Sunday, 26 February 2023

पाकिस्तान संकट

*पाकिस्तान: बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से आये!* 


0 पाकिस्तान आजकल भारी संकट में है। पड़ौसी मुल्क और मानवता के नाते वहां की परेशान जनता से किसी भी इंसान देश व समाज को सहानुभूति हो सकती है। लेकिन उसके शासकों सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आज़ादी के बाद से जो रास्ता चुना वह उसको इसी बर्बादी और तबाही की ओर ले जा सकता था। आज उसकी वहन क्षमता से कई गुना अधिक 250 बिलियन अमेरिकी डालर कर्ज़ है। उसको 33 बिलियन डाॅलर 2023 में चुकाने हैं। उसकी कुल खेती लायक ज़मीन में से 70 प्रतिशत पर 263 अमीर सामंत और नवाब रहे बड़े लोगों का कब्ज़ा है। पिछले साल आई भीषण बाढ़ से उसकी एक तिहाई खेती तबाह हो गयी। वहां निर्माण से अधिक आतंक पैदा हुआ है।        


                  -इक़बाल हिंदुस्तानी


      आईएमएफ यानी इंटरनेशनल मोनेट्री फंड ने उसको इस संकट से निकालने के लिये 7 अरब डालर का बेलआउट पैकेज देने को हामी तो भरी है लेकिन उसकी शर्तें इतनी मुश्किल जनविरोधी और सख़्त हैं कि पाक के सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली हालत है। रेटिंग एजेंसी मूडीज़ का कहना है कि पाक की कर्ज़ चुकाने की क्षमता आज दुनिया के किसी भी आज़ाद और संप्रभु देश के मुकाबले सबसे कमज़ोर है। अगर पाक इस पैकेज को लेता है तो उसको आईएमएफ की शर्त के अनुसार सब्सिडी में भारी कटौती टैक्स दरों में बढ़ोत्तरी और सुधारवादी आर्थिक नीतियां अपनानी होंगी। पाक के सामने करो या मरो की हालत है। उसके कर्ज़ का ब्याज भुगतान ही कुल आने वाले राजस्व का आधा है। 2017 का विदेशी कर्ज़ 66 से बढ़कर 100 बिलियन हो चुका है। डाॅलर की कीमत 267 रूपये हो चुकी है जिससे पाक का कर्ज़ बिना और लिये ही बढ़ता जा रहा है। साथ ही इससे महंगाई को भी पर लग गये हैं। जो 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 3.67 अरब डालर बचा है जोकि आगामी तीन सप्ताह के लिये ही हैै। उसकी सीमा पर विदेशी माल के ढेर लगे हैं। लेकिन उनकी कीमत चुकाने के लिये विदेशी मुद्रा ना होने से वह माल पाक मंे अंदर प्रवेश नहीं कर पा रहा है। हालांकि पाक के वर्तमान संकट के अन्य कारणों में तात्कालिक वजह यूक्रेन जंग वैश्विक मंदी और पिछले साल आई भयंकर बाढ़ से 33 मिलियन लोगों का जीवन तबाह हो जाना भी है। लेकिन आतंकवाद उग्रवाद चरमपंथ कट्टरपंथ करप्शन सेना का बार बार चुनी हुयी सरकार का तख़्ता पलट करना आर्थिक गैर बराबरी विदेश में काम करने वाले पाकिस्तानियों पर अर्थव्यवस्था का टिका होना आज़ादी के दशकों बाद तक अपना संविधान ना बना पाना लोकतंत्र मज़बूत ना होना सेना पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करना अमेरिका और खाड़ी के देशों से मिलने वाली बड़ी वित्तीय मदद का बड़ा हिस्सा तालिबान जैसे आतंकी संगठनों को पैदा कर पालना पोसना और भारत की तरह ज़मींदारी उन्मूलन ना कर देश में केवल बेहद गरीब और बेहद अमीर दो ही वर्ग आज तक बने रहना भी पाक की तबाही का कारण बना है।कहावत पाक पर इसलिये भी याद आ रही है कि इस संकट के दौर में जिस तालिबान को उसने बड़ी मेहनत लगन और कट्टर मज़हबी जनून की घुट्टी पिलाकर पाला था। आज वही उसके सीमावर्ती इलाकों में इतनी ज़बरदस्त पकड़ बना चुका है कि वहां पाक सरकार का राज नहीं चलता। तालिबान मस्जिद में नमाज़ पढ़ते लोगों और आर्मी के स्कूल में सैनिकों के बच्चो को जब तब बम और गोलीबारी से मारता रहता है। लेकिन पाक सरकार सेना और आईएसआई बेबस नज़र आते हैं। शायद गांधी जी ने इसीलिये बार बार ज़ोर देकर यह कहा था कि सही मकसद हासिल करने के लिये सही रास्ता भी अपनाया जाना ज़रूरी है। लेकिन पाक ने अफगानिस्तान से रूस को भगाने में अमेरिका के साथ मिलकर जो तालिबान पैदा किया वह आज उसी को खा रहा है। कहावत सही है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से आये।


 *नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक व नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं

Tuesday, 14 February 2023

बाल विवाह कैसे रुकेंगे?

*बाल विवाह रोकना है तो जेल नहीं स्कूल बढ़ाने होंगे!* 

0 असम सरकार ने बाल विवाह के खिलाफ़ अभियान शुरू करते हुए लगभग एक सप्ताह में 4000 रपट दर्ज कर 2500 से अधिक लोगों को जेल भेज दिया है। सीएम हिमंत विस्व सरमा ने कहा है कि जिन लोगों ने विगत 7 साल में बाल विवाह कराने में किसी भी तरह की भागीदारी की है उनको हर हाल में जेल भेजा जायेगा। बाल विवाह कराने वाले परिवारों के साथ ही दर्जनों क़ाज़ी और पुजारियों को भी पकड़ा गया है। कानून के हिसाब से देखा जाये तो अभियान सही है। प्रोहिबीशन आॅफ़ चाइल्ड मैरिज एक्ट व पाॅक्सो यानी प्रोटेक्शन आॅफ़ चिलड्रन फ्राम सेक्सुअल आॅफ़ेंस एक्ट यही कहता है। लेकिन सच यह भी है कि लोगों को जेल भेजकर नहीं शिक्षित करके बाल विवाह अधिक रोके जा सकते हैं। ऐसा सर्वे बताते हैं।      

