Saturday, 10 June 2017

मूसा तुम आतंकी......

*मूसा तुम आतंकी, हम देशप्रेमी भारतीय!*

*0हिजबुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर कश्मीरी आतंकी ज़ाकिर मूसा ने बिजनौर में रेल में एक सिपाही द्वारा एक महिला के साथ रेप के मामले में बयान जारी कर भारतीय मुसलमानों को न केवल ज़लील किया है बल्कि उनको भड़काने की भी नाकाम कोशिश की है।*

29 मई को लखनऊ-चंडीगढ़ एक्सप्रैस में एक विकलांग महिला के साथ एक पुलिसवाले द्वारा बलात्कार करने का आरोप लगा था। संयोग से महिला मुस्लिम थी। हालांकि यह जांच के बाद ही पता लगेगा कि वास्तव में उसके साथ रेप हुआ या नहीं? लेकिन इतना तय है कि अगर ऐसा हुआ भी होगा तो इसलिये नहीं कि वह मुस्लिम थी। मूसा ने जो ऑडियो बयान जारी किया है। उसकी आवाज़ की जांच कर पुलिस ने दावा किया है कि वह वास्तव में कश्मीरी आतंकी मूसा की ही आवाज़ है। मूसा ने उस बयान में कहा है-‘‘बहन मैं शर्मिंदा हूं और बहुत दुखी हूं कि तुम्हारी लिये कुछ नहीं कर सका।’’ इसके साथ ही मूसा ने भारतीय मुसलमानों को उस महिला के पक्ष में मुसलमान होने की वजह से न खड़ा होने की वजह से खूब अपशब्द भी कहे हैं।
इतना ही नहीं देश के विभिन्न राज्यों में गौरक्षा के नाम पर जो गुंडे मुसलमानों पर हमला कर मार रहे हैं। मूसा ने उन पर भी जमकर गुस्सा निकालने के साथ देश के मुसलमानों के ऐसी घटनाओं पर चुप रहने को उनकी बेशर्मी और बेहिसी बताया है। मूसा ने अपनी लड़ाई को इस्लाम की लड़ाई बताते हुए अब इस जंग को कश्मीर से बाहर यानी पूरे भारत मंे फैलाने की धमकी भी दी है। मूसा के बयान पर मुझे हंसी भी आ रही है और गुस्सा भी। मूसा भारतीय मुसलमानों को दवा के नाम पर ज़हर देना चाहता है। उसको यह नहीं पता कि बिजनौर रेलवे स्टेशन पर उस विकलांग महिला के साथ जो कुछ हुआ उस पर हंगामा शुरू करने वाला 15 साल का नवयुवक अरूण कुमार हिंदू था।

मूसा को यह भी नहीं पता कि उस महिला, उसके परिवार और उसके नाना ने रेप होने से ही मना कर दिया था। लेकिन हिंदू मुस्लिम जनता के दबाव में न केवल पुलिस ने एफआईआर दर्ज की बल्कि उस आरोपी पुलिस वाले को जेल भी भेज दिया। अब कोर्ट जो तय करेगा वह हम सबको मंजूर होगा। पुलिस वाला तो पुलिस वाला होता है। इसमें वह हिंदू पुलिस वाला कैसे हो गया? और जनता और उसमेें भी महिला वह भी गरीब कमज़ोर के साथ सब जगह ऐसा ही होता है। जोकि गलत तो है। लेकिन इसमें हिंदू मुसलमान का सवाल कहां से आ गया? रही बात गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी की तो इसके लिये भी देश में खुद हिंदू ही बड़ी तादाद में लगातार आवाज़ उठा रहे हैं।

