Sunday, 24 April 2022

योगी की पहल

*मुख्यमंत्री योगी की यह सराहनीय पहल सबके हित में है!*

0यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी ने दोबारा राज्य का कार्यभार संभालने के बाद पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पहली मुलाक़ात में प्रदेश में एकता भाईचारा और अमनचैन बनाये रखने के लिये जो व्यापक दिशा निर्देश दिये हैं। उनकी सराहना करना इसलिये भी ज़रूरी है क्योंकि इस समय तमाम दूसरे राज्यों में जिस तरह से धार्मिक जुलूसों को लेकर विभिन्न वर्गों में हिंसा और दंगे हुए हैं। वैसा यूपी में ना हो इसके लिये जिस तैयारी इच्छाशक्ति और निष्पक्षता की आवश्यकता है। उसको योगी जी ने समय रहते समझकर जिस तरह के एहतियाती क़दम उठाये हैं। वे उनकी इस बात को भी सही साबित करते हैं कि यूपी में 800 से अधिक धार्मिक जुलूस निकले लेकिन कहीं से टकराव या दंगा तो दूर कहासुनी तक की ख़बर नहीं है।    

       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      राजनीतिक रूप से हम सब किसी पार्टी का समर्थन या विरोध कर सकते हैं। यह हम सबकी संवैधानिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन सरकार सबकी होती है। अगर कोई सरकार गलत काम करती है तो उसकी आलोचना होती है। होनी भी चाहिये। लेकिन अगर कोई सरकार अच्छा काम करती है तो उसकी सराहना भी करनी चाहिये। अगर कोई विरोध के लिये विरोध और समर्थन के लिये समर्थन करता है तो वह निष्पक्ष ना होकर अंधभक्त कहलाता है। ऐसा करने वाला पत्रकार भी नहीं हो सकता वह पक्षकार कहलाता है। फिर वह चाहे किसी भी पार्टी किसी भी सोच या किसी भी बड़े से बड़े नेता का अंधभक्त ही क्यों ना हो? मिसाल के तौर पर यूपी में जब से योगी सीएम बने हैं। उन्होंने जो भी काम किये हैं। उनसे कुछ लोग सहमत हो सकते हैं। कुछ लोग असहमत भी हो सकते हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं। जिनसे असहमत होने या विरोध करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। मिसाल के तौर पर सीएम और सांसद बनने से पहले गोरखपुर मठ के मुखिया रहे योगी ने जिस तरह से यह अंधविश्वास तोड़ा कि जो सीएम नोएडा का दौरा कर लेता है। वह फिर से यूपी का चुनाव नहीं जीत पाता, वह एक सराहनीय उदाहरण है। इसके साथ ही उनकी छवि एक सख़्त प्रशासक की बनी है। यह अलग बात है कि यह छवि बनाने में कभी कभी उनके पुलिस प्रशासन ने ऐसी अतिरिक्त शक्ति और अवांछित उत्साह का परिचय दिया जिससे उनकी सरकार पर विपक्ष ने तरह तरह के आरोप भी लगाये। लेकिन यह पहले भी होता रहा है। हाल ही में इसी तरह की कई शिकायतें मिलने पर सीएम योगी ने पुलिस प्रशासन को दो टूक आदेश दिये थे कि माफिया या गैंगेस्टर कुख्यात अपराधियों के सिवा गरीब या व्यापारियों पर लगने वाले मामूली अपराध के आरोपों में बुल्डोज़र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। इसी तरह उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न जुलूस और शोभायात्राओं में आयेदिन हो रहे विभिन्न वर्गों के टकराव को देखते हुए यूपी में ऐसे आयोजनों को लेकर व्यापक दिशा निर्देश जारी कर दिये। इनमें साफ साफ कहा गया है कि कोई भी नया जुलूस नहीं निकाला जायेगा। साथ ही हर जुलूस को निकालने के लिये प्रशासन से अनुमति लेनी अनिवार्य होगी। इतना ही नहीं आयोजकों को इस आश्य का शपथपत्र भी पुलिस को देना होगा कि वे कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे साम्प्रदायिक सौहार्द या कानून का उल्लंघन हो। इस तरह के आयोजनों को लेकर और भी कई शर्तें और नियम कड़ाई से लागू करने की बात कही गयी है। साथ ही यह भी स्पश्ट कर दिया गया है कि पुलिस प्रशासन इस तरह के मामलों में पूरी तरह से निष्पक्ष और कानून के हिसाब से काम करेगा। किसी भी पक्ष को नियम कानून से छूट या मनमर्जी से कुछ भी असामाजिक या अपराधिक करने की स्वतंत्रता किसी भी हालत में नहीं दी जायेगी। इसके बावजूद अगर कोई कानून हाथ में लेगा तो उस पर सख़्त कार्यवाही की जायेगी। इतना ही नहीं योगी जी ने अपने दिशा निर्देशों में भविष्य में विवाद का कारण बनने वाले अन्य मामलों में भी बखूबी अग्रिम संज्ञान लिया है। उनका कहना है कि किसी भी धर्मस्थल पर लगे लाउड स्पीकर नियम अनुसार ही प्रयोग किये जा सकेंगे। नियम से मतलब यह है कि इसके लिये पुलिस प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। साथ ही इनकी आवाज़ का एक निर्धारित डेसिबल होगा। सुप्रीम कोर्ट के पहले से ही दिये दिशा निर्देश के मुताबिक रात 10 बजे के बाद और सुबह 6 बजे से पहले किसी भी सूरत में लाउड स्पीकरों का इस्तेमाल किसी भी धार्मिक स्थल पर प्रतिबंधित रहेगा। नये आदेश में यह भी कहा गया है कि पुलिस प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि किसी भी धार्मिक स्थल से पूजा पाठ या नमाज़ आदि की आवाज़ उस स्थल के अंदर तक ही सीमित रहे। हालांकि अभी केवल नोएडा में पुलिस ने कुछ धार्मिक स्थलों को इस बाबत अवगत कराया है। लेकिन आशा है कि ईद के बाद पूरे प्रदेश में इस आदेश पर अमल होने लगेगा। फिलहाल मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और उससे लगी ज्ञानवापी मस्जिद में वहां के आयोजकों ने खुद ही या तो लाउड स्पीकर उतार दिये हैं या फिर उनकी आवाज़ काफी कम कर दी गयी है। इतना ही नहीं सीएम योगी के गृहनगर और उनके मठ गोरखनाथ धाम में भी ऐसी ही मिसाल पेश की गयी है। यह अपने आप में सुखद और सराहनीय पहल है कि सरकार के आदेश को लागू करने के लिये पुलिस प्रशासन को कहीं भी सख़्ती या दंडात्मक कार्यवाही करने की ज़रूरत शायद नहीं होगी। जागरूक नागरिक और प्रगतिशील सिविल सोसायटी समय की ज़रूरत समझते हुए लगता है पूरे प्रदेश में ही कुछ समय में ऐसे लाउड स्पीकर या तो खुद ही उतार देेंगे या उनकी आवाज़ इतनी कम कर देंगे जिससे दूसरे वर्ग के लोगों को कोई कष्ट ना हो। सीएम योगी की यह पहल एक तरह से फ़साद की जड़ खत्म करने जैसा है। हम लोग आज 21 वीं सदी मेें जी रहे हैं। हम सबको यह समझना चाहिये कि आपसी प्रेम भाईचारे और शांति के बिना ना तो कोई समाज प्रगति कर सकता है और ना ही सदा लड़ता टकराता घृणा करता और पक्षपात व हिंसा के साथ आगे बढ़ सकता है। हम सबको सह अस्तित्व और पूरी दुनिया को परिवार मानने का अपना दावा कार्यान्वित करके विश्व के सामने एक उदाहरण रखना होगा। अन्यथा हम सब अपना आर्थिक नुकसान बढ़ाने को अभिषप्त होेंगे।                                          

