Thursday, 16 March 2017

मोदी लहर में भी तसलीम जीते

तसलीम ने कमल की आंधी में भी बखूबी साइकिल चलाई...*

 

 

 

दो बार चेयरमैन और दो बार विधायक बनने वाले यहां के *सपा नेता तसलीम अहमद ने बीजेपी से कांटे की टक्कर में 2106 वोट से जीत दर्ज कर अपना नाम प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में दर्ज कर लिया है। जो अपने बलबूते जिस पार्टी में चाहें उसको सीट जिताकर तोहफे के तौर पर पेश कर सकते हैं। पहले 2012 में वे बसपा में थे तो उन्होंने हवा के रूख़ के खिलाफ पूरे यूपी में सपा की लहर चलने और उसकी पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बावजूद यहां से अपने तौर तरीकों से बसपा की सीट जिता दी थी।*

*यह वह दौर था जब मुसलमानों का बहुमत सपा के साथ जाता था। लेकिन तसलीम ने अपने हुनर से उनका रूख़ भाजपा को हराने के लिये बसपा की तरफ सफलता पूर्वक मोड़ दिया था। नजीबाबाद सीट रिज़र्व से सामान्य होने के बाद यह वह दौर* *था। जब भाजपा 2007 के अपने मात्र 17000 वोट के मुकाबले सीधे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ लेकर* *51130 वोट यानी तीने गुने तक पहुंच गयी थी। हालांकि प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अधिकांश सीटों पर बीजेपी का कब्ज़ा हुआ है।लेकिन तसलीम अपनी जननेता की छवि और अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ज़िले की 8 में से इकलौती जनरल सीट जीतकर सपा के खाते में डालने मेें कामयाब रहे हैं।* आंकड़े बता रहे हैं कि तमाम ज़िलों में सपा को एक भी सीट नहीं मिली है। लेकिन बिजनौर ज़िले में नगीना रिज़र्व सीट के अलावा अगर कोई दूसरी जनरल सीट बेहद संघर्ष पूर्ण तरीके से किसी ने अपने बलबूते पर जीतकर पार्टी का सर उूंचा किया है तो वह नजीबाबाद सीट है।अभी विस्तार से आंकड़े सामने आने बाकी है कि कैसे तसलीम ने एक तरह से जादू करके मुस्लिम वोटोें का बंटवारा सपा बसपा के बीच अपने व्यवहार और नेतृत्व के कौशल से लगभग होने से एक तरह से रोक ही दिया। हमने अपने अनुमान में यह आशंका जताई थी कि गांवों में कमल के पक्ष में 9 प्रतिशत अधिक पोल हुआ भाजपा का वोट साइकिल की जीत में बाधा बन सकता है।