यहां तक कि खुद आरएसएस प्रमुख भागवत को भी गौरक्षकों को ऐसा करने के लिये फटकार लगानी पड़ी है। एक बार पीएम मोदी भी ऐसे गौरक्षकों को लताड़ चुके हैं। यहां तक कि भाजपा शासित राज्यों में भी ऐसी घटनायें होने पर उनके खिलाफ हर बार बाकायदा मुकदमें दर्ज होते हैं। आरोपियों की गिरपफतारी भी होती है। इससे पहले जहां जहां दंगे हुए उन मामलों में भी मुसलमानों की पैरवी बड़ी तादाद में सेकुलर और निष्पक्ष हिंदुओं ने खुलकर की है। गुजरात के 2002 के दंगे में हिंदू व सिख आईएसएस और आईपीएस के साथ एनजीओ की तीस्ता शीतलवाड़ ने मिलकर मुसलमानों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी। दूसरी तरफ कश्मीर से हिंदू पंडितों को निकाला गया।

उनके मंदिर जलाये गये। तब वहां के मुसलमानों को सांप संघ गया। हम भारतीय मुसलमान अपने देश से प्र्रेम करते हैं। हम अमनचैन और भाईचारे के साथ अपने हिंदू भाइयों के साथ सदियों से रहते आ रहे हैं। 1947 में हमारे बुजुर्गों ने खुद भारत में हिंदुओं के साथ रहने का विकल्प चुना था। जिनको पाकिस्तान जाना था। वे चले गये। 1971 में उसके दो टुकड़े होकर बंग्लादेश भी बन गया। अब तुम मुट्ठीभर अलगाववादी कश्मीरी आईएसआईएस और पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगाकर पता नहीं कौन सा तीर मार लोगे? पाकिस्तान अफगानिस्तान और सीरिया सहित पूरी दुनिया के अधिकांश मुस्लिम मुल्कों में खुद मुसलमान एक दूसरे को किस तरह जानवर की तरह आयेदिन काट रहे हैं।

किसी भी मुस्लिम मुल्क में अल्पसंख्यकों को बराबर हक नहीं दिये जा रहे हैं। उनको ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना या मारना काटना व उनकी महिलाओं से रेप करना कई मुस्लिम मुल्कों में आम बात है। यह किसी से अब छिपा नहीं है। मिस्टर मूसा यह ठीक है कि जहां दो बर्तन होते हैं। वे खड़कते ही हैं। इसी तरह से हमारे हिंदू भाई हैं। उनसे कभी कभी कुछ तकरार झगड़े टकराव हिंसक रूप ले लेते हैं। लेकिन वे हमेशा उनकी तरफ से ही नहीं होते। बल्कि सच तो यह है कि यह सब सियासत की वजह से ज़्यादा होते हैं। इसके लिये खुद मुसलमानों की जहालत आक्रामकता और नासमझी भी काफी हद तक कसूरवार होती है। घर से बाहर हम सब हिंदू मुसलमान नहीं बल्कि भारतीय हैं।

हम लडे़ेगे भिड़ेंगे और इसके बावजूद उन हिंदू भाइयों के साथ ही मिलजुलकर प्यार मुहब्बत से रहेंगे जिनका बड़ा हिस्सा आज भी हम से पड़ौसी भाई और दोस्त का रिश्ता निभाता है। हम हिंदुस्तानी मुसलमान भारत में सबसे सुरक्षित हैं। मिस्टर मूसा अलबत्ता तुम ठहरे सारी दुनिया के खुदाई फौजदार, इस्लाम और इंसानियत के दुश्मन तो तुम अपना यह गंदा खूनी खेल कश्मीर तक ही सीमित रखो क्योंकि तुम्हारी ज़िंदगी चार दिन की ही है। भाजपा नेता शाहनवाज़ हुसैन ने कम से कम इतनी बात तो ठीक ही कही है कि भारतीय मुसलमान तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाला और एक दिन ख़बर मिलेगी तुम कश्मीर को इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना देखते देखते खुद चंद दिन बाद सेना की गोली का शिकार हो गये।

*हम बावफ़ा थे इसलिये नज़रों से गिर गये,*
*शायद तुम्हें तलाश किसी बेवफ़ा की थी।*

Thursday, 8 June 2017

संवेदनहीनता की हद पार....

