Sunday, 24 May 2020

लॉकडाउन में मज़दूर

लॉकडाउन-4: मज़दूर कल भी था मजबूर,आज भी है लाचार!

0कंेद्रीय श्रम मंत्री थावरचंद गहलौत के नेतृत्व में बने मंत्रियों के समूह के अनुसार देश में लॉकडाउन से 9 करोड़ 30 लाख मज़दूर बेरोज़गार हुए हैं। जो कुल श्रम शक्ति का 27.1प्रतिशत है। जबकि दि सेंटर ऑफ़ मॉनिटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनोमी के मुताबिक यह आंकड़ा 11 करोड़ 40 लाख से अधिक है। हर साल 1 करोड़ 20 लाख नये नौजवान रोज़गार की तलाश में घर से निकलते हैं। लेकिन 2017-18 में देश में 45 साल में अब तक की सबसे अधिक 6 प्रतिशत बेरोज़गारी बढ़कर कुल 24प्रतिशत लोग खाली हाथ थे। अब ये लॉकडाउन से और बढ़ गये।      

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   24 मार्च को पहली बार जब हमारे पीएम मोदी ने चार घंटे से भी कम के नोटिस पर देश के 138 करोड़ लोगों को घरों मेें बंद रहने का फ़रमान सुनाया तो कोरोना से बचने को जान है तो जहान है का नारा सबको ठीक ही लगा था। लेकिन अगले दो चार दिन बाद ही जब करोड़ों प्रवासी मज़दूरों को सरकार के वादे के मुताबिक खाना पानी शैल्टरहाउस और दवा मिलने में व्यवहारिक समस्यायें सामने आने लगीं तो तमाम दावों के बावजूद हमने देखा कि राज्यों की सरकारें भी इतनी बड़ी आबादी को सुविधायेें उपलब्ध कराने मेें लाचार नज़र आने लगीं।

  जिस दिन पहली बार लॉकडाउन किया गया। तब तक देश में कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों की संख्या मात्र 552 थी। यानी उसी समय अगर स्वास्थ्य विशेषज्ञों वायरॉलोजी के वैज्ञानिकों महामारी सलाहकारों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा करके पूरी योजना बनाकर लॉकडाउन किया जाता तो प्रवासी मज़दूरों और जो लाखों लोग अचानक जहां के तहां फंस गयेउनको कोरोना संक्रमण का न्यूनतम जोखिम उठाकर उनके राज्य ज़िला नगर या गांव पहंुचाया जा सकता था। खुद सरकार मानती है कि देश में कुल मज़दूरों का 93प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में काम करता है।

   यानी 10 करोड़ से अधिक प्रवासी श्रमिक जहां काम करता है। उसका रिकॉर्ड उससे काम लेने वाले मालिक भी नहीं रखते। यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है कि जब राज्य और केंद्र सरकार के पास 90 प्रतिशत से अधिक प्रवासी श्रमिकों का रिकॉर्ड ही नहीं है तो यह दावा कैसे कर दिया गया कि जो मज़दूर जहां है वहीं रहे उसको भोजन राशन और सब अन्य सुविधायें वहीं पहुंचा दी जायेंगी। यह दावा पूरा करना कठिन ही नहीं असंभव था। प्रवासी श्रमिकों के मालिकांे ने उनको बिना काम वेतन तो दूर खाना और उनका बिना किराये के रहना तक स्वीकार नहीं किया।

    इसके बाद राज्य सरकारों ने कम्युनिटी किचन बनाकर जगह जगह खाना बांटना शुरू किया। लेकिन पका हुआ खाना बांटने के केंद्र इतनी दूर दूर और इतने कम थे कि मज़दूरों को वहां तक पहुंचने के लिये आधी रात को लाइन में लगने को निकलना पड़ता था। रात में उनको पुलिस रोकती और मारती थी। एक प्रॉब्लम यह भी थी कि पूरा परिवार भोजन लेने नहीं आता था तो उसको एक ही आदमी का खाना मिलता था। वह भी 24 घंटे में एक बार आधा अधूरा पका अधपका ही दाल भात मिल रहा था। कुछ मज़दूरों को राशन दिया गया। लेकिन उसके पास कमरे पर उसे पकाने को मसाले चूल्हा और दूसरा ज़रूरी सामान ही नहीं था।

    ज़ाहिर है कि ये सब अधिक दिन चलने वाला नहीं था। लिहाज़ा मज़दूरों ने पैदल ही अपने घर जाने को हज़ारों कि.मी. सड़कें नापनी शुरू कर दीं। मरता क्या नहीं करतायानी वे अपने घरों के लिये ना निकलते तो भूखे प्यासे ही मर जातेइस दौरान सफर में मरने वालों का सरकारी आंकड़ा लगभग 150 के आसपास है तो गैर सरकारी 600 के लगभग है। केंद्र ने तब भी इनके लिये रेल नहीं चलाई। खाये अघाये अमीर और सम्पन्न लोग जिन्होंने विदेशों से चारटर्ड प्लेन व देश के कोटा जैसी कोचिंग हब से अपने बच्चों को ए.सी. बसों से अपने घर बुलाकर राहत की सांस लीं।

    वो बार बार यह सवाल उठाते रहे कि ये मज़दूर घर जा ही क्यों रहे हैंकिसी कवि ने ठीक ही कहा है कि जिसके पैर ना पड़ी बिवाई,वो क्या जाने पीर पराईइसके बाद पूरी दुनिया में थू थू होने पर लॉकडाउन 2 से 3 और 3 से चार होने के बाद सरकार इन मज़दूरों को इनके घर भेजने को बेमन से तैयार हुयी। इसका भी इनसे लागत से बहुत अधिक किराया वसूल किया गया। इस दौरान पहले औरंगाबाद में 16मज़दूर रेल से कटकर तो बाद में औरया में वाहन टकराने से 24 श्रमिकों की दर्दनाक मौत हुयी। कुछ भूख प्यास से कुछ और अन्य बीमारी व कारणों से मारे गये। लेकिन हमारे शासकों के कान पर जूं नहीं रेंगी।

   गर्भवती महिला मज़दूरों की डिलीवरी तक सड़क पर हुयी। एक बच्चे को एक मां अपने सूटकेस पर लेटाकर खींच रही थी तो एक बाप अपनी बैलगाड़ी का एक बैल खाना खरीदने को बेचकर अपने युवा बेटे को बैल की जगह इस्तेमाल कर रहा था। इस दौरान हिंदू मुस्लिम मज़दूरों की एक दूसरे को मानवता के आधार पर रास्ते में बीमार पड़ने या मरने पर खून के रिश्तों की तरह मदद करने और अपनी जान तक दांव पर लगाने की मार्मिक तस्वीरें भी सामर्ने आइं। अफ़सोसनाक बात यह रही कि जब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी तो कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब तो किया लेकिन कोई राहत नहीं दी।

