजरीवाल दो तिहाई बहुमत से दिल्ली की सत्ता में ना लौट सकें। जनता की याददाश्त कमजोर होती है जिससे पांच साल बाद हालात पता नहीं क्या हों? उधर केजरीवाल और उनकी आप टीम अब दिल्ली सरकार की ज़िम्मेदारी से बरी होकर पूरे देश में कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ लोकसभा चुनाव में पूरे दमख़म से उनकी पोल खोलने के अभियान में जुटने जा रहे हैं।
    अब यह तो समय ही बतायेगा कि केजरीवाल का फैसला सही है गलत? अरविंद केजरीवाल ने एक साल के अंदर पहले आम आदमी पार्टी बनाकर, उसके बाद दिल्ली में 28 सीटें जीतकर और आप की सरकार का सीएम बनकर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की 25 नवंबर 2012 की उस चुनौती का मंुहतोड़ जवाब दे दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि अरविंद पहले म्यूनिसिपल कारापोरेटर ही बनकर दिखा दें। ऐसे ही पूर्व सीएम शीला दीक्षित ने 22 सितंबर 2013 को कहा था कि आप जैसे दल मानसूनी कीड़ों की तरह की होती हैं, ये आती हैं, पैसे बनाती हैं और गायब हो जाती हैं।
    ये इसलिये नहीं टिक पाती क्योंकि इनके पास दृष्टि नहीं होती। ऐसे ही भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज ने 2 दिसंबर 2013 को कहा था कि जनता आप को वोट देकर अपना मत ख़राब नहीं करना चाहती। बीजेपी के एक्स प्रेसीडेंट नितिन गडकरी ने 2 दिसंबर 13 को कहा था कि आप कांग्रेस की बी टीम है। दोनों बड़े दलों के इतने धुरंधर नेताओें के चुनाव नतीजे आने से पहले के ये बयान उनका खोखलापन बताने के लिये काफी हैं। आपको यहां यह भी याद दिला दें कि आप की सरकार बनने से पहले केवल 28 सीटें जीतने से ही दो बड़े काम लोकपाल का संसद में पास होना और भाजपा का 32 विधायकों के साथ सबसे बड़ा दल होने के बावजूद अन्य विधयकों को तोड़कर सरकार बनाने का प्रयास ना करना।
   कांग्रेस को यह भी आशा थी कि आप को सपोर्ट देकर सरकार बनवाई गयी तो वह कांग्रेस के प्रति कुछ नरम हो सकती है जबकि इस दौरान भाजपा ने कांग्रेस या आप के कुछ विधायक तोड़ लिये तो वह उसके घोटालों और भ्रष्टाचार की जांच कराकर लोकसभा चुनाव में और अधिक नुकसान पहंुचा सकती है।
    कांग्रेस यह भी मान कर चल रही थी कि आप को सपोर्ट कर के सरकार बनवाने से जनता की नाराज़गी उससे तो कम हो सकती है लेकिन नाकाम होने पर मतदाता आप से ख़फ़ा हो जायेगा।इसके विपरीत केजरीवाल ने शीला दीक्षित के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सख़्त कदम उठाकर और होममिनिस्टर सुशील शिंदे को उनकी औकात बताकर साबित कर दिया कि वह अपने एजेंडे पर चले। नजीबाबाद के हिंदी ग़ज़लकर दुष्यंत त्यागी की ये लाइनें यहां केजरीवाल के लिये समीचीन है-
 0सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये।
  मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चहिये।।

Monday, 17 February 2014

कांग्रेस की वापसी असंभव...