*संवेदनहीनता की हद है यह?*
हरियाणा के पटौदी स्थित गुरूग्राम अस्पताल से एक महिला अपने पति का शव एंबुलैंस से लेकर अपने घर जा रही थी। रास्ते में उसकी एंबुलैंस के दो टायर पंक्चर हो गये। तभी झाड़ियों में छिपे बदमाशों ने आकर उसे लूट लिया। इसे आप क्या कहेंगे ?

एक तरफ हम रोज़ नई तकनीक की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ हमारा समाज दिन प्रति दिन नैतिकता की ढलान से कुछ और नीचे खिसकता जा रहा है। आपको याद होगा कि पहले रास्ते के किनारे बैठकर पंक्चर जोड़ने वाले अपने कारोबार को चलाने के लिये यह ट्रिक इस्तेमाल करते थे। अब बदमाश इस तरीके को राहगीरों को लूटने के लिये आयेदिन इस्तेमाल कर रहे हैं। हरियाणा के केस में बदमाशों ने लूटने का यही तरीका अपनाया। उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि जिसको लूट रहे हैं। वह तो पहले ही अपना सबकुछ लुटाकर विधवा होकर अपने घर लौट रही है। साथ ही उसका सारा पैसा अपने पति के इलाज पर खर्च होने के बावजूद डाक्टर उसके पति को नहीं बचा पाये थे।

बताया जाता है कि उसने अपने पति के इलाज के लिये अपना सब कुछ बेच दिया था। जब इसके बाद भी इलाज का खर्च पूरा नहीं हुआ तो वह किसी महाजन से भारी ब्याज पर पैसे लाई थी। उसको भरोसा था कि एक दिन उसका पति इलाज से पहले की तरह भला चंगा हो जायेगा तो वह फिर से घर का सारा सामान खरीदकर उसकी खुशियां लौटा देगा। उसको यह भी विश्वास रहा होगा कि वह जो इतने भारी रेट पर अपने पति के इलाज के लिये साहूकार से सूद पर पैसा उठा रही है। वह पैसा भी उसके पति की जान के आगे कोई मायने नहीं रखता। बात भी ठीक है कि जान है तो जहान है। लेकिन उस बेचारी पर तो मानो मुसीबतों का पहाड़ एक साथ चारों तरफ से टूट पड़ा।

जैसे किसी हिंदी फिल्म में दर्दनाक कहानी चलती है। ठीक वैसे ही उस दुखियारी के साथ हुआ। उसके घर का सारा सामान बिक गया। वह कर्ज़ में डूब गयी। उसने अपना मकान गृवीं रख दिया। वह खुद विधवा हो गयी। उसके बच्चे अनाथ हो गये। इसके बावजूद रो रोकर बख़्शने की भीख मांगने पर भी उसको बदमाशों ने बिना लूटे नहीं छोड़ा। एक टाइम था। शायद अभी भी कुछ इलाकों मंे है। लोग शवयात्रा और जनाज़े को देखकर हाथ जोड़कर खड़े होकर सम्मान दिया करते हैं। कुछ लोग अपने कारोबार कुछ देर को छोड़कर चार क़दम जनाज़े के साथ चलकर उसको कंधा भी देते हैं। कुछ मरने वाले गरीब का कर्ज माफ कर देते हैं। कुछ लोग उसके अनाथ बच्चो और विधवा को खाने के लिये सामान खरीदकर देना शुरू कर देते हैं।
कुछ ज्ञानी और समाजसेवी उसके यतीम बच्चो की पढ़ाई का आजीवन खर्च देने का ऐलान करते हैं। कुछ लोग विपदा की इस घड़ी में एकमुश्त बड़ी रकम उसको चुपके से देकर उसके आंसू पोंछने का प्रयास भी करते हैं। लेकिन यह कैसा दौर आ गया कि एक विधवा को उसके पति के शव के साथ रोककर लूटा जा रहा है। हो सकता है बदमशों ने उस के साथ कुछ और भी दरिंदगी की हो लेकिन हमारी महान पुलिस ने इस की कहीं चर्चा ही न की हो। कभी कभी ऐसी दर्दनाक ख़बरें पढ़कर मन इतना उद्वेलित और खिन्न होता है कि लगता है कि हमने जो प्रगति और विकास किया है वह बिना सुरक्षा और गरिमा के सब बेकार सा ही है।