    सरकार ने अदालत में एक अपै्रल को कोरा झूठ बोल दिया कि एक भी मज़दूर सड़क पर पैदल नहीं जा रहा। जो जा रहे थे वे अफवाह का शिकार थे। अब उनको आसपास के स्थलों पर शरण दे दी गयी है। इसके बाद 28 अपै्रल को जब एक बार फिर कोर्ट ने सरकार से पूछा कि उसके पास प्रवासी मज़दूरों के लिये क्या योजना हैतो केेंद्र सरकार ने यह कहकर एक बार फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया कि राज्यों से चर्चा करके बतायेंगे।

    इतना ही नहीं कर्नाटक सरकार ने तो पूरी बेशर्मी से इनके लिये चलने वाली सारी रेलें ही रद्द कर दीं। बाद में जब हंगामा मचने पर रेल चलीं तो वहां के हाईकोर्ट ने यह आदेश कर दिये कि जो भी मज़दूर राज्य में आयेंगे वे तभी घुस पायेंगे जब अपना कोरोना टैस्ट करा लें। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाई। ऐसे ही मज़दूरों की भलाई के नाम पर राजस्थान यूपी और अन्य सरकारों ने काम के घंटे बढ़ाकर12 कर दिये। जो कोर्ट के आदेश पर बाद में वापस लेने पड़े। लेकिन अभी भी पक्ष विपक्ष केे कई राज्यों ने लैबर एक्ट को लागू करने से तीन साल के लिये मना कर दिया है।

    मज़दूरों को घर भेजने से लेकर खाना और यात्रा किराया वेतन व रोज़गार देने तक की आड़ में जो कुछ सभी दलों की सरकारें गरीब विरोधी काम कर रही हैं। उससे लगता है एक बार फिर बंधुआ मज़दूर यानी गुलामी का दौर वापस लौट आया है।                                                                    

Sunday, 17 May 2020

कोरोना पैकेज

पैकेज नहीं बॉन्ड हैप्रॉब्लम सप्लाई नहीं डिमांड है!

0कोरोना संकट से निबटने को पीएम मोदी ने जो 20 लाख करोड़ का पैकेज दिया है। उसका हर किसी ने ऐलान होते ही स्वागत किया था। लेकिन जब वित्तमंत्राी ने इसको चार दिन तक विस्तार से समझाया तो विपक्षी नेता राहुल गांध्ी पूर्व वित्तमंत्राी चिदंबरम और अन्य अर्थ विशेषज्ञों ने इसे एक तरह से बॉन्ड यानी कर्ज़ बताते हुए गरीबों को सीध्े नक़द मदद दिये जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। जिससे बाज़ार में डिमांड पैदा हो और रोज़गार के अवसर बढे़ं।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   पीएम मोदी ने लॉकडाउन का ऐलान करते हुए राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोध्न में कहा था कि जान है जहान है। उनका मतलब यह था कि कोरोना से हम सबकी जान को ख़तरा है। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन आगे बढ़ा उन्होंने अर्थव्यवस्था की नब्ज़ पहचानते हुए दूसरे संदेश कहा कि जान भी जहान भी। यानी हमें सेहत का ख़याल रखना है। साथ ही रोज़ी रोटी का भी। इसके बाद देश में कुछ आर्थिक गतिविध्यिों की छूट दी गयी। हालांकि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई की पहले ही व्यवस्था कर दी गयी थी। लेकिन इससे काम नहीं चला तो 1लाख 70 हज़ार करोड़ का पहला आर्थिक पैकेज दिया गया।

हमारी 130 करोड़ की आबादी के सामने यह पैकेज बहुत छोटा लगा। इसके बाद पीएम मोदी ने हमारी जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर यानी कुल 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज जब घोषित किया तो सबको लगा कि अब प्रवासी मज़दूरों बीपीएल परिवारों विध्वाओं वरिष्ठ नागरिकों किसानों बेरोज़गारों विकलांगों रोज़ कमाने रोज़ खाने वालों स्वरोज़गार वालों और मीडियम क्लास नागरिकों को नकद सहायता के रूप में बड़ी सहायत मिलेगी। लेकिन चूंकि हमारे पीएम न तो ऐसे मुद्दों पर अपनी कैबिनेट अर्थ विशेषज्ञों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों से राय लेते हैं।

इसलिये जब इस विशाल पैकेज की डिटेल सामने आई तो लगा कि यह बाज़ार में डिमांड बढ़ाने की बजाये सप्लाई बढ़ाने की एक बिना सोची समझी योजना है। इससे कई माह पहले भी सरकार ने आरबीआई से 1लाख 46 हज़ार करोड़ रिजर्व पफंड से लेकर बड़ी पूंजीपतियों उद्योगपतियों और कॉरपोरेट सैक्टर को दिये थे। लेकिन उससे रोज़गार बढ़ना तो दूर और उल्टा लोगों की नौकरियां जाने का सिलसिला दिन ब दिन तेज़ होता गया। पीएम मोदी ने यह ऐतिहासिक पैकेज देते हुए एक लाइन यह भी जोड़ी थी कि पहले के राहत पैकेज और रिज़र्व बैंक द्वारा बढ़ाई गयी लिक्विडिटी को भी इस पैकेज में जोड़ लिया गया है।

दरअसल सारा खेल इसी एक लाइन में था। यह तो माना जा सकता है कि पहले का 1,70,000करोड़ इसमें जोड़ लिया जाये। लेकिन पीएम ने आरबीआई का पफ़रवरी व मार्च में बैंको को 8लाख 04 हज़ार करोड़ का लिक्विडिटी पफंड मंे इसमें जोड़ लिया। जो बैंको को विभिन्न क्षेत्रों को लोन उपलब्ध् कराने के लिये दिया गया है। इन दोनों को जोड़ें तो कुल 9 लाख 74हज़ार करोड़ तो इसका मतलब पहले ही दिया जा चुका है। आगे सरकार एमएसएमईज़ यानी माइक्रो स्मॉल और मिनी एन्टरप्राइजे़ज को बाकी बची रकम 10 लाख 26 हज़ार करोड़ में से 3 लाख 70,000 करोड़ का पैकेज लोन के रूप में अपनी आसान गारंटी और कुछ ब्याज सब्सिडी पर देगी।

    ऐसे ही बिजली सप्लाई करने वाली डिस्कॉम को 90,000 करोड़ एनबीएपफसीज़ एचएपफसीज़ और एमएपफ़आईज़ को75,000 करोड़ टीडीएस टीसीएस एवं ईपीएपफ में कंपनियों की तरपफ से उनका हिस्सा 56,750 करोड़ व रियल स्टेट को40,000 करोड़ हाउसिंग को 70,000 करोड़ किसानों को कर्ज़ के लिये 2 लाख 36000करोड़ और सबसे कम पफेरी लगाने वालों को5000 करोड़ व प्रवासी मज़दूरों को मात्रा3500 करोड़ के साथ बाकी बची रकम 79750करोड़ अन्य विभिन्न मदों में वित्तमंत्राी घोषित करेंगी।  