तीसरा मार्चो ! सरकार बनने के सबसे ज़्यादा आसार?!
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0 कांग्रेस की वापसी असंभव, भाजपा की सीटें बढ़ेंगी घटक नहीं!
     2014 के लोकसभा चुनाव के बाद तीन संभावनाएं प्रबल हैं। एक- कांग्रेस की सरकार किसी कीमत पर नहीं बनेगी। दो-भाजपा की सीटंे बेशक बढ़ जायेंगी लेकिन उसको सरकार बनाने लायक घटक नहीं मिलने हैं। तीन- तीसरे मोर्चे की अल्पजीवी सरकार कांग्रेस के सपोर्ट से बन सकती है। हैरत की बात यह है कि जिस राजनीतिक समीकरण की संभावना सबसे अधिक है, मीडिया उसको कोई खास तवज्जो देने को तैयार नहीं है। हालांकि यह भी स्पश्ट है कि मीडिया चाहे इलैक्ट्रानिक हो और चाहे प्रिंट लेकिन उसके संचालक और स्वामी भी पूंजीवादी सोच के लोग हैं जिससे उनको जो अधिक फ़ायदे का सौदा नज़र आ रहा है वे उसको ज्यादा कवरेज दे रहे हैं। इस समय कारपोरेट सैक्टर भाजपा विशेषरूप से उसके पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के पीछे एकजुट है जिससे उसने मोदी के लिये मीडिया को सैट करने का पूरा इंतज़ाम बड़े पैमाने पर किया हुआ है।
    इसकी वजह साफ है कि जिस तरह से मोदी ने गुजरात में नियम कानून को ताक पर रखकर कारपोरेट सैक्टर को सरकारी ज़मीन कौड़ियों के भाव से लेकर बैंक लोन मामूली ब्याज दर पर उपलब्ध् कराये हैं उससे उनको लगता है कि उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण का बाकी बचा एजेंडा मोदी के नेतृत्व में भाजपा ही पूरा कर सकती है। यह अलग बात है कि जिस पूंजीवाद के पड़ाव वाले मक़ाम तक आते आते कांग्रेस हांफ गयी है और वह आम आदमी को खुश करने की आध्ी अध्ूरी कोशिश करके यह दिखाना चाहती है कि उसको महंगाई और असमानता रोकने की बड़ी ि‍फक्र है उस पर अब आम जनता तिल बराबर भी विश्वास करने को तैयार नहीं है। नतीजा यह होने जा रहा है कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार और मनमानी से तंग आकर मतदाता ना चाहते हुए भाजपा और क्षेत्रीय दलों की गोद में जाने को मजबूर है।
   यह अलग बात है कि जिस तरह से मोदी के पास कोई वैकल्पिक आर्थिक नीति नहीं है उसी तरह अपने अपने अहंकार और प्रधानमंत्री पद की आस लगाये क्षेत्रीय दलों के नेताओं के पास भी सबके विकास का सुचिंतित प्रोग्राम देश की भलाई के लिये नहीं है। इस समय सबसे बड़ा नारा और दावा सबका यही है कि जो भ्रष्टाचार और महंगाई कांग्रेस ने बढ़ाई है वे उसको सत्ता में आते ही ख़त्म करेंगे और सबके लिये रोटी कपड़ा और मकान के साथ दवाई पढ़ाई व रोज़गार का इंतज़ाम करेंगे लेकिन यह कैसे होगा यह योजना किसी के पास नहीं है। सबसे बड़ा लाख टके का सवाल यह है कि अगर तीसरा मोर्चा बन भी गया तो उसका नेतृत्व कौन करेगा? हालांकि लोकतंत्र में यह मुश्किल सवाल नहीं होना चाहिये था कि यह कैसे तय हो?
   सीध सा फंडा है कि जिसकी सीटें सबसे अधिक होंगी वही मोर्चे का नेतृत्व करेगा और अगर कई दलों की सीटें बराबर आ जायें तो निर्णय लाटरी द्वारा हो सकता है लेकिन भाजपा ने एक बार मायावती को कम सीटें होने के बाद भी उनकी शर्तो पर गठबंधन कर यूपी की सीएम बनवाकर सत्तालोलुपता का रास्ता खोल दिया है जिससे क्षेत्रीय घटक का हर नेता यह चाहता है कि वह हर कीमत पर किसी भी तिगड़म से पीएम बन जाये। सवाल यह भी है कि कांग्रेस जब अपनी सरकार नहीं बना पायेगी तो वह तीसरे मोर्चे की सरकार बाहरी सपोर्ट से क्यों बनाना चाहती है?
