Tuesday, 11 June 2019

मोदी की जीत


मोदी में आस्था की जीत को समझो!

02019 के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। वोटों की गिनती से पहले देश में तीन वर्ग थे। एक वर्ग का दावा था आयेगा मोदी ही’ दूसरे वर्ग को लगता था इस बार मोदी किसी कीमत पर नहीं जीतेंगे। लेकिन निष्पक्ष और तटस्थ लोगांे का एक तीसरा वर्ग भी था जिसको लगता था। भाजपा अपने दम पर ना सही लेकिन सरकार एनडीए की ही बनेगी। इसके लिये चाहे नया घटक भी जोड़ना पड़े।      

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   2014 में जब पहली बार मोदी सरकार बनी थी। उसकी जीत को बड़े वर्ग ने हिंदुत्व और विकास से अधिक तत्कालीन यूपीए सरकार के करप्शन मनमानी अहंकार मुस्लिम तुष्टिकरण और असफलता का परिणाम बताया था। लेकिन इस बार पहले से भी अधिक सीटेें जीतकर जब मोदी फिर से सरकार बना रहे हैं तो इसको मोदी ब्रांड की ही एकमात्र जीत माना जा रहा है। हालांकि अभी भी इसमें हिंदुत्ववादी विकास और लोगों का मोदी में ज़बरदस्त विश्वास छिपा हुआ है।

हालांकि सबका साथ सबका विकास कालाधन वापसी हर साल दो करोड़ रोज़गार राम मंदिर निर्माण कश्मीर से धारा 370 हटाना प्रशासन से रिश्वतखोरी ख़त्म करना नोटबंदी जीएसटी आतंकवाद माओवाद स्मार्ट सिटी और समान नागरिक संहिता जैसे किसी मुद्दे पर भाजपा ने वोट नहीं मांगे। लेकिन उज्जवला योजना पीएम किसान योजना जनधन खाते हर घर मंे शौचालय मुद्रा योजना पीएम आवास योजना हर घर को बिजली पक्की सड़कें और आयुषमान भारत योजना का भी मोदी की प्रचंड जीत में सहयोग रहा है।

मोदी ने जिस तरह से पुलवामा में 40 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद होने पर पाकिस्तान के बालाकोट में सेना को एयर स्ट्राइक करने की छूट दी उससे उनकी छवि शक्तिशाली और साहसी पीएम की बनी। इसके अलावा राफेल घोटाले को लेकर बिना ठोस सबूत के उन पर विपक्ष ने ‘‘चौकीदार चोर है’’ का नारा देकर जो हमले किये उससे उनको सहानुभूति ही मिली। बाकी रही कसर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने एक बार फिर से मोदी को गाली दोहराकर पूरी कर दी। सवाल यह है कि घरेलू मोर्चे पर इतनी नाकामी के बाद भी मोदी को इतना प्रचंड जनादेश कैसे मिल गया?

कुछ लोग इसके लिये विपक्ष के नाकारापन और कांग्रेस के छोटे दलों के साथ गठबंधन न करने को बताते हैं। लेकिन बिहार महाराष्ट्र और कर्नाटक में जिस तरह से कांग्रेस गठबंधन ने मुंह की खाई। उससे साफ है कि जनता मोदी में अथाह आस्था रखती है। जो लोग यह सवाल पूछते हैं कि विपक्ष में मोदी का विकल्प कौन थाउनसे हम जवाबी सवाल पूछते हैं कि खुद भाजपा के पास मोदी का विकल्प कौन सा है?यहां तक कि वाजपेयी तक 2004 का चुनाव हार चुके हैं। इसके बाद लगातार दो बार यूपीए सरकार बनी और आडवाणी जैसे कट्टर हिंदूवादी नेता मोदी की तरह चुनाव जीतकर नहीं दिखा सके। 

