Monday, 8 January 2018

बड़बोले नेता...

सत्ता में हैं तो कुछ भी बोल सकते हैं ?

0हमारे देश में राजनीतिक बयानबाज़ी का स्तर शायद कभी इतना नहीं गिरा था। जितना आजकल गिर चुका है। जिसका जो जी चाहे बोल देता हैै। अगर बयान देने वाला सत्ताधरी दल से जुड़ा है तो उसको कुछ अधिक ही आज़ादी मिली हुयी है। हालांकि मर्यादा और सीमा लांघने में विपक्ष के नेता भी कभी पीछे नहीं रहे हैं। पहले कम से कम बड़े पदों पर बैठे नेता ऐसे वाचाल नहीं थे।   

        

  केंद्रीय कौशल विकास मंत्री अनंत हेगड़े ने पिछले दिनों सेकुलर लोगोें को एक तरह से घुमा फिराकर नाजायज़ रिश्तों से पैदा हराम की औलाद तक बता दिया था। उनका कहना था कि ऐसे लोगांे के मांबाप का पता नहीं होता। वे कर्नाटक के कोप्पल ज़िले में ब्रहम्ण युवा परिषद के एक प्रोग्राम में बोल रहे थे। उनको यह भी एहसास नहीं हुआ कि वे खुद एक जातिवादी प्रोग्राम में हिस्सा ले रहे हैं। जो कि खुद में एक बड़ी बुराई है। उनका सवाल था कि सेकुलर लोगों को जब अपने इतिहास संस्कृति और परंपरा का ही नहीं पता तो वे धर्मनिर्पेक्ष होने में कैसे गौरव महसूस कर सकते हैं?

उनका यह भी दावा था कि संविधान से भी सेकुलर शब्द निकाला जाना चाहिये। वे इस काम को करेंगे क्योंकि भाजपा संविधान बदलने के लिये ही सत्ता मेें आई है। बाद में हंगामा मचने पर उन्होंने संविधान बदलने वाले बयान से किनारा कर लिया लेकिन सेकुलर लोगों को एक तरह से घुमा फिराकर दी गयी गाली पर कायम रहे। सही भी है उनके पास सेकुलर लोगों के खिलाफ कोई ठोस तर्क नहीं हैं जिससे वे इस स्तर पर बोल गये। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी के लिये अपशब्द बोले तो मोदी ने इस मुद्दे को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि वे गुजरात चुनाव हारते हारते जीत गये।

लेकिन जब खुद पीएम मोदी ने अय्यर के घर पर पाकिस्तानी षडयंत्र से कांग्रेस नेता अहमद पटेल को गुजरात का सीएम बनाने का आरोप लगाया तो न तो इसके लिये कोई सबूत पेश किया गया  और न ही बाद में चुनावी स्टंट केे लिये इतने हल्के दावे के लिये माफी मांगी गयी। साथ ही इस गंभीर आरोप की जांच भी नहीं कराई गयी। कार्यवाही तो क्या होतीयूपी के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि बाटी चोखा कच्चा वोटदारू मुर्गा पक्का वोट। लेकिन इस पर न तो मांस विरोधी किसी मोदीभक्त का खून खोला न ही चुनाव आयोग ने इस खुली वोट की सौदेबाजी का कोई संज्ञान लिया।

राजस्थान के अलवर ज़िले के रामगढ़ के भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा कि गो तस्करी और गोकशी करोगे तो यूं ही मरोगे। उनका एक तरह से दो टूक बयान उन हत्यारों के पक्ष में था जो आयेदिन गाय के नाम पर बेकसूर लोगों की जान ले रहे हैं। उनके खिलाफ न तो किसी कोर्ट ने कोई स्वतः संज्ञान लिया और न ही किसी ने उनके खिलाफ कानून हाथ में लेने को उकसाने की रपट ही दर्ज कराई।