 *0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

Saturday, 16 April 2022

बाबूजी

*स्व. श्री बाबूसिंह चैहान साहब की मिशनरी पत्रकारिता बेमिसाल!*
0दैनिक बिजनौर टाइम्स रोज़ाना ख़बर जदीद और चिंगारी दैनिक के संस्थापक प्रकाशक और प्रथम संपादक व वरिष्ठ जनवादी लेखक स्व. श्री बाबूसिंह चैहान साहब ने बिजनौर जि़ले एवं पश्चिमी यूपी के आसपास के क्षेत्रों को मात्र ये अख़बार ही नहीं दिये थे। बल्कि इन समाचार पत्रों के ज़रिये मिशनरी पत्रकारिता का एक पौधा भी लगाया था। जो आज बड़ा वृक्ष बनकर लहलहा रहा है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिन उसूलों मक़सद और मंजि़ल के लिये बाबूजी ने कांटों भरा सफ़र तय किया। आज समाज सरकार और देश के मुख्यधारा के मीडिया ने उन जनहित के मुश्किल रास्तों को छोड़कर अवसरवाद पूंजीवाद और झूठ व नफ़रत का शाॅर्टकट से लाभ का रास्ता अपना लिया है।
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
   आज से 23 साल पहले यानी इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले
चैहान साहब अकसर कहा करते थे कि आज दुनिया पंूजीवाद के रास्ते पर चल रही है। जिससे हमारा देश भारत भी अछूता नहीं रह सकता। वे यह भी कहा करते थे कि हम अपने अख़बारों को मिशनरी पत्रकारिता के तौर पर चला रहे हैं और आगे भी तमाम चुनौतियां और नुकसान उठाकर चलाते रहेंगे। लेकिन जो बड़े कारोबारी घराने अपने अख़बार पत्रिकायें या टीवी चैनल व्यवसायिक लाभ के लिये चला रहे हैं। वे कम से कम न्यूनतम सामाजिक नैतिक और निष्पक्षता के मापदंड तो अपनायें। उनका कहना था कि कारोबार करना बुरी बात नहीं है। ना ही कारोबार से लाभ कमाने की इच्छा रखना गलत है। लेकिन ख़बरें और लेख सच व तथ्यों पर ही आधारित होने चाहियें। बाबूजी का दो टूक कहना था कि आप अपने मुनाफे या सत्ता में बैठे आकाओं व अफसरों से बेजा लाभ लेने को झूठ नफरत और असामाजिक विषय वस्तु नहीं परोस सकते। उनका मशवरा था कि आप बेशक मीडिया को बिज़नेस के तौर अपनायें लेकिन उसको पूरी ईमानदारी सच्चाई और निष्पक्षता से करें। वे अकसर पत्रकारों के कार्यक्रमों जनसभाओं और गष्ठियों में कहा करते थे कि आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन पूंजीपतियों धनवानों और काॅरपोरेट ग्रुप्स को पत्रकारिता की एबीसीडी नहीं पता, वे बड़े बड़े पत्रकारों संवाददाताओं और लेखकों को वेतन पर रखकर यह बता रहे हैं कि वे ख़बर और लेख कैसे लिखें? किसके पक्ष और किसके खिलाफ लिखें? यहां तक कि उनको झूठ और नफरत परोसने में भी कोई बुराई नज़र नहीं आती अगर उनको इसका लाभ मिल रहा होता है। हालांकि यह वह दौर था जब चैहान साहब शुरूआती दौर में ही पहचान रहे थे कि हमारे देश में जब 1991 में एल पी जी यानी लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल नीतियां लागू कर पूंजीवाद के लिये सरकारें देश के दरवाजे़े ही नहीं बल्कि खिड़की और रोशनदान तक पूरी शिद्दत से खोलने में लगीं थीं। बाबूजी तभी उस ख़तरे को भांपकर आगाह कर रहे थे कि यह रास्ता विनाश का है। उनका कहना था कि अगर मीडिया पूंजी का गुलाम हो जायेगा। सरकार उस पर पूंजीपतियों पर नकेल डालकर अपना एजेंडा थोपने लगेगी तो फिर मिशनरी पत्रकारिता करना लोहे का चना चबाने जैसा हो जायेगा। जो सब नहीं कर पायेंगे। धीरे धीेरे लघु और मीडियम क्लास अखबार बंद होने लगेंगे। उनके लिये दोहरा संकट खड़ा हो जायेगा। एक तो वे बड़े मीडिया हाउस के पत्र पत्रिकाओं और रंगीन टीवी चैनलों के मुकाबले लंबे समय तक टिक नहीं पायेंगे। दूसरे सरकार की निर्भरता जब उनका प्रसार कम होते जाने से उनपर घटने लगेगी तो आगे चलकर बड़े बड़े काॅरपोरेट घरानों का मेन स्ट्रीम मीडिया पर कब्ज़ा हो जायेगा। जो देश के आम आदमी ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिये भी एक बड़ा ख़तरा बन सकता है। आज बाबूजी की वो आशंका सच होती नज़र आने लगी है। विपरीत हालात और आर्थिक तंगी के बावजूद मिशनरी पत्रकारिता का साहसिक रास्ता न छोड़ने वाले गिने चुने अख़बार और चैनलों में बि.टा. ग्रुप को सबसे आगे रखने में श्री चंद्रमणि रघुवंशी और श्री सूर्यमणि रघुवंशी आज भी ‘‘गुरूकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन न जाई’’ को निभा रहे हैं। जो वचन उन दोनों ने अपने पिताश्री को उनके जीते जी दिया था। जनहित की जो पत्रकारिता चैहान साहब अपने विषम समय में भी कर गये वो आज के पत्रकारों के लिये मशाल का काम कर रही है। बिजनौर टाइम्स और चिंगारी के ज़रिये उन्होंने जनपद बिजनौर को आवाज़ प्रदान की। उनके ललित निबंध ‘दर्पण झूठ बोलता है’, हों या उनकी चर्चित ख़बर ‘भूखा मानव क्या करेगा?’ उनके व्यक्तित्व का आईना रहे हैं।  हालांकि उनके जीते जी भी और आज भी बिजनौर टाइम्स ग्रुप पर लेखनी से समझौता करने के बार दबाव आये लेकिन इस ग्रुप ने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। चैहान साहब की कलम ने हमेशा बेबाक लिखा और सच लिखा। उनकी इसी साफगोई और निडरता से ही उनको कई राष्ट्रीय और इंटरनेशनल पुरस्कार व सम्मान भी मिले। उनको एक बार नहीं अनेक बार विदेश भ्रमण पर सरकारी प्रतिनिधि मंडल मंे जाने का सम्मान भी हासिल हुआ। विदेश दौरों से लौटकर उन्होंने अपने यात्रा संस्मरण भी कई माह तक किश्तों में लिखे। जब जनपद वासियों की प्यास इन संस्मरणों से भी नहीं भरी तो उन्होंने जनता की अपील पर सीध्ेा संवाद कर नगर नगर और गांव गांव अपनी यात्रा का आंखो देखा हाल सीध्ेा बयान किया। सबसे बड़ी बात यह थी कि जहां उनके प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य बड़े बड़े नामचीन पत्रकारों में अधिकांश विदेश जाकर घूमते फिरते और मौज मस्ती करते थे। वहीं चैहान साहब विदेशांे की लाइब्रेरी म्यूजि़यम और वहां के लोगों से संवाद करने में अपना अधिकांश समय बिताते थे। इसके साथ ही न केवल इन सब बातों पर समय लगाते थे बल्कि जब सब साथी रात में चैन की नींद सो जाते थे। बाबूजी रात रात भर जागकर दिन भर की बातों को कलमबंद करते थे। उन दिनों कम्पयूटर स्मार्टफोन और इंटरनेट का दौर तो था नहीं। इसलिये सारे दिन का हाल अपने हाथ से कलम से ही डायरी मेें नोट करना होता था। कमाल और हैरत की बात यह थी कि चैहान साहब हर समय रिपोर्टिंग और कलम काॅपी का इस्तेमाल नहीं करते थे। लेकिन फिर भी 24 घंटे की एक एक बात अपनी तेज़ याददाश्त के बल पर हू ब हू शब्दों में बयान कर देते थे। हमेें याद है मंदिर मस्जिद आंदोलन के दौरान जब 1990 के दशक में आज की तरह चंद अख़बारों मेें झूठी साम्प्रदायिक और भड़काउू रिपोर्टिंग की गई थी तो चैहान साहब चट्टान की तरह उनके रास्ते में विरोध जताने को खड़े हो गये थे। उन्होंने अपनी सोच के निष्पक्ष और निडर सेकुलर पत्रकारों के साथ मिलकर ऐसी घटिया फेक और पेड न्यूज की न केवल निंदा की बल्कि उनको घसीटकर पै्रस कौंसिल में ले जाने वालों का समर्थन किया। बाद में जांच होने पर दोषी पाये गये झूठे अख़बारों की प्रैस कौंसिल ने भी निंदा की और भविष्य में ऐसी भूल न दोहराने की चेतावनी दी। अंत में यही कहा जा सकता है कि चैहान साहब भले ही आज मौजूद नहीं हैं। लेकिन यह संतोष की बात है कि बिजनौर टाइम्स और चिंगारी के रूप में उनके विचारों की मशाल उनके सुपुत्र चांद और सूरज की तरह रोशन किये हुए हैं। अगर मिशनरी पत्रकारिता को जीवित रखना है और चैहान साहब को सच्ची श्रध््दांजलि अर्पित करनी है तो न केवल बिजनौर टाइम्स परिवार रघुवंशी बंधु इस ग्रुप से जुड़े पत्रकार बल्कि पूरे समाज को उन मूल्यों की रक्षा करनी होगी जिनके लिये पूरे जीवन बाबूजी निडरता और समर्पण से कड़ा संघर्ष करते रहे थे।
0 मैं यह नहीं कहता कि मेरा सर ना मिलेगा,
 लेकिन मेरी आंखों में तुझे डर ना मिलेगा।।        
  *(लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाॅम के ब्लाॅगर और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)*