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      पाॅक्सो के अनुसार 14 साल से कम उम्र की लड़की से सैक्स करना संज्ञेय और गैर ज़मानतीय अपराध है। ऐसा भले ही लड़की की सहमति और उससे शादी के बाद किया गया हो। ऐसे विवाह गैर कानूनी और अमान्य हैं। पुलिस ऐसे मामलों में बिना वारंट आरोपी को जेल भेज सकती है। इसमें 5 साल की सज़ा का प्रावधान है। इतना ही नहीं पाॅक्सो की धारा 19 में ऐसी शादी में किसी भी तरह से सहयोग करने और जानकारी होने पर पुलिस को सूचना ना देने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान है। यहां तक कि अगर डाक्टर के पास ऐसी दुल्हन गर्भपात या मां बनने पर चिकित्सा कराने आये तो डाक्टर को तत्काल पुलिस को सूचना देनी होगी। दूसरी तरफ बाल विवाह निषेध कानून के अनुसार 14 से अधिक और 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी करने पर विवाह मान्य तो होगा लेकिन अवैध माना जायेगा। इस कानून मंे 2 साल की सज़ा और एक लाख रू. तक का जुर्माना हो सकता हैै। उधर मुस्लिम अब तक इस कानून से पर्सनल लाॅ की वजह से बाहर माने जाते थे। उनका मानना है कि इस्लाम में लड़की के पीरियड शुरू होने पर उसको बालिग माना जाता है। इसके लिये कोई आयु तय नहीं है लेकिन अगर कोई सबूत या गवाही ना मिले तो यह उम्र आमतौर पर 15 साल मानी जाती है। लेकिन अब सरकार सबके लिये एक जैसा कानून लाने जा रही है। उधर अलग अलग हाईकोर्ट ऐसे मामलों में अलग अलग फैसले देते आ रहे हैं।  जिससे अब अंतिम निर्णय के लिये यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम लड़कियों के लिये शादी की उम्र तय करने के लिये याचिका लगा चुका है।
बहने से दर्दनाक मौत हो गयी तो हत्या के आरोप से उसका पति तो कोर्ट से बच गया। लेकिन इसके बाद इस तरह के 44 मामलों में डाक्टरों द्वारा पेश की गयी सूची से समाज में बाल विवाह के खिलाफ एक माहौल बनना शुरू हुआ। 11 साल की रूकमा बाई ने जबरन शादी करने पर अपने पति दादाजी बीकाजी के साथ विदा होने को मना कर दिया तो उसने कोर्ट में केस कर दिया। लेकिन समाजसुधारक एमजी रानाडे व बहराम जी मालाबारी ने रूकमा बाई को खुलकर सपोर्ट किया। इसके बाद 1891 के कानून में संशोधन कर लड़की की शादी की आयु 12 साल कर दी गयी। 1927 में राय साहिब हरविलास सारदा ने लेजिस्लेटिव कौंसिल में बाल विवाह रोकने का बिल पेश किया तो नया कानून बनाकर आयु 14 कर दी गयी। 2008 में विधि आयोग ने गरीबी कर्ज़ और दहेज़ को बाल विवाह की बड़ी वजह बताया था। असम सरकार को यह भी याद रखना चाहिये कि 2000 से 2010 के बीच शिक्षा बढ़ने पर बाल विवाह का आंकड़ा 47 से 30 पर आ चुका है। इस मामले में कानून के डर से अधिक जनता के बीच जागरूकता शिक्षा और सम्पन्नता लाकर सुधार हो सकता है।

 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक हैं।*

Sunday, 5 February 2023

भाजपा और मुसलमान

*पीएम मोदी की सलाह पर अमल करेंगे भाजपा नेता ?* 

0प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जहां अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर बात की वहीं अपनी पार्टी के नेताओं को कहा कि वे समाज के सभी वर्गों खासतौर पर पसमांदा व वोहरा मुसलमानों के पास जायें और उनको भाजपा सरकार के अच्छे काम बतायें। उन्होंने यह भी कहा कि कोई वोट दें या ना दें लेकिन वे मुसलमानों के बारे में कोई गलत बयानबाज़ी ना करें। मोदी ने पार्टी के वर्कर्स और लीडर्स को मर्यादित भाषा बोलने की सीख देते हुए यह भी नसीहत दी कि फिल्मों को लेकर भी फालतू विरोध से उनको बचना चाहिये। इसके बाद शाहरूख़ खान की फिल्म पठान का विरोध तो लगभग खत्म होता नज़र आया लेकिन क्या मुसलमानों पर भाजपा नेता अपना विरोध ख़त्म करेंगे? यह देखना अभी बाकी है।      