लेकिन तसलीम ने मुसलमानों के कम मतदान फीसद के बावजूद भी कुल पोल हुए 88334 वोटों में बसपा के हिस्से में जाने वाले अंसारी व अन्य मुस्लिम वोट को 16467 से बेहद कम कर लगभग 4000 तक सीमित कर दिया। दूसरा काम उन्होंने यह किया कि अपने चेयरमैन काल और विधायकी के दौर में गैर मुस्लिमों के काम आकर उनका दिल इतना जीत लिया कि वे उनको साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के दौर में भी सपोर्ट करने को मजबूर हो गये।
ऐसे ही तसलीम ने एमआईएम की पतंग को ज़्यादा उूपर नहीं उड़ने दिया जिससे वह 4 से 5 हज़ार की बजाये मात्र 2094 मुस्लिम वोट ही काट सकी। इसके बरअक्स बेहद कमज़ोर समझी जा रही लोकदल की लीना सिंघल ज़मानत ज़ब्त होने के बावजूद ‘‘हम तो डूबंेग तुम को भी ले डूबेंगे’’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए एक दो हज़ार की बजाये भाजपा के कोटे में जाने वाले जाटों में से 3587 वोट लेने में कामयाब रही। अगर इन वोटों को कमल के साथ जोड़ा जाये तो तस्वीर एकदम उल्टी हो सकती थी।
तसलीम अहमद को एक फायदा यह हुआ कि भाजपा को बड़ी संख्या में जाने वाला दलित वोट लगभग ना की बराबर गया। इसका नतीजा यह हुआ कि हमारे सर्वे में जिन दलितों ने बढ़चढ़कर कमल पर मुहर लगाने का दावा किया था। उनके 6600 की बजाये मुश्किल से एक से दो हज़ार वोट ही भाजपा को गये होंगे। इन वोटों का बीजेपी की तरफ न जाना भी तसलीम मियां केे लिये वरदान साबित हुआ। वर्ना इस आंकड़े से भी वे दो हज़ार से जीतने की बजाये भाजपा से उल्टा दो हज़ार वोटों से पिछड़ सकते थे।
इस सारे समीकरण का परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों के वोट गांवों में हिंदुओं के मुकाबले 9 फीसदी कम डाले जाने के बावजूद उनको बहुत ज़्यादा बंटने से बचाने में विजयी तसलीम अहमद पूरी तरह कामयाब रहे। उन्होंने मुसलमानों सहित सपा के परंपरागम हिंदू वोटर्स को समझाया कि अखिलेश युवा हैं। वह जो विकास के काम करा रहे हैं। अगर आप इस बार सपा को नहीं जितायेंगे तो अगली बार कौन सी पार्टी या मुख्यमंत्री आपके लिये भलाई के काम करेगा?
उनका कहने का मतलब यह था कि जब कोई साफ सुथरी छवि का इंसान अच्छे काम कर रहा है तो उसको एक मौका और मिलना चाहिये। अपनी इस मार्मिक अपील पर तसलीम अपनी जीत के अंतर लायक वोट उधर से इधर खींचने में पूरी तरह कामयाब होते नज़र आये। हद यह है कि जो अन्य डमी उम्मीदवारों को 5023 वोट गये हैं। उनमें भी तसलीम अहमद ने मुसलमानों के बहुत अधिक वोट नहीं जाने दिये हैं।

Wednesday, 8 March 2017

यू पी चुनाव के बयान बहादुर

*यूपी चुनाव: बयानबहादुरों की वजह से ये कहां आ गए हम?*

 

 

 

यूपी चुनाव का अंतिम दौर पूरा हो चुका है। चुनाव से पहले जो नेता अपनी पार्टी को 300 सीटें मिलने का दावा कर रहे थे, अब वे चुनाव ख़त्म होते-होते जनता से त्रिशंकु विधानसभा न बनाने की अपील करने लगे थे। पीएम मोदी ने सबसे पहले यूपी को जाति और धर्म की राजनीति से निकालकर विकास को मुद्दा बनाने बनाने का साहसिक फैसला किया था। एक राउंड के वोट पड़ने के बाद सपा-कांग्रेस गठबंधन और अखिलेश के विकास का मुद्दा BJP पर भारी पड़ते देख सबसे पहले हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण का खेल उन्होंने ही शुरू किया।

हालांकि, ऐसा नहीं है कि अन्य दलों के नेताओं ने प्रचार में अपना स्तर बनाए रखा हो। लेकिन पीएम होने की भी अपनी एक अलग मर्यादा होती है। हालत यह हो गई कि मोदी जी ने इलाहाबाद में प्रशासन की बिना अनुमति के ही रोड शो कर डाला। इतना ही नहीं, उत्तराखंड के सीएम ने भी उन पर बिना प्रशासन की अनुमति के जनसभा करने का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री ने बिना जांच पूरी हुए ही हुईं रेल दुर्घटनाओं का आतंकी कनेक्शन चुनाव में वोट हासिल करने के लिये अपनी तरीके से इस्तेमाल करने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया।

उन्होंने लोकतंत्र की भावना के खिलाफ एक तरह से मतदाताओं को दबाव में लेने के लिए एक बार फिर दिल्ली और बिहार की तरह यह कुतर्क रखा कि विकास के लिए केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होना ज़रूरी है। जो भाजपा अब तक केंद्र और राज्य के चुनाव नतीजों को एक दूसरे से जोड़ने पर भी ऐतराज़ करती रही है, वह उड़ीसा और महाराष्ट्र के निकाय चुनाव के अपने पक्ष में आये परिणामों को भी नोटबंदी पर जनता की मुहर बताने में लग गई।