विवादित सपा

*विवादों से घिरी सपा का भी भगवान ही मालिक है?*

0 यूपी के चुनाव मंे कांग्रेस और बसपा का सूपड़ा पूरी तरह साफ़ होने के बारे में तो काफी चर्चा हो रही है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल बनी सपा का वोट 22 से 32 प्रतिशत और सीट 47 से 125 होने पर यह सच छिप गया है कि उसको भी यादव और मुसलमानों के अलावा लगभग सभी अन्य हिंदू जातियों ने नकार दिया है। इसकी बहुत सी वजह हो सकती हैं। लेकिन सपा के माथे पर अपने विगत कार्यकाल में लगे अनेक आरोप उसका पीछा नहीं छोड़ पा रहे हैं। इतना ही नहीं अखिलेश ने पिछले दिनों एमएलसी के चुनाव में जिस तरह 34 में से 21 प्रत्याशी यादव उतारे उससे एक बार फिर यह चर्चा तेज़ हुयी है कि सपा समाजवादी यानी सर्व समाज की तो क्या उन मुसलमानों को भी बराबर प्रतिनिधित्व नहीं देती जिन्होंने उसे एकतरपफा वोट दिये।  

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      सपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक बार फिर अखिलेश और शिवपाल में टकराव शुरू हो गया है। यह लगभग तय है कि शिवपाल आज नहीं तो कल भाजपा में जा सकते हैं। इसके साथ ही यह भी साफ नज़र आ रहा है कि शिवपाल अपने साथ सपा संगठन और यादव जाति का काफी बड़ा हिस्सा सपा से तोड़कर भाजपा में ले जायेंगे। आने वाले लोकसभा के चुनाव में आप देखेंगे कि यादव समाज का 2019 के लोकसभा चुनाव से भी बड़ा वर्ग भाजपा के साथ जायेगा। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यादव वोट के चाचा भतीजे के गुटों में बंटवारा होने से भाजपा को दो तिहाई बहुमत जीतने में आसानी हो गयी थी। हालांकि किसी भी दल में इस तरह के मतभेद होना जीवंत लोकतंत्र की पहचान मानी जाती है। लेकिन यहां मतभेद नहीं मनभेद का मामला है। साथ ही अखिलेश और शिवपाल में यह टकराव किसी स्तर पर भी वैचारिक नहीं है। शिवपाल को लगता है कि जिस तरह से वे कई दशक से मुलायम सिंह के साथ मिलकर सत्ता और संगठन चला रहे थे। जब मुलायम सिंह ने राजनीति से सन्यास लिया तो उनका पहला हक़ विरासत पर बनता था। लेकिन मुलायम ने पुत्र मोह में यह ताज अखिलेश के सर पर रख दिया। मुलायम सिंह चूंकि बहुत घाघ और मंझे हुए नेता हैं। इसलिये उन्होंने शिवपाल की जगह अखिलेश को उत्तराधिकार सौंपते हुए यह नाटक किया जैसे वे तो शिवपाल के साथ हों और उनको ही सपा और सत्ता की कमान सौंपना चाहते हों। लेकिन अखिलेश ऐसा उनको करने नहीं दे रहे हों?जबकि सच यह है कि मुलायम सिंह ने सोची समझी रण्नीति के हिसाब से जिस दिन अखिलेश को सीएम बनाने का एलान किया था। उसी दिन सपा से भी शिवपाल का दख़ल अमल खत्म होना तय हो गया था। इतिहास गवाह है कि संगठन सत्ताधारी गुट के साथ ही जाता है। दूसरी तरफ शिवपाल की एक मजबूरी मायावती की तरह और भी है। उन्होंने मंत्री रहते जितने उल्टे सीध्ेा काम कर रखे हैं। अगर सपा इस बार सत्ता में आ जाती तो उनकी जान बची रहती या फिर वे भाजपा में चले जायेंगे तो उनको गांगा की तरह पाक साफ मान लिया जायेगा। फिलहाल हम इस मामले की और अधिक गहराई मंे नहीं जायेंगे। इस पर फिर कभी विस्तार से लिखेंगे। सवाल यह है कि सपा का भविष्य क्या है? यह तय है कि अगर बसपा की तरह सपा के सत्ता में आने की संभावना चुनाव दर चुनाव कम होती जायेगी तो उसका कोर वोट बैंक भी बसपा के दलित की तरह दूसरे विकल्प तलाशने शुरू कर देगा। जहां तक यादवों का सवाल है। उनको भाजपा में जाने में कोई विशेष परेशानी न तो पहले कभी थी न ही आगे होने वाली है। सपा का दूसरा सबसे मज़बूत और यादवों से भी बड़ा वोटबैंक मुसलमान इस बार उसको इतिहास का सबसे अधिक वोट देकर भी उसके सरकार ना बना पाने से काफी परेशान उदास और बेचैन नज़र आ रहा है। उधर बहनजी बार बार मुस्लिम समाज को जानबूझकर इस भूल का एहसास कराने के नाम पर गुमराह कर रही हैं कि उनको अगर भाजपा को हराना था तो सपा के साथ नहीं बल्कि बसपा के साथ आना चाहिये था। मायावती यह भी याद दिला रही है कि उनका दलित वोटबैंक यादवों से दो गुना है। उनका यह कहना भी किसी हद तक सही लगता है कि अगर मुसलमान पूरी तरह बसपा का साथ देते नज़र आते तो दलित वोट का जो हिस्सा भाजपा के साथ चला गया वह भी बसपा के साथ मज़बूती से बना रहता। उनकी इस बात में भी दम है कि संघ परिवार ने कानो कान यह प्रोपेगंडा करके कि वह चुनाव बाद मायावती को राष्ट्रपति बनायेगा, दलित समाज को बहकाकर उनका कुछ वोट धोखे से भाजपा को दिला दिया। लेकिन इन सब बातों के बावजूद मायावती कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इस आरोप का अभी तक ठीक से जवाब नहीं दे पा रही हैं कि उनको भाजपा ने जांच के नाम पर जेल भेजने का डर दिखाकर इस चुनाव में चुपचाप घर बैठने को मजबूर किया था। दूसरी बात मायावती यह समझने को तैयार नहीं है कि मुसलमानों को छोड़ो उन पर आज उनका वफादार दलित वोट बैंक भी भरोसा ना कर भाजपा के साथ जा रहा है। हमें लगता है कि भाजपा की बी टीम मानी जाने वाली बसपा को मुसलमान औवेसी की एमआईएम की तरह आगे भी भाव नहीं देगा। जहां तक सपा का सवाल है। उससे भी मुसलमानों का मोहभंग होना शुरू हो सकता है क्योंकि केवल सीट व वोट बढ़ने या विपक्ष में रहने से ही अगर काम चल जाया करता तो दिल्ली और पंजाब मंे भाजपा विरोधी मतदाता कांग्रेस को छोड़कर आप का रूख़ ना करते। सपा की सत्ता में रहते जो छवि यादववादी जातिवाद मुस्लिम धार्मिक तुष्किरण परिवारवाद करप्शन घोटाले और कमज़ोर लाॅ एंड आॅर्डर को लेकर बनी है। वह आगे भी टूटती नज़र नहीं आ रही है। अखिलेश जिस तरह से 2017 का चुनाव हारने के बाद चुपचाप घर बैठकर ट्विटर पर कुछ चुनिदा मुद्दों पर ट्वीट कर डिजिटल पाॅलिटिक्स करते रहे हैं। उससे आगे भी सपा का भगवान ही मालिक है। अखिलेश ने अपने सबसे बड़े मुस्लिम वोट बैंक के लिये इतना भी नहीं किया कि वे सीएए के खिलाफ उनके आंदोलन का खुलकर समर्थन करते या धरने प्रदर्शन मंे उनके साथ सड़क पर उतरते। साथ ही सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सांसद आज़म खान को जिस तरह से भाजपा सरकार ने जानबूझकर निशाने पर लिया, अखिलेश उस पर भी प्रतीकात्मक विरोध करते रहे। मुसलमानों की एक के बाद एक हो रही माॅब लिंचिंग पर भी अखिलेश बहुत बच बचकर औपचारिक बयान देकर खानापूरी करते नज़र आये। महंगाई किसान व्यापारी बेरोज़गारी लगातार गिरती अर्थव्यवस्था लचर कानून व्यवस्था और दलित उत्पीड़न पर भी अखिलेश जिस तरह होंट सीकर बैठे रहे। उससे सपा का आगे भी भविष्य उज्जवल नज़र नहीं आ रहा है। हालांकि उन्होंने जिस सूझबूझ से आज़मगढ़ की सांसदी छोड़कर अब यूपी में नेता विपक्षी दल बनकर ज़रूरी मुद्दों पर ज़बान खोलनी शुरू की है। वह उम्मीद जगाता है।                                       