छत्तीसगढ़ के श्रम एवं युवा कल्याण मंत्री भईयालाल राजवाड़े ने कहा कि क्या अधिकारियों के बाप का राज चल रहा है?केंद्रीय मंत्री हंसराज अहीर ने चन्द्रपुर में उन डाक्टरों को अप्रत्यक्ष रूप से गोली मारने की धमकी ही दे दी जो उनके दौरे के समय ड्यूटी पर मौजूद नहीं थे। उनका कहना था कि जब डाक्टरों का पता था कि वे दौरे पर आ रहे हैं तो वे छुट्टी पर कैसे गयेमंत्री जी ने कहा कि डाक्टरों को नक्सलियों में भर्ती हो जाना चाहिये। फिर मंत्री डाक्टरों को भी गोली मार देंगे। राजस्थान के जनजाति विकास मंत्री नंदलाल मीणा फरमाते हैं कि सब कांग्रेसी शराब पीते हैं।

महाराष्ट्र के जलसंसाधन मंत्री गिरीश महाजन का सुझाव है कि शराब की मांग बढ़ाने को शराब के ब्रांड का नाम महिलाओं के नाम पर रखा जाने चाहिये। केंद्रीय मंत्री रविशंकर बिना लाग लपेट के कहते हैं कि जब मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उनको भाजपा टिकट क्यों देइस बयान को आगे बढ़ाते हुए मध्यप्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग कहने लगे कि जो लोग भाजपा को वोट नहीं देते वो पाकिस्तानी होते हैं। ऐसा लगता है कि जिस तरह से पीएम जैसे सबसे बड़े पद पर बैठे मोदी जी ने एक मुस्लिम कांग्रेसी अहमद पटेल को गुजरात का सीएम बनाना एक साज़िश बताया।

उस बैठक में शामिल पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी आदि की उपस्थिति को उनकी देशभक्ति पर सवाल बताया। उसी से प्रेरणा लेकर संघ परिवार से जुड़े अन्य मंत्री सांसद विधायक व दूसरे नेता जो जी चाहे खुलकर बोल देते हैं। उनको पता है कि उनके खिलाफ कानून या पार्टी कोई कार्यवाही न करके शाबाशी ही मिलेगी। उधर भाजपा के विरोधियों और सेकुलर व निष्पक्ष लोगों को बात बात पर न केवल लपेटा जा रहा है बल्कि उनके खिलाफ देशद्रोह सहित संगीन धाराओं में तत्काल मुकदमा कायम कराकर सबक भी सिखाया जा रहा है।

जेएनयू के उमर खालिद और गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी पर हाल  ही में दलितों को भड़काने का आरोप लगाकर रपट दर्ज किया जाना इसका ताज़ा नमूना है। बहरहाल हमारा कहना यह है कि चाहे सत्ताधारी हों या विपक्ष के लोग सभी को बयान और भाषण देने में संयम बरतना चाहिये। फिर भी अगर कोई कानून के खिलाफ कुछ बोलता है तो उस पर कार्यवाही करते हुए पक्ष विपक्ष न देखकर अपराध की गंभीरता को देखा जाना चाहिये। हर हाल में कानून का राज कायम रखा जाना चाहिये।                   

0 हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,

  वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।

Sunday, 7 January 2018

कोरेगांव

कोरेगांवः इतिहास की खतरनाक सियासत !

0संघ परिवार ने सियासत के लिये जिस इतिहास का गलत इस्तेमाल शुरू किया था। अब महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में उसी इतिहास को लेकर दलित अस्मिता का सवाल उसके गले की फांस बन गया है। अभी भी समय है कि सभी वर्ग और जातियां इस तरह से इतिहास की आग से खेलना बंद करेें।  

        

  भीमा कोरेगांव में हर साल की तरह एक जनवरी को दलित समाज 1818की विजय का समारोह मना रहा था। इस बार कुछ नया अगर हुआ तो वह यह था कि उस समारोह पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इसके विरोध में दलितों के सभी संगठनों ने महाराष्ट्र बंद की अपील कर दी। इस दौरान हालांकि अपील बंद की पूर्व संध्या पर वापस भी ले ली गयी। लेकिन न केवल अनेक जगह पर हिंसक घटनायें हुयीं बल्कि दलितों ने अपना रोष खुलकर प्रकट किया। सरकार ने संतुलित कार्यवाही करने के लिये जहां दलित विजय के समारोह पर हमला करने वाले समूह के लिये ज़िम्मेदार दो लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