     -इक़बाल हिंदुस्तानी

      पीएम मोदी से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी कई बार मुसलमानों को लेकर सकारात्मक बयान जारी करते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा वास्तव में मुसलमानों को लेकर अपनी नीति बदल रही है? क्या संघ परिवार को यह लग रहा है कि वह हिंदुत्व की सियासत को और आगे विस्तार नहीं दे सकता? उसकी अंतिम सीमा तक वह पहुंच चुका है? हाल ही में हुए हिमाचल प्रदेश और दिल्ली नगर निगम के चुनाव में हिंदुत्व का कार्ड नहीं चला है। 2024 के आम चुनाव से पहले इस साल नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं? भाजपा दीवार पर लिखी इस इबारत को अभी से पढ़ रही है कि महाराष्ट्र और बिहार में उसने अपने सहयोगी दलों को खो दिया है। जिससे वह अपने पुराने रिकाॅर्ड को नहीं दोहरा सकेगी। इसके साथ ही कर्नाटक राजस्थान एमपी बंगाल त्रिपुरा सहित कई राज्यों में वह कमज़ोर सियासी ज़मीन पर खड़ी है। जिससे उसे विधानसभा के साथ ही लोकसभा चुनाव में भी नुकसान उठाने का अंदेशा अभी से सता रहा है। इसके साथ ही भाजपा यह भी समझ रही है कि वह कितना ही अच्छा काम कर ले चाहे जितना मीडिया में अच्छे दिन का प्रचार कर ले और चाहे जितना साम दाम दंड भेद का सहारा ले ले लेकिन एंटी इंकम्बैंसी उसकी 2019 में जीती कुछ सीटों की बलि अवश्य ही लेगी।ऐसे में उसका ज़ोर कम अंतर से हारी उन 160 सीटों पर है। जहां मुसलमानों की भी अच्छी खासी हराने जिताने लायक तादाद है। इसमें कोई दो राय नहीं राशन का निशुल्क अनाज हो या पीएम आवास पीएम गैस नलजल मनरेगा और मुद्रा योजना मुसलमानों को भी सरकार की जनहित की स्कीमांे का अपवाद छोड़ दें तो लाभ मिल ही रहा है। यही वजह है कि जिस भाजपा को पहले मुसलमान बांस से भी छूने को तैयार नहीं होता था। अब कई राज्यों और केंद्र के चुनाव में इकाई प्रतिशत में ही सही वोट देने लगा है। इसके पीछे उनका डर लालच और असुरक्षा की भावना भी कई वजह में एक वजह हो सकती है। भाजपा की नज़र ऐसे ही मुसलमानों पर है जो उसको पहले से और अधिक वोट देकर हारती हुयी सीटें जिता सकते हैं। जहां तक सेकुलर दलों को वोट देने वाले हिंदू मतदाताओं का सवाल है। उनमें धीरे धीरे यह धरणा मज़बूत होती जा रही है कि भाजपा हिंदुत्व के नाम पर धर्म यानी साम्प्रदायिकता की राजनीति से बार बार सत्ता हासिल कर उनके आर्थिक हितों की अनदेखी कर रही है। जिससे देश में बेरोज़गारी महंगाई करप्शन और अराजकता की पहले से अधिक गंभीर स्थिति बन रही है। पीएम मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं को यह भी कहा कि वे विपक्ष की भूमिका से बाहर निकलकर राजनीति से आगे सामाजिक कामों में जुटें। सवाल यह है कि जब संघ और भाजपा ने शुरू से हिंदुत्व की राजनीति की है तो उसके नेता अचानक अपील करने पर मुस्लिम विरोध का अपना पुराना एजेंडा कैसे छोड़ सकते हैं? छोटे कार्यकर्ता या गली मुहल्ले के मामूली भाजपा नेताआंे की तो बात ही क्या जब पार्टी के बड़े बड़े नेता मुसलमानों को कपड़ों से पहचानने उनको 2002 के गुजरात दंगों में सबक सिखा देने शमशान कब्रिस्तान की तुलना करने 80 बनाम 20 की चुनौती देने वोट ना देने पर बुल्डोज़र और तेज़ चलाने आर्थिक बायकाट इवीएम का बटन इतनी जोर से दबाने की बात करते हैं जिससे करंट शाहीन बाग में जाकर लगे। हमारा मानना है कि पीएम मोदी की यह अच्छी पहल है।इसका स्वागत खुद मुसलमानों को भी करना चाहिये। लेकिन सौ टके का सवाल बार बार यही सामने आता है कि क्या भाजपा नेता इस अपील पर अमल भी करेंगे? बहुत पुरानी बात नहीं है। जब आतंकी घटनाओं की आरोपी सांसद हिंदुओं से अपने घरों में हथियार रखने की बात कह रही थी। उन्होंने लवजेहादियों का नाम लेकर यह भी बताया कि वे सब्ज़ी काटने का चाकू किसके लिये तेज़ करने की बात कह रही थीं। इससे पहले एक भाजपा सांसद ने खुलेआम मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की बात कही। उसी दौरान एक केंद्रीय मंत्री ने ’’देश के ग़द्दारों को, गोली मारो.....का भीड़ से नारा लगवाया। लेकिन आज तक उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही तो दूर एफआईआर तक नहीं हुयी। सुल्ली सेल और बुल्ली डील सोशल मीडिया पर चलाकर मुस्लिम महिलाओं का अपमान किया गया लेकिन आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुयी। भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने टीवी चैनल पर पैगंबर का अपमान किया लेकिन भाजपा ने तब तक उनको पार्टी से नहीं निकाला जब तक अरब मुल्कों में इसकी ज़बरदस्त प्रतिक्रिया शुरू नहीं हो गयी। आज तक पुलिस ने नूपुर से सख़्ती से पूछताछ तक नहीं की। उनको जेल भेजने की तो बात ही क्या करें? उल्टा उनको पुलिस सुरक्षा और हथियार का लाइसेंस उपलब्ध कराया गया है। एक भाजपा विधायक खुलेआम मुसलमानों को धमकी देता है कि भाजपा को वोट दो नहीं तो बुल्डोज़र के लिये तैयार रहो? टीवी चैनल रोज़ मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर कई बार नाराज़गी दर्ज करा चुका है। लेकिन सरकार कोई ठोस कार्यवाही नहीं करती है। बिल्कीस बानो के केस में जिन आरोपियों को सज़ा पूरी करने से पहले छोड़ा गया उनका फूल मालाओं से स्वागत होता है। मुसलमानों की मोब लिंचिंग करने वालों को जब ज़मानत पर छोड़ा जाता है तो भाजपा नेता उनका जेल से बाहर आने पर स्वागत करते हैं। मासूम बच्ची का कश्मीर में बलात्कार करने के आरोपियों के पक्ष में दो मंत्री रैली तक निकाल देते हैं। दूसरी तरफ झूठे या सच्चे चाहे जैसे आरोप लगाकर आज़म खां डा. कफील खान जुबैर अहमद उमर खालिद सफूरा ज़रगर शरजील इमाम सद्दीक कप्पन को लंबे समय तक जेल में डाल दिया जाता है। मतलब कहने का यह है कि मुसलमान आज नही ंतो कल ज़रूर भाजपा को वोट देंगे लेकिन भाजपा को भी अपनी कथनी करनी एक करनी होगी।           

 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक हैं।*

आरवीएम बनाम ईवीएम

*इवीएम पर शंकाओं के दौर में आरवीएम पर चर्चाओं का ज़ोर!* 

0एक तरफ़ बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी एक के बाद एक हार का ठीकरा एक बार फिर इवीएम पर फोड़ते हुए इलैक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन पर उंगली उठाते हुए चुनाव फिर से बैलेट पेपर से कराने की पुरानी मांग दोहराई है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने हाल ही में 8 राष्ट्रीय एवं 40 राज्य स्तरीय दलों की बैठक कर उनसे प्रवासी लोगों के लिये प्रस्तावित आरवीएम यानी रिमोट वाटिंग मशीन की सुविधा दिये जाने पर चर्चा की है। विरोधी दलों ने आरवीएम पर सवाल उठाते हुए एक सुर में अभी से इसका विरोध शुरू कर दिया है। हालांकि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में बनी विपक्षी दलों की इस साझा कमैटी से आरवीएम विरोधी टीएमसी, वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस, बीजेडी, बीएसपी, डीएमके ने खुद को अलग रखा है।       