कोई माने या ना माने लेकिन मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद अपनी जो कट्टर हिंदू समर्थक और मुस्लिम विरोधी छवि बनाई थी। आज भी कमोबेश उनको इस विवादित इमेज का चुनावी लाभ मिल रहा है। मोदी सरकार रहते भाजपा की सरकार वाले राज्यों में जिस तरह से मुसलमानों की मॉब लिंचिंग और गाय को लेकर एक सोची समझी राजनीति हुयी उससे हिंदू वोट मोदी के साथ जुड़ता गया। मोदी राज में मीडिया से लेकर चुनाव आयोग सीबीआई आरबीआई ईडी सतर्कता आयोग सुप्रीम कोर्ट आदि स्वायत्त संस्थाओं का खुलकर चुनावी लाभ के लिये इस्तेमाल किया गया ।

उस पर देश में उदार सेकुलर व निष्पक्ष लोगों ने हंगामा ज़रूर किया। लेकिन मोदी सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ। जानकारों को लगता था कि यूपी सबसे बड़ा राज्य है। यहां सपा बसपा और लोकदल के गठजोड़ से भाजपा चुनाव में भारी नुकसान उठायेगी। लेकिन इन सेकुलर दलों का कोर वोट बैंक यादव और जाट ही इनको छोड़कर बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ चला गया। हालांकि बसपा का दलित वोट बैंक भी कुछ हद तक भाजपा के साथ गया। लेकिन उसका बड़ा हिस्सा हाथी की पूंछ पकड़े रहा जिससे पिछली बार शून्य पर आउट होने वाली बसपा सपा के 5 से दोगुने यानी 10 सांसद जीतने में कामयाब रही।

रही कांग्रेस की बात उसके पीएम पद के दावेदार मुखिया राहुल गांधी खुद अपनी अमैठी सीट अब तक एक बार भी चुनाव न जीतने वाली भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी से हार गये। हालांकि केरल की अपनी दूसरी सीट वायनाड से राहुल गांधी रिकॉर्ड मतों से जीते। लेकिन यहां मोदी का यह आरोप सही साबित हो गया कि राहुल गांधी वहां मुस्लिम वोटों की वजह से जीत सके। राहुल हिंदुओं की बहुसंख्या वाली सीट से नहीं जीत सकते। इतना ही नहीं भाजपा के नेताओं ने राहुल को पारसी पिता और ईसाई मां से जोड़कर उनके जन्म से हिंदू न होने का ही अभियान छेड़ दिया।

राहुल चूंकि कभी मंत्री नहीं बने इसलिये भी उनको अनुभव ना होने की वजह से पीएम पद का सही हकदार नहीं माना गया। राहुल को सोशल मीडिया पर तो संघ परिवार ने पप्पू ही घोषित कर दिया था। मोदी ने उनके दिवंगत पिता दादी और नाना पर भी झूठे सच्चे ढेरों आरोप लगाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि अगर कांग्रेस फिर सत्ता में आती है तो देश के लिये बहुत खराब बात होगी। मोदी ने वंशवाद के नाते भी राहुल पर निशाना साधा। कांग्रेस की नाकामी और राहुल के पीएम पद के दावे को अगर गंभीरता से ना भी लिया जाये तो सवाल यह है कि फिर यूपी में सपा बसपा दिल्ली में आम आदमी पार्टी बिहार में राजद महाराष्ट्र में एनसीपी कर्नाटक में जेडीएस बंगाल में वामपंथी और ममता की टीएमसी तक भाजपा के सामने क्यों नहीं टिक पाई?