    अर्थव्यवस्था के जानकारों रघुराम राजन अमतर््य सेन और अभिजीत बनर्जी आदि व विपक्ष का कहना सही लगता है कि इस समय लगभग 12 करोड़ मज़दूर बेरोज़गार हो चुके हैं। उनके परिवार के औसत 5 सदस्य भी मानें तो ये संख्या 60 करोड़ यानी हमारी आबादी का कुल आध हिस्सा है। ऐसे ही स्वरोज़गार वाले किसान वकील मीडियाकर्मी और अन्य वर्गों के रोज़गार खो बैठे लोगों को जोड़ा जाये तो इनकी तादाद देश की आध्ी आबादी से भी अध्कि हो जायेगी। ऐसा नहीं है कि इनको लॉकडाउन खुलने के बाद भी काम नहीं मिलेगा। लेकिन अभी कई महीने या साल दो साल बाद तक भी इनको रोज़गार वंचित रहना पड़ सकता है।

    अर्थव्यवस्था के दो महत्वपूर्ण पहिये होते हैं। एक डिमांड दूसरा सप्लाई। आप बाज़ार में जाकर देखें तो आपको शायद ही किसी चीज़ की कमी मिले। देश में हर वस्तु के गोदाम भरे पड़े हैं। दुकानदार और होलसेल डीलर आगे और ऑर्डर देने को तैयार नहीं है। उसका कहना सही है कि बाज़ार में मांग नहीं है। मांग इसलिये नहीं है कि लोगों की जेब में पैसा नहीं है। उनके रोज़गार चले गये हैं। ऐसे में सरकार ने बैंको के ज़रिये और अध्कि रकम लोन उपलब्ध् कराकर उल्टा काम किया है। बैंको का एनपीए पहले ही बढ़ता जा रहा है। उद्योगपति मांग न होने से और अध्कि उत्पादन करने को और अध्कि कर्ज़ लेेन को तैयार नहीं है।

    बैंक और एनपीए बढ़ने के डर से नया लोन देने को तैयार नहीं है। इससे रोज़गार बढ़ने की बजाये और घटने की आशंका इसलिये भी बढ़ जाती है कि ध्ंध ना चलने से कंपनियां और अध्कि लोगों को नौकरी से निकालकर अपनी लागत व खर्च कम करना चाहेंगी। इसलिये सरकार से पैकेज में लोन के रूप में एक तरह से बॉन्ड नहीं डिमांड बढ़ाने को आध्ी से अध्कि परेशान किसान गरीब व बेरोज़गार जनता के बैंक खाते में सीध्े नक़द रकम जो 20 लाख करोड़ भाग 130 करोड़ कर दी जाती तो लगभग हर किसी को 15000 रू. दिये जाने की आशा थी। लेकिन प्रॉब्लम वही है कि जिनके हाथ में सत्ता है। वे खुद जानते नहीं और एक्सपर्ट व विपक्ष की सलाह मानते नहीं।                                         

कोरोना और काँग्रेस

मोदी के हर फै़सले का अंध विरोध ना करे कांग्र्रेस!