        -इक़बाल हिंदुस्तानी

      चुनाव आयोग ने काफी पहले प्रवासी मतदाताओं की बड़ी संख्या को चुनाव से अलग रहने पर चिंता जताते हुए घरेलू प्रवासी सर्वे समिति का गठन किया था। इसकी रिपोर्ट 2016 में आयोग को सौंप दी गयी थी। इस सर्वे रिपोर्ट में रिमोट वोटिंग की सुविधा दिये जाने का मुख्य सुझाव आयोग को दिया गया था। 1951 में जब देश में पहला चुनाव हुआ उस समय कुल मतदाताओं में से मात्र 17 प्रतिशत का ही पंजीकरण किया जा सका था। इनमें से भी पहले चुनाव में केवल 45 प्रतिशत वोटर्स ने अपने वोट का अधिकार प्रयोग किया था। आयोग तब से ही यह प्रयास करता रहा है कि मतदान का प्रतिशत लगातार बढ़ाया जाये। इस दौरान वोटर रजिस्ट्रेशन 91 प्रतिशत और वोटिंग परसेंटेज बढ़कर 2019 में 67 तक पहुंच गया है। एक तरह से 30 करोड़ वोटर अभी भी वोटिंग से दूर हैं। आयोग ने अपने गृह राज्यों या गृह जनपदों से रोज़गार पढ़ाई या अन्य कारणों से दूर जाने वाले नागरिकों के लिये वहीं रहकर मतदान करने के लिये विशेष आरवीएम यानी स्टैंड अलोन डिवाइस तैयार कराई है। जिसे एक साथ 72 निर्वाचन क्षेत्रों से जोड़ा जायेगा। मतदाता एक कोड का प्रयोग कर अपने क्षेत्र के प्रत्याशियों और उनके चुनाव चिन्ह देखकर वहीं से मतदान कर सकेगा। इससे पहले रिटर्निंग अफसर पात्र वोटर्स का पंजीकरण कर निर्वाचन क्षेत्र से बाहर पोलिंग स्टेशन बनाने की व्यवस्था करेंगे। इस पर विरोधी दलों ने अभी से विरोध करना शुरू कर दिया है। उनका सवाल है कि जब आज तक इवीएम की विश्वसनीयता पर ही उंगलियां उठ रही हैं तो आरवीएम जिसको निर्वाचन क्षेत्र से बाहर स्थापित किया जायेगा। उसकी निगरानी पारदर्शिता और ईमानदारी उनका पोलिंग एजेंट वहां हर जगह मौजूद ना होने से कैसे सुनिश्चित होगी? भाजपा को छोड़कर कुछ हद तक बीजेडी ही इस नई व्यवस्था से संतुष्ट नज़र आ रही थी। अन्यथा जो विपक्षी दल कांग्रेस के नेतृत्व मेें आरवीएम का विरोध करने को बनाई गयी कमैटी की बैठक में शामिल नहीं भी हुए वे भी चुनाव आयोग की बैठक में आरवीएम का विरोध करत दिखाई दिये। उनका कहना था कि आरवीएम की बजाये प्रवासी मतदाताओं को एक की जगह चार दिन की सवेतन छुट्टी दी जाये साथ ही उनको वोट डालने के लिये अपने घर आने को रेल और बस में बिना टिकट यात्रा की सुविधा दी जाये। विरोधी दलों का कहना था कि राज्य के बाहर रहने वाले प्रवासी नागरिकों को वोट देने का वे विरोध नहीं करना चाहते। लेकिन सवाल यह है कि वहां रहकर चुनाव आचार संहिता का पालन हो रहा है या नहीं यह कैसे तय होगा? उनका कहना था कि वे सरकार और पुलिस प्रशासन पर निष्पक्ष व पारदर्शी मतदान के लिये निर्वाचन क्षेत्र से बाहर आरवीएम पर विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि अभी भी अगर कहीं विपक्ष का पोलिंग एजेंट मौजूद नहीं होता है तो वहां सत्ताधरी दल पर धांधली के आरोप लगते हैं। दरअसल 2001 और 2011 की जनसंख्या के आंकड़े बताते हैं कि 37 प्रतिशत लोग अपने निर्वाचन क्षेत्रों से बाहर रहते हैं। इनमें से 26 प्रतिशत अपने गृह ज़िलों से बाहर दूसरे जनपद में और शेष अपने गृह राज्य से दूर दूसरे राज्यों में रहते हैं। यही वजह थी कि सबसे अधिक प्रवासी वाले राज्यों यूपी बिहार में 2019 के आम चुनाव में देश के औसत 67 के बजाये 59 और 57 प्रतिशत ही वोट डाले जा सके थे। आंकड़े बताते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में 18 लाख सुरक्षाकर्मियों ने और 28 लाख चुनाव ड्यूटी में लगे सरकारी कर्मचारी, वरिष्ठ नागरिक विकलांग बंदी व कोविड रोगियों ने बैलेट का सहारा लेकर मतदान किया था। दरअसल जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 60 चुनाव आयोग को यह अधिकार देती है कि वह मतदान में अधिक से अधिक नागरिकों को हिस्सेदार बनाने के लिये लगातार ऐसे कदम उठाये। जिससे वे लोग जो चाहकर भी अपना वोट नहीं दे पाते वे मतदान करने में सक्षम हो सकें। इसी सिलसिले में चुनाव आयोग ने हाल ही में हुए तीन राज्यों के चुनाव से पहले 1000 से अधिक कारपोरेट हाउस को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने को कहा था कि वे अपने कर्मचारियों को मतदान के लिये प्रोत्साहित करें। हालांकि मतदान ना करने वाले ऐसे कर्मचारियों की सूची कंपनी की वेबसाइट पर डालने से लेकर उनकी एक दिन की तन्ख्वाह काटने का सुझाव भी आयोग के विचाराधीन था जिनको मतदान के लिये सवेतन छुट्टी दी जाती है लेकिन बाद में इस पर हंगामा बढ़ता देख अमल नहीं हो सका था।
 गुजरात के राज्य चुनाव आयुक्त ने यहां तक कहा था कि ऐसे सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की निगरानी की जायेगी जो मतदान नहीं करते हैं लेकिन बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ने साफ कर दिया था कि आयोग का अनिवार्य मतदान का कोई इरादा नहीं है क्योंकि संविधान और कानून हर वयस्क नागरिक को जहां वोट देने का अधिकार देता है तो उसी अधिकार में यह भी शामिल है कि वह ना चाहे तो वोट ना करे। किसी भी लोकतंत्र में किसी नागरिक को मतदान के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता भले ही किसी भी प्रत्याशी को मत ना देने वालों के लिये नोटा का प्रावधान किया गया हो। इस मामले में 2013 में पीयूसीएल की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि मतदान ना करना या नकारात्मक मतदान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनिवार्य अंग है। संविधान के सैक्शन 19 में यह मूल अधिकार में शामिल है। इससे पहले 2009 में भी सब से बड़ी अदालत में याचिका दायर कर अनिवार्य मतदान की मांग इस आधार पर की गयी थी कि वर्तमान सिस्टम से चुनी गयी सरकारों पर वास्तविक बहुमत नहीं होता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था।