तो इसका जवाब यह है कि जो भी पार्टी मुसलमानों को साथ लेकर चलेगी भाजपा उसको हिंदू विरोधी देशविरोधी और पाकिस्तान व आतंकवाद की समर्थक बताकर हिंदुओं का बहुमत अपने साथ कर लेगी। कोई माने या ना माने मोदी की प्रचंड जीत से 25 साल से गुजरात मेें इसी मुस्लिम विरोध और हिंदूवाद के सहारे राज कर रही भाजपा को खुद उसकी सरकार की किसी भयंकर गल्ती आर्थिक संकट या असहनीय असफलता के बाद उपजने वाले जन आक्रोष से ही आगे सत्ता से हटाया जा सकेगा विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस के बस का यह काम अब नहीं रह गया है।                                                 

0 मेरे बच्चे तुम्हारे लफ़्ज़ को रोटी समझते हैं,

  ज़रा तक़रीर कर दीजे कि इनका पेट भर जाये।।                   

ईवीएम पर शक


गिनती के बाद ईवीएम पर फिर उठें सवाल ?

0ई वी एम यानी इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन जब से चुनावों में इस्तेमाल होनी शुरू हुयी है। तभी से विपक्ष में चाहे भाजपा रही हो या कांग्रेस सब दल उस पर सवाल उठाते रहे हैं। इस बार माहौल ऐसा बन गया है कि अगर भाजपा बहुमत नहीं लाती है तो सब चुप रहेंगे लेकिन अगर तमाम अनुमान व सर्वे के विपरीत मोदी अपने बल पर 300 से अधिक सीट जीत गये तो एक बार फिर ईवीएम पर हंगामा होना तय है।       

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   शरद पवार जो विपक्ष के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं। उन्होेंने यह कहकर अभी से ईवीएम को सवालों के घेरे मेें खड़ा कर दिया है कि उन्होंने अपना वोट जब अपनी पार्टी एनसीपी के घड़ी निशान पर पोल किया तो वह भाजपा के चुनाव चिन्ह यानी कमल के फूल पर जाकर पड़ा। इस से पहले बसपा की नेता मायावती सपा मुखिया अखिलेष यादव और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के साथ ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित विपक्ष के अनेक दलों के नेता ईवीएम की विश्वसनीयता पर उंगलियां उठा चुके हैं। असम के पूर्व डीजीपी तक ने ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया।

2009 में भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा भी ईवीएम के खिलाफ मोर्चा खाले चुके हैं। उन्होंने ईवीएम के खिलाफ एक पुस्तक भी लिखी थी। यह भी इतिहास है कि भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी ईवीएम से चुनाव न कराने की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट गये थे। 8 अक्तूबर2013 को सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम में वीवीपेट लगाने के आदेश दिये थे। साथ ही यह भी कहा था कि 2019 के आम चुनाव में हर ईवीएम में वीवीपेट लगा होना चाहिये। अजीब बात यह है कि मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को 2017तक 3173 करोड़ रू0 वीवीपेट खरीदने को नहीं दिये।

जब आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश अमल में लाने को पीएमओ को 11 रिमाइंडर भेजे और कोर्ट की अवमानना का भय दिखाया तब जाकर भाजपा सरकार ने इसके लिये धन आवंटित किया। जो काम आयोग को 30 महीने में पूरा करना था। पैसा देर से मिलने की वजह से वह उसको 18 महीने में आनन फानन में करना पड़ा। इसके बाद वीवीपेट से मिलान के लिये हाईकोर्ट का आदेश लाने की शर्त आयोग ने लगा दी। जिससे वीवीपेट एक तमाशा बनकर रह गया। एक साल पहले कांग्रेस मुखिया सोनिया गांधी के नेतृत्व में 9 दलों के नेता ईवीएम के मुद्दे पर राष्ट्रपति से मिले थे।

जब प्रेसीडेंट ने उनकी बात अनसुनी कर दी तो विपक्ष के 21 नेता इस मामले को सुप्रीम कोर्ट भी ले जा चुके हैं। वहां उनकी मांग थी कि ईवीएम में लगी वीवीपेट मशीन की कम से कम50 प्रतिशम पर्चियोें का मिलान ईवीएम के वोटों से किया जाये। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग का ज़बरदस्त विरोध किया। उसका कहना था कि ऐसा करने में चुनाव नतीजे आने में 6 दिन लग जायेेंगे। आयोग का यह भी दावा था कि वीवीपेट की आधी पर्चिायों को गिनने के लिये बहुत अधिक मैनुअल पॉवर की ज़रूरत होगी। हालांकि चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिये था कि पहले जब चुनाव बैलेट पेपर से हुआ करते थे।