वहीं समारोह में गुजरात से पहुंचे उभरते हुए दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद पर भी बिना ठोस कारणों के विरोधियोें को सबक सिखाने की नीयत से जनता को भड़काने के आरोप में रपट दर्ज कर दी। वैसे देखने में यह आया है कि अकसर सभी दलों की सरकारें ऐसे मौकों पर सियासी लाभ के लिये ऐसे पक्षपात करती ही रहती हैं। लेकिन भाजपा इस मामले में सबको पीछे छोड़ती नज़र आ रही है। संघ परिवार को सत्ता में रहने का अनुभव नहीं है। इसीलिये वह यह नहीं समझ पा रही है कि वह दलितों और मुसलमानों के साथ ही निष्पक्ष हिंदुआंे के साथ जितना पक्षपात करेगी।

उसका विरोध उतना ही अधिक तेजी से बढ़ता जायेगा। अगर कानून व्यवस्था का सवाल फिलहाल कानून अपना काम करेगा’ जैसे सरकार के दावे पर छोड़ दिया जाये तो कोरेगांव भाजपा के लिये एक नई चिंता लेकर आया है। कोरेगांव का इतिहास गवाह है कि 1818 में महार सैनिकों ने अंग्रेजी सेना के साथ मिलकर अपने से बहुत बड़ी पेशवा बाजीराव की सेना को बुरी तरह हरा दिया था। इसके पीछे भले ही वजह कुछ और भी रही हो लेकिन यह भी सच है कि महारों में पेशवाई के खिलाफ भारी जातीय पक्षपात और अत्याचार का बदला लेने का गुस्सा था।

लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी है कि क्या महार ईस्ट इंडिया कंपनी को जिताने और अपने देश को गुलाम बनाने के लिये अंग्रेज़ों के साथ मिलकर मराठों के खिलाफ लड़ रहे थेतो जवाब है नहीं। ऐसे ही सवाल यह भी है कि क्या पेशवा भारतीय राष्ट्रीयता के लिये लड़ रहे थेतो जवाब है नहीें। इसीलिय इस लड़ाई को दलितोें की ब्रहम्णवाद पर जीत की तरह नहीं देखा जाना चाहिये। सच तो यह है कि पेशवा की जंग लगान बंटवारे को लेकर थी। पेशवा बाजीराव के सामने दूसरे मराठा सरदार बड़ौदा के गायकवाड थे। कंपनी को बीच में आने से पेशवा को हार का सामना करना पड़ा।

दिलचस्प बात यह है कि पेशवा की सेना में सबसे बड़ा हिस्सा अरबों का था। हारने के बाद पेंशन और घर के लिये पेशवा ने अंग्रेज़ों के सामने इसीलिये सरेंडर भी कर दिया। उधर कंपनी की सेना में महारों की तादाद भले ही सबसे अधिक हो लेकिन उनके साथ ही अंग्रेजों के साथ कुछ मराठे राजपूत मुसलमान और यहूदी भी शामिल थे। इसके साथ ही यह इतिहास है कि महारों का अंग्रेज़ों की जीत में सबसे बड़ा योगदान था। लेकिन उनका एक मकसद पेशवा के रूप मंे ब्रहम्णों से अपने अपमान का बदला लेना भी था। वे आत्मसम्मान के लिये लड़ रहे थे।

अब अगर आज पेशवा समर्थकों को दलितों का यह जश्न अपना अपमान लगता है तो उनके हमले को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। यह हमला दलितों पर नहीं हमारे लोकतंत्र संविधान और भारतीयता पर माना जाना चाहिये। इसके साथ ही संघ परिवार को अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हुई जंग को विदेशी आक्रांता और भारतीय राष्ट्रीयता के बीच बताने जैसे झूठे इतिहास को भी देश पर थोपने से बाज़ आ जाना चाहिये। मतलब यह है कि इतिहास को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिये। अकबर की अपनी उपलब्धि थीं तो महाराणा की अपनी वीरता थी।

