Friday, 27 July 2018

पुलिस इंस्पेक्टर हो तो ऐसा...

0आज पुलिस की बेईमानी और करप्शन को लेकर अकसर खिंचाई होती है। लेकिन जब कोई पुलिस कर्मचारी या अधिकारी अच्छा काम करता है तो हम सब चुप्पी साध लेते हैं। मेरठ के एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने खिलाफ ही थाने में शिकायत दर्ज करके एक अभूतपूर्व और अनुकरणीय मिसाल पेश की है।

यूपी के मेरठ ज़िले में खरखौदा एक थाना है। इस थाने के इंचार्ज राजेंद्र त्यागी हैं। वैसे तो देखने में त्यागी एक आम पुलिस अफसर ही नज़र आते हैं। लेकिन उन्होंने एक काम ऐसा किया है कि उससे उनकी पहचान मेरठ ही नहीं शायद पूरे राज्य में एक ज़िम्मेदार और ईमानदार अधिकारी की बन गयी है। जब वे मेरठ के खरखौदा थाने में प्रभारी के तौर पर तैनात हुए थे। उससे पहले वहां कानून व्यवस्था की हालत बहुत ख़स्ता हो चुकी थी। दरअसल राजेंद्र त्यागी की छवि एक तेज़ तर्रार और समर्पित पुलिस इंस्पेक्टर की मानी जाती है।
उन्होंने खरखौदा थाने का चार्ज लेने के फौरन बाद अपनी इस बेशकीमती छवि को सुरक्षित बनाये रखने के लिये कुछ सख़्त और ज़रूरी फैसले लिये। त्यागी ने तय किया कि अगर उनके थाना क्षेत्र में कहीं भी लूट की घटना होती है तो इसके लिये उस इलाके का बीट कांस्टेबिल हल्का इंचार्ज और चौकी प्रभारी ज़िम्मेदार होंगे। इसके साथ ही संवेदनशील मामले जैसे हत्या बलात्कार या गोहत्या के लिये लूट की तरह उपरोक्त तीन लोगों के साथ ही इंस्पेक्टर खुद भी ज़िम्मेदार होंगे। इस फैसले से ही त्यागी की नेकनीयती और दृढ़ निश्चय का पता चलता है।
अकसर होता यह है कि ऐसे मामलों में बाद में कोई तवज्जो नहीं दी जाती। जिस समय कोई नया अफसर चार्ज लेता है। वह बड़ी बड़ी बातें और लंबे चौड़े दावे करता है। बाद में उस इलाके की जनता जनप्रतिनिधि और मीडिया तक उस अधिकारी से जवाब तलब नहीं करता कि आपने अमुख अमुख वादे और दावे किये थे। ऐसा शायद इसलिये भी होता है कि खुद जनता की तो हिम्मत नहीं होती कि वह किसी थाने के सबसे बड़े अधिकारी से जवाब तलब कर सके। इसके साथ ही इलाके के ग्रामप्रधान चेयरमैन विधायक सांसद विपक्षी नेता और मंत्री तक उस अफसर से इतने सही और गलत काम कराने लगते हैं कि उससे उसके वादों के बारे में सवाल करने का उनका मंुह ही नहीं रहता।
एक सबसे बड़ी वजह यह भी होती होगी कि खुद आज के नेता इतने झूठे और बेबुनियाद वादे करके सत्ता में आते हैं कि वे अपने वादे ही सरकार बनने के बाद भूल जाते हैं। ज़ाहिर है कि ऐसे में वे किसी अफ़सर से उसके वादों के बारे में कैसे पूछ सकते हैं? लेकिन खरखौदा में खुद इंस्पेक्टर त्यागी ने यह दावा याद रखा कि उन्होंने अपनी तैनाती के समय क्या क्या तय किया था। कुछ ही माह में जब लूट की घटनायें हुयीं तो बीट कांस्टेबिल से लेकर चौकी प्रभारी का तस्करा जीडी में दर्ज किया जाने लगा।
हालांकि खरखौदा का पुलिस स्टाफ दबी ज़बान से यह चर्चा करता रहता होगा कि खुद इंस्पेक्टर की गर्दन जब किसी संगीन अपराध में फंसेगी तो उस दिन देखेंगे कि वह अपनी घोषणाओं पर कितना खरा उतरते हैं? अचानक गोहत्या और गो तस्करी का एक बड़ा मामला सामने आया तो इंस्पेक्टर त्यागी ने अपने तीनों मतहत के साथ ही अपने खिलाफ भी जीडी में तस्करा डाल दिया कि उनकी लापरवाही से इलाके में यह संवेदनशील घटना घटी। साथ ही उन्होंने मुखबिर से सूचना पर इस तरह के गंभीर अपराधों में कई को जेल भी भेजा है। सच तो यह है कि आज ऐसे ही अफसर चाहिये।
0 दूसरों पर जब तब्सिरा किया कीजिये,
आईना सामने रख लिया कीजिये ।।