तब तो सारी पर्चियां गिनने में 24 से 48 घंटे ही लगते थेतो अब आधी पर्चियां गिनने में एक सप्ताह कैसे लग सकता हैइसके साथ ही यह जवाब भी एक तरह से बहाना ही है कि इतना स्टाफ कहां से आयेगासवाल यह है कि इससे दो गुना स्टाफ पहले कहां से आता थाविपक्ष का यह सवाल बिल्कुल सही था कि फिर वीवीपेट लगाने का क्या फायदा हुआइस पर आयोग ने बताया कि वह एक विधान सभा क्षेत्र के एक बूथ की गिनती का मिलान वीवीपेट से कराता है। इस पर सबसे बड़ी अदालत ने आयोग को कम से कम 5 बूथ की गिनती का मिलान वीवीपेट से करने का आदेश दिया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की पुनर्विचार याचिका पर कम से कम 25 प्रतिशत ईवीएम के मतों का मिलान वीवीपेट से करने की मांग को ठुकरा दिया है। इससे हमारे चुनाव की निष्पक्षता लोकतंत्र और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठना तय है। ऐसा नहीं है कि शरद पवार ईवीएम पर सवाल उठाने वाले पहले नेता हों। इससे पहले 2018 मेें कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेस नेता ब्रिजेश कलप्पा ने राज्य विधानसभा के चुनाव में चुनाव आयोग को शिकायत की थी कि उन्होंने वोट देने के लिये बटन तो कांग्रेस का सामने वाला दबाया था लेकिन वोट भाजपा के खाते में गया है।

इसके बाद आयोग ने ईवीएम बदल दी थी। लेकिन साथ ही आयोग ने पलटकर यह भी दावा किया कि यह आरोप आयोग की छवि खराब करने की साज़िश है। यूपी के स्थानीय निकाय चुनाव में नवंबर 2017 में मेरठ के वार्ड नं0 89 में ईवीएम में भी यह शिकायत मिली थी कि बटन चाहे कोई सा भी दबाया जाये। लेकिन वोट हर बार कमल के फूल पर ही जा रहा था। इस पर जब हंगामा मचा तो आयोग ने माना कि मशीन में गड़बड़ी है। इसके बाद ईवीएम बदल दी गयी। ठीक ऐसी ही शिकायत कानपुर से भी आई। वहां भी चुनाव आयोग ईवीएम बदलकर चुनाव करा सका।

ऐसे ही गुजरात विधानसभा के 2017 के चुनाव में राजकोट विधनसभा के द्वारका के बूथ नं0 168 पर पंजे पर डाला गया वोट फूल को जा रहा था। सबसे बड़ा विवाद मध्य प्रदेश के भिंड में अपै्रल 2017 में उस समय सामने आया। जब चुनाव शुरू होने से पहले वहां की डीएम और निर्वाचन अधिकारी सलीना सिंह के सामने ईवीएम का डेमो यानी मॉक वोटिंग शुरू हुयी तो सभी यह देखकर हैरत में पड़ गये कि वोट चाहे आप किसी को डालें लेकिन वे सभी वोट भाजपा के खाते में जा रहे थे। इस पर बजाये मशीन बदलवाने के वहां की ज़िला अधिकारी ने पत्रकारों को धमकी दी कि अगर वे इस ख़बर को सार्वजनिक करेंगे तो सबको जेल भेजा जायेगा।