जिस तरह से संघ परिवार ने सोशल मीडिया पर फेक पोस्ट का सहारा लेकर सियासी लाभ उठाया था। आज वह उसके लिये ही बहुत बड़ा अभिषाप बनती जा रही है। उसी तरह अगर संघ परिवार ने इतिहास को तोड़ मरोड़ कर उसका सियासी लाभ के लिये दुरूपयोग बंद नहीें किया तो यह आगे चलकर उसको बजाये लाभ के लिये कोरेगांव की तरह राजनीतिक नुकसान अधिक पहंुचाने लगेगा।                 

0 ज़ख़्म भर जाते हैं मगर उफ़ ये खुरचने वाले,

   रोज़ आ जाते हैंदिखलाइये अब कैसे हैं।।                    

Today muslim-zameeruddeen shaah

पिछले दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति जमीरूद्दीन शाह ने बहुत पते की बात कही कि मुसलमान अपने सामाजिक हालातों के लिए खुद ही दोषी हैं। वे नमाज और रमजान महीने के कर्मकांडों पर बहुत समय बर्बाद करते हैं। इसके अलावा वे अपनी आधी आबादी मानें औरतों का कोई इस्तेमाल ही नहीं करते हैं, उनको उन्होंने घरों में गुलाम बनाकर रखा है। अपना सऊदी अरब का अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि वहां भी यही हालात हैं, औरतों को घरों में कैद रखा जाता है। यही हालात सभी मुस्लिम देशों के हैं। इसी कारण मुस्लिम देश पिछड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमान रमजान को तो छुट्टी का महीना मानते हुए उन दिनों में कोई काम नहीं करते है। सामान्य दिनों में वे ढाई घंटे काम नहीं करते हैं। शुक्रवार के दिन तो बहुत सारा समय नमाज पर खर्च कर देते हैं। इसके बाद साप्तिाहिक अवकाश आ जाता है। शिक्षा को तो उन्होंने छोड़ दिया है। हालांकि देश में कोई धार्मिक भेदभाव नहीं है, लेकिन इसके बावजूद मुसलमान अवसर न मिलने का रोना रोते रहते हैं। मुस्लिम समुदाय उस भेदभाव का रोना रोता है जो असल में है ही नहीं।

देश के मुस्लिमों की दशा पर विचार करने के लिए बनी सच्चर कमेटी जमीरूद्दीन शाह जैसे लोगों से कभी मिली ही नहीं। यदि मिलती तो मुस्लिम पिछड़ेपन के बारे में उसका नजरिया ही बदल जाता। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद हर तरफ एक ही हो हल्ला था कि मुसलमान देश का सबसे पिछड़ा तबका है। वह दलितों से भी ज्यादा पिछड़ा है। यह माहौल बना कि इस पिछड़ेपन के लिए भारत सरकार और भारतीय समाज का मुसलमानों के प्रति भेदभावपूर्ण नजरिया ही जिम्मेदार है। इस कलंक को मिटाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने अपना सारा खजाना खोल दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।

मुसलमानों के लिए विशेष योजना, बैंक कर्जों में 15 प्रतिशत कर्ज मुसलमानों को देने का प्रावधान, मुस्लिम छात्रों को स्कॉलरशिप, आदि न जाने कितने विशेष उपाय किए गए, लेकिन ये उपाय बेकार साबित हुए। मुसलमानों की स्थिति पर तब से लगातार बहस होती रही है। केंद्र में मुस्लिमों की हमदर्द होने का दावा करने वाली कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन मुसलमानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। साफ-साफ बातें करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि मुसलमान पिछड़ी मानसिकता के हैं। यही वजह है की दुनियाभर के मुसलमान पिछड़े हैं।