   इसका सीधा से जवाब है कि वह चाहती है कि तीसरा मोर्चा ना केवल सरकार उसके सपोर्ट से बनाकर उसके लिये नरम रहे बल्कि वह जब उचित मौका देखे तो पहले इतिहास की तरह तीसरे मोर्चे की सरकार से समर्थन वापस लेकर मध्याव‍ि‍ध चुनाव कराकर इस बहाने ि‍फर से सत्ता में आने का रास्ता साफ करे कि देखो भाजपा तो साम्प्रदायिक होने की वजह से सरकार बना ही नहीं सकती और तीसरा मोर्चा सरकार बन भी जाये तो चला नहीं सकता। लेदेकर हम यानी कांग्रेस ही एकमात्र दल है जो सरकार अकेले और गठबंधन की बना भी सकता है और चला भी सकता है। कांग्रेस ने इसी रण्नीति के तहत दिल्ली में केजरीवाल के नेतृत्व में आप की अल्पजीवी सरकार भी बनवाई है जिसे वह सोची समझी योजना के तहत ज़लील और परेशान होकर भी संसदीय चुनाव से पहले किसी कीमत पर नहीं गिराना चाहती।
   कांग्रेस जानती है कि उसका तो आने वाले चुनाव में बुरी तरह सफ़ाया होना अब तय है लेकिन उसकी जगह विकल्प मोदी के नेतृत्व में किसी तरह से भापजा ना बने वर्ना उसको आगे चलकर ज्यादा मुसीबतों का सामना करना होगा। उसने यह सोचकर आप को आगे किया है कि वह अगर चर्चा में रहेगी तो भाजपा को जाने वाले काफी वोट और सीटें आप को चली जायेंगी। राजनीतिक जानकारों का अनुमान है कि अगर आप 300 सीटें भी लड़ती है तो उसको 15 से 30 तक सीट और 4 से 6 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं। यह सोचने वाली बात है कि जब एक एक सीट और एक एक प्रतिशत वोट पर कांटे की टक्कर हो तो ऐसे में आप के मैदान में आने से भाजपा का खेल हर हाल में बिगड़ना तय है।
   अगर भाजपा की सीटें 200 से आगे नहीं बढ़ती जैसा कि संभावना है तो उसको 72 सीटों का जुगाड़ करना वह भी मोदी जैसे मुस्लिम विरोधी की छवि वाले नेता के नेतृत्व में लगभग असंभव हो जायेगा। यह भी मुमकिन नहीं होगा कि भाजपा सरकार बनाने के लिये मोदी की जगह किसी और उदार छवि के नेता को आगे करके सेकुलर दलों से सपोर्ट के लिये तैयार हो जाये। भाजपा के घटक अकाली दल और शिवसेना के बाद सबसे ज्यादा उम्मीद जयललिता से थी जो वामपंथियों के साथ गठबंधन करके पहले ही छिटक चुकी है। इसके साथ ही नवीन पटनायक से लेकर ममता बनर्जी और मायावती से लेकर नीतीश कुमार तक से वह साथ आने की आशा भी नहीं कर सकती।
   ऐसे में कांग्रेस की रण्नीति काम आयेगी और वह सपा बसपा, द्रमुक अन्नाद्रमुक, जनतादल यूनाइटेड राष्ट्रीय जनतादल और तृणमूल कांग्रेस व वामपंथियों के विरोधाभास के बावजूद तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने को धर्मर्निरपेक्षता और देश की एकता अखंडता बचाने के नाम पर कोई ना कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेगी और इसी तरह से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की संभावना सबसे ज़्यादा प्रबल हो चुकी है। कहीं तीसरे मोर्चे को लेकर ऐसा ना हो जाये जो शायर ने कहा है-
निज़ाम ए वक़्त का खुद को अमीन कहते थे,
तमाम ऐहल ए हुनर को कमीन कहते थे ।
गिरे जो आसमां से तो अब यह समझे हैं,