इस दौरान आंकड़ों की बाज़ीगरी से कम होने जा रही जीडीपी के भी बढ़ने का दावा किया गया। इतना ही नहीं, यूपी में वोटर्स से यह कहकर भी बीजेपी नेताओं ने वोट मांगे कि आने वाले समय में पार्टी को राज्यसभा में बहुमत और प्रेजिडेंट के चुनाव में राज्य में जीत की बहुत भारी ज़रूरत है। हद तो तब हो गई जबकि मोदी के साथ ही बीजेपी के राष्ट्रीय प्रेजिडेंट अमित शाह ने बीजेपी विरोधी दलों को आतंकवादी कसाब का समर्थक, बीएसपी को बहनजी सम्पत्ति पार्टी करार दे दिया।

अखिलेश पर पिता को वनवास देने का आरोप लगाया गया तो वहीं राहुल गांधी को नारियल के जूस के नाम पर घेरा गया।

उधर, सपा-कांग्रेस और बसपा ने भी मोदी पर निशाना साधा। बीजेपी को भारतीय जुमला पार्टी कहा। मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि 65 साल के बूढ़े को कौन गोद लेगा? कुल मिलाकर देखा जाए तो चुनाव प्रचार के स्तर को गिराने में किसी ने भी कोर-कसर नहीं छोड़ी। राजनेताओं ने यह भी लिहाज़ नहीं किया कि जहां मोदी के इस तरह के बयानों से उनकी गरिमा अपने आप ही गिर रही है, कम से कम उनको प्रधनमंत्री पद की गरिमा बनाए रखने के लिये मोदी पर इस तरह के शाब्दिक हमले नहीं करने चाहिए थे।

लेकिन यहां तो होड़ यह थी कि चाहे जितना ही नीचे गिरना पड़े, कोई किसी से पिछड़ना नहीं चाहता था। हद तो तब हो गई जब भाजपा के छुटभैया नेताओं ने दो कदम और आगे बढ़कर मुसलमानों को मरने के बाद अपने आप शव जलाने का फरमान जारी कर दिया। एक बड़बोले बीजेपी नेता ने तो यहां तक कह दिया कि अगर बीजेपी जीती तो दो-चार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कर्फ्यू ज़रूर लगेगा। इसका नतीजा यह हुआ कि पहले दौर में 64 प्रतिशत वोटिंग गिरकर 57 फीसदी तक आ गई।

Monday, 6 March 2017

गुरमेहर का क़सूर क्या है?

 

 

 

असहमति की आज़ादी ख़तरे में है!

दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के उमर खालिद को बोलने के लिये बुलाया गया था। वहां उनको उस अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने बोलने से रोका जो सलमान रूश्दी तस्लीमा नसरीन और तारिक फतेह की अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर सदा उनके पक्ष में खड़ी नज़र आती है। इस दौरान एबीवीपी ने विरोध के अपने परंपरागत तरीकोें को अपनाया। वहां आयोजन के दौरान कुछ आपत्तिजनक नारे सुनाई दिये।

यह नहीं पता कि वे नारे किसने लगाये। इसके बाद एबीवीपी की हिंसा वामपंथी रूजहान के अपने विरोधी गुट के खिलाफ मौके पर ही शुरू हो गयी। छात्राओं को भद्दी भद्दी गालियां दी गयी। इस दौरान एक तटस्थ छात्रा गुरमेहर ने अपनी बात मीडिया के ज़रिये रखी। उसका कहना था कि जिसको जो प्रोग्राम पसंद न हो वो उसमें हिस्सा ना ले। प्रोग्राम की परमीशन देना कॉलेज प्रशासन का अधिकार है। एक बार जब किसी प्रोग्राम की अनुमति मिल जाती है तो उसको रोकने का अधिकार केवल कानून को है। इसके लिये कोर्ट से स्टे लिया जा सकता है।
लेकिन जब नियमानुसार एक प्रोग्राम हो रहा है तो उसको रोकने का एबीवीपी ही नहीं किसी को भी अधिकार नहीं रह जाता है। इसके बाद भी कोई कानून अपने हाथ में लेकर जबरदस्ती अपनी पसंद के खिलाफ होने वाला प्रोग्राम रोकता है तो यह खुली गुंडागर्दी ही कहलायेगी। लेकिन गुरमेहर का इतना कहना था कि एबीवीपी वालों का पारा सातवें आसमान पर पहंुच गया। वे उससे न केवल बुरी तरह नाराज़ हो गये बल्कि उसको रेप तक की धमकी दे डाली।