यहां सब खामोश हैं कोई आवाज़ नहीं करता,
सच बोलकर कोई किसी को नाराज़ नहीं करता।

Insaano ka samaaj?

*यह इंसानों का समाज है?*
"इस लिखे को मुसलमान भी अपने को रख कर, सिर्फ त्योहारों, मौकों, लोगों के नाम हिंदूफाई कर के पढ़ सकते हैं...इस पोस्ट में मुस्लिमों की जगह 84 और सिखों को रख कर भी पढ़ा जा सकता है...

लेकिन इस पोस्ट को मत पढ़िएगा...आप पागल हो सकते हैं...या फिर अंधे...या फिर इतने पागल कि आप आगे और बुरे इंसान और समाज बन जाएं...मेरा या मेरे जैसे किसी का क्या है...हम सब अभिशप्त हैं, क्योंकि हम देख और महसूस कर पाते हैं..."
--------------------------------------------------------------------

"आप वो समाज हैं, जो बाबरी गिरने के बाद घरों की छतों पर खड़े हो कर थालियां पीट रहे थे..घंटे-घड़ियाल बजा रहे थे...रात को मशाल ले कर विजय जुलूस निकाल रहे थे...दीए जला रहे थे...

आप वह समाज हैं, जो गुजरात के निर्मम जनसंहार में हज़ार लोगों के बेरहम क़त्ल को गोधरा को लेकर तर्कसंगत बताने में लगे थे...बिल्कीस के बलात्कार, उसकी तीन साल की बच्ची की हत्या...और न जाने...

बिना यह सोचे कि आपके घर के पड़ोस में एक जावेद है, जो हर रोज़ बिना नागा आपके घर इस्त्री के कपड़े देने आता है, तो आपके बच्चे के लिए टॉफी ले कर आता है...

बिना यह सोचे कि एक अज़्मा है, जो आपके पूरे परिवार के जूठे बर्तन साफ करती है...एक कप टूट जाने पर सिहर जाती है और डांट ही नहीं खाती उसके पैसे भी वेतन से कटवा लेती है...

बिना यह सोचे कि आप के घर जुम्मन दूध ले कर आएगा और आप उससे कहेंगे कि कम तौल रहे हो, तो वह सही तौल के बावजूद 200 एमएल दूध और आपकी बाल्टी में डाल देगा...

बिना यह सोचे कि आपके साथ दफ्तर में काम करने वाली समीना ने आपके बेटे के लिए घर के काम और नौकरी के बीच वक़्त निकाल कर एक सुंदर स्वेटर बिन कर दिया है...

बिना यह सोचे कि आपके दोस्त अकरम ने आपको उस वक़्त पैसे उधार दिए थे, जब आपको अपनी प्रेमिका के साथ अपना कस्बा छोड़ कर भागना था...
बिना यह सोचे कि आपके प्रोफेसर ने जो कि सिद्दीकी उपनाम लगाते थे, आपको अलग से बिठा कर, कॉलेज के बाद मुफ़्त पढ़ाया था...जबकि उनको अपनी 5 बेटियों की शादी करनी थी..

बिना यह सोचे कि आपकी शादी में आपके गांव के बैंड मास्टर ने, जिसका नाम शकील था...यह कह कर, बारात में बैंड के पैसे लेने से इनकार कर दिया था कि भतीजे की शादी है...ये पैसा हराम है...