 *नोट-लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के एडिटर और नवभारत टाइम्स काॅम के ब्लाॅगर हैं।*

Wednesday, 14 December 2022

3 चुनाव 3 सन्देश

*गुजरात, हिमाचल व दिल्ली ने तीनों दलों को संदेश दिया है!*

0 भाजपा कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को दो राज्यों के विधानसभा और दिल्ली के स्थानीय निकाय चुनाव में भले ही जीत मिली हो लेकिन इन तीन चुनाव ने तीनों दलों को अलग अलग गहन संदेश भी दिये हैं। अगर विभिन्न राज्यों में हुए कुछ उपचुनाव की चर्चा हम यह मानकर ना भी करें कि इनमें अकसर सत्ताधारी दल जीत जाते हैं या जिसका जातीय व धार्मिक समीकरण फिट बैठ जाता है। वो दल वहां जीत जाता है। लेकिन गुजरात में भाजपा की अब तक की सबसे बड़ी जीत हिमाचल में कांग्रेस की मामूली अंतर से रण्नीतिक जीत और एमसीडी में आप की बंपर की जगह सामान्य जीत कुछ संदेश देती है।

    -इक़बाल हिंदुस्तानी

      हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने भाजपा से 37,974 वोट अधिक लेकर सत्ता हासिल की है। यानी कांग्रेस को 43.9 तो भाजपा को 43 प्रतिशत मत मिले हैं। हालांकि दोनों की सीटों में 40 और 25 यानी 15 का भारी अंतर दिखाई देता है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि यहां आप ने लगभग एक प्रतिशत वोट ही लिये हैं। उसका अधिक ज़ोर गुजरात पर ही था। वहां उसने सीट भले ही 5 लीं लेकिन वोट 13 प्रतिशत लिये हैं। इसके साथ ही आप 35 सीट पर दूसरे स्थान पर रही है। उधर गुजरात में भाजपा की ना केवल सीट डेढ़ गुनी हो गयीं बल्कि उसने अपने वोट भी लगभग 3 प्रतिशत से अधिक बढ़ाये हैं। इससे सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा है। हिमाचल में अगर कांग्रेस पुरानी पेंशन वापस लाने का वादा ना करती तो उसको वर्तमान और पूर्व ढाई लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों से शायद ही बड़ी तादाद में वोट और सपोर्ट मिलता। इसके साथ ही सेब के उत्पादकों वहां के सीएम जयराम ठाकुर को तमाम शिकायतों के बावजूद गुजरात की तरह ना बदलने और भाजपा की अंदरूनी गुटबंदी व 21 विद्रोही प्रत्याशियों में से 12 का भाजपा के वोट काटकर कांगेे्रस को जिता देना खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारना कहा जा सकता है। हालत यह थी कि भक्त दावा कर रहे थे कि मोदी यूक्रेन रूस जंग रूकवाने के प्रयास कर विश्वगुरू बनने वाले हैं और इधर देश में उनकी ही पार्टी के बाग़ी उम्मीदवारों ने उनके फोन कर चुनाव ना लड़ने की अपील करने के बावजूद हिमाचल चुनाव में बैठने से साफ मना कर दिया। हालांकि गुटबंदी कांग्रेस में भी थी लेकिन वहां प्रियंका गांधी राजीव शुक्ला और भूपेश बघेल ने उसे काबू कर लिया। सबसे बड़ी बात हिमाचल में हर बार सत्ता बदलने का रिवाज भाजपा उत्तराखंड की तरह तोड़ नहीं पाई। इसके साथ भाजपा का चुनाव जीतने का सबसे बड़ा मुस्लिम विरोधी फार्मूला यहां उनकी तादाद ना के बराबर यानी मात्र दो प्रतिशत होने से ध्रुवीकरण में काम नहीं आया।हालांकि गुजरात में एंटी इंकम्बैंसी 27 साल की थी लेकिन वहां पीएम मोदी और होम मिनिस्टर अमित शाह ने अपनी पूरी ताक़त झोंककर और अपनी नाक का सवाल बनाकर जितना जोरदार प्रचार किया उससे भाजपा वहां एक बार फिर जीतने में सफल रही। भाजपा की सीटें बढ़ने की एक वजह जहां भाजपा का पहले से वोट तीन प्रतिशत बढ़ना एक कारण रहा वहीं विपक्षी वोट कांग्रेस और आप में बंट जाना इसकी बड़ी वजह मानी जा सकती है। गुजरात संघ की प्रयोगशाला रहा है। वहां उसने जो हिंदू राष्ट्र का एक राज्य स्तरीय माॅडल स्थापित कर दिया है। वह अभी भी विकास रोज़गार महंगाई स्वास्थ्य और करप्शन पर भारी पड़ता नज़र आ रहा है। इससे पहले भाजपा ने अपनी सरकार के खिलाफ बनते माहौल को भांपकर काफी पहले वहां का पूरा मंत्रिमंडल सीएम सहित बदलकर मतदाताओं को ऐसा आभास कराया मानो वहां जो कुछ बुरा हो रहा है। उसके लिये भाजपा संघ या मोदी की सरकार नहीं बल्कि ये लोग कसूरवार थे। इसका उसको लाभ भी मिला। इतना ही नहीं भाजपा ने अपने 40 से अधिक वर्तमान विधायकों का टिकट काटकर भी यही संदेश दिया कि लोगों की तमाम परेशानी शिकायतों और समस्याओं के लिये यही एमएलए ज़िम्मेदार थे। अब नये विधायक चुनकर आयेंगे तो वे सबकुछ ठीक करेंगे। यानी भाजपा सरकार और पार्टी की कोई कमी गल्ती या ख़राबी थी ही नहीं। भाजपा का यह चतुर निर्णय भी काफी हद तक कारगर होता नज़र आया है। जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है। वह गुजरात में जीत के बड़े बड़े दावे कर रही थी लेकिन उसको भाजपा की बी टीम और केजरीवाल को छोटा मोदी मानने वालों की भी कमी नहीं है। यह ठीक है कि जिस तरह से वहां 27 साल से कांग्रेस लगातार भाजपा से हार रही है। उससे कुछ भाजपा विरोधी वोटर आप की तरफ गये हैं। पहले ही चुनाव में 5 सीट और 13 प्रतिशत वोट हासिल कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लेना ही फिलहाल आप के लिये उपलब्धि है। लेकिन जिस तरह से आप ने मुसलमानों और दलितों को नाराज़ कर नरम हिंदुत्व का रास्ता पकड़ा है। उससे उसे दिल्ली नगर निगम के चुनाव में वैसी बंपर जीत नहीं मिली जैसी वह खुद ही नहीं एग्ज़िट पोल भी मानकर चल रहे थे। आंकड़े बताते हैं कि विधानसभा के मुकाबले आप को मुसलमानों के 14 और दलितों के 16 प्रतिशत वोट कम मिले हैं। मुसलमानों के आधे वोट कांगे्रस के साथ चले गये। उधर हारने के बावजूद भाजपा दिल्ली में अपने वोट बढ़ाकर अब 39 प्रतिशत ले आई है। कहने का मतलब यह है कि आप कांग्रेस का वोट छीनकर अधिक मज़बूत हो रही है। लेकिन भाजपा पहले से कमज़ोर अभी भी नहीं हो रही है। भाजपा का वोट केवल हिमाचल में घटा है। हालांकि भाजपा ने गुजरात चुनाव के साथ दिल्ली निगम चुनाव कराकर और तीन हिस्सों में बंटी एमसीडी को एक कर चुनावी चाल चली थी। लेकिन यह खुद उस पर ही उल्टी पड़ गयी क्योंकि बीच बीच में भाजपा को गुजरात हारने का डर सता रहा था। जिससे उसके बड़े नेताओं ने अपना सारा फोकस गुजरात में किया। उधर आप के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को करप्शन के आरोप लगाकर घेरने की रण्नीति भाजपा के काम नहीं आई। भाजपा खुद को तो पाक साफ साबित कर नहीं पाती उसकी सारी कवायद आप को भी करप्ट साबित करने की थी। लेकिन लोगों ने इस पर कान नहीं दिये। कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के लिये इन चुनावों के संदेश साफ हैं कि आप लोगों को अगर ठीक से नहीं सुनेंगे और चालाकी मक्कारी या शाॅर्टकट से वोट लेकर बार बार जीतना चाहेंगे तो ये एक दो बार तो मुमकिन है लेकिन हर बार यह हथकंडा काम नहीं करेगा। इसलिये सभी दलों को संविधान के हिसाब से सबका साथ व विकास करना ही होगा।