पूरा संघ परिवार पहले तो इस मुद्दे पर अपने छात्र संगठन के साथ खड़ा हो गया। लेकिन जब पूरे देश में एबीवीपी की इस हरकत की निंदा और थू थू होने लगी तो एबीवीपी ने खुद को इससे अलग कर लिया। आरोपी को दिखावे के लिये संगठन से निकाला गया। एक औपचारिक रिपोर्ट भी पुलिस ने दर्ज की। जबकि घटना के समय पुलिस तमाशा देखती रही। इसके बावजूद गुरमेहर पर संघ परिवार की ट्रॉल आर्मी टूट पड़ी है। उसके फर्जी अश्लील फोटो पोस्ट और वीडियो नेट पर अपलोड कर उसको बुरी तरह मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

इसके बाद उसको गाली गलोच और तनाव से बचने के लिये अपना फेसबुक एकाउंट भी बंद करना पड़ा है। हद यह हो गयी कि गुरमेहर को यहां तक कहना पड़ा कि वह इस विवाद से अपने आप को अलग कर रही है। गुरमेहर के पिता ने पाकिस्तान के साथ जंग में शहादत दी थी। गुरमेहर एक खुले दिमाग की लड़की है। उसका कहना है कि उसके पिता को पाकिस्तान की जनता नहीं बल्कि जंग की मानसिकता वाले लोगांे ने मारा है। वह कहती है वह पाकिस्तान की जनता से नफ़रत नहीं करती।

संघ परिवार की असली परेशानी यहीं से शुरू होती है। संघ परिवार का कट्टरपंथ साम्प्रदायिकता और घृणा पाकिस्तान के बहाने सारे मुसलमानों से नफरत का पाठ पढ़ाती रही है। गुरमेहर जैसी मामूली स्टूडेंट ने संघ की इस बे बुनियाद और बनावटी सोच की एक तरह से पोल खोल दी है। मोदी भक्तों की फौज सोशल मीडिया पर गुरमेहर के पीछे हाथ धोकर पड़ गयी है। लेकिन इसके साथ ही गुरमेहर के पक्ष में भी देश के सेकुलर और सुलझे हुए निष्पक्ष लोगों का एक बड़ा वर्ग खुलकर सामने आ गया है।

उसका कहना है कि गुरमेहर को अपने मन की बात देश के सामने रखने का पूरा अधिकार है। दरअसल संघ परिवार और उसके एबीवीपी जैसे उग्र संगठन एक तरफ तो दुनिया के कुछ हिस्सों में हो रही मुसलमानों के कट्टरपंथ संकीर्णता और आतंकवादी हिंसा का विरोध करता है। दूसरी तरफ खुद सब पर अपनी बात थोपने और न मानने पर आतंकित करने को हिंसा से लेकर घटिया से घटिया हरकत करने को तैयार रहता है। अब इस दोगलेपन फासिज़्म और तानाशाही का वामपंथियों के साथ ही आम जनता भी विरोध करने लगी है।

Wednesday, 1 March 2017

सपा बनाम बसपा

माना एसपी पक्षपाती पर बीजेपी निष्पक्ष है क्या ?