0पहले कांग्रेस ने कोरोना को काबू रखने के लिये लगाये गये लॉकडाउन का विरोध किया। उसके बाद मीडिया को जारी होने वाले सरकारी विज्ञापनों का विरोध करते हुए उनको रोकने की मांग की। और अब कांग्रेस सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते की चंद किश्तों को रोकने पर मोदी सरकार को कोस रही है। इसके बावजूद जनता में मोदी की लोकप्रियता और कांग्रेस का विरोध दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस को सोचना चाहिये कि ऐसा क्यों है?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   लोकतंत्र में बेशक विपक्ष का काम सत्तापक्ष की गलत नीतियों फैसलों और मनमानी का विरोध करना होता है। लेकिन विरोध के लिये विरोध करने से जिसका विरोध किया जाता है। वह पहले से और अधिक मज़बूत होता जाता है। साथ ही जो सहानुभूति और समर्थन विरोध करने वाले विपक्ष को जनता का मिलना चाहिये था। वह भी उल्टे कम होता जाता है। आजकल कांग्रेस जो मुख्य विपक्षी दल हैउसके साथ कुछ ऐसा ही मामला हो रहा है। 2014 में जब से कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुयी है। उसने इस मुद्दे पर कभी गंभीरता से चिंतन मनन नहीं किया कि क्या वजह है कि 2019 आते आते वह और भी कमज़ोर और पीएम मोदी लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं। कोरोना से निबटने को लेकर यह ठीक है कि मोदी सरकार से कुछ भूल कमियां और विशेषज्ञों से विचार विमर्श की कमी रही है। लेकिन इस मुद्दे पर कोई दो राय नहीं है कि इसका असर कम करने को फिलहाल सरकार के पास लॉकडाउन ही एकमात्र इलाज था। लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध करके खुद अपना राजनीतिक नुकसान किया। इसके बाद जब राहत पैकेज की बात आई तो यह भी ठीक है कि सरकार गरीब कमज़ोर और असहाय वर्ग को उतनी सहायता राशि राशन या पका हुआ भोजन नहीं परोस पाई जितना ज़रूरत थी। लेकिन पैसे की कमी पूरी करने को सरकार को मीडिया के हज़ारों करोड़ के विज्ञापन बंद करने का सुझाव देना कांग्रेस का मानसिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है। इससे बचा खुचा मीडिया भी कांग्रेस के खिलाफ हो गया। दूसरे मीडिया जिसका बड़ा हिस्सा पहले ही मोदी सरकार के गीत गा रहा था। पहले से अधिक मोदी सरकार के पक्ष मंे झुक गया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है। आज नहीं तो कल वह ज़िंदा रहेगा तो उसके निष्पक्ष रहने का रास्ता भी निकल सकता है। इसके बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार के अब तक के सबसे अच्छे न्यायसंगत और सामाजिक समानता के फैसले सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के तीन महंगाई भत्ते रोकने के फैसले का विरोध करके अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। क्या कांग्रेस को पता नहीं है कि केंद्र सरकार के 48 लाख कर्मचारी और 65 लाख पेंशनभोगी लोगों के जनवरी जुलाई 2020 और जुलाई 2021 के डीए की तीन किश्तें रोकने से सरकार को 37,530करोड़ रू. की बचत होगी। अगर राज्य सरकारें भी ऐसा करें तो 82,566 करोड़ रू. की बचत हो सकती है। अगर ये दोनों रकम जोड़ें तो एक लाख करोड़ से अधिक होगी। ये सब पैसा कोरोना से लड़ने को स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च हो तो हमारा हैल्थ बजट दोगुना हो जायेगा। ज़ाहिर है जिस तेज़ी से कोरोना के केस सामने आ रहे हैं। उसका असली उभार जून जुलाई में पीक पर होगा। ऐसे में हमें कोरोना से लड़ने को पहले से अधिक बजट की ज़रूरत होगी। ऐसे में कोई भी मोदी सरकार के इस फैसले को गलत नहीं बता सकता। अलबत्ता कांग्रेस की मोदी सरकार से बुलैट ट्रेन और सेंटर विस्टा के निर्माण की मांग फिलहाल रोकने को उचित माना जा सकता है। लेकिन जहां तक उसका सरकारी कर्मचारियों के डीए रोकने से कम वेतन वालों को समस्या आने का लचर तर्क का सवाल हैवह पूरी तरह गलत है। मिसाल के तौर पर दिल्ली के एक सरकारी चपरासी का मूल वेतन 18000 है। उसमें डीए और अन्य भत्ते जोड़े जायें तो यह लगभग 30,000 हो जाता है। नेशनल सैंपल ऑर्गनाइजे़शन का कहना है कि पांच लोगों के परिवार के लिये किसी सरकारी कर्मचारी का यह सबसे कम वेतन देश के 85 प्रतिशत लोगों की कुल मासिक आय से अभी भी अधिक है। एन एस ओ के 2017-18 के 75वें दौर के मासिक खर्च के आंकड़े जोड़कर देखा जाये तो उस कर्मचारी को 1500 रू. के डीए का नुकसान होगा। लेकिन दिल्ली के ही निजी क्षेत्र के अकुशल श्रमिक के 14,842 वेतन के सापेक्ष यह अभी भी अधिक है। सरकारी सर्वे बताते हैं कि देश के अधिकांश परिवार 10,000 से कम मासिक आय पर जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कांग्रेस किस वर्ग के पक्ष में खड़ी हैक्या कांग्रेस नहीं जानती कि कोरोना के बाद लगे लॉकडाउन से 12 करोड़ मज़दूरोें की नौकरी चली गयी है। क्या उसको यह नहीं पता कि स्वरोज़गार वाले करोड़ों लोग मजबूरन घरों में बंद रहकर अपने कारोबार से पूरी तरह हाथ धो बैठे हैं। क्या कांग्रेस यह भी नहीं जानती कि तमाम निजी क्षेत्र की नौकरी जा रही हैं। हालत यह है कि 80 लाख से अधिक प्राइवेट कर्मचारियों ने अपना 3200 करोड़ से अधिक का भविष्य निधि का पैसा भुखमरी से बचने को रिटायर होने से पहले ही निकाल लिया है। जहां तक सरकारी कर्मचारियों के हाथ में अधिक पैसा आने से बाज़ार में मांग बढ़ने का कांग्रेस का दावा है। अगर यह पैसा गांवों और गरीबों के हाथ में आये तो बाज़ार में अधिक मांग निकलती है। अलग अलग राज्यों में फंसे हुए मज़दूरों के लिये रेल चलने पर मोदी सरकार द्वारा किराया वसूलने पर उनका किराया कांग्रेस द्वारा दिये जाने का मास्टर स्ट्रॉक सोनिया गांधी का अब तक का सबसे सही और बड़ा सराहनीय फैसला था। मगर बाकी मामलों में अनेक गल्ती मनमानी और देरी करने के बावजूद मोदी सरकार को कांग्रेस और विपक्ष अब तक ठीक से घेर नहीं पाया है। अलबत्ता केरल दिल्ली और राजस्थान की कई विपक्षी राज्य सरकारों ने कोरोना से सफलतापूर्वक निबटकर देश के सामने एक शानदार मिसाल ज़रूर पेश की है।                                                     

Tuesday, 5 May 2020

कोरोना हर्ड इम्युनिटी

कोरोना हर्ड इम्युनिटी: लॉकडाउन का ख़तरनाक विकल्प ?

0सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मारकंडेय काटजू ने लॉकडाउन को कोरोना से बचाव ना मानते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग की थी। अब रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने रोज़ एक लाख लोगों के टैस्ट किये बिना लॉकडाउन को निरर्थक बताया है। विपक्षी कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो पहले ही इसे पॉज़ बटन बता चुके हैं। लेकिन अब दुनिया में लॉकडाउन का विकल्प हर्ड इम्युनिटी को लेकर चर्चा तेज़ हो गयी है। रिसर्च क्या कहती हैं?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   प्रैस कौंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मारकंडेय काटजू ने कहा कि कोरोना बेशक बड़ी घातक महामारी है। लेकिन इससे लॉकडाउन लगाकर नहीं निबटा जा सकता क्योंकि ऐसा करने से देश की40 से 50 करोड़ जनता रोज़गार छिनने और घरों में बंद होने से भूख से मरने का ख़तरा है। उनका यह भी कहना है कि आंकड़े बताते हैं कि हर साल दुनिया ही नहीं भारत में इन्फुलुएंज़ा,मलेरियाडेंगूटीबीकैंसर और डायबिटीज़ से लाखों लोग मरते हैं। उनका मतलब शायद यह था कि कोरोना से इन बीमारियों से अधिक लोग नहीं मरेंगे।

लेकिन यहां काटजू साहब यह भूल गये कि अगर किसी के यहां साल में दो तीन बार चोरी होती है तो क्या चौथी बार चोर को चोरी की इजाज़त केवल इस वजह से ही दे दी जाये कि उसके यहां तो चोरी पहले से ही होती चली आ रही हैै। साथ ही यह भी याद रखना चाहिये कि कोरोना छुआछूत की सी महामारी है। जो संपर्क मंे आने वाले दूसरे लोगों को लगातार संक्रमित करती रहेगी। जबकि हर साल होने वाली अन्य बीमारियों का स्वभाव ऐसा नहीं है। जहां तक रघुराम राजन का सवाल है। उनकी इस बात में दम है कि अमेरिका में रोज़ डेढ़ लाख टैस्ट हो रहे हैं।

जबकि उसकी आबादी 30 करोड़ है। हमारे देश में मात्र 25 से 30 हज़ार टैस्ट हो रहे हैं। जिनको बढ़ाकर कम से कम एक लाख किया जाना चाहिये। अगर अमेरिका के हिसाब से चलें तो यह संख्या पांच लाख तक होनी चाहिये। यह बात भी सही है कि जितने अधिक लोगों का टैस्ट होगा। उतने ही अधिक कोरोना पॉज़िटिव हम तलाश सकेंगे। उनका लॉकडाउन के चलते उपचार करके अन्य लोगों को संक्रमण होने से बचाया जा सकेगा। अमेरिका की पिं्रसटन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में पता चला है कि अगर लॉकडाउन का विकल्प हर्ड इम्युनिटी को माना जाये तो इसके लिये देश के 60 प्रतिशत लोगों को संक्रमित होने के लिये 7 माह का समय लगेगा।