इस गड़बड़ी का वीडियो थोड़ी देर बाद ही वायरल होने से चुनाव आयोग हरकत में आया और उसने उस ईवीएम को ख़रबा बताकर दूसरी ईवीएम उपलब्ध करा दी। हालांकि हमारी अब तक की जानकारी के अनुसार सारी ईवीएम को हैक करके गड़बड़ी करना लगभग नामुमकिन है। लेकिन साथ साथ विपक्ष का यह सवाल आज तक लाजवाब है कि ईवीएम में यह कैसी तकनीकी मानवीय या यांत्रिक गड़बड़ी आती है। जिससे हर बार वोट किसी को भी पोल करो लेकिन वो भाजपा को ही जाता है?उनका यह शक वाजिब है कि ऐसा क्यों नहीं होता कि वोट कमल के फूल पर डाला जाये और वह पंजे साइकिल या हाथी यानी किसी विपक्षी दल के खाते मंे चला जाये?                                             

0 छोड़ तो सकता हूं मगर छोड़ नहीं पाता उसे,

  वो शख़्स मेरी बिगड़ी हुयी आदत की तरह है।।                   

Saturday, 18 May 2019

क्षेत्रीय दल किंगमेकर

23 मई: क्षेत्रीय दल बनेंगे किंगमेकर ?

01984 के तीन दशक बाद 2014 में किसी दल को संसद में अपने बल पर पूर्ण बहुमत मिला था। एक तरह से यह बहुमत भाजपा को न मिलकर मोदी को मिला था। वजह यह थी कि जनता को एमपी न चुनकर सीध्ेा पीएम के तौर पर मोदी को चुनने का एक नया प्रयोग संघ परिवार ने किया था। हालांकि यह संसदीय चुनाव की भावना के खिलाफ़ एक तरह से पीएम को सीधे राष्ट्रपति चुनने जैसा था। इसका परिणाम आज हमारे सामने है।        

         

   देश में चल रहे चुनाव के 7 में से 6 चरण निबट चुके हैं। यानी 543 में से 484 सीटों पर चुनाव हो चुका है। अभी तक के जो रूजहान सामने आये हैं। उनसे यह तो पक्का नहीं कहा जा सकता कि किसकी सरकार केंद्र में बनेगी?लेकिन चुनावी विश्लेषक यह ज़रूर मानकर चल रहे हैं कि इस बार जो भी सरकार बनेगी वह गठबंधन सरकार होगी। इसका मतलब यह भी माना जा सकता है कि लंबे समय से केंद्र सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा रहे क्षेत्रीय दल एक बार फिर से 2019 के चुनाव में मज़बूत होकर उभरने जा रहे हैं।

    मिसाल के तौर पर देश के सबसे बड़े राज्य यूपी मेें सपा बसपा और लोकदल का महागठबंधन सत्ताधरी भाजपा का दिल्ली का रास्ता रोकने में कामयाब होता नज़र आ रहा है। पिछले चुनाव में यहां कुल 80 सीटों में से भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल ने 73सीटें जीत ली थीं। लेकिन इस बार भाजपा पहले से आधी सीटें भी जीत ले तो उसके लिये बड़ी उपलब्धि होगी। ऐसे ही 48 सीट वाले महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना को विरोधी कांग्रेस व एनसीपी के गठबंधन से तगड़ी चुनौती मिल रही हैै। इतना ही नहीं वहां पूरे 5 साल भाजपा को कोसकर फिर उसके साथ चुनाव लड़ने वाली शिवसेना को चुनाव में भारी नुकसान की ख़बरें आ रही है।

    शायद इतना ही काफी नहीं था जिससे मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भाजपा गठबंधन के खिलाफ जोरदार मोर्चा खोल दिया है। एटीएस प्रमुख रहे करकरे के खिलाफ भाजपा प्रत्याशी आतंक आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के घटिया बयान से भी मराठी मानुष भारी गुस्से में बताया जाता है। उधर गुजरात और राजस्थान जहां पिछले चुनाव में भाजपा ने मोदी के नाम पर सभी लोकसभा सीटें जीत लीं थीं। इस बार सीन बिल्कुल बदला हुआ है। मोदी के घर यानी गुजरात में 2017 के चुनाव में जब कांग्रेस ने भाजपा को 150 के लक्ष्य की बजाये 99 के फेर में फंसाया था।