एक पार्टी हो भारतीयों की....

0पीएम मोदी ने दावा किया है कि कांग्रेस नेता ने कहा है कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है। उधर कांग्रेस पार्टी ने मोदी के बयान को अफ़वाह बताया है। उधर विपक्ष भाजपा पर हिंदू कट्टर पंथियों की सियासत का आरोप लगाता रहा है। हैरत और अफ़सोस की बात है कि मानव विकास और उपलब्धियों की बजाये धर्म के नाम पर देश में सत्ताधारी दल और मुख्य विपक्षी दल में इस स्तर की घटिया सियासत जारी है।

लंबे समय से देश में संघ परिवार एक सुनियोजित दुष्प्रचार करता चला आ रहा है कि भाजपा हिंदुओं और बाकी विपक्षी दल मुसलमानों के हमदर्द हैं। वैसे तो आजकल चंद मीडिया समूह को छोड़कर लगभग सभी अख़बार और चैनल भगवा रंग से सराबोर हैं। लेकिन भाजपा का एक प्रबल समर्थक और देश का सबसे अधिक प्रसार वाला हिंदी दैनिक अख़बार समूह होने का दावा करने वाले मीडिया हाउस ने कुछ समय पहले मुुंबई के एक विख्यात उर्दू दैनिक को ख़रीदा था। उसी उर्दू दैनिक ने एक झूठा समाचार कांग्रेस के मुस्लिम विद्वानों के सम्मेलन को लेकर राहुल गांधी के नाम से यह छापा कि हां कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है।
कमाल की बात यह है कि जो आरोप खुद संघ परिवार कांग्रेस और दूसरे सेकुलर विपक्षी दलों पर लगाता रहा है कि भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक दल मुसलमानों के ही दल हैं क्योंकि वे उनका तुष्टिकरण करते हैं। उसको खुद कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी कैसे स्वीकार कर सकते हैं? लेकिन देश में झूठ की सियासत और फेक न्यूज़ का खेल इतने बड़े पैमाने पर चल रहा है कि पहले एक झूठा बयान संघ परिवार का समर्थक एक उर्दू अख़बार कांग्रेस नेता के नाम से छापता है। इसके बाद पीएम मोदी उस फर्जी बयान को आधार बनाकर कांग्रेस पर सियासी हमला करते हैं।
इसके बाद इस सारे सियासी खेल को समझकर कांग्रेस उस झूठे बयान का खंडन करती है। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। यह किसी को नहीं पता चलता कि राहुल गांधी ने ऐसा कोई बयान दिया ही नहीं। पीएम मोदी का कांग्रेस पर आरोप कांग्रेस को चुनाव से पहले ही चित कर देता है। यह मात्र एक फेेक न्यूज का मामूली मामला ही नहीं है बल्कि आने वाले आम चुनाव की एक बानगी भी है कि भाजपा और संघ परिवार किस तरह से सबका साथ सबका विकास सहित कई लुभावने झूठे वादे करके 2014 में सत्ता में आये और कैैसे उनके पास अब फिर से चुनाव जीतने को कोई ठोस उपलब्धि विकास या प्रगति का आंकड़ा मौजूद न होने से वे झूठे दावे फर्जी बयान और फेेक न्यूज़ के द्वारा 2019 का चुनाव जीतने को भावनात्मक साम्प्रदायिक और बनावटी मुद्दों की तलाश में हैं।
यह सबको पता है कि सोशल मीडिया पर संघ परिवार की लगभग दस लाख लोगांे की एक ट्रॉल आर्मी हर समय मुसलमानों दलितों और निष्पक्ष हिंदुओं के खिलाफ़ ज़हर उगलने का अभियान चला रही है। उन्होंने लोगों के दिमाग में मुसलमानों को लेकर इतनी घृणा और भय भर दिया है कि अगर आज किसी बेकसूर और मासूम मुसलमान को गोमांस और गोहत्या के झूठे आरोप में भीड़ पीट पीटकर मार डालती है तो उसको कट्टर हिदंुओं द्वारा गलत नहीं माना जाता। यहां तक कि मुसलमानों के साथ किसी भी तरह की नाइंसाफ़ी जुल्म और अत्याचार देशभक्ति और राष्ट्रवाद की एकमात्र पहचान बना दी गयी है।