*0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

बाबा साहब

*विडंबनाः बाबा साहब को मानते हैं, बाबा साहब की नहीं मानते?*


014 अपै्रल को बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर की जयंती थी। पूरे देश में यह दिन बड़े ध्ूामधाम से मनाया गया। खासतौर पर सरकारों ने इस दिन बहुत आडंबर किये। इसके पीछे दलित समाज को खुश करने का नाटक अधिक था। लेकिन बाबा साहब ने भारत का जो संविधान बनाया था। उस पर कोई चलने को तैयार नहीं है। यह ठीक ऐसी ही बात है जैसे हिंदू समाज पूरे विश्व को एक परिवार बताता है। लेकिन जब वर्ण व्यवस्था और अल्पसंख्यकों का सवाल आता है तो इसका एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ खुलेआम खड़ा हो जाता है। ऐसे ही मुसलमान इस्लाम की बड़ी बड़ी बातें करते हैं। लेकिन जब अमल की बात आती है तो पैगं़बर का सब्र छोड़कर कई जगह रामनवमी के जुलूस में कुछ सिरफिरों के उकसाने पर चंद पत्थर उछालकर खुद मुसीबत मोल ले लेते हैं।     


                  -इक़बाल हिंदुस्तानी


      कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है। चुनी हुयी सरकारें हैं। पुलिस है। कोर्ट हैं। जांच एजेंसियां हैं। मीडिया हैं। संविधान है। चुनाव आयोग सूचना आयोग मानव अधिकार आयोग अल्पसंख्यक आयोग सीबीआई और ईडी जैसी कथित स्वायत्त संस्थायें हैं। यानी कानून का राज बताया जाता है। लेकिन वास्तव में क्या सब नागरिकों के अधिकार समान हैं? व्यवहार में तो ऐसा बिल्कुल भी नज़र नहीं आता है। विडंबना यह है कि हमारे पीएम सीएम एमपी एमएलए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सभी संविधान की शपथ लेकर अपने पद ग्रहण करते हैं। लेकिन हम देख रहे हैं कि कई मामलों में आयेदिन इस शपथ के विपरीत वे आजकल पूरी निडरता और क्रूरता से काम करने में हिचक नहीं रहे हैं। विधानमंडलों में पक्षपातपूर्ण कानून बनाने से लेकर पुलिस के द्वारा अपने विरोधी लोगों को टारगेट करने में अब उनको ज़रा भी लज्जा नहीं आती है। क्या संविधान इसकी इजाज़त देता है? नहीं देता तो आप डा. अंबेडकर को काहे झूठमूठ की श्रध्दांजलि का नाटक करते हो? अब एक नया संविधान विरोधी चलन देखने में आ रहा है कि अगर किसी पर दंगा या किसी अपराध का आरोप लगता है तो उस पर अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस प्रशासन सत्ता में बैठे अपने आकाओं का राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये उसके घर या दुकान व अन्य प्रोपर्टी पर बुल्डोज़र चलवा देता है। क्या कानूनन बिना नोटिस दिये कोई सरकार ऐसा कर सकती है? नहीं कर सकती। यूपी में तो सीएम येागी ने यह कहकर इस तरह के मामलों पर कुछ हद तक रोक लगा दी है कि केवल कुख्यात अपराधियों पर ही बुल्डोज़र की कार्यवाही की जाये, गरीबों पर बिल्कुल नहीं। एमपी में हालत यह है कि तीन लोग जो पहले से एक मामले में जेल में थे। उनके खिलाफ भी मुकदमा लिखा गया। उनमें से एक का घर भी बुल्डोज़र से तोड़ दिया गया। सवाल यह भी है कि जिन पर भी दंगे या सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहंुचाने पथराव या अन्य कोई अपराध का आरोप लगा।उनके घर के दूसरे सदस्य कैसे अपराधी हो गये? घर में तो आरोपी के साथ साथ पूरा परिवार रहता है। क्या बुल्डोज़र चलाये गये सभी घरों की रजिस्ट्री यानी मालिक वही आरोपी था। जिनका बताकर मकान तोड़ा गया है? अगर ये घर गैर कानूनी ज़मीन या गैर कानूनी तरीके से बिना नक़्शा पास कराये बनाये गये थे तो पहले ही क्यों नहीं तोड़े गये थे? आज दंगा होने पर एक वर्ग विशेष को सबक सिखाने और एक वर्ग विशेष को तुष्टिकरण कर उनसे थोक में वोट लेकर अनैतिक तरीके से एक साल में होने वाले चुनाव मंे चुनाव जीतने को यह सब सोची समझी योजना के तहत करने का विपक्ष का आरोप सही नज़र नहीं आ रहा है? अपवाद के तौर पर कभी कहीं हो जाता तो इन हरकतों को नज़र अंदाज़ भी किया जा सकता था। लेकिन ऐसा एक दो बार नहीं एक दो राज्यों में नहीं कई राज्यों में एक पार्टी की सरकारें लगातार कर रही हैं तो क्या इसे कानून का राज कहा जा सकता है? क्या इसे संविधान का राज कहा जा सकता है? क्या ऐसा करने वाले बाबा साहब के समर्थक हो सकते हैं? अगर किसी को लगता है कि वे ऐसा करके सही कर रहे हैं तो उनको चाहिये कि वे लोकतंत्र का दिखावा भी बंद कर दें। चुनाव का नाटक का भी ना किया करें। संविधान की शपथ भी ना लिया करें। स्वायत्त संस्थाओं को भी भंग कर दें। तत्काल इमरजैंसी का ऐलान कर दें। पूरी तरह तानाशाह बन जायें। साम्राज्यवादी मनमानी अत्याचारी अन्यायपूर्ण और पक्षपातपूर्ण शासन व्यवस्था लागू करने का ऐलान कर ये सब करें। यही हाल आज कर्नाटक में है। कभी हिजाब कभी हलाल बनाम झटका और कभी मंदिर परिसरों में लगने वाले मेलों से एक वर्ग विशेष को बाहर किया जा रहा है। वहां भी एक साल के भीतर चुनाव होने हैं। अब यह बात ढकी छिपी नहीं रह गयी है कि एक संस्था और एक दल खुलेआम एक वर्ग विशेष का दानवीकरण करने पर तुला है। इस वर्ग के खिलाफ धर्म संसद के नाम पर आयेदिन ज़हर उगला जा रहा है। जुलूसों में लाउड स्पीकर लगाकर जबरन इस वर्ग के इलाकों में जाकर गंदी गंदी गालियां दी जा रही है। खुलेआम हथियार लहराये जा रहे हैं। सरकारें अव्वल तो इन मामलों का संज्ञान ही नहीं लेती। जब मामला कोर्ट में चला जाता है तो मजबूरन हल्की धाराओं मेें एफआईआर दर्ज की जाती हैं। इसके बाद सत्ता के इशारे पर जांच के नाम पर केस को कमज़ोर किया जाता है। नतीजा यह होता है कि कोर्ट से आरोपियों को जल्दी ही ज़मानत मिल जाती है। आरोपी फिर से अपने नफरत और झूठ फैलाने के मिशन में लग जाते हैं। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक और संघ परिवार की विचार धारा का विरोध करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के मामलोें मेें ज़रूरत से ज्यादा तेज़ी दिखाई जाती है। 