इसके बाद कोरोना का वायरस नये शिकार नहीं तलाश कर पायेगा। हालांकि अभी भी कोरोना होकर उबर चुके लोगों के खून से प्लाज़मा लेकर अन्य कोरोना रोगी को चढ़ाने से उसकी इम्युनिटी बढ़ने की बातें सामने आ रही हैं। लेकिन हमारी सरकार का कहना है कि यह अभी अनुसंधान का मामला है। यह बात साफ है कि न तो अभी कोरोना की कोई वैक्सीन बनी है। ना ही कोरोना की कोई दवा सामने आई है। ऐसे मंे सवाल यह है कि कब तक लॉकडाउन के बल पर कोरोना को रोकने का प्रयास सफल हो सकता है।

 दिल्ली की एक स्वास्थ्य संस्था की रिसर्च में पता चला है कि भारत में 93 प्रतिशत लोग 65साल से कम उम्र के हैं। इस संस्था का कहना है कि 50 से कम आयु वाले लोगों पर कोरोना का बहुत कम असर होता है। यानी जवान और अध्ेाड़ रोगी कुछ दिन हल्के फुल्के लक्ष्णों के बाद घर पर रहकर ही कोरोना से जीत सकते हैं। गंभीर रोगियों को अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि इससे पहले ही अर्थव्यवस्था का हो चुका नुकसान लॉकडाउन आगे ना बढ़ने से रूकेगा। साथ ही लोगों की और नौकरी जाने का ख़तरा टलेगा।

घर में बंद गरीब और मज़दूर बाहर निकलकर जैसे तैसे कुछ भी काम धंधा कर अपना परिवार भूख से मरने से बचा सकेगा। जानकारों का यह भी कहना है कि अभी हमने 130 करोड़ जनता को एक तरह से क्वारंटाइन किया हुआ है। जबकि बच्चो और बुज़ुर्गों को ही घर में बंद रखने की ज़रूरत थी। आज किसी को कोरोना हो जाये तो उसके शरीर के अंदर कोरोना वायरस जाकर खुद को लाखों वायरस मंे विकसित कर लेता है। जब उस आदमी के शरीर में एंटी बॉडीज़ यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जाती है तो कोरोना वायरस खत्म करने लगती है।

ऐसे में उसके शरीर से लाखों कोरोना वायरस बाहर निकलकर अन्य स्वस्थ लोगों को अपना शिकार बनाने लगते हैं। लेकिन एक समय ऐसे आता है कि जब लोगों की बड़ी संख्या वायरस से संक्रमित होकर उससे सफलतापूर्वक लड़ने की क्षमता पा जाती है। इसी को हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है। इसे लॉकडाउन का विकल्प भी कहा जा रहा है। एक इस्राईली विशेषज्ञ ने दि जेरूसलम पोस्ट से कहा कि लॉकडाउन में संक्र्रमण दर उतनी सामने नहीं आई। जितना अनुमान हम लोगों ने लगाया था। नॉर्थ ईस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जैफ हॉव ने बोस्टन ग्लोब में लिखा है कि जब कभी भी लोग घर से बाहर निकलेंगे तो कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ने लगेगा।

उनका कहना है कि जब तक लॉकडाउन के दौरान पर्याप्त संख्या में लोगों को तीन टी यानी ट्रेस टैस्ट और ट्रीटमेंट ना दे दिया जाये। तब तक लॉकडाउन का कोई खास लाभ होने वाला नहीं है। उनका यह सवाल भी वाजिब है कि आप लॉकडाउन कब तक बढ़ा सकते हैंविशेष रूप से गरीब और विकासशील देशों की इकॉनोमी का तो लगातार लॉकडाउन से दिवाला ही निकल सकता है। उधर हर्ड इम्युनिटी के विकल्प के विरोधी कहते हैं कि यह प्रयोग बहुत ख़तरनाक है। उनका कहना है कि हर्ड इम्युनिटी के लिये आधी आबादी ही नहीं 60 से 85प्रतिशत जनता को इन्फैक्टेड होने के लिये खुला छोड़ना होगा।

ऐसे मंे यह ठीक ठीक कोई नहीं बता सकता कि इसका कितना कैसा और कब तक असर होगाअगर यह जोखि़म उठाकर 10 से 20प्रतिशत लोगों को कोरोना का गंभीर शिकार बनना पड़ा तो भारत जैसे देश में यह संख्या 10से 20 करोड़ से अधिक हो सकती है। ऐसे में इतनी बड़ी रोगियोें की फौज को उपचार कैसे दिया जायेगाकिसी भी देश के पास इतने संसाधन अस्पताल आईसीयू वैंटिलेटर और यहां तक कि क्वारंटाइन सेंटर तक नहीं हैं। खुद अमेरिका इस मामले में इतना शक्तिशाली देश होकर गच्चा खा गया हैै। ब्रिटेन ने शुरू शुरू में हर्ड इम्युनिटी का कंसैप्ट अपनाने का साहस दिखाया था।

लेकिन यह देर से लिया गया फैसला था। उसके पीएम बोरिस जॉनसन जब खुद कोरोना के शिकार होकर अस्पताल पहुंच गये तो उसने इस कदम से तौबा कर ली। इसके बाद बाकी देशों को भी यह विकल्प मज़ाक लगने लगा। उधर स्वीडन ने दावा किया है कि उसने अपनी राजधानी स्टॉकहोम में हर्ड इम्युनिटी के विकल्प को कामयाबी से अपनाया है। लेकिन उसकी परिस्थितियां कुछ अलग तरह की हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी हर्ड इम्युनिटी के विकल्प के पक्ष में नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के महामारी विशेषज्ञ जाइडियोन मेयेरोविट्ज़ ने गार्जियन अख़बार को बताया कि हर्ड इम्युनिटी वंचित और कमज़ोर वर्ग के गरीब लोगों की बड़ी कुर्बानी लेगा।

वे इसे अर्थव्यवस्था बचाने को बड़ी कीमत चुकाना और अनैतिक व अमानवीय मानते हैं। साथ ही वे हर्ड इम्युनिटी हासिल करने के लिये उच्च जोखिम वालों यानी बच्चो और वरिष्ठ नागरिकों को बचाने की योजना को अव्यवहारिक मानते हैं। उनका कहना है कि जब एक बार कोरोना वायरस को खुलकर अपना खेल करने को आज़ाद छोड़ दिया जायेगा तो यह कम इम्युनिटी वाले नौजवान वर्ग को भी अपना बड़ा श्किार बना सकता है। कैनेडा की मुख्य जन स्वास्थ्य अधिकारी का भी यह मत है कि सवाल कोरोना संक्रमितों की संख्या या उनमें कम दिख रहे लक्ष्णों का नहीं है।