 

 

 

यूपी चुनाव के आधे से अधिक चरण पूरे हो चुके हैं। जिनमें आधे से अधिक सीटों पर वोट भी पोल हो चुके हैं। इसके साथ ही तीनों मुख्य दल सपा कांग्रेस गठबंधन, बसपा और भाजपा अपनी अपनी जीत पक्की न देखकर विकास और सकारात्मक मुद्दो से भटक चुके हैं। इसकी शुरूआत वैसे तो पीएम मोदी ने फतेहपुर की रैली में की थी।
लेकिन बसपा सुप्रीमो काफी पहले से अपने दलित वोटबैंक के साथ इस बार सवर्ण मतदाता न जुड़ते देख खुलेआम मुसलमानों को भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर हाथी पर मुहर लगाने के लिये आमंत्रित नहीं बल्कि सीधे सीधे आतंकित सा कर रही हैं। उनको यह नहीं पता बीजेपी के सत्ता में आने से जितनी दिक्कत मुसलमानों को होती है। उससे कई गुनी दलितों को होती है।

इसका नमूना भाजपा सरकारों वाले राज्यों में दलितों के साथ आयेदिन होने वाली उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं के रूप में देखा जा सकता है।
बहनजी को यह बात कौन समझाये कि अगर भाजपा धर्म के नाम पर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करती है तो बसपा सहित सारे सेकुलर दल आसमान सर पर उठाने लगते हैं। लेकिन अपनी जाति और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का ख़तरनाक चुनावी मिश्रण तैयार करने से भी जवाबी हिंदू साम्प्रदायिकता को ही पर लगते हैं।

ऐसे ही सपा जब मुसलमानों के नाम पर कुछ योजनायें चलाती है तो इससे हिंदू समाज को यह समझाने में भाजपा को मदद मिलती है कि देखो बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण हो रहा है।
मिसाल के तौर पर मदरसों को मिलने वाली ग्रांट और इमामों को वेतन देने की चर्चा हो या कब्रिस्तान की चारदीवारी और मुस्लिम लड़कियों को हायर एजुकेशन के लिये दिये जाने वाले 30 हज़ार रू. हों। हमारा कहना तो यह है कि चुनाव में ही नहीं किसी भी दल की सरकार बनने के बाद किसी भी जाति या धर्म विशेष के लिये कोई भी विशेष योजना नहीं चलाई जानी चाहिये।
हालांकि हर देश और राज्य में अल्पसंख्यकों के लिये इस तरह की स्कीमें पहले से इसलिये चलती रही हैं क्योंकि उनमें कम होने की वजह से संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे को लेकर सदा एक भय बना रहता है। लेकिन भाजपा ने इसे तुष्टिकरण का प्रचार करके इतना बदनाम कर दिया है कि इससे न केवल जवाबी हिंदू ध्रुवीकरण का उसे लाभ मिलने लगा है।

यहां तक कि इस तरह के लगातार झूठे प्रोपेगंडे से दंगे तक भड़कने लगे हैं। इसका एक हल यह है कि योजनाओं का आधार गरीबी और दलित पिछड़े बनाये जा सकते हैं।
जिसको हमारे संविधान ने भी मान्यता देते हुए इस आधार पर आरक्षण भी दिया हुआ है। अब मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है। वह यह है कि क्या सपा बसपा पर जाति धर्म के आधार पर पक्षपात करने का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद निष्पक्ष सरकार चलाती है? चाहे केंद्र सरकार हो या भाजपा की राज्य सरकारें, अगर आप उनका रिकॉर्ड देखें तो न तो वे जाति व भ्रष्टाचार के मामले में दूध की धुली हैं और न ही वे धर्म के आधार पर पक्षपात के आरोपों से बची हुयी हैं।
भाजपा जिसे आरएसएस अपने हिसाब से चलाता है। व्यवहार में सवर्ण जातियों को हर मलाईदार जगह फिट करने में कई बार रंगे हाथ पकड़ी जाती रही है। गुजरात मोदी के सीएम रहते संघ परिवार का मॉडल राज्य रहा है। सबको पता है कि वहां 2002 के दंगों से लेकर फर्जी एनकाउंटर तक में मुसलमानों के साथ भाजपा का कितना खुला पक्षपात सामने आया है?