इसी श्रृंखला में भाजपा के कुछ मंत्री जनप्रतिनिधि और संघ परिवार के नेता मुसलमानों के साथ पक्षपात अपराध और बलात्कार तक करने वाले आरोपियों के साथ खुलकर खड़े होने लगे हैं। उन्होंने सियासत को एक तरह से धर्मयुध््द में बदल दिया है। हालांकि उनकी सांप्रदायिक और मुस्लिम विरोधी नीतियों से देश व हिंदुओं का केाई भला तो दूर उल्टा उनका ही अधिक नुकसान हो रहा है। ऐसे ही कांग्रेस सहित सेकुलर दलों की मूर्खता और वोटबैंक की सियासत से मुसलमानों का भी कोई भला नहीं हुआ है। इसके विपरीत मुसलमानों के कट्टरपंथियों की नाजायज़ मांगों के सामने कांग्रेस ने झुककर भाजपा की सियासत को मज़बूत ही किया है।
अगर आज भाजपा की केंद्र और 29 में से 20 राज्यों में अपनी या गठबंधन की सरकारों के आने का कारण खोजा जाये तो साफ पता लगता है कि कांग्रेस और भाजपा में नूरा कुश्ती चल रही है। भाजपा को 2 लोकसभा सीटों से 282 पर पहंुचाने वाले बाबरी मस्जिद रामजन्म भूमि विवाद में कांग्रेस की भूमिका मूर्ति रखे जाने से लेकर विवादित स्थल का ताला खुलवाने और वहां राम मंदिर का शिलान्यास कराने से लेकर संघ परिवार को पर्दे के पीछे पालने पोसने तक में संदिग्ध नहीं मुस्लिम और धर्मनिर्पेक्षता विरोधी रही है।
ऐसे ही शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने से लेकर सलमान रूश्दी की सैटेनिक वर्सेज़ विवादित किताब पर दुनिया में सबसे पहले रोक लगाकर कांग्रेस ने मुस्लिम कट्टरता और हिंदू कट्टरता को एक साथ पनपने और फलने फूलने का मौका दिया है। 2014 की शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस ने हार के कारणोें को जानने के लिये वरिष्ठ नेता ए के एंटोनी के नेतृत्व में एक जांच कमैटी बनाई थी। एंटोनी ने बड़ी मेहनत से इस मुद्दे की गहन जांच कर यह निष्कर्ष निकाला कि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी और मुस्लिम समर्थक दल की बन चुकी है।
हालांकि यह मात्र धरणा ही है। लेकिन राजनीति मंे सच से अधिक धरणा काम करती है। कांग्रेस ने अपने माथे पर लगे मुस्लिम समर्थक और हिंदू विरोधी होने के कलंक को धोने को आज तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है। राहुल गांधी ने गुजरात के चुनाव में मात्र इतना किया कि वे कई मंदिरों में पूजा पाठ करने गये। उस दौरान कांग्रेस प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि राहुल गांधी बाकायदा जनेउूधारी पक्के सच्चे हिंदू हैं।
यह एक तरह से भाजपा के जाल में फंसने वाली बात थी। कांग्रेस ने कभी सच्चर कमैटी की रपट के आधार पर हिंदुओं को यह बताने को कोई सघन अभियान नहीं चलाया कि मुसलमानों की हालत तो कांग्रेस के राज में दलितों से भी ख़राब हो चुकी है। कांग्रेस ने बजाये दोनों वर्गों की साम्प्रदायिक और कट्टर शक्तियों के सामने झुकने से मना कर खुद को सब वर्गों की पार्टी साबित करने के इन आरोपों पर सदा चुप्पी साधकर नरम हिंदुत्व का आत्मघाती रास्ता अपनाने की भूल जारी रखी। ज़ाहिर है नरम हिंदुत्व के मुकाबले हमेशा कट्टर हिंदुत्व की ही जीत होती है। यह सबको पता है कि कट्टर हिंदुत्व की सियासत देश में कौन कर रहा है। हमें लगता है कि कांग्रेस उसके प्रवक्ता और राहुल गांधी भाजपा के द्वारा उसके खिलाफ चलाये मुस्लिम हमदर्द और हिंदू विरोधी अभियान में जाने अनजाने और गहरे फंसते जा रहे हैं।
0 मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम,
तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादान है ।।