बिना यह सोचे कि हर तीसरे दिन, आपके स्कूटर का पंचर बनाने वाला नसीम आपको चाय पिए बिना दुकान से नहीं जाने देता...जबकि उस वक्त चाय 50 पैसे की थी और पंचर 1 रुपए का...

बिना यह सोचे कि आपके गांव के मंदिर के लिए, जागरण के लिए, होली की लकड़ी के लिए...सबसे ज़्यादा चंदा करीमुद्दीन इकट्ठा कर के लाता था...
बिना यह सोचे कि आपके दोस्त अकरम की छोटी बहन नज़्मा, आपको राखी बांधती रही...जबकि उसके रिश्तेदार कहते रहे कि राखी बांधना इस्लाम में हराम है...वो आपके माथे पर टीका भी लगाती रही, आरती भी उतारती रही और मिठाई भी..........

बिना यह याद रखे कि गांव की रामलीला में रसूलन का बेटा ही हमेशा हनुमान बनता था, जय-जय सियाराम चिल्लाता था...राम के पैरों में बैठ जाता था...और रामलीला के अंत में आरती की थाली, पूरी भीड़ में फिराता था...

बिना यह सोचे कि आपका एक दोस्त था...जिसकी मां, हर ईद...सिर्फ और सिर्फ आपके लिए शाकाहारी पकवान बनाती थी...जिसके लिए आप हमेशा अपनी मां से कहते रहे कि आपकी मां, वैसी सेंवई और छोले नहीं बना पाती...और जिसका आपने नाम भी कभी पता करने की ज़हमत न उठाई...चची में जो प्रेम था, वह किसी नाम में हो भी नहीं सकता...

और आपका वह दोस्त, जिसने पहली बार आपको छुप कर मांसाहार खिलाया?
वह दोस्त, जो मौलाना की डांट खा कर भी, जुमे की नमाज़ की जगह आपके साथ पगडंडी पर टहलना ज़्यादा पसंद करता था...

आपकी वह माशूका, जो मुस्लिम थी...लेकिन...

आपका वह दर्ज़ी, जिसने आपकी सबसे अच्छी कमीज़ें और अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के जैसी पतलूनें सिल कर दी थी...

इस लिखे को मुसलमान भी अपने को रख कर, सिर्फ त्योहारों, मौकों, लोगों के नाम हिंदूफाई कर के पढ़ सकते हैं...

इस पोस्ट में मुस्लिमों की जगह 84 और सिखों को रख कर भी पढ़ा जा सकता है...

लेकिन इस पोस्ट को मत पढ़िएगा...आप पागल हो सकते हैं...या फिर अंधे...या फिर इतने पागल कि आप आगे और बुरे इंसान और समाज बन जाएं...मेरा या मेरे जैसे किसी का क्या है...हम सब अभिशप्त हैं, क्योंकि हम देख और महसूस कर पाते हैं...

मेरे कानों में आज भी 6 दिसम्बर, 1992 की वो घंटियां...थालियां...शंख...उनका शोर सीसा पिघलाता है...और मैं बचपन में जा कर कान बंद कर के, एक कुएं में कूद जाना चाहता हूं...

वो मशालों और दीए मुझे अंधा कर देते हैं...आंखें चला जाना और उनका जल जाना...दोनों में बहुत अंतर है...ठीक वैसे ही जैसे समाज के मर जाने और उसके सड़ जाने में...

आपसे सड़ांध आती है...एक दिन आप पूरी तरह बायोडीग्रेड हो जाएंगे...फिर कहीं कोई सड़ांध नहीं आएगी...कोई अवशेष नहीं होगा...

प्रकृति के यौवन का श्रृंगार, करेंगे कभी न बासी फूल
मिलेंगे जा कर वह अतिशीघ्र, आह उत्सुक है उनको धूल..."
---------------------------------------------
@ Mayank Saxena

Sunday, 4 June 2017

जज और हम....