इसी मानसिकता से भारत के मुसलमान भी प्रभावित हैं। मध्य-पूर्व के देशों में मुस्लिम ब्रदरहुड नामक इस्लामवादी संस्था यह नारा लगाती है कि इस्लाम इज सोल्यूशन। लेकिन, पश्चिमी देशों में बैठे इस्लामी देशों के विशेषज्ञों को लगता है कि मामला इसके उलट है मानें इस्लाम इज प्रॉब्लम। कई मुस्लिम नेता कहते हैं कि इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद पैगंबर ज्ञान-विज्ञान के बहुत पक्ष में थे। उन्होंने कहा था कि ज्ञान पाने के लिए चीन जाना पड़े तो जाओ। पता नहीं कि मुसलमान ज्ञान प्राप्त करने के लिए कभी चीन गये या नहीं, लेकिन लडऩे के लिए भारत जरूर पहुंच गए, क्योंकि इस्लाम का भरोसा कलम पर कम तलवार पर कुछ ज्यादा ही रहा है। लेकिन, आज का युग ज्ञान-विज्ञान का युग है, सूचना का युग है। आज सिकंदर वही है जो ज्ञान-विज्ञान में अव्वल है। जो उसमें पिछड़ गया वह पिछड़ ही जाता है।

कुछ वर्षों पहले पाकिस्तान के स्वतंत्र पत्रकार डॉ. फारूख सईद के कुछ लेखों ने मुस्लिम जगत को चौंका दिया। इस लेख के आंकड़े कुछ साल पुराने हैं, लेकिन आज भी प्रासंगिक हैं। वे कहते हैं कि हालांकि, दुनिया में कई मुस्लिम देश काफी अमीर हैं। लेकिन, मुसलमान दुनिया के गरीबों में भी सबसे गरीब हैं। उनके मुताबिक 57 मुस्लिम देशों का सकल घरेलू उत्पाद 2 ट्रिलियन डॉलर से कम है। जबकि, अकेला अमेरिका 11 ट्रिलियन डॉलर उत्पादों और सेवाओं का उत्पादन करता है। चीन 5.7 ट्रिलियन डॉलर का, जापान जैसा छोटे से देश का सकल घरेलू उत्पाद 3.5 ट्रिलियन है और जर्मनी का 2.1 ट्रिलियन है। अर्थ ये कि कई देश हैं जो अकेले इतना उत्पादन करते हैं, जितना 57 मुस्लिम देश भी मिलकर नहीं कर पाते है। तेल के बूते अमीर बनने वाले कई देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर को मिलाकर देखें तो इनका सकल घरेलू उत्पाद 430 बिलियन डॉलर ही है। नीदरलैंड जैसे छोटे देश और बौद्ध धर्मांवलंबी थाईलैंड का सकल घरेलू उत्पाद इससे कहीं ज्यादा है। दुनिया की आबादी में मुसलमानों की आबादी 22 प्रतिशत है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में उनका योगदान मात्र पांच प्रतिशत का है। चिंता की बात यह है कि यह प्रतिशत भी लगातार गिरता जा रहा है। दुनिया के जो 9 सबसे ज्यादा गरीब देश हैं, उनमें से छह मुस्लिम देश हैं।

आज का युग ज्ञान-विज्ञान का युग है, मगर शिक्षा साक्षरता के मामले में मुस्लिम देशों की हालत बहुत ही खस्ता है। डॉ. फारूख सईद कहते हैं कि 57 मुस्लिम देशों की एक अरब 40 करोड़ आबादी के लिए सिर्फ छह सौ विश्वविद्यालय हैं। मतलब ये कि प्रति मुस्लिम देश में 10 विश्वविद्यालय हैं। जबकि, सिर्फ अमेरिका में इससे दस गुना यानी 5,758 विश्वविद्यालय हैं। मुस्लिम देशों में जो थोड़ी बहुत उच्च शिक्षा संस्थाएं हैं, उनका आलम यह है कि हाल ही में शंघाई जियाओ टॉग विश्वविद्यालय ने दुनिया के विश्वविद्यालयों की अकादमिक आधार पर जो रैंकिंग दी थी, उसके मुताबिक टॉप 500 विश्वविद्यालयों में मुस्लिम देशों का एक भी विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षा संस्थान तक नहीं था।
डॉ. फारूख सईद ने संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूएनडीपी द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर ईसाई और मुस्लिम देशों की शिक्षा की स्थिति की तुलना की। 15 ईसाई बहुल देश ऐसे हैं, जहां साक्षरता 100 प्रतिशत है। लेकिन, एक भी मुस्लिम देश ऐसा नहीं है, जहां साक्षरता 100 प्रतिशत हो। मुस्लिम बहुल देशों में औसत साक्षरता 40 प्रतिशत के नजदीक है। ईसाई देशों में 40 प्रतिशत ने कॉलेज शिक्षा भी ली है। वहीं मुस्लिम देशों में यह आंकड़ा केवल 2 प्रतिशत का है। डॉ. फारूख सईद इसके आधार पर निष्कर्ष निकलते हैं कि मुस्लिम देशों में ज्ञान पैदा करने की क्षमता का ही अभाव है। ऐसे में ज्ञान-विज्ञान की प्रगति में कहीं शामिल हैं ही नहीं।