Saturday, 7 July 2018

सुषमा ट्रोलिंग

सुषमा ट्रोलिंगः बोया पेड़ बबूल का तो....

सुषमा स्वराज न केवल बीजेपी की वरिष्ठ नेता हैं बल्कि विदेश मंत्री भी हैं। वह काफी सुलझी हुई नेता मानी जाती हैं। उनका सम्मान विपक्षी नेता भी करते रहे हैं, लेकिन जब उनको अंतरधार्मिक विवाह करने वाले एक जोड़े के पासपोर्ट बनवाने को लेकर हिंदूवादी उग्रवादियों ने ट्रोल किया तो पीएम मोदी सहित लगभग पूरा संघ परिवार चुप्पी साध गया।
बीजेपी में जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि आडवाणी के मुकाबले काफी उदार मानी जाती थी, उसी तरह से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की इमेज भी कभी कट्टर नहीं मानी गई। हालांकि सुषमा भी आरएसएस और बीजेपी के अजेंडे को लागू करने में कभी पीछे नहीं रही, लेकिन यह अपना-अपना स्वभाव और संस्कार होता है कि कौन किस सीमा तक जाकर अपना मिशन पूरा करता है। कई बार ऐसे मौके आए जब सुषमा स्वराज ने पार्टी लाइन से इतर जाकर मानवता के आधार पर अपने मंत्रालय के द्वारा कुछ परेशान और बीमार पाकिस्तानियों तक की सहायता की।
ऐसे ही देश में जब कभी इंसानियत का सवाल आया तो सुषमा ने हिंदू-मुस्लिम का अकसर भेद नहीं किया। पिछले दिनों लखनऊ में एक ऐसा जोड़ा अपना पासपोर्ट बनवाने वहां के पासपोर्ट ऑफिस में पहुंचा, जिसने हाल ही में अंतर-धार्मिक विवाह किया था। वहां मौजूद एक अधिकारी विकास मिश्रा ने संघ परिवार की नज़र में अपने नंबर बढ़ाने की नीयत से इस जोड़े के पासपोर्ट पर यह कहकर अब्जेक्शनलगा दिया कि वे हिंदू मुस्लिम होकर पति पत्नी कैसे हो सकते हैं? मिश्रा जी ने तनवी सेठ के पति अनस सिद्दीकी को हिंदू बनने तक की सलाह दे डाली।
यह मामला जब सोशल मीडिया के ज़रिए सुषमा स्वराज तक पहुंचा तो उन्होंने तत्काल इस जोड़े का पासपोर्ट दिलाने के साथ ही विकास मिश्रा का तबादला कर दिया। बस इतनी सी बात से संघ परिवार सुषमा से बुरी तरह से नाराज़ हो गया। उन्होंने विकास मिश्रा के पक्ष और सुषमा के खिलाफ सोशल नेटवर्किंग पर मोर्चा खोल दिया। जो ट्रॉल कल तक गैरबीजेपी और गैर संघियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर ज़हर उगला करते थे, वे खुलकर सुषमा के खिलाफ खुंदक निकालने लगे। सुषमा ने उनको कई बार प्यार से शालीन भाषा में समझाया कि वे असहमत हो सकते हैं, लेकिन जिस अश्ष्टि और अश्लील उग्र हिंसक भाषा का वे उनके खिलाफ प्रयोग कर रहे हैं, वह किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती। हालत इतनी खराब हो गई कि सुषमा के पति को टैग करके ट्रॉल यहां तक नीचता पर उतर आए कि उनसे उनकी पत्नी की पिटाई की मांग करने लगे। सुषमा की तरफ से उनकी बेटी ने सुषमा के बीमार होने और आहत होने की लाख दुहाई दी, लेकिन ट्रोल तो उनको एक मुस्लिम और हिंदू पति-पत्नी की पासपोर्ट बनवाने में मदद करने के लिये बेगम सुषमा तक नाम से संबोधित कर गंदे और घटिया आरोप लगाने से किसी कीमत पर बाज ही नहीं आये। मजबूर होकर सुषमा को बड़ी संख्या में अपने ट्विटर अकाउंट से ऐसे घटिया ट्रोलर्स को ब्लॉक करना पड़ा।