यह भी हो सकता है कि ऐसे रोगियों में परंपरागत बुखार सूखी खांसी और सांस लेने में तकलीफ ना होकर कोरोना वायरस चुपचाप उनकी किडनी लीवर ब्रेन और हार्ट को भारी नुकसान कर दे। ब्लूमबर्ग के एक शोधपत्र में कहा गया है कि हर्ड इम्युनिटी की बजाये हम सबको बाज़ार में इसका वैक्सीन आने का इंतज़ार करना चाहिये। उनका कहना है कि दुनिया मंे ऐसे तीन दर्जन से अधिक प्रयोग खोज और विकल्प तलाश किये जा रहे हैं जिनसे आज नहीं तो कल कोरोना का टीका या दवा मिल ही जायेगी। तब तक हमें लॉकडाउन या हर्ड इम्युनिटी पर शासन व्यवस्था की तानाशाी या लोकतंत्र में क्या बेहतर हैचर्चा और तर्क वितर्क करते रहना चाहिये। फिलहाल तो कोरोना को मुख़ातिब करके यह शेर ही कहा जा सकता है-                                                    

0 मैं अपने ख़ौफ़ की हद पर खड़ा हूं,

  अब इसके बाद घबराना है तुम को।।        

Wednesday, 29 April 2020

लॉकडाउन और कोरोना

लॉकडाउन धीरे धीरे हटेगा

कोरोना साथ साथ चलेगा !

0कृषि क्षेत्र सहित कुछ क्षेत्रों से लॉकडाउन पहले चरण के बाद ही हट चुका था। पहले रोज़े से कुछ और दुकानें खुल गयीं हैं। बाक़ी 3 मई के बाद धीरे धीरे अलग अलग राज्यों के हिसाब से लॉकडाउन आज नहीं तो कल किश्तोें में हटना ही है। लेकिन एक चीज़ जो महीनों या सालों तक नहीं जायेगी वह कोरोना है। ज़ाहिर है कि कोरोना अब हमारी ज़िंदगी के साथ साथ चलेगा। इसलिये बचाव को सावधनी लगातार जारी रखनी होगी।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोरोना एक बीमारी है। यह अजीब तरह की बीमारी है। इसके प्लेग स्पेनिश फ्रलू व ब्लैक फीवर की तरह महामारी बनने का ख़तरा दुनिया पर अब भी मंडरा रहा है। पहले आई महामारियों में करोड़ों लोग मारे गये थे। उस समय आज की तरह आध्ुानिक स्वास्थ्य सुविधायें तेज़ जनसंपर्क और लॉकडाउन जैसी सुविधायें दुनिया में उपलब्ध नहीं थीं। लेकिन यह भी सच है कि एक देश की महामारी इतनी जल्दी और इतनी तेज़ी से दूसरे देशों में भी पहले नहीं फैलती थी। इसकी वजह यह थी कि यातायात के साधन उतने अच्छे नहीं थे। जितने आज हैं।

हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि लॉकडाउन से कोरोना को ख़त्म नहीं किया जा सकता। लेकिन इससे होने वाला नुकसान कम किया जा सकता है। कुछ सूत्रों का दावा है कि लॉकडाउन तो एक तरह से पॉज़ बटन का काम करेगा। जैसे ही लॉकडाउन ख़त्म होगा। लोग घरों से बाहर निकलेंगे। एक दूसरे के संपर्क मेें आयेंगे तो कोरोना का असर फिर से बढ़ने लगेगा। अब यह तो समय ही बतायेगा कि इस आशंका में कितनी सच्चाई हैलेकिन जानकारों की इस बात में दम है कि लॉकडाउन का वास्तविक लाभ तभी मिलता है। जब सरकारें शत प्रतिशत ना सही अपने अधिकतक नागरिकों की देशबंदी के दौरान कोरोना जांच कर लें।

हमारे देश में हालत यह है कि शासन प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना संक्रमित तक अपने घरों में छिपे बैठे हैं। वे तमाम अपील और कोई कानूनी कार्यवाही या उत्पीड़न ना करने के सरकार के आश्वासन के बावजूद जाने अंजाने में अपने घरों मुहल्लों व पूरे रिहायशी इलाकों के लिये कोरोना प्रसार का ख़तरा बने हुए हैं। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि कोरोना लगातार अपने रंग बदल रहा है। पहले इसके लक्ष्ण 7 से 14 दिन में दिखने लगते थे। इसके बाद कुछ मामलों में कोरोना संक्रमितों में बुखार खांसी और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत 21 से 28 दिन बाद सामने आने लगी।

सरकार ने कोरोना के बारे में विशेषज्ञों की इसी राय को नज़र में रखते हुए ही पहले चरण का लॉकडाउन 14 की बजाये 21 दिन का रखा था। लेकिन जब 28 दिन और उससे भी अधिक दिन की बात सामने आयी तो सरकार ने 19दिन और बढ़ाकर इसको कुल 40 दिन का यह सोचकर किया होगा कि इससे जो भी कोरोना रोगी होंगे। उन सबके लक्ष्ण हर हाल में सामने आ जायेंगे। ऐसे मेें उन हज़ार या लाख दो लाख लोगों का इलाज करके देश के बाकी लोगों को कोरोना के प्रकोप से बचाया जा सकेगा।

लेकिन कोरोना ने 79 फीसदी रोगियों में अपने लक्ष्ण ज़ाहिर ना करके हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया के सामने यह नई चुनौती पेश कर दी कि कोरोना पीड़ितों को कैसे तलाश किया जाये?ज़ाहिर बात है कि जब तक हम एक एक कोरोना पीड़ित को देश में चिन्हित नहीं कर लेते उनका इलाज भी नहीं कर सकते। हालांकि सरकार ने इस दौरान स्वास्थ्य सुविधायें बढ़ाने कोरोना संक्रिमितों की जांच करने को लैब बड़े पैमाने पर स्थापित करने अस्पताल की संख्या बढ़ाने रेलवे के कोचों में अस्थायी कोरोना चिकित्सालय बनाने वैंटिलेटर और कोरोना टैस्ट की त्वरित किटें मंगाने में काफी अच्छा काम किया है।

लेकिन हमारी बड़ी आबादी और उनमें गरीबी व जहालत अधिक होने से कोरोना महामारी फैलने पर सब मरीज़ों का एक ही समय मंे इलाज करना कठिन नहीं लगभग नामुमकिन सा ही होगा। इसलिये लॉकडाउन खुलने के बाद हम सबको पूरी तरह से पहले की तरह सावधानी बरतते हुए नई दुनिया में जीना है।