चूंकि मुस्लिम देशों की जनता साक्षरता में बहुत पीछे है, इसलिए ज्ञान और सूचनाओं का प्रचार करने वाले अखबारों और किताबों के मामले में भी बहुत पीछे हैं। पाकिस्तान के कायदे आजम विश्वविद्यालय में तीन मस्जिदें हैं, चौथी बनने वाली है। लेकिन, वहां किताबों की कोई दुकान नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल कोर्स की किताबों को रटना भर है, ना कि आलोचनात्मक दृष्टि पैदा करना। सऊदी अरब की सरकारी स्कूलों में जो कुछ किताबें पढ़ाई जाती हैं, उनसे ये पता नहीं चलता कि धर्म की किताबें हैं या विज्ञान की। जैसे एक किताब का नाम है- ‘अन चैलेंजेबुल मिरेकल ऑफ द
कुरान’ या ‘द फैक्ट्स दैट कैन नॉट बी डिनाइड बाय साइंस।’

किसी देश द्वारा किये गये निर्यात में उच्च तकनीक उत्पादों का कितना हिस्सा है, यह पैमाना होता है कि कोई देश ज्ञान-विज्ञान का कितना इस्तेमाल कर पा रहा है। पाकिस्तान के निर्यात में उच्च तकनीक से निर्मित उत्पादों का हिस्सा एक प्रतिशत है। वहीं कुवैत, मोरक्को, अल्जीरिया और सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों में यह आंकड़ा 0.3 प्रतिशत है। दूसरी तरफ सिंगापुर में यह आंकड़ा 57 प्रतिशत का है। इससे स्पष्ट है कि मुस्लिम देश विज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग या तकनीकी क्षेत्र में प्रयोग में कहीं है ही नहीं। नोबेल पुरस्कार भी किसी देश या समाज की वैज्ञानिक प्रगति को नापने का पैमाना होता है। अब तक केवल दो मुस्लिम वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं, मगर दोनों ही ने अपनी उच्च शिक्षा पश्चिमी देशों में पाई है। दूसरी तरफ यहूदी जिनकी आबादी दुनिया में मात्र 1 करोड़ 40 लाख है अब तक 15 दर्जन नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं।

मुस्लिम देशों के पिछड़ेपन के बारे में ये चौंकाने वाले आंकड़े देखकर डॉ. फारूख सईद सवाल उठाते हैं कि मुस्लिम गरीब निरक्षर और कमजोर हैं। आखिर, क्या गलत हो गया? फिर वे खुद ही जवाब देते हैं कि हम पिछड़े इसलिए हैं, क्योंकि हम ज्ञान का निर्माण नहीं कर रहे। हम ज्ञान-विज्ञान को अमल में लाने में भी नाकाम रहे हैं। जबकि, आज का युग सूचना और ज्ञान का युग है, भविष्य केवल उन समाजों का है जो ज्ञान पर आधारित हैं। मानव विकास सूचकांक में भी यदि कुछ तेल का निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में इस्लामी देशों में बस पांच सौ शोध-प्रबंध यानी पीएचडी जमा होते हैं। यह संख्या अकेले इंग्लैंड में तीन हजार है।