अजीब बात यह रही कि बात-बात पर ट्वीट करने वाले पीएम मोदी और बीजेपी सहित संघ के वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले में चुप्पी साध ली। एनडीटीवी के बार-बार सवाल करने पर केवल गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सुषमा के पक्ष में बयान दिया। सोचने वाली बात है कि जिस संघ परिवार ने देश में मुसलमानों के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया है कि उनके पक्ष में अगर कोई बड़े से बड़ा विपक्षी नेता रिटायर्ड जज या कलाकार और कलमकार दो शब्द भी बोल दे तो ट्रोल उसको गालियां देने और धमकी देने पर उतर आते हैं। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका चुतर्वेदी को ऐसे ही एक मामले में ट्रोल उनकी बेटी से रेप करने की धमकी तक दे चुके हैं।

बाद में पूरे मुल्क में थू-थू होने पर धमकी देने वाले को सरकार ने मजबूरन पकड़कर जेल भेजा है, लेकिन यह अपवाद ही माना जाएगा क्योंकि ऐसे मामले लगभग रोज़ ही सामने आते हैं। ऐसे में ट्रोल अपनी ही सोच की पार्टी से जुड़ी एक मंत्री को किसी मुस्लिम हिंदू जोड़े की जायज़ मदद करते कैसे देख सकते हैं? यही वजह है कि देश में ऐसा नफरत और अलगाव का माहौल बना दिया गया है कि केवल हिंदू समर्थक होना राष्ट्रवाद और देशभक्ति माना जाता है, जबकि मुस्लिम के पक्ष में उसके पीड़ित होने पर भी बोलने पर बोलने वाले को पाकिस्तान समर्थक और देशद्रोही बताया जाता है। यही हालत कम्युनिस्टों और निष्पक्ष हिंदुओं को लेकर है।

इस घटना से आप आने वाले उस भयावह कल का अनुमान लगा सकते हैं कि कैसे साम्प्रदायिक और संकीर्ण हिंसक तत्व दुस्साहस के साथ चोरी और सीनाज़ोरी पर उतर आए।

Thursday, 5 July 2018

मोब लिंचिंग

मॉब लिंचिंग पर रोक कैसे लगे?