इतना ही नहीं मक्का मस्जिद हो समझौता एक्सप्रैस बम विस्फोट या मालेगांव धमाका, उनमें जो भी हिंदू आतंकवादी आरोपी थे।
उनको एक सुनियोजित योजना के तहत आरएसएस और भाजपा की सरकारें बारी बारी से बचाने का अभियान चला रही है। यह सब कुछ इतने दुस्साहस और खुलेआम किया जा रहा है कि इन मामलों की सरकारी वकील तक ने यह बात सार्वजनिक कर दी थी कि उन पर साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को गैर कानूनी तरीके से बचाने का मोदी सरकार की जांच एजेंसियां दबाव बना रही हैं। इतना ही नहीं गुजरात में भी दंगों और फर्जी एनकाउंटर के हिंदू आरोपियों को एक एक कर नियम कानून ताक पर रखकर ज़मानतें दी जा रही हैं।
मुस्लिम तुष्टिकरण का रोना रोने वाली भाजपा ने यूपी के चुनाव में 20 फीसदी आबादी वाले मुस्लिम समाज के एक भी आदमी को अपना केंडीडेट तक नहीं बनाया है। इसके उलट जिस आदमी ने भारत सरकार की मुंबई सीरियल बम विस्फोट मामले में अपने परिवार से बगावत करके आरोपियों को सज़ा दिलाने में मदद की और उसको देश वापस लाने के लिये वायदा माफ गवाह बनाने का झांसा दिया गया। उस याकून मेमन को रातो रात देश के सारे सेकुलर दलों बुद्धजीवियों और मानवतावादी संगठनों के विरोध के बावजूद फांसी पर चढ़ा दिया गया।
ऐसे एक नहीं अनेक मामले हिंदू आरोपियों के पक्ष और मुस्लिमों के खिलाफ पूर्वाग्रह से लिये जाने के यहां थोक में गिनवाये जा सकते हैं। इससे ऐसा लगता है कि मोदी भाजपा और संघ का असली मकसद मुस्लिमों के तुष्टिकरण के बहाने अपने हिंदू पक्षपात को जारी रखना है।
*दूसरों पर तब्सरा जब किया कीजिये,*
*आईना सामने रख लिया कीजिये।।*

नफ़रत तो बुरी ही होती है...

देसी हो विदेशी नफ़रत तो बुरी है!

 

 

 