इन सारे कारणों से मुस्लिम देशों में ज्ञान पर आधारित समाज बनने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती है, क्योंकि उसकी पहली शर्त है शिक्षा, ज्ञान के प्रति जिज्ञासा जिसका मुस्लिम समाज में घोर अभाव है। ये तथ्य और आंकड़े इस बात की ओर इंगित करते हैं कि मुसलमान केवल भारत में ही नहीं दुनियाभर में सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हैं। भारत के बारे में आप कह सकते हैं कि यहां की सरकार मुसलमानों से भेदभाव करती है, लेकिन इन 57 मुस्लिम देशों का क्या? यहां तो मुस्लिम सरकारें हैं। फिर मुस्लिम शिक्षा में पिछड़े क्यों हैं? इसलिए भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए केवल भारतीय समाज और भारत सरकार को दोषी ठहराना बेकार है। दरअसल सच्चर कमेटी को भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों का भी पता लगाना चाहिए था। साथ ही साथ इस बात पर भी गौर करना चाहिए था कि क्यों मुसलमान दुनियाभर में पिछड़े हैं? कहीं उनकी विशेष धार्मिक सोच, धर्मांधता, रीति-रिवाजों का कट्टरपन, मुल्ला- मौलवियों का शिकंजा इस पिछड़ेपन की वजह तो नहीं?

इस्लाम के कुछ जानकारों का कहना है कि मुसलमानों में अपने हर सवाल के जवाब अपने धर्म ग्रंथों में खोजने की आदत पड़ी हुई है, ये उनकी जिज्ञासा को कुंठित कर देती है। उन्हें यह गलतफहमी है कि उनके हर सवाल का जवाब कुरान में मौजूद है, फिर पढऩे-लिखने की जरूरत ही क्या है? आम जिंदगी में मुसलमानों का ज्यादा भरोसा कलम में कम और तलवार में ज्यादा रहा है। इस्लामी धर्म ग्रंथों के मुताबिक इस्लाम पूर्व का युग अज्ञान और अंधकार का युग रहा है, इसलिए उससे कुछ लेने का सवाल ही नहीं उठता। इस्लाम खुद कोई ज्ञान-विज्ञान कभी पैदा नहीं कर सका। दूसरे धर्मों द्वारा पैदा किए गए ज्ञान विज्ञान को वह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाया। यही वजह है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने कई विश्वविद्यालयों को नेस्तनाबूद कर दिया। उनके ग्रंथालयों को जला डाला। मुसलमान तो इस देश में सात सदियों तक शासक रहे और काफी लूट-खसोट की, उससे महल बनावाए, मकबरे बनवाए। लेकिन, उच्च शिक्षा का कोई संस्थान कभी नहीं बनवाया। अगर, उनके नाम पर कुछ दर्ज हैं तो कुछ इस्लामी शिक्षा देने वाले ही संस्थान। ऐसे लोगों पर सरस्वती कैसे प्रसन्न हो सकती है?

कई विद्वान मानते हैं कि मुसलमानों में ज्ञान को पाने की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पतन का मुख्य कारण है। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने विश्व मुस्लिम संगठन की बैठक में मुस्लिमों को बहुत सही सलाह दी थी कि मुसलमानों को अपनी रूढि़वादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं। मुसलमानों को यह याद रखने की जरूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज्जत और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है। आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज्जत और संसाधनों की गारंटी है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामथ्र्य है।

यहूदी देश इजराइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब के देशों पर हावी रहता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से बेहद समृद्ध देश है। जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है। एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं। जबकि, वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के वाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं। यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है।

- सतीश पेडणेकर
वाया Nishat Imran, Arpit Kamlesh Dwivedi
एजय यादव जी की वाल से

Saturday, 30 December 2017

कांग्रेस नीति भी बदले!