    यह बात तभी साफ हो गयी थी कि भविष्य में लोकसभा चुनाव मेें भी कांग्रेस भाजपा से ज़ीरो पर आउट नहीं होगी। ऐसे ही राजस्थान में अब कांग्रेस की सरकार है। इससे यह तय है कि परिणाम चाहे जो हो कांग्रेस वहां भाजपा से कुछ एमपी ज़रूर छीन लेगी। इसके साथ ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की 6माह पहले सरकारें बनी हैं। वहां भी भाजपा को वह एकतरफा वाकऑवर नहीं देगी। कर्नाटक में जेडीएस कांग्रेस का गठबंधन बन गया है। दिल्ली में सभी सातों सीटें जीतने वाली भाजपा से आप और कांग्रेस दो या तीन सीट झटक ही लेंगी।

    अब सवाल यह है कि अगर सभी राज्यों में भाजपा घटेगी तो वह बढ़ेगी कहांमोदी और अमित शाह का दावा है कि वे बंगाल व उड़ीसा में भारी संख्या में सीटें जीतने जा रहे हैं। लेकिन जानकार बताते हैं कि न तो उन दोनों राज्यों में ममता बनर्जी और नवीन पटनायक की पकड़ कमज़ोर हुयी है और न ही भाजपा इतनी मज़बूत हो सकी है कि वह सीध्ेा दो डिजिट में एमपी जिता सके। अलबत्ता यह तय है कि दोनों राज्यों में भाजपा का मत प्रतिशत तेज़ी से बढ़ रहा है। वह इस बार भी काफी बढ़ेगा। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसा होने से वहां के क्षेत्रीय दलों को कोई भारी नुकसान होगा।

     बल्कि इसका मतलब यह है कि वहां पहले से विपक्ष में मौजूद कांग्रेस और वामपंथी पिछले चुनाव से और कमज़ोर होंगे। इनका वोट भाजपा की तरफ जा रहा है। उधर दक्षिण के एकमात्र अपने प्रभाव वाले राज्य कर्नाटक में कमज़ोर पड़ने के बाद भाजपा ने तमिलनाडू और केरल में पांव जमाने की जीतोड़ कोशिश की है। लेेकिन वहां उसने जिस एआईडीएमके से गठबंधन किया था। जयललिता की मृत्यु के बाद वह पूरी तरह बिखर गया है। इससे भाजपा को न तो खुद और न ही उसके इस नये घटक को बड़ी संख्या में सीट मिलने जा रही है।

    कुल मिलाकर नतीजा यह लग रहा है कि एक बार फिर 2004 के फीलगुड नारे की नाकामी की तरह भाजपा पिछड़कर 200 सीट तक सिमट सकती है। साथ ही कांग्रेस 120सीट तक पहुंच सकती है। एनडीए और यूपीए के घटक भी मिलकर 272 का आंकड़ा हासिल नहीं कर पायेंगे। इन हालात को मोदी ने अभी से भांप लिया है। इसलिये वह अपने दोनों विकल्प खुले रखने वाले बीजू जनता दल के नवीन पटनायक की खुलकर तारीफो के पुल बांध रहे हैं। साथ ही वे बसपा की मायावती को भी सपा और कांग्रेस की चालों से सावधान करके अपने लिये कम पड़ने पर बहुमत जुगाड़ने की चाल चल रहे हैं।