उनके मामलों में धारायें भी अधिक गंभीर लगाई जाती हैं। उनकी ज़मानतों का कोर्ट में लगातार विरोध किया जाता है। उधर कोर्ट जहां पहले छोटे छोटे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर पिछली सरकारों से सख़्ती से जवाब तलब करते थे। आजकल देखने में आ रहा है कि या तो सरकार के खिलाफ आने वाले केस सुनवाई के लिये लिस्टेड ही नहीं होते या फिर उन पर कोर्ट राहत देने में पहले जैसे उदार नहीं रहे हैं। कोर्ट के मामलों में अधिक कुछ इसलिये भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके पास कोर्ट की मानहानि का केस चलाने की पाॅवर है। सुप्रीम कोर्ट के एक चीफ जस्टिस ने कहा था कि इंसाफ केवल होना ही नहीं चाहिये बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिये। इतना तो साफ है कि आज न्याय हो भी रहा हो तो वह नज़र नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं सरकारों ने संविधान के खिलाफ काम करके भी विरोध के रास्ते बंद कर दिये हैं।                                        

*0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

Saturday, 26 March 2022

कांग्रेस और भाजपा

कई दशक कांग्रेस भाजपा का मुक़ाबला नहीं कर पायेगी?

0 पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद एक बार फिर साबित हो गया है कि आज देश में सबसे मज़बूत भाजपा और सबसे मजबूर कांग्रेस पार्टी बन चुकी है। आज़ादी के बाद का इतिहास देखें तो कांग्रेस केंद्र और राज्यों में एकछत्र राज करने वाली एकमात्र पार्टी थी। लेकिन 55 साल पहले कांग्रेस तमिलनाडू में हारी, 45 साल पहले बंगाल में हारी ,33 साल पहले यूपी और बिहार में हारी 32 साल पहले उड़ीसा में हारी और 27 साल पहले गुजरात में हारी व 12 साल पहले दिल्ली में हारी तो कभी सत्ता में नहीं लौटी। उत्तराखंड और पंजाब में भी लगता है उसके साथ यही कहानी दोहराई जायेगी। इतना ही नहीं राज्यों के साथ साथ कांग्रेस केंद्र में भी इसीलिये कमज़ोर होती जा रही है। 