कंग्रेस: नेता बदला, नीति भी बदलो!
सोनिया गांधी की जगह राहुल गांधी के कांग्रेस का मुखिया बनने से यह पार्टी भाजपा को टक्कर तो देती नज़र आ रही है। लेकिन केवल नेता बदलने से कांग्रेस भाजपा को सत्ता से नहीं हटा पायेगी। इसके लिये कांग्रेस को अपनी गल्तियांे कमियों और नीतियों पर गंभीरता से चिंतन करना होगा।

सबको पता था कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ही कांग्रेस के सुप्रीमो बनेंगे। लेकिन यह किसी को पता नहींे था कि औपचारिकता के लिये भी कोई कांग्रेसी अपनी अंतर आत्मा की आवाज़ पर पार्टी प्रमुख का चुनाव लड़ने को नामांकन तक कराने की हिम्मत नहीं करेगा। इससे यह साबित होता है कि कांग्रेस के अंदर ही जब लोकतंत्र नहीं है तो वह देश में सरकार बनाने पर लोकतंत्र का कितना सम्मान कर सकती है? साथ ही कांग्रेस के साथ यह समस्या बड़ी नहीं थी कि सोनिया गांधी पार्टी की प्रमुख रहकर विदेशी मूल की होने और भारतीय परंपराओं व हिंदी को ठीक से नहीं अपना पा रही थीं।

अगर ऐसा होता तो वे 2004 से 2014 तक दस साल सरकार नहीं चला पातीं। एक तरह से देखा जाये तो सोनिया ने प्रधनमंत्री पद का त्याग करके भारतीय इतिहास में एक दुर्लभ मिसाल कायम कर दी। असली सवाल यह था कि सोनिया गांधी का देश और पार्टी को चलाने का तरीका जनता को पसंद नहीं आया। खासतौर पर यूपीए 2 के करप्ट कार्यकाल के बाद कांग्रेस राजनीति रूप से पूरी तरह दिवालिया सी हो गयी चुकी है। राहुल गांधी में भी अपनी मां और पिता के वे सारे लक्ष्ण मौजूद हैं। वे कांग्रेस को अपनी बपौती समझते हैं।

कंेद्र या राज्य में किसी कांग्रेस नेता को उभरने नहीं दिया जाता है। बड़े से बड़े कांग्रेस नेता को राहुल गांधी भी मिलने के लिये आसानी से समय तक नहीं देते हैं। अगर किसी कांग्रेस नेता की राहुल से मुलाकात हो भी जाये तो उसकी बात को कोई तवज्जो नहीं दी जाती। इसका नतीजा यह होता है कि कई बड़े नेता या तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा व अन्य क्षेत्रीय दलों में जा चुके हैं या फिर अपनी नई पार्टी बना चुके हैं। इसके साथ ही कांग्रेस की सरकारों में करप्शन बढ़ते जाने पर सोनिया कोई लगाम नहीं लगा सकीं। भ्रष्टाचार कांग्रेस की पहचान बन चुका है।

उसके अनेक नेता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के मुकदमों का सामना कर रहे हैं। कांग्रेस अपनी अल्पसंख्यक धार्मिक तुष्टिकरण की नीति भी छोड़ने को तैयार नज़र नहीं आ रही। जो गल्ती उसने शाहबानो के मामले में की थी। वही अब तीन तलाक विरोधी विधेयक को लेकर दोहराती नज़र आ रही है। बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद में भी उसके वरिष्ठ नेता और वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मोदी सरकार हटने तक रोकने की मांग कर देश के बहुसंख्यकों को गलत संदेश दिया है।

अगर कांग्रेस को गुजरात में भाजपा को चुनाव में कांटे की टक्कर देकर 150 सीट की जगह 99 पर रोक देने की खुशफहमी हो रही तो उसको यह याद रखना चाहिये कि वहां उसकी अपनी उपलब्धि कम और राजनीतिक हालात भाजपा के खिलाफ अधिक थे। मिसाल के तौर पर पटेलों को भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी सत्ता में आने पर आरक्षण नहीं दे सकती थी। 22 साल की इंकम्बैंसी भी वहां भाजपा के खिलाफ काम कर रही थी। भाजपा के राज में हिंदुत्व से पीड़ित दलित कांग्रेस के साथ मजबूरी में आया। जबकि पिछड़े पटेल आरक्षण के डर से उससे बिदक गये। कांग्रेस का संगठन भी वहां कमज़ोर था। कांग्रेस सत्ता में न सही अगर मज़बूत विपक्ष और विकल्प ही बनना चाहती है तो अपनी नीतियों पर फिर से विचार कर पूंजीवाद व समाजवाद मंे संतुलन लाये।