    उनकी नज़र लगभग 20 सीट जीतकर आने की चर्चा वाले आंध््रा के वाइएसआर कांग्रेस के जगन रेड्डी पर भी लगी है। लेकिन चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा बनाने की बात करे रहे तेलंगाना के चंद्रशेखर राव ने खुद को डिप्टी पीएम बनाने की शर्त पर कांग्रेस को ही ज़रूरत पड़ने पर समर्थन का ऐलान करके इशारा दे दिया है कि वह मोदी को फिर से पीएम बनता नहीं देखना चाहते हैं। उधर मायावती शरद पवार और ममता बनर्जी की नज़र भी देश के सबसे बड़े पद पर गड़ी हुयी है। भाजपा महासचिव राममाधव और शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने भी यह मान लिया है कि मोदी को पीएम बनने के लिये गठबंधन के घटकों की ज़रूरत पड़ सकती है।

    इसका मतलब इतना तय है कि मोदीराहुल या तीसरा मोर्चा चाहे जो सरकार बनाये किंगमेकर क्षेत्रीय दल ही बनने जा रहे हैं।                                                

0 लहजे के बाद अब वो बदलता निगाह भी,

  रस्ता बदलके हमने उसे हैरान कर दिया ।।

Sunday, 5 May 2019

चुनाव आयोग

चुनाव आयोग भाजपा का मतदान प्रकोष्ठ ?

0आजकल सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग पर एक जोक वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयोग ने भाजपा में शामिल होने से साफ़ इन्कार कर दिया है। लेकिन साथ ही चुनाव आयोग ने भाजपा को यह विश्वास भी दिलाया है कि वह बाहर रहकर उसको समर्थन देता रहेगा। यह चुनाव आयोग के पक्षपात की बानगी मात्र है।       

       

   देश आज़ाद होने के बाद शायद ऐसा पहली बार हो रहा है। जब हमारी स्वायत्त संस्थायें जैसे चुनाव आयोग सीबीआई आरबीआई ईडी एनआईए सूचना आयोग सतर्कता आयोग और मानव अधिकार आयोग राष्ट्रीय सांख्यकी संगठन और सीएजी आदि अपनी निष्पक्षता को लेकर सवालों के घेरे में हैं। आजकल चूंकि देश में चुनाव चल रहे हैं तो इनमें चुनाव आयोग का नाम सबसे अधिक चर्चा में है। हालत इतनी ख़राब है कि लोकतंत्र का तीसरा सबसे मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका तक अपनी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भता को लेकर चिंतित नज़र आती हैै।

       एक समय था। जब देश के चुनाव आयुक्त टी एन शेषन हुआ करते थे। वे मज़ाक में कहते थे कि वह नाश्ते में नेताओं को खाते हैं। यह बात किसी हद तक सच भी है कि उन्होंने इसी चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त रहते हुए बेलगाम और अहंकारी नेताओं को संविधान के दायरे में उनकी सीमा दिखा दी थीं। साथ ही नियम कानून न मानने वाले कई नेताओं का सियासी दिवाला भी शेषन ने निडरता से निकाल कर उनमेें एक भय पैदा कर दिया था। आज हालत यह है कि चुनाव आयोग अव्वल तो किसी नेता के खिलाफ चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर मुंह खोलने से ही डरता है।

      जब उसकी अपराधिक चुप्पी पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहंुच गया तो उसने यह कहकर अपने हाथ खड़े कर दिये कि वह एक दंतहीन संस्था है। लेकिन जब सबसे बड़ी अदालत ने उसको लताड़ लगाई तो वह कुछ ज़बानज़ोर नेताओं पर कुछ घंटों की चुनाव प्रचार पर रोक लगाने को मजबूर हुआ। इसके बाद भी आयोग विपक्षी नेताओं पर तो कुछ सख़्ती करता नज़र आया। लेकिन सत्ताधारी दल के नेताओं को विपक्ष वाली गल्ती दोहराने पर नज़रअंदाज़ करने का विपक्ष का आरोप झेलने को मजबूर हुआ। यानी रूलिंग पार्टी के प्रति वह नरम बना रहा।