*नोट- लेखक पब्लिक ऑब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Saturday, 10 December 2022

ईरानी महिलाओं की जीत

*ईरानी हिजाब विरोधी महिलाओं की जीत उदारवाद की जीत है!*

0 क़तर में हो रहे विश्व कप फुटबाॅल में अपने पहले मैच में ईरान की टीम ने जब अपने देश के हिजाब विरोधी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में राष्ट्रगान नहीं गाया था तो दुनिया कह रही थी कि ईरान सरकार पर इसका शायद ही कोई असर पड़े? यह भी आशंका जताई जा रही थी कि इन खिलाड़ियों को इसकी वतनवापसी पर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है? उधर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टार्क ने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर जुल्म की जांच को मानवाध्किार परिषद के बैनर तले स्वतंत्र जांच मिशन का गठन कर दिया था। इतना ही नहीं ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमेनी की भतीजी फरीदा मुरदखानी ने तो माॅरल पुलिस ख़त्म ना करने पर दुनिया से ईरान से सभी राजनीतिक रिश्ते तोड़ने तक की मांग की थी।* 

   -इक़बाल हिंदुस्तानी

      ईरान के अटाॅर्नी जनरल मुहम्मद जाफर मोन्टेजेरी ने ऐलान किया है कि माॅरेलिटी पुलिस का न्यायपालिका से कोई सरोकार नहीं है इसलिये उसको भंग करने का ईरान सरकार ने फैसला किया है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई देशों में सरकार की नीतियों और फैसलों के खिलाफ आंदोलन चलते हैं। लेकिन तानाशाह धार्मिक राजशाही की तो बात छोड़ दीजिये आजकल लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारें भी जन आंदोलनों को पसंद नहीं करतीं। जहां तक ईरान का सवाल है तो वहां की सरकार इस्लामिक कट्टर और पिछड़ी सोच की अतीतजीवी तानाशाह सरकार है। उसका मानवाधिकार रिकाॅर्ड भी बेहद खराब है। इतिहास यह भी बताता है कि जुल्म का सिलसिला जब हद पार कर जाता है तो जनता उसके खिलाफ बिना यह सोचे खड़ी होने लगती है कि उसके विरोध का अंजाम कितना डरावना हो सकता है? ईरान मेें जिस तरह से 16 सितंबर को 22 साल की कुरदिश युवती महशा अमीनी को ठीक से हिजाब ना पहनने के आरोप में इस्लामी पुलिस ने बेदर्दी से मार डाला था। उसके खिलाफ पहले से ही ईरान सरकार की पाबंदियों बंदिशों और जोर ज़बरदस्ती से नाराज़ महिला आज़ादी और बराबरी की मांग करने वाली ईरानी महिलायें विरोध में सड़कों पर उतर्र आइं। इसके बाद इन महिलाओं के पक्ष में ईरान में ही पुरूष वर्ग भी खुलकर साथ आ गया। धीरे धीरे पूरी दुनिया के उदारवादी लोकतांत्रिक और समानतावादी लोगों का नैतिक समर्थन ईरान की प्रदर्शनकारी महिलाओं को मिलने लगा। हालांकि पहले भी ईरान सहित दुनिया के अनेक मुल्कों में जनता के विभिन्न वर्गों ने ऐसे विरोध प्रदर्शन किये हैं। लेकिन अकसर समय के साथ ऐसे विरोध प्रदर्शन दम तोड़ देते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। बल्कि यह कहा जा सकता है कि अगर ईरान सरकार माॅरल पुलिस खत्म नहीं करती तो आगे चलकर वह खुद खत्म होने के कगार पर पहुंच जाती। नार्वे में स्थित ईरान ह्यूमन राइट नामक संगठन का कहना था कि आंदोलन के 10 वें सप्ताह में दाखिल होने के साथ ही कुल 326 लोगों को ईरानी सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतार दिया था जिनमें 40 मासूम बच्चे भी शामिल थे। हैरत और दुख की बात यह रही कि ईरानी संसद के 290 में से 227 सदस्यों ने इस जुल्म और नाइंसाफी के बावजूद जनता के साथ ना खड़े होकर अपने कथित कट्टर इस्लाम के साथ खड़े होते हुए देश की न्यायपालिका से बेशर्मी के साथ कहा कि उसको इस विरोध प्रदर्शन के आरोप में पकड़े गये 13000 से अधिक आरोपियों के साथ काई नरमी नहीं दिखानी चाहिये। इतना ही नहीं ईरान के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की अपील पर यूरूप कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों के द्वारा ईरान सरकार पर प्रदर्शनकारियों पर सख़्ती अनावश्यक बल प्रयोग और यौन हिंसा ना करने और उदारतावादी कदम उठाने की मांग का ईरान पर कोई असर नहीं पड़ा। आंदोलन को दबाने के लिये ईरान सरकार ने उल्टा आंदोलन को सपोर्ट कर रहे पत्रकारों छात्रों बुध्दिजीवियों डाॅक्टर्स और वकीलों को बड़े पैमाने पर सबक सिखाने को सताना शुरू कर दिया। ईरान सरकार यह नहीं समझ पाई कि 2009 और 2017 के आंदोलनों की तरह वह इस बार हिजाब विरोधी आंदोलन को किसी भी तरह के जुल्म ज़्यादती और डर से खत्म नहीं कर पायेगी और एक दिन उसको उदारवादियों के सामने घुटने टेकने होंगे। इसकी दो बड़ी वजह यह रहीं कि ईरान के छात्र और युवा अपने माता पिता से अधिक साहसी हैं क्योंकि एक कट्टर राज मेें वे अपना कोई भविष्य नहीं देखते हैं। दूसरी बात यह रही कि ईरान की माॅरल पुलिस की विश्वसनीयता उपयोगिता और ज़रूरत बदलते समय के साथ पूरी तरह खत्म हो चली है। ईरानी युवा साफ साफ देख पा रहा है कि उनकी कट्टर सरकार की वजह से ईरान पूरी दुनिया में अलग थलग पड़ चुका है। एक तरफ ईरान पर बाहर से उदार होने का भारी दबाव है तो दूसरी तरफ अंदर से एक बड़ा वर्ग अपनी ही सरकार की दकियानूसी और पुरातन नीतियों को इस्लाम के नाम पर आगे और झेलने को तैयार नहीं है। पाकिस्तानी उदार स्काॅलर जावेद ग़ामड़ी तो बहुत पहले से ईरान जैसी कट्टर सरकारोें को सावधान कर रहे हैं कि इस्लाम मेें कलमा नमाज़ रोज़ा ज़कात हज जैसी पांच बुनियादी चीज़ों को लेकर भी किसी तरह से ज़ोर ज़बरदस्ती से मना किया गया है। ऐसे में किसी
महिला को हिजाब पहनने के लिये कोई सरकार कोई माॅरल पुलिस या कोई तंज़ीम कैसे बल प्रयोग कर सकती है? लेकिन यही कट्टरवाद आतंकवाद और तानाशाही आज दुनिया के कई देशोें में धर्म के नाम पर ज़बरदस्ती थोपकर जनता पर राज किया जा रहा है। ईरान की जनता खासतौर पर महिलाओं ने पूरी दुनिया के लोगों को एक संदेश यह भी दिया है कि जिस तरह से आजकल की सरकारें चाहे चुनी हुयी हों या तानाशाह एक दूसरे से जनता को दबाने डराने और अपने गलत फैसले मनवाने को मजबूर करने को रोज़ नये नये हथकंडे सीख रही हैं। उसी तरह दुनिया के विभिन्न हिस्सों की जनता भी एक दूसरे से यह सीख सकती है कि कैसे जनविरोधी उदारता विरोधी और दिखावे के लोकतंत्र वाली सरकारों को निडर होकर लगातार आंदोलन करके झुकाया जा सकता है? दुनिया के तमाम देशों और जनता को आज यह समझ आने लगा है कि धर्म जाति कट्टरता रंग और पंूजी के बल पर आप कुछ लोगों को हमेशा मूर्ख बना सकते हैं। सब लोगों को कुछ समय के लिये बेवकूफ बना सकते हैं। लेेकिन सब लोगों को सदा के लिये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता या धर्म विशेष की कट्टरता बहुसंख्यकवाद नफ़रत और झूठ के बल पर सरकारेें ना तो बनाई जा सकती हैं और ना ही लंबे समय तक चलाई जा सकती हैं। यह बात भारत के राजनेताओं को भी समझ लेनी चाहिये।

 *(लेखक पब्लिक ऑब्ज़र्वर के संपादक व नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।)*

Wednesday, 30 November 2022

आफ़ताब की दरिंदगी

*बेशक आफ़ताब ने दरिंदगी की है मगर मसला धार्मिक नहीं सामाजिक है!* 

0दिल्ली के महरौली में लिव इन रिलेशन में साथ रह रहे आफ़ताब पूनावाला ने अपनी प्रेमिका श्रध्दा वाकर की हत्या कर जिस बेरहमी से उसके शरीर के दर्जनों टुकड़े कर लाश ठिकाने लगाई है। उसे बेशक जुल्म की इंतेहा और दरिंदगी कहा जायेगा। लेकिन इस घटना को लेकर जिस तरह से मीडिया खासतौर पर सोशल मीडिया पर लिव इन रिलेशन से लेकर आधुनिक सोच वाली लड़कियों और एक धर्म विशेष के लोगों को टारगेट किया जा रहा है। वह अपने आप मेें असली मुद्दे से लोगों का दिमाग भटकाने वाला है। इसका मक़सद राजनीति तो है ही साथ ही हमारे समाज का दोगलापन और संकीर्णता भी है। आइये देखते हैं कि ऐसी घटनायें कानून होेने के बावजूद क्यों बढ़ती जा रही हैं?       