एक ऐसा जज हम सबमें है ?

 

 

 

0राजस्थान हाईकोर्ट के जज शर्मा जी ने मोर को ब्रहम्चारी बताकर अपनी जो जगहंसाई कराई है। वो तो उनके एक आम इंसान की तरह कुछ मामलों में जानकारी न होना माना जा सकता है। लेकिन क्या हम सबके अंदर भी ऐसा ही एक जज नहीं बैठा हुआ है?

जज साहब को अगर यह पता है कि मोरनी मोर के आंसुओं से गर्भवती होती है। तो क्या यह ज़रूरी है कि कोई इंसान अगर जज बन जाये तो उसको पूरी दुनिया की जानकारी हो। और जो जानकारी हो वह भी सही सही हो। जज बनने के लिये जो न्यूनतम योग्यता चाहिये। वो शर्मा जी में ज़रूर रही होगी। लेकिन किसी इंसान के मात्र जज बन जाने से उसकी आस्था परंपरा अंधविश्वास और पूर्वाग्रह खत्म हो जायेंगे। यह गारंटी कौन ले सकता है? कुछ देर के लिये जज साहब को भूल जाइये। आपने उन वैज्ञानिकों के बारे में भी सुना होगा जो अपने नये आविष्कार और नये प्रयोग करने से पहले पूजापाठ ज़रूर करते रहे हैं। क्या साइंटिस्ट बनने से उनकी सोच साइंटिफिक हुयी? नहीं कदापि नहीं।
दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में एक ऐसा डाक्टर है जिसका दावा है कि उसके घर बेटा तब पैदा हो सका जब उसके कुछ गुरूआंे ने उसके परिवार को इसका आशीर्वाद दिया। आमतौर पर हम लोगों के घरों में बच्चा अचानाक रोने लगता है तो उसकी नज़र उतारने का रिवाज है। नज़र लगना और नज़र उतारना इस बात से नहीं जुड़ा है कि वह घर किस उच्च शिक्षित आदमी का है? हमारे देश में छोटे बड़े पद पर बैठे खास लोगों से लेकर आम आदमी तक मेहनत और योग्यता की बजाये भाग्य तावीज़ मन्नत मज़ार चादर भंडारा जागरण हवन हनुमान चालीसा हज नमाज़ व्रत दुआ जादू अभिषाप स्वर्ग नर्क देवता राक्षस जिन्न भूत और विशेष पूजा अर्चना में विश्वास करता है।
यहां तक कि अंधविश्वास के कारण कई बार बच्चो की बलि तक चढ़ा दी जाती है। जानवरों की बलि देकर भगवान को खुश करने का तो बाकायदा त्यौहार तक मनाया जाता है। किसी के छींकने और बिल्ली के रास्ता काटने से काम बिगड़ जाने की बचकानी मान्यता और चप्पल उल्टा होने से घर में झगड़ा होने की हास्यास्पद बात तो अकसर सुनी जाती है। दरअसल हम जिस घर में पैदा होते हैं। उस परिवार का जो धर्म होता है। वही धर्म बिना पढ़े बिना जाने और बिना समझे हम पर जन्मजात थोप दिया जाता है। ऐसे ही जाति भी हमको पैदाइशी मिल जाती है। यानी जो बात हमारे काबू मेें नहीं है। उस धर्म और जाति पर ही हमें बचपन से श्रेष्ठ होेने और गर्व करने का झूठा आडंबर सिखाया जाता है।
जो विचार और आस्था हमारे परिवार के मुखिया या माता पिता की होती हैं। वही देर सवेर हमारे दिमागों में ठूस दी जाती है। इसी का नतीजा है कि हम स्कूल जाकर पढ़ने लिखने से पहले अपनी सोच अपने घरवालों और परिवेश के हिसाब से गढ़ लेते हैं। उसके बाद स्कूल में मास्टर के साइंस या तार्किक बातें पढ़ाने से हमारी सोच पर कोई अंतर नहीं पड़ता। हम उन मान्यताओं और दकियानूसी परंपराओं को उच्च शिक्षित और जज की तरह उच्च पदस्थ होने के बावजूद ढोने को अभिषप्त होते हैं। जो हमारे मासूम और नादान दिल दिमाग में ज़बरदस्ती कूट कूट कर भरी जाती हैं।
किसी ने बिल्कुल ठीक कहा है कि जब हम एक उंगली किसी की तरफ उठाते हैं तो ऐसे में अपनी ही बाकी की चार उंगली हमारी अपनी तरफ उठी होती हैं। लेकिन हम अपने गिरेबान में झांकने का साहस नहीं कर पाते। मैंने ऐसा करने का प्रयास किया है तो मेरे घर वाले मुझे अजीब आदमी समझते हैं। मेरे मित्र और संबंधी मुझ से नाराज़ हो जाते हैं।
0 एक आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो कई बार देखना।