देश के विभिन्न राज्यों में मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर सरकार सुप्रीम कोर्ट और जनता की चिंता एकाएक बढ़ गयी है। यह हमारे देश मंे पहले से होता आया है कि जब आग पूरी तरह फैल जाती है। तब हम भारतवासी पानी के लिये हायतौबा मचाने लगते हैं। जबकि शुरू में जब समझदार लोग आगाह करते हैं तो उनकी नसीहतों को नज़रअंदाज़ किया जाता है।

  आज सब चाहते हैं कि मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगे। लेकिन जब मॉब लिंचिंग की सोची समझी घटनायें देश में सियासी लाभ के लिये शुरू हो रही थीं। उसी समय समाज विज्ञानी और निष्पक्ष समाज सेवी एलर्ट कर रहे थे कि यह ट्रेंड देश के लिये बेहद ख़तरनाक साबित होगा। तब साम्प्रदायिक और राजनीतिक दलों ने इस सोची समझी पहल पर यह कहकर पर्दा डाल दिया कि ऐसी इक्का दुक्का मॉब लिंचिंग की घटनायें तो देश में पहले भी होती रही हैं। मॉब लिंचिंग को देश के लिये कलंक और घातक बताने वालों पर ऐसे संकीर्ण लोगोें ने यह आरोप भी पलटकर लगाया कि सेकुलर सरकारों के राज में पहले वे चुप रहते थे।

     लेकिन अब जानबूझकर एक साज़िश के तहत उनकी सरकार और देश को दुनिया भर में बदनाम करने के लिये ऐसे आरोप जानबूझकर बढ़ा चढ़ाकर उछाले जा रहे हैं। शुरू शुरू मेें ऐसे अधिकांश मामले अल्पसंख्कों खासतौर पर मुसलमानों के साथ पेश आये। हर मामले में लगभग एकसा यानी गोमांस या गो तस्करी का आरोप लगाकर भीड़ ने चुन चुनकर मुसलमानों को मारा। कई राज्यों में ऐसे मामलों में जहां पुलिस ने सख़्त और निष्पक्ष कानूनी कार्यवाही आरोपियों के खिलाफ की तो कई भाजपा शासित राज्यों में सुनियोजित ढंग से पुलिस ने सरकार के इशारे पर एक एजेंडे के तहत न केवल आरोपियों को बचाने के लिये अज्ञात लोगों के खिलाफ औपचारिकता पूरी करने को दिखावे की रपट दर्ज की।

    बाद में कुछ लोगों के पकड़े जाने पर भी जांच में उनको क्लीन चिट दे दी गयी। इतना ही नहीं कई बार उल्टा बेशर्मी और क्रूरता से पुलिस ने सत्ताधरियों के दबाव में मॉब लिंचिंग के शिकार मृतक पीड़ित के खिलाफ ही गो तस्करी और गोरक्षकों पर हमले का झूठा मामला दर्ज कर अपने नंबर बढ़ाने का काम किया। दरअसल यह वही ट्रेंड था जो गुजरात जैसे राज्य में 2002 में बड़ी बड़ी भीड़ एकत्र कर गोधरा में रेल का डिब्बा जलाने के आरोप में प्रतिशोध के तौर पर सबक सिखाने का अभियान छेड़ा गया था।

इससे पहले उड़ीसा सहित दक्षिण के कई राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों में किसी महिला को डायन बताकर मॉब लिंचिंग भी कभी कभी कोई एक दो घटना एक दो साल में सुनने को मिल जाती थी। लेकिन मोदी जी के पीएम बनने के बाद से एकाएक गाय को लेकर मुसलमानों की मॉब लिंचिंग की घटनायें दादरी में अख़लाक से शुरू होकर हापुड़ में कासिम तक आ पहुंची। इस दौरान कोर्ट ने गाय के नाम पर मुसलमानों और पीएम ने भी एक बार दलितों को गाय के नाम पर मारे जाने पर नाराज़गी दर्ज की।