  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      श्रध्दा आफ़ताब की घटना रौंगटे खड़े कर देने वाली है। इसकी जितनी निंदा की जाये कम है। इसमें अपराध साबित होने पर जितनी सख़्त सज़ा दी जाये कम होगी। सज़ा जितनी जल्दी दी जाये उतना ही बेहतर होगा। लेकिन इस घटना को साम्प्रदायिक राजनीतिक और कट्टरवादी रंग देने वालों से बचना होगा। हमारा मानना है कि प्रेम करना गलत नहीं है। प्रेम जाति धर्म योग्यता शक्ल वर्ण रंग नस्ल हैसियत पैसा या क्षेत्र देखकर भी नहीं होता। प्यार करना अपनी पसंद की लड़की लड़के से शादी करना और शादी के बिना आपसी सहमति से लिव इन रिलेशन में रहना सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी करार दिया है। यहां तक कि लिव इन रिलेशन में रहने के दौरान पैदा होने वाले बच्चो के वही सब अधिकार हैं। जो कि शादी करने के बाद जन्म लेने वाले बच्चो के होते हैं। इसी तरह लिव इन रिलेशन में रहने वाली लड़की के भी पत्नी की तरह वही सब अधिकार हैं। जोकि शादी के बाद किसी दुल्हन के होते हैं। ज़ाहिर बात है कि इस तरह से लिव इन रिलेशन को इस तरह की वीभत्स घटनाओं के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। जहां तक सवाल माता पिता की मर्जी के बिना इस तरह का कदम उठाने वाली लड़कियांे का है तो कम लोगों को पता होगा कि प्रेम सोच समझकर नहीं किया जाता यह तो खुद ब खुद हो जाता है। हमारा समाज तो लड़के लड़की की अपनी मर्जी से की जाने वाली शादी का भी विरोध करता रहा है। यहां तक कि लड़की और लड़के के लिये अलग अलग नियम है। ज़रूरत समाज को अपनी सोच बदलने की भी है। अगर लड़की ने अपनी मर्जी से किसी लड़के के साथ रहने शादी करने या लिव इन रिलेशन का फैसला किया है तो अधिकांश माता पिता उससे रिश्ता ख़त्म कर देते हैं। ऐेसे में अगर उसके साथ उसका प्रेमी या  पति कोई गैर कानूनी हरकत करता है तो वह अपने माता पिता से शिकायत नहीं कर पाती। जबकि ठीक ऐसा ही करने पर लड़कों के साथ परिवार ऐसा रूख़ नहीं अपनाता। होना यह चाहिये कि हम अपने बच्चो को ऐसे संस्कार सोच और समझ दें जिससे वे अपने जीवन साथी का सही चुनाव कर सकें। अगर उनका फैसला समय की कसौटी पर गलत साबित हो तो उनके लिये घर वापसी भूल सुधार और पश्चाताप का दरवाज़ा खुला रहे। बच्चो को सिखायें कि बेशक प्यार करो लेकिन अगर जान पर बन आये तो अलग होने का विकल्प खुला रखो। अगर पे्रमी प्रेमिका का व्यवहार अचानक बदल जाता है धोखा हो जाता है पक्षपात या अत्याचार कोई करता है तो उसी समय हिंसक होेकर बदला लेने का आत्मघाती भावुक फैसला ना करें बल्कि अपने मित्रों सहेलियों परिवार वालों और कानून के जानकारों से ठंडे दिमाग से सलाह लेकर खुद को सुरक्षित रखते हुए ही एक्शन किया जा सकता है। लेकिन इस मामले में सोशल मीडिया में सीख यह दी जा रही है कि यह लव जेहाद का एक सोचा समझा अभियान है। जो धर्म विशेष के लोग एक एजेंडे के तहत दूसरे धर्म विशेष के लोगों के खिलाफ बाकायदा सोच समझकर एक साज़िश के तहत चला रहे हैं? जबकि ऐसा कुछ भी सच नहीं है। पहले मीडिया ऐसे मामलों में अलग अलग धर्म के प्रेमी प्रेमिका होने या किसी मंदिर मस्जिद में विवाद होने पर उनके नाम नहीं लिखता था जिससे साम्प्रदायिक नफरत ना पैदा हो लेकिन अब जानबूझकर ना केवल मीडिया बल्कि राजनेता ऐसे मामलों को बिना समय गंवाये आग में घी डालने का काम खुलेआम करते नज़र आते हैं। ऐसी घटनाओं के ज़रिये एक वर्ग विशेष के लोगों को राक्षस और दूसरे धर्म के लोगों को पीड़ित व संत बनाकर पेश किया जा रहा है। अगर याद करें तो 1995 में सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की दर्दनाक हत्या कर उसका शव टुकड़े टुकड़े कर तंदूर में जला दिया था। राजनैतिक रसूख के चलते आरोपी लंबे समय तक बचा रहा। 1996 में एक पुलिस अफसर के बेटे संतोष ने प्रिदर्शिनी मट्टू की हत्या बड़े कू्रर अंदाज़ में कर दी थी। अपने पिता की हैसियत की वजह से आरोपी सबूत नष्ट कर बचता रहा। 1999 में बार में शराब परोसने से मना करने पर जेसिका लाल की हत्या मनु शर्मा ने कर दी थी। कोर्ट ने ठोस सबूत ना होने पर आरोपी को बरी कर दिया था। 2002 में एक बड़े नेता के बेटों विकास और विशाल ने बहन के प्रेमी नीतीश को ज़िंदा जलाकर मार डाला था। 2008 में नोयडा में आरूषि की हत्या हुयी लेकिन मामला आजतक नहीं सुलझा। 2010 में देहरादून में इंजीनियर राजेश गुलाटी ने पत्नी अनुपमा की हत्या कर 72 टुकड़े कर दिये थे। 2011 में सुमित हांडा पर दक्षिण अफ्रीकी मूल की पत्नी निरंजनी पिल्लई की हत्या कर लाश के टुकड़े आफ़ताब की तरह ही ठिकाने लगाने का आरोप लगा था। 2018 में एक तरफा प्यार में पागल मेजर निखिल हांडा ने शैलजा की हत्या कर दी थी। 2020 में इंदौर में हर्ष शर्मा ने पत्नी अंशु का गला कुत्ते की जं़जीर से घोटकर चाकू से गोद दिया था। 2022 में अपने पति को छोड़कर साथ रहने वाली प्रीति शर्मा ने बेवफाई का शक होने पर अपने प्रेमी फिरोज का गला काटकर हत्या कर दी थी। मेरठ के एक गांव में एक प्रस्ताव ना मानने पर शिवानी को गोली मार दी गयी। कठुवा में एक मासूम बच्ची के बलात्कारियों को बचाने वाले कौन थे? वहां तो बाकायदा आरोपियों के पक्ष में बेशर्मी से रैली तक निकाली गयी थी। बिल्कीस बानो के बलात्कारियों को सज़ा पूरी करने से पहले छोड़ने वाले कौन लोग हैं? ऐसे और भी अनेक मामले गिनाये जा सकते हैं। लेकिन इससे आफ़ताब पूनावाला का जुर्म कम नहीं होगा। लिव इन रिलेशन या अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर ऐसा करने वाली लड़कियों को भी दोष देकर समस्या हल नहीं होगी। हमारे समाज को लड़का लड़की में अंतर करना छोड़ना होगा। कानून को निष्पक्ष और जल्दी काम कर आरोपियों को सख़्त सज़ा दिलाने से ही मसले का हल हो सकता है।

 *लेखक-पब्लिक आब्ज़र्वर के संपादक व नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*