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      पंजाब मंे चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी आज देश के मात्र दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता में रह गयी है। जुम्मा जुम्मा आठ दिन की आम आदमी पार्टी भी उसकी बराबरी करते हुए देश की ऐसी दूसरी पार्टी बन गयी है। जिसका राज दो राज्यों मेें हो गया है। हालांकि कांग्रेस का आधार संगठन और वोटबैंक आज भी भाजपा के बाद सबसे बड़ा है। आप को पूरे देश में ऐसा करने में अभी कई दशक लग सकते हैं। अब यह सवाल भी उठने लगा है कि कांग्रेेस 2024 के चुनाव के बाद मुख्य विपक्ष भी रह पायेगी या नहीं? कांग्रेस पर सबसे बड़ा आरोप वंशवादी पार्टी होने का लगता रहा है। लेकिन राज्यों के स्तर पर देखंे तो अखिलेश यादव तेजस्वी यादव नवीन पटनायक उद्ध्व ठाकरे और सुखवीर बादल सहित कई और पार्टी मुखिया अपने पिता की राजनीतिक विरासत के सहारे ही यहां तक पहंुचे हैं। लेकिन उनको लेकर इतनी हायतौबा नहीं मचती जितना निशाना राहुल गांधी पर साधा जाता है। इतना ही नहीं कांग्रे्रसमुक्त भारत का सपना देखने वाली भाजपा में भी पीयूष गोयल ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रवेश वर्मा पूनम महाजन और अनुराग ठाकुर व वरूण गांधी जैसे वंशवादी नेताओं की एक लंबी लिस्ट है। खुद कांग्रेस में भी कई और लीडर वंशवादी हैं। लेकिन उनको टारगेट नहीं किया जाता। इसकी वजह यह है कि राहुल गांधी आज तक सियासी तौर पर परिपक्व नहीं हो सके हैं। उनके पास कांग्रेस का कोई बड़ा पद भी नहीं है। लेकिन वह कांग्रेस को ऐसे चलाते हैं। जैसे कांग्रेस उनकी सियासी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हो। मिसाल के तौर पर कांग्रेस की प्रसीडेंट सोनिया गांधी हैं। उसके 9 महासचिवों में प्रियंका गांधी भी एक हैं। लेकिन राहुल इनमें शामिल नहीं हैं। राहुल किसी राज्य के प्रभारी भी नहीं हैं। कांग्रेस की एक वर्किंग कमैटी है। जिसके कुल 20 सदस्य हैं। राहुल गांधी उन 20 में से एक हैं। लेकिन गांधी परिवार से होने की वजह से वह फैसले इस तरह से करते हैं। जैसे वह कांग्रेस के सर्वेसर्वा हों? राहुल गांधी 2019 तक कांग्रेस के प्रेसीडेंट थे। लेकिन आम चुनाव में बुरी तरह हार के बाद उन्होंने नैतिक जि़म्मेदारी लेते हुए यह पद छोड़ दिया था। उसके बाद सोनिया फिर से कांग्रेस की कार्यवाहक मुखिया बन गयी थीं। लेकिन वह कभी भी किसी पब्लिक रैली जनसभा चुनाव प्रचार या इंटरव्यू में सामने नहीं आती। दूसरी तरफ बिना किसी बड़े पद के हर जगह राहुल गांधी कांग्रेस के एकमात्र चेहरे के तौर पब्लिक में आते हैं। उधर प्रियंका गांधी को कांग्रेसी बहुत बड़ा तुरूप के पत्ता मानकर चल रहे थे। लेकिन यूपी में प्रियंका ने जो सराहनीय विपक्ष के तौर पर संघर्ष किया उसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की सीट और वोट और भी कम हो गये। उधर सोशल मीडिया के द्वारा संघ परिवार राहुल को पप्पू और प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू को विलेन बनाने मंे लगा रहता है। राहुल गांधी ने एक बड़ी गल्ती और की है। उन्होंने कभी किसी राज्य के चुनाव प्रचार की जि़म्मेदारी लेकर कांग्रेस को जीत नहीं दिलाई। साथ ही वे मोदी की तरह किसी राज्य के सीएम भी नहीं बने। इतना ही नहीं 2004 से 2014 तक उनको तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने कई बार केंद्र में अपनी पंसद का मंत्रालय लेकर काम करने का प्रस्ताव दिया। जिससे राहुल अपनी योग्यता का लोहा मनवा सकते थे। लेकिन वह लगातार मना करते रहे। कांग्रेस ने भाजपा के गुजरात और आप के दिल्ली माॅडल की तरह किसी राज्य को आदर्श बनाकर जनता के सामने नहीं रखा। ऐसे ही कांग्रेस ने अन्य दलों की तरह किसी गैर गांधी कांग्रेसी को राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कभी उभरने नहीं दिया। इतना ही कई राज्यों में सरकार में रहते वहां के मुख्यमंत्रियों का इतना अपमान उपेक्षा और कद कम करने की साजि़श की गयी कि वे कांग्रेसी नेता मजबूर होेकर क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर कांग्रेस से अलग होकर नये दल बनाकर कांग्रेस का अपने राज्य से नाम व निशान मिटाने में लग गये। हाल ही में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ राहुल और प्रियंका ने उनको सीएम पद से हटाकर यह खेल किया। अगर आप गिनना चाहें तो ममता बनर्जी से लेकर हिमंत विस्व सर्मा तक देश के कम से कम 8 राज्यों में ऐसे सीएम या मुख्य क्षेत्रीय विपक्षी दल के  नेता आपको मिल जायेंगे जिनको कांग्रेस ने पार्टी से बाहर जाने को ज़लील किया। हमें नहीं लगता कांग्रेस अपनी भूलों को सुधारेगी। राहुल गांधी ट्विटर के अलावा भाजपा के प्रचार अभियान का जवाब देने को जब तक ज़मीन पर उतरकर अनशन आंदोलन और पदयात्रा नहीं करेंगे। कांग्रेस का ग्राफ दिन ब दिन गिरता ही जायेगा। कांग्रेस को शायद यह गलतफहमी है कि जब लोग भाजपा की साम्प्रदायिक समाजविरोधी और संकीर्ण नीतियों से तंग आकर तौबा करना चाहेंगे तो वे खुद ही कांग्रेस के पास वोट व सपोर्ट करने आयेंगे। लेकिन कांग्रेस यह भूल रही है कि उसकी जगह तेज़ी से सपा बसपा आरजेडी टीएमसी एनसीपी और आम आदमी पार्टी राज्यों में और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर लेती जा रही है। मिसाल के तौर पर जिन राज्यों की सत्ता से कांग्रेस एक बार बाहर हो गयी और वहां उसकी जगह भाजपा या किसी क्षेत्रीय दल ने ले ली वहां फिर कभी अपवाद छोड़कर कांग्रेस की वापसी सत्ता में नहीं हो पाती है। इतना ही नहीं आज के दौर में जहां जिस राज्य में जिस दल का राज है। वहां उसी दल के सांसद भी लोकसभा चुनाव में जीतने लगे हैं। कांग्रेस अपनी अकेला चलने की अकड़ छोड़कर जब तक क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत विचारधारा और काॅमन मिनिमम प्रोग्राम के आधार पर साझा मोर्चा नहीं बनायेगी। उसके वापस केंद्र की सत्ता में आने के दूर दूर तक आसार नहीं हैं। दूसरी बात पीएम मोदी का कोई विकल्प कांग्रेस के पास नहीं खुद भाजपा या किसी अन्य दल के पास भी आज नहीं है। कोई माने या ना माने मोदी देश के एक बड़े हिंदू वर्ग के दिलों पर राज करने लगे हैं। यही वजह है कि महंगाई बेरोज़गारी और कोरोना में तमाम नुकसान उठाकर भी जनता का बहुमत न केवल उनको केंद्र में बार बार सत्ता सौंप रहा है बल्कि उनके नाम पर कई राज्यों में भी भाजपा जीत रही है। अगर कांग्रेस अन्य सेकुलर दलों को साथ लेकर जनता का हिंदुत्व से कट्टर बन रहे दिमाग का ब्रेनवाश बड़े पैमाने पर आज नहीं करेगी तो वह कई दशक सत्ता से दूर रहेगी।                                         

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

भाजपा और मुसलमान

*भाजपा और मुसलमान एक दूसरे का विरोध क्यों करते हैं?*

0एबीपी लाइव डोटकाॅम की ख़बर के अनुसार यूपी में रामपुर की विलासपुर सीट से लगभग 300 वोट से बड़ी मुश्किल से जीते भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री बलदेव सिंह औलख ने आरोप लगाया है कि मुसलमानों ने हमारी सरकार की तमाम लाभकारी योजनाआंे का लाभ उठाया लेकिन फिर भी विधानसभा चुनाव में भाजपा को सपोर्ट नहीं किया। उन्होंने चेतावनी भी दी कि अब यूपी में बुल्डोज़र और तेज़ चलेगा। औलख ने यहां तक कह दिया कि अब हमें यह सोचना पड़ेगा कि भाजपा को हराने के लिये कोई कसर ना छोड़ने वाले मुसलमानों का क्या करना है? यह सच है कि मुसलमान आमतौर पर भाजपा को वोट नहीं देते लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि भाजपा मुसलमानों के विरोध का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती ऐसा क्यों है?    