लेकिन यह औपचारिक बनकर रह गयी। इस दौरान गोतस्करी के आरोप में एक बार तमिलनाडू के कुछ अधिकारी तक रेलवे परिसर में पीटे गये। इसके बाद अचानक विभिन्न राज्यों में बच्चा चोर या बच्चा उठाने वाले बताकर गैर मुस्लिम भी बड़े पैमाने पर मॉब लिंचिंग का शिकार होने लगे तो सरकार के माथे पर बढ़ती चिंता की रेखायें दिखाई देने लगीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार पुलिस और भीड़ को सख़्त कार्यवाही का कानून का भय दिखाया है।

सरकार ने मॉब लिंचिंग रोकने को अब न केवल राज्यों को सख़्त एडवाइज़री जारी की है बल्कि उसने इंटर नेशनल इंस्टेंट मैसिजिंग सर्विस वाट्सएप को भी हर हाल में यह सुनिश्चित करने को कहा है कि उसका दुरूपयोग अफवाहें फैलाकर मॉब लिंचिंग के लिये नहीं होना चाहिये। सवाल यह है कि जब वाट्सएप एंड टू एंड एन्क्रिप्ट है तो वह वाट्सएप के सारे मैसेज पर निगरानी कैसे रखेगा? खुद सरकार भी इसकी हर पोस्ट को संेसर नहीं कर सकती। भारत में वाट्सएप के लगभग 20 करोड़ उपभोक्ता हैं।

सवाल यह भी है कि जब तक जनता को यह डर न हो कि वे अफवाह फैलाकर और किसी की मॉब लिंचिंग करके किसी भी तरह सज़ा पाने से बच नहीं सकते तब तक वे मॉब लिंचिंग से कैसे बाज़ आयेंगे? हमारे देश में भीड़ को लेकर कानून ही नहीं पुलिस और सरकार भी हमेशा हल्के में लेकर बचके निकलने का मौका देती रही है। मॉब लिंचिंग करने वाले लोग यह मानकर भी चलते हैं कि जैसे सरकारें पुलिस से फर्जी मुठभेड़ में शातिर अपराधी बताकर धड़ाधड़ थोक में एनकाउंटर कराकर आरोपियों को सीध्ेा मौत के घाट के उतार रही है।

उसी तरह अगर वे भी बच्चा चोर बच्चा उठाने वाले या गो तस्करों को अगर बिना दलील बिना वकील पुलिस रपट और कोर्ट की कार्यवाही के सीधे सज़ा ए मौत दे रहे हैं तो इसमें कोई हंगामा या हायतौबा मचाने वाली बात नहीं है। मॉब लिंचिंग करने वाले तो कई बार यहंा तक मानकर चलते हैं कि ऐसा करके वे सरकार अदालत और पुलिस का काम ही आसान कर रहे हैं। बलात्कार कानून को सख्त करने के बावजूद जिस तरह सरकार आज तक अपनी नाकामी दूर न करने से बढ़ते बलात्कार नहीं रोक पा रही है।

उसी तरह मॉब लिंचिंग भी तब तक काबू नहीं की जा सकती जब तक सरकार इस बारे में स्पश्ट कानून निष्पक्ष पुलिस और कोर्ट में त्वरित कानूनी कार्यवाही के तौर पर पुलिस को मॉब लिंचिंग पर उतारू भीड़ पर तत्काल काबू पाने के लिये गोली चलाने तक की इजाज़त नहीं देती है।

लगेगी आग तो आयेंगे घर कई ज़द में,

यहां पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है ।।

Wednesday, 4 July 2018

ओला व एयरटेल

ओला के बाद अब एयरटेल!

0कुछ समय पहले ओला टैक्सी के ड्राइवर के मुसलमान होने से एक एक यात्री ने उसमें यात्रा करने से मना किया था। हाल ही में एयरटेल कंपनी में कस्टमर केयर पर कॉल एक मुस्लिम अधिकारी द्वारा अटेंड करने पर एक कस्टमर ने बात करने से इन्कार कर दिया। यह निंदनीय है।