कोरोना आने के बाद की दुनिया में सबको मास्क लगाना सड़क पर ना थूकना फिज़िकल डिस्टेंसिंग रखना बार बार साबुन से हाथ धोना बिना ज़रूरत घर से नहीं निकलना भीड़ में जाने से बचना शादी जन्मदिन की छोटी से छोटी पार्टी करना चाट मिठाई व चाउूमिन डोसे और बाहर का खुला सामान खाने से बचना डिजिटल पेमेंट करना खांसते छीेंकते समय मुंह ढकना हाथ ना मिलाना गले ना मिलना किस ना करना घर से बाहर जाने पर वापस आते ही नहाना दूसरे जूते चप्पल पहन लेना अवांछित लोगों को घर से बाहर ही रखना फालतू लोगों से ना मिलना फालतू बात ना करना स्कूल जाने वाले बच्चों को अपने साथ के बच्चों से दूरी बनाये रखने को समझाना सफाई का घर पर खास खयाल रखना और अनावश्यक सार्वजनिक स्थानों सिनेमा मीटिंग खरीदारी खेलकूद पिकनिक यात्रा टालना हर किसी से मिलने में 6 फुट से अधिक की दूरी बनाये रखना ही कोरोना से बचाव का एकमात्र रास्ता होगा।

यानी सरकार की भूमिका लॉकडाउन के बाद एक सीमा तक ही काम करेगी। हम सबको खुद ही ऐसे तौर तरीके विकसित करने होेंगे। जिससे कोरोना से समाज को जागरूक कर कोरोना के ख़तरे के साथ एक नई दुनिया में कोरोना से बचाव कर सकें। मतलब कोरोना की मौजूदगी के साथ एहतियात बरतते हुए लंबे समय तक हर पल हर क़दम पर चौकस रहकर नई जीवन शैली अपनानी होगी।                                                  

0 मैं बदले हुए हालात में ढल जाता हूं,

  देखने वाले अदाकार समझते हैं मुझे।।      

Monday, 20 April 2020

डॉक्टर्स पर हमला

जान बचाने वालों पर हमला किसी कीमत पर सहन नहीं होगा !

 

0पहले इंदौर और उसके बाद मुरादाबाद में संदिग्ध लोगों को कोरोना से बचाने गये डाक्टर्स नर्सों और पुलिस पर हमला हुआ। इस हमले को अफ़सोसनाक नहीं शर्मनाक माना जायेगा। यह भूल या मामूली गल्ती नहीं भयंकर व जघन्य अपराध है। तमाम अगर मगर और बहानों के बावजूद हम इस हमले को अक्षम्य और पागलपन मानते हैं। जब शासन प्रशासन पुलिस और स्वास्थ्य विभाग आपकी जान बचाने को अपनी जान दांव पर लगाकर दिन रात सेवा कर रहा है तब ऐसे हमले किसी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकते हैं।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोरोना से आज पुरी दुनिया परेशान है। दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन है। दुनिया के कई विकसित अमीर और कम आबादी वाले देश भी अपनी अकड़ नालायकी और लापरवाही से कोरोना की चपेट में आकर अब तक भारी नुकसान उठा चुके हैं। हमारा देश दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। हम विकासशील देश हैं। लिहाज़ा हमारे पास अभी पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं वाला ढांचा भी उपलब्ध नहीं है। हमारी सरकार ने इलाज से बेहतर बचाव की नीति पर चलते हुए देश में लॉकडाउन किया है। विपक्ष के साथ ही सरकार के आलोचक और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत के इस क़दम का समर्थन किया है।

     ज़रूरत के हिसाब से लॉकडाउन को 21दिन के बाद 19 दिन और बढ़ाया गया है। इस दौरान सरकार ने अपने स्तर पर गरीब मीडियम क्लास और ज़रूरतमंद लोगों की आर्थिक सहायता और राशन देकर यथा संभव सहायता भी की है। हालांकि इसमें कुछ कमियां और भूलचूक भी सामने आ रही हैं। लेकिन इतने बड़े देश इतनी बड़ी आबादी और इतने बड़े सिस्टम में यह सब होना स्वाभाविक है। जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो पहले एक सप्ताह सब कुछ काफी ठीक से चला। प्रवासी मज़दूरों के सड़कों पर निकलकर अपने घर जाने के लिये बड़ी तादाद में आने से कुछ समस्यायंे सामने आयीं। लेकिन जल्दी ही इनको संभाल लिया गया।

    इसके बाद दिल्ली में तब्लीगी जमात के मरकज़ में बड़ी संख्या में लोगों के पाये जाने पर हंगामा मचा। उधर तब्लीग के तुर्कमान गेट पर चल रहे दूसरे गुट ने डेढ़ महीने पहले ही अपने सारे प्रोग्राम कोरोना की ख़बर आते ही रद्द कर दिये थे। अरब में मक्का व मदीना की यात्रा भी निरस्त की जा चुकी थी। लेकिन फिर भी नासमझी नादानी और अपराधिक लापरवाही करने वाले जमाती और उनके अंधसमर्थक अपनी भूल ना मानकर सरकार व बहुसंख्यकों पर आरोप लगा रहे हैं। जबकि मीडिया की भूमिका वास्तव में एकतरफा रही है।

    आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल कोरोना रोगियों में से एक तिहाई जमात से जुड़े या उनके परिवार के लोग पाये गये हैं। यहां तक सब निभ जाता। लेकिन जब यह बात सामने आई कि जमात का मुखिया यह मानकर चल रहा है कि उनको कोरोना हो ही नहीं सकता। यहां तक कि उनका दावा था कि अगर तब्लीग का नेक काम करते उनको कोरोना हो भी जाये तो उनका मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए मरना बहुत अच्छी बात होगी। बताया जाता है कि जमात के मुखिया की ये बुतुकी और अंध्विश्वासी बातें यूट्यूब और जमात की अपनी वैबसाइट पर अपलोड हैं।

    इतना ही नहीं जमात के लोग अपने मुखिया की इस तरह की भटकाने वाली बातों से गुमराह होकर ना केवल कोरोना के ख़तरे को नज़रअंदाज़ करके खुद बड़ी तादाद में विदेशी तब्लीगियों के संपर्क में आकर बीमार हो गये। बल्कि वे बिना जांच कराये खुद को क्वारंटाइन किये और सावधानी बरते पूरे देश में आते जाते रहे। खुदा ही जानता होगा कि इन नादान लापरवाह और ज़िद्दी लोगों ने कितने और लोगों को सफर के दौरान या अपने घर परिवार व मुहल्ले में संक्रमित किया होगा। इसके बाद भी शासन प्रशासन ने इनसे अपील की कि वे खुद सामने आयें। अपना कोरोना टैस्ट करायें। लेकिन ये अधिकांश अपने घरों में छिपकर बैठे रहे।

    जब लॉकडाउन के दौरान जमात केे कई लोग कोरोना पॉज़िटिव पाये गये और कई की मौत होने लगी तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इनके परिवार के अन्य सदस्यों को क्वारंटाइन करने की पहल की। लेकिन इंदौर और मुरादाबाद की घटनाओं ने एक बार फिर जमात से जुड़े समाज का सर शर्म से झुका दिया है। हमारा मानना है कि चाहे जो वजह रही हो हमें इन घटनाओं के लिये बिना मीडिया और सरकार के 6 साल से जारी पक्षपात व अन्याय का बहाना लिये बिना बिना शर्त माफी मांगनी चाहिये और भविष्य में ऐसी घटनायें किसी कीमत पर दोहरानी नहीं चाहिये।                                                   

0 पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसा पाये हैं,

  तुम शहर ए मुहब्बत कहते हो हम जान बचाकर आये हैं ।।         

Monday, 6 April 2020

कोरोना और जहालत

कोरोना को हराना है तो जहालत को भगाना है !