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       विश्वसनी सर्वे एजंसी के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो इस चुनाव में मुसलमानों ने सपा को सबसे अधिक 79 परसेंट वोट किया है। लेकिन यही सर्वे बताता है कि उनका 8 परसेंट वोट भाजपा को भी गया है। जबकि पिछले चुनाव में उनका 19 परसेंट वोट लेने वाली बसपा को इस बार केवल 6 परसेंट मतदान हुआ है। यानी भाजपा से भी कम। उधर यादवों ने सपा को सर्वाधिक 83 परसेंट वोट किया है। ऐसे ही जाटवों ने बसपा को सबसे अधिक 65 परसेंट वोट दिया है। लेकिन भाजपा नेता जब केवल मुसलमानों को वोट ना देने के लिये टारगेट करते हैं तो मुसलमानों की यह शिकायत सही नज़र आती है कि उनको तो केवल मुसलमानों पर निशाना साधना है। इस बात को इस तरह भी समझा जा सकता है कि भाजपा को केवल 41 परसेंट लोगों ने वोट दिया है। इसका मतलब साफ है कि उनको 59 परसेंट जनता ने नापसंद किया है। लेकिन भाजपा नेता आधे से अधिक जनता को बुल्डोज़र तेज़ चलाने की धमकी नहीं देते क्योंकि वे सब मुसलमान नहीं हैं? सवाल यह भी है कि लोकतंत्र में क्या यह होता है कि जो वोट नहीं देगा उसको सरकार सबक़ सिखायेगी? अगर ऐसा ही है तो फिर भाजपा नेता मुसलमानों के साथ साथ यादवों और जाटवों को क्यों नहीं चेतावनी देते? रही बात सरकारी सुविधायें लेकर भी वोट ना देने की तो क्या ये सुविधायें भाजपा पार्टी दे रही है या सरकार? अगर सरकार दे रही है तो वो तो सबकी ही होती है। इसमें अहसान या उसके बदले में वोट की आशा करने का क्या मतलब है? सरकार तो उस सार्वजनिक धन व राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय संसाधनों की मात्र चैकीदार है जिसको जनता यानी असली मालिक कभी भी बदल सकता है। क्या यह बताने की भी ज़रूरत है कि जो भी लाभार्थी योजनायें चलायी जा रही हैं उनमें तरह तरह के टैक्स के द्वारा सभी धर्मों और जातियों का योगदान होता है। इसमें यह तर्क भी काम नहीं करता कि इनकम टैक्स कितने मुसलमान देते हैं? क्योंकि कम लोगों को मालूम है कि न तो सरकारी योजनायें केवल आयकर से चलती हैं और ना ही 138 करोड़ की आबादी में से मात्र 6 करोड़ रिटर्न भरने वाले सभी लोग कर अदा करते हैं। इनमें से केवल डेढ़ करोड़ लोग ही टैक्स चुकाते हैं। अलबत्ता जीएसटी और दूसरे कई तरह के चार्ज व फीस जो सरकार की इनकम का बहुत बड़ा साधन हैं। उनमें कम या अधिक सभी लोगों का हिस्सा सरकार को मिलता ही है। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जिस दिन से जनसंघ या भाजपा बनी और उसने एक के बाद एक चुनाव जीतकर सरकार बनानी शुरू की वह हिंदुत्व के नाम पर मुसलमानों का विरोध क्यों करती रही है? इस विरोध के बड़े कारण देखें तो चाहे बाबरी मस्जिद का मामला हो, कश्मीर की धारा 370 हो या काॅमन सिविल कोड भाजपा ने अकसर वो स्टैंड लिया जो मुसलमानों की सोच के खिलाफ माना जाता रहा है? इतना ही नहीं भाजपा ने आतंकवाद को मुसलमानों से जोड़ा और आडवाणी ने रथयात्रा निकालकर पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया जिससे हिंदू मुस्लिम के बीच दरार बढ़ती गयी। गुजरात में 2002 के दंगों को लेकर देश विदेश में जो छवि बनी उससे यह धरणा और भी मज़बूत हुयी कि मुसलमान भाजपा राज में ना केवल सुरक्षित नहीं है बल्कि उसको अत्याचार होने पर न्याय भी नहीं मिलेगा? इतना ही नहीं 3 तलाक से लेकर असम में जिस तरह से एनआरसी की कवायद हुयी उससे भी यह संदेश गया कि भाजपा सरकार जानबूझकर मुसलमानों को टारगेट कर रही है? जब सीएए आया और उसके मुसलमान विरोधी प्रावधन के खिलाफ मुसलमानोें ने आंदोलन किया तो यूपी में जिस तरह गैर कानूनी तरीके से अनावश्यक बल प्रयोग कर उनको सबक सिखाया गया उससे भी यही लगा कि भाजपा सरकारें हिंदू समर्थक कम मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह से अधिक काम कर रही हैं? दिल्ली के शाहीन बाग में ऐतिहासिक शांतिपूर्ण धरना देने वाली मुस्लिम महिलाओं को जिस तरह से टारगेट किया गया और इसके बाद पूर्वी दिल्ली में दंगा हुआ और सीएए विरोधी आंदोलन करने वालों को उसमें चुनचुन कर फंसाया गया। उससे भी यह लगना स्वाभाविक ही है कि मुसलमानों को संविधान में दिये गये समान  नागरिक अधिकार अब ना केवल दिये नहीं दिये जायेंगे बल्कि वे अगर इस प्रयास का विरोध लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण ढंग से भी करेंगे तो उनको ऐसा सबक सिखाया जायेगा कि वे भविष्य में ऐसा करने से पहले सौ बार सोचें। हालांकि जिन लोगों ने सीएए विरोधी आंदोलन में कानून हाथ में लिया उनको सज़ा मिलनी ही चाहिये थी। लेकिन यह भेदभावपूर्ण नहीं होना चाहिये क्योंकि हरियाणा में जाटों और राजस्थान में गूजरों व गुजरात में पटेलों ने आरक्षण की मांग को लेकर जो हिंसक आंदोलन किये उनको बिना सख्त कार्यवाही के लिये छोड़ दिया गया। ऐसे ही एंटी रोमियों अभियान लव जेहाद विरोधी कानून और यूएपीए का जमकर भाजपा सरकारों ने मुसलमानों के साथ साथ अपने विरोधी अन्य वर्ग के लोगों के खिलाफ दुरूपयोग किया है। डाॅक्टर कफील खान उमर खालिद से आज़म खान तक जिस तरह बड़े मुस्लिम नाम वाले लोगों को सुनियोजित तरीके से फंसाकर आज तक बिना अपराध साबित हुए उनकी ज़मानत का विरोध कर जेल में रखा गया है। बुल्ली सेल और सुल्ली डील जैसे मुस्लिम महिला विरोधी और भी अनेक मामले गिनाये जा सकते हैं। जिससे मुसलमानों में यह धारणा  बनी कि उनको जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। मुसलमानों की यह भी बड़ी शिकायत है कि भाजपा उनको उनकी आबादी के अनुपात में चुनाव में लड़ने को टिकट नहीं देती जिससे उनका लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व कम होता जा रहा है। इस पर भाजपा का यह तर्क किसी हद तक ठीक लगता है कि टिकट देते समय प्रत्याशी के जीतने की संभावना सबसे बड़ा कारण होता है। यह भी सच है कि शुरू शुरू में भाजपा ने चंद मुसलमानों को टिकट दिये लेकिन उनको उनके समाज के वोट ना मिलने और हिंदुओं के वोट उस उम्मीदवार के मुसलमान होने से कम मिलने से वो सब हारते रहे। लेकिन यहां सौ टके का सवाल फिर यही पूछा जायेगा कि भाजपा जब हर मुद्दे हर मामले और हर मोड़ पर मुसलमानों का विरोध करती रहेगी तो मुसलमान उसको वोट कैसे देगा? आज अगर लाभार्थी योजना से भाजपा का एक नया वोटबैंक बन रहा है तो उसमें 8 परसेंट मुसलमान भी जुड़ने लगा है जो आगे और भी बढ़ सकता है।                                        

 *0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

Sunday, 13 March 2022

2022 की जीत

यूपी में लाभार्थी, महिलायें और दलित भाजपा के बने खेवनहार!