फर्स्ट अमेरिकन। बी अमेरिकन। बाय अमेरिकन। जब अमेरिका के प्रेसीडेंट के चुनाव में ट्रंप ने यह नारा दिया था। जानकार तभी समझ गये थे। यह नारा अमेरिका में न केवल विदेशियों के लिये नफ़रत पैदा करेगा बल्कि मुसलमानों अश्वेतों और महिलाओं को भी अपनी ज़द में लेगा। जो लोग भारत में भी स्वदेशी के नारे के साथ अंधराष्ट्रवाद की बात करते रहे हैं। उनकी आंखे अमेरिका के कंसास में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास कुथीमोतला की हत्या के बाद खुल जानी चाहिये।
यह हत्या रंगभेद की भावना का ही विस्तार है। भारतीय इंजीनियर की हत्या करने वाला श्वेत अमेरिकी नागरिक एडम प्यूरिटन कुथीमोतला पर गोली चलाते हुए चिल्ला रहा था ‘‘मेरे देश से दफा हो जाओ’’। हालांकि आर्थिक संरक्षणवाद इसकी बड़ी वजह है। यूरूपीय यूनियन से ब्रिटेन का निकलना भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी रहा है। सुरक्षा को आतंकवाद से पैदा हुए ख़तरे को देखते हुए यही घृणा का रूजहान मुसलमानों के प्रति और भी भयावह है। आपको याद होगा।
चुनाव के दौरान ट्रंप ने भारतीय प्रवासियों के हिंदू संगठन रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन के प्रोग्राम में बड़े उत्साह के साथ हिस्सा लिया था। उन्होंने वहां यह भी दावा किया था कि वे हिंदुओं से बहुत प्यार करते हैं। लेकिन सबको पता है कि चुनाव के दौरान नेता ऐसी बड़ी बड़ी लुभावनी बातें करते ही हैं। अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं है। हालांकि यह संतोष और गर्व की बात है कि अमेरिकी सीनेट में पहली बार भारतीय मूल की कमला हैरिस चुनी गयी हैं।
इतना ही नहीं प्रमिला जयपाल, रौ खन्ना, अमि बेरा और राजा कृष्णामूर्ति पहले से ही प्रतिनिधि सभा में शामिल हैं। ट्रंप की आव्रजन नीति का ये शुरू से ही विरोध भी कर रहे हैं। ये सब डेमोक्रेट हैं। वहां भारतीय मूल के लोगों की आबादी एक प्रतिशत है। अब सीनेट में भी उनका प्रतिनिधित्व आबादी के बराबर हो गया है। लेकिन बहुमत के सामने इनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की बनकर रह गयी है।
सवाल यह है कि जो मोदीभक्त कल तक ट्रंप के जीतने के लिये इस लिये हवन और धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे क्योेंकि वे लगातार मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगल रहे थे। उनको अब भारतीय इंजीनियर की दुखद हत्या के बाद यह बात समझ में आ जानी चाहिये कि घृणा और अंधराष्ट्रवाद का कोई धर्म नहीं होता। नफरत का अभियान देसी हो या विदेशी लेकिन वह बुरी ही साबित होती है। मिसाल के तौर पर ट्रंप जिस दिन विदेशी मूल के लोगों के लिये जारी होने वाले वीज़ा एच 1 बी पर अपनी नई नीति का ऐलान करेंगे।
लाखों भारतीयों को अपनी नौकरी से न केवल हाथ धोना पड़ेगा बल्कि उनको अमेरिका भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं भविष्य में भारतीयों को अमेरिका में नौकरी उस तरह आराम से नहीं मिलंेगी जैसे पहले थोक में अपनी योग्यता के बल पर मिलती थीं। अगर आपने मारे गये भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास की शोकसंतप्त पत्नी का वह बयान पढ़ा हो जिसमें उन्होंने अमेरिकी सरकार से सभी गैर श्वेतों की रक्षा की मांग की है तो आपको यह भी समझ में आ जायेगा कि जिस तरह से हमारे अपने देश में असहिष्णुता का माहौल बनाया गया है।
उसका नतीजा भी अच्छा नहीं होने वाला। मोदी सरकार बनने के बाद इस नफरत का लगातार विस्तार हुआ है। कुछ हिंदूवादी संगठन और उग्र युवा बात बात पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। पहले उनके निशाने पर केवल मुसलमान ही होते थे। लेकिन अब वामपंथी तार्किक प्रगतिशील वैज्ञानिक और निष्पक्ष सोच के हिंदू भी उनका आयेदिन शिकार हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो बाकायदा 10 लाख लोगों की एक ट्रॉल आर्मी बनी हुयी है।
जो किसी भी मानवतावादी और तर्कशील तटस्थ लेखक कवि पत्रकार और कलाकार के यह कहते ही हाथ धोकर पीछे पड़ जाती है कि संघ परिवार मोदी समर्थकों को हिंदू तालिबान के नक्शे कदम पर ले जा रहा है। एक तरह से देखा जाये तो इस मामले में दो पैमाने नहीं बनाये जा सकते। अगर अमेरिका में वहां की ट्रंप सरकार का यह रूख़ गलत है तो हमारे यहां जो उग्र हिंदूवादी रूख अपनाया जा रहा है। वह भी ठीक नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपनी लड़की की शादी में तो दहेज़ को सामाजिक बुराई बताकर पल्ला झाड़ लें। लेकिन लड़के की शादी में कन्या पक्ष से दहेज़ की मांग करें। ऐसे विरोधाभास समाज और देश दोनों के लिये ही हमेशा नुकसानदाय साबित हुए हैं।
0 मुहब्बत का पता लगने मंे तो कई साल लगते हैं,
ये नफरत है जिसे दुनिया पल में जान लेती है।