0संडे की शाम तक देश में कोरोना के कुल3819 मामलों में से 1023 केस तब्लीगी जमात के सामने आये हैं। जमात के निज़ामुद्दीन मरकज़ की इस मामले में कमियां ग़ल्तियां और नालायकी रही है। इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन मंदिर गुरूद्वारों से और सरकार के स्तर पर भी ऐसी कई चूक हुयी हैं। इसलिये जमात के बहाने मुसलमानों को टारगेट करना भी ठीक नहीं कहा जा सकता है। इस समय हम सबको आपस में नहीं बल्कि एक साथ मिलकर कोरोना से लड़ना चाहिये।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोराना से लड़ने के लिये भारत जैसे बड़ी आबादी और ना के बराबर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश के पास लॉक डाउन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीें था। हो सकता है कि लॉक डाउन करने में हमारी सरकार से कोई देरी या इसका ऐलान करने में जल्दबाज़ी और पूरी तरह सभी क्षेत्रों के विशेषज्ञों से सलाह मश्वराह ना किया गया हो। लेकिन यह भी सोचा जाना चाहिये कि कभी कभी हम ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हो जाते हैं। जहां से जिस तरफ भी जायेंगे कुछ कमियां भूल और गल्तियां बाद में पता चलती हैं। लेकिन यह ऐसा नाजुक समय होता है। जबकि सरकार और उसके मुखिया के सामने दो ही विकल्प होते हैं।

    उसको किसी एक तरफ जाकर निर्णय लेना होता है। इसमेें असफलता और दूसरा विकल्प चुनने पर पहले से भी अधिक नुकसान की आशंका सदा बनी रहती है। इस तरफ या उस तरफ कोई भी फैसला होने के बाद उसके बुरे नतीजे आने या नाकामी के बाद यह कहना बहुत आसान होता है कि दूसरा रास्ता अपनाया जाना चाहिये था। बहरहाल हमें यह भी सममझना चाहिये कि जिस तरह की जनता होती है। उसके नेता भी उसी तरह के होते हैं। जनता की जो प्रथमिकतायें होती हैं। सरकार भी उसी दिशा में काम करती नज़र आना चाहती है।

    अगर जनता भावुक और अति धार्मिक है तो सरकार भी स्कूल अस्पताल की बजाये मंदिर मस्जिद और विशाल मूर्तियां लगवाने में अधिक रूचि लेगी। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिये कि सरकार के पास जो सूचनायें उपलब्ध होती हैं। वह उसी की रोश्नी में कोरोना जैसे बड़े महामारी के संकट से निबटने के फैसले करती है। यह अलग बात है कि सरकार अगर वनमैन शो है। उसका मुखिया अपनी कैबिनेट या लॉक डाउन के प्रभाव के बारे में विपक्ष या अन्य एक्सपर्ट से चर्चा नहीें करता है तो यह एक संयोग नहीं बल्कि एक प्रयोग कहा जा सकता है।

   जहां तक जनता का सवाल है। कोरोना जैसे एतिहासिक अभूतपूर्व और भयावह संकट से दो दो हाथ करने के लिये बिना जनता के सहयोग के सरकार सफल नहीं हो सकती है। ऐसा देखने में आया है कि जनता का बड़ा वर्ग कोरोना की बजाये अपनी रोज़ी रोटी और भूख से अधिक डर गया है। यही वजह थी कि लॉक डाउन के फौरन बाद दो चार दिन लाखों गरीब मज़दूर और कमज़ोर वर्ग के लोग दिल्ली सहित बड़े शहरों की सड़कों पर अपने घर जाने के लिये निकल आये। वे सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही चलकर अपने घर पहुंचने को तत्पर थे।

    हालांकि सरकार ने उनको अपने स्तर पर सीमित ही सही संसाधन उपलब्ध कराकर उनके घर पहुंचाने की आंशिक व्यवस्था उपलब्ध कराने की नाकाम कोशिश की। लेकिन लॉक डाउन के दौरान जो सोशल डिस्टेंसिंग का मकसद था। वह इस महापलायन से एक तरह से अध्ूारा रह गया। इसी तरह दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के निज़ामुद्दीन मरकज़ में लॉक डाउन के कई दिन बाद तक भी जिस तरह से हज़ारों जमाती मौजूद थे। उनमें अच्छी खासी तादाद विदेशी जमातियों की भी थी। उनमें कोराना का संक्रमण फैल चुका था। उनमें से काफी बड़ी तादाद में जमाती लॉक डाउन होने से पहले बिना किसी चैक अप के अपने अपने घर भी जा चुके थे।

    जिससे यह ख़तरा और भी बढ़ गया कि उनके संपर्क में आने वाले ना जाने कितने लोगों को कोरोना का इनफैक्शन हुआ होगा। सरकार को समय रहते विदेशी जमातियों को भारत आने से रोकना चाहिये था। साथ ही मरकज़ के बिल्कुल बराबर वाले पुलिस थाने और खुफिया एजंसियों की भी जवाबदेही होनी चाहिये कि वे कहां सो रही थीं। जब जमाती अपने घर जाने को वाहन पास मांग रहे थे तो उनको समय पर पास क्यों नहीं दिये गये?

    सबसे बढ़कर यह कि जब 11 मार्च को वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन ने कोरोना को महामारी घोषित कर दिया और अरब का मुसलमानों का मक्का मदीना भी बंद हो गया तो मरकज़ 13 से15 मार्च को विश्व सम्मेलन क्यों करने पर अड़ा हुआ थालेकिन यह जमात वालों का अंधविश्वास नादानी और मूर्खता कह सकते हैं कि उनको कोरोना नहीं हो सकता। लेकिन यह कोई साज़िश नहीं थी। जैसा कि हमारे मीडिया के बड़े वर्ग ने दुष्प्रचार किया कि जमाती छिपेहुए थे जबकि मंदिर और गुरूद्वारे में लोग छिपे हुए नहीं बल्कि फंसे’ हुए थे।                                                 

0 ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथ,

   ऐसा ना हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ ।।