Friday, 2 June 2017

विपक्षी एकता

विपक्ष एक हो तो अच्छा ही है!

0जिस तरह से देश में सत्ताधारी दल लोकतंत्र के लिये अनिवार्य है उसी तरह से विपक्ष भी सरकार को बेलगाम और जनविरोधी होने से रोकने को ज़रूरी होता है। यही कारण है कि विपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जाता है।

26 मई को दिल्ली में कांग्रेस प्रेसीडेंट सोनिया गांधी ने विपक्ष के 13 दलों की साझा बैठक राष्ट्रपति चुनाव पर विचार विमर्श करने को बुलाई थी। हालांकि इसमेें विपक्ष के किसी महागठबंधन की बाकायदा चर्चा नहीं हुयी। लेकिन इतना तय है कि भविष्य में भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष एकजुट होने की शुरूआत कर चुका है। ज़ाहिर है इससे भाजपा में चिंता और बेचैनी होनी थी। इसीलिये उसके नेताओं के बयान इस भावी विपक्षी गठबंधर के खिलाफ बनने से पहले ही आने शुरू हो गये हैं।

भाजपा नेताओं से पूछा जाना चाहिये कि जब उनको विपक्ष के ऐसे किसी गठबंधन से कोई ख़तरा और चुनौती महसूस नहीं हो रही है तो वे इतना परेशान क्यों हैं? दरअसल बिहार में भाजपा के खिलाफ विधानसभा चुनाव में जब से राजद, यूनाइटेड जनता दल और कांग्रेस का गठबंधन सत्ता में आने में सफल हुआ है। तब से ही यह चर्चा चल रही थी कि यूपी में भी सपा बसपा और कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिये।

लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले सपा को लगता था कि उसकी छवि और विकास उसको अकेले जिताने मंें सक्षम है। इसके बावजूद जब सपा ने मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और भाजपा का आक्रामक साम्प्रदायिक चुनाव अभियान देखा तो केवल कांग्रेस से गठबंधन करके ही भाजपा को पटखी देने लायक खुशफहमी पाल ली। इसमें भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों में पकड़ रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल को जोड़ना तक गवाराह नहीं किया गया।

उधर केंद्र में मोदी की सरकार बनने से पहले यूपी में मज़बूत इकलौती विपक्ष बहुजन समाज पार्टी राहुल गांधी के बार बार प्रयास करने के बावजूद सपा के साथ गठबंधन को किसी कीमत पर तैयार नहीं थी। बहनजी को यह भी गलतफहमी थी कि भाजपा और सपा केवल सत्ता में होने की वजह से मीडिया में ही चर्चा में हैं। उनको लगता था कि या तो वे अपने बल पर अकेले अपने जातीय समीकरण से 2007 की तरह सरकार बना लेंगी या फिर भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये विपक्ष की साझा सरकार बन जायेगी।