  देश में संकीर्णता और साम्प्रदायिकता इतनी बढ़ती जा रही है कि जो पक्षपात और भेदभाव लोग पहले अपने मन के किसी कोने में छिपाकर रखते थे। वो अब खुलकर न केवल बाहर आने लगा है बल्कि इस घटिया हरकत पर गर्व भी किया जा रहा है। काफी दिन पहले दिल्ली और बड़े शहरों में चलने वाली प्राइवेट टैक्सी सर्विस ओला को एक ग्राहक ने फोन किया। उस ग्राहक को ओला कंपनी ने तत्काल एक टैक्सी उपलब्ध करा दी। जब ग्राहक को पता चला कि उस ओला टैक्सी का ड्राइवर मुसलमान है तो उस ग्राहक ने साफ यह कहकर ओला को फोन कर टैक्सी लेने से मना कर दिया कि वह किसी जेहादी यानी मुसलमान के साथ टैक्सी में यात्रा नहीं कर सकता।

     इस ग्राहक का दुस्साहस देखिये कि इसने यह बात सोशल मीडिया पर भी शेयर की। इसके बाद इस ग्राहक जैसी बीमार मानसिकता के ढेर सारे लोग इसकी पोस्ट के सपोर्ट में आ गये। हालांकि बाद में ओला कंपनी ने समझदारी और अपनी पेशेगत ज़िम्मेदारी निभाते हुए इस साम्प्रदायिक और घटिया सोच के ग्राहक को अपना मुसलमान ड्राइवर न बदलने की दो टूक जानकारी देते हुए धर्मनिर्पेक्षता और सब इंसानों को बराबर समझने का अपना उसूल भी सोशल मीडिया पर ही समझा दिया। लेकिन सरकार या पुलिस ने इस ग्राहक के खिलाफ सार्वजनिक प्रमाण होने के बाद भी कोई कानूनी कार्यवाही करने की ज़रूरत नहीं समझी।

      हमारा मानना है कि अगर इस घृणित सोच के ग्राहक के खिलाफ धर्म के आधार पर लोगों के बीच नफ़रत फैलाने के आरोप में कानूनी कार्यवाही की गयी होती तो आज एयरटेल कंपनी में फोन कर के कस्टमर केयर अधिकारी को एक लड़की यह नहीं कहती कि आप मुसलमान हो इसलिये मैं आपसे बात नहीं करूंगी। इसके बाद ओला टैक्सी से उलट एयरटेल ने उस लड़की से बात करने को एक गैर मुस्लिम अधिकारी को तैनात कर दिया। हमारा मानना है कि यह एयरटेल ने अपना एक ग्राहक बचाने के लिये किया।

      इसके बाद वही हुआ जिसका अंदेशा था। एयरटेल के एक साम्प्रदायिक सोच के ग्राहक के सामने समर्पण से न केवल उसके मुस्लिम ग्राहक बल्कि बड़ी तादाद में गैर मुस्लिम ग्राहक भी उससे ख़फ़ा हो गये। उन सबने एक आवाज़ में न केवल एयरटेल और उस साम्प्रदायिक ग्राहक की सोशल मीडिया पर क्लास लगाई बल्कि बड़ी तादाद में एयरटेल के ग्राहक अपना मोबाइल नंबर और डीटीएच सर्विस पोर्ट करने या सरेंडर करने पर उतर आये।

     कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्लाह ने तो ट्विटर पर निष्पक्ष और सेकुलर लोगों का ट्वीट कर अव्हान ही कर दिया कि एयरटेल को एक साम्प्रदायिक ग्राहक के सामने समर्पण करने पर अपना नंबर पोर्ट कर सबक सिखायें। इसका हाथो हाथ इतना असर हुआ कि एयरटेल के होश ठिकाने आ गये। उसने अपनी भूल स्वीकार की। एयरटेल ने अपनी गल्ती की माफी मांगी और उस घृणित ग्राहक को सोशल मीडिया पर ही खरी खरी सुना दी। हमारा मानना है कि यही नहीं किसी भी मामले में धर्म जाति या क्षेत्र सहित किसी भी आधार पर किसी से कोई पक्षपात नहीं होना चाहिये।

0 मज़हब को लौटा ले और उसकी जगह दे दे,

  तहज़ीब सलीके की इंसान क़रीने के ।।