     इतना ही नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त पीएम मोदी को तो शायद कानून से उूपर मानकर चल रहे हैं। उनको लगता है कि मोदी ने ही उनको बिना योग्यता वरिष्ठता और डिज़र्व किये इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन किया है। वह खुद को अपनी निष्पक्षता की शपथ और संविधान के हिसाब न चलाकर मोदीभक्ति के अनुसार बेशर्मी की सभी सीमायें लांघ चुके हैं। खुद चुनाव आयोग ने चुनाव शुरू होने से पहले सभी दलों के नेताओं को सेना की उपलब्ध्यिों का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में न करने को कहा था। मोदी ने सबसे पहले इस निर्देश को ठेंगा दिखाया।

    इसकी शिकायत हुयी। लेकिन पहले तो चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। इसके बाद हंगामा होने पर महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयुक्त से जांच को कहा। जांच में स्थानीय अधिकारियों ने प्रथम दृष्टया पीएम को दोषी पाया। लेकिन चुनाव आयोग ने फिर भी आज तक कोई एक्शन नहीं लिया। इसके बाद पीएम के बारे में शिकायत आयोग की वेबसाइट से हटा दी गयी। इसके बाद मोदी का विमान एक चुनाव ऑब्ज़र्वर ने उनके विमान से एक रहस्मयी काला बॉक्स उतारे जाने पर चैक कर लिया। इसको मोदी ने अपनी नाक का सवाल बना लिया।

     आयोग ने मोदी के दबाव में ईमानदार और निडर ऑब्ज़र्वर को इनाम की बजाये सज़ा देकर सस्पैंड कर दिया। इतना ही नहीं मोदी बार बार साम्प्रदायिकता हिंदू मुस्लिम और सेना का नाम लेकर आचार संहिता की धज्जियां खुलेआम उड़ाते रहे। लेकिन चुनाव आयोग की हिम्मत ही नहीं हुयी कि उनसे जवाब तलब कर सके। मोदी के साथ भाजपा मुखिया अमित शाह और उनके कई मंत्री व बड़े नेता भी एक के बाद एक चुनाव आचार संहिता का मज़ाक उड़ाते रहे। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहंुचने के बाद भी चुनाव आयोग ने शिकायत होने के 25 दिन बाद तक भी आयोग की बैठक तक नहीं की।

     जब सर्वाेच्च न्यायालय ने आयोग को खुद कार्यवाही करने की चेतावनी देकर कहा कि वह बताये कि उसने इन शिकायतों पर क्या कार्यवही कीतब भी आयोग ने निर्लजता से यह कह दिया कि मोदी और शाह ने आचार संहिता का कोई उल्लंघन नहीं किया है। इसके खिलाफ मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। हो सकता है उचित पाये जाने पर कोर्ट आरोपी नेताओं के खिलाफ चुनाव आयोग को ही कदम उठाने पर मजबूर कर सके।

     लेकिन एक बात साफ हो गयी है कि2014 में मोदी को एमपी की बजाये पीएम के रूप में चुनने को मजबूर कर संघ परिवार ने जनता को लोकतंत्र संविधान और निष्पक्षता को दरकिनार कर व्यक्तिवादी तानाशाही का रास्ता खोल दिया था। उसी भूल का नतीजा है कि आज न कैबिनेट की कोई पॉवर है और न ही चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की इतनी हिम्मत है कि वह सारी दुनिया में थू थू होने पर भी पीएम मोदी को कानून का आईना दिखा सके। भविष्य में चुनाव आयुक्त के चयन के लिये पीएमनेता विपक्ष और चीफ जस्टिस की एक कमैटी बनाई जानी चाहिये। इसके साथ ही सभी दल इस बात पर भी सामूहिक रूप से विचार करें कि चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के सभी निर्णयों की समीक्षा अवलोकन और अनुमोदन सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य कर दिया जाये।                                                

0 हवा के दोश के पे रक्खे हुए चिराग़ हैं हम,

  जो बुझ गये तो हवाओं से शिकायत कैसी ।।