लेकिन जब चुनाव नतीजे आये तो बहनजी हैरत और सदमें में आ गयीं। हालांकि शुरू में उन्होंने अपनी पार्टी की हालत इतनी ख़राब होने का ठीकरा इवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाकर भाजपा की मोदी सरकार के सर पर फोड़ा। लेकिन जल्दी ही उनको यह बात समझ में आ गयी कि 2014 में तो सेंटर में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार थी। उस समय भी भाजपा को 80 में से 73 सीट और 43 फीसदी वोट मिले थे। अब विधानसभा चुनाव मेें भाजपा को पहले से 4 फीसदी कम वोट यानी 39 प्रतिशत मत मिले हैं।

लेकिन उसके खिलाफ पड़े 61 फीसदी विपक्षी वोट आपस में बराबर बराबर बंट गये हैं। बहनजी को अब यह भी समझ में आ गया है कि उनका दलित वोटबैंक अकेले उनका बेड़ा पार नहीं लगा सकता। इसके साथ ही सपा में अखिलेश अपने पिता और बहनजी के 36 के आंकड़े को दरकिनार कर यह समीकरण पूरी तरह मान चुके हैं कि भाजपा को दिल्ली के तख़्त दूर रखने के लिये कांग्रेस के साथ ही बसपा को साथ लेना होगा। सियासत के जानकार अच्छी तरह से जानते हैं कि केंद्र की सरकार का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है।

मायावती की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वे अपने दल के बल पर खुद अकेली भी अगली बार राज्यसभा नहीें जा सकती। मौके की नज़ाकत को भांप लालू यादव ने एडवांस में बहनजी को इस बात का आश्वासन दे दिया है कि उनको राज्यसभा के 2018 में आ रहे चुनाव में राजद सपोर्ट देकर जितायेगा। एक दर्जन से अधिक विपक्षी नेताओं के सोनिया गांधी के बुलावे पर एकत्र होने के बावजूद बिहार के सीएम नीतीश कुमार उस दिन दिल्ली विपक्षी दलों की बैठक में नहीं पहुंचे।

उन्होंने बहाना यह किया कि उनको अगले दिन पीएम मोदी के साथ मारीशस के पीएम से मुलाकात और गंगा सफाई अभियान पर बात करनी थी। हालांकि उनकी गंगा की सफाई सियासी सफाई मानकर अनेक विपक्षी दलों को उनके मौका देखकर भाजपा से हाथ मिलाने का शक पहले से ही होता रहा है। उधर ममता बनर्जी और वामपंथियों के इस बैठक में बिना शर्त शामिल होने से यह तय हो गया है कि आगे जो भी विपक्षी महागठबंधन बनेगा। उसमें नीतीश जैसे अवसरवादी विपक्षी नेता शामिल हों या ना हों।

लेकिन यह महागठबंधन कांग्रेस यानी राहुल गांधी के नेतृत्व में ही बनेगा। हो सकता है नीतीश स्वयं पीएम पद के विपक्ष की ओर से उम्मीदवार बनने का सपना देख रहे हों। लेकिन एक ऐसा विपक्षी नेता जिसके रिश्ते विपक्ष से अधिक भाजपा और मोदी के साथ मधुर हों, कैसे विपक्ष का साझा पीएम उम्मीदवार बन सकता है? फिर सवाल यह भी है कि जो कांग्रेस आज इतिहास के अपने सबसे बुरे दौर से गुज़रते हुए भी लोकसभा में 44 सीट रखती हो वह देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होकर भी किसी क्षेत्रीय नेता को क्यों पीएम का पद थाली मेें रखकर परोसना चाहेगी?

अलबत्ता जो भाजपा खुद पीडीपी जैसी विवादित पार्टी से गठबंधन कर सकती है उसे विपक्षी एकता पर बोलने का नैतिक हक़ बिल्कुल भी नहीं मिलना चाहिये।

मसलहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम

तू नहीं समझेगा सियासत तू अभी नादान है