0पांच राज्यों के चुनाव में से जहां चार राज्यों में भाजपा सत्ता में वापसी करती साफ नज़र आ रही है। वहीं कांग्रेस को खत्म कर राष्ट्रीय राजनीति में तेज़ी से अपनी जगह बनाती आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से दिल्ली के बाद पंजाब में रिकाॅर्ड जीत हासिल की है। उससे यह साफ हो गया है कि अब भारत की राजनीति हिंदुत्व के दौर से लाभार्थी के दौर में प्रवेश कर रही है। इन पांच राज्यों में से यूपी की जीत इसलिये भी भाजपा के लिये अहम थी कि इसी से वह 2024 का आम चुनाव जीतने के बारे में सोच सकती है। आपको याद होगा हम लगातार यह बात लिखते रहे हैं कि पिछड़ी जातियों का बहुमत यूपी में आज भी भाजपा के साथ है और यूपी वही जीतेगी।   

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       जिस समय हम यह लेख लिख रहे हैं। उस समय तक पांच राज्यों के पूरे नतीजे दलगत आधार पर सीटें उनको मिले वोट और भाजपा व आप को बहुमत देने वाले मतदाताओं का विस्तार से विवरण सामने नहीं आया है। लेकिन इतना साफ हो गया है कि भाजपा पांच में से चार राज्यों में फिर से सरकार बनाने जा रही है। यह भी दीवार पर लिखी इबारत की तरह तय हो गया है कि एक के बाद एक राज्य खोती जा रही कांग्रेस के ताबूत में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने पंजाब में उससे दिल्ली की तरह सत्ता छीनकर कांग्रेसमुक्त भारत बनाने के भाजपा के अभियान को ही आगे बढ़ा दिया है। जहां तक यूपी का सवाल है। यहां संघ परिवार गुजरात के बाद यूपी को अपनी दूसरी प्रयोगशाला बनाने में सफल होता नज़र आ रहा है। जिस तरह से पिछले पांच साल में योगी ने यूपी जैसे देश के सबसे बड़े राज्य में राज किया है। एक तरह से जनता ने उस पर मुहर लगा दी है। संघ योगी को भविष्य के पीएम के तौर पर प्रोजैक्ट कर रहा है। अगर भाजपा यूपी या योगी हार जाती तो उसका 2024 का केंद्र की सत्ता में आने का सपना भी पूरा होना मुश्किल हो सकता था। हालांकि यह सबको पहले से ही पता था कि यूपी में अगर भाजपा सत्ता में वापसी करती भी है तो उसको पहले की बराबर सीटें और वोट नहीं मिल पायेंगे। लेकिन यहां मोदी योगी और भाजपा ने इस धारणा को आधा झुठला दिया। हालांकि उनकी सीटंे तो कम हुयीं लेकिन वोट उल्टा कुछ बढ़ रहे हैं। इसके पीछे का राजनीतिक समीकरण समझने के लिये हमें यह देखना होगा कि वो कौन सा नया वोट है। जो भाजपा का 5 से 10 प्रतिशत वोट सपा गठबंधन के साथ जाने के बावजूद उसके साथ नया आया है। सपा 21 फीसदी से जहां इस चुनाव में 36 फीसदी वोट तक पहंुचती लग रही है। वहीं बसपा का वोट 22 फीसदी से घटकर 13 फीसदी तक नीचे आता लग रहा है। उधर भाजपा 39 फीसदी से 43 फीसदी तक पहंुचती नज़र आ रही है। इसकी वजह यह भी है कि मुकाबला सीधा हो गया है। कांग्रेस का वोट भी घट गया है। अन्य छोटे दल और निर्दलीय भी वोट कम काट सके हैं। इसमें मतदान का 10 से 15 प्रतिशत अधिक वोट तो महिलाओं का माना जा रहा है। जिन्होंने अपने परिवार के मुखिया या पुरूषों से अलग राह चलते हुए बेरोज़गारी महंगाई या कोरोना से हुए नुकसान को दरकिनार करते हुए योगी सरकार के कथित महिला सुरक्षा पर चुपचाप अतिरिक्त लगभग 5 प्रतिशत मतदान किया है। इसके साथ ही निशुल्क अनाज शौचालय उज्जवला गैस कनैक्शन जलनल योजना निशुल्कआवास श्रमिक नकद सहायता पेंशन जनधन खातों में नकद स्थांतरण किसान सम्मान योजना मुद्रा लोन व अन्य कल्याणकारी स्कीमों की वजह से लगभग 10 प्रतिशत का एक नया वोटबैंक बन गया है। जो कि बिना किसी चर्चा के खामोशी के साथ भाजपा के पक्ष में मतदान करके आया है। इतना ही नहीं यूपी में बसपा ने भाजपा के साथ एक गोपनीय समझौते के तहत अपने दलित वोट का जाटव वर्ग भी एक तिहाई भाजपा को अपने संगठन को दिये गुप्त संदेश के द्वारा चुपचाप ट्रांस्फर करा दिया है। इनमें से एक हिस्सा वह भी है। जो यह देखकर भाजपा के साथ आराम से चला गया है कि भाजपा ने तीन तीन बार बहनजी को मुख्यमंत्री बनवाया है। साथ ही जाटव वोट ने उन सीटों पर भी सपा गठबंधन को हराने के लिये भाजपा का रूख़ किया है। जहां मुस्लिम मतदाता उसे थोक में सपा या उसके सहयोगी दलों के साथ जाता दिखा है। जाटव वोट को बहनजी अपने बयानों में इशारा कर रही थीं कि उनका बड़ा विरोधी सपा है। भाजपा नहीं। यूपी में भाजपा की जीत में लाभार्थियों का योगदान यूं भी आंका जा सकता है कि पंजाब में जिस तरह से आप ने कांग्रेस का सफाया किया है। उसके पीछे उसकी कोई खास विचारधारा या उसूल नहीं हैं। बल्कि निशुल्क बिजली पानी हर महिला को पेंशन और सस्ता व बढि़या चिकित्सा व शिक्षा का माॅडल ही है। यानी उसकी जीत का आधार भी एक तरह से वही लाभार्थी का बन रहा नया वर्ग है। साथ ही भाजपा के लिये योगी भी मोदी के बाद एक तरह से हिंदू ब्रांड बनकर उभरे हैं। जिसमें उनकी सख़्त शासक की छवि लाॅ एंड आॅर्डर पर मायावती की तरह कड़ी नज़र और एक वर्ग विशेष को काबू में रखना भी खूबी मानी जा रही है। एक तरह से देखा जाये तो भाजपा ने यह समझ लिया था कि हिंदुत्व की वोट दिलाने की अपनी सीमा है। संघ परिवार यह भी मानकर चल रहा था कि 5 साल में कुछ ना कुछ एंटी इनकम्बैंसी भी होनी ही है। उसने इन सबसे होने वाले नुकसान की वैकल्पिक पूर्ति के लिये पहले ही योजना तैयार कर काम बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया था। जिसका उसे आज चुनाव में लाभ मिला है। उधर चुनाव को त्रिकोणात्मक बनाने की बजाये बसपा ने रहस्यमयी चुप्पी साधकर इन आशंकाओं को बल दिया कि वे जांच होने पर जेल जाने से डरकर गुप्त रूप से भाजपा की मदद कर रही हैं। इससे ना केवल उनको सवर्ण और मुसलमान वोट नहीं मिले बल्कि उनका कोर वोटबैंक यानी जाटव भी उनसे इस बार काफी हद तक छिटक गया। अखिलेश यादव भी चुनाव आने से दो तीन महीने पहले ही एक्टिव हुए। उन्होंने पिछड़ों का विश्वास पूरी तरह प्राप्त नहीं किया और कुछ छोटे दलों व स्वामी प्रसाद मौर्य धर्म सिंह सैनी व दारा सिंह चैहान जैसे गिनती के पिछड़े नेताओं के भाजपा से सपा में आने से यह समझा लिया कि वे कमंडल को मंडल से हरा देंगे। दलबदल करने वाले नेताओं की हालत इतनी पतली थी कि इनमें से एक तो खुद अपना ही चुनाव हार गये। अखिलेष यह भी भूल गये कि उनको तो किसान आंदोलन और जाट घर से बुलाकर खुद चुनावी मुकाबले में लाये हैं।                                        

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।