वो आसमां थे जिनको ज़मीन कहते थे।।

Monday, 10 February 2014

तेरी हिम्मत पे चम्मच हमें नाज़ है

  
तेरी हिम्मत पे चम्मच हमें नाज़ है
0 चमचो की बदौलत ही कई सरकारें चलीं तो कई ताज छिन गये!                 
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
     सुना आपने देहरादून के चम्मच कांड में एक दर्जन लोगों को उम्रकैद हो गयी। एक विवाह समारोह में इन लोगों ने चम्मच को लेकर हुए शुरू झगड़े में दो लोगों की हत्या कर दी थी। क्या ज़माना आ गया एक चम्मच ने पहले दो लोगों की जान ली और अब उसी चम्मच ने 12 लोगों को उम्रभर के लिये अंदर करा दिया। यह कम्बख़्त चम्मच चीज़ ही ऐसी होता है कि आदमी से ज़्यादा तवज्जो इसे दी जाने लगी है। अब देखिये ना अपने देश में कई सरकारें चमचो की वजह से बनी और उनकी मेहरबानी से ही चल रही है। हां यह अलग बात है कि जब कोई बड़ी आफत आती है तो चम्मच तोतों की तरह आंखे बदलने में ज़रा भी देर नहीं लगाते और सामने वाला हाथ मलता रह जाता है।
     कार्यालयों में कुछ लोग काम की बजाये बॉस की चमचागिरी करके ही आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं अब भले ही मेहनती और योग्य बंदा जलभुनकर राख ही क्यों न हो जाये, उनकी बला से। यह रास्ता आसान और हंडरेड परसेंट गारंटी से कामयाबी वाला जो है। संतरी से लेकर मंत्री तक चमचो का ही दबदबा है। थाने में आईपीसी की धराआंे से अधिक चमचो की पौबारा है। सरकारी नौकरी में तो चमचागिरी का मज़ा ही कुछ निराला है। मिसाल के तौर पर प्राइमरी में टीचर हैं तो आराम से घर बैठकर मस्ती करें बस बीएसए की चमचागिरी करना याद रखें। एमपी एमएलए के चमचे भी मज़े ले रहे हैं। अगर आप किसी बदमाश के चमचे हैं तो क्या कहने, आप न केवल मुहल्ले में सब पर रौब गालिब कर सकते हैं बल्कि पुलिस से भी आपकी खूब पटेगी।
    सियासत में तो जलवा ही चमचागिरी का है। टिकट लेना हो तो चमचागिरी से बड़ी काबलियत और कोई नहीं और मंत्री बनने से लेकर पीएम बनना हो तो भी यही हुनर काम आयेगा। मायावती और शीला इसी खूबी से सरकार चला रहे हैं तो लालू और मुलायम चमचागिरी न करने का नतीजा सत्ता से बाहर होकर भोग रहे हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं है आइरन लेडी कही जाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके चमचो, आप चाहें तो उनको तहज़ीब के दायरे में सलाहकार भी कह सकते हैं, ने सत्ता में बने रहने के लिये जनता का मूड देखने की बजाये एमरजैंसी लगाने की नेक सलाह दे डाली थी नतीजा यह हुआ कि वे उसी एक गल्ती से सत्ता से बाहर हो गयी। चमचो का कुछ नहीं बिगड़ा वे नारा लगाकर अपनी चमचागिरी का फर्ज अदा करते रहे इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा
   चमचो की कहानी लंबी है कि कैसे पंजाब में भिंडरावाला को आस्तीन का सांप बनाकर पालने की सलाह दी गयी और फिर जब इंदिरा जी की जान चली गयी तो चमचो ने राजीव जी को चमचागिरी करके पीएम बनवा दिया। चमचागिरी के बल पर एक पायलट की सरकार हवा में चलती रही और एक दिन चमचो ने फिर वही पुराना खेल दोहराया कि बाबरी मस्जिद/ रामजन्मभूमि का जिन्न बोतल से बाहर निकालने की सलाह सीधे सादे राजीव गांधी को दे डाली जिसका नतीजा सबके सामने है। इतना ही नहीं चमचो ने विदेश तक में हाथ पांव मारने शुरू किये तो भारतीय सेना को श्रीलंका के तमिल चीतों से लड़ने आ बैल मुझे मारकी तर्ज़ पर भेज दिया गया। चमचो की गलत सलाह से न केवल राजीव गांधी की कुर्सी गयी बल्कि लिट्टे की बदले की कार्यवाही में जान भी चली गयी।
  ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही चमचो की इतनी चलती हो बल्कि अमेरिका को देखो जो उसकी चमचागिरी करते रहते हैं वे चाहें तानाशाह हों और निकट भविष्य में उनका चुनाव कराने का इरादा भी न हो तो भी अपने अंकल सैम उनकी तरफ न खुद आंख उठाकर देखते हैं और न ही किसी को ऐसा करने की इजाज़त ही देते हैं। मिसाल के तौर पर सउूदी अरब जैसे कट्टरपंथी और पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के पालनहार को अंकल सैम चमचागिरी करने के इनाम के तौर पर अब तक बख़्शे हुए हैं, हां एक बात और जो उनकी चमचागिरी से इनकार करता है तो वे उसे नेस्तोनाबूद करने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ते।
   ओसामा बिन लादेन को ही लो जब तक वह अंकल सैम के इशारे पर रूस को अफगानिस्तान से भगाने के लिये जेहाद रूपी चमचागिरी करता रहा तो सब ठीक चलता रहा लेकिन जैसे ही उसने मुस्लिम मुल्कों से अमेरिका के चमचो का दख़ल ख़त्म करने का बीड़ा उठाया तो वह जेहादी से खूंखार आतंकवादी बन गया और चमचागिरी ख़त्म तो ओसामा भी ख़त्म। ऐसे ही इराक के सद्दाम हुसैन ने चमचागिरी से मना किया तो बिना ख़तरनाक हथियार बरामद किये ही सद्दाम की छुट्टी कर दी गयी। ताज़ा मिसाल लीबिया के कर्नल गद्दाफी की है ओबामा की चमचागिरी न कर पंगा ले रहा था, बेमौत मारा गया। आजकल पाकिस्तान चमचागिरी से ना नुकुर कर रहा है उसका भी भगवान ही मालिक है। ज़रदारी और गिलानी शायद ज़िया उल हक़ की चमचागिरी से मना करने का हश्र भूल गये हैं।
   अंकल सैम को गुस्सा आ गया तो पाक के राष्ट्रपति का चेहरा ज़र्द और प्रधानमंत्री का मुंह गिला करने लायक नहीं रहेगा। तरक्की का आज एक मात्र रास्ता है चमचागिरी। जय हो चमचो की। अगर गुस्ताख़ी माफ करें तो यूं कहा जा सकता है।
  0 जिनके आंगन में चमचो का शजर लगता है,

    उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है।। 

Sunday, 9 February 2014

खुशवंत जी की चुटकुला खोज

खुशवंत जी ने पता लगाया सरदारों पर क्यों बनते हैं चुटकुले?
   -इक़बाल हिंदुस्तानी
0 मनमोहन सिंह को लेकर उनकी राय से पक्षपात सामने आया!
           सबसे पहले यह स्पश्ट करदूं कि मैं इस बात के व्यक्तिगत रूप से खिलाफ हूं कि चुटकुले सरदारों या किसी भी वर्ग या जाति पर बनाये जायें। मैं यह भी उतना ही गलत मानता हूं कि किसी की अच्छाई या बुराई हम उसके धर्म जाति या पद को देखकर करें। यह एक तरह का पूर्वाग्रह ही कहा जायेगा। अब तक मेरी राय जाने माने लेखक सरदार खुशवंत सिंह के बारे में कम से कम यह तो नहीं थी कि वह भी पीएम मनमोहन सिंह का पक्ष केवल इसलिये लेंगे क्यांेकि वह भी उनकी तरह एक सरदार हैं। इतना ही नहीं खुशवंत सिंह जी ने पता नहीं कौन सी रिसर्च या सर्वे से यह भी पता लगा लिया है कि केवल पीएम मनमोहन सिंह ही नहीं बल्कि सबसे अधिक लतीफे सरदारों पर इसलिये बनाये जाते हैं क्योंकि वे दूसरों से ज़्यादा सफल होते हैं।
   साथ ही उन्होंने यह भी रहस्य उद्घाटन किया है कि सरदारों पर अधिकांुश लतीफे बनाने का यह नेक काम खुद सरदार लोग ही करते हैं। इसके साथ ही उनका यह दावा भी है कि पारसियों और मारवाड़ियों पर भी चुटकुलों की कोई कमी नहीं है क्योंकि उनके बकौल वे भी दूसरों से बेहतर हाल में हैं। खुशवंत सिंह फरमाते हैं कि अपने पर भरोसा करने वाला ही खुद पर लतीफा बना सकता है।
   अमेरिका के एक सिख भाई निरंजन सिंह ने तो इस मुद्दे पर पूरी एक किताब ही लिख डाली है। उनकी किताब का शीर्षक है ‘‘बंताइज़्मः द फिलॉसफी ऑफ सरदार जोक्स’’। अब यह तो निरंजन सिंह जी ही बता सकते हैं कि चुटकुलों में क्या फिलॉसफी होती है लेकिन यह काम वास्तव में उन्होंने हिम्मत का किया है क्योंकि ज़िंदा दिल लोग ही अपने पर हंस सकते हैं। हम बात कर रहे थे महान लेखक और वरिष्ठ पत्रकार सरदार खुशवंत सिंह जी की। उनका कहना है कि उनके दो फीसदी सिख समाज ने देश को कमाल का प्रधनमंत्री दिया है।
    ऐसा पीएम जो ईमानदार और विनम्र है। वे मनमोहन सिंह को कारगर भी बताते हैं। साथ ही मोंटेक सिंह आहलूवालिया का नाम और जोड़ते हैं कि वे भी एक सिख हैं और प्लानिंग कमीशन का काम शानदार तरीके से अंजाम दे रहे हैं।
   इन दोनों मिसालों पर हमें सख़्त एतराज़ है। मनमोहन और मोंटेक ने देश का सत्यानाश कर दिया है। मनमोहन कमाल के नहीं बल्कि धमाल और चौपाल के एक ऐसे पीएम हैं जो बेईमान सरकार चलाने का रिकॉर्ड बना रहे हैं। ऐसे पीएम को ईमानदार कैसे माना जा सकता है? क्या बेईमानी केवल रूपये पैसे की होती है? राजा जैसे बेईमान मंत्री को लंबे समय तक अपनी कैबिनेट में बनाये रखना, सुरेश कलमाड़ी को सहन करना और भ्रष्टाचार से मज़बूत कानून बनाकर लड़ने की बजाये अन्ना और उनकी टीम से लड़ना, उनका उत्पीड़न और अपमान करना कहां की विनम्रता और ईमानदारी कही जा सकती है।
   जिस आदमी की अपनी कोई साख, समझ और सोच ही न हो वह गर्व करने लायक कैसे हो सकता है? मनमोहन सही मायने में आज रबर स्टैंप की तरह के पीएम हैं तो सिर्फ इसलिये कि वह सोनिया गांधी की हर बात को सर आंखों पर रखते हैं। उन के अंदर इतनी हिम्मत और ताकत भी नहीं है कि वे जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ सकें। वे शायद पहले ऐसे पीएम हैं जो राज्यसभा से मनोनीत होकर आते हैं। उनको अपने देश की जनता से अधिक अमेरिका, वर्ल्ड बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के हितों की चिंता रहती है। उनके ज़माने में जितनी महंगाई बढ़ी है उतनी आज तक नहींे बढ़ी। रहा सवाल मोंटेक सिंह का गरीबी के पैमाने को लेकर उनका अमानवीय रूप पूरा देश पिछले दिनों देख चुका है।
   हम यह दावा नहीं कर रहे कि ये दोनों सिख समुदाय से हैं इसलिये ख़राब या असफल हैं बल्कि यह बात नहीं मानी जा सकती कि सरदार होने की वजह से इनकी नाकामी और नालायकी पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिये। मनमोहन सिंह तो अलीबाबा चालीस चोर की कहानी को चरितार्थ करते नज़र आ रहे हैं। वे यह बात स्वीकार भी कर चुके हैं कि गठबंधन सरकार चलाने की अपनी मजबूरियां होती हैं। इसका मतलब वे सरकार चलाने सरकार बचाने और उसका मुखिया बने रहने के लिये कोई भी समझौता कर सकते हैं। यहां तक कि देश के हित और जनहित से भी समझौता कर सकते हैं? ऐसे पीएम को कारगर नहीं नहीं बताना चाहिये बल्कि कारागार में डाला जाना चाहिये ।
   खुशवंत सिंह के बारे मंे अब तक मेरी जो बेबाक और साफ सुथरी राय थी वह 3 दिसंबर को दैनिक हिंदी अख़बार हिंदुस्तान में उनका यह लेख पढ़कर ख़राब हो गयी क्योंकि वह एक सरदार होने की वजह से पीएम का पक्ष ले रहे हैं।
 0सोचा था हमने जा के उससे फ़रियाद करेंगे,

  कमबख़्त वो भी उसी का चाहने वाला निकला।